रामपुर - गंगा जमुना तहज़ीब की राजधानी












रामपुर, जानें क्यों दवाओं के अभाव से दुनिया की 75 प्रतिशत आबादी का सफ़ाया हो सकता है ?
विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा
Thought II - Philosophy/Maths/Medicine
27-03-2025 09:27 AM
Rampur-Hindi

छोटे-मोटे सर्दी ज़ुकाम से लेकर गंभीर बीमारियों तक, हम आमतौर पर दवाओं का सहारा लेते हैं। ये न सिर्फ़ बीमारियों को रोकने और उनका इलाज करने में मदद करती हैं, बल्कि कई बार उन्हें नियंत्रित भी करती हैं। कुछ दवाएँ डॉक्टर की सलाह पर ली जाती हैं, जबकि कुछ बिना डॉक्टर के पर्चे के भी आसानी से उपलब्ध होती हैं। रामपुर में, लोग अक्सर बुखार के लिए पैरासिटामोल और पेट की समस्याओं के लिए एंटासिड जैसी दवाओं का इस्तेमाल करते हैं। हाल के वर्षों में, आयुर्वेदिक और हर्बल उपचारों की लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ी है। लोग अब पारंपरिक एवं आधुनिक चिकित्सा का मिश्रण अपनाने लगे हैं। इस लेख में हम उनमहत्वपूर्ण दवाओं पर चर्चा करेंगे जिन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांतिकारी बदलाव लाए हैं। साथ ही, हम यह भी समझेंगे कि दवाएँ कैसे विकसित होती हैं और इस क्षेत्र में हाल के वर्षों में कौन-कौन से नए आविष्कार हुए हैं। अंत में, हम यह स्पष्ट करेंगे कि औषधीय दवाएँ वास्तव में क्या होती हैं|
चलिए लेख की शुरुआत कुछ ज़रूरी और क्रांतिकारी दवाओं के साथ करते हैं।
दवाओं ने हमारी ज़िंदगी बदल दी है। कुछ दवाएँ इतनी महत्वपूर्ण साबित हुईं कि अगर वे न होतीं, तो शायद आज की दुनिया बहुत ही अलग होती। आइए, ऐसी ही कुछ ज़रूरी दवाओं को करीब से समझते हैं।
1) पेनिसिलिन: पहली एंटीबायोटिक – क्या आप जानते हैं कि अगर पेनिसिलिन न होती, तो आज दुनिया के 75% लोग शायद इस दुनिया में ही न होते? इसका कारण यह है कि इंसानों के पूर्वज बैक्टीरिया से होने वाले गंभीर संक्रमण का शिकार हो सकते थे। पेनिसिलिन (Penicillin) की खोज 1928 में अलेक्जेंडर फ्लेमिंग (Alexander Fleming) द्वारा की गई और यह पहली एंटीबायोटिक (Antibiotic) बनी। इससे पहले, छोटे-छोटे संक्रमण भी जानलेवा हो सकते थे। लेकिन पेनिसिलिन ने चिकित्सा जगत में क्रांति ला दी और यह साबित किया कि बैक्टीरिया से होने वाले रोगों का इलाज संभव है।
2) इंसुलिन (Insulin): मधुमेह (डायबिटीज़)(Diabetes) से ग्रस्त लोग अपने शरीर में भोजन से बनी शर्करा (ग्लूकोज़) (glucose) को ऊर्जा में नहीं बदल पाते। चाहे वे कितना भी खा लें, उनके शरीर को ज़रूरी ऊर्जा नहीं मिलती, क्योंकि उनका शरीर इंसुलिन नहीं बना पाता। पहले इस बीमारी को "शुगर सिकनेस" (sugar sickness) कहा जाता था, और इसका इलाज बहुत कठिन था। यहाँ तक की मरीज़ो को खाने से लगभग वंचित ही कर दिया जाता था। वे भूख और कमज़ोरी से मर जाते थे। लेकिन जब वैज्ञानिकों ने इंसुलिन की खोज की, तो यह एक चमत्कार जैसा था। अब मधुमेह के मरीज़ बस इंसुलिन इंजेक्शन लेकर सामान्य जीवन जी सकते हैं।
3) चेचक और पोलियो के टीके: वैक्सीन कोई दवा नहीं होती, लेकिन यह बीमारी को होने से रोकने में बेहद कारगर होती है। चेचक (स्मॉलपॉक्स) (Smallpox) एक भयानक बीमारी थी, जिसने लाखों लोगों की जान ली थी। लेकिन वैक्सीन के कारण यह बिमारी पूरी दुनिया से मिट गई। यह पहला रोग था, जिसे इंसान ने पूरी तरह खत्म कर दिया। इसी तरह, पोलियो भी लगभग समाप्ति की कगार पर है। एक समय था जब पोलियो से लोग जीवनभर के लिए अपंग हो जाते थे! लेकिन टीकाकरण ने इस खतरे को लगभग खत्म कर दिया। आज की पीढ़ी शायद यह अंदाज़ा भी नहीं लगा सकती कि यह बीमारी कितनी खतरनाक थी।
4) ईथर (Ether): आज अगर कोई ऑपरेशन (operation) होता है, तो मरीज़ को बेहोश कर दिया जाता है ताकि उसे दर्द महसूस न हो। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पहले ऐसा नहीं था? ईथर से पहले, मरीज़ो को पकड़कर सर्ज़री करनी पड़ती थी, बिना बेहोशी के ! ज़रा सोचिए, जब बिना संवेदनाहारी दवा के किसी के शरीर का कोई हिस्सा काटा जा रहा हो तो वह कितना भयानक और असहनीय होता होगा।ईथर पहली ऐसी दवा थी, जिसने यह साबित किया कि बेहोशी संभव है। इसके बाद बेहतर एनेस्थेटिक्स(Anesthetics) (बेहोश करने वाली दवाएँ) आईं, लेकिन सर्ज़री को आसान और कम दर्दनाक बनाने का श्रेय ईथर को जाता है।
5) मॉरफ़ीन (Morphine): अगर आपने कभी सर्ज़री (surgery) करवाई हो या किसी को गंभीर चोट लगी हो, तो आपने दर्द निवारक दवाओं के महत्व को ज़रूर समझा होगा। मॉरफीन सबसे पुरानी और प्रभावी दर्द निवारक दवा है। यह अफ़ीम से बनती है और इसका नाम ग्रीक मिथकों के "सपनों के देवता" मॉर्फियस के नाम पर रखा गया। हालांकि, मॉरफीन का अधिक उपयोग करने से लत लग सकती है, फिर भी यह उन लोगों के लिए जीवनदायक बनी हुई है, जिन्हें असहनीय दर्द से जूझना पड़ता है।
6) एस्पिरिन (Aspirin): एस्पिरिन शायद सबसे आम दवाओं में से एक है, लेकिन इसका महत्व सिर्फ़ साधारण सिरदर्द तक सीमित नहीं है। यह मांसपेशियों के दर्द, बुखार, गठिया और यहां तक कि दिल के दौरे को रोकने में भी मदद करती है। एस्पिरिन ने साबित किया कि एक सुरक्षित और प्रभावी दर्द निवारक दवा बनाई जा सकती है, जिससे बिना किसी गंभीर दुष्प्रभाव के राहत मिल सकती है।
निचोड़ यही है कि चाहे वह संक्रमण से बचाने वाली पेनिसिलिन हो, मधुमेह के मरीज़ो के लिए जीवनदायिनी इंसुलिन हो, या दर्द से राहत देने वाली मॉरफीन—इन दवाओं ने लाखों, बल्कि करोड़ों लोगों की ज़िंदगी बचाई है।
दवाओं के विकास की कहानी रोमांचक पड़ावों से भरी हुई है। प्राचीन जड़ी-बूटियों से लेकर आधुनिक हाई-टेक दवाओं तक, हर खोज ने हमारे जीवन को बेहतर और सुरक्षित बनाया है। विज्ञान के विकास के साथ-साथ दवाओं के असर, उनकी खुराक और सुरक्षा पर भी शोध हुआ, जिससे चिकित्सा क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आए।
दवाएँ क्या होती हैं और वे कैसे काम करती हैं?
जब भी हम बीमार होते हैं या कोई स्वास्थ्य समस्या होती है, तो डॉक्टर हमें कुछ दवाएँ लेने की सलाह देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि दवाएँ वास्तव में होती क्या हैं और वे हमारे शरीर कैसे काम करती हैं? दवा, जिसे औषधि, फार्मास्युटिकल ड्रग (Pharmaceutical Drug) या मेडिसिन (medicine) भी कहा जाता है, एक ऐसा पदार्थ होता है जिसका उपयोग बीमारी का पता लगाने (Diagnosis), इलाज (Treatment), रोकथाम (Prevention) या लक्षणों को कम करने के लिए किया जाता है। आसान भाषा में कहें, तो दवाएँ हमारे शरीर में उस समस्या पर काम करती हैं, जिसकी वजह से हम अस्वस्थ महसूस कर रहे होते हैं।
दवाओं को कई तरीकों से वर्गीकृत किया जाता है। उनमें से कुछ प्रमुख वर्ग इस प्रकार हैं:
प्रिस्क्रिप्शन दवाएँ (Prescription Drugs) – ये वे दवाएँ होती हैं जो केवल डॉक्टर के लिखे गए पर्चे (Prescription) पर ही मिलती हैं। इन्हें खरीदने के लिए मेडिकल स्टोर(Medical Store) पर डॉक्टर की सलाह दिखानी पड़ती है।
ओवर-द-काउंटर (OTC) दवाएँ – कुछ दवाएँ ऐसीहोती हैं जिन्हें बिना डॉक्टर के पर्चे के सीधे मेडिकल स्टोर से खरीदा जा सकता है, जैसे बुखार या सिरदर्द की सामान्य गोलियां।
इसके अलावा, दवाओं को उनके असर के तरीके, सेवन के तरीके (जैसे गोली, इंजेक्शन, क्रीम), शरीर पर प्रभाव डालने वाली प्रणाली (जैसे पाचन, हृदय, तंत्रिका तंत्र) या उनके चिकित्सीय प्रभाव के आधार पर भी वर्गीकृत किया जाता है। दवाओं की सही जानकारी और उनका उचित उपयोग बहुत ज़रूरी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) आवश्यक दवाओं की एक सूची तैयार करता है, जिसमें उन दवाओं को शामिल किया जाता है जो सबसे ज़रूरी और प्रभावी मानी जाती हैं। सही दवा, सही मात्रा में और सही तरीके से लेने से ही उसका पूरा लाभ मिलता है। इसलिए, हमेशा डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही दवाओं का सेवन करना चाहिए।
आइए, जानते हैं कि दवा अनुसंधान ने कैसे-कैसे अहम मोड़ लिए और हमारी सेहत को कैसे नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया।
आधुनिक औषध विज्ञान की शुरुआत: 19वीं सदी की बड़ी छलांग: - 19वीं सदी से पहले दवाओं को ज़्यादातर परंपरागत ज्ञान के आधार पर इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन इस दौर में वैज्ञानिकों ने दवा अनुसंधान को एक व्यवस्थित दिशा दी। अब वैज्ञानिक यह समझने लगे कि कौन-सी दवा शरीर पर कैसे असर करती है, उसे किस मात्रा में दिया जाना चाहिए और उसके संभावित साइड इफेक्ट्स (side effects) क्या हो सकते हैं। इसी दौरान, मॉडर्न फार्मास्युटिकल साइंस (pharmaceutical science) ने एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में आकार लेना शुरू किया।
प्राकृतिक स्रोतों से प्रभावी दवाएँ: 19वीं सदी की बड़ी उपलब्धियाँ:- प्राकृतिक स्रोतों से असरदार यौगिकों को अलग करना इस दौर की सबसे बड़ी खोजों में से एक थी।
कुछ बेहतरीन उदाहरणों में शामिल है:
✔ मॉरफीन – अफ़ीम से निकाला गया एक मज़बूत दर्द निवारक।
✔ कुनैन (Quinine) – सिनकोना पेड़ से प्राप्त, जिसने मलेरिया के इलाज में क्रांति ला दी।
इन खोजों ने आधुनिक दवा उद्योग की नींव रखी और वैज्ञानिकों को समझ आया कि प्रकृति में छिपे तत्वों को सही तरीके से उपयोग करके नई दवाएँ बनाई जा सकती हैं।
20वीं सदी: दवा विकास में क्रांतिकारी बदलाव:- 20वीं सदी विज्ञान और तकनीक के तेज़ी से बढ़ने का युग बना। इस दौरान कई नई दवाएँ और चिकित्सा तकनीकें विकसित हुईं, जिनमें से कुछ ने तो इंसानी जीवन की दिशा ही बदल दी। फार्मास्युटिकल उद्योग ने ज़बरदस्त रफ़्तार पकड़ी और कई गंभीर बीमारियों के इलाज संभव हो सके।
आइए अब दवा अनुसंधान की 3 सबसे बड़ी सफ़लताओं पर एक नज़र डालते हैं:
1. एंटीबायोटिक्स (Antibiotics): संक्रमण के ख़िलाफ़ सबसे बड़ा हथियार:- एंटीबायोटिक्स की खोज को दवा इतिहास के सबसे बड़े मील के पत्थरों में से एक माना जाता है। पहले, मामूली संक्रमण भी जानलेवा हो सकते थे, लेकिन एंटीबायोटिक्स ने चिकित्सा क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाया। इससे अनगिनत ज़िंदगियाँ बचाई जा सकीं और गंभीर संक्रमणों का इलाज संभव हुआ।
2. दर्द निवारक दवाएँ: बेहतर जीवन की ओर एक कदम:- दर्द को मैनेज(manage) करना हमेशा से चिकित्सा जगत के लिए चुनौती रहा है। लेकिन आधुनिक दर्द निवारक दवाओं ने यह समस्या हल कर दी। अब डॉक्टर तीव्र और पुराने दोनों तरह के दर्द का इलाज प्रभावी तरीके से कर सकते हैं, जिससे मरीज़ो की जीवनशैली बेहतर हुई है।
3. मानसिक स्वास्थ्य के लिए दवाएँ: नई उम्मीद की किरण:- पहले के समय में मानसिक बीमारियों का इलाज करना बहुत मुश्किल हुआ करता था। लेकिन समय के साथ वैज्ञानिकों ने ऐसी दवाएँ विकसित कीं, जो अवसाद, चिंता और सिज़ोफ्रेनिया(Schizophrenia) जैसी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए वरदान साबित हुईं। साइकोट्रोपिक(psychotropic) दवाओं ने इस क्षेत्र में नई संभावनाएँ खोलीं और लाखों लोगों को राहत दी।
दवा अनुसंधान की यात्रा आज भी जारी है। हर नई खोज, हर नया शोध हमें बेहतर इलाज की ओर ले जा रहा है। जेनेटिक (genetic) दवाएँ, पर्सनलाइज्ड मेडिसिन (personalised medicine) और बायोटेक्नोलॉजी (Biotechnology) जैसी नई तकनीकें भविष्य में और भी प्रभावी उपचारों का रास्ता खोलेंगी। विज्ञान के इन नए पड़ावों के साथ, उम्मीद है कि आने वाले समय में और भी घातक बीमारियों का इलाज संभव हो सकेगा।
संदर्भ:
https://tinyurl.com/26pebuqc
https://tinyurl.com/2dbmbzf2
https://tinyurl.com/2f7dvjfa
मुख्य चित्र स्रोत : Wikimedia
रामपुर समझें, उत्तर प्रदेश में प्रसिद्ध हाइड्रोपॉनिक और एरोपॉनिक खेती के बीच अंतरों को
भूमि प्रकार (खेतिहर व बंजर)
Land type and Soil Type : Agricultural, Barren, Plain
26-03-2025 09:14 AM
Rampur-Hindi

