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क्या होता है, सकल घरेलू उत्पाद (GDP)

What is gdp

Rampur
18-08-2019 10:30 AM

सकल घरेलू उत्पाद (GDP) या जीडीपी या सकल घरेलू आय (GDI), एक अर्थव्यवस्था के आर्थिक प्रदर्शन का एक बुनियादी माप है, यह एक वर्ष में एक राष्ट्र की सीमा के भीतर सभी अंतिम माल और सेवाओ का बाजार मूल्य है। GDP (सकल घरेलू उत्पाद) को तीन प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है, जिनमें से सभी अवधारणात्मक रूप से समान हैं। पहला, यह एक निश्चित समय अवधि में (आम तौर पर 365 दिन का एक वर्ष) एक देश के भीतर उत्पादित सभी अंतिम माल और सेवाओ के लिए किये गए कुल व्यय के बराबर है। दूसरा, यह एक देश के भीतर एक अवधि में सभी उद्योगों के द्वारा उत्पादन की प्रत्येक अवस्था (मध्यवर्ती चरण) पर कुल वर्धित मूल्य और उत्पादों पर सब्सिडी रहित कर के योग के बराबर है। तीसरा, यह एक अवधि में देश में उत्पादन के द्वारा उत्पन्न आय के योग के बराबर है- अर्थात कर्मचारियों की क्षतिपूर्ति की राशि, उत्पादन पर कर औरसब्सिडी रहित आयात और सकल परिचालन अधिशेष (या लाभ) ।

सन्दर्भ:-
1.
https://bit.ly/2YUnPAF
2. https://www.youtube.com/watch?v=wjom29IQLnE

Rampur/1908183252





असीमित नोटों की छपाई करके, क्यों भारत सरकार नहीं बना देती सबको अमीर

Why the Indian government does not make everyone rich by printing unlimited notes

Lucknow
18-08-2019 10:30 AM

प्रारंग आपको इस चलचित्र के माध्यम से बताना चाहता है कि जब भारतीय सरकार या भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) असीमित भारतीय मुद्रा रुपये के नोटों को प्रिंट करता है और सभी को मुफ्त में वितरित करता है, तो उन्हें देश के भीतर असीमित मुद्रा (नोटों) को छापने की अनुमति होती है। इसके बावजूद रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया द्वारा 2000, 500, 100 रुपये (INR) जैसे भारतीय मुद्रा (नोटों) की सीमित मात्रा क्यों छापी जाती है? भारतीय मुद्रा वास्तविक मूल्य क्या है और हम अपने लेनदेन के लिए भारतीय रुपये का उपयोग क्यों करते हैं।

क्यों हमारी भारतीय सरकार कर्ज चुकाने और सबको अमीर बनाने के लिए ज्यादा पैसा नहीं छाप सकती ?

सन्दर्भ:-
1.
https://www.youtube.com/watch?v=3oyLdYv9Ql8&pbjreload=10

Lucknow/1908183251





कैसे तय होती है, रुपये और डॉलर की कीमत?

How is the price of rupee and dollar determined

Meerut
18-08-2019 10:30 AM

दोस्तों हम अक्सर रूपए के कमजोर होने और डॉलर के मजबूत होने की बाते सुनते आएं हैं... डॉलर और रुपए की कीमत हमें अक्सर परेशान करती रहती है। आए दिन आप न्यूज़ पढ़ते होगे कि कैसे डॉलर का मूल्य रुपए के मुकाबले उपर चला गया! आख़िर ये सब कैसे काम करता है? कैसे तय होती है भारतीय रुपए की कीमत?

आपके लिए प्रारंग लेकर आया है, एक चलचित्र जिसमें हम आपको समझाने की कोशिश करेंगे कि कैसे भारतीय मुद्रा (करेंसी) की कीमत कभी कम या ज्यादा होती रहती है, आखिर वो कौन से कारक हैं जो भारतीय रुपये की चमक को फीका कर देते हैं। इतना ही नहीं हम आपको इस बात की जानकारी भी देंगे कि, कब एक रुपया एक डॉलर के बराबर हुआ करता था। साथ ही ये समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर क्या होगा अगर एक रुपया एक डॉलर के बराबर हो जाए।

सन्दर्भ:-
1.
https://www.youtube.com/watch?v=6HTvSH5SFGM

Meerut/1908183250





कहाँ और कैसे किया जाता है भारतीय मुद्रा का मुद्रण(Printing)

