वाका वाका - फीफा विश्व कप 2010 की वह धुन जो आज भी दिलों में बसती है
वर्ष 2010 के फीफा विश्व कप के साथ यदि कोई गीत सबसे अधिक जुड़ गया, तो वह था वाका वाका (थिस टाइम फॉर अफ्रीका) (Waka Waka (This Time for Africa))। कोलंबियाई गायिका शकीरा (Shakira) और दक्षिण अफ्रीकी बैंड फ्रेशलीग्रॉउंड (Freshlyground) द्वारा प्रस्तुत यह गीत दक्षिण अफ्रीका में आयोजित विश्व कप का आधिकारिक गीत था। इसकी ऊर्जावान धुन, प्रेरणादायक बोल और अफ्रीकी संगीत की झलक ने इसे दुनिया भर में लोकप्रिय बना दिया।इस गीत की रचना शकीरा और जॉन हिल (John Hill) ने मिलकर की थी। इसके बोल खिलाड़ियों को चुनौतियों का सामना करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। गीत में कैमरून के प्रसिद्ध मकौसा गीत “ज़ामीना मीना” की धुन का भी उपयोग किया गया, जिसने इसे एक विशिष्ट अफ्रीकी पहचान दी।हालाँकि, शुरुआत में कुछ दक्षिण अफ्रीकी लोगों ने यह सवाल उठाया कि विश्व कप के आधिकारिक गीत के लिए किसी स्थानीय कलाकार को चुना जाना चाहिए था। इसके बावजूद “वाका वाका” ने जल्द ही पूरी दुनिया का दिल जीत लिया। यह अनेक देशों के संगीत चार्ट में पहले स्थान पर पहुँचा और वर्ष 2010 के सबसे लोकप्रिय गीतों में शामिल रहा।समय के साथ यह गीत केवल एक विश्व कप गीत नहीं रहा, बल्कि फुटबॉल, उत्साह और वैश्विक एकता का प्रतीक बन गया। आज भी जब फीफा विश्व कप की बात होती है, तो “वाका वाका” की धुन लाखों प्रशंसकों के मन में गूंज उठती है।संदर्भ - https://tinyurl.com/u5uzxa42https://tinyurl.com/558e8um6https://tinyurl.com/4rm33w76https://tinyurl.com/mrpecnhh
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
उत्तर प्रदेश के सत्यदेव प्रसाद जैसे तीरंदाज खेलते हैं, हमारा प्राचीन व सांस्कृतिक खेल
रामपुर वासियों, आज हम तीरंदाजी खेल के इतिहास को समझेंगे, और जानेंगे कि, यह शिकार और युद्ध के रूप में कैसे शुरू हुई। फिर हम धनुर्वेद, प्राचीन भारतीय ग्रंथों और महाभारत जैसे महाकाव्यों में तीरंदाजी के उल्लेख का पता लगाएंगे। आगे, हम तीरंदाजी में उपयोग किए जाने वाले उपकरणों और इस खेल का अभ्यास कैसे किया जाता है, इस पर गौर करेंगे। फिर हम अंतरराष्ट्रीय तीरंदाजी में भारत के प्रदर्शन और उपलब्धियों की जांच करेंगे। लेख के अंत में, हम हमारे राज्य उत्तर प्रदेश के सत्यदेव प्रसाद जैसे तीरंदाजों और इस खेल में उनके योगदान के बारे में जानेंगे।धनुष और बाण का इतिहास, मानवता के इतिहास से जुड़ा हुआ है। तीरंदाजी, शुरुआत में शिकार और बाद में युद्ध तकनीक के रूप में उभरी। तीरंदाजी का सबसे पहला साक्ष्य - चकमक पत्थर से बने तीर-कमान - लगभग 20,000 ईसा पूर्व का है। संभव है कि, प्रारंभिक मानव पहले भी धनुष और तीर का उपयोग करते थे। एशिया में, घोड़े पर सवार योद्धाओं के पास छोटे मिश्रित धनुष आम थे। जबकि, यू (Yew) पेड़ की लकड़ी से बने लंबे धनुष, मध्य युग में इंग्लैंड (England) सैन्य में आम थे।