रामपुर की आबिदा बेगम ने पहली गांधी टोपी सिल कर, रखी औपनिवेश भारत में एकता की कड़ी बुनियाद
भारत की आज़ादी की लड़ाई सिर्फ़ हथियारों या बड़े राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके ताने-बाने में हमारे पहनावे, प्रतीकों और ज़मीनी आंदोलनों का बहुत बड़ा हाथ था। उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक रामपुर रियासत हो या फिर दक्षिण भारत का मदुरै—हर शहर ने आज़ादी के आंदोलन में अपना एक नया रंग भरा। इसी तरह, पहले विश्व युद्ध के बाद जब ख़िलाफ़त आंदोलन शुरू हुआ, तो गांधी जी और अली बंधुओं के राजनीतिक गठजोड़ ने देश की आज़ादी की पूरी लड़ाई को एक नई दिशा दे दी।रामपुर में कैसे हुआ था विश्व-प्रसिद्ध गांधी टोपी का जन्म? ज़्यादातर लोगों को यही लगता है कि बापू की पहचान बन चुकी गांधी टोपी का उद्गम गुजरात के साबरमती या महाराष्ट्र के वर्धा में हुआ होगा। लेकिन हक़ीक़त यह है कि इस टोपी की असली शुरुआत रामपुर रियासत से हुई थी। रामपुर के इतिहास पर किताबें लिखने वाले 75 वर्षीय वकील शौकत अली बताते हैं कि महात्मा गांधी ने 1920 में रामपुर का दौरा किया था और यहीं उन्होंने पहली बार यह टोपी पहनी थी। दरअसल, 1920 में गांधी जी मौलाना मोहम्मद अली जौहर की बेटी के निकाह में शरीक होने मुरादाबाद आए थे, जो उस दौर में रामपुर का ही हिस्सा था। शादी के बाद गांधी जी ने रामपुर के नवाब सैयद हामिद अली ख़ान बहादुर से मिलने का फ़ैसला किया, जिन्होंने 1889 से 1930 तक वहाँ हुकूमत की थी। उस समय रियासत का यह दस्तूर था कि नवाब के दरबार में कोई नंगे सिर नहीं जा सकता था, और गांधी जी के पास कोई टोपी नहीं थी। साथियों ने बाज़ार भर में ढूँढा, लेकिन गांधी जी के सिर के नाप की कोई टोपी नहीं मिली। ऐसे में मोहम्मद अली जौहर की वालिदा आबिदा बेगम आगे आईं। उन्होंने घर में ही काते गए खुरदरे सूती कपड़े यानी 'गारा' से अपने हाथों से एक टोपी सिलकर तैयार कर दी। बापू को वह सादी टोपी इतनी पसंद आई कि पूरे रामपुर प्रवास के दौरान उन्होंने उसे सिर से उतारा ही नहीं। आगे चलकर यही सादी टोपी पूरे देश में 'गांधी टोपी' के नाम से आज़ादी का सबसे लोकप्रिय प्रतीक बन गई।प्रथम विश्व युद्ध के बाद ख़िलाफ़त आंदोलन में गांधी जी और अली बंधुओं का गठबंधन कैसे बना? ख़िलाफ़त आंदोलन की जड़ें पहले विश्व युद्ध की उथल-पुथल से जुड़ी थीं। जब 1914 में तुर्की (Turkey) ने मित्र देशों के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान किया, तो भारत के मुसलमानों में गहरी चिंता फैल गई। 11 नवंबर को जर्मनी (Germany) के हथियार डालने और 31 अक्टूबर को तुर्की (Turkey) के झुकने के बाद ऑटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) पूरी तरह बिखर गया। तुर्की (Turkey) को मुद्रोस (Mudros) में युद्धविराम` समझौते पर दस्तख़त करने के लिए मजबूर होना पड़ा। एंटेंट पावर्स (Entente powers) से हारने के बाद सुल्तान वाहिदेद्दीन मेहमेद षष्ठम (Sultan Vahideddin Mehmed VI) ने ब्रिटेन (Britain) की शर्तों पर चलना शुरू कर दिया। इधर दक्षिण अफ्रीका (South Africa) से लौटने के बाद महात्मा गांधी अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ बेख़ौफ़ आवाज़ उठाने वाले अली बंधुओं के हौसले से बहुत प्रभावित हुए और 1915 में मोहम्मद अली से मिले। गांधी जी ने इस मुलाक़ात को याद करते हुए लिखा था कि यह "पहली नज़र का प्यार" जैसा था। जाने-माने इतिहासकार बी.आर. नंदा लिखते हैं कि दोनों के तौर-तरीक़ों में भले ही बहुत फ़र्क़ था, लेकिन जेल से अली बंधुओं की रिहाई के लिए गांधी जी की कोशिशों ने उनके दिलों को जोड़ दिया। लेखक अफ़ज़ल इकबाल के अनुसार, अहिंसा को लेकर अपने अलग नज़रिए के बावजूद मोहम्मद अली बापू के सबसे भरोसेमंद साथी बन गए। मोहम्मद अली का गांधी जी पर इतना पक्का यक़ीन था कि उन्होंने यहाँ तक कह दिया था: “पैगंबर के बाद... मैं गांधी के आदेशों पर चलना अपना सबसे बड़ा फ़र्ज़ मानता हूँ।”असहयोग आंदोलन के दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता ने ब्रिटिश हुकूमत को कैसे चुनौती दी? लखनऊ में ख़िलाफ़त सम्मेलन की सदारत करते हुए मोहम्मद अली ने बापू की मौजूदगी में भरे मंच से कहा था: "मैं आज यह ऐलान करता हूँ कि हिंदुस्तानी फ़ौज महात्मा गांधी की फ़ौज है, हिंदुस्तानी पुलिस महात्मा गांधी की पुलिस है और हर इंसान गांधी के साथ खड़ा है..."। गांधी जी ने अली बंधुओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पूरे मुल्क का दौरा किया और अलीगढ़ कॉलेज के नौजवानों से सरकारी संस्थानों का बहिष्कार करने की अपील की। बापू का 'स्वराज' का विचार अली बंधुओं के दिल में पूरी तरह उतर चुका था। अमृतसर में कांग्रेस ने ख़िलाफ़त के मसले पर गांधी जी की अगुआई को यह कहते हुए मंज़ूर किया कि जब देश का एक हिस्सा भारी तकलीफ़ में हो, तो दूसरा हिस्सा चुपचाप अलग नहीं बैठ सकता। जुलाई 1920 में सिंध में हुए ख़िलाफ़त सम्मेलन में गांधी जी ने 23 करोड़ हिंदुओं से 7 करोड़ मुसलमान भाइयों का साथ देने की अपील की, जिसने हिंदू-मुस्लिम एकता की एक मज़बूत बुनियाद रख दी। फिर सितंबर 1920 के कलकत्ता के विशेष कांग्रेस अधिवेशन में असहयोग के फ़ैसले पर दोनों समुदायों ने अपनी मुहर लगाई। इसके बाद अली बंधुओं ने और भी तीखे भाषण देने शुरू किए, और अक्टूबर 1920 में लखनऊ में मोहम्मद अली ने अंग्रेज़ी अख़बारों के दोहरे रवैये पर सवाल उठाया, जहाँ उन्हें अपनी सभाओं के इश्तिहार छपवाने के लिए भी 150 से 200 पाउंड चुकाने पड़ते थे। हालांकि, 1924 के कोहाट दंगों और 1928 की नेहरू रिपोर्ट के बाद इस रिश्ते में कड़वाहट आ गई और 21 दिसंबर 1928 को अली बंधुओं ने ख़िलाफ़त सम्मेलन में नेहरू रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया।मदुरै की उस भावुक घटना ने गांधी जी को आजीवन खादी का महात्मा कैसे बनाया? कपड़ों के ज़रिए जनता के साथ जुड़ने का गांधी जी का यह सफ़र सिर्फ़ टोपी तक ही नहीं रुका। दक्षिण अफ्रीका (South Africa) में वकालत करते समय बापू थ्री-पीस सूट पहना करते थे। 1915 में जब वे अपने वतन लौटे, तो उन्होंने पारंपरिक गुजराती वेशभूषा अपना ली। लेकिन 20 सितंबर 1921 को अपनी दूसरी मदुरै यात्रा के दौरान गांधी जी वेस्ट मासी स्ट्रीट में ठहरे हुए थे। वहाँ उन्होंने जब खेत-खलिहानों में दिहाड़ी मज़दूरों को तन पर बिना कमीज़ के पसीना बहाते देखा, तो इस मंज़र ने उनके दिल को भीतर तक झकझोर कर रख दिया। वे सोचने लगे कि जिस मुल्क के करोड़ों ग़रीबों के पास तन ढकने को कपड़ा तक नहीं है, वहाँ वे ख़ुद इतने कपड़े कैसे पहन सकते हैं? उसी रात, यानी 21 सितंबर को उन्होंने अपनी पारंपरिक पोशाक हमेशा के लिए छोड़ दी और महज़ चार मीटर लंबी खादी की धोती लपेट ली। अगली सुबह 22 सितंबर को जब वे कामराज स्ट्रीट (जिसे आज 'गांधी पोट्टल' कहा जाता है) में लोगों के सामने पहुँचे, तो सिर्फ़ एक सादी खादी की वेष्टि में अपने नेता को देखकर सब हैरान रह गए। वेस्ट मासी स्ट्रीट का वह मकान जहाँ बापू रुके थे, आज एक खादी केंद्र बन चुका है और वहाँ लगी पत्थर की पट्टिका इस ऐतिहासिक फ़ैसले की गवाही देती है।चरखा और खादी कैसे बने भारत की आत्मनिर्भरता के सबसे बड़े हथियार? स्वदेशी की लड़ाई में चरखा महज़ सूत कातने का औज़ार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और स्वावलंबन का सबसे बड़ा हथियार बन गया था। साबरमती आश्रम का यह पक्का नियम था कि सभी साथी सिर्फ़ हाथ से कते सूत और बुने हुए कपड़े ही पहनेंगे। गंगाबेन मजूमदार ने बड़ौदा रियासत के विजापुर से गांधी जी के लिए पहला चरखा खोजकर निकाला, जिसके बाद आश्रम में बड़े पैमाने पर खादी तैयार होने लगी। 1918 में बापू ने गाँवों में रहने वाले ग़रीबों को सहारा देने के लिए खादी की मुहिम शुरू की थी। धीरे-धीरे यह सिर्फ़ रोज़गार का ज़रिया नहीं रहा, बल्कि विदेशी कपड़ों के बहिष्कार और आज़ादी की अलख जगाने का सबसे बड़ा राजनीतिक और भावनात्मक प्रतीक बन गया। आज भी निफ्ट बेंगलुरु जैसे संस्थान कर्नाटक राज्य खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड के साथ मिलकर 400 से ज़्यादा नए डिज़ाइन तैयार कर रहे हैं, ताकि खादी की इस सुनहरी विरासत को नई पीढ़ी की पसंद के मुताबिक़ आगे बढ़ाया जा सके।संदर्भ:https://tinyurl.com/2bfokkz8https://tinyurl.com/27kkw9c7https://tinyurl.com/2aoh8fej
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
उंगलियों की गिनती से लेकर ग्राफिक्स स्क्रीन तक, कैलकुलेटर के विकास की पूरी कहानी
एक समय ऐसा था जब लिखित संख्याएं अस्तित्व में नहीं थीं। इंसान के पास गिनती करने के लिए केवल अपनी उंगलियां और पैर के अंगूठे ही थे। उंगलियों, पत्थरों और सीपियों का उपयोग करके भेड़ों और फसलों की गिनती करना एक सीमा तक ही संभव था। इसलिए मानव सभ्यता ने एबेकस (Abacus) का आविष्कार किया, जिसे कंप्यूटर हिस्ट्री म्यूजियम के अनुसार उंगलियों के अलावा सबसे पुराना लगातार उपयोग किया जाने वाला गणना उपकरण माना जाता है। एबेकस आज भी उपयोग में है, लेकिन यह गणना मशीनों के प्रति मानव जाति की रुचि की केवल एक शुरुआत थी। समय के साथ इन मशीनों में बड़े और क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं।दुनिया की पहली मैकेनिकल एडिंग मशीन का आविष्कार किसने और कब किया था?इतिहास के पन्नों में पहली बार एडिंग मशीन (Adding Machine) का जिक्र 1623 में मिलता है। विल्हेम शिकार्ड (Wilhelm Schickard) को पहली एडिंग मशीन के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है। यह बात तब सामने आई जब जोहान्स केपलर (Johannes Kepler) के जीवनी लेखक डॉ. फ्रांज हैमर ने दावा किया कि 1623 और 1624 में विल्हेम शिकार्ड द्वारा जोहान्स केपलर को लिखे गए दो पत्रों में कैलकुलेटिंग क्लॉक का चित्र मिला था। इस खोज से पहले यह माना जाता था कि ब्लेज़ पास्कल (Blaise Pascal) ने 1642 में पहली एडिंग मशीन बनाई थी। विल्हेम शिकार्ड की इस मशीन में गुणा करने वाला उपकरण, मध्यवर्ती परिणामों को रिकॉर्ड करने का तंत्र और 6-अंकीय दशमलव जोड़ने वाला उपकरण शामिल था।ब्लेज़ पास्कल की मशीन पास्कलाइन कैसे काम करती थी और यह कितनी सफल रही?ब्लेज़ पास्कल 17वीं सदी के फ्रांस के सबसे प्रसिद्ध दार्शनिकों, गणितज्ञों और आविष्कारकों में से एक थे। 1642 में, 19 वर्ष की आयु में, उन्होंने पहला पास्कलाइन (Pascaline) बनाया, जिसे दुनिया का पहला मैकेनिकल कैलकुलेटर भी कहा जाता है। अपने पिता को कर संग्राहक के रूप में बड़े घटाव और गुणा करते हुए देखकर, उन्होंने एक ऐसा उपकरण बनाने का फैसला किया जो इस समय लेने वाले काम को आसान कर सके। पास्कलाइन एक जटिल तंत्र वाला बॉक्स था, जिसमें बड़े नंबर डाले जा सकते थे। यह मशीन जोड़ और घटाव कर सकती थी, और जोड़-घटाव के लगातार उपयोग से गुणा और भाग भी कर सकती थी।हालांकि यह एक क्रांतिकारी आविष्कार था, लेकिन इसका प्रभाव तुरंत नहीं दिखा। पास्कलाइन के केवल 50 के आसपास ही मॉडल बनाए गए थे। ये मशीनें आम लोगों की पहुंच से बाहर थीं और इन्हें मुख्य रूप से अमीर लोगों द्वारा एक महंगी और जटिल वस्तु के रूप में खरीदा जाता था। 1649 में फ्रांसीसी शाही दरबार से एक विशेष अधिकार मिलने के बाद केवल ब्लेज़ पास्कल ही इसे बना सकते थे। प्रत्येक मशीन हाथ से बनाई जाती थी, इसलिए इसे बनाने में बहुत समय लगता था। 1654 में उन्होंने इसका निर्माण बंद कर दिया।पहला काम करने वाला कैलकुलेटर और पहला कमर्शियल मैकेनिकल कैलकुलेटर कौन सा था?1773 में फिलिप मथायस हैन (Philip Matthäus Hahn) ने पहला काम करने वाला कैलकुलेटर तैयार किया। उन्होंने अपनी मशीन को 1672 में गॉटफ्रीड विल्हेम लाइबनिज़ (Gottfried Wilhelm Leibniz) द्वारा बनाए गए स्टेप्ड रेकनर पर आधारित किया था। इसके बाद 1820 में चार्ल्स जेवियर थॉमस डी कोलमार (Charles Xavier Thomas de Colmar) ने अरिथमोमीटर (Arithmometer) का आविष्कार किया। यह जोड़, घटाव, गुणा और भाग जैसी चारों बुनियादी संक्रियाओं को पूरा करने वाली पहली व्यावसायिक रूप से सफल गणना मशीन थी। 1851 में इसके उत्पादन के साथ ही मैकेनिकल कैलकुलेटर उद्योग की शुरुआत हुई और यह प्रथम विश्व युद्ध तक उपयोग में रहा।इलेक्ट्रॉनिक युग की शुरुआत कैसे हुई और पहला ट्रांजिस्टर कैलकुलेटर कौन सा था?गणना मशीनों के इतिहास में एक बड़ा बदलाव तब आया जब आईबीएम (IBM) ने 1954 में आईबीएम 608 मशीन पेश की। यह पहली गणना मशीन थी जिसमें वैक्यूम ट्यूब के बजाय सॉलिड-स्टेट ट्रांजिस्टर का उपयोग किया गया था। इस मशीन को कई बड़ी अलमारियों में रखा जाता था। इसकी कीमत 83,210 डॉलर थी या इसे 1,760 डॉलर प्रति माह पर किराए पर लिया जा सकता था। इस मशीन की मुख्य मेमोरी 9 अंकों वाली 40 संख्याओं को स्टोर कर सकती थी और एक सेकंड में 4,500 जोड़ कर सकती थी। इसमें 3,000 से अधिक जर्मेनियम ट्रांजिस्टर लगे थे।दुनिया का पहला इलेक्ट्रॉनिक डेस्कटॉप कैलकुलेटर एनिएटा कैसे बना?1961 में ब्रिटेन की बेल पंच (Bell Punch) कंपनी ने दुनिया का पहला इलेक्ट्रॉनिक डेस्कटॉप कैलकुलेटर बाजार में उतारा, जिसे एनिएटा (ANITA) नाम दिया गया। कंपनी मुख्य रूप से टिकट पंच बनाने के लिए जानी जाती थी। 1956 में नॉर्बर्ट किट्ज़ (Norbert Kitz) को इलेक्ट्रॉनिक्स का उपयोग करके नई मशीन विकसित करने के लिए लाया गया था। काफी शोध के बाद उन्होंने एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक मशीन बनाई जिसमें केवल कीबोर्ड की कुंजियां ही घूमने वाले हिस्से थे।1961 में हैम्बर्ग के एक व्यापार मेले में इसका पहला मॉडल एनिएटा मार्क 7 पेश किया गया और उसी साल अक्टूबर में लंदन में एनिएटा मार्क 8 लॉन्च किया गया। एनिएटा मार्क 8 में लगभग 170 वैक्यूम ट्यूब, एक डिकाट्रॉन दशक काउंटर ट्यूब और न्यूमीकेटर डिस्प्ले ट्यूब का उपयोग किया गया था। एनिएटा का नाम इतनी तेजी से लोकप्रिय हुआ कि कंपनी ने इसे ही ब्रांड नाम बना लिया। यह मशीन यूरोप में भारी सफल रही और दो साल से अधिक समय तक बाजार में इसके टक्कर का कोई दूसरा इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर नहीं था।एनिएटा के बाद पॉकेट कैलकुलेटर और नई तकनीकों का विकास कैसे हुआ?1960 के दशक के मध्य में सिलिकॉन ट्रांजिस्टर सस्ते हो गए। बेल पंच ने एकीकृत सर्किट यानी इंटीग्रेटेड सर्किट को अपनाया। 1971 तक लार्ज स्केल इंटीग्रेशन चिप्स के इस्तेमाल से मशीनों का आकार छोटा होने लगा। 1971 में ही बसिकॉम (Busicom) ने दुनिया का पहला पॉकेट के आकार का और रेड एलईडी डिस्प्ले वाला कैलकुलेटर हैंडी जारी किया। इसकी कीमत 395 डॉलर थी। बाद में अमेरिकी कंपनी रॉकवेल (Rockwell) ने बेल पंच की कैलकुलेटर इकाई को खरीद लिया। रॉकवेल ने एक चिप पर पूरा सर्किट डाल दिया, लेकिन पॉकेट कैलकुलेटर बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण 1970 के दशक के अंत तक बेल पंच और एनिएटा का नाम बाजार से गायब हो गया।मैकेनिकल कैलकुलेटर और इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर के बीच मुख्य अंतर क्या हैं?मैकेनिकल और इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर के काम करने के तरीके में बहुत बड़ा फ़र्क होता है। मैकेनिकल कैलकुलेटर में भौतिक गियर, लीवर, पहिए और कैम होते हैं। ये मशीनें हाथ की ताकत (क्रैंक या स्प्रिंग) से चलती हैं और भौतिक घटकों की हलचल के आधार पर धीमी गति से गणना करती हैं। इनका आकार बहुत बड़ा और वजन काफी ज्यादा होता था, और लगातार घर्षण के कारण इनमें टूट-फूट का खतरा रहता था। इनमें परिणाम देखने के लिए नंबर वाले डायल या छपे हुए पेपर टेप का इस्तेमाल होता था।दूसरी ओर, इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर पूरी तरह से माइक्रोचिप, सिलिकॉन ट्रांजिस्टर और एकीकृत सर्किट पर आधारित होते हैं। ये बिजली, बैटरी या सौर ऊर्जा से चलते हैं। इनमें डेटा प्रोसेसिंग के लिए बाइनरी लॉजिक गेट्स का उपयोग होता है, जिससे गणनाएं लगभग तुरंत हो जाती हैं। ये वजन में बेहद हल्के, पतले और जेब में रखने लायक होते हैं। इनमें परिणाम देखने के लिए एलसीडी या एलईडी स्क्रीन होती है। यांत्रिक घिसाव न होने के कारण ये लंबे समय तक चलते हैं, हालांकि सर्किट खराब होने का खतरा रहता है।ग्राफिंग कैलकुलेटर से लेकर टच स्क्रीन और कलर डिस्प्ले तक का सफर कैसे तय हुआ?समय के साथ इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर और उन्नत होते गए। 1967 में टैक्सास इंस्ट्रूमेंट्स (Texas Instruments) ने कैल टेक नाम से पहला हैंडहेल्ड कैलकुलेटर विकसित किया। 1974 में हेवलेट-पैकार्ड (Hewlett-Packard) ने 795 डॉलर में एचपी-65 नाम का पहला प्रोग्राम योग्य कैलकुलेटर लॉन्च किया, जो अंतरिक्ष में जाने वाला पहला कैलकुलेटर भी बना।1985 में कैसिओ (Casio) ने 422 बाइट्स मेमोरी और 82 वैज्ञानिक कार्यों के साथ पहला ग्राफिंग कैलकुलेटर कैसिओ एफएक्स-7000जी लॉन्च किया। 2003 में शार्प (Sharp) ने पहला स्टायलस-आधारित टच ग्राफिंग कैलकुलेटर बनाया। इसके बाद 2010 में कैसिओ ने प्रिज्म नाम से पहला फुल-कलर ग्राफिंग कैलकुलेटर बाजार में उतारा, जिससे छात्रों को मोनोक्रोम डिस्प्ले से हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया। एबेकस से शुरू हुआ यह सफर आज अत्याधुनिक रंगीन स्क्रीन और शक्तिशाली चिप्स तक पहुंच चुका है, जिसने गणित और विज्ञान की दुनिया को पूरी तरह से बदल दिया है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/y8y8hb9o2. https://tinyurl.com/2ak9jr5h3. https://tinyurl.com/h3ko9zg
जलवायु और मौसम
आज हम जानेंगे, रामपुर की क्षेत्रीय लू हवा के पीछे कौन से वायुमंडलीय कारक मौजूद हैं?
हमारे रामपुर जैसे समुद्र से दूर स्थित जिलों में आने वाली भीषण लू (गर्म हवा), तीव्र सौर विकिरण के क्षेत्रीय वायुमंडलीय स्थितियों के साथ प्रभाव का परिणाम है। हालांकि सूर्य से पृथ्वी की औसत निकटता अपेक्षाकृत स्थिर रहती है, लेकिन स्थानीय भू-तापन इस बात पर अधिक निर्भर करता है कि सीधी सौर किरणें वायुमंडल से कैसे गुजरती हैं। जब सीधी धूप सूखी मिट्टी पर पड़ती है, तो ऊष्मीय विकिरण सतह के पास फंस जाते हैं, जिससे जमीन का तापमान काफी बढ़ जाता है।सौर ऊर्जा अवशोषण, विकिरण ताप स्थानांतरण (Radiation heat transfer) की वह प्रक्रिया है, जहाँ कोई सतह गिरने वाली सूरज की रोशनी को दूर परावर्तित करने के बजाय, उसे अवशोषित कर लेती है। यह अवशोषित विकिरण, ऊष्मीय ऊर्जा बन जाता है, जिससे सतह का तापमान बढ़ सकता है और फिर चालन (conduction), संवहन (convection), और पुन:विकिरण (re-radiation) हानियों को बढ़ावा मिल सकता है।यदि विकिरण किसी सतह पर पड़ता है, तो उसका कुछ हिस्सा परावर्तित हो जाता है, कुछ हिस्सा उससे गुजर सकता है, और बाकी हिस्सा अवशोषित हो जाता है। सूरज की ओर अधिक सीधे भाग वाली सतह को उससे दूर झुकी हुई सतह की तुलना में अधिक प्रभावी ऊर्जा प्राप्त होती है, भले ही दोनों की सामग्री एक ही हो। एक बार ऊर्जा अवशोषित हो जाने के बाद, सतह गर्म हो जाती है और फिर ऊष्मीय विकिरण उत्सर्जित करती है। इसके अलावा, यदि कोई सतह अन्य सतहों से घिरी हुई है, तो उसे प्राप्त होने वाला कुछ विकिरण ज्यामिति के आधार पर अवरुद्ध, पुनर्निर्देशित या विनिमय किया जा सकता है। साथ ही, गहरे रंगों वाली सतहें अधिक विकिरण अवशोषित करती हैं और फीके रंगों वाली सतहें कम अवशोषण करती हैं।एक हीट डोम (Heat dome) अर्थात गर्मी का कवच जैसा क्षेत्र, तब विकसित होता है, जब उच्च दबाव का एक व्यापक क्षेत्र किसी अन्य क्षेत्र पर स्थापित हो जाता है और लंबी अवधि तक वहीं रहता है। उच्च दबाव के तहत, हवा वायुमंडल से नीचे रहती है। जैसे-जैसे यह नीचे आती है, यह संपीड़ित (Compressed) होती है और गर्म होती है। साथ ही, बादलों का निर्माण रुक जाता है, जिससे तेज धूप जमीन तक पहुँच पाती है। यह पैटर्न जितनी देर तक बना रहता है, ऊष्मा का प्रभाव उतना ही अधिक होता है। साफ आसमान, दिन के समय तापमान के बढ़ने को प्रेरित करता है, जबकि मिट्टी धीरे-धीरे सूख जाती है। जैसे-जैसे ज़मीन की नमी कम होती है, वाष्पीकरण के लिए कम सौर ऊर्जा का उपयोग होता है। इससे अधिक ऊर्जा ज़मीन की सतह तथा इसके ऊपर की हवा को सीधे तौर पर गर्म करने के लिए उपलब्ध हो जाती है।बाद में, सूखी ज़मीन अतिरिक्त वार्मिंग को बढ़ावा देती है, जो बदले में अधिक सूखे को प्रोत्साहित करती है। चूंकि गर्म हवा, ठंडी हवा की तुलना में वायुमंडल की गहरी परत में आती है, इसलिए परिणामी पैटर्न हीट डोम हो सकता है, जिसका हटना मुश्किल हो जाता है। जब ये पैटर्न होते हैं, तो वे गर्म जलवायु और अक्सर सूखी ज़मीन में योगदान देते हैं। इस प्रकार बढ़ी गर्मी में, सामान्य गर्मी की तुलना में अधिक तीव्र होने की क्षमता है। दूसरे शब्दों में, भले ही मौसम के पैटर्न स्वयं काफी नहीं बदलें हो, लेकिन उनके प्रभाव तेजी से गंभीर होते जा रहे हैं। साथ ही, स्थानीय इलाके और शहरी घनत्व इस बात को संशोधित करते हैं कि विकिरणीय सौर ऊर्जा कैसे संग्रहीत होती है।कई शहर, आज शहरी ताप द्वीप (Urban Heat Island) प्रभाव का अनुभव कर रहे हैं। यह शहरों में, मानवीय गतिविधियों के कारण बढ़ती अत्यधिक गर्मी से संबंधित अवधारणा है। जैसे-जैसे प्राकृतिक और कृषि भूमि कंक्रीट, इमारतों, और सड़कों जैसी पक्की संरचनाओं में बदलती है, स्थानीय तापमान तेजी से बढ़ने लगता है। इससे शहरी ताप द्वीप प्रभाव बनता है। कंक्रीट और डामर जैसी सामग्री दिन के समय गर्मी को अवशोषित कर लेती है और रात में इसे उत्सर्जित करती है। इससे स्थानीय सूक्ष्म जलवायु (Microclimates) प्रभावित होती है। इस कारण, शहरी क्षेत्रों में भूमि उपयोग, उसकी संरचना और स्थानीय तापीय गतिकी (Localized thermal dynamics) के बीच मौजूद संबंधों का विश्लेषण करना जरूरी है।पेड़ों, पार्कों और वनस्पतियों की कमी के कारण वाष्पोत्सर्जन की प्राकृतिक शीतलन प्रक्रिया रुक जाती है। इससे शहरी इलाकों में गर्मी का असर और अधिक तीव्र हो जाता है। स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाली यह अतिरिक्त गर्मी और बिगड़ी हुई तापीय गतिकी मिलकर, क्षेत्रीय स्तर पर लू के प्रभाव को ज्यादा खतरनाक व गंभीर बना देती हैं। इस कारण, क्षेत्रीय स्तर पर गर्मी के प्रकोप को कम करने के लिए शहरी नियोजन में हरे भरे स्थान और प्राकृतिक वनस्पतियों को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है। संदर्भ1. https://tinyurl.com/3ft4cx462. https://tinyurl.com/bdfpmjdr3. https://tinyurl.com/c4knvx9h
ध्वनि II - भाषाएँ
नेपाल से लेकर सूरीनाम तक किन 8 देशों में शान से बोली जाती है हिंदी?