Where and how Indian currency is printed

Jaunpur District
18-08-2019 10:30 AM

भारतीय रुपया (प्रतीक-चिह्न: ; कोड: INR) भारत की राष्ट्रीय मुद्रा है। इसका बाज़ार नियामक और जारीकर्ता भारतीय रिज़र्व बैंक है। नये प्रतीक चिह्न के आने से पहले रुपये को हिन्दी में दर्शाने के लिए 'रु' और अंग्रेजी में प्रतीक के तौर पर Re. (1 रुपया), Rs. और Rp. का प्रयोग किया जाता था। आधुनिक भारतीय रुपये को 100 पैसे में विभाजित किया गया है।

भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण (प्रा) लिमिटेड (बीआरबीएनएमपीएल) की स्थापना भारत में बैंक नोट का उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा अपने संपूर्ण स्वामित्वाधीन उसकी सहायक कम्पनी के रूप में 3 फरवरी 1995 को हुई ताकि रिज़र्व बैंक देश में बैंक नोट के लिए आपूर्ति तथा मांग के बीच के अन्तर को मिटा सके। बीआरबीएनएमपीएल का पंजीकरण कम्पनी अधिनियम 1956 के अंतर्गत प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी के रूप में किया गया है एवं उसका पंजीकृत तथा कार्पोरेट कार्यालय बंगलुरु में स्थित है।

इस रविवार प्रारंग आपके लिए लेकर आया है, भारतीय मुद्रा के मुद्रण से जुडी हुई जानकारी का एक चलचित्र। इस चलचित्र में मुद्रणालय/छापाखाने और टकसालों से लेकर बैंक खराब नोटों का क्या करती है, इत्यादि जानकारी को बताया गया है। इस चलचित्र को फैक्टयूब वर्ल्ड (Factube World) नामक यूटयूब चैनल द्वारा प्रसारित किया है।

मुद्रणालय या छापखाने
इंडियन सिक्योरिटी प्रेस, नासिक रोड महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में नासिक रोड पर स्थित इंडियन सिक्योरिटी प्रेस है जहां पर डाक संबंधी सामग्री जैसे डाक टिकट बैंकों के चेक, राष्ट्रीय बचत पत्र, पासपोर्ट, इंदिरा विकास पत्र, पोस्टल आर्डर, किसान विकास पत्र आदि के अलावा अलावा यह प्रेस करेंसी नोट भी छापती है जिसमें 10, 50 , 100, 500 तथा 2000 के नोट होते हैं तभी उनकी पूर्ति भी करती है।

सिक्योरिटी प्रिंटिंग प्रेस, हैदराबाद
इसकी स्थापना दक्षिण राज्यों की लेखन सामग्री की मांगों को पूरा करने और देश की केंद्रीय उत्पाद शुल्क स्‍टाम्‍प की मांग को पूरा करने के लिए वर्ष 1982 में की गई थी इसकी स्‍थापना इंडियन सिक्योरिटी प्रेस नासिक रोड महाराष्ट्र के उत्‍पादन की अनुपूर्ति के लिये की गयी थी ।

बैंक नोट प्रेस देवास
मध्य प्रदेश के देवास में स्थित बैंक नोट प्रेस 10, 50, 100, 500 तथा 2000 के बैंक नोट छापती है तथा यहां पर एक स्‍याही कारखाना भी है जो कि प्रतिभूति पत्रों के लिए स्याही का निर्माण करता है।

शाहबनी (पश्चिम बंगाल) तथा मैसूर
भारतीय रिजर्व बैंक मुद्रण लिमिटेड के दो नए एवं अत्याधुनिक करेंसी नोट प्रेस शाहबनी पश्चिम बंगाल तथा मैसूर कर्नाटक में में स्थापित किए गए हैं। यहां आरबीआई के नियंत्रण में करेंसी नोट छापे जाते हैं इन छापखानों में वर्ष 1998 से 99 तक 10000 मिलियन करेंसी नोट का अतिरिक्त वार्षिक मुद्रण का अनुमान लगाया गया था। देवास तथा महाराष्ट्र में नासिक रोड पर स्थित बैंक करेंसी प्रेस में प्रतिवर्ष 6000 मिलियन करेंसी नोट का मुद्रण होता है।

सिक्योरिटी पेपर मिल, होशंगाबाद
मध्य प्रदेश के होसंगाबाद में स्थित इस सुरक्षा-पत्र मिल में बैंक और करेंसी नोट कागज तथा गैर-न्यायिक स्टाम्प पेपर की छपाई होती है। वर्ष 1968 में करेंसी नोट और स्टांप पेपर की छपाई करने के लिए सिक्योरिटी पेपर मिल होशंगाबाद में इसका उत्पादन चालू किया गया था।

