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नोबेल पुरस्कार के लिए साहित्यिक भाषा विवाद का कारण है

Literary language is the reason for the Nobel Prize controversy

Rampur
23-05-2019 10:30 AM

नोबेल पुरस्कार विश्व का सर्वोच्च सम्मान है जिसे इसके अंतर्गत आने वाली श्रेणियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए दिया जाता है। साहित्य भी इसकी श्रेणी का ही एक हिस्सा है तथा उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले साहित्यकारों को यह पुरस्कार दिया जाता है।1901 से साहित्य क्षेत्र में 100 से भी अधिक नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं। केवल 1914, 1918, 1935, 1940, 1941, 1942 और 1943 में यह पुरस्कार साहित्य क्षेत्र के लिये नहीं दिया गया। चार बार यह पुरस्कार संयुक्‍त रूप से 1904 में फ्रैडरिक मिस्ट्रल, जोस एचेगाराय (Frédéric Mistral, José Echegaray),1917 में कार्ल गजलरुप, हेनरिक पोंटोपिडन (Karl Gjellerup, Henrik Pontoppidan),1966 में शमूएल एगन, नेल्ली सैक (Shmuel Agnon, Nelly Sachs) और 1974 में आईविंड जॉनसन, हैरी मार्टिंसन (Eyvind Johnson, Harry Martinson) को दिया गया।

साहित्य में नोबेल पुरस्कार के विजेता के चयन के लिए सर नोबेल द्वारा "आदर्शवादी" और "आदर्श" ( Ideals) पर जोर दिए जाने के मापदंड के कारण शुरु से ही यह पुरस्कार विवादग्रस्त रहा है। भारत से साहित्य के लिये अब तक केवल रवींद्रनाथ टैगोर को ही नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, जबकि हिंदी, उर्दू, या फारसी के लेखकों जैसे विभूति भूषण बंधोपाध्याय, मुंशी प्रेमचंद, कुवेम्पु, इस्मत चुगताई, आर के. नारायण, सुंदर रामस्वामी, आशापुर्णा देवी, वेकम मुहम्मद बशीर, अमृता प्रीतम आदि को नोबेल साहित्य पुरस्कार के लिये नामांकित तो किया गया लेकिन ये साहित्यकार खिताब से वंचित ही रहे। अरबी और तुर्की साहित्य को भी यह पुरस्कार मिल चुका है किंतु नोबेल पुरस्कार विजेताओं में अधिकतर संख्यां युरोपीय भाषाओं की ही है। नोबेल साहित्य पुरस्कार निम्न भाषाओं के साहित्यों को दिया गया है:

भारत में क्षेत्रीय भाषाओं में भी विविधतापूर्ण साहित्य लिखा गया किंतु यह दुनिया का ध्यान आकर्षित करने में विफल रहा। इसका प्रमुख कारण यह है कि इन कार्यों का अंग्रेजी और दुनिया की अन्य भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध नहीं है। नोबेल चयनकर्ताओं द्वारा इन उत्कृष्ट साहित्यकारों को अनदेखा करना साधारण विद्रोह भी हो सकता है। नोबेल पुरस्कार की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार स्वीडिश अकादमी साहित्‍य पुरस्कार विजेताओं का चयन करती है किंतु यदि बात की जाए साहित्‍यिक भाषा की तो यहां पक्षपात का प्रश्‍न उठ सकता है क्‍योंकि उम्‍मीदवार को चयनित करते समय चयनकर्ता किस भाषा में साहित्‍य को पढ़ते हैं यह कहना कठिन है। 1901 में साहित्‍य पुरस्‍कार की शुरूआत के बाद प्रारंभिक पांच साहित्‍य पुरस्‍कार गैर=यूरोपियों को दिए गए थे क्‍योंकि उन सभी के साहित्‍य अंग्रेजी भाषा में अनुवादित थे। चयनप्रक्रिया के बारे में अधिक जानकारी के बिना यह कहना असंभव है कि साहित्य का नोबेल पुरस्कार वैश्विक दर्शकों को आकर्षित करता है या नहीं।

