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रामपुर जिले के कृषि क्षेत्र की उपज बढ़ाने में उर्वरकों की विशेष भूमिका

रामपुर

 14-09-2021 10:24 AM
भूमि प्रकार (खेतिहर व बंजर)

मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती, मेरे देश की धरती !
मिट्टी हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्यों कि विभिन्न प्रकार के भोज्य पदार्थ जिन्हें हम दैनिक जीवन में ग्रहण करते हैं, उनके लिए कच्चा माल पेड़-पौधों से प्राप्त होता है तथा पेड़-पौधे मिट्टी में ही उगते हैं। पूरे भारत में स्थान के आधार पर भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टी पाई जाती है। रामपुर की यदि बात करें तो यहां महीन बनावट वाली, कार्बनिक पदार्थों से भरपूर मिट्टी तराई पथ में पाई जाती है। चिकनी-बलुई मिट्टी उच्च भूमि में विकसित हुई है, तथा सिल्टी मिट्टी छोटे जलोढ़ मैदानों में पाई जाती है। जिले के भूमि उपयोग पैटर्न को तय करने में मिट्टी के प्रकार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यहां की भूमि का उपयोग मुख्य रूप से वन, कृषि, चारागाह, उद्यान आदि के लिए किया जाता है।
मिट्टी, पृथ्वी पर रहने वाले हर जीव को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचाती है, किंतु वर्तमान समय में देश की बढ़ती जनसंख्या के कारण भूमि उपयोग पर जो दबाव पड़ रहा है, उसने मृदा प्रदूषण को जन्म दिया है।
बीसवीं सदी के अंतिम दशक से भारत में औद्योगिक क्षेत्र का तीव्रता से विकास हो रहा है। इस तरह के तीव्र औद्योगिक विकास ने पर्यावरण के लिए खतरा बढ़ा दिया है।यह प्रदूषण जहां वायु और जल से सम्बंधित है,वहीं मिट्टी के लिए भी इसके दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं।प्रदूषण के विभिन्न पहलू मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे देश में कृषि पारिस्थितिकी तंत्र खतरे का सामना कर रहा है। यह इंगित करता है कि मिट्टी के संसाधनों को दूषित कार्बनिक पदार्थों के जानबूझकर उपयोग, संशोधन सामग्री और सिंचाई के पानी या वायुमंडलीय जमाव, अपशिष्टों के रिसाव आदि से खतरों का सामना करना पड़ रहा है। मिट्टी के प्रदूषण के लिए उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग भी एक प्रमुख कारण बनाहै। लेकिन इस बात को नकारा नहीं जा सकता है, कि देश में कृषि उपज को बढ़ाने में उर्वरकों की भी एक विशेष भूमिका रही है।लगभग 17% सकल मूल्य वर्धित (Gross value added) के साथ कृषि प्रधान भारत के आर्थिक विकास में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 50% से अधिक आबादी इस पर निर्भर है। पिछले 17 वर्षों में, अखिल भारतीय खाद्यान्न उत्पादन लगभग 3% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से 2002 - 2003 में 175 मिलियन टन से बढ़कर 2019 - 2020 में 296 मिलियन टन हुआ।रकबे में केवल मामूली वृद्धि के साथ, उत्पादकता के स्तर में वृद्धि कृषि उद्योग के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि उर्वरकों का हिस्सा फसल की उपज का कम से कम आधा हिस्सा होता है।
हालाँकि,जबकि भारत के पास दुनिया में कृषि योग्य और स्थायी रूप से फसली भूमि का सबसे बड़ा क्षेत्र है, लेकिन फिर भी यह मुख्य रूप से कम फसल उत्पादकता के कारण चीन (China) और अमेरिका (America) के बाद समग्र खाद्यान्न उत्पादन में दुनिया में तीसरे स्थान पर है।सीमित कृषि योग्य भूमि और बढ़ती खाद्य जरूरतों के साथ,भारत में उर्वरकों के उपयोग में वृद्धि की दीर्घकालीन संभावना मध्यम रूप से अधिक है।
दूसरी ओर,रकबे में वित्तीय वर्ष 2002 – 2003 में 16.3 मिलियन हेक्टेयर से वित्तीय वर्ष2018 - 2019 में 25.49 मिलियन हेक्टेयर वृद्धि के साथ उत्पादकता में सुधार 8.9 टन प्रति हेक्टेयर से 12.3 टन प्रति हेक्टेयर तक किया गया।पोषक तत्वों की संरचना के आधार पर भारतीय उर्वरक उद्योग को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है, पहला नाइट्रोजन युक्त उर्वरक और दूसरा फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरक।भारत में उर्वरक की कुल खपत वित्त वर्ष 2009 में 50.6 मिलियन टन से 2.0% की सीएजीआर से बढ़कर वित्त वर्ष 2020 में 61.4 मिलियन टन हो गई है।वित्त वर्ष2020 में,स्वस्थ मानसून के बाद,उर्वरकों की प्राथमिक बिक्री की मात्रा 6.0% की मामूली दर से बढ़कर2019 में 57.8 मिलियन टन से2020 में61.4 मिलियन टन हुई।जबकि वित्त वर्ष 2020 में यूरिया की बिक्री5.9% से बढ़कर 33.6 मिलियन टन हुई जो वित्त वर्ष 2019 में 31.7 मिलियन टन थी।
भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार रासायनिक उर्वरक
कोरोना महामारी के दौरान जहां विभिन्न क्षेत्रों में महामारी के नकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं, वहीं उर्वरक उद्योग पर इसका मिश्रित प्रभाव हुआ है।मई 2020 में उर्वरक की कीमतों में 8.5% की गिरावट आई क्योंकि कम इनपुट लागत और कमजोर मौसमी मांग के कारण आपूर्ति बाधाओं में धीरे-धीरे कमी आई।महामारी के शुरुआती चरणों के दौरान कीमतें अपेक्षाकृत लचीली थीं।विश्व बैंक उर्वरक मूल्य सूचकांक 2020 की शुरुआत की तुलना में अप्रैल में 4% अधिक था। यह दर्शाता है, कि उत्पादन में कटौती और आपूर्ति श्रृंखला व्यवधान उत्पन्न हुआ है। यूं तो अब तक उर्वरक उद्योग पर कोरोनोवायरस का सीमित प्रभाव पड़ा है, लेकिन वैश्विक महामारी का पूरा प्रभाव कुछ क्षेत्रों में दिखाई देने लगा है, जो फसलों के सड़ने से होने वाली नकदी प्रवाह की समस्याओं के कारण है।कोरोना महामारी सरकारों को कड़े उपायों को फिर से लागू करने के लिए मजबूर कर सकती है, जिससे उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो सकती है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले प्रमुख उर्वरक बाजारों की मुद्राओं का निरंतर मूल्यह्रास उर्वरक मांग को सीमित कर सकता है।

संदर्भ:
https://bit.ly/3A4ohed
https://bit.ly/3tywPHA
https://bit.ly/3k4N5NI
https://bit.ly/3lcR9uE
https://bit.ly/3twnSyJ
https://bit.ly/3nlir4F

चित्र संदर्भ

1. खेत में उर्वरकों का छिड़काव करने का एक चित्रण (adobestock)
2. खेतों में उगे छोटे पोंधे का एक चित्रण (flickr)
3. खेती में उर्वरकों का छिड़काव करते किसान का एक चित्रण (blob.core)
4. भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार रासायनिक उर्वरक के उपयोग का एक चित्रण (wikimedia)



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