भाषा किसी भी राष्ट्र की अस्मिता, संस्कृति और उसके नागरिकों के पारस्परिक संबंधों की संवाहिका होती है। भारतीय उपमहाद्वीप में सदियों से संवाद और चेतना के केंद्र में रही हिंदी आज न केवल देश के 1.3 अरब से अधिक लोगों के बीच संपर्क की प्रमुख भाषा है, बल्कि यह सात समंदर पार भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है। इंडो-आर्यन भाषा परिवार की सदस्य और देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी का इतिहास अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण रहा है। 10वीं शताब्दी की आरंभिक बोलियों से लेकर 21वीं सदी के डिजिटल (digital) युग तक, हिंदी ने अपनी अद्भुत ग्रहणशीलता (assimilation power) के बल पर क्षेत्रीय सीमाओं को लाँघकर वैश्विक स्तर पर एक प्रभावशाली भाषा का दर्जा प्राप्त किया है।10वीं शताब्दी से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक कैसे विकसित हुई हिंदी भाषा?हिंदी भाषा के ऐतिहासिक विकास को मुख्य रूप से तीन कालखंडों में विभाजित किया जाता है। पहला पूर्व-आधुनिक काल (10वीं से 18वीं शताब्दी) माना जाता है। इस दौर में हिंदी मुख्य रूप से उत्तर और मध्य भारत में बोली जाती थी, जिस पर संस्कृत और स्थानीय बोलियों का गहरा प्रभाव था। हिंदी के प्राचीनतम ज्ञात प्रमाण दिल्ली और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में बोली जाने वाली खड़ी बोली में मिलते हैं, जो आधुनिक मानक हिंदी का मूल आधार बनी। 11वीं शताब्दी में धार्मिक स्वरूप के जो प्राचीन ग्रंथ मिलते हैं, उन्हें 'पुरानी हिंदी' या 'हिंदवी' के नाम से जाना गया।दूसरा आधुनिक काल (19वीं से 20वीं शताब्दी के मध्य तक) औपनिवेशिक काल के प्रभाव में विकसित हुआ। इस दौरान अंग्रेज़ों के शासनकाल में हिंदी का मानकीकरण हुआ और साक्षरता बढ़ाने के उद्देश्य से देवनागरी लिपि के स्वरूप को सुव्यवस्थित किया गया। तीसरा कालखंड 1947 में स्वतंत्रता के बाद का है, जब हिंदी को स्वतंत्र भारत की राजभाषा का दर्जा दिया गया।साहित्यिक दृष्टि से हिंदी का भंडार अत्यंत वैभवशाली रहा है। 15वीं शताब्दी के रहस्यवादी कवि कबीर की साखियों से लेकर भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त मीराबाई की भक्ति रचनाओं तक, इस भाषा ने जन-जन को आध्यात्मिक प्रेरणा दी। आधुनिक काल में हरिवंश राय बच्चन, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा जैसे मूर्धन्य रचनाकारों ने इसे वैश्विक पहचान दिलाई। इसके अलावा, ब्रजभाषा, भोजपुरी और अवधी जैसी समृद्ध बोलियों ने इसके शब्दकोश को विस्तार दिया। हिंदी ने फ़ारसी के 'शराब', 'दरबार' और 'मज़ार' जैसे शब्दों को अपनाया, तो अरबी के 'नमाज़', 'कुरान' व 'मौलवी' तथा आधुनिक युग में अंग्रेज़ी के कंप्यूटर (computer), मोबाइल और ईमेल जैसे शब्दों को भी सहजता से आत्मसात कर लिया।क्या संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया है या यह केवल राजभाषा है?प्रायः जनसामान्य में यह धारणा देखने को मिलती है कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है, किंतु वैधानिक दृष्टि से यह तथ्य सही नहीं है। भारतीय संविधान के तहत किसी भी एक भाषा को 'राष्ट्रभाषा' (National Language) का दर्जा प्रदान नहीं किया गया है।संविधान के भाग 17 के अंतर्गत अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ की आधिकारिक भाषा के संबंध में स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं। अनुच्छेद 343 के अनुसार, देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी भारतीय संघ की 'राजभाषा' (Official Language) है, जिसका उपयोग केंद्र सरकार के प्रशासनिक कार्यों में किया जाता है। इसके साथ ही, अहिंदी भाषी राज्यों से संवाद और प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ी को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है।भारत की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को संरक्षित रखने के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है। वर्ष 1950 में जब संविधान लागू हुआ था, तब मूल रूप से इसमें केवल 14 भाषाएँ शामिल थीं। इसके बाद समय-समय पर संवैधानिक संशोधन किए गए:वर्ष 1967 में 21वें संविधान संशोधन द्वारा सिंधी को 15वीं भाषा के रूप में जोड़ा गया।वर्ष 1992 में 71वें संविधान संशोधन द्वारा कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को शामिल किया गया, जिससे कुल संख्या 18 हो गई।वर्ष 2003 में 92वें संविधान संशोधन द्वारा बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को शामिल किया गया, जिससे आठवीं अनुसूची में भाषाओं की संख्या बढ़कर 22 हो गई।यह संवैधानिक व्यवस्था स्पष्ट करती है कि सभी अनुसूचित भाषाएँ देश की सांस्कृतिक धरोहर हैं, जबकि हिंदी और अंग्रेज़ी प्रशासनिक संवाद के साधन हैं।1971 से 2011 तक की जनगणना के आंकड़े हिंदी के विस्तार के बारे में क्या बताते हैं?जनगणना के ऐतिहासिक आंकड़े यह सिद्ध करते हैं कि स्वतंत्र भारत में हिंदी बोलने वालों की संख्या और प्रतिशत में निरंतर वृद्धि हुई है। शोध पत्र में संकलित भारतीय जनगणना के आंकड़ों के अनुसार:वर्ष 1971 में देश की कुल 54.81 करोड़ की जनसंख्या में हिंदी भाषियों की संख्या 20.27 करोड़ थी, जो कुल आबादी का 36.99 प्रतिशत था।वर्ष 1981 में यह संख्या बढ़कर 25.77 करोड़ (38.74 प्रतिशत) हो गई।वर्ष 1991 में हिंदी भाषियों की संख्या 32.95 करोड़ (39.29 प्रतिशत) तक पहुँची।वर्ष 2001 में यह आँकड़ा 42.20 करोड़ (41.03 प्रतिशत) हो गया।वर्ष 2011 की जनगणना में भारत के 52.83 करोड़ लोगों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया, जो देश की कुल जनसंख्या का 43.63 प्रतिशत है।राज्यों के आधार पर देखा जाए तो देश के कुल हिंदी भाषियों में उत्तर प्रदेश का योगदान सर्वाधिक 35.58 प्रतिशत है। इसके बाद बिहार (15.27 प्रतिशत), मध्य प्रदेश (12.17 प्रतिशत), राजस्थान (11.60 प्रतिशत), हरियाणा (4.22 प्रतिशत), छत्तीसगढ़ (4.04 प्रतिशत), झारखंड (3.87 प्रतिशत), महाराष्ट्र (2.74 प्रतिशत), दिल्ली (2.70 प्रतिशत) और उत्तराखंड (1.70 प्रतिशत) का स्थान आता है। वर्ष 1997 के एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, देश के 66 प्रतिशत नागरिक हिंदी समझ और बोल सकते हैं, जबकि 77 प्रतिशत लोगों का मानना है कि हिंदी समूचे देश में सबसे अधिक प्रयुक्त होने वाली संपर्क भाषा है।भारत के बाहर किन आठ प्रमुख देशों में सबसे ज्यादा बोली जाती है हिंदी?हिंदी की लोकप्रियता केवल भारत की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है। विश्व में 42.5 करोड़ से अधिक लोग हिंदी को अपनी पहली भाषा के रूप में और लगभग 12 करोड़ लोग इसे दूसरी भाषा के रूप में बोलते हैं। भारत के अतिरिक्त आठ ऐसे प्रमुख देश हैं, जहाँ हिंदी व्यापक रूप से बोली जाती है:नेपाल (Nepal): भारत के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी हिंदी भाषी आबादी नेपाल में रहती है। यहाँ लगभग 80 लाख लोग हिंदी बोलते हैं। वर्ष 2016 में नेपाल की संसद में हिंदी को आधिकारिक दर्जा देने पर विचार किया गया था, क्योंकि वहाँ की लगभग 80 प्रतिशत आबादी हिंदी समझने अथवा बोलने में सक्षम है।संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America): अमेरिका में विश्व की तीसरी सबसे बड़ी हिंदी भाषी आबादी (लगभग 6.49 लाख) निवास करती है। यह अमेरिका में बोली जाने वाली 11वीं सबसे बड़ी विदेशी भाषा है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि अमेरिका में चिकित्सकों के बीच अंग्रेज़ी और स्पैनिश के बाद हिंदी तीसरी सबसे लोकप्रिय भाषा बन चुकी है।मॉरीशस (Mauritius): मॉरीशस में लगभग 4.5 लाख लोग हिंदी बोलते हैं। भारतीय मूल के लोगों की बहुलता के कारण यहाँ हिंदी का गहरा सांस्कृतिक जुड़ाव है।फ़िजी (Fiji): फ़िजी में लगभग 3.8 लाख लोग फ़िजी हिंदी बोलते हैं, जिसका आरंभ औपनिवेशिक काल में गिरमिटिया श्रमिकों के आगमन के साथ हुआ था।दक्षिण अफ़्रीका (South Africa): 19वीं शताब्दी से बसे भारतीय समुदाय के कारण यहाँ लगभग 2.5 लाख लोग हिंदी बोलते हैं।सूरीनाम (Suriname): डच उपनिवेश काल में 1873 से बसे भारतीय प्रवासियों के कारण यहाँ लगभग 1.5 लाख लोग 'सरनामी हिंदी' बोलते हैं।युगांडा (Uganda): पूर्वी अफ़्रीका के इस देश में पीढ़ियों से बसे भारतीय मूल के लगभग 1 लाख लोग अपने घरों और सामाजिक कार्यक्रमों में हिंदी बोलते हैं।यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom): ब्रिटेन के प्रवासी भारतीय समुदाय में लगभग 45,800 लोग दैनिक जीवन में हिंदी का प्रयोग करते हैं।संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक कूटनीति के मंच पर हिंदी ने कैसे बनाई अपनी विशिष्ट पहचान?अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं। वर्ष 1977 में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहली बार हिंदी में भाषण देकर इतिहास रचा था। इसके बाद, सितंबर 2014 में 69वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा और सितंबर 2015 में संयुक्त राष्ट्र सतत विकास सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदी में अपना संबोधन प्रस्तुत किया, जिससे विश्व मंच पर भाषा का गौरव बढ़ा। वैश्विक स्तर पर हिंदी के प्रचार-प्रसार और शोध के लिए वर्ष 1997 में महाराष्ट्र के वर्धा में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना की गई, जिसका एक प्रमुख लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने का प्रयास करना भी है। वर्तमान में विश्व के 180 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी के अध्यापन की व्यवस्था है, जिनमें से 100 से अधिक उच्च शिक्षण संस्थान अकेले अमेरिका में स्थित हैं। डिजिटल युग और कंप्यूटर तकनीक ने हिंदी को वैश्विक भाषा बनाने में क्या भूमिका निभाई है?सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार ने हिंदी को एक नई शक्ति प्रदान की है। 20 जून 2005 को सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत संस्था सी-डैक (C-DAC) ने हिंदी का निःशुल्क सॉफ्टवेयर (software) जारी किया। इस पैकेज में ओपनऑफिस (OpenOffice) के लिए 525 हिंदी फॉन्ट, वेब ब्राउज़र, ईमेल, ओसीआर (OCR), हिंदी-अंग्रेज़ी शब्दकोश, टाइपिंग ट्यूटर और 'लेखवानी' जैसी ऑडियो टाइपिंग प्रणाली उपलब्ध कराई गई। माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) कंपनी ने भी हिंदी में एमएस ऑफिस जारी किया, और कंपनी के प्रवर्तक बिल गेट्स (Bill Gates) ने कंप्यूटर के लिए हिंदी की उपयुक्तता को स्वीकार किया।यूनिकोड (Unicode) प्रणाली के आगमन से इंटरनेट पर हिंदी क्रांति आ गई। आज इंटरनेट पर 15 से अधिक हिंदी सर्च इंजन कार्यरत हैं। भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने 'लीला' (LILA - Learning Indian Language through Artificial Intelligence) नामक पैकेज विकसित किया है, जिसके माध्यम से देश की 14 प्रमुख भाषाओं (असमिया, बोडो, बांग्ला, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, तमिल और तेलुगु) की सहायता से कोई भी व्यक्ति सरलता से हिंदी सीख सकता है।ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्निशन (ओसीआर) तकनीक की सहायता से प्राचीन संस्कृत और पुरानी देवनागरी पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में परिवर्तित किया जा रहा है। गूगल इनपुट टूल्स, यूनिनागरी, कृतिदेव-टू-यूनिकोड कन्वर्टर जैसे साधनों ने लेखन को सुगम बना दिया है। यही कारण है कि आज हॉलीवुड में 'अवतार' (Avatar) जैसे शीर्षक से फ़िल्में बनती हैं और वैश्विक कंपनियाँ अपने उत्पादों के दिशा-निर्देशों में हिंदी को अनिवार्य स्थान दे रही हैं। यह तकनीकी सामर्थ्य यह सिद्ध करता है कि हिंदी आने वाले समय में विश्व भाषा बनने की दिशा में दृढ़ता से अग्रसर है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/28sjtos42. https://tinyurl.com/26sjmzht3. https://tinyurl.com/24wshyn24. https://tinyurl.com/28oas2cn
बैक्टीरिया, प्रोटोज़ोआ, क्रोमिस्टा और शैवाल
निपाह वायरस का कहर और रामपुर के लिए केरल मॉडल से सीखने वाले अहम सबक?
निपाह (Nipah) एक बेहद गंभीर और जानलेवा वायरस है जो जानवरों से इंसानों में फैलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य प्रमुख स्वास्थ्य संस्थानों के अनुसार इस बीमारी में मृत्यु दर चालीस से 75% तक हो सकती है। यह बीमारी मुख्य रूप से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाई जाती है। जब भी किसी नए वायरस या महामारी का खतरा मंडराता है तो स्थानीय प्रशासन और आम जनता की जागरूकता ही बचाव का सबसे बड़ा हथियार बनती है। निपाह वायरस के हालिया मामलों और इसके संक्रमण की गंभीरता को देखते हुए यह समझना बेहद जरूरी है कि यह वायरस क्या है और इससे कैसे बचा जा सकता है। केरल जैसे राज्य ने जिस तत्परता से इस महामारी का सामना किया है वह रामपुर जैसे शहरों के लिए एक बेहतरीन उदाहरण है।निपाह वायरस क्या है?निपाह एक प्रकार का जूनोटिक वायरस है जिसका मतलब है कि यह जानवरों से इंसानों में फैलता है। वैज्ञानिक तौर पर यह पैरामिक्सोविरिडे परिवार (Family Paramyxoviridae) का हिस्सा है। इस वायरस का प्राकृतिक स्रोत टेरोपोडीडे परिवार (Family Pteropodidae) के फ्रूट बैट यानी फल खाने वाले चमगादड़ होते हैं जिन्हें फ्लाइंग फॉक्स भी कहा जाता है। यह वायरस चमगादड़ों में कोई बीमारी पैदा नहीं करता लेकिन जब यह इंसानों या अन्य जानवरों तक पहुंचता है तो बेहद खतरनाक साबित होता है।निपाह वायरस की पहचान पहली बार साल 1998 में मलेशिया में सूअर पालने वाले किसानों के बीच हुई थी। इसके बाद 1999 में सिंगापुर में भी इसके मामले सामने आए जब मलेशिया से बीमार सूअरों का आयात किया गया था। तब से लेकर अब तक भारत और बांग्लादेश में इसके कई प्रकोप देखे जा चुके हैं। भारत में सिलीगुड़ी और केरल में समय-समय पर इसके मामले सामने आते रहे हैं।निपाह वायरस कैसे फैलता है?निपाह वायरस के फैलने के कई तरीके हैं। मुख्य रूप से यह चमगादड़ और सूअर जैसे संक्रमित जानवरों के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। अगर कोई व्यक्ति संक्रमित चमगादड़ की लार या मूत्र से दूषित फल खाता है या कच्चा खजूर का रस पीता है तो वह इस वायरस का शिकार हो सकता है। बांग्लादेश और भारत के कुछ हिस्सों में खजूर के कच्चे रस के सेवन से संक्रमण के कई मामले सामने आए हैं।जानवरों के अलावा यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में भी फैल सकता है। जो लोग निपाह संक्रमित मरीजों की देखभाल करते हैं या उनके शरीर के तरल पदार्थों के संपर्क में आते हैं उन्हें इसका सबसे ज्यादा खतरा होता है। अस्पतालों में जहां वेंटिलेशन की कमी होती है और संक्रमण नियंत्रण के उपाय ठीक से लागू नहीं होते वहां स्वास्थ्य कर्मियों और परिवार के सदस्यों में इसका फैलाव तेजी से होता है।निपाह वायरस के प्रमुख लक्षण क्या हैं?निपाह वायरस से संक्रमित होने के बाद लक्षण दिखने में आमतौर पर चार से चौदह दिन का समय लगता है, जिसे इन्क्यूबेशन पीरियड (incubation period) कहा जाता है। हालांकि कुछ दुर्लभ मामलों में यह समय पैंतालीस दिनों तक का भी हो सकता है। कुछ लोगों में इसके कोई लक्षण दिखाई नहीं देते लेकिन ज्यादातर मरीजों में बुखार सिरदर्द खांसी गले में खराश और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं।जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता है स्थिति गंभीर होती जाती है। कुछ मरीजों के मस्तिष्क में सूजन आ जाती है, जिसे एन्सेफलाइटिस (encephalitis) कहते हैं। ऐसी स्थिति में मरीज को भ्रम सुस्ती और दौरे पड़ने लगते हैं और चौबीस से अड़तालीस घंटे के भीतर वह कोमा में भी जा सकता है। जो लोग इस गंभीर बीमारी से बच जाते हैं उनमें से लगभग बीस प्रतिशत लोगों को लंबे समय तक न्यूरोलॉजिकल (neurological) समस्याओं का सामना करना पड़ता है।निपाह वायरस संक्रमण की पहचान कैसे होती है?शुरुआती लक्षणों के आधार पर निपाह वायरस को अन्य संक्रामक बीमारियों से अलग करना मुश्किल होता है। इसकी सटीक पहचान के लिए प्रयोगशाला परीक्षण आवश्यक हैं। इसके निदान के लिए मुख्य रूप से रियल टाइम पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (real-time polymerase chain reaction) या आरटी-पीसीआर टेस्ट (RT-PCR test) का इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए मरीज के गले के स्वैब, नाक के स्वैब, रक्त या मस्तिष्कमेरु द्रव के नमूने लिए जाते हैं।इसके अलावा रक्त में एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए एलिसा टेस्ट (ELISA test) भी किया जाता है। चूंकि यह वायरस बेहद खतरनाक है इसलिए संदिग्ध मरीजों के नमूनों को प्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा उच्चतम सुरक्षा वाली प्रयोगशालाओं में ही जांचा जाना चाहिए।निपाह वायरस का इलाज और वैक्सीन की स्थिति क्या है?वर्तमान में निपाह वायरस संक्रमण के लिए कोई भी मान्यता प्राप्त दवा या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। इलाज पूरी तरह से सहायक देखभाल पर निर्भर करता है। मरीज को पर्याप्त आराम, तरल पदार्थ और लक्षणों के आधार पर दवाएं दी जाती हैं। गंभीर मामलों में ऑक्सीजन सपोर्ट और वेंटिलेटर की आवश्यकता होती है।वैज्ञानिक और शोधकर्ता लगातार इसके इलाज की खोज में लगे हुए हैं। रेमडेसिविर (Remdesivir) रिबाविरिन (Ribavirin) और फैविपिराविर (Favipiravir) जैसी एंटीवायरल दवाओं का जानवरों पर परीक्षण किया गया है और कुछ सकारात्मक परिणाम भी मिले हैं। इसके साथ ही कई प्रकार की वैक्सीन जैसे कि मैसेंजर आरएनए (RNA) आधारित वैक्सीन और वायरल वेक्टर आधारित वैक्सीन के निर्माण पर भी काम चल रहा है लेकिन ये अभी क्लिनिकल ट्रायल के चरण में हैं।निपाह वायरस से बचाव के क्या उपाय हैं?निपाह वायरस से बचने का सबसे प्रभावी तरीका जागरूकता और सावधानी है। प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले या यात्रा करने वाले लोगों को साबुन और पानी से नियमित रूप से हाथ धोने चाहिए। चमगादड़ों और बीमार सूअरों से दूर रहना चाहिए। उन जगहों पर जाने से बचना चाहिए जहां चमगादड़ रहते हैं।खाने-पीने की चीजों को लेकर विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। जमीन पर गिरे हुए या जानवरों द्वारा खाए गए फलों का सेवन नहीं करना चाहिए। फलों को अच्छी तरह धोकर और छीलकर ही खाना चाहिए। खजूर के ताजे रस को उबालने के बाद ही पीना सुरक्षित है। स्वास्थ्य कर्मियों को संक्रमित मरीजों का इलाज करते समय दस्ताने मास्क गाउन और आंखों की सुरक्षा के लिए चश्मे का इस्तेमाल करना चाहिए।केरल ने निपाह वायरस को कैसे नियंत्रित किया?भारत में निपाह वायरस के कई प्रकोप हो चुके हैं, जिनमें से ज्यादातर मामले केरल में दर्ज किए गए हैं। जब केरल में निपाह वायरस का प्रकोप फैला तो राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग ने बिना समय गंवाए कार्यवाही शुरू कर दी। सबसे पहला कदम था प्रभावित इलाकों में तुरंत अलर्ट जारी करना और संदिग्ध मरीजों के नमूनों को जांच के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी पुणे भेजना।संक्रमण की पुष्टि होते ही राज्य सरकार ने प्रभावित गांवों में कंटेनमेंट जोन बना दिए। लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई और सार्वजनिक स्थानों पर मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया गया। एहतियात के तौर पर स्कूलों को बंद करके ऑनलाइन कक्षाएं शुरू की गईं।स्वास्थ्य विभाग ने एक हजार दो सौ अट्ठासी लोगों की पहचान की जो संक्रमित मरीजों के संपर्क में आए थे। इन सभी लोगों को 21 दिनों के लिए निगरानी और क्वारंटाइन में रखा गया। केरल की सफलता का एक बड़ा कारण उनका विकेंद्रीकृत प्रशासन था। हर जिले की स्वास्थ्य इकाइयों को अपने स्तर पर तुरंत फैसले लेने की छूट दी गई थी, जिससे समय की बचत हुई। इसके अलावा कोविड महामारी के दौरान प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों ने कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और मरीजों को आइसोलेट करने में अहम भूमिका निभाई।रामपुर भविष्य की महामारियों के लिए केरल से क्या सीख सकता है?रामपुर जैसे शहरों के लिए केरल का मॉडल एक आदर्श खाका पेश करता है। रामपुर भविष्य की स्वास्थ्य आपात स्थितियों और निपाह जैसी महामारियों से निपटने के लिए केरल से बहुत कुछ सीख सकता है। सबसे पहली सीख बीमारी की त्वरित पहचान और मरीजों को तुरंत आइसोलेट करना है। किसी भी संदिग्ध मामले को हल्के में न लेते हुए तुरंत उसकी जांच और पुष्टि की व्यवस्था होनी चाहिए।केरल की तरह रामपुर प्रशासन को भी कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की सख्त प्रणाली लागू करनी चाहिए ताकि संक्रमण की चेन को जल्द से जल्द तोड़ा जा सके। जन जागरूकता अभियान चलाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लोगों को यह बताना जरूरी है कि उन्हें क्या खाना चाहिए और किन जानवरों से दूरी बनानी चाहिए। भोजन और जल स्रोतों को संक्रमण से बचाने के लिए साफ-सफाई और स्वच्छता पर जोर देना आवश्यक है।इसके अलावा स्वास्थ्य कर्मियों का उचित प्रशिक्षण बहुत जरूरी है ताकि वे बिना घबराए और सुरक्षित तरीके से मरीजों की देखभाल कर सकें। अस्पताल प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए जिससे किसी भी आपात स्थिति में फैसले लेने में देरी न हो। अगर रामपुर स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे में सुधार करता है और समुदाय को जागरूक करता है तो भविष्य में किसी भी बड़े संक्रमण और महामारी के खतरे को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/y8hudome 2. https://tinyurl.com/28xhphbl 3. https://tinyurl.com/26x33ozt 4. https://tinyurl.com/24vqbmz3
धर्म का युग : 600 ई.पू. से 300 ई.
रामपुर वासियों, भागवत पुराण से जानें श्री कृष्ण की 'रास-लीला' का वास्तविक आध्यात्मिक मर्म
हमारे रामपुर शहर के कई लोग, श्री कृष्ण की आराधना करते हैं। उनके जीवन के सुंदर किस्से हमें ज्ञात ही हैं। उदाहरण के लिए, रास-लीला को भक्ति के मार्ग में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। दरअसल, रास-लीला, भगवान श्री कृष्ण के प्रति उनके अदूषित, निर्मल, निष्काम, अनन्य और समर्पित भक्तों के निश्चल प्रेम व भक्ति का प्रतीक है।रास-लीला उन दिव्य लीलाओं में से एक है, जो श्री कृष्ण ने वृंदावन में यमुना तट पर शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी रात में गोपियों (व्रज-बालाओं) के साथ रची थी। इसका अर्थ, परमात्मा का अपनी जीवात्माओं या भक्तों के साथ महामिलन है। जब श्री कृष्ण ने इस दिव्य लीलाएं की अभिव्यक्ति की, तब उनकी आयु लगभग 7 से 10 वर्ष के बीच थी। रास-लीला को श्री कृष्ण की बाल-लीलाओं और पावन गाथाओं में, सर्वोच्च एवं अत्यंत गूढ़ लीला माना जाता है।रास-लीला का प्रामाणिक संदर्भ श्रीमद्भागवत पुराण के दसवें स्कंध (जो श्री कृष्ण को समर्पित है) में पाया जाता है। इसके अंतर्गत, 'रास-पंचाध्यायी' नाम से प्रसिद्ध पांच अध्याय हैं, जो वृंदावन की गोपियों के साथ श्री कृष्ण की इस अलौकिक रास-लीला का विशद वर्णन करते हैं। रास-लीला का स्त्री-पुरुष के भौतिक या सांसारिक काम-भोग से बिलकुल भी संबंध नहीं है, और ऐसा सोचना एक बहुत बड़ी भ्रांति है। यह तो परमेश्वर श्री कृष्ण और उनके अनन्य भक्तों के मध्य का एक विशुद्ध दिव्य एवं आध्यात्मिक संबंध है।वास्तव में, रास-लीला उस सूक्ष्म एवं अलौकिक प्रक्रिया की बाह्य अभिव्यक्ति है, जो प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा के साथ मिलन के रूप में निरंतर घटित होती है। 'रास' शब्द संस्कृत के "रस" शब्द से निष्पन्न हुआ है। इसके अनेक अर्थ हैं, जैसे कि आनंदरस, दिव्य भावना, द्रवीभूत प्रेम, और अमृत। दूसरी ओर, 'लीला' शब्द, श्री कृष्ण के उन असीम एवं अलौकिक चरित्रों को दर्शाता है, जिन्हें पूर्णतः समझना हमारी साधारण बुद्धि के परे है। लेकिन, 'लीला' का शाब्दिक अर्थ अभिनय, क्रीड़ा अथवा आनंददायक खेल है, और यह क्रीड़ा नृत्य के रूप में प्रकट होती है। अतः, इन दोनों शब्दों के संयोजन से रास-लीला का अर्थ, ‘गोपियों के साथ श्री कृष्ण का भाव, अनन्य, प्रेम और परमानंद से परिपूर्ण दिव्य महा-नृत्य’ है।श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, कोई भी शब्द अपने प्राणप्रिय श्री कृष्ण के प्रति गोपियों के निष्कपट एवं अनन्य प्रेम का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकता। भगवान श्री हरि के प्रति गोपियों का यह स्नेह दैहिक या कामुक नहीं था, बल्कि वह प्रेरणादायी विशुद्ध आध्यात्मिक प्रेम था। वास्तव में, ये गोपियां कोई साधारण स्त्रियां नहीं थीं, बल्कि वे पूर्व जन्मों के महान ऋषि-मुनि थे, जिन्होंने कठोर तपस्या की थी। वे गोपियों के रूप में अवतरित होकर रास-लीला में अपने आराध्य श्री कृष्ण से साक्षात्कार की प्रतीक्षा कर रहे थे। विशेषत: कुछ पौराणिक प्रसंगों के अनुसार, ये गोपियां, दंडकारण्य के वे ऋषि-मुनि थे, जो त्रेतायुग में भगवान श्री राम के 14 वर्षों के वनवास के दौरान उनसे आलिंगन न पाने के कारण व्यथित थे। अपनी उस अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए उन्होंने द्वापरयुग में गोपियों के रूप में जन्म लिया, क्योंकि स्वयं श्री राम ने उन्हें ऐसा वरदान दिया था।समस्त गोपियों में, श्रीमति राधा रानी श्री कृष्ण की सर्वाधिक प्रिय थीं। श्री कृष्ण के प्रति उनका प्रेम, विशुद्ध प्रेम का सर्वोच्च प्रमाण और पराकाष्ठा है। श्री कृष्ण और श्री राधा रानी को संयुक्त रूप से 'प्रेम-पुरुषोत्तम' एवं आनंद स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।रास-लीला का यह पावन प्रसंग, शरद ऋतु की पूर्णिमा की रात को घटित हुआ था, जब वृंदावन की गोपियां श्री कृष्ण की मधुर बांसुरी की ध्वनि सुनकर अपने समस्त सांसारिक कामकाज, गृहस्थी और पारिवारिक बंधनों को छोड़कर कुंज-गलियों की ओर दौड़ पड़ीं। गोपियां बांसुरी की धुन से इस तरह सम्मोहित हुईं कि वे भय, लोक-लाज, सामाजिक मर्यादा और पारिवारिक संकोच को पीछे छोड़ आईं।भगवान श्री कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति के साथ रास-लीला के इस परम उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए, उस रात्रि को अधिक दिव्य, उज्ज्वल एवं अलौकिक बना दिया। उस वातावरण का प्रत्येक दृश्य अनुपम था। तब वृंदावन में पुष्प विकसित हो चुके थे, पूर्ण चंद्र अपनी शीतल किरणों से जगमगा रहा था और यमुना तट से मंद-शीतल-सुगंधित हवा बह रही थी।यमुना के पावन तट पर, गोपियों ने एक कदंब वृक्ष के नीचे अपने प्रिय श्री कृष्ण का दर्शन किया। रास-लीला के दौरान भगवान श्री कृष्ण ने प्रत्येक गोपी को यह आश्वस्त किया कि वे उन सभी के साथ व्यक्तिगत रूप से नृत्य करेंगे। तत्पश्चात, श्री कृष्ण केंद्र में विराजमान हुए और गोपियों ने उन्हें एक गोलाकार वृत्त में घेर लिया। तब श्री कृष्ण ने अनेक रूप धारण करके प्रत्येक गोपी के साथ स्वयं को प्रकट किया। इससे हर गोपी को यही अनुभव हुआ कि श्री कृष्ण केवल उसी के साथ नृत्य कर रहे हैं। इसकी प्रशंसा में गंधर्व, यक्ष और समस्त देवतागण आकाश मार्ग से इस अलौकिक नृत्य के साक्षी बने और उन्होंने देवलोक से पुष्प-वर्षा की।किंतु, जब गोपियों के मन में यह सूक्ष्म गर्व जागृत होने लगता है कि परमेश्वर केवल उन्हीं के वश में हैं, तब श्री कृष्ण उनका मद दूर करने के लिए वहीं अदृश्य हो जाते हैं। गोपियां, अतः विरह-व्यथा में व्याकुल होकर पूरे वन में श्री कृष्ण को ढूंढती हैं। विरह की उस चरम अवस्था में वे आपस में श्री कृष्ण की विविध लीलाओं का अनुकरण और अभिनय करने लगती हैं। अंततः वे पुनः यमुना तट पर लौटती हैं और श्री कृष्ण के पुनरागमन की आस में उनके अनुपम गुणों का गान करने लगती हैं। इस विरह-वेदना में गोपियों के हृदय से जो अश्रुपूर्ण गीतों की धारा फूटी, वही श्रीमद्भागवत का अमर प्रसंग 'गोपी-गीत' बना है।गोपियों के इस अनन्य प्रेम और पूर्ण समर्पण को देखकर श्री कृष्ण पुनः उनके समक्ष प्रकट होते हैं और रास-लीला पुनः प्रारंभ होती है। इसके पश्चात, यह रास-नृत्य अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंचता है। सांसारिक बंधनों के सर्वथा छिन्न-भिन्न हो जाने के कारण, गोपियां पूर्णतः कृष्ण प्रेम में लीन हो जाती हैं। रास की वह अलौकिक रात्रि पूर्ण होने पर, श्री कृष्ण गोपियों को अपने-अपने घर लौटने की आज्ञा देते हैं।वर्तमान वृंदावन शहर में स्थित सेवाकुंज और निधिवन, वे पावन स्थल माने जाते हैं, जहां श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ यह अलौकिक रास-लीला रचाई थी। प्राचीन काल में ये दोनों स्थल, एक ही विशाल वन क्षेत्र का भाग थे। मान्यता है कि आज भी प्रतिदिन रात्रि में, श्री कृष्ण और श्री राधा रानी इन कुंजों में अपनी नित्य दिव्य लीलाओं हेतु पधारते हैं। दोनों ही स्थानों पर 'रंग महल' स्थित है, जो इस दिव्य लीला के उपरांत उनके विश्राम-स्थल के रूप में पूजित है। सेवाकुंज में श्री राधा रानी की प्रिय सखी ललिता जी की प्यास शांत करने हेतु श्री कृष्ण द्वारा प्रकट किया गया 'ललिता कुंड' विद्यमान है। जबकि, निधिवन में इसी प्रकार 'विशाखा कुंड' स्थित है। निधिवन में ही महान संगीत-शिरोमणि एवं संत स्वामी हरिदास जी की पवित्र समाधि भी स्थित है, जिन्होंने श्री कृष्ण के स्नेह में अनेक पदों की रचना की और उनका गायन किया था। संदर्भ1. https://tinyurl.com/ykj8c655 2. https://tinyurl.com/29u6pj8k 3. https://tinyurl.com/c2xzt2mv
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
जानें, विश्व शांति व प्रेम के प्रतीक के रूप में कैसे हुई रक्षाबंधन जैसे मित्रता दिवस की शुरुआत?
