भारत की अर्थव्यवस्था के समक्ष है ढेर सारी समस्याएं

रामपुर

 30-10-2019 12:50 PM
वास्तुकला 2 कार्यालय व कार्यप्रणाली

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था उस देश की प्रगति का महत्वपूर्ण सूचक होती है। देश की प्रगति मुख्य रूप से इस पर निर्भर करती है। भारत जैसे देश की प्रगति और विकास में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इस वर्ष भारतीय मूल के अमेरिकी अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी को एस्थर डूफ्लो और माइकल क्रेमर के साथ संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दुनिया भर में गरीबी को दूर करने तथा अर्थव्यवस्था में सुधार करने हेतु उनके द्वारा एक प्रायोगिक दृष्टिकोण दिया गया जिसे यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण (Randomized controlled trials) कहा जाता है। यह परीक्षण गरीबी उन्मूलन के लिए महत्वपूर्ण योगदान माना जा रहा है क्योंकि यह दृष्टिकोण दुनिया भर में लोगों के खराब जीवन को सुधारने में सक्षम हो सकता है।

हालांकि इस दृष्टिकोण को कुछ आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ रहा है। उनके इस कार्य में कुछ पद्धति संबंधी समस्याओं की आलोचना की गयी। आलोचकों के अनुसार उनके यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षणों का दायरा बहुत छोटा है। कुछ स्थानों पर ही परीक्षण किये गये हैं जिससे यह जानने या निष्कर्ष निकालने में समस्या उत्पन्न होती है कि क्या एक क्षेत्र के परिणाम दूसरे क्षेत्र के लिए भी समान होंगे? ऐसा असम्भव है कि जो परिणाम ग्रामीण राजस्थान में प्राप्त हुए हैं वो महानगर दिल्ली के लिए भी समान हों। दूसरी ओर उनके परीक्षण प्रयोगशाला तक ही सीमित या केंद्रित हैं, वास्तविक दुनिया से उनका कोई सम्बंध नहीं है। उनके यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण मौजूदा आर्थिक आंकड़ों पर आधारित नहीं हैं। इसके अतिरिक्त यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण केवल संकीर्ण प्रश्नों के समूह पर केंद्रित होते हैं जिनके उत्तर लोग अपने-अपने अनुसार देते हैं। यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण गरीबी के लिए वास्तविक अनुभवजन्य से प्राप्त हुए स्पष्टीकरण की अनदेखी करता है। यह गरीबी के लिए व्यक्तिगत कारणों को महत्ता देता है या केंद्रित करता है। उनका यह कार्य संरचनात्मक कारकों को नज़रअंदाज़ करता है। भारत और अन्य देशों की विकास अवस्थाएं अलग-अलग हैं। उनके शोध बड़े और छोटे संरचनात्मक कारकों को नज़रअंदाज़ करते हैं। इस प्रकार उनका दृष्टिकोण गरीबी का समाधान नहीं कर सकता।

भारत में स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का स्तर कम होने और इलाज योग्य बीमारियों का उपचार न होने के कारण लोग निरंतर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। सरकारी विद्यालय की दोषपूर्ण प्रणाली ने शिक्षा स्तर को गिरा दिया है। इसके अतिरिक्त कोई प्रभावी श्रम और पर्याप्त आय कानून नहीं हैं जो गरीबी को बढ़ावा देता है। भारत जैसे देश के लिए इस अवस्था से उभर पाना बहुत मुश्किल है। स्वतंत्रता के बाद, गरीबी को कम करने के प्रयास में कई कार्यक्रमों को पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से आगे लाया गया। दादाभाई नौरोजी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्वतंत्रता से पहले गरीबी रेखा की अवधारणा के बारे में बात की थी। गरीबी रेखा का सीमांकन करने के लिए सामान्य रूप से प्रति व्यक्ति कैलोरी (Calorie) सेवन मापदंडों का उपयोग किया गया जिसके अंतर्गत न्यूनतम कैलोरी सेवन को रखा गया।