टकसालें
भारत सरकार की चार टकसालें मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद तथा नोएडा में स्थित हैं जहां पर सिक्कों का उत्पादन किया जाता है तथा सोने और चांदी की परख की जाती है एवं पदक/मेडल का भी उत्पादन भारत सरकार द्वारा यहां किया जाता है। मुंबई, हैदराबाद और कोलकाता की टकसालें काफी पुरानी हैं। मुंबई की टकसाल 1830 में स्‍थापित गई थी, जबकि हैदराबाद की 1930 में और कोलकाता की 1950 में स्थापित की गई थी। नोएडा की टकसाल नवीनतम है जिसे वर्ष 1989 में स्थापित किया गया है।

सन्दर्भ:-
1. https://bit.ly/2KE11w7
2. https://bit.ly/2Mow1lS
3. https://www.youtube.com/watch?v=rkPgDuHyPeA

Jaunpur_District/1908183249





आखिर किसके पास है महासागरों का स्‍वामित्‍व?

who owns the oceans

Meerut
17-08-2019 02:52 PM

पृथ्‍वी में लगभग 71 प्रतिशत पानी है, जिसका अधिकांश हिस्‍सा महासागर में मौजूद है। पृथ्‍वी का अन्‍य हिस्‍सा अर्थात भू-खण्‍ड, नदियां, पहाड़, पर्वत इत्‍यादि में विभिन्‍न राष्‍ट्रों द्वारा स्‍वामित्‍व का दावा किया जाता है किंतु विशालकाय महासागरों जिनमें संसाधनों का एक विशाल भण्‍डार भी मौजूद है, का स्‍वामी कौन है। इसका निर्धारण करना वास्‍तव में एक कठिन कार्य है। यह महासागर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं तथा इनके द्वारा पृथ्‍वी का 71 प्रतिशत हिस्‍सा कवर किया गया है। पृथ्‍वी का भूखण्‍ड इन महासागरों में द्वीपों के समान है, जिस पर विश्‍व की लगभग सात अरब जनसंख्‍या निवास करती है। इनमें से समुद्र का वास्‍तविक स्‍वामी कौन है?

विश्‍व में समुद्री मार्ग द्वारा आवाजाही बढ़ने लगी तो तत्‍कालीन सरकारों द्वारा एक समझौता किया गया कि समुद्र पर किसी का व्‍यक्तिगत स्‍वामित्‍व नहीं होगा। इस समझौते को फ्रिडम ऑफ सी डॉक्‍टराइन (Freedom of the Seas doctrine) कहा गया। इस सिद्धान्‍त के अंतर्गत समुद्रतटीय राष्‍ट्रों की समुद्री सीमा तीन मील कर दी गयी। इन राष्‍ट्रों को दी गयी समुद्री सीमा के भीतर बिना अनुमति के प्रवेश को घुसपैठ माना गया तथा समुद्र के शेष हिस्‍से को सभी राष्‍ट्रों के मध्‍य साझा किया गया। अतः खुले समुद्र में एक राष्‍ट्र द्वारा दूसरे राष्‍ट्र के समुद्री जहाज पर हमला युद्ध की श्रेणी में आएगा।

1812 के युद्ध और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने इस सिद्धान्‍त की स्‍वतंत्रता का भरपूर उपयोग किया। आगे चलकर अमेरिका ने इसकी सीमा तीन मील से दो सौ मील कर दी। जिससे उसने अधिकांश तटीय राष्‍ट्रों की समुद्री सीमा को हड़प लिया, जिससे समुद्री राष्‍ट्रों में विवाद प्रारंभ हो गया तथा इन्‍होंने भी अपनी समुद्री सीमा का विस्‍तार किया।

औपनिवेशिकरण के दौरान विश्‍व में यूरोपियों का दब दबा रहा, इन्‍होंने अपने उपनिवेशी राष्‍ट्रों के संसाधनों पर नियंत्रण स्‍थापित किया। आगे चलकर इन्‍होंने समुद्री संसाधनों की ओर रूख किया, सीमा रहित होने के कारण समुद्री संसाधनों के दोहन में तीव्रता आयी। जिसके चलते समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होने लगा।