बारूद के आविष्कार के साथ, युद्ध में तीरंदाजी अप्रचलित हो गई, और बाद में एक खेल के रूप में विकसित हुई। पहली ज्ञात तीरंदाजी प्रतियोगिता, 1583 में इंग्लैंड में आयोजित की गई थी, और इसमें 3000 प्रतिभागी थे। लेकिन, तीरंदाजी को पहली बार 1900 से 1908 और 1920 में आधुनिक ओलंपिक खेलों में प्रदर्शित किया गया। इस खेल को स्थायी पहचान दिलाने के लिए, 1931 में ‘विश्व तीरंदाजी’ की स्थापना की गई थी।तीरंदाजी को अक्सर मिथकों और किंवदंतियों के साथ-साथ, आधुनिक साहित्य एवं फिल्मों में भी दिखाया जाता है। धनुष और तीर अक्सर नियंत्रण, सटीकता, आत्मनिर्भरता और धैर्य का प्रतीक होते हैं। सबसे प्रसिद्ध पौराणिक तीरंदाजों में से एक रॉबिन हुड (Robin Hood) है, जिसकी कहानी मध्य युग में इंग्लैंड में उत्पन्न हुई।प्रागैतिहासिक काल से ही, धनुष, दुनिया भर में युद्ध और शिकार का एक प्रमुख हथियार था। प्राचीन मिस्र और यूनानियों के बीच सैन्य तथा मनोरंजक तीरंदाजी का अभ्यास किया जाता था। हूण (Hun), सेल्जूक तुर्क (Seljuq Turks), मंगोल (Mongol) और अन्य खानाबदोश घुड़सवार तीरंदाजों ने पहली शताब्दी ईसवी से लगभग 15 शताब्दियों तक एशिया के बड़े हिस्से पर प्रभुत्व बनाए रखा। अंग्रेजी धनुर्धरों ने सौ साल के युद्ध (1337-1453) में तीरंदाजी की मदद से ही सैन्य जीत हासिल की। जबकि महाद्वीपीय यूरोप (Europe) में क्रॉसबो (Crossbow) का व्यापक रूप से उपयोग किया जाने लगा था। हालांकि, आग्नेयास्त्रों के आगमन के साथ धनुष युद्धों से दूर हो गए।तब, धनुष को एक शिकार हथियार के रूप में रखा गया था। एक तरफ, इंग्लैंड में जनता द्वारा एक खेल के रूप में, तीरंदाजी का अभ्यास जारी था। बाद में, वहां इस खेल को संरक्षण प्राप्त हुआ, तथा इससे संबंधित कई संगठन बने। तब इसके नियम भी बनाए गए। फिर, 1931 में पेरिस (Paris) में फेडरेशन ऑफ इंटरनेशनल टारगेट आर्चरी (Federation of International Target Archery) की स्थापना के साथ, अंतर्राष्ट्रीय नियमों को मानकीकृत किया गया था।पहले अमेरिकी तीरंदाजी संगठन की स्थापना 1828 में हुई थी। 1870 के दशक में कई तीरंदाजी क्लब उभरे, और 1879 में उनमें से आठ क्लबों ने संयुक्त राज्य अमेरिका के ‘राष्ट्रीय तीरंदाजी संघ’ का गठन किया। 1939 में शिकार, नौकायन और मैदानी तीरंदाजी को बढ़ावा देने के लिए, अमेरिका में ‘राष्ट्रीय फील्ड तीरंदाजी संघ’ की स्थापना की गई थी। 1930 के बाद, अमेरिका में इस खेल की उल्लेखनीय वृद्धि के कारण, दुनिया भर में तीरंदाजों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।