रवींद्रनाथ टैगोर बंगाल के प्रसिद्ध साहित्यकार थे जिनका जन्म 7 मई 1861 में कलकत्ता में हुआ था। अपने गहन, संवेदनशील और सुंदर काव्य रचना (जिसे उन्होनें अंग्रेजी में स्वयं अपने शब्दों द्वारा अनुवादित किया था), के लिये 1913 में नोबेल पुरस्कार दिया गया। रवींद्रनाथ टैगोर का लेखन में भारतीय और पश्चिमी दोनों परम्पराएं गहराई से निहित हैं। इनके इस साहित्य के कविता, गीत, कहानी और नाटक में कल्पना के अतिरिक्त आम लोगों के जीवन, साहित्यिक आलोचना, दर्शन और सामाजिक मुद्दों को भी चित्रित किया गया है। रवींद्रनाथ टैगोर ने मूलरूप से बंगाली में लिखा था, लेकिन बाद में अंग्रेजी में अपनी कविता को व्यापक रूप से पश्चिम देशों के दर्शकों तक पहुंचाया। जब उन्हेंखबर मिली कि उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए सम्मानित किया जा रहा है तो तब वे शांति निकेतन में थे। नोबेल पुरस्कार के रिकॉर्ड में पहली बार यह पुरस्कार गैरयूरोपीय व्यक्ति को दिया गया था।

संदर्भ:
1. https://bit.ly/2NG3dBQ
2. https://bit.ly/2X0oWJV
3. http://mulosige.soas.ac.uk/nobel-prize-non-european-languages/
4. https://bit.ly/2Jz4iNX
5. https://www.nobelprize.org/prizes/literature/1913/tagore/facts/
6. https://bit.ly/2JyzaOS

Rampur/1905232887





आयुर्वेद के क्षेत्र में नोबेल पुरस्‍कार के अवसर

opportunities of Nobel prize in the field of Ayurveda

Meerut
23-05-2019 10:30 AM

आयुर्वेद और यूनानी चिकित्‍सा प्रणाली विश्‍व की सबसे प्राचीन पारंपरिक चिकित्‍सा प्रणाली है, जिनमें मानवीय शरीर और उसमें होने वाले विकारों का गहनता से वर्णन किया गया है तथा आज भी इनमें अनुसंधान जारी है। जिनके कई उल्‍लेखनीय परिणाम भी उभरकर सामने आए हैं। वर्ष 2017 में तीन पश्चिमी वैज्ञानिकों को उनके कार्य के लिए नोबेल पुरस्‍कार से नवाजा गया है, जिसने आयुर्वेद और यूनानी चिकित्‍सा प्रणाली के शोधकर्ताओं के लिए एक आशा की किरण जगा दी है। वास्‍तव में यह पुरस्‍कार औषधी और फिजियोलॉजी के क्षेत्र में दिया गया था।

अमेरिकी वैज्ञानिक जेफरी सी. हॉल (Jeffrey C. Hall), माइकल रोसबाश (Michael Rosbash) और माइकल डब्ल्यू. यंग (Michael W. Young) को आणविकतंत्रों को नियंत्रित करने वाली सर्कैडियन दवा (circadian rhythm )पर कार्य करने के लिए संयुक्‍त रूप से नोबेल पुरस्‍कार दिया गया। यह दवा आयुर्वेद और पारंपरिक चीनी चिकित्सा जैसी सभी प्राचीन चिकित्सा प्रणालियों और प्रकृति के दैनिक, मासिक और मौसमी चक्रों के साथ आहार और जीवन शैली के गहन अध्ययन पर आधारित थी।

आयुर्वेद में जैविक घड़ी (Body Clock) का उल्‍लेख मिलता है, इन वैज्ञानिकों ने इस घड़ी की कार्यप्रणाली का गहनता से अध्‍ययन किया। इन्‍होंने इस घड़ी की समय सारणी को जानने के लिए फलमक्खियों पर अध्‍ययन किया, जिसमें वे दैनिक जैविक लय को नियंत्रित करने वाले जीन को अलग करने में सफल रहे। इस जीन को पीरियड (period) या अवधि नाम दिया गया। यह जीन पीरियड (PER) नाम के एक प्रो‍टीन को संकेत करता है, जो रात में बढ़ता तथा दिन में घट जाता है। इस प्रकार यह प्रो‍टीन 24-घण्‍टे के चक्र को नियमित करता है।

इनके शोध का दूसरा लक्ष्‍य यह जानना था कि सर्कैडियन दोलनों (circadian rhythm) को कैसे उत्पन्न और निरंतर किया जा सकता है।जेफरी हॉल और माइकल रोसबाश ने अनुमान लगाया कि पर(PER) प्रोटीन अवधि जीन की गति विधि को अवरुद्ध करता है। उन्होंने तर्क दिया कि एक निषेधात्मक प्रतिक्रिया में पाश (लूप) सेपीरियड (PER) प्रोटीन स्वयं के संश्लेषण को रोक सकता है और इस तरह एक सतत, चक्रीय लय में स्वयं के स्तर को नियंत्रित कर सकता है।