जिस प्रकार समुद्री संसाधनों का अंधाधुन दोहन किया जा रहा है, ऐसी परिस्थिति में इसके देखरेख और विनियमन की सख्‍त आवश्‍यकता है। महासागर वातावरण से कार्बन को हटाने और ऑक्सीजन प्रदान करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित करता है। समुद्र में रोग निवारक जैविक संसाधनों का अपार भण्‍डार है। वैश्विक अर्थव्‍यवस्‍था में मछली का भी महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है, जिसके प्रमुख स्‍त्रोत समुद्र ही है, किंतु इनका आवश्‍यकता से अधिक उपभोग इनकी प्रजातियों के लिए खतरा बन रहा है। जिसके चलते इन पर कुछ सीमाएं लगाने की आवश्‍यकता हैं, जिससे संरक्षण किया जा सके।

समुद्री मार्ग से व्‍यापार हेतु विभिन्‍न जहाजों या पोत जैसे कंटेनर जहाज, टैंकर, कच्चे तेल के जहाज, उत्पाद जहाज, रासायनिक जहाज, थोक वाहक, केबल परतें, सामान्य मालवाहक जहाज, अपतटीय आपूर्ति पोत का उपयोग किया जाता है। इन जहाजों द्वारा अपशिष्‍ट रासायनिक या अजैविक पदार्थों को समुद्र में छोड़ दिया जाता है जिससे इसका पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है। प्रतिवर्ष लाखों की संख्‍या में समुद्री पर्यटन हेतु आए आगंतुक विशाल मात्रा में अ‍पशिष्‍ट पदार्थों को यहां छोड़ा जाता है जिसका प्रतिकूल प्रभाव पर्यावरण में देखने को मिलता है।

आवश्‍यकता से अधिक खनन के कुप्रभावों से समुद्र भी अछूता नहीं रहा है। जिसके विनाशकारी प्रभाव समुद्र के प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र पड़े हैं। किसी भी प्रकार के निकर्षण से समुद्री जानवरों के आवासों का विनाश होता है, साथ ही बड़ी संख्या में मछलियों और अकशेरुकी जीवों का भी सफाया हो जाता है। वायुमंडल की जलवायु नियंत्रण हेतु महासागरों की महत्‍वपूर्ण भूमिका है, किंतु प्रदुषण के कारण समुद्री तापमान में वृद्ध‍ि हो रही है। जिसके चलते जलवायु चक्र में परिवर्तन देखने को मिल रहा है। समुद्र के पारिस्थितिक तंत्र में बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन का उत्‍पादन किया जाता है तथा वह समुद्र के माध्‍यम से वायुमण्‍डल में प्रवाहित कर दी जाती है। किंतु प्रदूषण के कारण इसकी मात्रा में भी कमी आ रही है।

महासागरों के समुचित उपयोग हेतु 1967 में, यू.एन के सदस्यों के आग्रह पर समुद्र के लिए एक नया कानून लाया गया। जिसके अंतर्गत इस सार्वजनिक मानवीय संपत्ति को संरक्षित करने के लिए कुछ नियमावली तैयार की गयी यह 1994 में लागू हुआ। समुद्रतटीय देशों में सीमा का विस्‍तार क्षेत्र 12 समुद्री मील कर दिया गया। समुद्रों में परमाणु परिक्षणों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। समुद्री संसाधनों का समुचित मात्रा में दोहन हेतु इन भी कुछ प्रतिबंध लगाए गए। किंतु इनके कुछ विशेष प्रभाव नहीं दिखाई दे रहे हैं।

संदर्भ:
1. https://bit.ly/2HdwB1L
2. https://bit.ly/33Ekmoz
3. https://bit.ly/2MlOdwI
4. https://marinebio.org/conservation/ocean-dumping/ocean-resources/

Meerut/1908173248





कैसे पड़ा हिन्‍द महासागर का नाम भारत के नाम पर?

How was the name of the Indian Ocean named after India

Rampur
17-08-2019 01:54 PM

विश्‍व के पांच महासागरों में से एक हिन्‍द महासागर, एकमात्र ऐसा महासागर है जिसका नाम भारत के नाम पर पड़ा है। किंतु इस महासागर का नाम ही देश के नाम पर क्‍यों पड़ा यह एक विचारणीय विषय है। हिन्‍द महासागर के नाम की उत्‍पत्ति के विषय में प्रत्‍यक्ष प्रमाण किसी के पास उपलब्‍ध नहीं हैं। लेकिन ऐसा माना जाता है कि इसको यह नाम भारत आए उपनिवेशियों द्वारा दिया गया है।