हर साल, लोग राखी और मित्रता दिवस (फ्रेंडशिप डे) को लेकर बहुत उत्साह और उमंग महसूस करते हैं। रक्षाबंधन के पावन पर्व पर एक भाई अपनी बहन की रक्षा करने का आजीवन वादा करता है। इसके विपरीत, दोस्त, कोई औपचारिक वादा तो नहीं करते हैं, लेकिन इसके लिए दोनों व्यक्तियों में एक गहरी और पक्की मानसिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है। राखी हमारा पारंपरिक और सांस्कृतिक त्योहार है, जबकि मित्रता दिवस आधुनिक समय की देन है।दुनिया भर में हर किसी द्वारा मित्रता के गुण की सराहना की जाती है। लोगों के बीच मित्रता के वैश्विक बंधन को प्रोत्साहित करने के लिए, विभिन्न देशों द्वारा अलग-अलग तारीखों पर मित्रता दिवस मनाया जाता है। भारत जैसे अधिकांश देशों ने इस अवसर के लिए संयुक्त राज्य द्वारा निर्धारित तारीख का अनुसरण किया है, जो हर साल अगस्त के पहले रविवार को आती है।मित्रता दिवस का विचार सबसे पहले 1930 में ‘हॉलमार्क कार्ड्स’ (Hallmark Cards) के संस्थापक जॉयस हॉल (Joyce Hall) द्वारा दिया गया था। इससे पहले, ग्रीटिंग कार्ड, उपहार और अन्य वस्तुएँ भेजकर 2 अगस्त को मित्रता दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा गया था। इस विचार को 1920 के दशक के दौरान ‘ग्रीटिंग कार्ड नेशनल एसोसिएशन’ द्वारा अधिक बढ़ावा दिया गया था। लेकिन इसे बहुत सकारात्मक रूप से नहीं लिया गया, क्योंकि यह मित्रता दिवस के नाम पर व्यावसायिक हितों को बढ़ावा देने वाला एक हथकंडा प्रतीत होता था।इस दिशा में वास्तविक और आधिकारिक प्रयास तब स्पष्ट हुए, जब अमेरिकी कांग्रेस ने वर्ष 1935 में दोस्तों के सम्मान में एक दिन समर्पित करने का निर्णय लिया। हालांकि मित्रता दिवस मनाने का सटीक कारण स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है, लेकिन इसकी आवश्यकता प्रथम विश्व युद्ध के विनाशकारी प्रभावों के बाद महसूस की गई थी। इस अवसर को एक ऐसे माध्यम के रूप में सोचा गया था, जो वैश्विक मित्रता के मजबूत बंधनों के माध्यम से विभिन्न देशों के लोगों के बीच अविश्वास, घृणा और दुश्मनी की दीवारों को मिटा सके।इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए अमेरिकी कांग्रेस ने 1935 में एक औपचारिक उद्घोषणा के माध्यम से, अगस्त के पहले रविवार को मित्रता दिवस के रूप में चिह्नित किया, ताकि मित्रता के सम्मान के लिए एक विशेष अवकाश हो सके। बाद में, अन्य देश भी इस उत्सव में शामिल हो गए। दरअसल, संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2011 में अपनाए गए प्रस्ताव के अनुसार ‘अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस’ 30 जुलाई को मनाने का निर्णय लिया गया था। यह तय किया गया था कि जाति, रंग, लिंग, धर्म, नस्ल और अन्य किसी भी भेदभाव की परवाह किए बिना विभिन्न देशों के लोगों के बीच मित्रता का एक मजबूत बंधन स्थापित किया जाए।अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस 2011 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इस दूरदर्शी सोच के साथ घोषित किया गया था कि लोगों, देशों, संस्कृतियों और व्यक्तियों के बीच दोस्ती शांति के प्रयासों को प्रेरित कर सकती है और समुदायों के बीच एक मजबूत पुल का निर्माण कर सकती है। यह प्रस्ताव भावी नेताओं के रूप में युवाओं को उन सामुदायिक गतिविधियों में शामिल करने पर विशेष जोर देता है, जिनमें विभिन्न संस्कृतियाँ शामिल हों और जो अंतर्राष्ट्रीय समझ व विविधता के लिए सम्मान को बढ़ावा देती हैं।अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस को चिह्नित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सरकारों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और नागरिक समाज समूहों को ऐसे कार्यक्रमों, गतिविधियों और पहलों को आयोजित करने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो सभ्यताओं के बीच संवाद, एकजुटता, आपसी समझ और सुलह को बढ़ावा देने की दिशा में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के प्रयासों में योगदान करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस एक ऐसी पहल है, जो ‘संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO)’ द्वारा शांति की संस्कृति को मूल्यों, दृष्टिकोणों और व्यवहारों के एक ऐसे समूह के रूप में परिभाषित करने वाले प्रस्ताव का अनुसरण करती है, जो हिंसा को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं और समस्याओं को रोकने का प्रयास करते हैं। इसे बाद में 1997 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाया गया था।मित्रता दिवस पर हम कई लोगों के हाथों में ‘फ्रेंडशिप बैंड (Friendship Band)’ बंधा हुआ पाते हैं। ऐसे फ्रेंडशिप बैंड, हमारे दिलों में एक विशेष स्थान रखते हैं। ये बैंड, केवल धागे या धातु के टुकड़ों से कहीं अधिक बढ़कर हैं। वे हमारे दोस्तों के साथ साझा किए जाने वाले मजबूत और अटूट बंधनों का प्रतीक हैं।जब हम अपनी कलाई पर एक फ्रेंडशिप बैंड बांधते हैं या इसे किसी दोस्त को भेंट करते हैं, तो हम जुड़ाव का एक सुंदर संकेत दे रहे होते हैं। इन बैंडों को पहनने और आदान-प्रदान करने का कार्य हमारे बीच के भावनात्मक संबंधों की एक दृश्य याद दिलाता है। यह इस बात को स्वीकार करने का भी एक तरीका है कि भले ही हम शारीरिक रूप से दूर हों, हमारे दिल हमेशा जुड़े हुए हैं।इसके अलावा, समय के साथ, ये बैंड संजोए जाने वाली अमूल्य निशानियाँ बनते हैं। वे सिर्फ साधारण वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि साझा अनुभवों, हँसी-मजाक और समर्थन की अनगिनत यादें अपने साथ रखते हैं। यह हँसी, मुश्किल समय में सहारा देने के लिए कंधे और हमारे दोस्तों द्वारा प्रदान की जाने वाली संगति के प्रति कृतज्ञता दिखाने का भी एक तरीका है।दरअसल, फ्रेंडशिप बैंड अक्सर विभिन्न प्रकार के आकर्षक रंगों में आते हैं, और प्रत्येक रंग का अपना एक विशेष महत्व होता है। उदाहरण के लिए, लाल रंग प्रेम और जोश का प्रतीक हो सकता है, जबकि पीला रंग खुशी और सकारात्मकता का प्रतिनिधित्व करता है। अपने मित्र के व्यक्तित्व से मेल खाने वाले रंग को चुनना, इस हाव-भाव में एक व्यक्तिगत स्पर्श जोड़ता है। इसी तरह, खुद अपने हाथों से बनाए गए बैंड का अक्सर एक गहरा और अनूठा अर्थ होता है, क्योंकि वे उन्हें बनाने में लगाए गए प्रयास, समय और भावनाओं को अपने साथ समेटे होते हैं।जब कोई व्यक्ति अपनी किशोरावस्था में कदम रखता है, तो वह अक्सर ही अपना अधिकांश समय, भाई-बहनों के साथ बिताने के बजाय अपने दोस्तों के साथ बिताना पसंद करता है। लेकिन यह भी एक सत्य है कि इस गतिशील और बदलती दुनिया में, कई बार हमारे सबसे अच्छे दोस्तों की जगह दूसरे लोग ले लेते हैं। इसके बावजूद, दोस्त हमारे सबसे बड़े विश्वासपात्र होते हैं, जिन पर हम भरोसा कर सकते हैं और अपने सबसे गहरे रहस्य साझा कर सकते हैं। कभी-कभी, हम उनसे वे बातें भी साझा करते हैं, जिन्हें हम अपने सगे भाई-बहनों के साथ साझा करने से हिचकिचाते हैं। हालांकि, जरूरत पड़ने पर कई बार दोस्तों से तुरंत मदद मिलना कठिन हो सकता है, जबकि भाई-बहन हर परिस्थिति में सबसे अधिक भरोसेमंद साबित होते हैं।संक्षेप में कहा जाए तो, फ्रेंडशिप डे और रक्षाबंधन दोनों का अपना-अपना अनूठा और विशिष्ट महत्व है। किसी भी व्यक्ति के जीवन में दोनों ही मूल्यवान हैं। जहाँ एक ओर दोस्त जीवन रूपी बगीचे में खिले हुए सुंदर फूलों की तरह हैं, वहीं दूसरी ओर भाई-बहन उसी बगीचे के सच्चे संरक्षक होते हैं। दोस्त वे लोग होते हैं, जिनसे हमारा कोई खून का रिश्ता नहीं होता है, फिर भी वे हमारी असीम परवाह करते हैं। दूसरी ओर, भाई-बहनों के बीच का पवित्र बंधन जीवनभर हमारे साथ रहता है। हमें इन दोनों ही विशेष दिवसों को पूरे जोश और उल्लास के साथ मनाना चाहिए, क्योंकि किसी भी मनुष्य के जीवन में इन दोनों का ही अत्यधिक और अतुलनीय महत्व है। संदर्भ1. https://tinyurl.com/3p4zpdyc 2. https://tinyurl.com/bdef5624 3. https://tinyurl.com/49eje4v6 4. https://tinyurl.com/hw3bukxj
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
जानें, रामपुर की हस्तनिर्मित वायलिन कैसे दुनिया तक अपनी अनूठी पहचान पहुँचा रही है
रामपुर भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा और प्रसिद्ध रामपुर-सहसवान घराने के लिए जाना जाता है। यह घराना अपनी विशिष्ट गायकी शैली के कारण हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। संगीत से इस गहरे जुड़ाव के साथ-साथ रामपुर, हस्तनिर्मित वायलिन बनाने की अपनी अनूठी परंपरा के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ दशकों से कारीगर बड़ी सावधानी और कौशल के साथ वायलिन तैयार करते आए हैं, जो भारत ही नहीं, विदेशों तक भी पहुँचते रहे हैं।वायलिन दुनिया के सबसे अभिव्यंजक तंत्री वाद्यों में से एक माना जाता है। इसकी चार तारों पर धनुष (बो) चलाकर ध्वनि उत्पन्न की जाती है, जिससे कलाकार को अत्यंत कोमल, गंभीर और ऊर्जावान भावों को समान सहजता से व्यक्त करने का अवसर मिलता है। यही कारण है कि वायलिन पश्चिमी शास्त्रीय ऑर्केस्ट्रा, एकल प्रस्तुतियों, लोक संगीत और आधुनिक संगीत सहित अनेक विधाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसकी स्वर-सीमा और मानवीय आवाज़ जैसी अभिव्यक्ति इसे विश्वभर के संगीतकारों का प्रिय वाद्य बनाती है।वायलिन की विविध अभिव्यक्तियों को समझने के लिए कुछ उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ देखी जा सकती हैं। विश्वविख्यात वायलिन वादक येहूदी मेनुहिन (Yehudi Menuhin) की प्रस्तुति इस वाद्य की मधुरता, संतुलन और भावपूर्ण शैली का सुंदर उदाहरण है। वहीं हिलरी हैन (Hilary Hahn) अपनी सटीक तकनीक और स्वच्छ प्रस्तुति के माध्यम से वायलिन की आधुनिक शैली को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं। भारतीय संदर्भ में डॉ. एल. सुब्रमण्यम ने भारतीय शास्त्रीय संगीत और पश्चिमी ऑर्केस्ट्रा के साथ अपने सहयोगों के माध्यम से यह दिखाया है कि वायलिन विभिन्न संगीत परंपराओं के बीच एक सशक्त सेतु बन सकता है।आज वायलिन केवल पश्चिमी शास्त्रीय संगीत तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत में भी इसकी एक विशिष्ट पहचान बन चुकी है। रामपुर जैसे शहरों की शिल्प परंपरा और विश्वभर के कलाकारों की प्रस्तुतियाँ यह दर्शाती हैं कि संगीत और वाद्य दोनों ही सीमाओं से परे होते हैं। यदि आप वायलिन की मधुरता, तकनीकी दक्षता और भावपूर्ण अभिव्यक्ति का अनुभव करना चाहते हैं, तो ये प्रस्तुतियाँ इस वैश्विक वाद्य का उत्कृष्ट परिचय प्रदान करती हैं।संदर्भ:https://tinyurl.com/4amp2s6w https://tinyurl.com/yejcjdry https://tinyurl.com/mryf8wa4https://tinyurl.com/3fcceka7 https://tinyurl.com/32t3dz8z https://tinyurl.com/shrwz7cx
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
भारतीय रसायन विज्ञान के पितामह प्रफुल्ल चंद्र राय की अनसुनी कहानी
रसायन विज्ञान हमारे जीवन के हर हिस्से से जुड़ा हुआ है। सुबह उठकर इस्तेमाल किए जाने वाले टूथपेस्ट से लेकर हमारे भोजन, कपड़ों, दवाओं और वाहनों के ईंधन तक, हर जगह रासायनिक प्रक्रियाएं काम कर रही हैं। यहां तक कि हम जो हवा सांस के ज़रिए लेते हैं और जो पानी पीते हैं, वह भी हमारे पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने के लिए रासायनिक प्रतिक्रियाओं से गुज़रता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस जटिल विज्ञान की शुरुआत कहां से हुई और कैसे इसने आधुनिक रूप लिया?प्राचीन काल में कैसे हुई रसायन विज्ञान की शुरुआत?इतिहासकारों के अनुसार, 'केमिस्ट्री' और 'अल्केमी' (alchemy) यानी कीमियागिरी शब्द मिस्र के प्राचीन नाम 'खेम' (chem) से लिए गए हैं। ईसा पूर्व 1000 तक, प्राचीन सभ्यताओं ने ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था जो आगे चलकर रसायन विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का आधार बनीं। कीमियागिरी रसायन विज्ञान की वह शाखा थी जिसमें तत्वों की छिपी हुई प्रकृति का अध्ययन किया जाता था।दवाओं और जड़ी-बूटियों का विचार ईसा पूर्व 1000 से भी पहले के प्राचीन भारतीय वेदों में मिलता है। वहीं, चीनी कीमियागिरी का मानना था कि ब्रह्मांड में केवल पांच तत्व हैं - लकड़ी, आग, पृथ्वी, धातु और जल। इन्हें पाँच रंगों, पाँच दिशाओं और पाँच धातुओं जैसे सोना, चांदी, सीसा, तांबा और लोहे से जोड़ा गया था। इसके नतीजे में चीनी कीमियागिरी की हर तकनीक में पाँच चरणों को दोहराया जाता था। लगभग 420 ईसा पूर्व में, एम्पेडोकल्स (Empedocles) ने कहा था कि सभी पदार्थ चार मूलभूत तत्वों से बने हैं - पृथ्वी, आग, हवा और पानी। इसके बाद अरस्तू (Aristotle) ने तत्वों के गुणों का विचार विकसित किया और बताया कि विभिन्न प्रकार के पदार्थ गर्म, ठंडे, गीले और सूखे गुणों के एक विशिष्ट संतुलन पर निर्भर करते हैं।आधुनिक रसायन विज्ञान के जनक कौन थे? रसायन विज्ञान को एक व्यवस्थित विज्ञान बनाने का श्रेय फ्रांसीसी वैज्ञानिक एंटोनी लेवोज़ियर को जाता है, जिन्हें आधुनिक रसायन विज्ञान का पिता कहा जाता है। 1789 में, उन्होंने द्रव्यमान संरक्षण का नियम स्थापित किया। लेवोज़ियर (Lavoisier) ने ही सबसे पहले यह साबित किया कि ऑक्सीजन दहन यानी जलने की प्रक्रिया में एक प्रमुख तत्व है और उन्होंने ही इस तत्व को इसका नाम दिया था। उन्होंने रासायनिक पदार्थों के नामकरण की आधुनिक प्रणाली भी विकसित की। उनकी वैज्ञानिक खोजों में उनकी पत्नी मैरी-ऐनी (Mary Anne) का भी बड़ा योगदान था, जिन्होंने उनके प्रयोगों के चित्र बनाए और उनके लिए अंग्रेज़ी के दस्तावेज़ों का अनुवाद किया।लेवोज़ियर एक वैज्ञानिक होने के साथ-साथ एक फाइनेंसर और प्रशासक भी थे। उन्होंने कृषि उत्पादन पर व्यापक प्रयोग किए और वज़न और माप को एकीकृत करने वाले आयोग में भी काम किया, जिससे मीट्रिक प्रणाली को अपनाया जा सका। हालांकि, फ्रांसीसी क्रांति के दौरान 1794 में उन्हें उनके ससुर और अन्य कर संग्रहकर्ताओं के साथ गिलोटिन (Guillotine) से फांसी दे दी गई।पीरियोडिक टेबल का निर्माण कैसे हुआ? तत्वों को एक क्रम में व्यवस्थित करने की दिशा में कई वैज्ञानिकों ने काम किया। 1789 में लेवोज़ियर ने तत्वों को धातु और गैर-धातु के रूप में समूहित करने का प्रयास किया था। इसके बाद जर्मन भौतिक विज्ञानी जोहान वोल्फगैंग डोबेराइनर (Johann Wolfgang Döbereiner) ने समान भौतिक और रासायनिक गुणों वाले तत्वों को तीन-तीन के समूह में रखा।1860 में जर्मनी में हुए पहले अंतरराष्ट्रीय रसायन विज्ञान सम्मेलन में एक बड़ी सफलता मिली, जब तत्वों के परमाणु भार को हाइड्रोजन से तुलना करके तय करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद ब्रिटिश रसायनज्ञ जॉन न्यूलैंड्स (John Newlands) ने अष्टक नियम दिया। लेकिन सबसे क्रांतिकारी बदलाव 1869 में आया, जब रूसी रसायन वैज्ञानिक दिमित्री मेंडेलीव (Dmitri Mendeleev) ने आधुनिक पीरियोडिक टेबल का ढांचा तैयार किया। उन्होंने ज्ञात रासायनिक तत्वों को उनके बढ़ते परमाणु भार के क्रम में व्यवस्थित किया। मेंडेलीव की दूरदर्शिता इतनी सटीक थी कि उन्होंने अपनी टेबल में कुछ खाली जगहें छोड़ दीं और भविष्य में खोजे जाने वाले तत्वों के गुणों की पहले ही भविष्यवाणी कर दी। जब बाद में गैलियम (Gallium), स्कैंडियम (Scandium) और जर्मेनियम (Germanium) जैसे तत्व खोजे गए, तो मेंडेलीव की भविष्यवाणी बिल्कुल सच साबित हुई।परमाणु क्रमांक की खोज ने कैसे बदली रसायन की दुनिया? 19वीं सदी तक उप-परमाणु कणों की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं थी। लेकिन 1913 में अंग्रेज़ भौतिक विज्ञानी हेनरी मोसले (Henry Moseley) ने एक्स-रे का उपयोग करके तत्वों की तरंग दैर्ध्य को मापा और इन मापों को उनके परमाणु क्रमांक से जोड़ा। मोसले ने साबित किया कि किसी तत्व के प्रमुख गुण उसके परमाणु भार से नहीं, बल्कि परमाणु क्रमांक से तय होते हैं। उन्होंने पीरियोडिक टेबल को परमाणु क्रमांक के आधार पर पुनर्व्यवस्थित किया, जिससे पुरानी कमियां दूर हो गईं। इसे मोसले का नियम कहा गया। मोसले का करियर बहुत छोटा रहा, क्योंकि 1914 में प्रथम विश्व युद्ध छिड़ने पर वे सेना में शामिल हो गए और 27 वर्ष की अल्पायु में तुर्की के गैलीपोली में एक स्नाइपर की गोली का शिकार हो गए।ट्रांसयूरेनियम तत्वों की खोज में ग्लेन टी. सीबोर्ग का क्या योगदान रहा?रसायन विज्ञान के विस्तार में अमेरिकी परमाणु रसायनज्ञ ग्लेन टी. सीबोर्ग (Glenn T. Seaborg) का नाम बेहद अहम है। उन्हें मुख्य रूप से यूरेनियम से भारी तत्वों यानी ट्रांसयूरेनियम (Transuranium) तत्वों को अलग करने और पहचानने के लिए जाना जाता है। 1941 में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर प्लूटोनियम की खोज की। इसके अलावा उन्होंने अमेरिसियम (Americium), क्यूरियम (Curium), बर्केलियम (Berkelium), कैलिफोर्नियम (Californium), आइंस्टीनियम (Einsteinium), फर्मियम (Fermium), मेंडेलेवियम (Mendelevium) और नोबेलियम (Nobelium) जैसे कई नए तत्वों की खोज की।ग्लेन थियोडोर सीबोर्गसीबोर्ग ने पीरियोडिक टेबल में एक्टिनाइड (Actinide) अवधारणा पेश की, जो मेंडेलीव के बाद पीरियोडिक टेबल में सबसे बड़ा बदलाव था। इस अभूतपूर्व कार्य के लिए उन्हें 1951 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके सम्मान में एक तत्व का नाम सीबोर्गियम (Seaborgium) रखा गया। यह पहली बार था जब किसी जीवित वैज्ञानिक के नाम पर किसी तत्व का नामकरण हुआ।भारतीय रसायन विज्ञान के पितामह कौन हैं?जब हम रसायन विज्ञान के इतिहास की बात करते हैं, तो भारत के महान वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय का नाम गर्व से लिया जाता है। उन्हें भारतीय रसायन विज्ञान का जनक कहा जाता है। बचपन से ही मेधावी रहे प्रफुल्ल चंद्र राय ने एडिनबर्ग विश्वविद्यालय से अपनी उच्च शिक्षा पूरी की।उन्हें अकार्बनिक और कार्बनिक नाइट्राइट पर उनके गहन शोध के लिए जाना जाता है और उन्हें मास्टर ऑफ नाइट्राइट्स (Master of Nitrites) की उपाधि दी गई थी। 1896 में उन्होंने एक स्थिर यौगिक मरक्यूरस नाइट्राइट की खोज की, जिसने धातुओं के नाइट्राइट की संरचना और संश्लेषण के शोध की नींव रखी। वे न केवल एक बेहतरीन वैज्ञानिक थे, बल्कि वे प्राचीन भारतीय विज्ञान और आधुनिक विज्ञान को एक साथ जोड़ने के प्रबल पक्षधर भी थे। उनकी लिखी पुस्तक 'ए हिस्ट्री ऑफ हिंदू केमिस्ट्री' (A History of Hindu Chemistry) उनके इसी दृष्टिकोण का परिचायक है।हमारे दैनिक जीवन में रसायन विज्ञान का क्या महत्व है? आज रसायन विज्ञान हमारी दिनचर्या का एक अभिन्न अंग बन चुका है। हम जो खाना खाते हैं, उसमें मौजूद प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा को समझने में रसायन विज्ञान मदद करता है। बाज़ार में मिलने वाले ठंडे पेय पदार्थों और आइसक्रीम में मिठास लाने के लिए एस्पार्टेम (Aspartame), सुक्रालोज़ (Sucralose) और नियोटेम (Neotame) जैसी कृत्रिम मिठास का इस्तेमाल होता है। दवाओं के निर्माण में रसायन विज्ञान की बदौलत ही हम संक्रमण से लड़ने वाले एंटीबायोटिक्स और दर्द निवारक दवाएं बना पाए हैं।हमारे घरों में इस्तेमाल होने वाले साबुन और डिटर्जेंट भी रासायनिक प्रतिक्रियाओं का ही परिणाम हैं। साबुन बनाने की प्रक्रिया में वसा या तेल की क्षार के साथ प्रतिक्रिया होती है, जिसे साबुनीकरण कहा जाता है। पानी में घुलने पर साबुन मिसेल बनाता है, जो गंदगी और तेल को फंसाकर बाहर निकाल देता है। सफाई में एनायनिक (Anionic) डिटर्जेंट जैसे सोडियम लॉरिल सल्फेट (Sodium Lauryl Sulfate) और कैटायनिक (Cationic) डिटर्जेंट जैसे सेटिलपिरिडिनियम क्लोराइड (Cetylpyridinium Chloride) का व्यापक उपयोग होता है।सौंदर्य प्रसाधनों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए पैराबेंस (Parabens), फेनोक्सीथेनॉल (Phenoxyethanol) और सोर्बिक एसिड (Sorbic Acid) जैसे प्रिजर्वेटिव्स मिलाए जाते हैं, जो बैक्टीरिया और फंगस को पनपने से रोकते हैं। इसी तरह, त्वचा को सूरज की हानिकारक यूवीए और यूवीबी किरणों से बचाने के लिए सनस्क्रीन में खास रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, जो त्वचा को झुर्रियों और सनबर्न जैसी समस्याओं से बचाते हैं।कुल मिलाकर, प्राचीन कीमियागिरी की रहस्यमयी दुनिया से निकलकर रसायन विज्ञान आज एक ऐसा व्यावहारिक विज्ञान बन चुका है, जिसके बिना आधुनिक जीवन की कल्पना करना भी असंभव है। यह ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने के साथ-साथ हमारे दैनिक जीवन को आसान और सुरक्षित बनाने में एक निर्णायक भूमिका निभा रहा है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/27gv99nk 2. https://tinyurl.com/shasxrx 3. https://tinyurl.com/yae4x4nx 4. https://tinyurl.com/zajy4k3 5. https://tinyurl.com/2c5woob7 6. https://tinyurl.com/y2twxmaj 7. https://tinyurl.com/26o7f86h 8. https://tinyurl.com/25ukz5h5 9. https://tinyurl.com/25o74od6
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
रोहिल्ला पठानों से लेकर भारत गणराज्य तक जानिए रामपुर रियासत की पूरी कहानी
उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक शहर रामपुर अपने प्रसिद्ध रामपुरी चाकू और मीठे ज़ायकों के लिए तो जाना ही जाता है, लेकिन इसका राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास इससे कहीं अधिक गहरा और दिलचस्प है। मध्यकाल में कभी दिल्ली क्षेत्र का हिस्सा रहा रामपुर, 18वीं शताब्दी में उत्तर भारत की एक प्रमुख शक्ति बन कर उभरा। यह शहर केवल नवाबों का शहर नहीं है, बल्कि यह उन अफ़ग़ान रोहिल्ला योद्धाओं की भी कहानी है जिन्होंने अपनी तलवारों और कूटनीति से इतिहास में एक अलग मुकाम बनाया और अंततः 1949 में स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में खुद को समाहित कर लिया।रोहिल्ला कौन थे और रामपुर रियासत की स्थापना कैसे हुई?रोहिल्ला मुख्य रूप से अफ़ग़ान पठान (Afghan Pashtuns) थे, जो 16वीं और 18वीं शताब्दी के बीच हिंदू कुश, खैबर और काबुल जैसे पहाड़ी इलाकों से भारत आए थे। 'रोह' का अर्थ होता है पहाड़, इसलिए इन्हें 'पहाड़ों के लोग' या रोहिल्ला कहा गया। वे भारत में मुख्य रूप से सैनिकों और घुड़सवारों के रूप में आए थे, लेकिन मुगल साम्राज्य के पतन के दौरान उन्होंने अपनी सैन्य शक्ति के बल पर बरेली, मुरादाबाद और बदायूं जैसे क्षेत्रों में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया, जिसे 'रोहिलखंड' कहा गया। अली मुहम्मद खान को रोहिलखंड का असली वास्तुकार माना जाता है, जिन्होंने बिखरे हुए अफ़ग़ान कबीलों को एकजुट किया।लेकिन रोहिल्लाओं का यह स्वतंत्र शासन लंबे समय तक नहीं चल सका। 1774 में 'प्रथम रोहिल्ला युद्ध' (First Rohilla War) हुआ। यह युद्ध तब शुरू हुआ जब रोहिल्लाओं ने मराठों के खिलाफ सैन्य सहायता के बदले अवध के नवाब को चुकाए जाने वाले कर्ज से इनकार कर दिया। वारेन हेस्टिंग्स (Warren Hastings) द्वारा भेजी गई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) की सेना की मदद से अवध के नवाब ने रोहिल्लाओं को हरा दिया और उन्हें उनकी राजधानी बरेली से खदेड़ दिया। इस युद्ध में महान रोहिल्ला नेता हाफिज रहमत खान मारे गए।इसी हार के बाद, 7 अक्टूबर 1774 को ब्रिटिश कमांडर कर्नल चैंपियन (Commander Colonel Champion) की मौजूदगी में एक समझौते के तहत नवाब फैजुल्लाह खान ने रामपुर रियासत की स्थापना की। इसके बाद से रामपुर ब्रिटिश संरक्षण के तहत एक रियासत बन गया।रामपुर शहर का विकास और नवाबों का शासन कैसा रहा?नवाब फैजुल्लाह खान ने 1775 में रामपुर में एक नए किले की नींव रखी और इस तरह वर्तमान रामपुर शहर की स्थापना हुई। शुरुआत में इसे कठेर (Kather) नामक चार गांवों के समूह पर बसाया गया था। नवाब इसका नाम 'फैज़ाबाद' रखना चाहते थे, लेकिन इस नाम के अन्य शहर पहले से मौजूद थे, इसलिए इसका नाम मुस्तफाबाद उर्फ रामपुर रखा गया।नवाब फैजुल्लाह खान ने 20 वर्षों तक शासन किया। वे एक महान विद्वान थे और उन्होंने अरबी, फारसी, तुर्की और उर्दू पांडुलिपियों का एक विशाल संग्रह शुरू किया, जो आज विश्व प्रसिद्ध 'रामपुर रज़ा लाइब्रेरी' (Rampur Raza Library) का मुख्य हिस्सा है। उनके बाद नवाब मुहम्मद सईद खान, यूसुफ अली खान, और कलब अली खान जैसे शासकों ने रामपुर को शिक्षा, न्याय और वास्तुकला का एक प्रमुख केंद्र बनाया। 1865 में नवाब बने कलब अली खान (Kalb Ali Khan) ने ही रामपुर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद का निर्माण कराया था।1889 में नवाब बने हामिद अली खान (Hamid Ali Khan) ने 1905 में किले के भीतर एक शानदार 'दरबार हॉल' बनवाया, जहां आज रज़ा लाइब्रेरी की अनमोल पांडुलिपियां रखी हुई हैं। इन नवाबों ने संगीत को भी खूब बढ़ावा दिया। उस्ताद इनायत हुसैन खान जैसे दिग्गजों ने यहीं से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के 'रामपुर-सहसवान घराने' (Rampur-Sahaswan Gharana) की नींव रखी।1857 के स्वतंत्रता संग्राम में रामपुर की भूमिका क्या थी?1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रामपुर के नवाबों की राजनीतिक स्थिति बहुत जटिल थी। चूंकि रामपुर रियासत ब्रिटिश संरक्षण के तहत चल रही थी, इसलिए नवाबों ने 1857 के विद्रोह में ब्रिटिश सरकार का साथ दिया था। इस वफादारी के कारण अंग्रेजों ने उन्हें उत्तर भारत में अपने राजनीतिक और सांस्कृतिक मामलों को जारी रखने की छूट दी। हालांकि, इसी दौरान नवाबों ने मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार से विस्थापित हुए कई महान साहित्यकारों और शायरों को रामपुर में पनाह भी दी, जिससे रामपुर उर्दू अदब का एक बड़ा केंद्र बन गया।ब्रिटिश शासन का अंत और रामपुर का भारत में विलय कैसे हुआ?1930 में रज़ा अली खान (Raza Ali Khan) रामपुर के अंतिम शासक नवाब बने। वे एक प्रगतिशील शासक थे जिन्होंने हिंदुओं के समावेश में विश्वास किया और लेफ्टिनेंट कर्नल होरीलाल वर्मा को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया।अगस्त 1947 में जब भारत को ब्रिटिश हुकूमत से आज़ादी मिली, तब रामपुर सहित देश की 500 से अधिक रियासतों के सामने एक बड़ा सवाल था—स्वतंत्र भारत में शामिल होना या अलग रहना। तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की कूटनीति और भारत के एकीकरण की प्रक्रिया के तहत, रामपुर रियासत ने स्वतंत्र भारत में विलय का फैसला किया।1 जुलाई 1949 को रामपुर रियासत आधिकारिक तौर पर भारत गणराज्य (Republic of India) में विलीन हो गई और बाद में इसे उत्तर प्रदेश (पहले संयुक्त प्रांत) के एक ज़िले के रूप में मान्यता मिली। आज रामपुर के किले के द्वार और नवाबों के महल भले ही जर्जर हो रहे हों, लेकिन इस शहर की रज़ा लाइब्रेरी, इसका संगीत और इसकी मिली-जुली अफ़ग़ान-भारतीय संस्कृति आज भी दुनिया भर के विद्वानों और पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है। रामपुर की यह कहानी एक कबीले के संघर्ष, कूटनीति और अंततः एक मजबूत लोकतंत्र के प्रति समर्पण की अद्भुत मिसाल है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/24mfvl4a 2. https://tinyurl.com/2a689cyt 3. https://tinyurl.com/25dg69bf
हथियार और खिलौने
अन्य देशों की तरह समुद्री संप्रभुता सुनिश्चित करने हेतु, भारत ने कैसे बनाया विक्रांत युद्धपोत?