18वीं शताब्दी के दौरान, खगोल विदजीन जैक्स डी' आर्ट सडीमैरन ने मिमोसा पौधों का अध्ययन किया, और पाया कि पत्तियां दिन के दौरान सूर्य की ओर खुलती हैं और शाम को बंद हो जाती हैं। उन्होंने सोचा कि अगर पौधे को लगातार अंधेरे में रखा जाए तो क्या होगा? उन्होंने पाया कि दैनिक सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति में भी पत्तियों ने अपने सामान्य दैनिक चक्र का पालन किया। पौधों की भी अपनी जैविक घड़ी होती है। इस नियमित रूपांतरण को सर्कैडियन लय के रूप में संदर्भित किया जाता है।

मनुष्यों सहित सभी बहुकोशिकीय जीव, सर्कैडियन लय को नियंत्रित करने के लिए समान प्रणाली का उपयोग करते हैं। हमारे जीन का एक बड़ा हिस्सा जैविक घड़ी द्वारा नियंत्रित किया जाता है और, परिणामस्वरूप, शरीर की आंतरिक घड़ी सर्कैडियन लय हमारे शरीर को सावधानी पूर्वक दिन के विभिन्न चरणों में ढालता है। यह घड़ी मानवीय व्‍यवहार हार्मोन के स्तर, नींद, शरीर के तापमान और चयापचय जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को नियंत्रित करता है। बाह्य वातावरण और आंतरिक जैविक घड़ी के मध्‍य असंतुलन है, हमारे स्‍वास्‍थ्‍य को प्रभावित करता है।

संदर्भ:
1. https://swarajyamag.com/science/this-years-nobel-prize-in-medicine-puts-fresh-focus-on-ayurveda
2. https://lifespa.com/nobel-prize-validates-ayurvedic-circadian-clock/
3. https://bit.ly/2wO0NJB
4. https://www.nobelprize.org/prizes/medicine/2017/press-release/
5. http://indiafacts.org/nobel-prize-medicine-means-ayurvedic-research/

Meerut/1905232886





क्या है नोबेल (Nobel) और रेमन मेगसेसे (Ramon Magsaysay) पुरूस्कार

what are Nobel and Ramon Magsaysay Awards

Lucknow
23-05-2019 10:30 AM

वर्तमान में समाज के विकास और कल्याण के लिये विभिन्न पुरस्कार दिये जाते हैं। इन पुरस्कारों का स्तर भिन्न भिन्न होता है, जैसे राज्य स्तर, राष्ट्रीय स्तर और अंतराष्ट्रीय स्तर। अंतराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए दिये जाने वाले पुरस्कार विश्व के सर्वोच्च पुरस्कार हैं, जिनमें नोबेल(Nobel) और रेमन मैग्सेसे (Ramon Magsaysay) पुरस्कार भी शामिल हैं।

नोबेल पुरस्कार:
यह नोबेल फाउंडेशन (Nobel Foundation) द्वारा स्वीडन (Sweden) के वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल (Alfred Nobel) की याद में वर्ष 1901 में शुरू किया गया। इस पुरस्कार की 6 श्रेणियां रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, साहित्य, शांति, फिजियोलॉजी या मेडिसिन, और अर्थशास्त्र हैं। इन क्षेत्रों में अद्वितीय और यादगार कार्य करने के लिये यह पुरस्कार दिया जाता है तथा प्रशस्ति-पत्र के साथ लगभग 7 करोड़ की राशि भी प्रदान की जाती है।अल्फ्रेड नोबेल ने 1895 में पांच नोबेल पुरस्कारों की स्थापना की और यह पुरस्कार पहली बार 1901 में दिए गये।1901 और 2018 के बीच लगभग 935 लोगों और संगठनों को 590 बार नोबेल पुरस्कार दिया गया। नोबेल पुरस्कार जीतने वाले भारतीयों की सूची निम्नलिखित है:

रेमन मैगसेसे पुरस्कार:
यह पुरस्कार एशिया के व्यक्तियों एवं संस्थाओं को उनके अपने क्षेत्र में विशेष रूप से उल्लेखनीय कार्य करने के लिये प्रदान किया जाता है। इसे प्राय: एशिया का नोबेल पुरस्कार भी कहा जाता है।यह पुरस्कार न्यूयॉर्क स्थित "रॉकफेलर ब्रदर्स फण्ड" (Rockerfeller Brothers Fund) के ट्रस्टियों द्वारा सन् 1957 में स्थापित किया गया था जो फ़िलीपीन्स के भूतपूर्व राष्ट्रपति रेमन मैगसेसे की याद में रेमन मैगसेसे पुरस्कार फाउन्डेशन द्वारा दिया जाता है।पुरस्कार की श्रेणियाँ सरकारी सेवा, सार्वजनिक सेवा, सामुदायिक नेतृत्व, पत्रकारिता, साहित्य एवं सृजनात्मक संचार कलाएँ, शान्ति एवं अंतराष्ट्रीय सद्भावना, अप्रत्याशित नेतृत्व हैं।रेमन मैग्सेसे पुरस्कार जीतने वाले कुछ भारतीयों की सूची निम्नलिखित है:

मोहनदास करमचंद्र गांधी जी 20 वीं सदी में अहिंसा का सबसे मजबूत प्रतीक बने।उनके अथक प्रयासों और अहिंसा के मार्ग ने भारत की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण योगदान दिया जिसके लिए उन्हें कई बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित भी किया गया लेकिन फिर भी उन्हें इस पुरस्कार से सम्मानित नहीं किया गया। जिसके निम्नलिखित कारण हैं:
नोबेल समिति के सलाहकार जैकब वॉर्- Jacob Worm-Müller मूलर ने गांधीजी के बारे में नकारात्मक लेख लिखा था, जिसके अनुसार गांधी जी अंहिसा की नीति पर हमेशा कायम नहीं रहे और इस कारण 1937 का नोबेल पुरस्कार उन्हें नहीं दिया गया।
1938 और 1939 के समय अंतराष्ट्रीय शांति आंदोलन में गांधी जी के कई आलोचक थे, जिस कारण वह दूसरी बार खिताब से चूके।
1947 के समय पाकिस्तान के साथ हालात बिगड़ने के बाद गांधीजी ने कहा कि “मैं हर तरह के युद्ध का विरोधी हूं, लेकिन पाकिस्तान चूंकि कोई बात नहीं मान रहा है, इसलिए पाकिस्तान को अन्याय करने से रोकने के लिए भारत को उसके ख़िलाफ़ युद्ध के लिए तैयार हो जाना चाहिये। इस बयान के कारण गांधी जी को शांति-विरोधी माना गया और फिर से उन्हें पुरस्कार से वंचित कर दिया गया।
जनवरी 1948 में गांधी जी की हत्या हो चुकी थी और उस समय तक मरणोपरांत किसी को भी नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जाता था।ऐसे में समस्या ये थी कि गांधी जी को देने वाली पुरस्कार की राशि किसे दी जाए? क्योंकि गांधी जी न ही किसी संगठन से जुड़े थे और न ही कोई वसीयत छोड़कर गए थे। इस प्रकार 1948 में किसी को भी शांति का नोबेल पुरस्कार नहीं दिया गया था।

संदर्भ:
1. https://en.wikipedia.org/wiki/Nobel_Prize
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Ramon_Magsaysay_Award
3. https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_Indian_Nobel_laureates
4. http://www.quickgs.com/list-of-indian-winners-of-ramon-magsaysay-award/
5. https://www.nobelprize.org/prizes/themes/mahatma-gandhi-the-missing-laureate/

Lucknow/1905232885





अन्नदाता कहे जाते है नोबेल पुरस्कार विजेता- नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग (Norman Ernest Borlaug)

anadata is said to be the Nobel laureate Norman Ernest Borlaug.

Jaunpur District
23-05-2019 10:30 AM

नोबेल फाउंडेशन (Nobel Foundation) द्वारा स्वीडन (Sweden) के वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल (Alfred Nobel) की याद में वर्ष 1901 में एक पुरुष्कार शुरू किया गया। यह शांति, साहित्य, भौतिकी, रसायन, चिकित्साविज्ञान, और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार है जिसे नोबेल पुरूस्कार कहा जाता है। हालांकि कृषि के क्षेत्र में विशेष रूप से नोबेल पुरस्कार नहीं है, परंतु फिर भी ऐसे कई महत्व पूर्ण कृषि विशेषज्ञ हैं,जिन्होंने विभिन्न श्रेणियों में नोबेल पुरस्कार जीता है। इनमे से सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक है नॉर्मन बोरलॉग (25 मार्च, 1914-12 सितंबर, 2009), जिन्होंने 1960 के दशक में कृषि क्षेत्र की काया पलटकर रख दी। उन्होंने खेती-बाड़ी में जो अभूतपूर्व बदलाव किए उसे दुनिया भर में हरित क्रांति (Green Revolution) के नाम से जाना जाता है। इन्हें कृषि क्षेत्र में इस असाधारण क्रांति के लिए 1970 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला था।