इंग्लैंड और अमेरिका के साथ, हमारे देश भारत में भी तीरंदाजी का लंबा इतिहास रहा है। ‘धनुर्वेद’ अर्थात तीरंदाजी का विज्ञान, युद्ध और तीरंदाजी पर लिखा गया एक संस्कृत ग्रंथ है। इसे यजुर्वेद (1100 - 800 ईसा पूर्व) से जुड़ा एक उपवेद माना जाता है। शौनक द्वारा लिखित ‘चरणव्यूह’ में चार उपवेदों का उल्लेख है, जिनमें तीरंदाजी (धनुर्वेद) और सैन्य विज्ञान (शास्त्रशास्त्र) शामिल हैं। इनमें महारत हासिल करना एक योद्धा का कर्तव्य (धर्म) माना जाता था।ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद भी, धनुष और तीर के उपयोग पर जोर देते हैं। प्राचीन साहित्य की अनेक कृतियां धनुर्वेद का उल्लेख करती हैं। विष्णु पुराण इसे ज्ञान की अठारह शाखाओं में से एक के रूप में संदर्भित करता है, और महाभारत में उल्लेख है कि, इसमें अन्य वेदों की तरह कुछ सूत्र हैं।धनुर्वेद में तीरंदाजी की प्रथाओं, उपयोग, धनुष और बाण बनाने की कला, सैन्य प्रशिक्षण तथा युद्ध के नियमों का वर्णन मिलता है। यह ग्रंथ योद्धाओं, सारथियों, घुड़सवार सेना, हाथी योद्धाओं, पैदल सेना आदि के प्रशिक्षण के संबंध में युद्ध तकनीक की चर्चा करता है। धनुष की घुमावदार आकृति को अर्थवेद में वक्र कहा गया है। धनुष की प्रत्यंचा को ‘ज्या’ कहा जाता था, और इसे आवश्यकता पड़ने पर ही बांधा जाता था। जबकि, तीर को ‘इशु’ कहा जाता था, और तरकश को ‘इशुधि’ कहा जाता था।द्वापर युग में भी युद्ध में तीरंदाजी आम थी। महाभारत काल में धनुर्विद्या को उसके पूर्ण वैभव के साथ प्रस्तुत किया गया। परशुराम, अग्निवेश और द्रोण जैसे प्रतिष्ठित शिक्षकों ने, तीरंदाजी को उच्चतम स्तर तक पहुंचाया, और अपने छात्रों को उत्कृष्ट तीरंदाज बनने के लिए प्रशिक्षित किया। महाभारत काल में तीरंदाजी प्रमुख युद्ध कौशलों में से एक थी। तब, तीर की नोकें लोहे से बनी होती थीं, और बाण सरकण्डे और बाँस से बने होते थे। अर्धचंद्र, नाराच, विपता और अन्य प्रकार के तीर उस समय उपयोग किए जाते थे।हालांकि, आधुनिक तीरंदाजी उपकरण काफी अलग हैं। ‘विश्व तीरंदाजी नियम पुस्तिका’ में अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में उपयोग के लिए अनुमत उपकरणों का विवरण दिया गया है। तीरों के मुख्य प्रकारों में रिकर्व धनुष (Recurve bow), कंपाउंड धनुष (Compound bow), और बेयरबो (Barebow) शामिल हैं।रिकर्व धनुष, पारंपरिक धनुषों का आधुनिक संस्करण है। यह ओलंपिक खेलों में उपयोग किए जाने वाले धनुष की शैली है। धनुष खींचे जाने पर, खिलाड़ी के अंगों में संग्रहीत ऊर्जा, तीर छोड़ने पर तीर में स्थानांतरित हो जाती है। इससे वह 200 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति से छूटता है। आधुनिक रिकर्व धनुष तकनीकी रूप से उन्नत सामग्रियों और विधियों का उपयोग करके बनाए जाते हैं, हालांकि कई निर्माता प्राकृतिक सामग्रियों को एकीकृत करते हैं। दूसरी तरफ, मिश्रित धनुष का आविष्कार 1960 के दशक में तीरंदाजी के यांत्रिक रूप से कुशल उपकरण के रूप में किया गया