रामपुर के लोगों, क्या आप जानते हैं कि हाइड्रोपॉनिक एक तरीका है जिसमें पौधों को मिट्टी के बजाय पौष्टिक पानी में उगाया जाता है। पौधों की जड़ें, इस पानी में डुबोई जाती हैं या फिर उन्हें एक दूसरे पदार्थ जैसे पर्लाइट (perlite) या कंकड़ के सहारे रखा जाता है। यह खेती का तरीका उत्तर प्रदेश के कई शहरों में बहुत लोकप्रिय हो रहा है, जैसे बरेली, मुज़फ़्फ़रनगर, हापुड़, आगरा, नोएडा और गोरखपुर में।
आज हम समझेंगे एरोपॉनिक और हाइड्रोपॉनिक खेती में क्या फर्क है। फिर, हम जानेंगे कि यह खेती का तरीका कैसे काम करता है। इसमें हम खेती के अहम हिस्सों के बारे में बात करेंगे, जैसे बढ़ने वाला पदार्थ, एयर पंप, नेट पॉट्स आदि। इसके बाद हम हाइड्रोपॉनिक खेती में उपयोग होने वाले उपकरणों के बारे में भी जानेंगे, जैसे पी एच (pH) मीटर, टी डी एस (TDS) मीटर, ग्रो लाइट्स। आखिर में, हम सीखेंगे कि क्यों हाइड्रोपॉनिक खेती भारत में हाल के सालों में ज़्यादा लोकप्रिय हो रही है।
एरोपॉनिक और हाइड्रोपॉनिक खेती में अंतर
पहलू | एरोपॉनिक खेती | हाइड्रोपॉनिक खेती |
पोषक तत्व पहुंचाने की विधि | पौधों की जड़ों पर पोषक तत्वों से छिड़काव किया जाता है। | पौधे या तो पूरी तरह पानी में डूबे रहते हैं या समय-समय पर पानी का प्रवाह दिया जाता है।
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डिजाइन और कार्यप्रणाली
| यह खेती पूरी तरह नियंत्रित और बंद वातावरण में होती है, जहां फ़सलें हवा में लटकी रहती हैं। | यह खेती भी नियंत्रित और बंद वातावरण में होती है, जहां पौधे पोषक तत्वों से भरपूर पानी वाले कंटेनरों में उगाए जाते हैं। |
पौधों की वृद्धि और स्वास्थ्य
| पौधे एक सील किए गए वातावरण में उगते हैं, जिससे बैक्टीरिया का खतरा कम होता है। जड़ें हवा में लटकी रहती हैं, जिससे ऑक्सीजन का बेहतर अवशोषण होता है। | पौधे एक सील किए गए वातावरण में उगते हैं, जिससे बैक्टीरिया का खतरा कम होता है। जड़ें सीधे पोषक तत्वों से भरपूर घोल के संपर्क में रहती हैं, जिससे तेज़ी से बढ़ने में मदद मिलती है। |
हाइड्रोपॉनिक्स कैसे काम करता है ?
हाइड्रोपॉनिक सिस्टम इतने कारगर होते हैं क्योंकि ये तापमान और पीएच संतुलन जैसी पर्यावरणीय परिस्थितियों पर पूरी तरह नियंत्रण रखने की सुविधा देते हैं और पौधों को अधिक से अधिक पोषक तत्व और पानी प्रदान करते हैं। यह प्रणाली एक सरल सिद्धांत पर काम करती है – पौधों को वही चीज़ दें जिसकी उन्हें ज़रूरत है, और जब ज़रूरत हो, तब दें।
हाइड्रोपॉनिक इस प्रणाली में हर पौधे की ज़रूरत के अनुसार पोषक तत्वों का घोल तैयार किया जाता है । इसमें यह भी तय किया जाता है कि पौधों को कितनी रोशनी मिले और कितनी देर तक मिले। पी एच स्तर को भी मापा और बदला जा सकता है। इस तरह के पूरी तरह नियंत्रित माहौल में पौधों की वृद्धि बहुत तेज़ी से होती है।
जब पौधों के लिए सही माहौल बनाया जाता है, तो कई जोखिम कम हो जाते हैं। खुले मैदानों और बागीचों में उगने वाले पौधे कई समस्याओं का सामना करते हैं, जैसे कि मिट्टी में मौजूद फ़फ़ूंद, जो बीमारियाँ फैला सकती हैं। खरगोश जैसे जानवर फ़सलों को नष्ट कर सकते हैं और टिड्डियों का झुंड एक ही दिन में खेतों को बर्बाद कर सकता है। हाइड्रोपॉनिक खेती इन सभी समस्याओं को खत्म कर देती है।
मिट्टी में उगने वाले पौधों को उसकी कठोरता का सामना करना पड़ता है, लेकिन हाइड्रोपॉनिक्स में ऐसा नहीं होता, जिससे पौधे जल्दी बड़े होते हैं। साथ ही, इसमें कीटनाशकों की ज़रूरत नहीं पड़ती, जिससे फल और सब्ज़ियाँ ज़्यादा सेहतमंद और उच्च गुणवत्ता वाली होती हैं। जब कोई रुकावट नहीं होती, तो पौधे तेज़ी से और स्वस्थ तरीके से बढ़ते हैं।
भारत में हाइड्रोपॉनिक खेती के प्रमुख तत्व
1.) ग्रोइंग मीडिया (Growing Media): हाइड्रोपॉनिक खेती में पौधे मिट्टी के बजाय एक खास माध्यम (ग्रोइंग मीडिया) में उगाए जाते हैं, जो पौधे को सहारा देता है और उसकी जड़ों को मज़बूती से पकड़कर रखता है। यह मीडिया मिट्टी का विकल्प होता है, लेकिन खुद से कोई पोषण नहीं देता। इसके बजाय, यह नमी और पोषक तत्वों को सोखकर पौधों तक पहुंचाता है। कई ग्रोइंग मीडिया, पी एच-सामान्य (pH-neutral) होते हैं, जिससे पोषक घोल का संतुलन बिगड़ता नहीं है। हाइड्रोपॉनिक खेती के लिए कई प्रकार के मीडिया उपलब्ध हैं, जिनका चुनाव उगाए जाने वाले पौधे और सिस्टम के आधार पर किया जाता है। ये ऑनलाइन और स्थानीय नर्सरी व गार्डनिंग स्टोर्स (gardening stores) में आसानी से मिल जाते हैं।
2.) एयर स्टोन्स और एयर पंप्स (Air Stones and Air Pumps): अगर पौधों की जड़ें लंबे समय तक पानी में डूबी रहें और उन्हें पर्याप्त ऑक्सीजन न मिले, तो वे सड़ सकती हैं। इसलिए, एयर स्टोन्स का उपयोग किया जाता है, जो पोषक तत्वों से भरपूर पानी में छोटे-छोटे ऑक्सीजन के बुलबुले छोड़ते हैं। यह न केवल पानी में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाते हैं, बल्कि पोषक तत्वों को भी पूरे घोल में समान रूप से फैलाने में मदद करते हैं। हालांकि, एयर स्टोन्स खुद ऑक्सीजन नहीं बनाते, इसलिए इन्हें एक बाहरी एयर पंप से जोड़ना पड़ता है। ये उपकरण आमतौर पर एक्वेरियम में भी इस्तेमाल किए जाते हैं और किसी भी पेट स्टोर (pet store) पर आसानी से मिल सकते हैं।
3.) नेट पॉट्स (Net Pots): नेट पॉट्स, जालीदार गमले होते हैं, जिनमें हाइड्रोपॉनिक पौधे लगाए जाते हैं। इनकी जालीदार संरचना की वजह से पौधों की जड़ें किनारों और निचले हिस्से से बाहर निकल सकती हैं, जिससे उन्हें ज़्यादा ऑक्सीजन और पोषक तत्व मिलते हैं। पारंपरिक मिट्टी या प्लास्टिक के गमलों की तुलना में नेट पॉट्स बेहतर जल निकासी प्रदान करते हैं, जिससे पौधे स्वस्थ तरीके से बढ़ते हैं।
भारत में हाइड्रोपॉनिक खेती के ज़रूरी उपकरण
1.) पी एच (pH) मीटर: हाइड्रोपॉनिक खेती में पौधों को सही पोषण देने के लिए पानी का पी एच बैलेंस बनाए रखना बहुत ज़रूरी होता है। पी एच मीटर की मदद से हम पानी का पी एच स्तर नाप सकते हैं और ज़रुरत के हिसाब से उसे ठीक कर सकते हैं। हर पौधा एक खास पी एच में ही अच्छे से बढ़ता है, इसलिए इसे समय-समय पर चेक करना ज़रूरी है।
2.) ई सी/ टी डी एस (EC/TDS) मीटर: पानी में कितने पोषक तत्व घुले हुए हैं, यह जानने के लिए ई सी/ टी डी एस मीटर का इस्तेमाल किया जाता है। इससे यह पक्का किया जाता है कि पौधों को सही मात्रा में पोषण मिल रहा है, जिससे उनकी ग्रोथ अच्छी हो सके।
3.) ग्रो लाइट: अगर आप हाइड्रोपॉनिक खेती घर के अंदर कर रहे हैं, तो पौधों को सूरज की रोशनी के बिना भी बढ़ाने के लिए ग्रो लाइट्स का इस्तेमाल किया जाता है। ये लाइट्स वैसे ही काम करती हैं जैसे सूरज की रोशनी, जिससे पौधे अच्छी तरह बढ़ सकें। ज़्यादातर एल ई डी (LED) या एच आई डी (HID) लाइट्स का इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि ये ज़्यादा असरदार होती हैं।
भारत में हाइड्रोपॉनिक खेती क्यों तेज़ी से लोकप्रिय हो रही है
- घर के पास उगाए गए ताज़ा खाने की मांग - आजकल लोग सेहत को लेकर ज़्यादा जागरूक हो गए हैं, इसलिए वे ताज़ा और बिना केमिकल वाले फल-सब्ज़ियां खाना पसंद कर रहे हैं। कुछ लोग खुद उगाने लगे हैं, तो कुछ लोकल किसानों से खरीदना पसंद कर रहे हैं।
- नई तकनीकों की मदद - अब खेती में नए और स्मार्ट तरीके आ गए हैं, जिससे हाइड्रोपॉनिक सिस्टम को चलाना आसान और सस्ता हो गया है। ऑटोमेशन और कंट्रोल सिस्टम्स की वजह से इसमें ज़्यादा मेहनत भी नहीं लगती।
- सालभर खेती और बेहतर खाद्य आपूर्ति - हाइड्रोपॉनिक खेती से पूरे साल फ़सल उगाई जा सकती है। साथ ही, इसमें पानी और खाद की भी कम ज़रूरत होती है। इससे लोगों को बिना किसी रुकावट के ताज़ी सब्ज़ियां और फल मिलते रहते हैं।
- बदलती खाने की आदतें - पहले भारत में अनाज ज़्यादा उगाया जाता था, लेकिन अब लोग विदेशी फल-सब्ज़ियां भी खाना पसंद कर रहे हैं, जैसे कि बेरीज़, केसर, शिमला मिर्च, ज़ूकीनी और पत्तेदार सब्ज़ियां। हाइड्रोपॉनिक सिस्टम की मदद से इन्हें बिना मौसम की टेंशन लिए आसानी से उगाया जा सकता है।
- पैसे लगाने के नए मौके - हाइड्रोपॉनिक खेती शुरू करने में शुरुआत में काफ़ी खर्चा आता है, लेकिन अब इसमें निवेश बढ़ रहा है। सरकार भी ऐसी नई तकनीकों को बढ़ावा दे रही है और कई स्टार्टअप्स इस फील्ड में उभर रहे हैं।
- नई कंपनियों की एंट्री - अब कई स्टार्टअप्स (Startups) और कंपनियां लोगों को, हाइड्रोपॉनिक खेत सेटअप करने और चलाने में मदद कर रही हैं। ये कंपनियां, जानकारी भी देती हैं और “ फ़ार्मिंग ऐज़ ए सर्विस” (Farming as a Service) जैसी सुविधाएं भी देती हैं, जिससे खेती करना और आसान हो गया है।
- कम फ़सल बर्बाद होती है - चूंकि हाइड्रोपॉनिक पूरी तरह से निगरानी में होते हैं, इसलिए फ़सल ख़राब होने का खतरा बहुत कम होता है। साथ ही, फ़सल जल्दी बिक जाती है, जिससे बर्बादी भी नहीं होती।
- खाने की गुणवत्ता और ट्रेसबिलिटी - ये खेत शहरों के पास बनाए जाते हैं, जिससे फल और सब्ज़ियां सीधे ग्राहकों तक पहुंचाई जा सकती हैं। इससे लोग आसानी से पता कर सकते हैं कि उनका खाना कहां से आ रहा है और कितना ताज़ा है।
संदर्भ:
मुख्य चित्र: बाईं तरफ़ हाइड्रोपॉनिक और दाईं तरफ़ एरोपॉनिक खेती (Wikimedia)
एक अनुभवी योगी, योग की गहराइयों को समझता है !
य़ातायात और व्यायाम व व्यायामशाला
Locomotion and Exercise/Gyms
25-03-2025 09:19 AM
Rampur-Hindi