पुरस्कार मिलने के बाद बोरलॉग ने कहा कि वे अक्सर सोचते है कि ‘यदि नोबेल ने पचास साल पहले विभिन्न पुरस्कारों की स्थापना के लिए अपनी वसीयत लिखी होती तो उसमें प्रथम पुरस्कार खाद्य और कृषि के क्षेत्र के लिए बनाया गया होता। क्योंकि नोबेल ने अपनी वसीयत 1895 में की थी और उस समय यूरोप में 1845-51 की तरह व्यापक आलू अकाल की जैसी कोई भी भयंकर खाद्य उत्पादन की समस्या नहीं थी, जिसने लाखों लोगों की जान ले ली।’

नोबेल पुरस्कार विजेता नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग एक अमेरिकी कृषि विज्ञानी थे, जिन्हें हरित क्रांति का पिता (Father of Green Revolution) माना जाता है। बोरलॉग उन लोगों में से एक हैं, जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार, स्वतंत्रता का राष्ट्रपति पदक और कांग्रेस का गोल्ड मेडल प्रदान किया गया था। इसके अलावा उन्हें भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण प्रदान किया गया था। बोरलॉग की खोजों से दुनिया के करोड़ों लोगों का जीवन बचा है। उनके नवीन प्रयोगों ने अनाज की समस्या से जूझ रहे भारत सहित अनेक विकास शील देशों में हरित क्रांति का प्रवर्तन करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका योगदान यहीं तक सीमित नहीं रहा, उन्होंने अफ्रीका में उत्पादन को बढ़ावा दिया, विश्व खाद्य पुरस्कार 1986 में नॉर्मन बोरलॉग द्वारा ही बनाया गया था. यह पुरस्कार उन व्यक्तियों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने भुखमरी को कम करने एवं वैश्विक खाद्य सुरक्षा को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया हो.25 जून, 2018 को विश्व खाद्य पुरस्कार फाउंडेशन द्वारा वर्ष 2018 के प्रतिष्ठित विश्व खाद्य पुरस्कार को डॉ. लॉरेंस हैडाड (Dr. Lawrence Haddad) और डॉ. डेविड नाबैरो (Dr david Nabarro) को प्रदान किए जाने की घोषणा की गई थी। इसके अलावा उन्होंने वैश्विक खेती और खाद्य आपूर्ति के भविष्य के लिये कई कार्य किये।

नॉर्मन का जन्म 1914 में आयोवा (Iowa) के क्रेस्को (Cresco) प्रांत में हुआ। खेती बाड़ी नॉर्मन बोरलॉग के जीवन का केंद्र बिंदु था, उनके परिवार के पास 40 हेक्टेअर जमीन थी जिस पर वह मक्का, बाजरा जैसी फसलों की खेती किया करते थे।ये वो दौर था जब बहुत से किसानों ने अपनी फ़सलें बर्बाद होते देखी थीं। बोरलॉग बड़े हुए तो उनके पास कॉलेज जाने के लिए पैसे नहीं थे।लेकिन ग्रेट डिप्रेशन एरा प्रोग्राम (Great Depression Era Program), जिसे नेशनल यूथ एडमिनिस्ट्रेशन (National Youth Administration) के नाम से भी जाना जाता है, के जरिये 1937 में बोरलॉग मिनेपॉलिस की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी (University of Minnesota) में वानिकी में बी.एस (B.Sc) करने लगे। इसके बाद उन्होंने 1942 में प्लांट पैथोलॉजी और जेनेटिक्स में पी.एच.डी (Ph.d) की डिग्री हासिल कर ली।

नॉर्मन बोरलॉग भूख के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वाले महान योद्धा थे,जिस शोध और कार्य ने नॉर्मन बोरलॉग को दुनिया भर में मशहूर कर दिया, वो काम उन्होंने 1960 के दशक में शुरू किया था जब उन्होंने मैक्सिको में मक्का और गेहूँ की विससित नस्लों को जन्म दिया। बोरलॉग ने मेकिस्को में रॉकफेलर फाउंडेशन (Rockefeller Foundation) से पूंजी प्राप्त परियोजना में काम करना शुरू कर दिया। जहां वे जेनेटिक्स, प्लांटब्रीडिंग, प्लांट पैथोलॉजी, कृषिविज्ञान, अनाज प्रौद्योगिकी आदि पर गेहूं उत्पादन में वृद्धि के लिये काम कर रहे थे। बोरलॉग की मेहनत रंग लाई और उन्होंने गेहूँ की पिटिक 62 (Pitic 62) और पेनजामो 62 (Penjamo 62) किस्में तैयार कीं, जिससे गेहूं का उत्पादन छह गुना अधिक हो चुका था और उत्पादन इतना बढ़ा कि बाद में मैक्सिको गेहूं का निर्यातक बन गया।