विशाल समुद्र में भी लड़ाकू विमानों को आधार प्रदान करने तथा उड़ने या उतरने हेतु पथ प्रदान करके, युद्धपोत (Warship) रोमांचक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। आज हम उनके बारे में ही पढ़ेंगे। युद्धपोत, सैन्य बलों की समुद्री पानी से तटीय क्षेत्रों तक आवाजाही को सुनिश्चित करते हैं, जहां उन्हें उतारा जा सकता है और दुश्मन ताकतों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। वे दुश्मन के हमले से व्यापारिक जहाज़ों की रक्षा करते हैं; दुश्मन को सैन्य बलों के परिवहन के लिए समुद्र का उपयोग करने से रोकते हैं; एवं उनके व्यापारी जहाज़ों पर हमला भी कर सकते हैं। नौसैनिक जहाजों का उपयोग नाकाबंदी में भी किया जाता है, यानी, दुश्मन को युद्ध के लिए आवश्यक वस्तुओं को समुद्र के रास्ते आयात करने से रोका जा सकता है।इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए, नौसेना जहाजों को प्राचीन काल से ही व्यापारिक जहाजों की तुलना में अधिक तेज़, मजबूत और आक्रामक हथियार ले जाने में सक्षम बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। जबकि, आधुनिक युग में क्राफ़्ट (Craft) शब्द, उन छोटे सतही जहाजों को सूचित करने लगा है, जो आमतौर पर तटीय जल में संचालित होते हैं।सबसे पुराने युद्धपोत लगभग 5,000 साल पहले ग्रीस और मिस्र में उभरे थे। पहले रिकॉर्ड किए गए युद्धपोतों का उपयोग नील नदी पर किया गया था। मूल रूप से वे सरकंडों से बने होते थे, और बाद में लकड़ी के समुद्री जहाजों में विकसित हुए। तब, संकीर्ण एवं तेज़ ‘लंबे जहाज’ (युद्धपोत) और चौड़े एवं भारी ‘गोल जहाज’ (व्यापारी जहाज) अलग–अलग थे।ग्रीक नौसैनिक शक्ति, ट्राइरेम (Triremes) के विकास के साथ चरम पर थी, जिसने युद्धपोतों की मदद से 480 ईसा पूर्व में सलामिस की लड़ाई (Battle of Salamis) जीती थी। ट्राइरेम, अधिकतम मानव बाहुबल, भारी कील द्वारा समर्थित एक कांस्य मेढ़ा और दुश्मन के जहाजों पर चढ़ने हेतु नौसैनिकों के लिए एक पुल पर निर्भर था। बाद में विभिन्न देशों में चली हथियारों की होड़ के कारण बड़े पैमाने पर मल्टी-बैंक्ड जहाज (Multibanked ships) आए, और अस्थायी लकड़ी के बुर्जों के साथ-साथ भारी मिसाइल हथियारों की शुरूआत हुई।भारी तोपखाने की शुरूआत के लिए मजबूत एवं बड़ी पतवार की आवश्यकता थी। इनमें से कुछ जहाज, हवा के द्वारा भी संचालित होते थे, क्योंकि इनकी पाल पर बड़े कपड़े लगाए जाते थे। फिर कुछ वर्षों बाद, जहाज पाल से भाप इंजन की ओर परिवर्तित हुए, और उन्होंने अंततः पानी के नीचे मौजूद प्रोपेलर (Propeller) को अपनाया। क्योंकि लकड़ी के पतवार, अब विस्फोटक गोलों का सामना नहीं कर सकते थे। शुरुआत में, नौसेनाओं ने लकड़ी के जहाजों पर लोहे की परतें चढ़ाई, जिससे लोहे की परत वाले जहाजों का विकास हुआ। अंततः, युद्धपोतों का निर्माण पूरी तरह से लोहे और स्टील से किया जाने लगा।फिर, भाप टर्बाइनों और आंतरिक दहन इंजनों ने पारंपरिक भाप इंजनों की जगह ले ली, और नौसेनाएं कोयला जलाने से तेल जलाने की ओर परिवर्तित हो गईं। इससे युद्धपोतों की गति और परिचालन सीमा में काफी सुधार हुआ।सन 1850 से लेकर वर्तमान समय तक, नौसैनिक विकास में तकनीकी नवाचारों और बदलती युद्ध रणनीतियों के कारण महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में लकड़ी के नौकायन जहाजों से लेकर, भाप से चलने वाले जहाजों में परिवर्तन हुआ, जिससे लोहे से बने युद्धपोतों की शुरुआत हुई। इसी सदी के अंत तक, युद्धपोत प्रमुख नौसैनिक बल बन गए, लेकिन बीसवीं सदी में पनडुब्बियों, विमानों और विमान वाहकों के उद्भव के साथ एक आदर्श बदलाव देखा गया।प्रथम विश्व युद्ध ने टॉरपीडो (Torpedoes) और डिस्ट्रॉयर (Destroyers) जैसे जहाजों को उत्प्रेरित किया, जबकि द्वितीय विश्व युद्ध में विमानवाहक पोत ने युद्धपोतों को प्रतिस्थापित करते हुए, नौसैनिक रणनीतियों को नया आकार दिया। युद्ध के बाद के युग में, परमाणु ऊर्जा की शुरूआत ने पनडुब्बियों और विमान वाहक में क्रांति ला दी, जिससे विस्तारित संचालन और अधिक क्षमताओं की अनुमति मिली। इसके अतिरिक्त, निर्देशित हथियारों और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के उदय ने नौसैनिक क्षमताओं को बदल दिया।दरअसल, विमान वाहक युद्धपोत चार बुनियादी कार्य करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं:1. विदेशों में विभिन्न प्रकार के विमानों का परिवहन करना।2. हवाई जहाजों को लॉन्च और लैंड कराना।3. सैन्य अभियानों के लिए एक गतिमान नियंत्रण केंद्र के रूप में कार्य करना। और,4. कर्मी दल को घर जैसा आश्रय देना।इन कार्यों को पूरा करने हेतु युद्धपोत पर एक जहाज, एक वायु सेना आधार, एवं एक छोटे शहर के तत्वों को संयोजित करने की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, इसमें निम्नलिखित तत्व शामिल होते हैं:1. उड़ान डेक (Deck) – यह जहाज के शीर्ष पर एक सपाट सतह है, जहां विमान उड़ान भर सकता है और उतर सकता है।2. हैंगर डेक (Hanger deck) – विमान उपयोग में न होने पर यहां रखे जाते हैं। यह मुख्य डेक के नीचे स्थित होता है।3. आइलैंड (Island) - यह उड़ान डेक के शीर्ष पर स्थित एक इमारत है, जहां से अधिकारी उड़ान और जहाज संचालन को निर्देशित कर सकते हैं।4. चालक दल के रहने और काम करने के लिए कमरे।5. नाव को एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने, और पूरे जहाज के लिए बिजली उत्पन्न करने के लिए एक बिजली संयंत्र और प्रोपेलेंट प्रणाली।6. भोजन और ताज़ा पानी उपलब्ध कराने वाली प्रणालियां, रेडियो और टेलीविजन स्टेशन, अखबार केंद्र, मलप्रवाह-पद्धति, कचरा व्यवस्थापन प्रणाली, आदि।7. पतवार - यह जहाज का मुख्य भाग है, जो पानी में तैरता है। पानी की रेखा के नीचे रहने वाला पतवार का भाग, गोल और अपेक्षाकृत संकीर्ण होता है, जबकि पानी के ऊपर का भाग विस्तृत डेक बनाने के लिए बड़ा होता है।इन सुविधाओं के कारण, सैनिकों और शस्त्रागारों के परिवहन हेतु वाहनों के रूप में जहाजों के उपयोग से लेकर, स्वचालित हथियारों को पेश करने तक, नौसैनिक युद्ध में काफी प्रगति हुई है। समुद्र में एक रणनीतिक योजना और सामरिक कार्यान्वयन, नौसैनिक युद्ध में जीत हासिल करने में मदद कर सकता है। हालांकि, इसका गलत उपयोग रोकना भी महत्वपूर्ण था। अतः ‘नौसैनिक युद्ध कानून’ सामने आया। इसकी उत्पत्ति का पता 1856 में लगाया जा सकता है। इसमें कई नियम शामिल किए गए, एवं संशोधन भी हुए। अंततः नौसैनिक युद्ध के लिए पहले जिनेवा कन्वेंशन (Geneva Conventions), 1949 में निर्धारित नियमों को अपनाना गया। इस कन्वेंशन को फिर एक बार संशोधित किया गया, और 1907 में हेग कन्वेंशन (Hague Convention) द्वारा प्रतिस्थापित किया गया।द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित विमान वाहक बड़े थे, और उनमें बख्तरबंद उड़ान डेक थे। आधुनिक काल में आए जेट विमानों ने अपने अधिक वजन, धीमी गति, उच्च लैंडिंग गति और अधिक ईंधन खपत के कारण कुछ समस्याएं पैदा की थी, लेकिन इनसे निपटते हुए भी, वैसे युद्धपोत बनाए गए। उदाहरण के लिए, 24 सितंबर, 1960 को संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा पहला परमाणु-संचालित वाहक – एंटरप्राइज़ (Enterprise) लॉन्च किया था। ऐसी संयुक्त क्षमताओं वाले वाहकों को ‘बहुउद्देशीय वाहक’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है।इसके अलावा, अमेरिकी नौसेना के ‘यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड (USS Gerald R. Ford)’ परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत को 2017 में कमीशन किया गया था। यह गेराल्ड आर. फोर्ड श्रेणी का प्रमुख जहाज है, और 1 लाख टन से अधिक वजन के विस्थापन और 1,106 फीट (337 मीटर) की लंबाई के साथ अब तक का सबसे बड़ा युद्धपोत है।इसी कड़ी में, भारत ने भी अपने पहले स्वदेशी विमान वाहक - विक्रांत को लॉन्च करके एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। इसे भारतीय नौसेना के आन्तरिक वॉरशिप डिज़ाइन ब्यूरो (Warship Design Bureau) द्वारा डिज़ाइन किया गया है। जबकि बंदरगाह, शिपिंग और जलमार्ग मंत्रालय के तहत सार्वजनिक शिपयार्ड - कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा इसका निर्माण किया गया है। विक्रांत को अत्याधुनिक स्वचालन सुविधाओं के साथ बनाया गया है। यह भारत के समुद्री निर्माण इतिहास में अब तक बना, सबसे बड़ा जहाज है।इस जहाज में बड़ी संख्या में स्वदेशी उपकरण और मशीनरी हैं। नौसेना में विक्रांत जहाज के शामिल होने से, भारत को दो परिचालन विमान वाहक मिलेंगे, जिससे देश की समुद्री सुरक्षा में काफी सुधार होगा। यह देश के "आत्मनिर्भर भारत" के लक्ष्य का एक शानदार उदाहरण है, और सरकार की "मेक इन इंडिया" पहल को गति देता है। विक्रांत पोत के साथ, भारत देशज स्तर पर विमानवाहक पोत के डिजाइन और निर्माण की विशेष क्षमता वाले देशों के एक विशिष्ट समूह में शामिल हो गया है, जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन शामिल हैं।संदर्भ1. https://tinyurl.com/mpm4fwhr 2. https://tinyurl.com/5f4ue3yz 3. https://tinyurl.com/ydpvfsj3 4. https://tinyurl.com/3eapnvfe 5. https://tinyurl.com/39avfffb 6. https://tinyurl.com/32m45t9e
दृष्टि II - अभिनय कला
असम राज्य की सुंदर एवं अनूठी, मुखौटे बनाने की शिल्पकला के बारे में जानना हमारे लिए है महत्वपूर्ण
रामपुर, क्या आप इस तथ्य से अवगत है कि, असम की नाट्य कलाएं सदियों से चली आ रही एक समृद्ध विरासत का दावा करती हैं, जो नौवीं शताब्दी के मंदिर नृत्य परंपराओं से लेकर भाओना नाटक जैसे प्रतिष्ठित रूपों में विकसित हुई है। इस विकास को पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी के संत और समाज सुधारक, श्रीमंत शंकरदेव द्वारा आकार दिया गया था। चलिए, आज इसके बारे में जानकारी पाते हैं।शंकरदेव जी ने नव-वैष्णववाद (भक्ति आंदोलन) के दर्शन को बढ़ावा दिया, और उन्होंने ‘सत्र संस्थानों’ की स्थापना की। शंकरदेव ने बाद में इन सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रथाओं को माजुली पर केंद्रित किया, जो ब्रह्मपुत्र नदी की ऊपरी पहुंच में एक प्रमुख नदी द्वीप है। इस कारण, माजुली, नव-वैष्णव परंपराओं में गहराई से निहित, विश्व स्तर पर प्रशंसित सांस्कृतिक केंद्र बन गया है। यह द्वीप एक जटिल सांस्कृतिक जाल को संरक्षित करता है, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं:1. यहां सत्र संस्थाएं और नामघर के मठ और प्रार्थना कक्ष, आध्यात्मिक नींव के रूप में कार्य करते हैं।2. यहां का मौखिक साहित्य, पीढ़ीगत रूप से प्रसारित लोककथाओं और परंपराओं से बना है।3. कुछ जीवंत नृत्य-नाटक जैसी प्रदर्शन कलाएं, धार्मिक शिक्षाओं और स्थानीय समुदाय को जोड़ती हैं।4. यहां मुख शिल्प भी प्रसिद्ध है, जो मुखौटा बनाने की एक पारंपरिक कला है।सोलहवीं शताब्दी से निर्मित मुख शिल्प, माजुली के सबसे प्रसिद्ध शिल्पों में से एक है। शंकरदेव जी ने नाट्य प्रदर्शनों में मुखौटों की शुरुआत की थी। इनका उपयोग, विशेष रूप से उनके पारंपरिक एकांकी नाटक - अंकिया नाट में किया जाता था। इससे अभिनेताओं को पौराणिक पात्रों को स्पष्ट रूप से चित्रित करने में मदद मिली।जबकि आधुनिक पारंपरिक मुखौटे बांस से जुड़े हुए हैं, ऐतिहासिक साक्ष्य से पता चलता है कि, मुख शिल्प बनाने की तकनीक बांस की तकनीक से पहले की है। मूल रूप से, कारीगरों ने लकड़ी और शोलापिथ पेड़ से जटिल विवरण उकेरे थे। लेकिन, अंततः बांस की ओर हुआ बदलाव, समय के साथ स्थानीय कारीगरों की अनुकूलन क्षमता, संसाधनशीलता और रचनात्मक विकास को दर्शाता है।आधुनिक समय में, माजुली की मुखौटा बनाने की विरासत, स्थानीय धार्मिक प्रदर्शन से अंतर्राष्ट्रीय प्रशंसा में परिवर्तित हो गई है। आधुनिक मुखौटों में जटिल इंजीनियरिंग होती है, जो कलाकारों को चेहरे के अंगों में हेरफेर करने, तथा उन्नत अभिव्यक्ति के लिए आंखों और मुंह को हिलाने की अनुमति देती है। व्यावसायीकरण ने इस शिल्प को एक व्यवहार्य आजीविका में बदल दिया है, जिससे स्थानीय कलाकारों को वित्तीय सशक्तिकरण मिला है। इससे युवा पीढ़ी इस व्यापार को सीखने के लिए आकर्षित हुई है। दूसरी ओर, पारंपरिक रंगमंच से परे, ये मुखौटे अब त्योहार की सजावट, घर की सजावट, बैठकों और व्यावसायिक उपहारों के लिए व्यापक रूप से उत्पादित किए जाते हैं।इसके साथ ही, लंदन में ब्रिटिश संग्रहालय सहित, अन्य प्रतिष्ठित वैश्विक स्थानों पर इस मुख शिल्प की लगी प्रदर्शनियां, असम की मुखौटा निर्माण विरासत के स्थायी सांस्कृतिक मूल्य और कलात्मक उत्कृष्टता को रेखांकित करती हैं।सत्रीय परंपरा में, इन मुखौटों को उनके आकार, संरचना और चरित्र सार के आधार पर दो मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:1. लौकिक (सांसारिक) मुखौटे, भौतिक, सांसारिक क्षेत्र के पात्रों का प्रतिनिधित्व करने के लिए तैयार किए जाते हैं। इसमें मनुष्य और विभिन्न जानवरों के मुख शामिल हैं।2. अलौकिक मुखौटे, विशेष रूप से अलौकिक गुणों और गहरे पौराणिक महत्व वाले पात्रों, जैसे कि - देवताओं, राक्षसों और पौराणिक प्राणियों के लिए बनाए जाते हैं।मुख शिल्प में महाकाव्य और पौराणिक आकृतियों से संबंधित कई मुखौटे बनाए गए हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:• देवता और दिव्य प्राणी: ब्रह्मा, हंस, गणेश, गरुड़, हनुमान और जम्बूवंत।• अवतार: वराह और नरसिंह।• राक्षस और विरोधी: दस सिर वाला रावण, कुंभकर्ण, तारक, मारीच, पूतना, बकासुर, अघासुर, धेनुकासुर और बत्सासुर।• पौराणिक जीव और प्राणी: जटायु, चक्रवत, और कालिया नाग।इन्हीं मुखौटों में आधुनिक नवाचार एवं स्थिरता भी आई है। लुतुकोरी मुखों और कठपुतली जैसे तंत्रों को शामिल करते हुए, नए मुखौटे कार्यात्मक आंख और होंठ की गतिविधियों को सक्षम करते हैं। इनके डिजाइन आज व्यावहारिक बनाए जा रहे हैं, ताकि, आसान परिवहन की अनुमति मिले। ये संरचनात्मक नवाचार, कला की व्यावसायिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं। शैक्षिक कार्यशालाओं के संगठन और छोटे तथा लोकप्रिय सजावटी शिल्पों के निर्माण ने भी इनकी अपील को बढ़ाया है।ऐसे सुंदर मुख शिल्प बनाने में उपयोग किए जाने वाले उपकरण और सामग्रियां स्थानीय रूप से प्राप्त होती हैं। इनमें बांस, मिट्टी, कपड़ा, कागज, बेंत, जूट, गाय का गोबर, आदि शामिल हैं। कारीगर स्थानीय बांस की किस्म का उपयोग करते हैं, जिसे ‘जतिबाण’ के नाम से जाना जाता है। रंग भरने के लिए प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है।मुखौटे बनाने के चरण:1. आधार संरचना:यह प्रक्रिया बांस का एक ढांचा बनाने से शुरू होती है। पात्र की चेहरे की विशेषताओं और भावों को प्रतिबिंबित करने के लिए, सबसे पहले बांस को काटा जाता है, उसे आकार दिया जाता है, और इस प्रकार एक मजबूत ढांचा बनाया जाता है।2. मिट्टी का अनुप्रयोग:मुखौटे को आकार देने, और बांस की सतह को चिकना करने के लिए इस पर मिट्टी और गाय के गोबर का मिश्रण लगाया जाता है। स्थायित्व सुनिश्चित करने के लिए, प्रत्येक परत के बाद इसे धूप में सुखाया जाता है। एक बार सूखने के बाद, मुखौटे को चेहरे का विवरण बनाने के लिए तैयार किया जाता है।3. कागज लुगदी की परत:मिट्टी की परत पर, कागज के गूदे और पानी से बना पेस्ट लगाया जाता है। यह लंबे भाओना प्रदर्शन के दौरान, कलाकारों के लिए मुखौटे को हल्का और आरामदायक बनाता है।4. पेंटिंग और विवरण:फिर मुखौटों को सावधानीपूर्वक प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता है। उदाहरण के लिए, दानव मुखौटों को उनके उग्र स्वभाव को प्रतिबिंबित करने के लिए स्पष्ट, गहरे और उग्र हाव-भाव दिए जाते हैं।ये जीवित परंपराएं पूरे असम क्षेत्र में हिंदू वैष्णव मान्यताओं और संस्कृति के प्रसार एवं रखरखाव में सहायक रही हैं। जैसा कि हमने ऊपर पढ़ा हैं, ये मुखौटे अंकिया नाट भाओना का एक महत्वपूर्ण तत्व हैं। मूल रूप से, रात भर प्रस्तुत किया जाने वाला अंकिया भाओना प्रदर्शन अब केवल कुछ घंटों तक चलता है। इन नाटकों में हिंदू महाकाव्यों और पौराणिक कथाओं - महाभारत, रामायण और भागवत पुराण - की कहानियों को दर्शाया गया है, जिसमें मुखौटे उन कहानियों और पात्रों का नाटकीय चित्रण करते हैं।असम के पारंपरिक हस्तशिल्प उत्पाद अत्यधिक व्यावहारिक और सांस्कृतिक मूल्य रखते हैं, जो स्थानीय लोगों के दैनिक जीवन में सहजता से एकीकृत हो जाते हैं। अपनी सौंदर्यात्मक अपील से परे, ये शिल्प कई ग्रामीण परिवारों की आजीविका को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह जटिल शिल्प कौशल परंपरा, सांस्कृतिक संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आर्थिक भलाई के बीच एक मजबूत व पारस्परिक रूप से मजबूत संबंध बनाती है।दरअसल, संत-सुधारक श्री शंकरदेव द्वारा लिखित अभूतपूर्व नाटक - सिहना यात्रा ने उन पात्रों के लिए मुखौटे पेश करके एक ऐतिहासिक मील का पत्थर चिह्नित किया था, जिन्हें मानव चेहरे प्रभावी ढंग से चित्रित नहीं कर सकते थे (जैसे कि - गरुड़, चार सिर वाले ब्रह्मा, और भगवान शिव)। यह अभिनव प्रथा जल्द ही रामायण जैसे अन्य प्रमुख महाकाव्यों तक फैल गई, जिसमें रावण, कुंभकर्ण, सूर्पणखा, जटायु, तारक, मारीच, सुबाहु, सुग्रीव और भगवान विष्णु के दस अवतारों जैसे जटिल पात्रों को जीवंत किया गया।हालांकि, इन मुखौटों के लिएं वर्तमान समय थोड़ा जटिल है। मुखौटा निर्माण से जुड़ी वित्तीय चुनौतियां, इच्छुक कलाकारों को इसे पूर्णकालिक पेशे के रूप में अपनाने से हतोत्साहित कर सकती हैं। वित्तीय सहायता की कमी एवं स्थापित कलाकारों के लिए एक स्थिर आय स्रोत की अनुपस्थिति, एक ऐसा वातावरण बनाती है, जो इस कला रूप की स्थिरता को हतोत्साहित करती है।इसके अलावा, मानसून के दौरान ये मुखौटे नहीं बनाए जा सकते हैं, क्योंकि उनको सूरज की रोशनी में सुखाना पड़ता है। इस आवश्यकता ने, माजुली में मुखौटा बनाने की आजीविका गतिविधि को, वर्ष के केवल कुछ महीनों तक ही सीमित कर दिया है। माजुली द्वीप पर मुखौटा बनाने में संलग्न पारंपरिक कारीगरों और युवाओं के सामने, एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती गुणवत्ता, प्रौद्योगिकी तथा बाजार गतिशीलता की कमी है। बदलती सांस्कृतिक गतिशीलता और पर्यावरणीय चिंताएं, कुछ अन्य चुनौतियां हैं।पारंपरिक कारीगरों और युवा पीढ़ी को सशक्त बनाने के लिए, इन जोखिमों को संबोधित करना महत्वपूर्ण है। जबकि इस कला रूप को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं, इसकी स्थिरता, परंपरा और अनुकूलन के बीच एक नाजुक संतुलन पर निर्भर करती है। सरकारी निकायों और सांस्कृतिक संगठनों ने कारीगरों को समर्थन देने के लिए कार्यशालाएं, प्रदर्शनियां और दस्तावेज़ीकरण पहल आयोजित करना शुरू कर दिया है। कुछ कलाकारों ने घर की सजावट, संग्रहालय प्रदर्शन और समकालीन स्थापनाओं के लिए मुखौटे बनाने में भी विविधता लाई है। इससे, इस परंपरा को नाटकों से परे दर्शकों तक पहुंचने में मदद मिली है।माजुली के मुखौटे आज न केवल कलाकृतियों के रूप में, बल्कि असम के भक्ति रंगमंच के जीवंत प्रतीक के रूप में खड़े हैं। वे एक जीवंत एवं विकसित दृश्य भाषा है, जो कला, आस्था, शिल्प कौशल और समुदाय को जोड़ती है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/y3znjz6s 2. https://tinyurl.com/46275paz 3. https://tinyurl.com/ypmmh7ry 4. https://tinyurl.com/y3znjz6s 5. https://tinyurl.com/y3znjz6s 6. https://tinyurl.com/ye587xyr
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
02-10-2026 09:10 AM • Rampur-Hindi
रामपुर की आबिदा बेगम ने पहली गांधी टोपी सिल कर, रखी औपनिवेश भारत में एकता की कड़ी बुनियाद
भारत की आज़ादी की लड़ाई सिर्फ़ हथियारों या बड़े राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके ताने-बाने में हमारे पहनावे, प्रतीकों और ज़मीनी आंदोलनों का बहुत बड़ा हाथ था। उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक रामपुर रियासत हो या फिर दक्षिण भारत का मदुरै—हर शहर ने आज़ादी के आंदोलन में अपना एक नया रंग भरा। इसी तरह, पहले विश्व युद्ध के बाद जब ख़िलाफ़त आंदोलन शुरू हुआ, तो गांधी जी और अली बंधुओं के राजनीतिक गठजोड़ ने देश की आज़ादी की पूरी लड़ाई को एक नई दिशा दे दी।