रामपुर के कई निवासियों के लिए, योग, उनकी दिनचर्या का अहम हिस्सा बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि, योग की शुरुआत, आज से तकरीबन 5000 साल पहले हुई थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि, योग को व्यवस्थित रूप से तैयार करने और इसे आम लोगों तक पहुँचाने का श्रेय महर्षि पतंजलि को दिया जाता है? उन्हें "योग के जनक" के रूप में भी जाना जाता है।
महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र नामक छंदों का संग्रह तैयार किया, जिसमें आत्म-साक्षात्कार और ज्ञान प्राप्ति के लिए, योग का अभ्यास करना सिखाया गया है। इन सूत्रों में योग का दार्शनिक आधार दिया गया है, जो आधुनिक योग अभ्यास की नींव माने जाते हैं। पतंजलि के अनुसार, योग, आठ अंगों में विभाजित है, जिसे "अष्टांग योग" भी कहा जाता है।
आज के इस लेख में, हम योग के इस इतिहास और उसकी उत्पत्ति को विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे। साथ ही, हम योग सूत्रों के चार अध्यायों या पादों पर चर्चा करेंगे। इसके बाद, हम योग के अंगों पर ध्यान केंद्रित करेंगे।, इस लेख में हम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि पर चर्चा करेंगे । आइए, इस प्राचीन विद्या की गहराइयों में झांकें और इसे बेहतर ढंग से समझें।
पतंजलि के योग सूत्र क्या हैं?
महर्षि पतंजलि को योग सूत्र के प्रवर्तक और संस्थापक माना जाता है। हालांकि, उन्होंने अपनी रचना की सटीक तिथि को स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किया। लेकिन विद्वानों का मानना है कि, महर्षि पतंजलि, लगभग 200 ईसा पूर्व के आसपास इस पृथ्वी पर रहे थे। इसी समय, उन्होंने योग सूत्र की रचना की, जिसे योग के मूलभूत सिद्धांतों और जीवनशैली का आधार माना जाता है।
हालांकि, उनकी लेखन शैली में भिन्नताएँ देखकर कुछ लोगों ने यह सुझाव दिया कि "पतंजलि" कोई एक व्यक्ति न होकर, 14 विद्वानों की एक परंपरा हो सकती है, जिसे सामूहिक रूप से "पतंजलि" कहा गया हो।
योग सूत्र की उत्पत्ति, प्राचीन परंपराओं में निहित है। इसकी सटीक तिथि पर विद्वानों के बीच मतभेद है। जैसे:
- एक प्रमुख इंडोलॉजिस्ट (Indologist) एडविन ब्रायंट (Edwin Bryant) का मानना है कि, यह रचना चौथी या पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व की है।
- मिशेल डेस्मराइस (Michele Marie Desmarais) जो की एक प्रसिद्ध लेखिका हैं, जो की एक प्रसिद्ध लेखिका हैं, ने, इसे 500 ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के बीच का बताया।
- वुड्स (Woods) नामक एक शोधकर्ता के अनुसार, अधिकांश विद्वानों ने इसकी अवधि 400 ईसा के आसपास मानी है।
पतंजलि के योग सूत्र और अन्य ग्रंथों, जैसे महाभाष्य, में भाषा, व्याकरण और शैली में स्पष्ट अंतर है। महाभाष्य का लेखक भी "पतंजलि" नाम से जाना जाता है, लेकिन इसकी शैली योग सूत्र से बिल्कुल अलग है। इसी कारण, यह बहस लंबे समय से चल रही है कि क्या योग सूत्र वास्तव में पतंजलि की रचना है। यह ग्रंथ आज भी विद्वानों के अध्ययन और चर्चा का विषय बना हुआ है।
आइए, अब योग सूत्र के चार अध्याय (पाद) को समझते हैं:
समाधि पाद: यह अध्याय, ध्यान और आनंद से संबंधित है। इसे योग का अंतिम लक्ष्य माना जाता है। इसमें योग की प्रसिद्ध परिभाषा दी गई है: ‘योग चित्तवृत्ति निरोधः, यानी मन के उतार-चढ़ाव को समाप्त करना ही योग है।”
साधना पाद: यह अध्याय, योग के अभ्यास पर केंद्रित है। इसमें अष्टांग योग (आठ अंगों का मार्ग) का वर्णन है, जो ऐसा जीवन जीने का मार्ग दिखाता है जिससे दुख कम हो सके। पतंजलि बताते हैं कि ध्यान, अंतिम लक्ष्य है, लेकिन इसकी तैयारी के लिए अध्ययन, अनुशासन और भक्ति जैसे अभ्यास आवश्यक हैं। जब हमारा मन भौतिक चीजों में फंस जाता है, तो एक नैतिक जीवन दृष्टिकोण अपनाने से मन स्थिर हो सकता है।
विभूति पाद: यह अध्याय ध्यान के गहरे स्तरों और विशेष शक्तियों की प्राप्ति पर केंद्रित है। ध्यान के परिणामस्वरूप अद्भुत शक्तियाँ हासिल हो सकती हैं। इनमें 'हाथी जैसी शक्ति' या ब्रह्मांड की गहराई समझने की क्षमता शामिल है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि ये शक्तियाँ रूपक हैं या प्राचीन योगियों की वास्तविक उपलब्धियाँ।
कैवल्य पाद: इस अध्याय में, मुक्ति (कैवल्य) का वर्णन है। यह वह स्थिति है, जब आत्मा (पुरुष) भौतिक जीवन (प्रकृति) से मुक्त हो जाती है। यह अंतिम स्वतंत्रता और शांति की स्थिति है।
आइए, अब इन योग सूत्रों में वर्णित योग के अंगों की खोज करते हैं:
1. आसन (योग मुद्राएं): आसन का अर्थ, ‘योग मुद्राओं का अभ्यास’ होता है। पतंजलि ने इसे ऐसे शारीरिक अभ्यास के रूप में सिखाया, जिसे सहजता और आनंद के साथ किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हर मुद्रा को धीरे-धीरे और सावधानीपूर्वक करना चाहिए। इस दौरान, मन को सांस पर केंद्रित रखना और एक मुद्रा से दूसरी मुद्रा में शांति से जाना ज़रूरी है। यदि योग को केवल कसरत की तरह किया जाए, तो यह नुकसानदायक हो सकता है। इससे शरीर पर अधिक दबाव पड़ सकता है और चोट लगने की संभावना बढ़ जाती है। योग का उद्देश्य शरीर से जुड़ाव और मन के द्वंद्व को कम करना है। नियमित आसन अभ्यास से शरीर और मन दोनों स्वस्थ होते हैं।
2. प्राणायाम (सांस का नियंत्रण): प्राणायाम का अर्थ, 'सांस को नियंत्रित करना' होता है। योग के सिद्धांतों के अनुसार, सांस हमारे चारों ओर की सूक्ष्म जीवन ऊर्जा से जुड़ने का माध्यम है। जब हम सांस को सचेत रूप से नियंत्रित करते हैं, तो यह जीवन ऊर्जा हमारे शरीर को सक्रिय करती है। इससे हमारा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तनाव पर प्रतिक्रिया देने का तरीका भी बदलता है। प्राणायाम का मूल अनुपात 1:4:2 है। इसमें 1 सेकंड तक सांस अंदर लें (पूरक), 4 सेकंड तक सांस रोकें (कुंभक), और 2 सेकंड तक सांस छोड़ें (रेचक)। उन्नत प्राणायाम में बंधों का समावेश भी होता है। इन तकनीकों को सीखने के लिए किसी अनुभवी योग शिक्षक से सलाह लें।
3. प्रत्याहार (इंद्रियों को वापस लेना): प्रत्याहार का अर्थ, चेतना को बाहरी विकर्षणों से अलग करना होता है। यह ध्यान के अभ्यास की तैयारी का अंतिम चरण है। इस प्रक्रिया में ध्वनि, गंध या दृश्य जैसे संवेदी अनुभवों को बिना किसी प्रतिक्रिया के देखने और उन्हें गुज़रने देने का अभ्यास किया जाता है। यह अभ्यास माइंडफ़ुलनेस (mindfulness) की तरह है, जहां इंद्रियों से जुड़ाव कम किया जाता है।
4. धारणा (एकाग्रता): धारणा योग की आंतरिक यात्रा का पहला चरण है। इसमें साधक अपने ध्यान को पूरी तरह से एक बिंदु, जैसे नाभि या किसी विशेष छवि पर केंद्रित करता है। यह ध्यान अभ्यास दुख से मुक्ति की दिशा में पहला कदम है।
5. ध्यान (ध्यान का अभ्यास): ध्यान का अर्थ किसी एक वस्तु पर पूरी तरह से ध्यान केंद्रित करना होता है। इसमें साधक अपनी पूरी ऊर्जा और चेतना को केवल एक वस्तु पर केंद्रित करता है और बाकी सब कुछ भुला देता है। जबकि कई लोग ध्यान को सभी विचारों को खाली करने की प्रक्रिया मानते हैं, पतंजलि के अनुसार यह आवश्यक नहीं है। ध्यान की वस्तु कुछ भी हो सकती है, जब तक कि ध्यान स्थिर और केंद्रित रहे।
6. समाधि (पूर्ण एकाग्रता): समाधि, वह अवस्था है, जब ध्यान गहन हो जाता है और साधक अपनी ध्यान की वस्तु के साथ विलीन हो जाता है। इसे ईश्वर या ब्रह्मांड के साथ मिलन के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन पतंजलि ने इसे सिर्फ ध्यान की उच्चतम स्थिति के रूप में समझाया है। इन छह अंगों का अभ्यास जीवन में शारीरिक और मानसिक शांति लाने का मार्ग है। इनसे मन को स्थिरता, शरीर को लचीलापन, और आत्मा को शांति प्राप्त होती है।
संदर्भ:
https://tinyurl.com/275uayta
https://tinyurl.com/2ahh7zad
https://tinyurl.com/288nj35q
https://tinyurl.com/255mjk8d
मुख्य चित्र का स्रोत : Pxhere
सूक्ष्मजीव बन गए हैं, रामपुर के किसानों के सुख-दुख के साथी !
कीटाणु,एक कोशीय जीव,क्रोमिस्टा, व शैवाल
Bacteria,Protozoa,Chromista, and Algae
24-03-2025 09:24 AM
Rampur-Hindi