1960 के दशक के दौरान भारत में अकाल पड़ा था। उस समय नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन को यह जानकारी थी कि दूर देश मैक्सिको में क्या चल रहा है। वे भारत में भी बोरलॉग के काम का लाभ उठाना चाहते थे, इसी सिलसिले में उन्होंने अपने निदेशक डॉ बी पी पाल को पत्र लिखकर बोरलॉग को भारत बुलाने का आग्रह किया। नतीजतन बोरलॉग और उनके सहयोगी डॉक्टर रॉबर्ट ग्लेन एंडरसन 1963 में भारत आए। यहां उन्होंने अपने परीक्षण के लिए उन्नत बीजों को दिल्ली, लुधियाना, पंतनगर, कानपुर, पुणे और इंदौर में बोया। 1965 तक इन बीजों को व्यापक पैमाने पर बोया जाने लगा। उस साल गेहूं की पैदावार 12.3 मिलियन टन थी जबकि 1970 तक वह बढ़कर 20.1 मिलियन टन हो गई और 1974 तक भारत अनाज उत्पादन के मामले में पूर्ण रूप से निर्भर हो गया।

2009में 95 साल की उम्र में नॉर्मन बोरलॉग का निधन हो गया। परंतु, उनकी विरासत उस अनाज के रूप में हमारे साथ आज भी है जिसे हम रोज खाते हैं। बोरलॉग ने भारत के एम एस स्वामीनाथन के साथ मिलकर देश को खाद्यान्न के मामले में आत्म निर्भर बनाया। उन्होंने हरित क्रांति के जरिये भूख से लड़ने वाले वैज्ञानिकों और किसानों को एक नयी दिशा दिखाई थी। इसके परिणाम स्वरूप आज दुनिया की सात अरब आबादी का पेट भरने के लिए भोजन की कोई कमी नहीं है।

संदर्भ:
1. https://www.nobelprize.org/prizes/peace/1970/borlaug/article/
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Norman_Borlaug
3. https://bit.ly/2wbKlV2
4. https://bit.ly/30yNbRW
5. https://bit.ly/2JQBQXi

Jaunpur_District/1905232884





रामपुर में भी देखी गयी दुर्लभ खरगोश प्रजाति - हिसपिड हेयर

Rare Rabbit Species seen in Rampur Hispid Hair

Rampur
22-05-2019 10:30 AM

हिसपिड हेयर (Hispid Hare) या हिसपिड खरगोश एक बहुत ही दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजाति है। जोकि भारत से लगभग विलुप्त हो चुकी है। यह केवल कुछ ही सीमित इलाकों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में हिमालय की तलहटी के कुछ अलग हिस्सों तक मौजूद हैं। जिला रामपुर उन स्थान में से एक है जहाँ इस दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजाति को देखा गया है क्योंकि रामपुर कॉर्बेट नेशनल पार्क (Corbett National Park) और पीलीभीत टाइगर रिज़र्व (यह हिमालय की तलहटी में भारत-नेपाल सीमा और उत्तर प्रदेश में तराई क्षेत्र में स्थित है। यह भारत के 50 टाइगर रिज़र्व प्रोजेक्ट/Tiger Reserve Project में से एक है।) के बहुत करीब हैं। बाघों के रहने के स्‍थल के अलावा, इन दोनों रिज़र्व में अति दुर्लभ हिसपिड हेयर भी देखे गये हैं।

