आगरा अकाल और गंगा नहर का है, गहरा संबंध

मेरठ

 21-12-2021 09:06 AM
उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

धरती पर प्राचीन समय से ही विभिन्न प्रकार की आपदाएं आती रही हैं, जिसने जन-जीवन को बुरी तरह से प्रभावित किया है। अकाल भी आपदा का ही एक रूप है, जो अपने साथ कुपोषण, भुखमरी, महामारी और बढ़ती मृत्यु दर लाता है। सामान्य शब्दों में अकाल भोजन की व्यापक कमी है, जो युद्ध, प्राकृतिक आपदा, फसल की विफलता, जनसंख्या असंतुलन, व्यापक गरीबी, आर्थिक तबाही या सरकारी नीतियों सहित विभिन्न कारकों की वजह से होता है।ब्रिटिश शासन के दौरान भारत को अनेकों अकालों का सामना करना पड़ा।1760 से लेकर 1943 तक भारत बार-बार अकाल की चपेट में रहा।
ब्रिटिश सूत्रों के अनुसार,इन अकालों में 85 मिलियन से अधिक भारतीय मारे गए थे। इन अकालों में 1770 का ग्रेट बंगाल अकाल, 1782-84 का चालीसा अकाल, 1788-94 का दोजी बारा अकाल या खोपड़ी (Skull) अकाल, 1837-38 का आगरा अकाल, 1860-61 का ऊपरी दोआब अकाल, 1866 का उड़ीसा अकाल, 1869 का राजस्थान अकाल, 1873-74 का बिहार अकाल, 1876-78 का दक्षिणी भारत का अकाल, 1896- 97 का भारतीय अकाल, 1899-1900 का भारतीय अकाल, 1943 का बंगाल अकाल शामिल है।1837-38 (अर्थात संवत वर्ष 1894) का आगरा अकाल भारत के इतिहास की एक दुखद घटना है।ब्रिटिश राज के शुरुआती दिनों के दौरानयह अकाल उत्तर भारत में आज के जिलों - कानपुर, इटावा, मैनपुरी, आगरा और कालपी के क्षेत्र मेंव्यापक मौत और भुखमरी का कारण बना था। इस अकाल ने 25,000 वर्ग मील (65,000 वर्ग किलोमीटर) के क्षेत्र और 80 लाख लोगों की आबादी को प्रभावित किया।1838 के अंत तक, लगभग 800,000 लोग भुखमरी से मर चुके थे। इस अकाल को लोक स्मृति में “चौरानव्वे” के रूप में भी जाना जाता है, क्यों कि यह संवत कैलेंडर में वर्ष 1894 का समय था।इस अकाल से राहत दिलाने में गंगा नहर की विशेष भूमिका रही। जब अकाल की वजह से आठ लाख लोग मारे जा चुके थे, तब एक इंजीनियर ने 500 किलोमीटर लंबी नहर का निर्माण शुरू किया। यह मानव निर्मित संरचना बहुत भव्य थी, जिसे ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियोजितइंजीनियरप्रोबी कॉटली (Proby Cautley) द्वारा बनाया गया था।कॉटली सत्रह साल की उम्र में भारत आए और बंगाल आर्टिलरी (Artillery) में शामिल हो गए। 1825 में, उन्होंने पूर्वी यमुना नहर के निर्माण के प्रभारी इंजीनियर कैप्टन रॉबर्ट स्मिथ (Robert Smith) की सहायता की।1836 तक, वह नहरों के अधीक्षक-जनरल थे। शुरू से ही, उन्होंने गंगा नहर बनाने के अपने सपने की दिशा में काम किया, और छह महीने जंगलों और ग्रामीण इलाकों में घूमने और सवारी करने में बिताए, ताकि वह अपनी परियोजनाओं को सफल रूप दे सकें। गंगा नहर बनाने की उनकी परियोजना में कई आपत्तियां और बाधाएं थीं, (उनमें से अधिकतर वित्तीय), लेकिन कॉटली ने दृढ़ता से काम किया और अंततः ईस्ट इंडिया कंपनी को अपना समर्थन करने के लिए राजी कर लिया। जबकि ब्रिटिश कंपनी की नौकरशाही नहर को एक अनावश्यक खर्च मानती थी, लेकिन कॉटली ने अपने सहयोगियों को आश्वस्त किया कि नहर के निर्माण से कृषि राजस्व में काफी वृद्धि होगी।