कई अर्थशास्त्रियों ने इस तकनीक की आलोचना की क्योंकि यह वास्तविक गरीब लोगों की पहचान करने और कई मुद्दों को हल करने में असमर्थ थी। इस तकनीक की कमियों को दूर करने के लिए, कई अन्य तकनीकों जैसे सेन इंडेक्स (Sen Index-नोबेल विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन द्वारा), गरीबी गैप इंडेक्स (Poverty Gap Index) और स्क्वेर्ड गरीबी गैप (Squared Poverty Gap) का अविष्कार किया गया। 1973-74 में, गरीबी रेखा से नीचे 32 करोड़ से अधिक लोग थे, 2011-12 में यह संख्या घटकर 27 करोड़ हुई। पिछले तीन और चार दशकों में कई राज्यों में सुधार हुआ और गरीबी के अनुपात में गिरावट आई हालाँकि ओडिशा, मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश में गरीबी का स्तर स्थिर बना रहा।

भारत में गरीबी के मुख्य कारण निरक्षरता, बेरोज़गारी, धन का असमान वितरण, अत्यधिक जनसंख्या, जाति और धर्म आदि के आधार पर भेदभाव आदि हैं। इसके अतिरिक्त भारत के कई हिस्सों में किसानों की दुर्दशा भी इसका एक महत्वपूर्ण कारण है जिसकी वजह से किसान आत्महत्या को मजबूर हो जाते हैं। इसके मुख्य कारणों में उच्च ब्याज दर ऋण, राज्य निवेश में कमी, कम उत्पादकता, रियायती या कम दर वाले विदेशी उत्पादों की उपलब्धता, बुनियादी सुविधाओं का अभाव, खराब सिंचाई प्रणाली, नकली बीज और कीटनाशक, फसल की विफलता (सूखे के कारण) आदि शामिल हैं।

पहली पंचवर्षीय योजना के शुरू होने के साथ सरकार ने गरीबी उन्मूलन के विभिन्न कार्यक्रमों और नीतियों की शुरुआत की, किंतु इसके कोई अच्छे परिणाम देखने को नहीं मिले बल्कि अमीर और गरीब के बीच की खाई और भी अधिक चौड़ी हो गई है। भारत में गरीबी के स्तर को सुधारने के लिए ग्रामीण रोज़गार सृजन कार्यक्रम (REGP), प्रधानमंत्री रोज़गार योजना (PMRY), स्वर्ण जयंती शहरी रोज़गार योजना (SJSRY) आदि शुरू किये गये थे। 2005 में, संसद ने एक नया अधिनियम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम पारित किया। इससे 2013-14 की अवधि के दौरान, लगभग पांच करोड़ परिवारों को रोज़गार के अवसर मिले और वे इस अधिनियम से लाभान्वित हुए। गरीबों की पोषण स्थिति में सुधार के लिए तीन बड़े कार्यक्रम सार्वजनिक वितरण प्रणाली, समेकित बाल विकास योजना और मध्याह्न भोजन योजना शुरू किए गए हैं। इसके अतिरिक्त ग्रामीण लोगों की भलाई के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना, और वाल्मीकि अम्बेडकर आवास योजना भी शुरू की गयी हालाँकि इनके परिणाम काफी संतोषजनक नहीं रहे जिसके प्रमुख कारण प्रणालीगत भ्रष्टाचार, भूमि और धन का असमान वितरण, स्थानीय अभिजात वर्ग से दबाव, गरीब लोगों द्वारा भागीदारी में कमी, अल्प-विकसित अर्थव्यवस्था, पूंजी में कमी आदि हैं।

संदर्भ:
1.
https://bit.ly/2of7SUs
2. https://bit.ly/2qWf9JX
3. https://www.tutorialspoint.com/indian_economy/indian_economy_poverty.htm
4. http://www.economicsdiscussion.net/essays/main-causes-of-poverty-in-india/2277



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