हिसपिड हेयर को ‘असम खरगोश और ब्रिसली खरगोश’ भी कहा जाता है क्योंकि इनके मोटे, गहरे भूरे रंग के बाल होते हैं। इनके कान छोटे होते हैं और इनके पिछले पैर आगे के पैरों की तुलना में अधिक बड़े नहीं होते हैं। एक वयस्क का वज़न लगभग 2.5 किलोग्राम होता है और ये ज़्यादातर सवाना के उष्णकटिबंधीय घास के मैदानों में रहना पसंद करता है। ये ज्यादा सामाजिक नहीं होते हैं परंतु कभी-कभी इन्हें जोड़े में रहते देखा गया है। इनके आहार में मुख्य रूप से छाल, अंकुर बीज और घास की जड़ें और फसलें आदि शामिल हैं। हालांकि ये खरगोश जैसे दिखते तो हैं परंतु ये थोड़े से भिन्न होते हैं। खरगोश लॅपोरिडे (Leporidae) कुल से संबंधित है जबकि ये ख़ास खरगोश/हेयर लेपस (Lepus) जाति से संबंधित हैं। इसके अलावा एक अंतर ये भी है कि खरगोश नवजात शिशु हेयर के नवजात शिशु से कम विकसित होते हैं। आप इस विडियो के माध्यम से एक हिसपिड हेयर को अपने शिशुओं के लिए ज़मीन खोदते हुए देख सकते हैं।

वर्तमान में यह प्रजाति बहुत ही दुर्लभ है इसलिए इसे 1986 में IUCN रेड लिस्ट में लुप्तप्राय के रूप में सूचीबद्ध किया गया। 2004 में भारत और नेपाल में इस प्रजाति को देखा गया था। इनकी आबादी में गिरावट के मुख्य कारण खेती, वानिकी, चराई, भोजन के लिए शिकार, जंगलों का कटाव व बढ़ता हुआ मानव निवास हैं। इसके अतिरिक्त फसलों को इनसे बचाने के लिये किया गया शिकार भी इसकी विलुप्ति का कारण है। मानस नेशनल पार्क में हिसपिड हेयर का विस्तृत मूल्यांकन किया गया जिससे पता चलता है कि हिसपिड हेयर के जीवन को बचाने के लिए उनके आवासों को संरक्षित करने की आवश्यकता है। घास के मैदानों का वार्षिक शुष्क मौसम में जलाया जाना भी इनके आवास अभाव का एक कारण है।

इनके आवासों के प्रबंधन और संरक्षण के लिये पश्चिम बंगाल के जलदापाड़ा वन्यजीव अभयारण्य में हिसपिड हेयर का एक पारिस्थितिक अध्ययन किया गया था। इस अध्ययन में बताया गया है कि हिसपिड एक शर्मीली और एकांत में रहने वाली प्रजाति है जो भारत में दुधवा और मानस राष्ट्रीय उद्यान के अलावा उत्तरी पश्चिम बंगाल के जलदापाड़ा वन्यजीव अभयारण्य के लंबी घास के मैदानों में पाये जाते हैं। ये ज्यादातर उन स्थानों में निवास करते हैं जहां घास की ऊंचाई 3 मीटर से अधिक होती हो, ताकि ये आसानी से छिप सकें। इस अध्ययन में अप्रत्यक्ष रूप से लघु वनस्पतियों, भूमि आवरण और दीर्घ वनस्पतियों के माध्यम से जलदापाड़ा वन्यजीव अभयारण्य में हिसपिड हेयर की आबादी का आकलन भी किया गया था।

संदर्भ:
1. http://www.animalinfo.org/species/caprhisp.htm
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Hispid_hare
3. https://bit.ly/30vCdg0
4. https://en.wikipedia.org/wiki/Pilibhit_Tiger_Reserve
5. https://bit.ly/2LWVnrL
6. https://www.youtube.com/watch?v=LYJ4ZrueW9k

Rampur/1905222882





शहरों और खासकर मेरठ में बढ़ती तेंदुओं की घुसपैठ

Intrusion of leopards growing in cities and especially in Meerut

Meerut
22-05-2019 10:30 AM

हाल ही में बिजनौर में गन्‍ने के खेतों में दर्जनों तेंदुओं को बचाया गया है। किंतु पर्याप्‍त बजट के अभाव में इन शावकों की देख-रेख करना विभाग के लिए एक चुनौती बन गया है। विगत वर्षों तक इनकी संख्‍या मात्र दो या तीन हुआ करती थी, जिन्‍हें कानपुर चिड़ियाघर में स्थानांतरित कर दिया जाता था, किंतु इस वर्ष इनकी संख्‍या काफी अच्‍छी है, जिनकी देखरेख के लिए पर्याप्‍त सुविधाओं का होना आवश्‍यक है। फिलहाल इन्‍हें कानपुर चिड़ियाघर भेजा जा रहा है। शावक आमतौर पर अप्रैल के अंतिम सप्ताह में पैदा होते हैं, जब गन्ने की फसल होती है तथा बड़ी मादा तेंदुओं को खेतों से बाहर भगा दिया जाता है। जिस कारण शावक खेत में ही छूट जाते हैं।