रामपुर के किसानों का एक बड़ा तबका, अपनी आजीविका के लिए खेती-किसानी पर निर्भर करता है! यदि आप भी खेती करते हैं, या फिर अपने घरों के छोटे-छोटे बगीचों में सब्ज़ियाँ उगाते हैं, तो आपको कृषि में सूक्ष्मजीवों (microbes) की रोचक भूमिका के बारे में पता होना चाहिए। ये नन्हें जीव मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और किसानों को स्वस्थ फ़सल उगाने में बड़ी मदद करते हैं। क्या आप जानते हैं कि लाभकारी बैक्टीरिया और कवक से जैव उर्वरक बनाए जाते हैं, जो मिट्टी में नाइट्रोजन (Nitrogen) जैसे पोषक तत्व बढ़ाकर पौधों को मज़बूत बनाते हैं। इतना ही नहीं सूक्ष्मजीव खाद बनाने में भी सहायक होते हैं। वे कचरे को जैविक खाद में बदलकर मिट्टी की गुणवत्ता को स्वाभाविक रूप से सुधारते हैं। इसके अलावा, सूक्ष्मजीवों से कुछ जैविक कीटनाशक भी बनाए जाते हैं, जो फ़सलों को कीटों और बीमारियों से सुरक्षित रखते हैं। इससे पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की आवश्यकता कम होती है। इससे किसानों को बेहतर फ़सल उत्पादन में सहायता मिलती है और उनकी मिट्टी भी स्वस्थ बनी रहती है। सूक्ष्मजीव वास्तव में किसानों के सच्चे मित्र हैं। वे न केवल कृषि में बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान देते हैं। इसलिए आज के इस लेख में हम राइज़ोबियम(Rhizobium) और नाइट्रोजन स्थिरीकरण पर चर्चा करेंगे। इसके तहत हम जानेंगे कि ये मिट्टी की उर्वरता को कैसे बढ़ाते हैं। फिर हम जैव उर्वरकों के लाभों और उनके द्वारा स्वस्थ पौधों के विकास को प्रोत्साहित करने की प्रक्रिया को समझेंगे। अंत में हम खाद निर्माण, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार और टिकाऊ खेती में सूक्ष्मजीवों की भूमिका पर विचार करेंगे।
आइए लेख की शुरुआत राइज़ोबियम और नाइट्रोजन स्थिरीकरण को आसान भाषा में समझने के साथ करते हैं:
राइज़ोबियम एक ग्राम-नेगेटिव जीवाणु होता है, जो गतिशील होता है और मिट्टी में पाया जाता है। यह वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करने में मदद करता है। यह मुख्य रूप से फलीदार पौधों और पैरास्पोनिया की जड़ों में मौजूद रूट नोड्यूल (root nodules) में पाया जाता है, जहाँ यह पौधों के साथ, सहजीवी संबंध बनाता है।
राइज़ोबियम बैक्टीरिया रूट नोड्यूल के भीतर पौधों की कोशिकाओं में प्रवेश करता है। वहाँ यह वायुमंडलीय नाइट्रोजन को अमोनिया में परिवर्तित करता है। यह प्रक्रिया " नाइट्रोजनेज़ " (Nitrogenase) एंज़ाइम(enzyme) की मदद से होती है। इसके माध्यम से बैक्टीरिया पौधों को यूरीड्स और ग्लूटामाइन जैसे कार्बनिक नाइट्रोजन यौगिक प्रदान करने में मदद करता है।
राइज़ोबियम बैक्टीरिया अकेले नाइट्रोजन स्थिरीकरण नहीं कर सकते। वे केवल सहजीवी संबंध के तहत ही यह क्षमता विकसित करते हैं। इस संबंध में पौधों को भी लाभ मिलता है क्योंकि वे प्रकाश संश्लेषण द्वारा कार्बनिक यौगिक बनाते हैं, जो बैक्टीरिया को भी मिलते हैं। इस तरह, पौधों और राइज़ोबियम के बीच एक परस्पर लाभकारी संबंध बनता है। फलीदार पौधों की जड़ें कुछ रासायनिक पदार्थ स्रावित करती हैं, जो बैक्टीरिया को आकर्षित करते हैं। इसके बाद, नोड कारक छोड़ने वाले बैक्टीरिया जड़ के बालों को कर्लिंग कर देते हैं, जिससे नोड्यूल बनने की प्रक्रिया शुरू होती है।
राइज़ोबियम का उपयोग कहाँ होता है?
राइज़ोबियम जैव-उर्वरक एक ऐसा पदार्थ है, जिसमें जीवित सूक्ष्मजीव होते हैं। इसे पौधों की सतह, बीज या मिट्टी में मिलाया जाता है। यह बैक्टीरिया पौधों की जड़ों या राइज़ोस्फीयर(rhizosphere) को उपनिवेशित कर, पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाते हैं और पौधों की वृद्धि में सहायक होते हैं। राइज़ोबियम वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर कर उसे उपयोगी कार्बनिक यौगिकों में बदलता है, जिससे पौधों और बैक्टीरिया दोनों को लाभ मिलता है।
नाइट्रोजनेज़ (Nitrogenase) एक महत्वपूर्ण एंज़ाइम है, जिसका उत्पादन राइज़ोबियम और साइनोबैक्टीरिया जैसे कुछ बैक्टीरिया करते हैं। यह वायुमंडलीय नाइट्रोजन को अमोनिया में परिवर्तित करता है। यह प्रक्रिया अवायवीय परिस्थितियों में अधिक सक्रिय होती है। यह एंज़ाइम दो प्रकार के प्रोटीन सबयूनिट से मिलकर बना होता है—नॉन-हीम आयरन प्रोटीन और आयरन-मोलिब्डेनम प्रोटीन।
इस तरह, राइज़ोबियम बैक्टीरिया और नाइट्रोजनेज एंज़ाइम मिलकर नाइट्रोजन स्थिरीकरण की प्रक्रिया को संचालित करते हैं, जिससे फलीदार पौधों की वृद्धि और उपज में सुधार होता है।
आइए, अब जैव उर्वरकों और उनके लाभों पर एक नज़र डालते हैं:
जैवउर्वरक लाभकारी सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके पौधों की वृद्धि में मदद करते हैं। ये मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाते हैं और पौधों को स्वस्थ व मज़बूत बनाते हैं। जैवउर्वरक नाइट्रोजन फिक्सर, फॉस्फोरस और पोटेशियम घुलनशील बनाने वाले जीवाणुओं, तथा आयरन मोबिलाइज़र का उपयोग करते हैं। इसके अलावा, ये फाइटोहॉर्मोन (phytohormones) का उत्पादन करने वाले सूक्ष्मजीवों की सहायता से मिट्टी की पोषक गुणवत्ता को सुधारते हैं।
इन उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ती है, जिससे मिट्टी का स्वास्थ्य और स्थिरता बनी रहती है। इसके परिणामस्वरूप पौधे तेज़ी से बढ़ते हैं और अधिक उपज देते हैं। कुछ जीवाणु प्रजातियाँ, जिन्हें पादप-विकास-प्रवर्तक राइज़ोबैक्टीरिया (PGPR) कहा जाता है, एज़ोटोबैक्टर, एस्चेरिचिया कोली, स्यूडोमोनास और बैसिलस जैसे जैवउर्वरकों में शामिल होते हैं। इसी तरह, आर्बुस्कुलर माइकोराइज़ल कवक (AMF) जैसे ग्लोमस वर्सीफॉर्म, एस्परगिलस अवामोरी, ग्लोमस मैक्रोकार्पम भी बिना किसी नकारात्मक प्रभाव के मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं।
पी जी पी आर(PGPR) और ए एम एफ(AMF) के संयुक्त उपयोग से पौधों की वृद्धि, पोषक तत्वों का अवशोषण और रोग सहिष्णुता में सुधार होता है। यह पौधों को अजैविक तनाव सहने में भी सक्षम बनाता है। उदाहरण के लिए, राइज़ोबियम, एज़ोटोबैक्टर और वेसिकुलर आर्बुस्कुलर माइक्रोराइज़ा (Vesicular Arbuscular Mycorrhiza) (VAM) के साथ रॉक फॉस्फेट का उपयोग करने से गेहूं की उपज में वृद्धि हुई। इसी तरह, थियोबैसिलस थायोऑक्सिडेंस, बैसिलस सबटिलिस और सैक्रोमाइसीज जैसे जीवाणु लौह (Fe), मैंगनीज़ (Mn), और ज़िंक (Zn) जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों को घुलनशील बनाकर पौधों को उपलब्ध कराते हैं।
ट्राइकोडर्मा एस पी पी (Trichoderma spp) जैसे कवक पौधों की जैविक और अजैविक तनाव सहनशीलता को बढ़ाने में मदद करते हैं। ये एंज़ाइम का उत्पादन कर हानिकारक रसायनों को निष्क्रिय करते हैं और तनाव-रोधी प्रोटीन के निर्माण को बढ़ावा देते हैं। उदाहरण के लिए, ट्राइकोडर्मा हरज़ियानम ने टमाटर के पौधों की ठंड सहने की क्षमता बढ़ाई। नाइट्रोजन फिक्सिंग, पोटेशियम और फॉस्फेट घुलनशील करने वाले जीवाणु फ़सलों की वृद्धि, उत्पादन और गुणवत्ता को बेहतर बनाते हैं। इस प्रकार, जैवउर्वरक टिकाऊ कृषि के लिए आवश्यक हैं और आधुनिक कृषि प्रणालियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आइए अब खाद बनाने और मृदा स्वास्थ्य में सूक्ष्मजीवों की भूमिका को समझते हैं:
मृदा सूक्ष्मजीव और कार्बनिक पदार्थ मिलकर मिट्टी को उपजाऊ और उत्पादक बनाते हैं। आइए समझते हैं कि यह प्रक्रिया कैसे काम करती है।
1. मृदा कार्बनिक पदार्थ की भूमिका: मृदा कार्बनिक पदार्थ में पौधों के अवशेष और पशु खाद शामिल होते हैं। यह पदार्थ मिट्टी की संरचना को सुधारता है, जल धारण क्षमता बढ़ाता है और पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने में मदद करता है। इसके अलावा, यह पोषक तत्वों का भंडार बनाता है, जिससे पौधे लाभ उठा सकते हैं। कार्बनिक पदार्थ मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्मजीवों के लिए भी भोजन का स्रोत बनता है, जिससे उनका समुदाय विकसित होता है।
2. सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटन: मृदा सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों के प्रमुख अपघटक होते हैं। जीवाणु, कवक और अन्य सूक्ष्मजीव जटिल कार्बनिक यौगिकों को सरल रूपों में तोड़ते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान नाइट्रोजन(nitrogen), फ़ॉस्फ़ोरस(phosphorus) और सल्फ़र (sulphur) जैसे आवश्यक पोषक तत्व मुक्त होते हैं। यह अपघटन पोषक चक्रण को बनाए रखने और पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
3. सहजीवी संबंध: कुछ मृदा सूक्ष्मजीव पौधों के साथ सहजीवी संबंध बनाते हैं। उदाहरण के लिए, माइकोराइज़ल कवक पौधों की जड़ प्रणाली का विस्तार करते हैं और पोषक तत्वों व पानी के अवशोषण की क्षमता बढ़ाते हैं। नाइट्रोजन-फिक्सिंग बैक्टीरिया वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ऐसे रूप में परिवर्तित करते हैं, जिसे पौधे उपयोग कर सकते हैं। इन सहजीवी संबंधों को बनाए रखने में मिट्टी में मौजूद कार्बनिक पदार्थ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
4. मिट्टी के कार्बनिक पदार्थ और सूक्ष्मजीवों की विविधता: मिट्टी में अधिक कार्बनिक पदार्थ होने से सूक्ष्मजीवों की विविधता बढ़ती है। यह विविधता मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए आवश्यक होती है। विविध माइक्रोबियल(microbial) समुदाय मिट्टी में होने वाली बीमारियों को रोकने, कार्बनिक पदार्थों के अपघटन को तेज़ करने और पौधों के स्वास्थ्य को बढ़ाने में सहायक होते हैं। खाद डालने, कवर क्रॉपिंग, फ़सल चक्रण और कम जुताई जैसी कृषि तकनीकें मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों के स्तर को बनाए रखने और सूक्ष्मजीवों की विविधता बढ़ाने में मदद करती हैं।
5. मिट्टी के स्वास्थ्य पर प्रभाव: मृदा सूक्ष्मजीवों और कार्बनिक पदार्थों के बीच का संतुलन सीधे मिट्टी के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। संतुलित कार्बनिक पदार्थ और सक्रिय सूक्ष्मजीवों से भरपूर मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है, मिट्टी की संरचना मज़बूत होती है और पर्यावरणीय तनावों से निपटने की क्षमता बेहतर होती है। इससे फ़सल की पैदावार बढ़ती है, उपज की गुणवत्ता में सुधार होता है और खेती अधिक टिकाऊ बनती है।
कुल मिलाकर मृदा सूक्ष्मजीव और कार्बनिक पदार्थ मिट्टी की उर्वरता और स्वास्थ्य को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि किसान और कृषि वैज्ञानिक ऐसी पद्धतियाँ अपनाएँ जो मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाएँ, तो वे मिट्टी की पूरी क्षमता का उपयोग कर सकते हैं और बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
संदर्भ:
मुख्य चित्र: खेत में एक किसान और राइज़ोबियम नामक बैक्टीरिया (Wikimedia)
चलिए, कुछ चलचित्रों कि ज़रिए, आज पृथ्वी पर मौजूद सबसे प्रारंभिक जीवों से अवगत होते हैं
व्यवहारिक
By Behaviour
23-03-2025 09:12 AM
Rampur-Hindi

हमारे प्यारे शहर वासियों, क्या आप जानते हैं, कि जेलीफ़िश (Jellyfish), 500 मिलियन से भी अधिक वर्षों से अस्तित्व में है? इसका मतलब है कि वे ऐसे जीव हैं, जो पहले डायनासोर (Dinosaurs) से 250 मिलियन वर्ष पहले भी मौजूद थे। जेलीफ़िश के अलावा, नॉटिलस (Nautilus) भी ऐसे जीव हैं, जो प्राचीन समय से आज भी पृथ्वी पर मौजूद हैं । गहरे समुद्र की चट्टानों में वे 480 मिलियन वर्षों से भी अधिक समय से मौजूद हैं। ये नरम शरीर वाले जीव, एक जटिल कोष्ठ वाले आवरण के अंदर रहते हैं। क्या आप जानते हैं कि एक वयस्क जेलीफ़िश को मेडुसा (medusa) के नाम से जाना जाता है ? जेलीफ़िश की एक प्रजाति, जिसे टुरिटोप्सिस डोहर्नी (Turritopsis dohrnii) कहा जाता है, लगभग 4.5 मिलीमीटर चौड़ी और लंबी होती है, संभवतः यह आपकी छोटी उंगली के नाखून से भी छोटी होती है। किंतु आश्चर्यजनक बात यह है, कि यह अपने जीवन चक्र को उलट सकती है। इसलिए, इसे अमर जेलीफ़िश (Immortal jellyfish) कहा जाता है। जब इस प्रजाति को शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचता है या कोई अन्य तनाव होता है, तो यह मरने के बजाय खुद को सिकोड़ लेती है, अपने तंतुओं को फिर से अवशोषित कर लेती है और अपनी तैरने की क्षमता खो देती है। फिर यह, एक बूँद जैसी संरचना के रूप में समुद्र तल से चिपक जाती है। अगले 24-36 घंटों में, यह बूँद जैसी संरचना वापस नए जीव के रूप में विकसित हो जाती है। तो आइए, हम, इन चलचित्रों के माध्यम से पृथ्वी पर आज मौजूद सबसे प्रारंभिक जीवों के बारे में विस्तार से जानें। उपर्युक्त जीवों के अलावा, हम, हॉर्सशू केकड़ा (Horseshoe crab), सीलैकैंथ (Coelacanth), स्टर्जन (Sturgeon) और इसी तरह के अन्य जानवरों पर भी एक नज़र डालेंगे। उसके बाद, एक अन्य चलचित्र के माध्यम से, हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि, अमर जेलीफ़िश (Immortal Jellyfish), सैद्धांतिक रूप से हमेशा के लिए कैसे जीवित रह सकती है।
संदर्भ:
https://tinyurl.com/4t8dvtbs
https://tinyurl.com/3vute7cb
https://tinyurl.com/3ksmfjd3
https://tinyurl.com/y5kk9wjj
https://tinyurl.com/3x5ahsun
चलिए जानते हैं, भारत की जलविद्युत क्षमता और इसके भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण योजनाओं को
नगरीकरण- शहर व शक्ति
Urbanization - Towns/Energy
22-03-2025 09:08 AM
Rampur-Hindi