रामपुर में कैसे हुआ था विश्व-प्रसिद्ध गांधी टोपी का जन्म? ज़्यादातर लोगों को यही लगता है कि बापू की पहचान बन चुकी गांधी टोपी का उद्गम गुजरात के साबरमती या महाराष्ट्र के वर्धा में हुआ होगा। लेकिन हक़ीक़त यह है कि इस टोपी की असली शुरुआत रामपुर रियासत से हुई थी। रामपुर के इतिहास पर किताबें लिखने वाले 75 वर्षीय वकील शौकत अली बताते हैं कि महात्मा गांधी ने 1920 में रामपुर का दौरा किया था और यहीं उन्होंने पहली बार यह टोपी पहनी थी। दरअसल, 1920 में गांधी जी मौलाना मोहम्मद अली जौहर की बेटी के निकाह में शरीक होने मुरादाबाद आए थे, जो उस दौर में रामपुर का ही हिस्सा था। शादी के बाद गांधी जी ने रामपुर के नवाब सैयद हामिद अली ख़ान बहादुर से मिलने का फ़ैसला किया, जिन्होंने 1889 से 1930 तक वहाँ हुकूमत की थी। उस समय रियासत का यह दस्तूर था कि नवाब के दरबार में कोई नंगे सिर नहीं जा सकता था, और गांधी जी के पास कोई टोपी नहीं थी। साथियों ने बाज़ार भर में ढूँढा, लेकिन गांधी जी के सिर के नाप की कोई टोपी नहीं मिली। ऐसे में मोहम्मद अली जौहर की वालिदा आबिदा बेगम आगे आईं। उन्होंने घर में ही काते गए खुरदरे सूती कपड़े यानी 'गारा' से अपने हाथों से एक टोपी सिलकर तैयार कर दी। बापू को वह सादी टोपी इतनी पसंद आई कि पूरे रामपुर प्रवास के दौरान उन्होंने उसे सिर से उतारा ही नहीं। आगे चलकर यही सादी टोपी पूरे देश में 'गांधी टोपी' के नाम से आज़ादी का सबसे लोकप्रिय प्रतीक बन गई।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद ख़िलाफ़त आंदोलन में गांधी जी और अली बंधुओं का गठबंधन कैसे बना? ख़िलाफ़त आंदोलन की जड़ें पहले विश्व युद्ध की उथल-पुथल से जुड़ी थीं। जब 1914 में तुर्की (Turkey) ने मित्र देशों के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान किया, तो भारत के मुसलमानों में गहरी चिंता फैल गई। 11 नवंबर को जर्मनी (Germany) के हथियार डालने और 31 अक्टूबर को तुर्की (Turkey) के झुकने के बाद ऑटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) पूरी तरह बिखर गया। तुर्की (Turkey) को मुद्रोस (Mudros) में युद्धविराम` समझौते पर दस्तख़त करने के लिए मजबूर होना पड़ा। एंटेंट पावर्स (Entente powers) से हारने के बाद सुल्तान वाहिदेद्दीन मेहमेद षष्ठम (Sultan Vahideddin Mehmed VI) ने ब्रिटेन (Britain) की शर्तों पर चलना शुरू कर दिया। इधर दक्षिण अफ्रीका (South Africa) से लौटने के बाद महात्मा गांधी अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ बेख़ौफ़ आवाज़ उठाने वाले अली बंधुओं के हौसले से बहुत प्रभावित हुए और 1915 में मोहम्मद अली से मिले। गांधी जी ने इस मुलाक़ात को याद करते हुए लिखा था कि यह "पहली नज़र का प्यार" जैसा था। जाने-माने इतिहासकार बी.आर. नंदा लिखते हैं कि दोनों के तौर-तरीक़ों में भले ही बहुत फ़र्क़ था, लेकिन जेल से अली बंधुओं की रिहाई के लिए गांधी जी की कोशिशों ने उनके दिलों को जोड़ दिया। लेखक अफ़ज़ल इकबाल के अनुसार, अहिंसा को लेकर अपने अलग नज़रिए के बावजूद मोहम्मद अली बापू के सबसे भरोसेमंद साथी बन गए। मोहम्मद अली का गांधी जी पर इतना पक्का यक़ीन था कि उन्होंने यहाँ तक कह दिया था: “पैगंबर के बाद... मैं गांधी के आदेशों पर चलना अपना सबसे बड़ा फ़र्ज़ मानता हूँ।”
असहयोग आंदोलन के दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता ने ब्रिटिश हुकूमत को कैसे चुनौती दी? लखनऊ में ख़िलाफ़त सम्मेलन की सदारत करते हुए मोहम्मद अली ने बापू की मौजूदगी में भरे मंच से कहा था: "मैं आज यह ऐलान करता हूँ कि हिंदुस्तानी फ़ौज महात्मा गांधी की फ़ौज है, हिंदुस्तानी पुलिस महात्मा गांधी की पुलिस है और हर इंसान गांधी के साथ खड़ा है..."। गांधी जी ने अली बंधुओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पूरे मुल्क का दौरा किया और अलीगढ़ कॉलेज के नौजवानों से सरकारी संस्थानों का बहिष्कार करने की अपील की। बापू का 'स्वराज' का विचार अली बंधुओं के दिल में पूरी तरह उतर चुका था। अमृतसर में कांग्रेस ने ख़िलाफ़त के मसले पर गांधी जी की अगुआई को यह कहते हुए मंज़ूर किया कि जब देश का एक हिस्सा भारी तकलीफ़ में हो, तो दूसरा हिस्सा चुपचाप अलग नहीं बैठ सकता। जुलाई 1920 में सिंध में हुए ख़िलाफ़त सम्मेलन में गांधी जी ने 23 करोड़ हिंदुओं से 7 करोड़ मुसलमान भाइयों का साथ देने की अपील की, जिसने हिंदू-मुस्लिम एकता की एक मज़बूत बुनियाद रख दी। फिर सितंबर 1920 के कलकत्ता के विशेष कांग्रेस अधिवेशन में असहयोग के फ़ैसले पर दोनों समुदायों ने अपनी मुहर लगाई। इसके बाद अली बंधुओं ने और भी तीखे भाषण देने शुरू किए, और अक्टूबर 1920 में लखनऊ में मोहम्मद अली ने अंग्रेज़ी अख़बारों के दोहरे रवैये पर सवाल उठाया, जहाँ उन्हें अपनी सभाओं के इश्तिहार छपवाने के लिए भी 150 से 200 पाउंड चुकाने पड़ते थे। हालांकि, 1924 के कोहाट दंगों और 1928 की नेहरू रिपोर्ट के बाद इस रिश्ते में कड़वाहट आ गई और 21 दिसंबर 1928 को अली बंधुओं ने ख़िलाफ़त सम्मेलन में नेहरू रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया।
मदुरै की उस भावुक घटना ने गांधी जी को आजीवन खादी का महात्मा कैसे बनाया? कपड़ों के ज़रिए जनता के साथ जुड़ने का गांधी जी का यह सफ़र सिर्फ़ टोपी तक ही नहीं रुका। दक्षिण अफ्रीका (South Africa) में वकालत करते समय बापू थ्री-पीस सूट पहना करते थे। 1915 में जब वे अपने वतन लौटे, तो उन्होंने पारंपरिक गुजराती वेशभूषा अपना ली। लेकिन 20 सितंबर 1921 को अपनी दूसरी मदुरै यात्रा के दौरान गांधी जी वेस्ट मासी स्ट्रीट में ठहरे हुए थे। वहाँ उन्होंने जब खेत-खलिहानों में दिहाड़ी मज़दूरों को तन पर बिना कमीज़ के पसीना बहाते देखा, तो इस मंज़र ने उनके दिल को भीतर तक झकझोर कर रख दिया। वे सोचने लगे कि जिस मुल्क के करोड़ों ग़रीबों के पास तन ढकने को कपड़ा तक नहीं है, वहाँ वे ख़ुद इतने कपड़े कैसे पहन सकते हैं? उसी रात, यानी 21 सितंबर को उन्होंने अपनी पारंपरिक पोशाक हमेशा के लिए छोड़ दी और महज़ चार मीटर लंबी खादी की धोती लपेट ली। अगली सुबह 22 सितंबर को जब वे कामराज स्ट्रीट (जिसे आज 'गांधी पोट्टल' कहा जाता है) में लोगों के सामने पहुँचे, तो सिर्फ़ एक सादी खादी की वेष्टि में अपने नेता को देखकर सब हैरान रह गए। वेस्ट मासी स्ट्रीट का वह मकान जहाँ बापू रुके थे, आज एक खादी केंद्र बन चुका है और वहाँ लगी पत्थर की पट्टिका इस ऐतिहासिक फ़ैसले की गवाही देती है।
चरखा और खादी कैसे बने भारत की आत्मनिर्भरता के सबसे बड़े हथियार? स्वदेशी की लड़ाई में चरखा महज़ सूत कातने का औज़ार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और स्वावलंबन का सबसे बड़ा हथियार बन गया था। साबरमती आश्रम का यह पक्का नियम था कि सभी साथी सिर्फ़ हाथ से कते सूत और बुने हुए कपड़े ही पहनेंगे। गंगाबेन मजूमदार ने बड़ौदा रियासत के विजापुर से गांधी जी के लिए पहला चरखा खोजकर निकाला, जिसके बाद आश्रम में बड़े पैमाने पर खादी तैयार होने लगी। 1918 में बापू ने गाँवों में रहने वाले ग़रीबों को सहारा देने के लिए खादी की मुहिम शुरू की थी। धीरे-धीरे यह सिर्फ़ रोज़गार का ज़रिया नहीं रहा, बल्कि विदेशी कपड़ों के बहिष्कार और आज़ादी की अलख जगाने का सबसे बड़ा राजनीतिक और भावनात्मक प्रतीक बन गया। आज भी निफ्ट बेंगलुरु जैसे संस्थान कर्नाटक राज्य खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड के साथ मिलकर 400 से ज़्यादा नए डिज़ाइन तैयार कर रहे हैं, ताकि खादी की इस सुनहरी विरासत को नई पीढ़ी की पसंद के मुताबिक़ आगे बढ़ाया जा सके।
उंगलियों की गिनती से लेकर ग्राफिक्स स्क्रीन तक, कैलकुलेटर के विकास की पूरी कहानी
एक समय ऐसा था जब लिखित संख्याएं अस्तित्व में नहीं थीं। इंसान के पास गिनती करने के लिए केवल अपनी उंगलियां और पैर के अंगूठे ही थे। उंगलियों, पत्थरों और सीपियों का उपयोग करके भेड़ों और फसलों की गिनती करना एक सीमा तक ही संभव था। इसलिए मानव सभ्यता ने एबेकस (Abacus) का आविष्कार किया, जिसे कंप्यूटर हिस्ट्री म्यूजियम के अनुसार उंगलियों के अलावा सबसे पुराना लगातार उपयोग किया जाने वाला गणना उपकरण माना जाता है। एबेकस आज भी उपयोग में है, लेकिन यह गणना मशीनों के प्रति मानव जाति की रुचि की केवल एक शुरुआत थी। समय के साथ इन मशीनों में बड़े और क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं।
दुनिया की पहली मैकेनिकल एडिंग मशीन का आविष्कार किसने और कब किया था? इतिहास के पन्नों में पहली बार एडिंग मशीन (Adding Machine) का जिक्र 1623 में मिलता है। विल्हेम शिकार्ड (Wilhelm Schickard) को पहली एडिंग मशीन के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है। यह बात तब सामने आई जब जोहान्स केपलर (Johannes Kepler) के जीवनी लेखक डॉ. फ्रांज हैमर ने दावा किया कि 1623 और 1624 में विल्हेम शिकार्ड द्वारा जोहान्स केपलर को लिखे गए दो पत्रों में कैलकुलेटिंग क्लॉक का चित्र मिला था। इस खोज से पहले यह माना जाता था कि ब्लेज़ पास्कल (Blaise Pascal) ने 1642 में पहली एडिंग मशीन बनाई थी। विल्हेम शिकार्ड की इस मशीन में गुणा करने वाला उपकरण, मध्यवर्ती परिणामों को रिकॉर्ड करने का तंत्र और 6-अंकीय दशमलव जोड़ने वाला उपकरण शामिल था।
ब्लेज़ पास्कल की मशीन पास्कलाइन कैसे काम करती थी और यह कितनी सफल रही? ब्लेज़ पास्कल 17वीं सदी के फ्रांस के सबसे प्रसिद्ध दार्शनिकों, गणितज्ञों और आविष्कारकों में से एक थे। 1642 में, 19 वर्ष की आयु में, उन्होंने पहला पास्कलाइन (Pascaline) बनाया, जिसे दुनिया का पहला मैकेनिकल कैलकुलेटर भी कहा जाता है। अपने पिता को कर संग्राहक के रूप में बड़े घटाव और गुणा करते हुए देखकर, उन्होंने एक ऐसा उपकरण बनाने का फैसला किया जो इस समय लेने वाले काम को आसान कर सके। पास्कलाइन एक जटिल तंत्र वाला बॉक्स था, जिसमें बड़े नंबर डाले जा सकते थे। यह मशीन जोड़ और घटाव कर सकती थी, और जोड़-घटाव के लगातार उपयोग से गुणा और भाग भी कर सकती थी।
हालांकि यह एक क्रांतिकारी आविष्कार था, लेकिन इसका प्रभाव तुरंत नहीं दिखा। पास्कलाइन के केवल 50 के आसपास ही मॉडल बनाए गए थे। ये मशीनें आम लोगों की पहुंच से बाहर थीं और इन्हें मुख्य रूप से अमीर लोगों द्वारा एक महंगी और जटिल वस्तु के रूप में खरीदा जाता था। 1649 में फ्रांसीसी शाही दरबार से एक विशेष अधिकार मिलने के बाद केवल ब्लेज़ पास्कल ही इसे बना सकते थे। प्रत्येक मशीन हाथ से बनाई जाती थी, इसलिए इसे बनाने में बहुत समय लगता था। 1654 में उन्होंने इसका निर्माण बंद कर दिया।
पहला काम करने वाला कैलकुलेटर और पहला कमर्शियल मैकेनिकल कैलकुलेटर कौन सा था? 1773 में फिलिप मथायस हैन (Philip Matthäus Hahn) ने पहला काम करने वाला कैलकुलेटर तैयार किया। उन्होंने अपनी मशीन को 1672 में गॉटफ्रीड विल्हेम लाइबनिज़ (Gottfried Wilhelm Leibniz) द्वारा बनाए गए स्टेप्ड रेकनर पर आधारित किया था। इसके बाद 1820 में चार्ल्स जेवियर थॉमस डी कोलमार (Charles Xavier Thomas de Colmar) ने अरिथमोमीटर (Arithmometer) का आविष्कार किया। यह जोड़, घटाव, गुणा और भाग जैसी चारों बुनियादी संक्रियाओं को पूरा करने वाली पहली व्यावसायिक रूप से सफल गणना मशीन थी। 1851 में इसके उत्पादन के साथ ही मैकेनिकल कैलकुलेटर उद्योग की शुरुआत हुई और यह प्रथम विश्व युद्ध तक उपयोग में रहा।
इलेक्ट्रॉनिक युग की शुरुआत कैसे हुई और पहला ट्रांजिस्टर कैलकुलेटर कौन सा था? गणना मशीनों के इतिहास में एक बड़ा बदलाव तब आया जब आईबीएम (IBM) ने 1954 में आईबीएम 608 मशीन पेश की। यह पहली गणना मशीन थी जिसमें वैक्यूम ट्यूब के बजाय सॉलिड-स्टेट ट्रांजिस्टर का उपयोग किया गया था। इस मशीन को कई बड़ी अलमारियों में रखा जाता था। इसकी कीमत 83,210 डॉलर थी या इसे 1,760 डॉलर प्रति माह पर किराए पर लिया जा सकता था। इस मशीन की मुख्य मेमोरी 9 अंकों वाली 40 संख्याओं को स्टोर कर सकती थी और एक सेकंड में 4,500 जोड़ कर सकती थी। इसमें 3,000 से अधिक जर्मेनियम ट्रांजिस्टर लगे थे।
दुनिया का पहला इलेक्ट्रॉनिक डेस्कटॉप कैलकुलेटर एनिएटा कैसे बना? 1961 में ब्रिटेन की बेल पंच (Bell Punch) कंपनी ने दुनिया का पहला इलेक्ट्रॉनिक डेस्कटॉप कैलकुलेटर बाजार में उतारा, जिसे एनिएटा (ANITA) नाम दिया गया। कंपनी मुख्य रूप से टिकट पंच बनाने के लिए जानी जाती थी। 1956 में नॉर्बर्ट किट्ज़ (Norbert Kitz) को इलेक्ट्रॉनिक्स का उपयोग करके नई मशीन विकसित करने के लिए लाया गया था। काफी शोध के बाद उन्होंने एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक मशीन बनाई जिसमें केवल कीबोर्ड की कुंजियां ही घूमने वाले हिस्से थे।
1961 में हैम्बर्ग के एक व्यापार मेले में इसका पहला मॉडल एनिएटा मार्क 7 पेश किया गया और उसी साल अक्टूबर में लंदन में एनिएटा मार्क 8 लॉन्च किया गया। एनिएटा मार्क 8 में लगभग 170 वैक्यूम ट्यूब, एक डिकाट्रॉन दशक काउंटर ट्यूब और न्यूमीकेटर डिस्प्ले ट्यूब का उपयोग किया गया था। एनिएटा का नाम इतनी तेजी से लोकप्रिय हुआ कि कंपनी ने इसे ही ब्रांड नाम बना लिया। यह मशीन यूरोप में भारी सफल रही और दो साल से अधिक समय तक बाजार में इसके टक्कर का कोई दूसरा इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर नहीं था।
एनिएटा के बाद पॉकेट कैलकुलेटर और नई तकनीकों का विकास कैसे हुआ? 1960 के दशक के मध्य में सिलिकॉन ट्रांजिस्टर सस्ते हो गए। बेल पंच ने एकीकृत सर्किट यानी इंटीग्रेटेड सर्किट को अपनाया। 1971 तक लार्ज स्केल इंटीग्रेशन चिप्स के इस्तेमाल से मशीनों का आकार छोटा होने लगा। 1971 में ही बसिकॉम (Busicom) ने दुनिया का पहला पॉकेट के आकार का और रेड एलईडी डिस्प्ले वाला कैलकुलेटर हैंडी जारी किया। इसकी कीमत 395 डॉलर थी। बाद में अमेरिकी कंपनी रॉकवेल (Rockwell) ने बेल पंच की कैलकुलेटर इकाई को खरीद लिया। रॉकवेल ने एक चिप पर पूरा सर्किट डाल दिया, लेकिन पॉकेट कैलकुलेटर बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण 1970 के दशक के अंत तक बेल पंच और एनिएटा का नाम बाजार से गायब हो गया।
मैकेनिकल कैलकुलेटर और इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर के बीच मुख्य अंतर क्या हैं? मैकेनिकल और इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर के काम करने के तरीके में बहुत बड़ा फ़र्क होता है। मैकेनिकल कैलकुलेटर में भौतिक गियर, लीवर, पहिए और कैम होते हैं। ये मशीनें हाथ की ताकत (क्रैंक या स्प्रिंग) से चलती हैं और भौतिक घटकों की हलचल के आधार पर धीमी गति से गणना करती हैं। इनका आकार बहुत बड़ा और वजन काफी ज्यादा होता था, और लगातार घर्षण के कारण इनमें टूट-फूट का खतरा रहता था। इनमें परिणाम देखने के लिए नंबर वाले डायल या छपे हुए पेपर टेप का इस्तेमाल होता था।
दूसरी ओर, इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर पूरी तरह से माइक्रोचिप, सिलिकॉन ट्रांजिस्टर और एकीकृत सर्किट पर आधारित होते हैं। ये बिजली, बैटरी या सौर ऊर्जा से चलते हैं। इनमें डेटा प्रोसेसिंग के लिए बाइनरी लॉजिक गेट्स का उपयोग होता है, जिससे गणनाएं लगभग तुरंत हो जाती हैं। ये वजन में बेहद हल्के, पतले और जेब में रखने लायक होते हैं। इनमें परिणाम देखने के लिए एलसीडी या एलईडी स्क्रीन होती है। यांत्रिक घिसाव न होने के कारण ये लंबे समय तक चलते हैं, हालांकि सर्किट खराब होने का खतरा रहता है।
ग्राफिंग कैलकुलेटर से लेकर टच स्क्रीन और कलर डिस्प्ले तक का सफर कैसे तय हुआ? समय के साथ इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर और उन्नत होते गए। 1967 में टैक्सास इंस्ट्रूमेंट्स (Texas Instruments) ने कैल टेक नाम से पहला हैंडहेल्ड कैलकुलेटर विकसित किया। 1974 में हेवलेट-पैकार्ड (Hewlett-Packard) ने 795 डॉलर में एचपी-65 नाम का पहला प्रोग्राम योग्य कैलकुलेटर लॉन्च किया, जो अंतरिक्ष में जाने वाला पहला कैलकुलेटर भी बना।
1985 में कैसिओ (Casio) ने 422 बाइट्स मेमोरी और 82 वैज्ञानिक कार्यों के साथ पहला ग्राफिंग कैलकुलेटर कैसिओ एफएक्स-7000जी लॉन्च किया। 2003 में शार्प (Sharp) ने पहला स्टायलस-आधारित टच ग्राफिंग कैलकुलेटर बनाया। इसके बाद 2010 में कैसिओ ने प्रिज्म नाम से पहला फुल-कलर ग्राफिंग कैलकुलेटर बाजार में उतारा, जिससे छात्रों को मोनोक्रोम डिस्प्ले से हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया। एबेकस से शुरू हुआ यह सफर आज अत्याधुनिक रंगीन स्क्रीन और शक्तिशाली चिप्स तक पहुंच चुका है, जिसने गणित और विज्ञान की दुनिया को पूरी तरह से बदल दिया है।
संदर्भ 1. https://tinyurl.com/y8y8hb9o 2. https://tinyurl.com/2ak9jr5h 3. https://tinyurl.com/h3ko9zg
जलवायु और मौसम
21-09-2026 09:28 AM • Rampur-Hindi
आज हम जानेंगे, रामपुर की क्षेत्रीय लू हवा के पीछे कौन से वायुमंडलीय कारक मौजूद हैं?
हमारे रामपुर जैसे समुद्र से दूर स्थित जिलों में आने वाली भीषण लू (गर्म हवा), तीव्र सौर विकिरण के क्षेत्रीय वायुमंडलीय स्थितियों के साथ प्रभाव का परिणाम है। हालांकि सूर्य से पृथ्वी की औसत निकटता अपेक्षाकृत स्थिर रहती है, लेकिन स्थानीय भू-तापन इस बात पर अधिक निर्भर करता है कि सीधी सौर किरणें वायुमंडल से कैसे गुजरती हैं। जब सीधी धूप सूखी मिट्टी पर पड़ती है, तो ऊष्मीय विकिरण सतह के पास फंस जाते हैं, जिससे जमीन का तापमान काफी बढ़ जाता है।
सौर ऊर्जा अवशोषण, विकिरण ताप स्थानांतरण (Radiation heat transfer) की वह प्रक्रिया है, जहाँ कोई सतह गिरने वाली सूरज की रोशनी को दूर परावर्तित करने के बजाय, उसे अवशोषित कर लेती है। यह अवशोषित विकिरण, ऊष्मीय ऊर्जा बन जाता है, जिससे सतह का तापमान बढ़ सकता है और फिर चालन (conduction), संवहन (convection), और पुन:विकिरण (re-radiation) हानियों को बढ़ावा मिल सकता है।
यदि विकिरण किसी सतह पर पड़ता है, तो उसका कुछ हिस्सा परावर्तित हो जाता है, कुछ हिस्सा उससे गुजर सकता है, और बाकी हिस्सा अवशोषित हो जाता है। सूरज की ओर अधिक सीधे भाग वाली सतह को उससे दूर झुकी हुई सतह की तुलना में अधिक प्रभावी ऊर्जा प्राप्त होती है, भले ही दोनों की सामग्री एक ही हो। एक बार ऊर्जा अवशोषित हो जाने के बाद, सतह गर्म हो जाती है और फिर ऊष्मीय विकिरण उत्सर्जित करती है। इसके अलावा, यदि कोई सतह अन्य सतहों से घिरी हुई है, तो उसे प्राप्त होने वाला कुछ विकिरण ज्यामिति के आधार पर अवरुद्ध, पुनर्निर्देशित या विनिमय किया जा सकता है। साथ ही, गहरे रंगों वाली सतहें अधिक विकिरण अवशोषित करती हैं और फीके रंगों वाली सतहें कम अवशोषण करती हैं।
एक हीट डोम (Heat dome) अर्थात गर्मी का कवच जैसा क्षेत्र, तब विकसित होता है, जब उच्च दबाव का एक व्यापक क्षेत्र किसी अन्य क्षेत्र पर स्थापित हो जाता है और लंबी अवधि तक वहीं रहता है। उच्च दबाव के तहत, हवा वायुमंडल से नीचे रहती है। जैसे-जैसे यह नीचे आती है, यह संपीड़ित (Compressed) होती है और गर्म होती है। साथ ही, बादलों का निर्माण रुक जाता है, जिससे तेज धूप जमीन तक पहुँच पाती है। यह पैटर्न जितनी देर तक बना रहता है, ऊष्मा का प्रभाव उतना ही अधिक होता है। साफ आसमान, दिन के समय तापमान के बढ़ने को प्रेरित करता है, जबकि मिट्टी धीरे-धीरे सूख जाती है। जैसे-जैसे ज़मीन की नमी कम होती है, वाष्पीकरण के लिए कम सौर ऊर्जा का उपयोग होता है। इससे अधिक ऊर्जा ज़मीन की सतह तथा इसके ऊपर की हवा को सीधे तौर पर गर्म करने के लिए उपलब्ध हो जाती है।
बाद में, सूखी ज़मीन अतिरिक्त वार्मिंग को बढ़ावा देती है, जो बदले में अधिक सूखे को प्रोत्साहित करती है। चूंकि गर्म हवा, ठंडी हवा की तुलना में वायुमंडल की गहरी परत में आती है, इसलिए परिणामी पैटर्न हीट डोम हो सकता है, जिसका हटना मुश्किल हो जाता है। जब ये पैटर्न होते हैं, तो वे गर्म जलवायु और अक्सर सूखी ज़मीन में योगदान देते हैं। इस प्रकार बढ़ी गर्मी में, सामान्य गर्मी की तुलना में अधिक तीव्र होने की क्षमता है। दूसरे शब्दों में, भले ही मौसम के पैटर्न स्वयं काफी नहीं बदलें हो, लेकिन उनके प्रभाव तेजी से गंभीर होते जा रहे हैं। साथ ही, स्थानीय इलाके और शहरी घनत्व इस बात को संशोधित करते हैं कि विकिरणीय सौर ऊर्जा कैसे संग्रहीत होती है।
कई शहर, आज शहरी ताप द्वीप (Urban Heat Island) प्रभाव का अनुभव कर रहे हैं। यह शहरों में, मानवीय गतिविधियों के कारण बढ़ती अत्यधिक गर्मी से संबंधित अवधारणा है। जैसे-जैसे प्राकृतिक और कृषि भूमि कंक्रीट, इमारतों, और सड़कों जैसी पक्की संरचनाओं में बदलती है, स्थानीय तापमान तेजी से बढ़ने लगता है। इससे शहरी ताप द्वीप प्रभाव बनता है। कंक्रीट और डामर जैसी सामग्री दिन के समय गर्मी को अवशोषित कर लेती है और रात में इसे उत्सर्जित करती है। इससे स्थानीय सूक्ष्म जलवायु (Microclimates) प्रभावित होती है। इस कारण, शहरी क्षेत्रों में भूमि उपयोग, उसकी संरचना और स्थानीय तापीय गतिकी (Localized thermal dynamics) के बीच मौजूद संबंधों का विश्लेषण करना जरूरी है।
पेड़ों, पार्कों और वनस्पतियों की कमी के कारण वाष्पोत्सर्जन की प्राकृतिक शीतलन प्रक्रिया रुक जाती है। इससे शहरी इलाकों में गर्मी का असर और अधिक तीव्र हो जाता है। स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाली यह अतिरिक्त गर्मी और बिगड़ी हुई तापीय गतिकी मिलकर, क्षेत्रीय स्तर पर लू के प्रभाव को ज्यादा खतरनाक व गंभीर बना देती हैं। इस कारण, क्षेत्रीय स्तर पर गर्मी के प्रकोप को कम करने के लिए शहरी नियोजन में हरे भरे स्थान और प्राकृतिक वनस्पतियों को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है।
नेपाल से लेकर सूरीनाम तक किन 8 देशों में शान से बोली जाती है हिंदी?