नहर के लिए खुदाई 1839में शुरू हुई, लेकिन जल्द ही कॉटली को बाधाओं का अहसास हुआ। नहर निर्माण के लिए सही ईंटें उपलब्ध नहीं थीं, न ही मोर्टार मौजूद थे। इतने परिमाण और पैमाने की परियोजना के लिए, पर्याप्त इंजीनियर और जलविज्ञानी भी नहीं थे।कॉटली ने प्रत्येक समस्या को धैर्य और दृढ़ता के साथ निपटाया। इसके लिए उन्होंने एशिया (Asia) के पहले इंजीनियरिंग कॉलेज, थॉमसन कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (Thomasson College of Engineering) की स्थापना की, जो अब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानरुड़की के नाम से जाना जाता है।हरिद्वार के पुजारियों ने पवित्र गंगा के मुक्त प्रवाह को अवरुद्ध करने के कॉटलीके प्रयासों पर कड़ी आपत्ति जताई। लेकिन उन्होंने भारत के सबसे पवित्र स्थान, हर-की-पैड़ी पर पानी को अनियंत्रित रूप से बहने देने के लिए, बांध में एक अंतर छोड़ने काआश्वासनदिया।नहर के उद्घाटन के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा गणेश पूजा का आयोजन किया गया था।गंगा नहर परियोजना को पूरा करना आसान नहीं था। प्रमुख मुद्दों में पहाड़ी धाराओं की समस्या थी, जिससे नहर को खतरा था।रुड़की के पास, जमीन तेजी से कम हो रही थी,और कॉटली को नहर को आधा किलोमीटर तक ले जाने के लिए एक जलसेतु का निर्माण भी करना पड़ा। नतीजतन, रुड़की में नहर मूल नदी से 25 मीटर ऊंची है। कॉटली ने 1851 में सामग्री परिवहन के लिए भारत का पहला स्टीम इंजन भी संचालित किया था।
जब नहर औपचारिक रूप से 1854 में खुली तो इसका मुख्य चैनल 560 किलोमीटर लंबा था, इसकी शाखाएँ 492 किलोमीटर लंबी थीं और 4,800 किलोमीटर से अधिक लंबीविभिन्न सहायक नदियाँ 5,000 गांवों की सिंचाई के काम आती थी। हरिद्वार से कानपुर तक फैली इस परियोजना के लिएप्रत्येक पुल, वाटर लॉक, मिल इत्यादि कोस्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया। नहर के लिए कॉटली के जुनून के परिणामस्वरूप उन्हें कई व्यक्तिगत समस्याएं भी हुईं। उस समय अंग्रेजों द्वारा भारत में कोई इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित नहीं किया गया था, लेकिन गंगा नहर निर्माण परियोजना की आवश्यकता के कारण रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज का निर्माण किया गया।हालांकि कॉटली के प्रयास से पूर्वी उत्तर प्रदेश में सूखे और बाढ़ की समस्याओं से निजात पाने में सहायता प्राप्त हुई, लेकिन यह प्रयास क्षेत्रकी समृद्धि का कारण भी बना।नहर के ऊपर और नीचे प्रवासी पक्षियों के झुंड को देखा जा सकता है, जो दर्शाता है कि नहर ने अपने आप में एक पारिस्थितिकी विकसित की है।

संदर्भ:
https://bit.ly/3sl86rL
https://bit.ly/3yGusoZ
https://bit.ly/30Hd9HC
https://bit.ly/3pbvwhm
https://bit.ly/3yHgtzd

चित्र संदर्भ

1.अकाल के दौरान जमा हुए लोगों को दर्शाता एक चित्रण (istock)
2. मद्रास में भारी अकाल के गवाह रहे लोगों को दर्शाता एक चित्रण (flickr)
3. हर-की-पैड़ी को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)

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