भारतीय तेंदुआ वास्‍तव में चीते की एक उप प्रजाति है। जिसे IUCN रेड लिस्ट (IUCN Red List) में अतिसंवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। 2014 में, पूर्वोत्तर को छोड़कर भारत में बाघों के आवासों के आसपास तेंदुओं की एक राष्ट्रीय गणना की गई। सर्वेक्षण किए गए क्षेत्रों में 7,910 तेंदुओं का अनुमान लगाया गया तथा पूरे देश में 12,000-14,000 तेंदुए होने का अनुमान लगाया गया।

भारतीय तेंदुआ भारत, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में पाया जाता है। इनमें नर और मादा दोनों की शारीरिक संरचना में भिन्‍नता होती है, नर 4 फीट 2 इंच से 4 फीट 8 इंच के बीच बढ़ते हैं तथा इनकी पूंछ 2 फीट 6 इंच से 3 फीट लंबी होती है और इनके शरीर का वज़न 50 से 77 किग्रा तक होता है। मादाएं आकार में छोटी होती हैं, इनके शरीर का आकार 3 फीट 5 इंच से 3 फीट 10 इंच के मध्‍य होता है, पूंछ का आकार 76 सेमी से 87.6 सेमी तक होता है। इनका वज़न 29 से 34 किलो तक हो सकता है।

भारतीय तेंदुआ उष्णकटिबंधीय वर्षावनों, शुष्क पर्णपाती वनों, समशीतोष्ण वनों और उत्तरी शंकुधारी वनों में निवास करता है। तेंदुए एकांतप्रिय और निशाचर होते हैं, जो अपनी चढ़ाई करने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं। यह दिन में पेड़ों की शीर्ष शाखा पर विश्राम करते हैं। यह बहुत चुस्त होता है तथा 58 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकता है, क्षैतिज रूप से 6 मीटर से अधिक तथा उर्ध्वाधर रूप से 3 मीटर तक की छलांग लगा सकता है। यह अस्थिर और अवसरवादी शिकारी है, जो अपने मज़बूत सिर और जबड़ों से बड़े से बड़े शिकार को दबोच लेता है। तेंदुए क्षेत्रानुसार किसी भी मौसम में प्रजनन करते हैं, मादाएं 90 से 105 दिनों के भीतर शावक को जन्‍म दे देती हैं। एक बार में मादा तीन से चार शावकों को ही जन्‍म देती है। एक तेंदुए का औसत जीवनकाल 12 से 17 वर्ष के मध्‍य होता है।

अवैध वन्यजीव व्यापार के लिए भारतीय तेंदुओं का शिकार उनके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रहा है। कृषि में उपयोग की जाने वाली भूमि के विस्तार, मनुष्यों द्वारा अतिक्रमण और संरक्षित क्षेत्रों में उनके वन्‍य जीवों के निवास स्‍थान का नुकसान और शिकार इनकी संख्‍या में कमी का सबसे बड़ा कारण है। भारत में तेंदुओं और मनुष्‍यों के मध्‍य संघर्ष होना काफी आम बात है। वर्ष 2016 में मेरठ छावनी में एक निर्माणाधीन जगह पर एक तेंदुआ घुस गया जिसने दो मजदूरों को घायल किया। बड़ी मेहनत मसक्कत के बाद उस तेंदुए को पकड़ा गया। इस प्रकार की घटनाएं हमारे देश में काफी आम हैं, विशेषकर मेरठ शहर में।

जंगली पशुओं की शहर के बीच में घुसपैठ की समस्‍या पूरे भारत में है, 2011 में मैसूर में दो हाथी अपने झुण्ड से बिछड़ गये, जिन्‍होंने शहर के बीच में घुसकर तबाही मचाना प्रारंभ कर दिया। उत्‍तराखण्‍ड में नरभक्षी बाघों का प्रकोप आम समस्‍या है, आये दिन बाघ द्वारा लोगों पर हमला करने या मार देने की खबर सामने आ ही जाती है। आज हम इस प्रकार की समस्‍या के लिए अक्‍सर बेज़ुबान पशुओं को ज़िम्‍मेदार ठहराते हैं। जबकि यह मानव द्वारा किए गये कृ‍त्‍यों का ही परिणाम है।

संदर्भ:
1. https://bit.ly/2JZsOYj
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_leopard
3. https://bit.ly/2WTR1CT
4. https://www.theatlantic.com/photo/2014/02/a-leopard-runs-wild-through-meerut-india/100688/
5. https://bit.ly/2WiHd8a

Meerut/1905222881





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