भाषा किसी भी राष्ट्र की अस्मिता, संस्कृति और उसके नागरिकों के पारस्परिक संबंधों की संवाहिका होती है। भारतीय उपमहाद्वीप में सदियों से संवाद और चेतना के केंद्र में रही हिंदी आज न केवल देश के 1.3 अरब से अधिक लोगों के बीच संपर्क की प्रमुख भाषा है, बल्कि यह सात समंदर पार भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है। इंडो-आर्यन भाषा परिवार की सदस्य और देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी का इतिहास अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण रहा है। 10वीं शताब्दी की आरंभिक बोलियों से लेकर 21वीं सदी के डिजिटल (digital) युग तक, हिंदी ने अपनी अद्भुत ग्रहणशीलता (assimilation power) के बल पर क्षेत्रीय सीमाओं को लाँघकर वैश्विक स्तर पर एक प्रभावशाली भाषा का दर्जा प्राप्त किया है।
10वीं शताब्दी से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक कैसे विकसित हुई हिंदी भाषा? हिंदी भाषा के ऐतिहासिक विकास को मुख्य रूप से तीन कालखंडों में विभाजित किया जाता है। पहला पूर्व-आधुनिक काल (10वीं से 18वीं शताब्दी) माना जाता है। इस दौर में हिंदी मुख्य रूप से उत्तर और मध्य भारत में बोली जाती थी, जिस पर संस्कृत और स्थानीय बोलियों का गहरा प्रभाव था। हिंदी के प्राचीनतम ज्ञात प्रमाण दिल्ली और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में बोली जाने वाली खड़ी बोली में मिलते हैं, जो आधुनिक मानक हिंदी का मूल आधार बनी। 11वीं शताब्दी में धार्मिक स्वरूप के जो प्राचीन ग्रंथ मिलते हैं, उन्हें 'पुरानी हिंदी' या 'हिंदवी' के नाम से जाना गया।
दूसरा आधुनिक काल (19वीं से 20वीं शताब्दी के मध्य तक) औपनिवेशिक काल के प्रभाव में विकसित हुआ। इस दौरान अंग्रेज़ों के शासनकाल में हिंदी का मानकीकरण हुआ और साक्षरता बढ़ाने के उद्देश्य से देवनागरी लिपि के स्वरूप को सुव्यवस्थित किया गया। तीसरा कालखंड 1947 में स्वतंत्रता के बाद का है, जब हिंदी को स्वतंत्र भारत की राजभाषा का दर्जा दिया गया।
साहित्यिक दृष्टि से हिंदी का भंडार अत्यंत वैभवशाली रहा है। 15वीं शताब्दी के रहस्यवादी कवि कबीर की साखियों से लेकर भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त मीराबाई की भक्ति रचनाओं तक, इस भाषा ने जन-जन को आध्यात्मिक प्रेरणा दी। आधुनिक काल में हरिवंश राय बच्चन, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा जैसे मूर्धन्य रचनाकारों ने इसे वैश्विक पहचान दिलाई। इसके अलावा, ब्रजभाषा, भोजपुरी और अवधी जैसी समृद्ध बोलियों ने इसके शब्दकोश को विस्तार दिया। हिंदी ने फ़ारसी के 'शराब', 'दरबार' और 'मज़ार' जैसे शब्दों को अपनाया, तो अरबी के 'नमाज़', 'कुरान' व 'मौलवी' तथा आधुनिक युग में अंग्रेज़ी के कंप्यूटर (computer), मोबाइल और ईमेल जैसे शब्दों को भी सहजता से आत्मसात कर लिया।
क्या संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया है या यह केवल राजभाषा है? प्रायः जनसामान्य में यह धारणा देखने को मिलती है कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है, किंतु वैधानिक दृष्टि से यह तथ्य सही नहीं है। भारतीय संविधान के तहत किसी भी एक भाषा को 'राष्ट्रभाषा' (National Language) का दर्जा प्रदान नहीं किया गया है।
संविधान के भाग 17 के अंतर्गत अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ की आधिकारिक भाषा के संबंध में स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं। अनुच्छेद 343 के अनुसार, देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी भारतीय संघ की 'राजभाषा' (Official Language) है, जिसका उपयोग केंद्र सरकार के प्रशासनिक कार्यों में किया जाता है। इसके साथ ही, अहिंदी भाषी राज्यों से संवाद और प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ी को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है।
भारत की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को संरक्षित रखने के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है। वर्ष 1950 में जब संविधान लागू हुआ था, तब मूल रूप से इसमें केवल 14 भाषाएँ शामिल थीं। इसके बाद समय-समय पर संवैधानिक संशोधन किए गए:
वर्ष 1967 में 21वें संविधान संशोधन द्वारा सिंधी को 15वीं भाषा के रूप में जोड़ा गया।
वर्ष 1992 में 71वें संविधान संशोधन द्वारा कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को शामिल किया गया, जिससे कुल संख्या 18 हो गई।
वर्ष 2003 में 92वें संविधान संशोधन द्वारा बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को शामिल किया गया, जिससे आठवीं अनुसूची में भाषाओं की संख्या बढ़कर 22 हो गई।
यह संवैधानिक व्यवस्था स्पष्ट करती है कि सभी अनुसूचित भाषाएँ देश की सांस्कृतिक धरोहर हैं, जबकि हिंदी और अंग्रेज़ी प्रशासनिक संवाद के साधन हैं।
1971 से 2011 तक की जनगणना के आंकड़े हिंदी के विस्तार के बारे में क्या बताते हैं? जनगणना के ऐतिहासिक आंकड़े यह सिद्ध करते हैं कि स्वतंत्र भारत में हिंदी बोलने वालों की संख्या और प्रतिशत में निरंतर वृद्धि हुई है। शोध पत्र में संकलित भारतीय जनगणना के आंकड़ों के अनुसार:
वर्ष 1971 में देश की कुल 54.81 करोड़ की जनसंख्या में हिंदी भाषियों की संख्या 20.27 करोड़ थी, जो कुल आबादी का 36.99 प्रतिशत था।
वर्ष 1981 में यह संख्या बढ़कर 25.77 करोड़ (38.74 प्रतिशत) हो गई।
वर्ष 1991 में हिंदी भाषियों की संख्या 32.95 करोड़ (39.29 प्रतिशत) तक पहुँची।
वर्ष 2001 में यह आँकड़ा 42.20 करोड़ (41.03 प्रतिशत) हो गया।
वर्ष 2011 की जनगणना में भारत के 52.83 करोड़ लोगों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया, जो देश की कुल जनसंख्या का 43.63 प्रतिशत है।
राज्यों के आधार पर देखा जाए तो देश के कुल हिंदी भाषियों में उत्तर प्रदेश का योगदान सर्वाधिक 35.58 प्रतिशत है। इसके बाद बिहार (15.27 प्रतिशत), मध्य प्रदेश (12.17 प्रतिशत), राजस्थान (11.60 प्रतिशत), हरियाणा (4.22 प्रतिशत), छत्तीसगढ़ (4.04 प्रतिशत), झारखंड (3.87 प्रतिशत), महाराष्ट्र (2.74 प्रतिशत), दिल्ली (2.70 प्रतिशत) और उत्तराखंड (1.70 प्रतिशत) का स्थान आता है। वर्ष 1997 के एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, देश के 66 प्रतिशत नागरिक हिंदी समझ और बोल सकते हैं, जबकि 77 प्रतिशत लोगों का मानना है कि हिंदी समूचे देश में सबसे अधिक प्रयुक्त होने वाली संपर्क भाषा है।
भारत के बाहर किन आठ प्रमुख देशों में सबसे ज्यादा बोली जाती है हिंदी? हिंदी की लोकप्रियता केवल भारत की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है। विश्व में 42.5 करोड़ से अधिक लोग हिंदी को अपनी पहली भाषा के रूप में और लगभग 12 करोड़ लोग इसे दूसरी भाषा के रूप में बोलते हैं। भारत के अतिरिक्त आठ ऐसे प्रमुख देश हैं, जहाँ हिंदी व्यापक रूप से बोली जाती है:
नेपाल (Nepal): भारत के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी हिंदी भाषी आबादी नेपाल में रहती है। यहाँ लगभग 80 लाख लोग हिंदी बोलते हैं। वर्ष 2016 में नेपाल की संसद में हिंदी को आधिकारिक दर्जा देने पर विचार किया गया था, क्योंकि वहाँ की लगभग 80 प्रतिशत आबादी हिंदी समझने अथवा बोलने में सक्षम है। संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America): अमेरिका में विश्व की तीसरी सबसे बड़ी हिंदी भाषी आबादी (लगभग 6.49 लाख) निवास करती है। यह अमेरिका में बोली जाने वाली 11वीं सबसे बड़ी विदेशी भाषा है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि अमेरिका में चिकित्सकों के बीच अंग्रेज़ी और स्पैनिश के बाद हिंदी तीसरी सबसे लोकप्रिय भाषा बन चुकी है। मॉरीशस (Mauritius): मॉरीशस में लगभग 4.5 लाख लोग हिंदी बोलते हैं। भारतीय मूल के लोगों की बहुलता के कारण यहाँ हिंदी का गहरा सांस्कृतिक जुड़ाव है। फ़िजी (Fiji): फ़िजी में लगभग 3.8 लाख लोग फ़िजी हिंदी बोलते हैं, जिसका आरंभ औपनिवेशिक काल में गिरमिटिया श्रमिकों के आगमन के साथ हुआ था। दक्षिण अफ़्रीका (South Africa): 19वीं शताब्दी से बसे भारतीय समुदाय के कारण यहाँ लगभग 2.5 लाख लोग हिंदी बोलते हैं। सूरीनाम (Suriname): डच उपनिवेश काल में 1873 से बसे भारतीय प्रवासियों के कारण यहाँ लगभग 1.5 लाख लोग 'सरनामी हिंदी' बोलते हैं। युगांडा (Uganda): पूर्वी अफ़्रीका के इस देश में पीढ़ियों से बसे भारतीय मूल के लगभग 1 लाख लोग अपने घरों और सामाजिक कार्यक्रमों में हिंदी बोलते हैं। यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom): ब्रिटेन के प्रवासी भारतीय समुदाय में लगभग 45,800 लोग दैनिक जीवन में हिंदी का प्रयोग करते हैं। संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक कूटनीति के मंच पर हिंदी ने कैसे बनाई अपनी विशिष्ट पहचान? अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं। वर्ष 1977 में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहली बार हिंदी में भाषण देकर इतिहास रचा था। इसके बाद, सितंबर 2014 में 69वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा और सितंबर 2015 में संयुक्त राष्ट्र सतत विकास सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदी में अपना संबोधन प्रस्तुत किया, जिससे विश्व मंच पर भाषा का गौरव बढ़ा।
वैश्विक स्तर पर हिंदी के प्रचार-प्रसार और शोध के लिए वर्ष 1997 में महाराष्ट्र के वर्धा में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना की गई, जिसका एक प्रमुख लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने का प्रयास करना भी है। वर्तमान में विश्व के 180 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी के अध्यापन की व्यवस्था है, जिनमें से 100 से अधिक उच्च शिक्षण संस्थान अकेले अमेरिका में स्थित हैं।
डिजिटल युग और कंप्यूटर तकनीक ने हिंदी को वैश्विक भाषा बनाने में क्या भूमिका निभाई है? सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार ने हिंदी को एक नई शक्ति प्रदान की है। 20 जून 2005 को सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत संस्था सी-डैक (C-DAC) ने हिंदी का निःशुल्क सॉफ्टवेयर (software) जारी किया। इस पैकेज में ओपनऑफिस (OpenOffice) के लिए 525 हिंदी फॉन्ट, वेब ब्राउज़र, ईमेल, ओसीआर (OCR), हिंदी-अंग्रेज़ी शब्दकोश, टाइपिंग ट्यूटर और 'लेखवानी' जैसी ऑडियो टाइपिंग प्रणाली उपलब्ध कराई गई। माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) कंपनी ने भी हिंदी में एमएस ऑफिस जारी किया, और कंपनी के प्रवर्तक बिल गेट्स (Bill Gates) ने कंप्यूटर के लिए हिंदी की उपयुक्तता को स्वीकार किया।
यूनिकोड (Unicode) प्रणाली के आगमन से इंटरनेट पर हिंदी क्रांति आ गई। आज इंटरनेट पर 15 से अधिक हिंदी सर्च इंजन कार्यरत हैं। भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने 'लीला' (LILA - Learning Indian Language through Artificial Intelligence) नामक पैकेज विकसित किया है, जिसके माध्यम से देश की 14 प्रमुख भाषाओं (असमिया, बोडो, बांग्ला, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, तमिल और तेलुगु) की सहायता से कोई भी व्यक्ति सरलता से हिंदी सीख सकता है।
ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्निशन (ओसीआर) तकनीक की सहायता से प्राचीन संस्कृत और पुरानी देवनागरी पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में परिवर्तित किया जा रहा है। गूगल इनपुट टूल्स, यूनिनागरी, कृतिदेव-टू-यूनिकोड कन्वर्टर जैसे साधनों ने लेखन को सुगम बना दिया है। यही कारण है कि आज हॉलीवुड में 'अवतार' (Avatar) जैसे शीर्षक से फ़िल्में बनती हैं और वैश्विक कंपनियाँ अपने उत्पादों के दिशा-निर्देशों में हिंदी को अनिवार्य स्थान दे रही हैं। यह तकनीकी सामर्थ्य यह सिद्ध करता है कि हिंदी आने वाले समय में विश्व भाषा बनने की दिशा में दृढ़ता से अग्रसर है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/28sjtos4
2. https://tinyurl.com/26sjmzht
3. https://tinyurl.com/24wshyn2
4. https://tinyurl.com/28oas2cn
बैक्टीरिया, प्रोटोज़ोआ, क्रोमिस्टा और शैवाल
07-09-2026 09:59 AM • Rampur-Hindi
निपाह वायरस का कहर और रामपुर के लिए केरल मॉडल से सीखने वाले अहम सबक?
निपाह (Nipah) एक बेहद गंभीर और जानलेवा वायरस है जो जानवरों से इंसानों में फैलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य प्रमुख स्वास्थ्य संस्थानों के अनुसार इस बीमारी में मृत्यु दर चालीस से 75% तक हो सकती है। यह बीमारी मुख्य रूप से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाई जाती है। जब भी किसी नए वायरस या महामारी का खतरा मंडराता है तो स्थानीय प्रशासन और आम जनता की जागरूकता ही बचाव का सबसे बड़ा हथियार बनती है। निपाह वायरस के हालिया मामलों और इसके संक्रमण की गंभीरता को देखते हुए यह समझना बेहद जरूरी है कि यह वायरस क्या है और इससे कैसे बचा जा सकता है। केरल जैसे राज्य ने जिस तत्परता से इस महामारी का सामना किया है वह रामपुर जैसे शहरों के लिए एक बेहतरीन उदाहरण है।
निपाह वायरस क्या है? निपाह एक प्रकार का जूनोटिक वायरस है जिसका मतलब है कि यह जानवरों से इंसानों में फैलता है। वैज्ञानिक तौर पर यह पैरामिक्सोविरिडे परिवार (Family Paramyxoviridae) का हिस्सा है। इस वायरस का प्राकृतिक स्रोत टेरोपोडीडे परिवार (Family Pteropodidae) के फ्रूट बैट यानी फल खाने वाले चमगादड़ होते हैं जिन्हें फ्लाइंग फॉक्स भी कहा जाता है। यह वायरस चमगादड़ों में कोई बीमारी पैदा नहीं करता लेकिन जब यह इंसानों या अन्य जानवरों तक पहुंचता है तो बेहद खतरनाक साबित होता है।
निपाह वायरस की पहचान पहली बार साल 1998 में मलेशिया में सूअर पालने वाले किसानों के बीच हुई थी। इसके बाद 1999 में सिंगापुर में भी इसके मामले सामने आए जब मलेशिया से बीमार सूअरों का आयात किया गया था। तब से लेकर अब तक भारत और बांग्लादेश में इसके कई प्रकोप देखे जा चुके हैं। भारत में सिलीगुड़ी और केरल में समय-समय पर इसके मामले सामने आते रहे हैं।
निपाह वायरस कैसे फैलता है? निपाह वायरस के फैलने के कई तरीके हैं। मुख्य रूप से यह चमगादड़ और सूअर जैसे संक्रमित जानवरों के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। अगर कोई व्यक्ति संक्रमित चमगादड़ की लार या मूत्र से दूषित फल खाता है या कच्चा खजूर का रस पीता है तो वह इस वायरस का शिकार हो सकता है। बांग्लादेश और भारत के कुछ हिस्सों में खजूर के कच्चे रस के सेवन से संक्रमण के कई मामले सामने आए हैं।
जानवरों के अलावा यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में भी फैल सकता है। जो लोग निपाह संक्रमित मरीजों की देखभाल करते हैं या उनके शरीर के तरल पदार्थों के संपर्क में आते हैं उन्हें इसका सबसे ज्यादा खतरा होता है। अस्पतालों में जहां वेंटिलेशन की कमी होती है और संक्रमण नियंत्रण के उपाय ठीक से लागू नहीं होते वहां स्वास्थ्य कर्मियों और परिवार के सदस्यों में इसका फैलाव तेजी से होता है।
निपाह वायरस के प्रमुख लक्षण क्या हैं? निपाह वायरस से संक्रमित होने के बाद लक्षण दिखने में आमतौर पर चार से चौदह दिन का समय लगता है, जिसे इन्क्यूबेशन पीरियड (incubation period) कहा जाता है। हालांकि कुछ दुर्लभ मामलों में यह समय पैंतालीस दिनों तक का भी हो सकता है। कुछ लोगों में इसके कोई लक्षण दिखाई नहीं देते लेकिन ज्यादातर मरीजों में बुखार सिरदर्द खांसी गले में खराश और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं।
जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता है स्थिति गंभीर होती जाती है। कुछ मरीजों के मस्तिष्क में सूजन आ जाती है, जिसे एन्सेफलाइटिस (encephalitis) कहते हैं। ऐसी स्थिति में मरीज को भ्रम सुस्ती और दौरे पड़ने लगते हैं और चौबीस से अड़तालीस घंटे के भीतर वह कोमा में भी जा सकता है। जो लोग इस गंभीर बीमारी से बच जाते हैं उनमें से लगभग बीस प्रतिशत लोगों को लंबे समय तक न्यूरोलॉजिकल (neurological) समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
निपाह वायरस संक्रमण की पहचान कैसे होती है? शुरुआती लक्षणों के आधार पर निपाह वायरस को अन्य संक्रामक बीमारियों से अलग करना मुश्किल होता है। इसकी सटीक पहचान के लिए प्रयोगशाला परीक्षण आवश्यक हैं। इसके निदान के लिए मुख्य रूप से रियल टाइम पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (real-time polymerase chain reaction) या आरटी-पीसीआर टेस्ट (RT-PCR test) का इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए मरीज के गले के स्वैब, नाक के स्वैब, रक्त या मस्तिष्कमेरु द्रव के नमूने लिए जाते हैं।
इसके अलावा रक्त में एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए एलिसा टेस्ट (ELISA test) भी किया जाता है। चूंकि यह वायरस बेहद खतरनाक है इसलिए संदिग्ध मरीजों के नमूनों को प्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा उच्चतम सुरक्षा वाली प्रयोगशालाओं में ही जांचा जाना चाहिए।
निपाह वायरस का इलाज और वैक्सीन की स्थिति क्या है? वर्तमान में निपाह वायरस संक्रमण के लिए कोई भी मान्यता प्राप्त दवा या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। इलाज पूरी तरह से सहायक देखभाल पर निर्भर करता है। मरीज को पर्याप्त आराम, तरल पदार्थ और लक्षणों के आधार पर दवाएं दी जाती हैं। गंभीर मामलों में ऑक्सीजन सपोर्ट और वेंटिलेटर की आवश्यकता होती है।
वैज्ञानिक और शोधकर्ता लगातार इसके इलाज की खोज में लगे हुए हैं। रेमडेसिविर (Remdesivir) रिबाविरिन (Ribavirin) और फैविपिराविर (Favipiravir) जैसी एंटीवायरल दवाओं का जानवरों पर परीक्षण किया गया है और कुछ सकारात्मक परिणाम भी मिले हैं। इसके साथ ही कई प्रकार की वैक्सीन जैसे कि मैसेंजर आरएनए (RNA) आधारित वैक्सीन और वायरल वेक्टर आधारित वैक्सीन के निर्माण पर भी काम चल रहा है लेकिन ये अभी क्लिनिकल ट्रायल के चरण में हैं।
निपाह वायरस से बचाव के क्या उपाय हैं? निपाह वायरस से बचने का सबसे प्रभावी तरीका जागरूकता और सावधानी है। प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले या यात्रा करने वाले लोगों को साबुन और पानी से नियमित रूप से हाथ धोने चाहिए। चमगादड़ों और बीमार सूअरों से दूर रहना चाहिए। उन जगहों पर जाने से बचना चाहिए जहां चमगादड़ रहते हैं।
खाने-पीने की चीजों को लेकर विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। जमीन पर गिरे हुए या जानवरों द्वारा खाए गए फलों का सेवन नहीं करना चाहिए। फलों को अच्छी तरह धोकर और छीलकर ही खाना चाहिए। खजूर के ताजे रस को उबालने के बाद ही पीना सुरक्षित है। स्वास्थ्य कर्मियों को संक्रमित मरीजों का इलाज करते समय दस्ताने मास्क गाउन और आंखों की सुरक्षा के लिए चश्मे का इस्तेमाल करना चाहिए।
केरल ने निपाह वायरस को कैसे नियंत्रित किया? भारत में निपाह वायरस के कई प्रकोप हो चुके हैं, जिनमें से ज्यादातर मामले केरल में दर्ज किए गए हैं। जब केरल में निपाह वायरस का प्रकोप फैला तो राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग ने बिना समय गंवाए कार्यवाही शुरू कर दी। सबसे पहला कदम था प्रभावित इलाकों में तुरंत अलर्ट जारी करना और संदिग्ध मरीजों के नमूनों को जांच के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी पुणे भेजना।
संक्रमण की पुष्टि होते ही राज्य सरकार ने प्रभावित गांवों में कंटेनमेंट जोन बना दिए। लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई और सार्वजनिक स्थानों पर मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया गया। एहतियात के तौर पर स्कूलों को बंद करके ऑनलाइन कक्षाएं शुरू की गईं।
स्वास्थ्य विभाग ने एक हजार दो सौ अट्ठासी लोगों की पहचान की जो संक्रमित मरीजों के संपर्क में आए थे। इन सभी लोगों को 21 दिनों के लिए निगरानी और क्वारंटाइन में रखा गया। केरल की सफलता का एक बड़ा कारण उनका विकेंद्रीकृत प्रशासन था। हर जिले की स्वास्थ्य इकाइयों को अपने स्तर पर तुरंत फैसले लेने की छूट दी गई थी, जिससे समय की बचत हुई। इसके अलावा कोविड महामारी के दौरान प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों ने कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और मरीजों को आइसोलेट करने में अहम भूमिका निभाई।
रामपुर भविष्य की महामारियों के लिए केरल से क्या सीख सकता है? रामपुर जैसे शहरों के लिए केरल का मॉडल एक आदर्श खाका पेश करता है। रामपुर भविष्य की स्वास्थ्य आपात स्थितियों और निपाह जैसी महामारियों से निपटने के लिए केरल से बहुत कुछ सीख सकता है। सबसे पहली सीख बीमारी की त्वरित पहचान और मरीजों को तुरंत आइसोलेट करना है। किसी भी संदिग्ध मामले को हल्के में न लेते हुए तुरंत उसकी जांच और पुष्टि की व्यवस्था होनी चाहिए।
केरल की तरह रामपुर प्रशासन को भी कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की सख्त प्रणाली लागू करनी चाहिए ताकि संक्रमण की चेन को जल्द से जल्द तोड़ा जा सके। जन जागरूकता अभियान चलाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लोगों को यह बताना जरूरी है कि उन्हें क्या खाना चाहिए और किन जानवरों से दूरी बनानी चाहिए। भोजन और जल स्रोतों को संक्रमण से बचाने के लिए साफ-सफाई और स्वच्छता पर जोर देना आवश्यक है।
इसके अलावा स्वास्थ्य कर्मियों का उचित प्रशिक्षण बहुत जरूरी है ताकि वे बिना घबराए और सुरक्षित तरीके से मरीजों की देखभाल कर सकें। अस्पताल प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए जिससे किसी भी आपात स्थिति में फैसले लेने में देरी न हो। अगर रामपुर स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे में सुधार करता है और समुदाय को जागरूक करता है तो भविष्य में किसी भी बड़े संक्रमण और महामारी के खतरे को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।
रामपुर वासियों, भागवत पुराण से जानें श्री कृष्ण की 'रास-लीला' का वास्तविक आध्यात्मिक मर्म
हमारे रामपुर शहर के कई लोग, श्री कृष्ण की आराधना करते हैं। उनके जीवन के सुंदर किस्से हमें ज्ञात ही हैं। उदाहरण के लिए, रास-लीला को भक्ति के मार्ग में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। दरअसल, रास-लीला, भगवान श्री कृष्ण के प्रति उनके अदूषित, निर्मल, निष्काम, अनन्य और समर्पित भक्तों के निश्चल प्रेम व भक्ति का प्रतीक है।
रास-लीला उन दिव्य लीलाओं में से एक है, जो श्री कृष्ण ने वृंदावन में यमुना तट पर शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी रात में गोपियों (व्रज-बालाओं) के साथ रची थी। इसका अर्थ, परमात्मा का अपनी जीवात्माओं या भक्तों के साथ महामिलन है। जब श्री कृष्ण ने इस दिव्य लीलाएं की अभिव्यक्ति की, तब उनकी आयु लगभग 7 से 10 वर्ष के बीच थी। रास-लीला को श्री कृष्ण की बाल-लीलाओं और पावन गाथाओं में, सर्वोच्च एवं अत्यंत गूढ़ लीला माना जाता है।
रास-लीला का प्रामाणिक संदर्भ श्रीमद्भागवत पुराण के दसवें स्कंध (जो श्री कृष्ण को समर्पित है) में पाया जाता है। इसके अंतर्गत, 'रास-पंचाध्यायी' नाम से प्रसिद्ध पांच अध्याय हैं, जो वृंदावन की गोपियों के साथ श्री कृष्ण की इस अलौकिक रास-लीला का विशद वर्णन करते हैं। रास-लीला का स्त्री-पुरुष के भौतिक या सांसारिक काम-भोग से बिलकुल भी संबंध नहीं है, और ऐसा सोचना एक बहुत बड़ी भ्रांति है। यह तो परमेश्वर श्री कृष्ण और उनके अनन्य भक्तों के मध्य का एक विशुद्ध दिव्य एवं आध्यात्मिक संबंध है।
वास्तव में, रास-लीला उस सूक्ष्म एवं अलौकिक प्रक्रिया की बाह्य अभिव्यक्ति है, जो प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा के साथ मिलन के रूप में निरंतर घटित होती है। 'रास' शब्द संस्कृत के "रस" शब्द से निष्पन्न हुआ है। इसके अनेक अर्थ हैं, जैसे कि आनंदरस, दिव्य भावना, द्रवीभूत प्रेम, और अमृत। दूसरी ओर, 'लीला' शब्द, श्री कृष्ण के उन असीम एवं अलौकिक चरित्रों को दर्शाता है, जिन्हें पूर्णतः समझना हमारी साधारण बुद्धि के परे है। लेकिन, 'लीला' का शाब्दिक अर्थ अभिनय, क्रीड़ा अथवा आनंददायक खेल है, और यह क्रीड़ा नृत्य के रूप में प्रकट होती है। अतः, इन दोनों शब्दों के संयोजन से रास-लीला का अर्थ, ‘गोपियों के साथ श्री कृष्ण का भाव, अनन्य, प्रेम और परमानंद से परिपूर्ण दिव्य महा-नृत्य’ है।
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, कोई भी शब्द अपने प्राणप्रिय श्री कृष्ण के प्रति गोपियों के निष्कपट एवं अनन्य प्रेम का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकता। भगवान श्री हरि के प्रति गोपियों का यह स्नेह दैहिक या कामुक नहीं था, बल्कि वह प्रेरणादायी विशुद्ध आध्यात्मिक प्रेम था। वास्तव में, ये गोपियां कोई साधारण स्त्रियां नहीं थीं, बल्कि वे पूर्व जन्मों के महान ऋषि-मुनि थे, जिन्होंने कठोर तपस्या की थी। वे गोपियों के रूप में अवतरित होकर रास-लीला में अपने आराध्य श्री कृष्ण से साक्षात्कार की प्रतीक्षा कर रहे थे। विशेषत: कुछ पौराणिक प्रसंगों के अनुसार, ये गोपियां, दंडकारण्य के वे ऋषि-मुनि थे, जो त्रेतायुग में भगवान श्री राम के 14 वर्षों के वनवास के दौरान उनसे आलिंगन न पाने के कारण व्यथित थे। अपनी उस अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए उन्होंने द्वापरयुग में गोपियों के रूप में जन्म लिया, क्योंकि स्वयं श्री राम ने उन्हें ऐसा वरदान दिया था।
समस्त गोपियों में, श्रीमति राधा रानी श्री कृष्ण की सर्वाधिक प्रिय थीं। श्री कृष्ण के प्रति उनका प्रेम, विशुद्ध प्रेम का सर्वोच्च प्रमाण और पराकाष्ठा है। श्री कृष्ण और श्री राधा रानी को संयुक्त रूप से 'प्रेम-पुरुषोत्तम' एवं आनंद स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।
रास-लीला का यह पावन प्रसंग, शरद ऋतु की पूर्णिमा की रात को घटित हुआ था, जब वृंदावन की गोपियां श्री कृष्ण की मधुर बांसुरी की ध्वनि सुनकर अपने समस्त सांसारिक कामकाज, गृहस्थी और पारिवारिक बंधनों को छोड़कर कुंज-गलियों की ओर दौड़ पड़ीं। गोपियां बांसुरी की धुन से इस तरह सम्मोहित हुईं कि वे भय, लोक-लाज, सामाजिक मर्यादा और पारिवारिक संकोच को पीछे छोड़ आईं।
भगवान श्री कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति के साथ रास-लीला के इस परम उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए, उस रात्रि को अधिक दिव्य, उज्ज्वल एवं अलौकिक बना दिया। उस वातावरण का प्रत्येक दृश्य अनुपम था। तब वृंदावन में पुष्प विकसित हो चुके थे, पूर्ण चंद्र अपनी शीतल किरणों से जगमगा रहा था और यमुना तट से मंद-शीतल-सुगंधित हवा बह रही थी।
यमुना के पावन तट पर, गोपियों ने एक कदंब वृक्ष के नीचे अपने प्रिय श्री कृष्ण का दर्शन किया। रास-लीला के दौरान भगवान श्री कृष्ण ने प्रत्येक गोपी को यह आश्वस्त किया कि वे उन सभी के साथ व्यक्तिगत रूप से नृत्य करेंगे। तत्पश्चात, श्री कृष्ण केंद्र में विराजमान हुए और गोपियों ने उन्हें एक गोलाकार वृत्त में घेर लिया। तब श्री कृष्ण ने अनेक रूप धारण करके प्रत्येक गोपी के साथ स्वयं को प्रकट किया। इससे हर गोपी को यही अनुभव हुआ कि श्री कृष्ण केवल उसी के साथ नृत्य कर रहे हैं। इसकी प्रशंसा में गंधर्व, यक्ष और समस्त देवतागण आकाश मार्ग से इस अलौकिक नृत्य के साक्षी बने और उन्होंने देवलोक से पुष्प-वर्षा की।
किंतु, जब गोपियों के मन में यह सूक्ष्म गर्व जागृत होने लगता है कि परमेश्वर केवल उन्हीं के वश में हैं, तब श्री कृष्ण उनका मद दूर करने के लिए वहीं अदृश्य हो जाते हैं। गोपियां, अतः विरह-व्यथा में व्याकुल होकर पूरे वन में श्री कृष्ण को ढूंढती हैं। विरह की उस चरम अवस्था में वे आपस में श्री कृष्ण की विविध लीलाओं का अनुकरण और अभिनय करने लगती हैं। अंततः वे पुनः यमुना तट पर लौटती हैं और श्री कृष्ण के पुनरागमन की आस में उनके अनुपम गुणों का गान करने लगती हैं। इस विरह-वेदना में गोपियों के हृदय से जो अश्रुपूर्ण गीतों की धारा फूटी, वही श्रीमद्भागवत का अमर प्रसंग 'गोपी-गीत' बना है।
गोपियों के इस अनन्य प्रेम और पूर्ण समर्पण को देखकर श्री कृष्ण पुनः उनके समक्ष प्रकट होते हैं और रास-लीला पुनः प्रारंभ होती है। इसके पश्चात, यह रास-नृत्य अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंचता है। सांसारिक बंधनों के सर्वथा छिन्न-भिन्न हो जाने के कारण, गोपियां पूर्णतः कृष्ण प्रेम में लीन हो जाती हैं। रास की वह अलौकिक रात्रि पूर्ण होने पर, श्री कृष्ण गोपियों को अपने-अपने घर लौटने की आज्ञा देते हैं।
वर्तमान वृंदावन शहर में स्थित सेवाकुंज और निधिवन, वे पावन स्थल माने जाते हैं, जहां श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ यह अलौकिक रास-लीला रचाई थी। प्राचीन काल में ये दोनों स्थल, एक ही विशाल वन क्षेत्र का भाग थे। मान्यता है कि आज भी प्रतिदिन रात्रि में, श्री कृष्ण और श्री राधा रानी इन कुंजों में अपनी नित्य दिव्य लीलाओं हेतु पधारते हैं। दोनों ही स्थानों पर 'रंग महल' स्थित है, जो इस दिव्य लीला के उपरांत उनके विश्राम-स्थल के रूप में पूजित है। सेवाकुंज में श्री राधा रानी की प्रिय सखी ललिता जी की प्यास शांत करने हेतु श्री कृष्ण द्वारा प्रकट किया गया 'ललिता कुंड' विद्यमान है। जबकि, निधिवन में इसी प्रकार 'विशाखा कुंड' स्थित है। निधिवन में ही महान संगीत-शिरोमणि एवं संत स्वामी हरिदास जी की पवित्र समाधि भी स्थित है, जिन्होंने श्री कृष्ण के स्नेह में अनेक पदों की रचना की और उनका गायन किया था।
जानें, विश्व शांति व प्रेम के प्रतीक के रूप में कैसे हुई रक्षाबंधन जैसे मित्रता दिवस की शुरुआत?
