भारत में लकड़ी की बढ़ती मांग की पूर्ती कैसे हो

पेड़, झाड़ियाँ, बेल व लतायें
20-11-2021 11:00 AM
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भारत में लकड़ी की बढ़ती मांग की पूर्ती कैसे हो

भारत में लकड़ी के बाजार का विश्लेषण करने वाली एक आईटीटीओ (ITTO) रिपोर्ट‚ जो 2030 तक भारत के लकड़ी बाजार की गतिशीलता का विश्लेषण करती है‚ के अनुसार भारत में 2030 तक लकड़ी की खपत में पर्याप्त वृद्धि होने की संभावना है‚ लकड़ी के उत्पादन और मांग के बीच मौजूदा कमी और लकड़ी के आयात पर देश की निर्भरता में वृद्धि होगी। प्रोमोद कांत और रमन नौटियाल द्वारा लिखित इंडिया टिम्बर सप्लाई एंड डिमांड 2010-2030 (India Timber Supply and Demand 2010–2030)‚ 2010-2019 के लिए ऐतिहासिक रुझानों की समीक्षा करके और 2030 तक संभावित स्थिति का अनुमान लगाकर भारत के लकड़ी बाजार की गतिशीलता का विश्लेषण करता है। रिपोर्ट से पता चलता है‚ कि भारत के वन क्षेत्रों में लगभग दो दशकों से लगातार वृद्धि हुई है‚ लकड़ी का उत्पादन अभी भी खपत से काफी कम है और मांग का एक बड़ा हिस्सा आयात द्वारा पूरा किया जा रहा है। इस रिपोर्ट में तीन मुख्य खंड हैं: पहला खंड पिछले दशक में भारतीय वन क्षेत्रों के विकास की समीक्षा करता है‚ जिसमें वन आवरण और लकड़ी के बढ़ते स्टॉक में परिवर्तन शामिल हैं। दूसरा खंड भारत के लकड़ी आधारित उद्योग में रुझानों का विश्लेषण करता है‚ जिसमें राउंडवुड (roundwood)‚ सावनवुड (sawnwood)‚ प्लाईवुड (plywood)‚ फाइबरबोर्ड (fibreboard)‚ हूपवुड (hoopwood)‚ पल्प (pulp) तथा वेनीर (veneer) के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार शामिल हैं तथा रिपोर्ट का तीसरा खंड जनसंख्या और आय में संभावित वृद्धि‚ लकड़ी की खपत के रुझान तथा महत्वपूर्ण लकड़ी आधारित उद्योगों में वृद्धि के आधार पर 2021-2030 के लिए मांग का अनुमान प्रदान करता है। इस अध्ययन में‚ अगले दशक में भारत में राउंडवुड की मांग में लगभग 70% की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है‚ जो बड़े पैमाने पर निर्माण क्षेत्र द्वारा संचालित है। भारत को मांग में इस उछाल को पूरा करने के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर रहने की आवश्यकता होगी‚ क्योंकि घरेलू उत्पादन देश की संरक्षण-उन्मुख वन नीति द्वारा प्रतिबंधित है।
भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) (Confederation of Indian Industry) द्वारा आयोजित 10वें स्थिरता शिखर सम्मेलन (Sustainability Summit) में‚ केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) (public-private partnership) मोड के माध्यम से निम्‍नीकृत जंगलों को वनों में बदलने के केंद्र के फैसले के बारे में बात की थी। इसी तरह का ऐलान‚ राष्ट्रीय कृषि वानिकी नीति 2014 (National Agroforestry policy 2014) की घोषणा के दौरान भी किया गया था‚ जिसमें कृषि वानिकी और एग्रोफारेस्ट्री (Agroforestry)को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया था। फिर भी धरातल पर कोई कार्रवाई होती नहीं दिखाई दी। निरंतर बढ़ती जनसंख्या के लिए भारी