यह तो सर्वविदित है कि प्राचीन और मध्‍यकालीन भारत ‘सोने की चिडि़या’ कहलाता था, जिस कारण वह विश्‍व के आकर्षण का केन्‍द्र बना हुआ था, अनेक पाश्‍चात्‍य व्‍यापारी भारत पहुंचने वाले मार्ग की खोज में निकले, जिसमें वास्‍कोदिगामा को सफलता मिली और इन्‍होंने भारत आने वाले जलमार्ग की खोज की। आगे चलकर इस मार्ग में पश्‍चिमी व्‍यापारियों की आवाजाही बढ़ गयी तथा जैसे-जैसे भारत में व्‍यापारियों का आवागमन बढ़ा तो उनके मध्‍य संपर्क भी स्‍थापित होने लगा तथा इन्‍होंने भारत के निचले हिस्‍से में मौजूद महासागर को हिन्‍द महासागर के रूप में पुकारना प्रारंभ किया। तभी से यह हिन्‍द महासागर के नाम से प्रचलित हो गया। भारतीय पौराणिक ग्रन्‍थों (संस्‍कृत) में इसे रत्नाकर नाम दिया गया है।

नाइंटी ईस्‍ट रिज (Ninety East ridge) हिन्‍द महासागर को पश्चिम और पूर्वी हिंद महासागर में विभाजित करती है, यह हिन्‍द महासागर के तल में स्थि‍त एक रेखीय संरचना है। जिसका नाम पूर्वी गोलार्ध के केंद्र में 90 वीं मध्याह्न रेखा के पास समानांतर टकराव पर रखा गया है। इसकी लंबाई लगभग 5,000 किलोमीटर (3,100 मील) है तथा इसे बंगाल की खाड़ी से दक्षिण-पूर्व भारतीय रिज (SEIR) की ओर स्थलाकृतिक रूप में देखा जा सकता है। रिज का विस्तार अक्षांश 33° दक्षिण और 17° उत्‍तर के मध्‍य है तथा इसकी औसत चौड़ाई 200 किमी है। पूर्वोत्तर की ओर इसका नाम व्हार्टन बेसिन (Wharton basin) है तथा यह डायमेंटिना फ्रैक्चर जोन (Diamantina fracture zone) के पश्चिमी छोर पर समाप्‍त होता है, जो कि पूर्व में प्रायः ऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप तक फैला है। रिज मुख्य रूप से ओशन आइलैंड थोलेइट्स (Ocean Island Tholeiites -OIT) से बना है, जो कि बेसाल्ट (basalt) का एक उप-समूह है।

इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट (Indo-Australian Plate) के नीचे स्थित एक हॉटस्पॉट (Hotspot) ने इस रिज का निर्माण किया है, क्योंकि यह प्लेट समय के साथ मेसोज़ोइक और सेनोज़ोइक में उत्तर की ओर बढ़ी है। कई भू-वैज्ञानिकों और रसायन वैज्ञानिकों का मानना है कि भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर की ओर बढ़ने के बाद केर्गुएलन हॉटस्पॉट (Kerguelen hotspot) में ज्वालामुखी की शुरूआत के समय बाढ़ बेसाल्ट की शुरूआत भी हुयी थी। माना जाता है कि भारत और ऑस्ट्रेलिया लगभग 32 मिलियन वर्षों से टेक्टोनिक प्लेट (Tectonic plate) पर मौजूद हैं। हालाँकि, नब्बे पूर्वी रिज क्षेत्र में बड़े भूकंपों के उच्च स्तर और मध्य हिंद महासागर में विरूपण के साक्ष्‍यों को देखते हुए, मध्य हिंद महासागर में विरूपित क्षेत्र भारतीय प्लेट और ऑस्ट्रेलियाई प्लेट को अलग करने वाली प्लेट सीमा क्षेत्र मानना अधिक उपयुक्त होगा।

लगभग 150 मिलियन वर्ष पूर्व जब वृहत महाद्वीप गोंडवाना का टूटना प्रारंभ हुआ तभी से हिंद महासागर का निर्माण भी शुरू हुआ। हालांकि, लगभग 36 मिलियन वर्ष पहले तक भी इसने अपनी वर्तमान स्थिति और आकार को प्राप्त नहीं किया था। हिन्‍द महासागर के नाम का पहला अधिकारिक उपयोग 1515 ईस्‍वी में किया गया था, जो आज भी प्रचलित है।

संदर्भ:
1. https://en.wikipedia.org/wiki/Ninety_East_Ridge
2. https://brainly.in/question/1201721
3. https://www.quora.com/Why-was-the-Indian-Ocean-named-after-India

Rampur/1908173247





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