हर साल, लोग राखी और मित्रता दिवस (फ्रेंडशिप डे) को लेकर बहुत उत्साह और उमंग महसूस करते हैं। रक्षाबंधन के पावन पर्व पर एक भाई अपनी बहन की रक्षा करने का आजीवन वादा करता है। इसके विपरीत, दोस्त, कोई औपचारिक वादा तो नहीं करते हैं, लेकिन इसके लिए दोनों व्यक्तियों में एक गहरी और पक्की मानसिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है। राखी हमारा पारंपरिक और सांस्कृतिक त्योहार है, जबकि मित्रता दिवस आधुनिक समय की देन है।
दुनिया भर में हर किसी द्वारा मित्रता के गुण की सराहना की जाती है। लोगों के बीच मित्रता के वैश्विक बंधन को प्रोत्साहित करने के लिए, विभिन्न देशों द्वारा अलग-अलग तारीखों पर मित्रता दिवस मनाया जाता है। भारत जैसे अधिकांश देशों ने इस अवसर के लिए संयुक्त राज्य द्वारा निर्धारित तारीख का अनुसरण किया है, जो हर साल अगस्त के पहले रविवार को आती है।
मित्रता दिवस का विचार सबसे पहले 1930 में ‘हॉलमार्क कार्ड्स’ (Hallmark Cards) के संस्थापक जॉयस हॉल (Joyce Hall) द्वारा दिया गया था। इससे पहले, ग्रीटिंग कार्ड, उपहार और अन्य वस्तुएँ भेजकर 2 अगस्त को मित्रता दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा गया था। इस विचार को 1920 के दशक के दौरान ‘ग्रीटिंग कार्ड नेशनल एसोसिएशन’ द्वारा अधिक बढ़ावा दिया गया था। लेकिन इसे बहुत सकारात्मक रूप से नहीं लिया गया, क्योंकि यह मित्रता दिवस के नाम पर व्यावसायिक हितों को बढ़ावा देने वाला एक हथकंडा प्रतीत होता था।
इस दिशा में वास्तविक और आधिकारिक प्रयास तब स्पष्ट हुए, जब अमेरिकी कांग्रेस ने वर्ष 1935 में दोस्तों के सम्मान में एक दिन समर्पित करने का निर्णय लिया। हालांकि मित्रता दिवस मनाने का सटीक कारण स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है, लेकिन इसकी आवश्यकता प्रथम विश्व युद्ध के विनाशकारी प्रभावों के बाद महसूस की गई थी। इस अवसर को एक ऐसे माध्यम के रूप में सोचा गया था, जो वैश्विक मित्रता के मजबूत बंधनों के माध्यम से विभिन्न देशों के लोगों के बीच अविश्वास, घृणा और दुश्मनी की दीवारों को मिटा सके।
इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए अमेरिकी कांग्रेस ने 1935 में एक औपचारिक उद्घोषणा के माध्यम से, अगस्त के पहले रविवार को मित्रता दिवस के रूप में चिह्नित किया, ताकि मित्रता के सम्मान के लिए एक विशेष अवकाश हो सके। बाद में, अन्य देश भी इस उत्सव में शामिल हो गए। दरअसल, संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2011 में अपनाए गए प्रस्ताव के अनुसार ‘अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस’ 30 जुलाई को मनाने का निर्णय लिया गया था। यह तय किया गया था कि जाति, रंग, लिंग, धर्म, नस्ल और अन्य किसी भी भेदभाव की परवाह किए बिना विभिन्न देशों के लोगों के बीच मित्रता का एक मजबूत बंधन स्थापित किया जाए।
अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस 2011 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इस दूरदर्शी सोच के साथ घोषित किया गया था कि लोगों, देशों, संस्कृतियों और व्यक्तियों के बीच दोस्ती शांति के प्रयासों को प्रेरित कर सकती है और समुदायों के बीच एक मजबूत पुल का निर्माण कर सकती है। यह प्रस्ताव भावी नेताओं के रूप में युवाओं को उन सामुदायिक गतिविधियों में शामिल करने पर विशेष जोर देता है, जिनमें विभिन्न संस्कृतियाँ शामिल हों और जो अंतर्राष्ट्रीय समझ व विविधता के लिए सम्मान को बढ़ावा देती हैं।
अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस को चिह्नित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सरकारों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और नागरिक समाज समूहों को ऐसे कार्यक्रमों, गतिविधियों और पहलों को आयोजित करने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो सभ्यताओं के बीच संवाद, एकजुटता, आपसी समझ और सुलह को बढ़ावा देने की दिशा में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के प्रयासों में योगदान करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस एक ऐसी पहल है, जो ‘संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO)’ द्वारा शांति की संस्कृति को मूल्यों, दृष्टिकोणों और व्यवहारों के एक ऐसे समूह के रूप में परिभाषित करने वाले प्रस्ताव का अनुसरण करती है, जो हिंसा को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं और समस्याओं को रोकने का प्रयास करते हैं। इसे बाद में 1997 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाया गया था।
मित्रता दिवस पर हम कई लोगों के हाथों में ‘फ्रेंडशिप बैंड (Friendship Band)’ बंधा हुआ पाते हैं। ऐसे फ्रेंडशिप बैंड, हमारे दिलों में एक विशेष स्थान रखते हैं। ये बैंड, केवल धागे या धातु के टुकड़ों से कहीं अधिक बढ़कर हैं। वे हमारे दोस्तों के साथ साझा किए जाने वाले मजबूत और अटूट बंधनों का प्रतीक हैं।
जब हम अपनी कलाई पर एक फ्रेंडशिप बैंड बांधते हैं या इसे किसी दोस्त को भेंट करते हैं, तो हम जुड़ाव का एक सुंदर संकेत दे रहे होते हैं। इन बैंडों को पहनने और आदान-प्रदान करने का कार्य हमारे बीच के भावनात्मक संबंधों की एक दृश्य याद दिलाता है। यह इस बात को स्वीकार करने का भी एक तरीका है कि भले ही हम शारीरिक रूप से दूर हों, हमारे दिल हमेशा जुड़े हुए हैं।
इसके अलावा, समय के साथ, ये बैंड संजोए जाने वाली अमूल्य निशानियाँ बनते हैं। वे सिर्फ साधारण वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि साझा अनुभवों, हँसी-मजाक और समर्थन की अनगिनत यादें अपने साथ रखते हैं। यह हँसी, मुश्किल समय में सहारा देने के लिए कंधे और हमारे दोस्तों द्वारा प्रदान की जाने वाली संगति के प्रति कृतज्ञता दिखाने का भी एक तरीका है।
दरअसल, फ्रेंडशिप बैंड अक्सर विभिन्न प्रकार के आकर्षक रंगों में आते हैं, और प्रत्येक रंग का अपना एक विशेष महत्व होता है। उदाहरण के लिए, लाल रंग प्रेम और जोश का प्रतीक हो सकता है, जबकि पीला रंग खुशी और सकारात्मकता का प्रतिनिधित्व करता है। अपने मित्र के व्यक्तित्व से मेल खाने वाले रंग को चुनना, इस हाव-भाव में एक व्यक्तिगत स्पर्श जोड़ता है। इसी तरह, खुद अपने हाथों से बनाए गए बैंड का अक्सर एक गहरा और अनूठा अर्थ होता है, क्योंकि वे उन्हें बनाने में लगाए गए प्रयास, समय और भावनाओं को अपने साथ समेटे होते हैं।
जब कोई व्यक्ति अपनी किशोरावस्था में कदम रखता है, तो वह अक्सर ही अपना अधिकांश समय, भाई-बहनों के साथ बिताने के बजाय अपने दोस्तों के साथ बिताना पसंद करता है। लेकिन यह भी एक सत्य है कि इस गतिशील और बदलती दुनिया में, कई बार हमारे सबसे अच्छे दोस्तों की जगह दूसरे लोग ले लेते हैं। इसके बावजूद, दोस्त हमारे सबसे बड़े विश्वासपात्र होते हैं, जिन पर हम भरोसा कर सकते हैं और अपने सबसे गहरे रहस्य साझा कर सकते हैं। कभी-कभी, हम उनसे वे बातें भी साझा करते हैं, जिन्हें हम अपने सगे भाई-बहनों के साथ साझा करने से हिचकिचाते हैं। हालांकि, जरूरत पड़ने पर कई बार दोस्तों से तुरंत मदद मिलना कठिन हो सकता है, जबकि भाई-बहन हर परिस्थिति में सबसे अधिक भरोसेमंद साबित होते हैं।
संक्षेप में कहा जाए तो, फ्रेंडशिप डे और रक्षाबंधन दोनों का अपना-अपना अनूठा और विशिष्ट महत्व है। किसी भी व्यक्ति के जीवन में दोनों ही मूल्यवान हैं। जहाँ एक ओर दोस्त जीवन रूपी बगीचे में खिले हुए सुंदर फूलों की तरह हैं, वहीं दूसरी ओर भाई-बहन उसी बगीचे के सच्चे संरक्षक होते हैं। दोस्त वे लोग होते हैं, जिनसे हमारा कोई खून का रिश्ता नहीं होता है, फिर भी वे हमारी असीम परवाह करते हैं। दूसरी ओर, भाई-बहनों के बीच का पवित्र बंधन जीवनभर हमारे साथ रहता है। हमें इन दोनों ही विशेष दिवसों को पूरे जोश और उल्लास के साथ मनाना चाहिए, क्योंकि किसी भी मनुष्य के जीवन में इन दोनों का ही अत्यधिक और अतुलनीय महत्व है।
जानें, रामपुर की हस्तनिर्मित वायलिन कैसे दुनिया तक अपनी अनूठी पहचान पहुँचा रही है
रामपुर भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा और प्रसिद्ध रामपुर-सहसवान घराने के लिए जाना जाता है। यह घराना अपनी विशिष्ट गायकी शैली के कारण हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। संगीत से इस गहरे जुड़ाव के साथ-साथ रामपुर, हस्तनिर्मित वायलिन बनाने की अपनी अनूठी परंपरा के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ दशकों से कारीगर बड़ी सावधानी और कौशल के साथ वायलिन तैयार करते आए हैं, जो भारत ही नहीं, विदेशों तक भी पहुँचते रहे हैं।
वायलिन दुनिया के सबसे अभिव्यंजक तंत्री वाद्यों में से एक माना जाता है। इसकी चार तारों पर धनुष (बो) चलाकर ध्वनि उत्पन्न की जाती है, जिससे कलाकार को अत्यंत कोमल, गंभीर और ऊर्जावान भावों को समान सहजता से व्यक्त करने का अवसर मिलता है। यही कारण है कि वायलिन पश्चिमी शास्त्रीय ऑर्केस्ट्रा, एकल प्रस्तुतियों, लोक संगीत और आधुनिक संगीत सहित अनेक विधाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसकी स्वर-सीमा और मानवीय आवाज़ जैसी अभिव्यक्ति इसे विश्वभर के संगीतकारों का प्रिय वाद्य बनाती है।
वायलिन की विविध अभिव्यक्तियों को समझने के लिए कुछ उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ देखी जा सकती हैं। विश्वविख्यात वायलिन वादक येहूदी मेनुहिन (Yehudi Menuhin) की प्रस्तुति इस वाद्य की मधुरता, संतुलन और भावपूर्ण शैली का सुंदर उदाहरण है। वहीं हिलरी हैन (Hilary Hahn) अपनी सटीक तकनीक और स्वच्छ प्रस्तुति के माध्यम से वायलिन की आधुनिक शैली को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं। भारतीय संदर्भ में डॉ. एल. सुब्रमण्यम ने भारतीय शास्त्रीय संगीत और पश्चिमी ऑर्केस्ट्रा के साथ अपने सहयोगों के माध्यम से यह दिखाया है कि वायलिन विभिन्न संगीत परंपराओं के बीच एक सशक्त सेतु बन सकता है।
आज वायलिन केवल पश्चिमी शास्त्रीय संगीत तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत में भी इसकी एक विशिष्ट पहचान बन चुकी है। रामपुर जैसे शहरों की शिल्प परंपरा और विश्वभर के कलाकारों की प्रस्तुतियाँ यह दर्शाती हैं कि संगीत और वाद्य दोनों ही सीमाओं से परे होते हैं। यदि आप वायलिन की मधुरता, तकनीकी दक्षता और भावपूर्ण अभिव्यक्ति का अनुभव करना चाहते हैं, तो ये प्रस्तुतियाँ इस वैश्विक वाद्य का उत्कृष्ट परिचय प्रदान करती हैं।
भारतीय रसायन विज्ञान के पितामह प्रफुल्ल चंद्र राय की अनसुनी कहानी
रसायन विज्ञान हमारे जीवन के हर हिस्से से जुड़ा हुआ है। सुबह उठकर इस्तेमाल किए जाने वाले टूथपेस्ट से लेकर हमारे भोजन, कपड़ों, दवाओं और वाहनों के ईंधन तक, हर जगह रासायनिक प्रक्रियाएं काम कर रही हैं। यहां तक कि हम जो हवा सांस के ज़रिए लेते हैं और जो पानी पीते हैं, वह भी हमारे पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने के लिए रासायनिक प्रतिक्रियाओं से गुज़रता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस जटिल विज्ञान की शुरुआत कहां से हुई और कैसे इसने आधुनिक रूप लिया?
प्राचीन काल में कैसे हुई रसायन विज्ञान की शुरुआत? इतिहासकारों के अनुसार, 'केमिस्ट्री' और 'अल्केमी' (alchemy) यानी कीमियागिरी शब्द मिस्र के प्राचीन नाम 'खेम' (chem) से लिए गए हैं। ईसा पूर्व 1000 तक, प्राचीन सभ्यताओं ने ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था जो आगे चलकर रसायन विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का आधार बनीं। कीमियागिरी रसायन विज्ञान की वह शाखा थी जिसमें तत्वों की छिपी हुई प्रकृति का अध्ययन किया जाता था।
दवाओं और जड़ी-बूटियों का विचार ईसा पूर्व 1000 से भी पहले के प्राचीन भारतीय वेदों में मिलता है। वहीं, चीनी कीमियागिरी का मानना था कि ब्रह्मांड में केवल पांच तत्व हैं - लकड़ी, आग, पृथ्वी, धातु और जल। इन्हें पाँच रंगों, पाँच दिशाओं और पाँच धातुओं जैसे सोना, चांदी, सीसा, तांबा और लोहे से जोड़ा गया था। इसके नतीजे में चीनी कीमियागिरी की हर तकनीक में पाँच चरणों को दोहराया जाता था। लगभग 420 ईसा पूर्व में, एम्पेडोकल्स (Empedocles) ने कहा था कि सभी पदार्थ चार मूलभूत तत्वों से बने हैं - पृथ्वी, आग, हवा और पानी। इसके बाद अरस्तू (Aristotle) ने तत्वों के गुणों का विचार विकसित किया और बताया कि विभिन्न प्रकार के पदार्थ गर्म, ठंडे, गीले और सूखे गुणों के एक विशिष्ट संतुलन पर निर्भर करते हैं।
आधुनिक रसायन विज्ञान के जनक कौन थे? रसायन विज्ञान को एक व्यवस्थित विज्ञान बनाने का श्रेय फ्रांसीसी वैज्ञानिक एंटोनी लेवोज़ियर को जाता है, जिन्हें आधुनिक रसायन विज्ञान का पिता कहा जाता है। 1789 में, उन्होंने द्रव्यमान संरक्षण का नियम स्थापित किया। लेवोज़ियर (Lavoisier) ने ही सबसे पहले यह साबित किया कि ऑक्सीजन दहन यानी जलने की प्रक्रिया में एक प्रमुख तत्व है और उन्होंने ही इस तत्व को इसका नाम दिया था। उन्होंने रासायनिक पदार्थों के नामकरण की आधुनिक प्रणाली भी विकसित की। उनकी वैज्ञानिक खोजों में उनकी पत्नी मैरी-ऐनी (Mary Anne) का भी बड़ा योगदान था, जिन्होंने उनके प्रयोगों के चित्र बनाए और उनके लिए अंग्रेज़ी के दस्तावेज़ों का अनुवाद किया।
लेवोज़ियर एक वैज्ञानिक होने के साथ-साथ एक फाइनेंसर और प्रशासक भी थे। उन्होंने कृषि उत्पादन पर व्यापक प्रयोग किए और वज़न और माप को एकीकृत करने वाले आयोग में भी काम किया, जिससे मीट्रिक प्रणाली को अपनाया जा सका। हालांकि, फ्रांसीसी क्रांति के दौरान 1794 में उन्हें उनके ससुर और अन्य कर संग्रहकर्ताओं के साथ गिलोटिन (Guillotine) से फांसी दे दी गई।
पीरियोडिक टेबल का निर्माण कैसे हुआ? तत्वों को एक क्रम में व्यवस्थित करने की दिशा में कई वैज्ञानिकों ने काम किया। 1789 में लेवोज़ियर ने तत्वों को धातु और गैर-धातु के रूप में समूहित करने का प्रयास किया था। इसके बाद जर्मन भौतिक विज्ञानी जोहान वोल्फगैंग डोबेराइनर (Johann Wolfgang Döbereiner) ने समान भौतिक और रासायनिक गुणों वाले तत्वों को तीन-तीन के समूह में रखा।
1860 में जर्मनी में हुए पहले अंतरराष्ट्रीय रसायन विज्ञान सम्मेलन में एक बड़ी सफलता मिली, जब तत्वों के परमाणु भार को हाइड्रोजन से तुलना करके तय करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद ब्रिटिश रसायनज्ञ जॉन न्यूलैंड्स (John Newlands) ने अष्टक नियम दिया। लेकिन सबसे क्रांतिकारी बदलाव 1869 में आया, जब रूसी रसायन वैज्ञानिक दिमित्री मेंडेलीव (Dmitri Mendeleev) ने आधुनिक पीरियोडिक टेबल का ढांचा तैयार किया। उन्होंने ज्ञात रासायनिक तत्वों को उनके बढ़ते परमाणु भार के क्रम में व्यवस्थित किया। मेंडेलीव की दूरदर्शिता इतनी सटीक थी कि उन्होंने अपनी टेबल में कुछ खाली जगहें छोड़ दीं और भविष्य में खोजे जाने वाले तत्वों के गुणों की पहले ही भविष्यवाणी कर दी। जब बाद में गैलियम (Gallium), स्कैंडियम (Scandium) और जर्मेनियम (Germanium) जैसे तत्व खोजे गए, तो मेंडेलीव की भविष्यवाणी बिल्कुल सच साबित हुई।
परमाणु क्रमांक की खोज ने कैसे बदली रसायन की दुनिया? 19वीं सदी तक उप-परमाणु कणों की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं थी। लेकिन 1913 में अंग्रेज़ भौतिक विज्ञानी हेनरी मोसले (Henry Moseley) ने एक्स-रे का उपयोग करके तत्वों की तरंग दैर्ध्य को मापा और इन मापों को उनके परमाणु क्रमांक से जोड़ा। मोसले ने साबित किया कि किसी तत्व के प्रमुख गुण उसके परमाणु भार से नहीं, बल्कि परमाणु क्रमांक से तय होते हैं। उन्होंने पीरियोडिक टेबल को परमाणु क्रमांक के आधार पर पुनर्व्यवस्थित किया, जिससे पुरानी कमियां दूर हो गईं। इसे मोसले का नियम कहा गया। मोसले का करियर बहुत छोटा रहा, क्योंकि 1914 में प्रथम विश्व युद्ध छिड़ने पर वे सेना में शामिल हो गए और 27 वर्ष की अल्पायु में तुर्की के गैलीपोली में एक स्नाइपर की गोली का शिकार हो गए।
ट्रांसयूरेनियम तत्वों की खोज में ग्लेन टी. सीबोर्ग का क्या योगदान रहा? रसायन विज्ञान के विस्तार में अमेरिकी परमाणु रसायनज्ञ ग्लेन टी. सीबोर्ग (Glenn T. Seaborg) का नाम बेहद अहम है। उन्हें मुख्य रूप से यूरेनियम से भारी तत्वों यानी ट्रांसयूरेनियम (Transuranium) तत्वों को अलग करने और पहचानने के लिए जाना जाता है। 1941 में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर प्लूटोनियम की खोज की। इसके अलावा उन्होंने अमेरिसियम (Americium), क्यूरियम (Curium), बर्केलियम (Berkelium), कैलिफोर्नियम (Californium), आइंस्टीनियम (Einsteinium), फर्मियम (Fermium), मेंडेलेवियम (Mendelevium) और नोबेलियम (Nobelium) जैसे कई नए तत्वों की खोज की।
ग्लेन थियोडोर सीबोर्ग
सीबोर्ग ने पीरियोडिक टेबल में एक्टिनाइड (Actinide) अवधारणा पेश की, जो मेंडेलीव के बाद पीरियोडिक टेबल में सबसे बड़ा बदलाव था। इस अभूतपूर्व कार्य के लिए उन्हें 1951 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके सम्मान में एक तत्व का नाम सीबोर्गियम (Seaborgium) रखा गया। यह पहली बार था जब किसी जीवित वैज्ञानिक के नाम पर किसी तत्व का नामकरण हुआ।
भारतीय रसायन विज्ञान के पितामह कौन हैं? जब हम रसायन विज्ञान के इतिहास की बात करते हैं, तो भारत के महान वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय का नाम गर्व से लिया जाता है। उन्हें भारतीय रसायन विज्ञान का जनक कहा जाता है। बचपन से ही मेधावी रहे प्रफुल्ल चंद्र राय ने एडिनबर्ग विश्वविद्यालय से अपनी उच्च शिक्षा पूरी की।
उन्हें अकार्बनिक और कार्बनिक नाइट्राइट पर उनके गहन शोध के लिए जाना जाता है और उन्हें मास्टर ऑफ नाइट्राइट्स (Master of Nitrites) की उपाधि दी गई थी। 1896 में उन्होंने एक स्थिर यौगिक मरक्यूरस नाइट्राइट की खोज की, जिसने धातुओं के नाइट्राइट की संरचना और संश्लेषण के शोध की नींव रखी। वे न केवल एक बेहतरीन वैज्ञानिक थे, बल्कि वे प्राचीन भारतीय विज्ञान और आधुनिक विज्ञान को एक साथ जोड़ने के प्रबल पक्षधर भी थे। उनकी लिखी पुस्तक 'ए हिस्ट्री ऑफ हिंदू केमिस्ट्री' (A History of Hindu Chemistry) उनके इसी दृष्टिकोण का परिचायक है।
हमारे दैनिक जीवन में रसायन विज्ञान का क्या महत्व है? आज रसायन विज्ञान हमारी दिनचर्या का एक अभिन्न अंग बन चुका है। हम जो खाना खाते हैं, उसमें मौजूद प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा को समझने में रसायन विज्ञान मदद करता है। बाज़ार में मिलने वाले ठंडे पेय पदार्थों और आइसक्रीम में मिठास लाने के लिए एस्पार्टेम (Aspartame), सुक्रालोज़ (Sucralose) और नियोटेम (Neotame) जैसी कृत्रिम मिठास का इस्तेमाल होता है। दवाओं के निर्माण में रसायन विज्ञान की बदौलत ही हम संक्रमण से लड़ने वाले एंटीबायोटिक्स और दर्द निवारक दवाएं बना पाए हैं।
हमारे घरों में इस्तेमाल होने वाले साबुन और डिटर्जेंट भी रासायनिक प्रतिक्रियाओं का ही परिणाम हैं। साबुन बनाने की प्रक्रिया में वसा या तेल की क्षार के साथ प्रतिक्रिया होती है, जिसे साबुनीकरण कहा जाता है। पानी में घुलने पर साबुन मिसेल बनाता है, जो गंदगी और तेल को फंसाकर बाहर निकाल देता है। सफाई में एनायनिक (Anionic) डिटर्जेंट जैसे सोडियम लॉरिल सल्फेट (Sodium Lauryl Sulfate) और कैटायनिक (Cationic) डिटर्जेंट जैसे सेटिलपिरिडिनियम क्लोराइड (Cetylpyridinium Chloride) का व्यापक उपयोग होता है।
सौंदर्य प्रसाधनों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए पैराबेंस (Parabens), फेनोक्सीथेनॉल (Phenoxyethanol) और सोर्बिक एसिड (Sorbic Acid) जैसे प्रिजर्वेटिव्स मिलाए जाते हैं, जो बैक्टीरिया और फंगस को पनपने से रोकते हैं। इसी तरह, त्वचा को सूरज की हानिकारक यूवीए और यूवीबी किरणों से बचाने के लिए सनस्क्रीन में खास रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, जो त्वचा को झुर्रियों और सनबर्न जैसी समस्याओं से बचाते हैं।
कुल मिलाकर, प्राचीन कीमियागिरी की रहस्यमयी दुनिया से निकलकर रसायन विज्ञान आज एक ऐसा व्यावहारिक विज्ञान बन चुका है, जिसके बिना आधुनिक जीवन की कल्पना करना भी असंभव है। यह ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने के साथ-साथ हमारे दैनिक जीवन को आसान और सुरक्षित बनाने में एक निर्णायक भूमिका निभा रहा है।
रोहिल्ला पठानों से लेकर भारत गणराज्य तक जानिए रामपुर रियासत की पूरी कहानी
उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक शहर रामपुर अपने प्रसिद्ध रामपुरी चाकू और मीठे ज़ायकों के लिए तो जाना ही जाता है, लेकिन इसका राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास इससे कहीं अधिक गहरा और दिलचस्प है। मध्यकाल में कभी दिल्ली क्षेत्र का हिस्सा रहा रामपुर, 18वीं शताब्दी में उत्तर भारत की एक प्रमुख शक्ति बन कर उभरा। यह शहर केवल नवाबों का शहर नहीं है, बल्कि यह उन अफ़ग़ान रोहिल्ला योद्धाओं की भी कहानी है जिन्होंने अपनी तलवारों और कूटनीति से इतिहास में एक अलग मुकाम बनाया और अंततः 1949 में स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में खुद को समाहित कर लिया।
रोहिल्ला कौन थे और रामपुर रियासत की स्थापना कैसे हुई? रोहिल्ला मुख्य रूप से अफ़ग़ान पठान (Afghan Pashtuns) थे, जो 16वीं और 18वीं शताब्दी के बीच हिंदू कुश, खैबर और काबुल जैसे पहाड़ी इलाकों से भारत आए थे। 'रोह' का अर्थ होता है पहाड़, इसलिए इन्हें 'पहाड़ों के लोग' या रोहिल्ला कहा गया। वे भारत में मुख्य रूप से सैनिकों और घुड़सवारों के रूप में आए थे, लेकिन मुगल साम्राज्य के पतन के दौरान उन्होंने अपनी सैन्य शक्ति के बल पर बरेली, मुरादाबाद और बदायूं जैसे क्षेत्रों में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया, जिसे 'रोहिलखंड' कहा गया। अली मुहम्मद खान को रोहिलखंड का असली वास्तुकार माना जाता है, जिन्होंने बिखरे हुए अफ़ग़ान कबीलों को एकजुट किया।
लेकिन रोहिल्लाओं का यह स्वतंत्र शासन लंबे समय तक नहीं चल सका। 1774 में 'प्रथम रोहिल्ला युद्ध' (First Rohilla War) हुआ। यह युद्ध तब शुरू हुआ जब रोहिल्लाओं ने मराठों के खिलाफ सैन्य सहायता के बदले अवध के नवाब को चुकाए जाने वाले कर्ज से इनकार कर दिया। वारेन हेस्टिंग्स (Warren Hastings) द्वारा भेजी गई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) की सेना की मदद से अवध के नवाब ने रोहिल्लाओं को हरा दिया और उन्हें उनकी राजधानी बरेली से खदेड़ दिया। इस युद्ध में महान रोहिल्ला नेता हाफिज रहमत खान मारे गए।
इसी हार के बाद, 7 अक्टूबर 1774 को ब्रिटिश कमांडर कर्नल चैंपियन (Commander Colonel Champion) की मौजूदगी में एक समझौते के तहत नवाब फैजुल्लाह खान ने रामपुर रियासत की स्थापना की। इसके बाद से रामपुर ब्रिटिश संरक्षण के तहत एक रियासत बन गया।
रामपुर शहर का विकास और नवाबों का शासन कैसा रहा? नवाब फैजुल्लाह खान ने 1775 में रामपुर में एक नए किले की नींव रखी और इस तरह वर्तमान रामपुर शहर की स्थापना हुई। शुरुआत में इसे कठेर (Kather) नामक चार गांवों के समूह पर बसाया गया था। नवाब इसका नाम 'फैज़ाबाद' रखना चाहते थे, लेकिन इस नाम के अन्य शहर पहले से मौजूद थे, इसलिए इसका नाम मुस्तफाबाद उर्फ रामपुर रखा गया।
नवाब फैजुल्लाह खान ने 20 वर्षों तक शासन किया। वे एक महान विद्वान थे और उन्होंने अरबी, फारसी, तुर्की और उर्दू पांडुलिपियों का एक विशाल संग्रह शुरू किया, जो आज विश्व प्रसिद्ध 'रामपुर रज़ा लाइब्रेरी' (Rampur Raza Library) का मुख्य हिस्सा है। उनके बाद नवाब मुहम्मद सईद खान, यूसुफ अली खान, और कलब अली खान जैसे शासकों ने रामपुर को शिक्षा, न्याय और वास्तुकला का एक प्रमुख केंद्र बनाया। 1865 में नवाब बने कलब अली खान (Kalb Ali Khan) ने ही रामपुर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद का निर्माण कराया था।
1889 में नवाब बने हामिद अली खान (Hamid Ali Khan) ने 1905 में किले के भीतर एक शानदार 'दरबार हॉल' बनवाया, जहां आज रज़ा लाइब्रेरी की अनमोल पांडुलिपियां रखी हुई हैं। इन नवाबों ने संगीत को भी खूब बढ़ावा दिया। उस्ताद इनायत हुसैन खान जैसे दिग्गजों ने यहीं से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के 'रामपुर-सहसवान घराने' (Rampur-Sahaswan Gharana) की नींव रखी।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में रामपुर की भूमिका क्या थी? 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रामपुर के नवाबों की राजनीतिक स्थिति बहुत जटिल थी। चूंकि रामपुर रियासत ब्रिटिश संरक्षण के तहत चल रही थी, इसलिए नवाबों ने 1857 के विद्रोह में ब्रिटिश सरकार का साथ दिया था। इस वफादारी के कारण अंग्रेजों ने उन्हें उत्तर भारत में अपने राजनीतिक और सांस्कृतिक मामलों को जारी रखने की छूट दी। हालांकि, इसी दौरान नवाबों ने मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार से विस्थापित हुए कई महान साहित्यकारों और शायरों को रामपुर में पनाह भी दी, जिससे रामपुर उर्दू अदब का एक बड़ा केंद्र बन गया।
ब्रिटिश शासन का अंत और रामपुर का भारत में विलय कैसे हुआ? 1930 में रज़ा अली खान (Raza Ali Khan) रामपुर के अंतिम शासक नवाब बने। वे एक प्रगतिशील शासक थे जिन्होंने हिंदुओं के समावेश में विश्वास किया और लेफ्टिनेंट कर्नल होरीलाल वर्मा को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया।
अगस्त 1947 में जब भारत को ब्रिटिश हुकूमत से आज़ादी मिली, तब रामपुर सहित देश की 500 से अधिक रियासतों के सामने एक बड़ा सवाल था—स्वतंत्र भारत में शामिल होना या अलग रहना। तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की कूटनीति और भारत के एकीकरण की प्रक्रिया के तहत, रामपुर रियासत ने स्वतंत्र भारत में विलय का फैसला किया।
1 जुलाई 1949 को रामपुर रियासत आधिकारिक तौर पर भारत गणराज्य (Republic of India) में विलीन हो गई और बाद में इसे उत्तर प्रदेश (पहले संयुक्त प्रांत) के एक ज़िले के रूप में मान्यता मिली। आज रामपुर के किले के द्वार और नवाबों के महल भले ही जर्जर हो रहे हों, लेकिन इस शहर की रज़ा लाइब्रेरी, इसका संगीत और इसकी मिली-जुली अफ़ग़ान-भारतीय संस्कृति आज भी दुनिया भर के विद्वानों और पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है। रामपुर की यह कहानी एक कबीले के संघर्ष, कूटनीति और अंततः एक मजबूत लोकतंत्र के प्रति समर्पण की अद्भुत मिसाल है।
अन्य देशों की तरह समुद्री संप्रभुता सुनिश्चित करने हेतु, भारत ने कैसे बनाया विक्रांत युद्धपोत?