रामपुर के नागरिकों, क्या आप जानते हैं कि मार्च 2020 तक भारत की जलविद्युत ऊर्जा क्षमता, 46,000 मेगावाट थी, जो देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का लगभग 12% थी ? इसके अलावा, भारत के जलविद्युत क्षेत्र के लिए 2024-2025 से लेकर 2031-2032 तक 12,461 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है।
आज हम भारत की जलविद्युत क्षमता (Hydroelectricity Production Capacity) की तुलना इसके भविष्य से करेंगे। फिर, हम जानेंगे कि भारत में जलविद्युत के लिए पैसे कैसे जुटाए जाते हैं और कौन सी संस्थाएं इसमें मदद करती हैं। इसके बाद, हम भारत के बजट में जलविद्युत के लिए आवंटित पैसे के बारे में बात करेंगे। अंत में, हम जलविद्युत के विकास को बढ़ावा देने के लिए योजनाओं पर चर्चा करेंगे।
भारत में जलविद्युत उत्पादन की वर्तमान स्थिति और संभावित क्षमता की तुलना
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (Central Electricity Authority (CEA)) के अनुसार, भारत में कुल 133 GW जलविद्युत क्षमता हो सकती है। लेकिन 31 अगस्त 2024 तक, इसमें से केवल 47 GW बड़े जलविद्युत और 5 GW छोटे जलविद्युत परियोजनाएं ही काम कर रही हैं। इसका मतलब है कि भारत की कुल जलविद्युत क्षमता का 40 प्रतिशत से भी कम हिस्सा ही उपयोग हो रहा है।
उत्तर-पूर्वी राज्य जैसे असम, अरुणाचल प्रदेश आदि में जलविद्युत की क्षमता है, यहां कुल 55,929.7 MW क्षमता हो सकती है। इसके बाद हिमाचल प्रदेश (18,305 MW), उत्तराखंड (13,481.35 MW), और जम्मू-कश्मीर (12,264.5 MW) का स्थान आता है। फिलहाल, उत्तर-पूर्वी राज्य में क्षमता का केवल 3.62 प्रतिशत, हिमाचल प्रदेश में 56.16 प्रतिशत, उत्तराखंड में 29.93 प्रतिशत, और जम्मू-कश्मीर में 27.4 प्रतिशत क्षमता का इस्तेमाल हो रहा है।
इसके अलावा, किसी छोटे जलविद्युत संयंत्र (Hydroelectric Poer Plant) की क्षमता, 21,133 MW हो सकती है, और इसके लिए 7,133 स्थलों पर काम किया जा सकता है, जैसा कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की के अध्ययन में बताया गया है। लेकिन वर्तमान में छोटे जलविद्युत का इस्तेमाल मात्र 25 प्रतिशत हुआ है यानी 5 GW क्षमता काम कर रही है।
पंप्ड स्टोरेज परियोजनाओं (Pumped Storage Projects (PSPs)) की क्षमता लगभग 176,280 MW हो सकती है, जिसमें पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में 66,580 MW और 60,475 MW की बहुत बड़ी संभावनाएं हैं। मगर फिलहाल भारत में इन परियोजनाओं की क्षमता, 5 GW से भी कम है, और इसके चालू होने की क्षमता केवल 3 GW है, जो अनुमानित क्षमता से बहुत कम है।
भारत में जलविद्युत वित्तपोषण
एन एच पी सी (National Hydroelectric Power Corporation (NHPC)) एक सरकारी संस्था है, जिसकी निवेश राशि 38,718 करोड़ रुपये है। यह मिनी रत्न श्रेणी-1 की भारतीय सरकारी कंपनी है, और इसका अधिकृत शेयर लगभग 15,000 करोड़ रुपये है, जो पूरी तरह से सरकार के पास है। केंद्र सरकार के फंड्स के अलावा, एनएचपीसी वाणिज्यिक ऋण और बॉन्ड्स के फ़ंड्स ज़रिए भी पैसे जुटाती है। मार्च 2017 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, एनएचपीसी का दीर्घकालिक ऋण 17,246 करोड़ रुपये था, जिसमें बॉन्ड्स, सुरक्षित टर्म लोन और असुरक्षित विदेशी मुद्रा लोन शामिल थे, जिनकी राशि क्रमशः 8,493 करोड़ रुपये, 4,479 करोड़ रुपये और 4,274 करोड़ रुपये थी। सुरक्षित ऋण में भारतीय बैंकों और वित्तीय संस्थाओं से लिया गया पैसा शामिल है, जैसे कि भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय ओवरसीज बैंक, आई सी आई सी आई बैंक (ICICI Bank), जम्मू और कश्मीर बैंक, बैंक ऑफ़ इंडिया, एक्सिस बैंक, पटियाला स्टेट बैंक, बीकानेर और जयपुर स्टेट बैंक, एचडीएफसी बैंक, इंडसइंड बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, कोटक महिंद्रा बैंक, आरबीएल बैंक, जीवन बीमा निगम, पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन और ग्रामीण विद्युतीकरण निगम।
जलविद्युत परियोजनाओं के लिए वित्तपोषण के लिए कई नए तरीके सामने आ रहे हैं। हाल ही में एक नया ट्रेंड तेज़ी से बढ़ रहा है, और वह है ग्रीन बॉन्ड्स का। ग्रीन बॉन्ड्स वे फ़िक्स्ड -इनकम लोन होते हैं, जिन्हें खासतौर पर पर्यावरण और जलवायु जोखिमों को कम करने के लिए परियोजनाओं को वित्तपोषित करने के लिए तैयार किया जाता है। 2016 में 80 बिलियन डॉलर से अधिक ग्रीन बॉन्ड्स जारी किए गए थे, जो पिछले साल से लगभग दोगुना था, लेकिन यह बाजार अभी भी शुरुआती चरण में है। ग्रीन बॉन्ड्स बाजार का लक्ष्य 2020 तक प्रति वर्ष 1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश प्राप्त करना है, ताकि यह पेरिस समझौते के अनुरूप हो सके। बहुपक्षीय विकास बैंकों और कॉर्पोरेट क्षेत्र के नेतृत्व में पोलैंड 2016 के अंत में पहला ग्रीन सोवरेन बॉन्ड जारी करने वाला देश बना, जिसमें $750 मिलियन जुटाए गए। इसके बाद, फ़्रांस ने जनवरी 2017 में $7.5 बिलियन जुटाए। अन्य देश जैसे स्वीडन, नाइजीरिया और केन्या भी इसे अपनाने की संभावना रखते हैं। भारत ने 2017 के अंत में ग्रीन बॉन्ड्स काउंसिल बनाई, जो भारतीय चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स और इंडस्ट्री (FICCI) और क्लाइमेट बॉन्ड्स इनिशिएटिव (CBI) का एक संयुक्त प्रोजेक्ट था। भारत ने 2017 के अप्रैल में 3.2 बिलियन डॉलर के ग्रीन बॉन्ड्स जारी किए और वैश्विक स्तर पर टॉप 10 में अपनी जगह बनाई।
भारत के हाल के बजट में जलविद्युत के लिए पैसे की व्यवस्था
भारत सरकार, जलविद्युत क्षेत्र के लिए पैसे दे रही है। इसके लिए 2024-2025 से 2031-2032 तक 12,461 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया है।
विद्युत मंत्रालय के अनुसार, इस पैसे से 31 गीगावाट (GW) जलविद्युत क्षमता बनाई जाएगी, जिसमें से 15 GW पंप्ड स्टोरेज क्षमता होगी।
के लिए जो मदद मिलेगी, वह छोटे प्रोजेक्ट्स के लिए 200 मेगावाट (MW) तक 1 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट होगी। 200 मेगावाट से के प्रोजेक्ट्स के लिए यह 200 करोड़ रुपये के अलावा 0.75 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट होगी।
अगर अधिकारियों को सही कारण मिलते हैं, तो यह राशि 1.5 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट तक बढ़ाई जा सकती है।
भारत में जिम्मेदार जलविद्युत विकास मार्ग
1.) शासन व्यवस्था को मज़बूत करना: प्राकृतिक संसाधनों के क्षेत्र में अच्छे शासन की आवश्यकता है ताकि देश में टिकाऊ और समावेशी विकास हो सके। इसके लिए देश को एक मज़बूत नीति ढांचा, विशेष क्षेत्रीय रणनीतियाँ और जलविद्युत परियोजनाओं को तेज़ी से बढ़ाने के लिए स्पष्ट और पारदर्शी प्रक्रिया चाहिए। यदि सरकारी एजेंसियाँ आपस में सही तरीके से काम करती हैं और प्रक्रिया मानकीकरण की जाती है, तो इससे निवेशकों के लिए एक बेहतर माहौल बनेगा।
2.) लाभ साझा करने का ढांचा: जलविद्युत परियोजनाओं के विकास में सामाजिक और पर्यावरणीय जोखिमों को कम करना बहुत ज़रूरी है। प्राकृतिक संसाधनों के विकास के लाभ और नकारात्मक प्रभाव आमतौर पर असमान रूप से बांटे जाते हैं, इसलिए लाभ-साझा करने की प्रक्रिया और जोखिम कम करने के उपायों की ज़रूरत है ताकि विकास टिकाऊ और स्थिर रहे। लाभ-साझा करने का मतलब है कि सरकार और परियोजना निर्माता दोनों को मिलकर लाभ और हानि को सही तरीके से साझा करना चाहिए, ताकि समाज में शांति बनी रहे और राष्ट्रीय रणनीतियाँ स्थानीय ज़रूरतों के अनुरूप हों।
3.) निवेश और वित्त पोषण को आसान बनाना: जलविद्युत परियोजनाएँ, बहुत बड़ी और महंगी होती हैं, इसलिए इन परियोजनाओं के लिए निवेश आकर्षित करना ज़रूरी है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि जोखिम का सही तरीके से बंटवारा किया जाए और कभी-कभी निवेशकों को बेहतर मुनाफे का अवसर भी दिया जाए। इसके साथ ही, सार्वजनिक-निजी साझेदारी (Public-Private Partnership (PPP)) को इस तरह से डिजाइन किया जाना चाहिए कि परियोजना के लिए ज़रूरी पूंजी, क्षमता और विश्वसनीयता को ध्यान में रखा जाए।
4.) बाज़ार के विकास को बढ़ावा देना: बाज़ार विकास के लिए नीतियाँ बनाना बहुत महत्वपूर्ण है ताकि निजी कंपनियाँ जलविद्युत क्षेत्र में निवेश कर सकें। निजी क्षेत्र जलविद्युत क्षेत्र की बड़ी संभावनाओं को पहचानता है, लेकिन इसे तेज़ी से बढ़ावा देने के लिए सरकार को नीति और नियामक ढांचे में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव करने होंगे।
5.) तकनीकी क्षमता का विकास: जलविद्युत परियोजनाओं में बहुत सी कठिनाइयाँ आती हैं, खासकर भूगोल और इलाके की वजह से। इन समस्याओं का समाधान करने के लिए सरकारी एजेंसियों को मज़बूत करना और नई तकनीकें व तरीकों को अपनाना ज़रूरी है। इस प्रक्रिया में जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ी विशिष्ट तकनीकी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए एजेंसियों को ज़रूरी उपकरण, प्रशिक्षण और सिस्टम देना होगा ताकि इन चुनौतियों का सामना किया जा सके।
संदर्भ:
मुख्य चित्र: एक झील पर बने बांध का ड्रोन से लिया गया दृश्य (Pexels)
हमारे रामपुर में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों के प्रति बढ़ रही है जागरूकता !
विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा
Thought II - Philosophy/Maths/Medicine
21-03-2025 09:11 AM
Rampur-Hindi

हमारा मानसिक स्वास्थ्य, हमारी सोच, भावनाओं, हमारे आसपास की दुनिया की धारणा और हमारे कार्यों को प्रभावित करता है। भारत में मनोरोग संबंधी बीमारी को लंबे समय से एक वर्जित और कलंकित विषय माना जाता रहा है, जहां व्यक्तियों को अपनी मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों के कारण सामाजिक बहिष्कार और भेदभाव का सामना करना पड़ता है। लेकिन अब आपको यह जानकर खुशी होगी कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ रही है। 2021 में एक सर्वेक्षण के दौरान, नौ भारतीय महानगरीय केंद्रों में 3497 उत्तरदाताओं में से, 92 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने जवाब दिया कि वे अपने या अपने किसी परिचित के मानसिक विकारों की स्थिति में पेशेवर मनोचिकित्सक से उपचार लेंगे, जो 2018 में 54 प्रतिशत से अधिक है। हालांकि, अभी भी पूरे देश में मानसिक रोगों को लेकर जागरूकता कम है। तो आइए, आज भारत में मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता को बढ़ावा देने में आने वाली चुनौतियों के बारे में जानते हुए समझने का प्रयास करते हैं कि हमारे देश में अन्य शारीरिक बीमारियों की तुलना में इस प्रकार की बीमारी पर उतना ध्यान क्यों नहीं दिया जाता है। इसके साथ ही, हम भारत में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों से संबंधित कुछ प्रमुख आंकड़ों और मनोचिकित्सकों की कमी के मुद्दे पर चर्चा करेंगे। अंत में, हम भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान के लिए हाल के वर्षों में उठाए गए कदमों और उपायों पर कुछ प्रकाश डालेंगे।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता को बढ़ावा देने में आने वाली चुनौतियां:
- संसाधनों की कमी: भारत में मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों और सुविधाओं की कमी है, जिससे लोगों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है। इसके अतिरिक्त, मौजूदा सेवाएं भी अधिकांश आबादी के लिए वहनीय नहीं हैं।
- सीमित ज्ञान: भारत में सामान्य आबादी के बीच मानसिक स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान और समझ की कमी है। बहुत से लोगों को मानसिक बीमारी के लक्षणों या मदद लेने के तरीके के बारे में जानकारी नहीं होती है।
- सांस्कृतिक मान्यताएँ: मानसिक बीमारी से जुड़ी पारंपरिक मान्यताएं भी चिकित्सीय मदद में बाधा बन सकती हैं। भारत में आज भी कई लोग मानते हैं कि मानसिक बीमारी अलौकिक या आध्यात्मिक कारकों के कारण होती है और मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के बजाय पारंपरिक चिकित्सकों से मदद लेते हैं।
- सरकारी समर्थन का अभाव: भारत में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे को संबोधित करने के लिए पर्याप्त संसाधन आवंटित नहीं किए गए हैं, और कई मौजूदा मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम जनसंख्या के अनुरूप अपर्याप्त हैं।
इन चुनौतियों से कैसे निपटें:
इन चुनौतियों पर काबू पाने के लिए, भारत में मानसिक स्वास्थ्य को संबोधित करने की दिशा में अधिक संसाधनों और प्रयासों की आवश्यकता है। इसमें मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाना, जनता को मानसिक स्वास्थ्य के बारे में शिक्षित करना और मानसिक बीमारी से जुड़े कलंक को कम करना शामिल है। इसके अतिरिक्त, मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता बढ़ाने के प्रयास में धार्मिक और सामुदायिक नेताओं को शामिल करना लाभदायक हो सकता है।
भारत में मानसिक बीमारी कलंक क्यों है:
आज भी भारत में मानसिक बीमारी को अक्सर अंधविश्वास और अज्ञानता के चश्मे से देखा जाता है। बहुत से लोग मानते हैं कि मनोरोग संबंधी बीमारियाँ व्यक्तिगत कमज़ोरी, बुरे कर्म या यहाँ तक कि बुरी आत्माओं के कब्ज़े के कारण होती हैं। ये अंधविश्वास, मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों से पीड़ित व्यक्तियों को समाज में स्वयं को शर्मिंदा अनुभव कराते हैं। इसके अलावा, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को अक्सर एक पारिवारिक मामला माना जाता है, जिसे लोगों की नज़रों से छिपाकर रखा जाना चाहिए। अधिकांश लोग, पेशेवर मदद लेने से झिझकते हैं। मानसिक बीमारी से जुड़ा कलंक सामाजिक अलगाव, रोज़गार के अवसरों की हानि और परिवार और दोस्तों के साथ तनावपूर्ण संबंधों को जन्म दे सकता है। इससे पहले से ही मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों से जूझ रहे व्यक्तियों की पीड़ा और भी अधिक बढ़ जाती है।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों से संबंधित कुछ प्रमुख आँकड़े:
भारत में लगभग 60 से 70 मिलियन (6 से 7 करोड़) लोग, सामान्य और गंभीर मानसिक विकारों से पीड़ित हैं। यह एक चिंता का विषय है कि पूरी दुनिया में सबसे अधिक आत्महत्या भारत में होती है, जहां एक वर्ष में आत्महत्या के लगभग 2.6 लाख से अधिक मामले सामने आते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रति लाख लोगों पर आत्महत्या की औसत दर 10.9 है। भारत में मानसिक स्वास्थ्य रोगियों की चिंताजनक संख्या को देखते हुए यह जानना आवश्यक है कि हम भारत में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों से निपटने के लिए कितने सक्षम हैं। भारत में प्रति 100,000 लोगों पर केवल 0.3 मनोचिकित्सक, 0.07 मनोवैज्ञानिक और 0.07 सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वहीं, विकसित देशों में मनोचिकित्सकों का अनुपात प्रति 100,000 पर 6.6 है और वैश्विक स्तर पर मानसिक अस्पतालों की औसत संख्या प्रति 100,000 पर 0.04 है जबकि भारत में यह केवल 0.004 है।
भारत में मनोचिकित्सकों की संख्या कम क्यों हैं:
- अपर्याप्त स्नातक शिक्षा: विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में न के बराबर स्नातक चिकित्सा पाठ्यक्रम (Undergraduate medical courses), मनोचिकित्सा पर केंद्रित है। स्नातक स्तर पर, मनोचिकित्सा पर बहुत कम अनिवार्य परीक्षाएं होती हैं और पाठ्यक्रम भी कठोर नहीं हैं।
- स्नातकोत्तर सीटों की सीमित संख्या: जब मनोचिकित्सा में स्नातकोत्तर शिक्षा (postgraduate education) की बात आती है, तो मेडिकल कॉलेजों में पर्याप्त सीटें उपलब्ध नहीं हैं। वर्तमान में, भारत में मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में केंद्र द्वारा वित्त पोषित केवल 21 उत्कृष्टता केंद्र हैं। मनोचिकित्सा में अति विशेषज्ञता पाठ्यक्रम बहुत कम हैं। अब तक, भारत में केवल दो अति विशेषज्ञता पाठ्यक्रम हैं - बाल और किशोर मनोचिकित्सा, तथा वृद्धावस्था मानसिक स्वास्थ्य।
- चिकित्सकों का पलायन: भारत में पर्याप्त मनोचिकित्सकों की कमी का एक और कारण यह है कि अधिकांश मनोचिकित्सक, विदेशों में बेहतर संभावनाओं की तलाश में देश छोड़ देते हैं। भारत में अच्छे अवसरों की कमी के कारण प्रतिभा पलायन होता है, जो जनसंख्या में मनोचिकित्सकों के विषम अनुपात को देखते हुए विडंबनापूर्ण है। यह विडंबना ही तो है कि भारत में जितने मनोचिकित्सक हैं, उससे कहीं अधिक मनोचिकित्सक पश्चिमी देशों में भारतीय मूल के हैं।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान के लिए उठाए गए कदम और उपाय:
देश में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान के लिए भारत सरकार, मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की संख्या बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। भारत सरकार द्वारा देश में 'राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम' (National Mental Health Programme (NMHP)) लागू किया गया है, जिसके तृतीयक देखभाल घटक के तहत, मानसिक स्वास्थ्य विशिष्टताओं में पीजी विभागों में छात्रों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ तृतीयक स्तर की उपचार सुविधाएं प्रदान करने के लिए 25 उत्कृष्टता केंद्रों को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा, सरकार द्वारा मानसिक स्वास्थ्य विशिष्टताओं में 47 पीजी विभागों को मज़बूत करने के लिए 19 सरकारी मेडिकल कॉलेजों/संस्थानों को भी समर्थन दिया गया है। एन एम एच पी (National Mental Health Programme (NMHP)) के ज़िला ' मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम' को 767 ज़िलों में कार्यान्वयन के लिए मंज़ूरी दे दी गई है, जिसके लिए, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के माध्यम से राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को सहायता प्रदान की जाती है।
सरकार प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने के लिए भी कदम उठा रही है। सरकार द्वारा 1.73 लाख से अधिक उप स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में अपग्रेड किया है। इन आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में प्रदान की जाने वाली व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के तहत सेवाओं के पैकेज में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को जोड़ा गया है।
| चित्र स्रोत : Wikimedia
2018 में भारत सरकार द्वारा तीन केंद्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों - राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान (National Institute of Mental Health and Neuro Sciences (NIMHANS)), बेंगलुरु, लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई क्षेत्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान (Lokopriya Gopinath Bordoloi Regional Institute of Mental Health (LGBRIMH)), तेजपुर, असम और केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान (Central Institute of Psychiatry (CIP)), रांची - की स्थापना की गई, जहां डिजिटल अकादमियों के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य देखभाल चिकित्सा और पैरा-मेडिकल पेशेवरों की विभिन्न श्रेणियों को ऑनलाइन प्रशिक्षण पाठ्यक्रम प्रदान किया जाता है। डिजिटल अकादमियों के तहत प्रशिक्षित पेशेवरों की कुल संख्या 42,488 है।
साथ ही, 66 संस्थान/विश्वविद्यालयों में 'एम.फिल चिकित्सा मनोविज्ञान' पाठ्यक्रम उपलब्ध है। शैक्षणिक सत्र 2024-25 से चिकित्सा मनोविज्ञान में अधिक पेशेवरों को विकसित करने के लिए, चिकित्सा मनोविज्ञान (ऑनर्स) पाठ्यक्रम और इस पाठ्यक्रम की पेशकश करने के लिए 19 विश्वविद्यालयों को मंज़ूरी दी गई। उपरोक्त के अलावा, सरकार द्वारा देश में गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य परामर्श और देखभाल सेवाओं तक पहुंच को और बेहतर बनाने के लिए 10 अक्टूबर 2022 को एक "राष्ट्रीय टेली मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम" शुरू किया गया। 22 नवंबर 2024 तक, 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 53 टेली मानस सेल स्थापित किए गए हैं और टेली मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं शुरू की गई हैं। 10 अक्टूबर, 2024 को 'विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस' के अवसर पर सरकार द्वारा टेली मानस मोबाइल एप्लिकेशन भी लॉन्च की गई। टेली-मानस मोबाइल एप्लिकेशन, एक व्यापक मोबाइल प्लेटफ़ॉर्म है जिसे मानसिक स्वास्थ्य से लेकर मानसिक विकारों तक के मुद्दों के लिए सहायता प्रदान करने के लिए विकसित किया गया है।
संदर्भ:
मुख्य चित्र स्रोत : pexels
चलिए आज जानें, पूर्वोत्तर भारत के कामरुप साम्राज्य व वर्मन राजवंश के बारे में
छोटे राज्य 300 ईस्वी से 1000 ईस्वी तक
Small Kingdoms: 300 CE to 1000 CE
20-03-2025 09:21 AM
Rampur-Hindi