मात्रा में लकड़ी की आवश्यकता होती है‚ जो बदले में मौजूदा वन संपदा पर अत्यधिक दबाव डालती है। वर्तमान संदर्भ में‚ पारिस्थितिक स्थिरता और आर्थिक विस्तार के लिए स्वदेशी प्रजातियों का उपयोग करके पहले से विकसित कृषि वानिकी मॉडल को बढ़ाने की आवश्यकता है। देश में लकड़ी उत्पादन के लिए पेड़ों की उत्पादन क्षमता लगभग 0.7 घन मीटर/हेक्टेयर/वर्ष तक सीमित है‚ जबकि विश्व औसत 2.1 घन मीटर/हेक्टेयर/वर्ष है। इससे मांग और आपूर्ति के बीच भारी अंतर पैदा होता है। राष्ट्रीय वानिकी कार्य योजना के अनुसार‚ 2006 में भारत कीलकड़ी की आवश्यकता 82 मिलियन क्यूबिक मीटर थी‚ जबकि घरेलू उपलब्धता केवल 27 मिलियन क्यूबिक मीटर थी। पिछले 10 वर्षों में‚ लकड़ी के आयात पर खर्च किया गया धन 2001 में यूएस डॉलर 1 बिलियन से बढ़कर 2011 में यूएस डॉलर 5 बिलियन से अधिक हो गया है। घरेलू लकड़ी के संसाधनों की कमी और बढ़ती मांग के कारण‚ देश में लकड़ी का आयात 2006 के बाद से दोगुना हो गया है। चूंकि भूमि एक सीमित संसाधन है‚ इसलिए कृषि क्षेत्रों का विस्तार संभव नहीं है। लेकिन कृषि वानिकी और एग्रोफारेस्ट्री के तहत तेजी से बढ़ने वाले पेड़ों को लगाने और एकीकृत करके खेतों की दक्षता बढ़ाना लकड़ी की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए एक उचित और यथार्थवादी विकल्प है। वन के बाहर तेजी से बढ़ने वाले वृक्षों को कृषि-वानिकी या एग्रोफारेस्ट्री के रूप में रोपना ही‚ राष्ट्रीय वन नीति 1988 के अनुसार‚ वन वृक्ष आवरण को वर्तमान 24.01 प्रतिशत से बढ़ाकर 33 प्रतिशत करने के आवश्यक लक्ष्य को पूरा करने का एकमात्र तरीका है। वन आच्छादन बढ़ाने के लिए वनवासियों को अक्सर वृक्षारोपण या वन क्षेत्रों में विदेशी पेड़ों को लगाने और बढ़ावा देने के लिए लक्षित किया जाता है। पिछले दो दशकों में‚ लकड़ी आधारित उद्योगों और वृक्षारोपण कंपनियों ने कच्ची लकड़ी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए यूकेलिप्टस (Eucalyptus)‚ कैसुरीना (Casuarina)‚ पोपलर (Poplar) और सुबाबुल (Subabul) जैसे विदेशी पेड़ों को लगाने पर जोर दिया है। कुछ प्रजातियां जैसे; पोपलर और कैसुरीना एक विशेष भौगोलिक स्थान तक ही सीमित हैं। विदेशी प्रजातियां‚ स्थायी समाधान नहीं है क्योंकि वे स्वदेशी प्रजातियों पर पनपती हैं। इसके अलावा विदेशी वृक्ष प्रजातियों की‚ मौजूदा वनस्पति और फसलों पर उनके प्रभाव के संदर्भ में कुछ सीमाएं होती हैं। नीम‚ मेलिया (Melia)‚ कदम (Kadam)‚ ऐलेन्थस (Ailanthus) और होलोंग (Hollong) जैसी देशी प्रजातियों को विदेशी प्रजातियों के विकल्प के रूप में आजमाया गया‚ जिसमें मेलिया एक ऐसी स्वदेशी वृक्ष प्रजाति पाई गई‚ जो व्यापक रूप से अनुकूल है। यह तेजी से बढ़ने वाला पर्णपाती पेड़ है‚ जो 20-25 मीटर की ऊंचाई प्राप्त करता है। ये दक्षिण-पूर्व एशिया (Asia) और ऑस्ट्रेलिया (Australia) की एक स्वदेशी प्रजाति है‚ जो भारत में स्वाभाविक रूप से 600- 1‚800 मीटर की ऊंचाई पर पायी जाती है‚ खासकर सिक्किम हिमालय‚ उत्तरी बंगाल‚ असम‚ खासी पहाड़ियों‚ ओडिशा के पहाड़ी क्षेत्रों‚ दक्कन पठार और पश्चिमी घाट में। इसे भारत के