विशाल समुद्र में भी लड़ाकू विमानों को आधार प्रदान करने तथा उड़ने या उतरने हेतु पथ प्रदान करके, युद्धपोत (Warship) रोमांचक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। आज हम उनके बारे में ही पढ़ेंगे। युद्धपोत, सैन्य बलों की समुद्री पानी से तटीय क्षेत्रों तक आवाजाही को सुनिश्चित करते हैं, जहां उन्हें उतारा जा सकता है और दुश्मन ताकतों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। वे दुश्मन के हमले से व्यापारिक जहाज़ों की रक्षा करते हैं; दुश्मन को सैन्य बलों के परिवहन के लिए समुद्र का उपयोग करने से रोकते हैं; एवं उनके व्यापारी जहाज़ों पर हमला भी कर सकते हैं। नौसैनिक जहाजों का उपयोग नाकाबंदी में भी किया जाता है, यानी, दुश्मन को युद्ध के लिए आवश्यक वस्तुओं को समुद्र के रास्ते आयात करने से रोका जा सकता है।
इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए, नौसेना जहाजों को प्राचीन काल से ही व्यापारिक जहाजों की तुलना में अधिक तेज़, मजबूत और आक्रामक हथियार ले जाने में सक्षम बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। जबकि, आधुनिक युग में क्राफ़्ट (Craft) शब्द, उन छोटे सतही जहाजों को सूचित करने लगा है, जो आमतौर पर तटीय जल में संचालित होते हैं।
सबसे पुराने युद्धपोत लगभग 5,000 साल पहले ग्रीस और मिस्र में उभरे थे। पहले रिकॉर्ड किए गए युद्धपोतों का उपयोग नील नदी पर किया गया था। मूल रूप से वे सरकंडों से बने होते थे, और बाद में लकड़ी के समुद्री जहाजों में विकसित हुए। तब, संकीर्ण एवं तेज़ ‘लंबे जहाज’ (युद्धपोत) और चौड़े एवं भारी ‘गोल जहाज’ (व्यापारी जहाज) अलग–अलग थे।
ग्रीक नौसैनिक शक्ति, ट्राइरेम (Triremes) के विकास के साथ चरम पर थी, जिसने युद्धपोतों की मदद से 480 ईसा पूर्व में सलामिस की लड़ाई (Battle of Salamis) जीती थी। ट्राइरेम, अधिकतम मानव बाहुबल, भारी कील द्वारा समर्थित एक कांस्य मेढ़ा और दुश्मन के जहाजों पर चढ़ने हेतु नौसैनिकों के लिए एक पुल पर निर्भर था। बाद में विभिन्न देशों में चली हथियारों की होड़ के कारण बड़े पैमाने पर मल्टी-बैंक्ड जहाज (Multibanked ships) आए, और अस्थायी लकड़ी के बुर्जों के साथ-साथ भारी मिसाइल हथियारों की शुरूआत हुई।
भारी तोपखाने की शुरूआत के लिए मजबूत एवं बड़ी पतवार की आवश्यकता थी। इनमें से कुछ जहाज, हवा के द्वारा भी संचालित होते थे, क्योंकि इनकी पाल पर बड़े कपड़े लगाए जाते थे। फिर कुछ वर्षों बाद, जहाज पाल से भाप इंजन की ओर परिवर्तित हुए, और उन्होंने अंततः पानी के नीचे मौजूद प्रोपेलर (Propeller) को अपनाया। क्योंकि लकड़ी के पतवार, अब विस्फोटक गोलों का सामना नहीं कर सकते थे। शुरुआत में, नौसेनाओं ने लकड़ी के जहाजों पर लोहे की परतें चढ़ाई, जिससे लोहे की परत वाले जहाजों का विकास हुआ। अंततः, युद्धपोतों का निर्माण पूरी तरह से लोहे और स्टील से किया जाने लगा।
फिर, भाप टर्बाइनों और आंतरिक दहन इंजनों ने पारंपरिक भाप इंजनों की जगह ले ली, और नौसेनाएं कोयला जलाने से तेल जलाने की ओर परिवर्तित हो गईं। इससे युद्धपोतों की गति और परिचालन सीमा में काफी सुधार हुआ।
सन 1850 से लेकर वर्तमान समय तक, नौसैनिक विकास में तकनीकी नवाचारों और बदलती युद्ध रणनीतियों के कारण महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में लकड़ी के नौकायन जहाजों से लेकर, भाप से चलने वाले जहाजों में परिवर्तन हुआ, जिससे लोहे से बने युद्धपोतों की शुरुआत हुई। इसी सदी के अंत तक, युद्धपोत प्रमुख नौसैनिक बल बन गए, लेकिन बीसवीं सदी में पनडुब्बियों, विमानों और विमान वाहकों के उद्भव के साथ एक आदर्श बदलाव देखा गया।
प्रथम विश्व युद्ध ने टॉरपीडो (Torpedoes) और डिस्ट्रॉयर (Destroyers) जैसे जहाजों को उत्प्रेरित किया, जबकि द्वितीय विश्व युद्ध में विमानवाहक पोत ने युद्धपोतों को प्रतिस्थापित करते हुए, नौसैनिक रणनीतियों को नया आकार दिया। युद्ध के बाद के युग में, परमाणु ऊर्जा की शुरूआत ने पनडुब्बियों और विमान वाहक में क्रांति ला दी, जिससे विस्तारित संचालन और अधिक क्षमताओं की अनुमति मिली। इसके अतिरिक्त, निर्देशित हथियारों और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के उदय ने नौसैनिक क्षमताओं को बदल दिया।
दरअसल, विमान वाहक युद्धपोत चार बुनियादी कार्य करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं:
1. विदेशों में विभिन्न प्रकार के विमानों का परिवहन करना।
2. हवाई जहाजों को लॉन्च और लैंड कराना।
3. सैन्य अभियानों के लिए एक गतिमान नियंत्रण केंद्र के रूप में कार्य करना। और,
4. कर्मी दल को घर जैसा आश्रय देना।
इन कार्यों को पूरा करने हेतु युद्धपोत पर एक जहाज, एक वायु सेना आधार, एवं एक छोटे शहर के तत्वों को संयोजित करने की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, इसमें निम्नलिखित तत्व शामिल होते हैं:
1. उड़ान डेक (Deck) – यह जहाज के शीर्ष पर एक सपाट सतह है, जहां विमान उड़ान भर सकता है और उतर सकता है।
2. हैंगर डेक (Hanger deck) – विमान उपयोग में न होने पर यहां रखे जाते हैं। यह मुख्य डेक के नीचे स्थित होता है।
3. आइलैंड (Island) - यह उड़ान डेक के शीर्ष पर स्थित एक इमारत है, जहां से अधिकारी उड़ान और जहाज संचालन को निर्देशित कर सकते हैं।
4. चालक दल के रहने और काम करने के लिए कमरे।
5. नाव को एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने, और पूरे जहाज के लिए बिजली उत्पन्न करने के लिए एक बिजली संयंत्र और प्रोपेलेंट प्रणाली।
6. भोजन और ताज़ा पानी उपलब्ध कराने वाली प्रणालियां, रेडियो और टेलीविजन स्टेशन, अखबार केंद्र, मलप्रवाह-पद्धति, कचरा व्यवस्थापन प्रणाली, आदि।
7. पतवार - यह जहाज का मुख्य भाग है, जो पानी में तैरता है। पानी की रेखा के नीचे रहने वाला पतवार का भाग, गोल और अपेक्षाकृत संकीर्ण होता है, जबकि पानी के ऊपर का भाग विस्तृत डेक बनाने के लिए बड़ा होता है।
इन सुविधाओं के कारण, सैनिकों और शस्त्रागारों के परिवहन हेतु वाहनों के रूप में जहाजों के उपयोग से लेकर, स्वचालित हथियारों को पेश करने तक, नौसैनिक युद्ध में काफी प्रगति हुई है। समुद्र में एक रणनीतिक योजना और सामरिक कार्यान्वयन, नौसैनिक युद्ध में जीत हासिल करने में मदद कर सकता है। हालांकि, इसका गलत उपयोग रोकना भी महत्वपूर्ण था। अतः ‘नौसैनिक युद्ध कानून’ सामने आया। इसकी उत्पत्ति का पता 1856 में लगाया जा सकता है। इसमें कई नियम शामिल किए गए, एवं संशोधन भी हुए। अंततः नौसैनिक युद्ध के लिए पहले जिनेवा कन्वेंशन (Geneva Conventions), 1949 में निर्धारित नियमों को अपनाना गया। इस कन्वेंशन को फिर एक बार संशोधित किया गया, और 1907 में हेग कन्वेंशन (Hague Convention) द्वारा प्रतिस्थापित किया गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित विमान वाहक बड़े थे, और उनमें बख्तरबंद उड़ान डेक थे। आधुनिक काल में आए जेट विमानों ने अपने अधिक वजन, धीमी गति, उच्च लैंडिंग गति और अधिक ईंधन खपत के कारण कुछ समस्याएं पैदा की थी, लेकिन इनसे निपटते हुए भी, वैसे युद्धपोत बनाए गए। उदाहरण के लिए, 24 सितंबर, 1960 को संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा पहला परमाणु-संचालित वाहक – एंटरप्राइज़ (Enterprise) लॉन्च किया था। ऐसी संयुक्त क्षमताओं वाले वाहकों को ‘बहुउद्देशीय वाहक’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
इसके अलावा, अमेरिकी नौसेना के ‘यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड (USS Gerald R. Ford)’ परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत को 2017 में कमीशन किया गया था। यह गेराल्ड आर. फोर्ड श्रेणी का प्रमुख जहाज है, और 1 लाख टन से अधिक वजन के विस्थापन और 1,106 फीट (337 मीटर) की लंबाई के साथ अब तक का सबसे बड़ा युद्धपोत है।
इसी कड़ी में, भारत ने भी अपने पहले स्वदेशी विमान वाहक - विक्रांत को लॉन्च करके एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। इसे भारतीय नौसेना के आन्तरिक वॉरशिप डिज़ाइन ब्यूरो (Warship Design Bureau) द्वारा डिज़ाइन किया गया है। जबकि बंदरगाह, शिपिंग और जलमार्ग मंत्रालय के तहत सार्वजनिक शिपयार्ड - कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा इसका निर्माण किया गया है। विक्रांत को अत्याधुनिक स्वचालन सुविधाओं के साथ बनाया गया है। यह भारत के समुद्री निर्माण इतिहास में अब तक बना, सबसे बड़ा जहाज है।
इस जहाज में बड़ी संख्या में स्वदेशी उपकरण और मशीनरी हैं। नौसेना में विक्रांत जहाज के शामिल होने से, भारत को दो परिचालन विमान वाहक मिलेंगे, जिससे देश की समुद्री सुरक्षा में काफी सुधार होगा। यह देश के "आत्मनिर्भर भारत" के लक्ष्य का एक शानदार उदाहरण है, और सरकार की "मेक इन इंडिया" पहल को गति देता है। विक्रांत पोत के साथ, भारत देशज स्तर पर विमानवाहक पोत के डिजाइन और निर्माण की विशेष क्षमता वाले देशों के एक विशिष्ट समूह में शामिल हो गया है, जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन शामिल हैं।
असम राज्य की सुंदर एवं अनूठी, मुखौटे बनाने की शिल्पकला के बारे में जानना हमारे लिए है महत्वपूर्ण
रामपुर, क्या आप इस तथ्य से अवगत है कि, असम की नाट्य कलाएं सदियों से चली आ रही एक समृद्ध विरासत का दावा करती हैं, जो नौवीं शताब्दी के मंदिर नृत्य परंपराओं से लेकर भाओना नाटक जैसे प्रतिष्ठित रूपों में विकसित हुई है। इस विकास को पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी के संत और समाज सुधारक, श्रीमंत शंकरदेव द्वारा आकार दिया गया था। चलिए, आज इसके बारे में जानकारी पाते हैं।
शंकरदेव जी ने नव-वैष्णववाद (भक्ति आंदोलन) के दर्शन को बढ़ावा दिया, और उन्होंने ‘सत्र संस्थानों’ की स्थापना की। शंकरदेव ने बाद में इन सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रथाओं को माजुली पर केंद्रित किया, जो ब्रह्मपुत्र नदी की ऊपरी पहुंच में एक प्रमुख नदी द्वीप है। इस कारण, माजुली, नव-वैष्णव परंपराओं में गहराई से निहित, विश्व स्तर पर प्रशंसित सांस्कृतिक केंद्र बन गया है। यह द्वीप एक जटिल सांस्कृतिक जाल को संरक्षित करता है, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं:
1. यहां सत्र संस्थाएं और नामघर के मठ और प्रार्थना कक्ष, आध्यात्मिक नींव के रूप में कार्य करते हैं।
2. यहां का मौखिक साहित्य, पीढ़ीगत रूप से प्रसारित लोककथाओं और परंपराओं से बना है।
3. कुछ जीवंत नृत्य-नाटक जैसी प्रदर्शन कलाएं, धार्मिक शिक्षाओं और स्थानीय समुदाय को जोड़ती हैं।
4. यहां मुख शिल्प भी प्रसिद्ध है, जो मुखौटा बनाने की एक पारंपरिक कला है।
सोलहवीं शताब्दी से निर्मित मुख शिल्प, माजुली के सबसे प्रसिद्ध शिल्पों में से एक है। शंकरदेव जी ने नाट्य प्रदर्शनों में मुखौटों की शुरुआत की थी। इनका उपयोग, विशेष रूप से उनके पारंपरिक एकांकी नाटक - अंकिया नाट में किया जाता था। इससे अभिनेताओं को पौराणिक पात्रों को स्पष्ट रूप से चित्रित करने में मदद मिली।
जबकि आधुनिक पारंपरिक मुखौटे बांस से जुड़े हुए हैं, ऐतिहासिक साक्ष्य से पता चलता है कि, मुख शिल्प बनाने की तकनीक बांस की तकनीक से पहले की है। मूल रूप से, कारीगरों ने लकड़ी और शोलापिथ पेड़ से जटिल विवरण उकेरे थे। लेकिन, अंततः बांस की ओर हुआ बदलाव, समय के साथ स्थानीय कारीगरों की अनुकूलन क्षमता, संसाधनशीलता और रचनात्मक विकास को दर्शाता है।
आधुनिक समय में, माजुली की मुखौटा बनाने की विरासत, स्थानीय धार्मिक प्रदर्शन से अंतर्राष्ट्रीय प्रशंसा में परिवर्तित हो गई है। आधुनिक मुखौटों में जटिल इंजीनियरिंग होती है, जो कलाकारों को चेहरे के अंगों में हेरफेर करने, तथा उन्नत अभिव्यक्ति के लिए आंखों और मुंह को हिलाने की अनुमति देती है। व्यावसायीकरण ने इस शिल्प को एक व्यवहार्य आजीविका में बदल दिया है, जिससे स्थानीय कलाकारों को वित्तीय सशक्तिकरण मिला है। इससे युवा पीढ़ी इस व्यापार को सीखने के लिए आकर्षित हुई है। दूसरी ओर, पारंपरिक रंगमंच से परे, ये मुखौटे अब त्योहार की सजावट, घर की सजावट, बैठकों और व्यावसायिक उपहारों के लिए व्यापक रूप से उत्पादित किए जाते हैं।
इसके साथ ही, लंदन में ब्रिटिश संग्रहालय सहित, अन्य प्रतिष्ठित वैश्विक स्थानों पर इस मुख शिल्प की लगी प्रदर्शनियां, असम की मुखौटा निर्माण विरासत के स्थायी सांस्कृतिक मूल्य और कलात्मक उत्कृष्टता को रेखांकित करती हैं।
सत्रीय परंपरा में, इन मुखौटों को उनके आकार, संरचना और चरित्र सार के आधार पर दो मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:
1. लौकिक (सांसारिक) मुखौटे, भौतिक, सांसारिक क्षेत्र के पात्रों का प्रतिनिधित्व करने के लिए तैयार किए जाते हैं। इसमें मनुष्य और विभिन्न जानवरों के मुख शामिल हैं।
2. अलौकिक मुखौटे, विशेष रूप से अलौकिक गुणों और गहरे पौराणिक महत्व वाले पात्रों, जैसे कि - देवताओं, राक्षसों और पौराणिक प्राणियों के लिए बनाए जाते हैं।
मुख शिल्प में महाकाव्य और पौराणिक आकृतियों से संबंधित कई मुखौटे बनाए गए हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
• देवता और दिव्य प्राणी: ब्रह्मा, हंस, गणेश, गरुड़, हनुमान और जम्बूवंत।
• अवतार: वराह और नरसिंह।
• राक्षस और विरोधी: दस सिर वाला रावण, कुंभकर्ण, तारक, मारीच, पूतना, बकासुर, अघासुर, धेनुकासुर और बत्सासुर।
• पौराणिक जीव और प्राणी: जटायु, चक्रवत, और कालिया नाग।
इन्हीं मुखौटों में आधुनिक नवाचार एवं स्थिरता भी आई है। लुतुकोरी मुखों और कठपुतली जैसे तंत्रों को शामिल करते हुए, नए मुखौटे कार्यात्मक आंख और होंठ की गतिविधियों को सक्षम करते हैं। इनके डिजाइन आज व्यावहारिक बनाए जा रहे हैं, ताकि, आसान परिवहन की अनुमति मिले। ये संरचनात्मक नवाचार, कला की व्यावसायिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं। शैक्षिक कार्यशालाओं के संगठन और छोटे तथा लोकप्रिय सजावटी शिल्पों के निर्माण ने भी इनकी अपील को बढ़ाया है।
ऐसे सुंदर मुख शिल्प बनाने में उपयोग किए जाने वाले उपकरण और सामग्रियां स्थानीय रूप से प्राप्त होती हैं। इनमें बांस, मिट्टी, कपड़ा, कागज, बेंत, जूट, गाय का गोबर, आदि शामिल हैं। कारीगर स्थानीय बांस की किस्म का उपयोग करते हैं, जिसे ‘जतिबाण’ के नाम से जाना जाता है। रंग भरने के लिए प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है।
मुखौटे बनाने के चरण:
1. आधार संरचना:
यह प्रक्रिया बांस का एक ढांचा बनाने से शुरू होती है। पात्र की चेहरे की विशेषताओं और भावों को प्रतिबिंबित करने के लिए, सबसे पहले बांस को काटा जाता है, उसे आकार दिया जाता है, और इस प्रकार एक मजबूत ढांचा बनाया जाता है।
2. मिट्टी का अनुप्रयोग:
मुखौटे को आकार देने, और बांस की सतह को चिकना करने के लिए इस पर मिट्टी और गाय के गोबर का मिश्रण लगाया जाता है। स्थायित्व सुनिश्चित करने के लिए, प्रत्येक परत के बाद इसे धूप में सुखाया जाता है। एक बार सूखने के बाद, मुखौटे को चेहरे का विवरण बनाने के लिए तैयार किया जाता है।
3. कागज लुगदी की परत:
मिट्टी की परत पर, कागज के गूदे और पानी से बना पेस्ट लगाया जाता है। यह लंबे भाओना प्रदर्शन के दौरान, कलाकारों के लिए मुखौटे को हल्का और आरामदायक बनाता है।
4. पेंटिंग और विवरण:
फिर मुखौटों को सावधानीपूर्वक प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता है। उदाहरण के लिए, दानव मुखौटों को उनके उग्र स्वभाव को प्रतिबिंबित करने के लिए स्पष्ट, गहरे और उग्र हाव-भाव दिए जाते हैं।
ये जीवित परंपराएं पूरे असम क्षेत्र में हिंदू वैष्णव मान्यताओं और संस्कृति के प्रसार एवं रखरखाव में सहायक रही हैं। जैसा कि हमने ऊपर पढ़ा हैं, ये मुखौटे अंकिया नाट भाओना का एक महत्वपूर्ण तत्व हैं। मूल रूप से, रात भर प्रस्तुत किया जाने वाला अंकिया भाओना प्रदर्शन अब केवल कुछ घंटों तक चलता है। इन नाटकों में हिंदू महाकाव्यों और पौराणिक कथाओं - महाभारत, रामायण और भागवत पुराण - की कहानियों को दर्शाया गया है, जिसमें मुखौटे उन कहानियों और पात्रों का नाटकीय चित्रण करते हैं।
असम के पारंपरिक हस्तशिल्प उत्पाद अत्यधिक व्यावहारिक और सांस्कृतिक मूल्य रखते हैं, जो स्थानीय लोगों के दैनिक जीवन में सहजता से एकीकृत हो जाते हैं। अपनी सौंदर्यात्मक अपील से परे, ये शिल्प कई ग्रामीण परिवारों की आजीविका को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह जटिल शिल्प कौशल परंपरा, सांस्कृतिक संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आर्थिक भलाई के बीच एक मजबूत व पारस्परिक रूप से मजबूत संबंध बनाती है।
दरअसल, संत-सुधारक श्री शंकरदेव द्वारा लिखित अभूतपूर्व नाटक - सिहना यात्रा ने उन पात्रों के लिए मुखौटे पेश करके एक ऐतिहासिक मील का पत्थर चिह्नित किया था, जिन्हें मानव चेहरे प्रभावी ढंग से चित्रित नहीं कर सकते थे (जैसे कि - गरुड़, चार सिर वाले ब्रह्मा, और भगवान शिव)। यह अभिनव प्रथा जल्द ही रामायण जैसे अन्य प्रमुख महाकाव्यों तक फैल गई, जिसमें रावण, कुंभकर्ण, सूर्पणखा, जटायु, तारक, मारीच, सुबाहु, सुग्रीव और भगवान विष्णु के दस अवतारों जैसे जटिल पात्रों को जीवंत किया गया।
हालांकि, इन मुखौटों के लिएं वर्तमान समय थोड़ा जटिल है। मुखौटा निर्माण से जुड़ी वित्तीय चुनौतियां, इच्छुक कलाकारों को इसे पूर्णकालिक पेशे के रूप में अपनाने से हतोत्साहित कर सकती हैं। वित्तीय सहायता की कमी एवं स्थापित कलाकारों के लिए एक स्थिर आय स्रोत की अनुपस्थिति, एक ऐसा वातावरण बनाती है, जो इस कला रूप की स्थिरता को हतोत्साहित करती है।
इसके अलावा, मानसून के दौरान ये मुखौटे नहीं बनाए जा सकते हैं, क्योंकि उनको सूरज की रोशनी में सुखाना पड़ता है। इस आवश्यकता ने, माजुली में मुखौटा बनाने की आजीविका गतिविधि को, वर्ष के केवल कुछ महीनों तक ही सीमित कर दिया है। माजुली द्वीप पर मुखौटा बनाने में संलग्न पारंपरिक कारीगरों और युवाओं के सामने, एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती गुणवत्ता, प्रौद्योगिकी तथा बाजार गतिशीलता की कमी है। बदलती सांस्कृतिक गतिशीलता और पर्यावरणीय चिंताएं, कुछ अन्य चुनौतियां हैं।
पारंपरिक कारीगरों और युवा पीढ़ी को सशक्त बनाने के लिए, इन जोखिमों को संबोधित करना महत्वपूर्ण है। जबकि इस कला रूप को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं, इसकी स्थिरता, परंपरा और अनुकूलन के बीच एक नाजुक संतुलन पर निर्भर करती है। सरकारी निकायों और सांस्कृतिक संगठनों ने कारीगरों को समर्थन देने के लिए कार्यशालाएं, प्रदर्शनियां और दस्तावेज़ीकरण पहल आयोजित करना शुरू कर दिया है। कुछ कलाकारों ने घर की सजावट, संग्रहालय प्रदर्शन और समकालीन स्थापनाओं के लिए मुखौटे बनाने में भी विविधता लाई है। इससे, इस परंपरा को नाटकों से परे दर्शकों तक पहुंचने में मदद मिली है।
माजुली के मुखौटे आज न केवल कलाकृतियों के रूप में, बल्कि असम के भक्ति रंगमंच के जीवंत प्रतीक के रूप में खड़े हैं। वे एक जीवंत एवं विकसित दृश्य भाषा है, जो कला, आस्था, शिल्प कौशल और समुदाय को जोड़ती है।