क्या आप सब जानते हैं कि, पूर्वोत्तर भारत में ‘कामरूप साम्राज्य’ (Kamarupa kingdom), तीन राजवंशों – वर्मन, म्लेच्छ और पाल राजवंश द्वारा शासित था। इस राज्य का इतिहास चौथीं शताब्दी का है। चलिए आज, कामरुप साम्राज्य और इसकी उत्पत्ति के बारे में विस्तार से बात करते हैं। फिर हम, वर्मन राजवंश और इसके सबसे महत्वपूर्ण शासकों पर ध्यान केंद्रित करेंगे। इसके बाद, हम इस राजवंश के तहत, कामरूप राज्य के व्यवस्थापकों पर कुछ प्रकाश डालेंगे। उसके बाद, हम वर्मन राजवंश की कुछ सांस्कृतिक उपलब्धियों का भी पता लगाएंगे। एवं अंत में, हम कामरूप साम्राज्य के सिक्कों के बारे में जानेंगे।
कामरूप राज्य का परिचय:
प्राचीन भारतीय राज्य – कामरूप, वर्तमान में उत्तरपूर्वी भारत में, असम राज्य है। इस क्षेत्र में कई शासक थे। लेकिन, प्राकृतिक किलेबंदी द्वारा संरक्षित किए जाने से, काफ़ी सुसंगत क्षेत्रीय सीमाओं को बनाए रखा गया था।
कामरूप पर, लगभग 350 ईसवी से लेकर बारहवीं शताब्दी के मध्य तक, तीन राजवंशों का शासन था। यद्यपि कामरूप छठवीं शताब्दी से, गुप्त साम्राज्य के सामंती राज्य के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन, यह एक स्वतंत्र राज्य के रूप में भी मौजूद था। यद्यपि, 13 वीं शताब्दी में कई मुस्लिम आक्रमणों को हटा दिया गया था, इसी अवधि में, इस क्षेत्र में उत्तर से उत्तरी म्यांमार (Myanmar) के अहोम जनजाति ने घुसपैठ किया था। धीरे–धीरे, इस क्षेत्र को अपने नियंत्रण में करने के बाद, वे पश्चिम की ओर बढ़े। अहोम ने इस क्षेत्र को ‘असम’ (या संभवतः असमा) के रूप में संदर्भित किया, और इस शब्द ने अंततः क्षेत्र के लिए स्वीकृत नाम के रूप में कामरूप की जगह ले ली। दक्षिण और पूर्वी एशियाई संस्कृतियों का एक अनूठा मिश्रण होने के बावजूद, कामरूप, गुवाहाटी में कामाख्या मंदिर परिसर सहित, हिंदू धर्म के तांत्रिक रूप के लिए विकास का केंद्र था।

वर्मन राजवंश के महत्वपूर्ण शासक:
1.) पुष्य वर्मन (355-380 ईसवी) –
उनके शासनकाल का संदर्भ, इलाहाबाद स्तंभ प्रासस्ती में किया गया है, जहां कामरूप और दावक को गुप्त आधिपत्य को स्वीकार करते हुए, सीमांत राज्यों के रूप में उल्लेख किया गया है। उन्होंने गुप्त काल के दौरान, भारतीय भू -राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2.) बालवर्मन (405–420 ईसवी) –
उनकी बेटी – अमृतप्रभा ने कश्मीर के मेघहन से शादी की, जो असम को कश्मीर की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत से जोड़ता है। अमृतप्रभा ने कश्मीर में बौद्ध स्मारकों का भी निर्माण किया, जो कामरूप में शुरुआती बौद्ध संबंधों का प्रदर्शन करते हैं।
3.) कल्याण वर्मन (420–440 ईसवी) –
कल्याण वर्मन ने दावक साम्राज्य (वर्तमान कपिली घाटी) को, कामरूप साम्राज्य में शामिल किया। संभवतः असम की बढ़ती प्रमुखता के प्रतीक के रूप में, उन्होंने चीन के लिए एक राजनयिक दूत-कर्म भेजा।
4.) महेंद्र वर्मन (450–485 ईसवी) –
उन्होंने, गुप्त वंश से लड़कर, अपनी संप्रभुता और स्वतंत्रता का प्रदर्शन किया, और कामरूप की सीमाओं को दक्षिण–पूर्व बंगाल में बढ़ाया।
5.) भूटी वर्मन (510–555 ईसवी) –
प्राचीन असम का सबसे पहला दिनांकित शिलालेख – बादगंगा एपिग्राफ़, भूटीवर्मन के शासनकाल से संबंधित है। उन्होंने बंगाल में कामरूप के क्षेत्रों का विस्तार किया, जिसमें पंड्रवर्धन क्षेत्र (आधुनिक उत्तर बंगाल) शामिल थे। उन्होंने धर्म और शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाते हुए, 200 से अधिक ब्राह्मण परिवारों को ज़मीन भी दी थी।
6.) भास्कर वर्मन (594-650 ईसवी) –
भास्कर वर्मन, जिन्हें ‘कुमार राजा’ के नाम से भी जाना जाता है, वर्मन राजवंश के सबसे प्रसिद्ध शासक थे।
हर्षवर्धन के साथ गठबंधन: हर्ष के साथ एक रणनीतिक गठबंधन बनाने के लिए, भास्कर वर्मन ने अपने राजदूत – हंसवेग को भेजा, जिसने गौड़ा के शशांक को हराने में मदद की। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग (Hiuen Tsang) ने भास्करवर्मन की बुद्धि, कूटनीति और उदारता की प्रशंसा की। ह्वेन त्सांग की विदाई के दौरान, भास्कर ने उन्हें बारिश और ठंड से बचाने के लिए, त्वचा जानवरों की से बनी एक टोपी प्रस्तुत की। उन्होंने निदानपुर अनुदान भी जारी किया, जो पहले भूमि दान की पुष्टि करते हैं।
वर्मन राजवंश का प्रशासन और समाज:
वर्मन राजवंश ने नागरिक और सैन्य कार्यों के बीच एक स्पष्ट सीमांकन के साथ, एक परिष्कृत प्रशासनिक ढांचे का प्रदर्शन किया। राज्य को प्रांतों और ज़िलों में विभाजित किया गया था, जिसे प्रत्येक राजा द्वारा नियुक्त अधिकारियों द्वारा प्रबंधित किया गया था। इस प्रशासनिक संरचना ने कुशल संसाधन प्रबंधन, व्यवस्थित कर संग्रह तथा कानून और व्यवस्था के रखरखाव की सुविधा प्रदान की।
सामाजिक रूप से, वर्मन ने ब्राह्मणवाद के साथ स्वदेशी परंपराओं और विश्वासों के एकीकरण को बढ़ावा दिया। इस अवधि से मिले शिलालेख और पुरातात्विक निष्कर्ष, स्थानीय एनिमिस्टिक पंथों (Animistic cults) से लेकर हिंदू धर्म तक, विविध धार्मिक प्रथाओं के एक सह -अस्तित्व और संश्लेषण को इंगित करते हैं। ये बातें, वर्मन शासन की समावेशी प्रकृति को उजागर करती हैं।
कामरूप राजाओं की ताम्रपत्र मुहर | चित्र स्रोत : WIkimedia
वर्मन राजवंश की सांस्कृतिक उपलब्धियां:
वर्मन युग को कला, साहित्य और वास्तुकला के उत्कर्ष द्वारा चिह्नित किया गया था। इस समय से प्राप्त संस्कृत शिलालेख, एक उच्च स्तर की छात्रवृत्ति और एक क्षेत्र में संस्कृत संस्कृति के प्रसार को दर्शाते हैं, जिसे अन्यथा, भारतीय सांस्कृतिक मुख्य आधार पर परिधीय माना जाता है। यद्यपि, इस अवधि से कुछ वास्तुशिल्प अवशेष बच गए हैं, ज़ुआनजांग (Xuanzang) जैसे चीनी यात्रियों के साहित्यिक संदर्भ और खाते, महत्वपूर्ण मंदिरों और शैक्षणिक संस्थानों के अस्तित्व का सुझाव देते हैं।
कामरूप राजवंश के सिक्के:
मई 2022 के दौरान, तांबे और चांदी से बने दुर्लभ और अद्वितीय एकल मुख सिक्के, जो त्यागीसिंह (890-900 ईसवी) की अवधि से संबंधित हैं, मध्य असम के मोरीगांव ज़िले में खोजे गए थे। त्यागीसिंह दरअसल, म्लेच्छ राजवंश के अंतिम शासक थे।
पुरातत्व विभाग के राज्य निदेशालय द्वारा, कुल 12 सिक्के और सिक्कों के 10 टूटे हुए टुकड़े बरामद किए गए हैं। ये सिक्के, ज़्यादातर तांबे से बने होते हैं और उनमें से केवल कुछ ही चांदी से बने होते हैं। निदेशालय का कहना है कि, इनके अधिक अध्ययन की आवश्यकता है। सिक्कों के केवल अग्र भाग पर ही, असमिया और बंगाली लिपि में प्रयुक्त वर्ण ढाला गया है। जबकि, पिछले भाग को खाली छोड़ दिया गया है, जिसके कारण, ये सिक्के एकल मुख वाले कहलाए जाते हैं।
संदर्भ:
मुख्य चित्र: कामरूप साम्राज्य का मानचित्र (Wikimedia)
रामपुर, चलिए सीताफल की मिठास को याद करके पढ़ते हैं, इसके स्वास्थ्य लाभों के बारे में
फल-सब्ज़ियां
Fruits and Vegetables
19-03-2025 09:13 AM
Rampur-Hindi