अधिकांश हिस्सों में सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है‚ जहां 1‚000 मिलीमीटर की वार्षिक वर्षा होती है और न्यूनतम तापमान 0-15 डिग्री सेल्सियस और अधिकतम तापमान 30-43 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है। इसकी लकड़ी की गुणवत्ता इसे प्लाईवुड‚ माचिस की तीली और कागज उद्योग में उपयोग के लिए एक आदर्श कच्चा माल बनाती है। इस पेड़ की लकड़ी का उपयोग फर्नीचर‚ संगीत वाद्ययंत्र‚ पैकिंग केस और कृषि उपकरण बनाने के लिए भी किया जा सकता है क्योंकि यह दीमक प्रतिरोधी है। भारत में खेती एक लाभदायक व्यवसाय है। वर्तमान कृषि प्रणाली के तहत‚ फसल की खेती को उत्पादक माना जाता है‚ यदि एक किसान एक औसत परिवार को बनाए रखने के लिए सालाना 1‚00‚000 रुपये से 1‚20‚000 रुपये प्रति हेक्टेयर का न्यूनतम लाभ अर्जित करने में सक्षम है। एक कृषि व्यवसाय शुरू करने के लिए यह पता लगाना आवश्यक है‚ कि कौन सी फसल या पेड़ व्यवसाय की सफलता के लिए या लाभ कमाने में मदद करेगा। आय की लाभप्रदता मुख्य रूप से ग्राहकों या खरीदारों की मांग पर निर्भर करती है। ग्राहकों या खरीदारों द्वारा उत्पाद की मांग होगी तो कृषि व्यवसाय बढ़ेगा। जो फसलें सबसे अधिक लाभ प्रदान करती हैं‚ उनकी बाजार में खरीदारों द्वारा सबसे अधिक मांग होती है। भारत में खेती के लिए 20 लाभदायक पेड़‚ जो भारी मुनाफा कमाने में मदद कर सकते हैं: केला‚ पपीता‚ बांस‚ आम‚ अमरूद‚ महुआ‚ नारियल‚ नीम‚ पीच‚ बोनसाई‚ बादाम‚ टीक‚ अंजीर‚ युकलिप्टुस (Eucalyptus)‚ शीशम‚ काष्ठफल‚ बबूल‚ मसाले के पेड़‚ चंदन का पेड़ तथा सहजन का पेड़। इन 20 पेड़ों में से कुछ लाभदायक पेड़ भारत में खेती के व्यवसाय में भारी मार्जिन उत्पन्न करने में मदद कर सकते हैं। उत्पादकता के मामले में हमेशा विदेशी और स्वदेशी पेड़ प्रजातियों के बीच तुलना होती है। वर्तमान में जब प्राकृतिक वनों के संरक्षण पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है‚ तो तेजी से बढ़ने वाली देशी प्रजातियां विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। बौहिनिया पुरपुरिया (Bauhinia purpurea)‚ बिग्नोनिया मेगापोटामिका (Bignonia megapotamica)‚ कैलिस्टेमॉन लांसोलेटस (Callistemon lanceolatus)‚ एरिथ्रिना इंडिका (Erythrina indica) और डेलोनिक्स रेजिया (Delonix regia) ऐसे वृक्ष हैं‚ जो भारत में पाए जाते हैं और अन्य विशिष्टताओं के साथ अच्छी लकड़ी के लिए भी जाने जाते हैं।

संदर्भ:
https://bit.ly/3CyjqCu
https://bit.ly/3oC1TUY
https://bit.ly/324POzV
https://bit.ly/3FwDt6g

चित्र संदर्भ   
1. लकड़ी के गोदाम को संदर्भित करता एक चित्रण (flickr)
2. विभिन्न प्रकार की लकड़ी की सतह, को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
3. शीशम लकड़ी के वृक्षों को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
4. पेड़ काटती मशीन, को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
5. खेती करके उगाये गए चीड़ के वृक्षों को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)

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