हमारे रामपुर में सीताफल, एक आम फल है, क्योंकि यह अच्छी तरह से सुखी मिट्टी के साथ, गर्म जलवायु में खास बढ़ता है। यह हमारे क्षेत्र में किसानों के लिए एक उपयुक्त फ़सल है। सीताफल, न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि विटामिन (Vitamins), फ़ाइबर (Fibre) और एंटीऑक्सिडेंट (Antioxidants) में भी समृद्ध है। यह हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ावा देने, पाचन में सुधार करने और हृदय स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में भी मदद करता है। कम कैलोरी मात्रा, परंतु पोषक तत्वों में उच्च होने के कारण, यह एक स्वस्थ फल है।
आज, हम सीताफल के संक्षिप्त परिचय पर चर्चा करेंगे। हम इसके स्वास्थ्य लाभों का पता भी लगाएंगे। इसके बाद, हम भारत में इसकी बाज़ार क्षमता को देखेंगे। हम सीताफल की खेती के लिए आवश्यक, आदर्श जलवायु और मिट्टी स्थिति के बारे में भी पढ़ेंगे। अंत में हम जानेंगे कि, देश भर में इस फल की कौन सी लोकप्रिय किस्में उगाई जाती हैं।
सीताफल का विवरण:
कस्टर्ड ऐप्पल (Custard apple) या सीताफल (एनोना स्क्वैमोसा एल. – Annona squamosa L.) को, इसके अत्यंत मीठे व नाज़ुक गुदे के कारण, ‘शुष्क क्षेत्र की नज़ाकत’ कहा जा सकता है। सीताफल पूरे भारत में, सीताफल या सीता पालम या शरीफ़ा के रूप में लोकप्रिय है।
यह लगभग, 5-6 मीटर ऊंचाई वाली एक पर्णपाती या अर्ध पर्णपाती लंबी झाड़ी है, जिसमें अनियमित रूप से फ़ैलने वाली शाखाएं होती हैं। सीताफल, कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates) में समृद्ध होते हैं, जिसमें मुख्य रूप से शर्करा (23.5%), प्रोटीन (1.6%), कैल्शियम (17 मिलीग्राम/100 ग्राम), फ़ॉस्फोरस (47 मिलीग्राम/100 ग्राम) और लौह (1.5 मिलीग्राम/100 ग्राम) शामिल हैं।
यह भारत में उष्णकटिबंधीय अमेरिका से पेश किए गए, कुछ सबसे बेहतरीन फलों में से एक है, और देश के कई हिस्सों में जंगली रूप में पाया गया है। यह चीन (China), फ़िलीपींस (Phillippines), मिस्र(Egypt) और मध्य अफ़्रीका (Central Africa) में आम है।
सीताफल अपने रंग में, गहरे हरे भूरे होते हैं, और इनका छिलका उठाव एवं गिराव के साथ चिह्नित होता है। इसका गुदा लाल–पीला, मीठा और बहुत नरम है, लेकिन, बीजों को ज़हरीला माना जाता है।
भारत में सीताफल उत्पादक क्षेत्रों में असम, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु शामिल हैं। देश में लगभग 55,000 हेक्टेयर क्षेत्र सीताफल की खेती के लिए समर्पित हैं। महाराष्ट्र के साथ, गुजरात एक और बड़ा सीताफल उत्पादक राज्य है। यह फल खारी मिट्टी से लेकर सुखी मिट्टी जैसे विभिन्न स्थितियों को सहन करता है। वास्तव में, किसान आमतौर पर बंजर भूमि में, पहाड़ियों पर इन फलों की खेती करते हैं। हालांकि, अनियमित बारिश इन फलों की गुणवत्ता को बाधित करती है।
सीताफल के स्वास्थ्य लाभ:
एक स्वादिष्ट फल के रूप में सेवन किए जाने के अलावा, सीताफल का उपयोग शेक, स्मूदी, मिठाई, आइसक्रीम और पौष्टिक स्नैक्स तैयार करने के लिए भी किया जा सकता है। यह फल, उत्कृष्ट स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है, क्योंकि यह कैल्शियम (Calcium), मैग्नीशियम (Magnesium), लौह (Iron), नियासिन (Niacin), पोटैशियम (Potassium) और विटामिन सी (Vitamin-C) जैसे एंटी-ऑक्सीडेंट में समृद्ध है।
•विटामिन ए (Vitamin-A) में समृद्ध:
स्वस्थ त्वचा और बालों को बढ़ावा देता है, तथा आंखों की रोशनी एवं दांतों की सड़न का मुकाबला करने में मदद करता है।
•विटामिन बी 6, पोटैशियम और मैग्नीशियम से भरपूर:
ब्रोन्कियल सूजन को कम करने में मदद करता है; दमा को रोकता है; हृदय रोगों के जोखिम को कम करने में मदद करता है; तथा रक्तचाप के स्तर को बनाए रखने में मदद करता है।
•तांबे, नियासिन और आहार फ़ाइबर में समृद्ध:
पाचन में सहायता करता है; आंत्र संचलन को बनाए रखता है; टाइप-2 मधुमेह के जोखिम को कम करता है; एवं कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol) के स्तर को प्रभावी ढंग से कम करने में मदद करता है।
•समृद्ध लौह स्रोत:
एनीमिया के इलाज़ में उपयोगी है।
•गर्भावस्था में उपयोगी:
स्त्रियों में दूध उत्पादन के लिए एवं भ्रूण के स्वस्थ विकास में मदद करता है।
बाज़ार क्षमता-
भारत में, महाराष्ट्र, 92,320 टन की उपज के साथ, सीताफल के उत्पादन में, देश का नेतृत्व करता है। उसके बाद गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का स्थान आता हैं। यह असम, बिहार, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में भी उगाया जाता है। गुजरात में यह मुख्य रूप से एक ‘सीमा फ़सल’ (State Institute for Management of Agriculture (SIMA)) के रूप में उगाया जाता है और यह जंगलों में भी व्यापक रूप से बढ़ता है।
एक तरफ़, भारत सरकार ने इस छोटे से अपितु महत्वपूर्ण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए, स्थानीय किसानों को विदेशी खाद्य सामग्री के बीज और पौधे प्रदान करने की घोषणा की है।
सीताफल की खेती के लिए आवश्यक जलवायु और मिट्टी-
•जलवायु:
सभी एनोना फल, उष्णकटिबंधीय मूल के हैं, और अलग-अलग स्तर वाले गर्म और शुष्क जलवायु में अच्छी तरह से बढ़ते हैं। सीताफल को पुष्पन के समय, गर्म व शुष्क जलवायु एवं फलों की स्थापना के समय, उच्च आर्द्रता की आवश्यकता होती है। इनमें, मई की गर्म शुष्क जलवायु के दौरान, फूल आते है, लेकिन फल की स्थापना मानसून की शुरुआत में होती है। कम आर्द्रता, सीताफल पेड़ों के परागण और निषेचन के लिए हानिकारक है। सूखे की स्थिति, बादल वाली स्थिति और यहां तक कि, जब तापमान 15 डिग्री सेल्सियस से नीचे जाता है, तब भी सीताफल इसका सामना करता है। इसके लिए, 50-80 सेंटीमीटर की वार्षिक वर्षा इष्टतम है, हालांकि, यह उच्च वर्षा का भी सामना कर सकता है।
•मिट्टी:
सीताफल को किसी खास प्रकार की मिटटी की आवशयकता नहीं होती है, और उथली, रेतीली जैसी सभी प्रकार की मिट्टी में पनपता है। लेकिन, मिट्टी के नीचे वाला मृदा भाग खराब हो जाता है, तो यह बढ़ने में विफ़ल रहता है। यह अच्छी जल निकास वाली मिट्टी और गर्म जलवायु में तेज़ी से बढ़ता है। थोड़ी सी लवणता या अम्लता भी इसे प्रभावित नहीं करती है, लेकिन क्षारीयता, अधिक क्लोरीन, खराब जल निकासी या दलदली-गीली भूमि, इसके विकास और फ़लने में बाधा डालती है।
सीताफल की विभिन्न किस्में:
देश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में उगाई जाने वाली, सीताफल की कुछ किस्में निम्नलिखित हैं–
१.लाल सीताफल (Red custard apple)
२.बालनगर (Balanagar)
३.हाइब्रिड सीताफल (Hybrid custard apple)
४.वाशिंगटन (Washington)
५.पुरंदर(पुणे) (Purandhar (Pune))
संदर्भ:
मुख्य चित्र स्रोत : pxhere
रामपुर, आइए आज अवगत होते हैं, भारत में वर्नैक्यूलर शिक्षा की शुरुआत और इसके महत्व से
उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक
Colonization And World Wars : 1780 CE to 1947 CE
18-03-2025 09:12 AM
Rampur-Hindi

छात्रों को उनकी मूल भाषा में पढ़ाने की प्रथा को वर्नाक्यूलर शिक्षा (Vernacular Education) के नाम से जाना जाता है। यह इस विचार पर आधारित है कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने से छात्रों के शैक्षिक अनुभव में सुधार हो सकता है। 1854 के "वुड्स डिस्पैच" (Wood’s Despatch) के बाद, भारत में स्थानीय भाषा शिक्षा को महत्वपूर्ण गति मिली, जिसने प्राथमिक शिक्षा में स्थानीय भाषाओं का उपयोग करने की सिफ़ारिश की। तो आइए, आज भारत में वर्नाक्युलर शिक्षा के महत्व और विकास के कालानुक्रमिक क्रम के बारे में जानते हैं। इसके साथ ही, हम वर्नाक्यूलर प्रेस अधिनियम (Vernacular Press Act) के बारे में जानेंगे और आधुनिक भारत में वर्नाक्युलर शिक्षा के कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डालेंगे। अंत में, हम रामपुर में शैक्षिक क्षेत्र की वर्तमान स्थिति के बारे में समझेंगे।

शिक्षा में स्थानीय भाषा का महत्व:
शिक्षा में स्थानीय भाषाओं के उपयोग से परिणामों, भागीदारी और ड्रॉपआउट दर (Droupout rate) पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा मिलने पर छात्रों के शैक्षिक अनुभवों में महत्वपूर्ण रूप से सुधार होता है। स्थानीय भाषा में शिक्षा न केवल वैचारिक स्पष्टता, आत्मविश्वास और सामाजिक सामंजस्य को बढ़ावा देती है, बल्कि विशेष रूप से ग्रामीण और आर्थिक रूप से वंचित छात्रों को भी लाभान्वित करती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 (National Education Policy 2020) के दिशानिर्देशों में, शिक्षा में समानता, पहुंच और समावेशिता को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय भाषाओं का समर्थन किया गया है, जो शिक्षा में स्थानीय भाषाओं के प्रयोग के महत्व को दर्शाता है।
वर्नाक्यूलर शिक्षा के विकास का कालानुक्रमिक क्रम:
ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान, भारत में वर्नाक्यूलर शिक्षा के उद्भव से शैक्षिक नीतियों और प्रथाओं में महत्वपूर्ण बदलाव आया। ब्रिटिश प्रभुत्व से पहले, स्वदेशी शिक्षा प्रणालियाँ ज्यादातर पारंपरिक शिक्षण और शिक्षण तकनीकों पर आधारित थीं, जो अक्सर स्थानीय भाषाओं में थीं। ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों ने शैक्षिक वातावरण में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाए, विशेष रूप से वर्नाक्यूलर शिक्षा के प्रोत्साहन और विकास के माध्यम से। इस विकास को निम्न प्रकार समझा जा सकता है:
- 1835, 1836, 1838: बंगाल और बिहार में वर्नाक्यूलर शिक्षा पर विलियम एडम (William Adam) की रिपोर्ट ने कार्यक्रम की खामियों को उजागर किया।
- 1843-53: उत्तर-पश्चिम प्रांत के लेफ़्टिनेंट गवर्नर, जेम्स जोनाथन ने प्रत्येक तहसील में एक मॉडल स्कूल के रूप में एक सरकारी स्कूल और शिक्षकों के लिए एक सामान्य स्कूल बनाया।
- 1853: एक प्रसिद्ध लिखित ब्योरे में, लॉर्ड डलहौजी ने वर्नाक्यूलर शिक्षा के पक्ष में राय व्यक्त की।
- 1854: वुड्स डिस्पैच द्वारा स्थानीय शिक्षा के लिए निम्नलिखित दिशानिर्देश स्थापित किए गए थे:
- मानकों का उत्थान,
- सरकारी निकाय द्वारा नियंत्रण,
- शिक्षकों का नियमित स्कूलों में प्रशिक्षण,
- स्थानीय भाषा में प्राथमिक शिक्षा।
- 1854-71: ब्रिटिश प्रशासन ने माध्यमिक शिक्षा और वर्नाक्यूलर शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया और पहले की तुलना में पांच गुना से भी अधिक स्थानीय भाषा के स्कूल खोले गए।
- 1882: हंटर आयोग (Hunter Commission) का मानना था कि राज्य को वर्नाक्यूलर शिक्षा के विस्तार और सुधार के लिए विशेष प्रयास करने चाहिए।
- 1904: शिक्षा नीति में वर्नाक्यूलर शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया और इसके लिए अनुदान बढ़ाया गया।
- 1929: हार्टोग समिति ने प्राथमिक शिक्षा की निराशाजनक तस्वीर प्रस्तुत की।
- 1937: वर्नाक्यूलर विद्यालयों को कांग्रेस मंत्रालयों से प्रोत्साहन मिला।
वर्नाक्यूलर प्रेस अधिनियम:
ब्रिटिश भारत में, आयरिश प्रेस कानूनों पर आधारित वर्नाक्यूलर' प्रेस अधिनियम' (Vernacular Press Act 1878) को भारतीय प्रेस की स्वतंत्रता को कम करने और ब्रिटिश नीतियों के प्रति आलोचना की अभिव्यक्ति को रोकने के लिए अधिनियमित किया गया था। सरकार द्वारा जनमत और उसके प्रति देशद्रोही लेखन को प्रबंधित करने हेतु स्वदेशी प्रेस को विनियमित करने के लिए, वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम, 1878 को अपनाया गया। यह अधिनियम, भारत के तत्कालीन वायसराय लिटन द्वारा प्रस्तावित किया गया और 14 मार्च 1878 को वायसराय लॉर्ड लिटन (Lord Lytton) की परिषद द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया। इस अधिनियम में अंग्रेज़ी भाषा के प्रकाशनों को शामिल नहीं किया गया था, क्योंकि इसका उद्देश्य दक्षिण को छोड़कर देश में हर जगह 'ओरिएंटल भाषाओं में प्रकाशनों' में देशद्रोही लेखन को नियंत्रित करना था। इस अधिनियम ने सरकार को निम्नलिखित तरीकों से प्रेस पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार दिया:
- आयरिश प्रेस अधिनियम पर आधारित, इस अधिनियम ने सरकार को वर्नाक्युलर प्रेस में रिपोर्ट और संपादकीय को सेंसर करने के व्यापक अधिकार प्रदान किए।
- सरकार विभिन्न भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों पर नियमित रूप से नज़र रखने लगी।
- यदि किसी अखबार में छपने वाली किसी रिपोर्ट को देशद्रोही करार दिया जाता था, तो उस अखबार को चेतावनी दी जाती थी।
भारत में वर्नाक्यूलर शिक्षा के कार्यान्वयन में चुनौतियां:
सीमित नामांकन: अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (All India Council for Technical Education (AICTE)) के अनुसार, एन ई पी 2020 (National Education Policy 2020) के हिस्से के रूप में क्षेत्रीय भाषाओं में इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम शुरू करने के प्रयासों के बावजूद, शैक्षणिक वर्ष 2021-22 में, क्षेत्रीय भाषाओं में बीटेक कार्यक्रमों के लिए आवंटित 1,140 सीटों में से केवल 233 सीटें भरी गईं। 2022-23 तक इस आंकड़े में थोड़ा सुधार हुआ, लेकिन कई कॉलेजों में अभी भी पर्याप्त रिक्तियां बनी हुई हैं। उदाहरण के लिए, गुजरात तकनीकी विश्वविद्यालय (Gujarat Technological University) में गुजराती-माध्यम पाठ्यक्रमों के लिए कोई नामांकन नहीं हुआ, जो यह दर्शाता है कि कई छात्र स्थानीय भाषा-आधारित इंजीनियरिंग शिक्षा का चयन करने में झिझक रहे हैं।
धारणा संबंधी समस्याएं: तकनीकी साहित्य और अनुसंधान में अंग्रेज़ी के व्यापक उपयोग के कारण, कई छात्रों का मानना है कि अपनी मातृभाषा में इंजीनियरिंग करने से उनके रोज़गार के अवसर सीमित हो सकते हैं और वैश्विक नौकरी बाज़ार में उनकी क्षमता सीमित हो सकती है।
सीमित संसाधन: इसकी प्रमुख चुनौतियों में से एक क्षेत्रीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण शैक्षिक सामग्री की कमी है। अधिकांश पाठ्यपुस्तकें और शैक्षणिक संसाधन अभी भी अंग्रेज़ी आशा में हैं, जिससे छात्रों के लिए अपनी मातृभाषा में पाठ्यक्रम से पूरी तरह जुड़ना कठिन हो गया है। कुछ संस्थानों ने द्विभाषी दृष्टिकोण लागू करने का प्रयास किया है, लेकिन इन प्रयासों से अभी तक नियुक्ति और परीक्षाओं के दौरान भाषा दक्षता के बारे में चिंताओं का समाधान नहीं हुआ है।
रामपुर में शैक्षिक क्षेत्र की वर्तमान स्थिति:
रामपुर और यहाँ के गांवों में शैक्षिक क्षेत्र, लगातार विकसित हो रहे हैं । हमारे शहर में कई माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक विद्यालय और कॉलेज हैं। काशीपुर-अंगा, केमरी, बिलासपुर आदि जैसे आसपास के स्थानों के छात्रों के लिए यहां के शैक्षणिक संस्थान मुख्य आकर्षण हैं। उच्च शिक्षा के लिए शहर के कई नए संस्थान मुख्य रूप से एमजेपी रोहिलखंड विश्वविद्यालय, बरेली से संबद्ध हैं। हालाँकि यहाँ कई शैक्षणिक संस्थान हैं, लेकिन अभी भी रामपुर का औसत साक्षरता दर, 53.34% है, जो राष्ट्रीय औसत 59.5% से कम है। पुरुष साक्षरता दर 61.40% है, और महिला साक्षरता दर 44.44% है। मुहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय (Mohammad Ali Jauhar University) यहां स्थापित होने वाला पहला विश्वविद्यालय है। रामपुर के ग्रामीण इलाकों में कई सार्वजनिक और सरकारी प्राथमिक विद्यालय भी शिक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
संदर्भ:
मुख्य चित्र स्रोत : प्रारंग चित्र संग्रह
रामपुर, आइए जानें, कैसे हिमालयी शहद मधुमक्खियां, हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को संभालती हैं
तितलियाँ व कीड़े
Butterfly and Insects
17-03-2025 09:24 AM
Rampur-Hindi

हिमालयी शहद मधुमक्खी (Himalayan giant honey bee), जो पोषक तत्वों से समृद्ध शहद उत्पादन के लिए जानी जाती है, लंबे समय से पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय आजीविका का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। रामपुर से नज़दीक स्थित हिमालयी क्षेत्रों में ये मधुमक्खियां आम हैं। ये मधुमक्खियां, पौधों के परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर जंगलों, कृषि और जैव विविधता का समर्थन करती हैं। हालांकि, आज वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक कीटनाशक के उपयोग और निवास स्थान के विनाश के कारण उनकी आबादी लगातार घट रही है। जंगली फूलों और घोंसला बनाने योग्य स्थानों के नुकसान ने, उनका जीवन कठिन बना दिया है। इससे शहद उत्पादन और प्रकृति संतुलन, दोनों को खतरा है। इसीलिए, न केवल शहद के लिए, बल्कि, स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने और अनगिनत पौधों एवं पशु प्रजातियों के अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए, आज इन मधुमक्खियों की रक्षा करना आवश्यक है।
आज, हम हिमालयी शहद मधुमक्खी के बारे में जानेंगे। फिर हम, इस मधुमक्खी के जीवन चक्र को समझेंगे। इसके बाद, हम उनकी आबादी में गिरावट के पीछे मौजूद कारणों पर चर्चा करेंगे, जिसमें उनके निवास स्थान की हानि, जलवायु परिवर्तन और मानव गतिविधियां मुख्य है। अंत में, हम परागण और जैव विविधता संरक्षण में मधुमक्खियों के महत्व को उजागर करेंगे। हम पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने और खाद्य उत्पादन का समर्थन करने में, उनकी महत्वपूर्ण भूमिका पर अतः ज़ोर देंगे।
हिमालयी शहद मधुमक्खी का परिचय-
यद्यपि हिमालयी शहद मधुमक्खी – एपिस लेबोरिओसा स्मिथ (Apis laboriosa Smith), दुनिया की सबसे बड़ी शहद मधुमक्खी प्रजाति है, इनका बहुत ही कम अध्ययन किया गया है। इनका वितरण, ज़्यादातर दक्षिणी एशिया के हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में केंद्रित है। यह प्रजाति, एपिस डोर्सटा (Apis Dorsata) के साथ, उप जीनस (Genus) – मेगापिस (Megapis) की सदस्य है। हिमालयी शहद मधुमक्खी को अतः, 1980 तक एपिस डोर्सटा (Apis dorsata) की उप-प्रजाति माना जाता था। लेकिन, फिर सकागामी (Sakagami) ने एपिस लेबोरिओसा को एक अलग प्रजाति के रूप में वर्णित किया, जिसे बाद में आनुवंशिक अनुक्रमण द्वारा समर्थित किया गया था। एपिस लेबोरिओसा, आमतौर पर चट्टानों पर एकल मधुकोष के साथ एक बड़ा खुला घोंसला बनाती है।

हिमालयी शहद मधुमक्खी का जीवन चक्र-
अन्य सभी शहद मधुमक्खी प्रजातियों की तरह, हिमालयी शहद मधुमक्खी भी हालमिटैबलस (Holometabolous) कीड़े हैं। ये निम्नलिखित जीवन चरणों के साथ, एक पूर्ण मेटामोर्फ़ोसिस(Metamorphosis) प्रक्रिया से गुजरते हैं – अंडा, लार्वा (Larva ), प्यूपा (Pupa) और वयस्क। एपिस लेबोरिओसा के विकास के बारे में विवरण, हालांकि काफ़ी हद तक अज्ञात हैं, क्योंकि, इनके घोंसले या मधुकोश तक अध्ययन के लिए पहुंचना मुश्किल है।
१.अंडा: एक शहद मधुमक्खी का जीवन तब शुरू होता है, जब एक मोम कोष में रानी मधुमक्खी द्वारा अंडे दिए जाते हैं। इन अंडों से, तीन दिनों के बाद लार्वा निकलते हैं।
२.लार्वा: अपने अंडे से भोजन ग्रहण करने के बाद, लार्वा, भोजन और देखभाल के लिए अब श्रमिकों पर निर्भर होते है। एक स्वस्थ लार्वा, कोष में अंग्रेज़ी अक्षर – सी (C) जैसा आकार लेता है, जिससे वह कोष के नीचे स्थित तरल भोजन प्राप्त करता है। जब छह दिनों के बाद लार्वा थोड़ा बड़ा होता है, तब यह श्रमिकों को एक रासायनिक संदेश भेजता है कि, कोष मोम के साथ लेपित करने के लिए तैयार है।
३.प्यूपा: यह एक भोजन रहित जीवन चरण है, जब प्यूपा 11 दिनों तक पूर्ण रूप से शांत रहता है। प्रत्येक दिन, प्यूपा, अपनी लार्वा विशेषता खोता है, और अधिक वयस्क सुविधाओं को प्राप्त करता है।
४.वयस्क मधुमक्खी: जब प्यूपा पूरी तरह से वयस्क बन जाता है, तो यह कोष से निकलता है, रेंगता है, और कॉलोनी के काम में, अन्य मधुमक्खियों के साथ विचरण व काम करने लगता है।

हिमालयी शहद मधुमक्खी की जनसंख्या में गिरावट के कारण-
दुनिया भर में, मधुमक्खी पालकों ने ‘कॉलोनी पतन विकारों’ के कारण, मधुमक्खी के छत्तों में एक महत्वपूर्ण नुकसान को देखा है। “कॉलोनी पतन विकार (Colony collapse disorder)(CCD)”, शहद मधुमक्खी की आबादी में कमी के कारण हैं। मानव आबादी ने वैश्विक स्तर पर, मधुमक्खी आवासों को नुकसान पहुंचाया है।
कॉलोनी पतन विकार(CCD), वह घटना है, जो तब होती है, जब एक कॉलोनी में कार्यकर्ता मधुमक्खियों की बहुसंख्यक आबादी या तो खो जाती है, या अकेले रानी पर काम छोड़ने हेतु फ़रार हो जाती है। यह विकार, मधुमक्खियों के लिए लंबे समय में एक गंभीर खतरा पैदा करता है। पिछले अध्ययनों ने बताया है कि, कॉलोनी पतन विकार के विभिन्न मामलों के कारण, पिछले पांच वर्षों में कई मधुमक्खी कालोनियों में काफ़ी कमी आई हैं। सर्दियों के मौसम में, छत्तों की संख्या एवं दर से, इन किटों की जीवित रहने की संभावना कम हो जाती है।
•निर्माण गतिविधियां –
ठोस सामग्री का उपयोग करके मनुष्यों की मानवजनित गतिविधियां, तेज़ी से औद्योगिकीकरण और निर्माण, अधिक प्रदूषण मधुमक्खियों की घटती आबादी के मुख्य कारण हैं।
•कीटनाशक और भारी धातुएं-
भारत कृषि प्रधान देश है। अतः किसान अपनी फ़सल को बचाने के लिए, अतिरिक्त कीटनाशकों का उपयोग कर रहे हैं। कीटनाशकों का उपयोग, परागण एजेंटों (agents) के जीवन चक्र को प्रभावित करता है, जिसमें मधुमक्खियां विशेष रूप से प्रभावित हैं। कीटनाशकों के अंश, मधुमक्खी उत्पादों में प्रवेश कर सकते हैं, और उन्हें खपत के लिए अयोग्य बना सकते हैं।
•मधुमक्खी के दुश्मन-
अन्य कीट व बीमारियों सहित विभिन्न तनावों के कारण, हर साल इनके छत्तों की बड़ी संख्या क्षतिग्रस्त हो जाती है, जो अंततः मधुमक्खी पालन उद्यम को नुकसान पहुंचाती है।

परागण और जैव विविधता संरक्षण के लिए मधुमक्खियों का महत्व-
परागण, पौधों को शहद और अन्य मधुमक्खी उत्पादों की तुलना में 40-140 गुना अधिक लाभ देता है, और शहद मधुमक्खियां इस प्रक्रिया में 60-68% योगदान देती हैं। ये कीट, विभिन्न प्रकार की फ़सलों में परागण करने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं । हिमालयी शहद मधुमक्खी जैसी भारतीय मधुमक्खियां, वास्तव में, अन्य की तुलना में दो से तीन गुना अधिक प्रभावी परागणकर्ता हैं।
भोजन के संदर्भ में, मधुमक्खियां, कभी भी पौधों और जानवरों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकती हैं, लेकिन परागण के माध्यम से, वे फ़सल उत्पादन को बढ़ावा दे सकती हैं । अंततः वे खाद्य सुरक्षा में योगदान कर सकती हैं। इस प्रकार, खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता संरक्षण के दृष्टिकोण से, शहद मधुमक्खी मनुष्यों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
संदर्भ:
मुख्य चित्र: हिमालयी शहद मधुमक्खी (Wikimedia)
आइए रामपुर, नज़र डालते हैं, 'गार्डेन ऑफ़ यूरोप' के नाम से प्रसिद्ध कोकनहॉफ़ बगीचे पर
बागवानी के पौधे (बागान)
Flowering Plants(Garden)
16-03-2025 09:00 AM
Rampur-Hindi

हमारे प्यारे शहर वासियों, आप सभी इस तथ्य से सहमत होंगे कि मनुष्य को फूलों के बगीचे, उनकी सुंदरता, तनाव से राहत, सांस्कृतिक प्रतीकवाद और प्रकृति के साथ विकासवादी संबंध के लिए पसंद हैं। फूलों के बगीचे, खुशी का संचार करते हैं, स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं और एक संवेदी, भावनात्मक और सामाजिक अनुभव प्रदान करते हैं। कोकनहॉफ़ (Keukenhof), जिसे गार्डन ऑफ़ यूरोप भी कहा जाता है, दुनिया के सबसे बड़े फूलों के बगीचों में से एक है, जो नीदरलैंड (Netherlands) के लिस्से (Lisse) नामक एक नगरपालिका में स्थित है। इसकी आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, कोकनहॉफ़ पार्क, 32 हेक्टेयर (79 एकड़) के क्षेत्र में फैला हुआ है और हर साल, इन बगीचों में लगभग 70 लाख फूलों की पौध लगाई जाती है। हालाँकि यह अपने ट्यूलिप (tulips) फूलों के लिए व्यापक रूप से जाना जाता है, लेकिन कोकनहॉफ़ में कई अन्य फूल भी मौजूद हैं, जिनमें जलकुंभी, डैफ़ोडिल (daffodils), लिली (lilies), गुलाब, कार्नेशन (carnations) और आईरिस (irises) सहित अन्य कई फूल शामिल हैं। ऐसा अनुमान है कि, 2019 में, 1.5 मिलियन लोगों ने कोकनहॉफ़ का दौरा किया, जो प्रति दिन, 26,000 आगंतुकों के बराबर है। विश्व प्रसिद्ध आठ सप्ताह तक चलने वाले विश्व प्रसिद्ध ट्यूलिप प्रदर्शन के लिए यह उद्यान, मध्य मार्च से मध्य मई तक आम जनता के लिए खुलता है। तो आइए, आज हम, कुछ चलचित्रों के माध्यम से इस शानदार बगीचे के बारे में विस्तार से जानें। यहाँ हम, विभिन्न किस्मों और रंगों के सुंदर ऑर्किड के फूलों को पूरी तरह खिलते हुए देखेंगे। इसके आलावा, हम जलकुंभी, डैफ़ोडिल (daffodils), लिली (lilies), गुलाब, कार्नेशन (carnations) और आईरिस (irises) जैसे यहाँ उगाए जाने वाले कुछ अन्य फूलों के दृश्यों का भी आनंद लेंगे।
संदर्भ:
संस्कृति 1989
प्रकृति 717