था। अधिकांश प्रमुख प्रतियोगिताओं में यह प्रयुक्त होता है। इसमें मौजूद पुली और केबल की एक प्रणाली से, धनुष को पूरी तरह से पकड़ना आसान होता है, और तीर में अधिक कुशलता से ऊर्जा स्थानांतरित होती है। जबकि, बेयरबो, धनुष की एक मूल शैली है, जो यांत्रिक रूप से रिकर्व के समान है। लेकिन, लक्ष्य या स्थिरीकरण में सहायता के लिए इसमें अन्य उपकरण का उपयोग नहीं होता है। ऐतिहासिक रूप से, इस धनुष का उपयोग मुख्य रूप से फ़ील्ड तीरंदाजी में किया गया है, लेकिन अब इसे लक्ष्य तीरंदाजी के लिए भी मान्यता प्राप्त है।आधुनिक प्रतिस्पर्धा के तीर एल्यूमीनियम, कार्बन फाइबर या दोनों सामग्रियों के संयोजन से बने होते हैं। एक सेट में प्रत्येक तीर वजन और आकार में बारीकी से मेल खाता है। तीर का डंठल खोखला होता है। इसे बनाने के लिए उपयोग की जाने वाली सामग्री की मोटाई और ताकत, तीर की रीढ़ को परिभाषित करती है। धनुष जितना अधिक शक्तिशाली होगा, तीर की रीढ़ उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। तीर के अंत में लगे पर, सीधे, मुड़े हुए या पंख वाले हो सकते हैं, और वे उड़ान के दौरान तीर को स्थिर करते हैं।क्या आप जानते हैं कि, 1989 में, राजस्थान के तीरंदाज लिम्बा राम ने बीजिंग (Beijing) में एशियाई तीरंदाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर, भारत को पहली बार अंतरराष्ट्रीय सफलता दिलाई थी। भारत ने 1988 के सियोल ओलंपिक (Seoul Olympics) में, तीरंदाजी में अपना ओलंपिक पदार्पण किया। इन शुरुआती मुकाबलों ने भारतीय तीरंदाजों को बहुमूल्य अनुभव प्रदान किया। अब, इक्कीसवीं सदी में वैश्विक मंच पर भारतीय तीरंदाजों के प्रदर्शन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। डोला बैनर्जी, जयंत तालुकदार और तरूणदीप राय जैसे तीरंदाज विश्व चैंपियनशिप और एशियाई खेलों में पदक जीतकर प्रमुख शख्सियत बनकर उभरे हैं। 2007 तीरंदाजी विश्व कप में, डोला बैनर्जी का स्वर्ण पदक भारतीय तीरंदाजी के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।भारत की सबसे मशहूर तीरंदाजों में से एक दीपिका कुमारी ने लगातार उच्चतम स्तर पर प्रदर्शन किया है। उन्होंने कई विश्व कप पदक जीते हैं, और महिला रिकर्व तीरंदाजी में विश्व नंबर एक रैंकिंग हासिल की है। 2019 में, दीपिका कुमारी, लैशराम बोम्बायला देवी और लक्ष्मीरानी माझी सहित भारतीय महिला संघ ने विश्व तीरंदाजी चैंपियनशिप में रजत पदक जीता, जो इस आयोजन में भारत का पहला संघ पदक था। 2021 में, अभिषेक वर्मा ने पेरिस (Paris) में विश्व कप के दौरान, पुरुषों की कंपाउंड स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता, जिससे कंपाउंड तीरंदाजी में भारत की शक्ति का प्रदर्शन हुआ।सत्यदेव प्रसाददूसरी ओर, सत्यदेव प्रसाद, एक अन्य भारतीय तीरंदाज है, और सिडनी (Sydney) ओलंपिक खेल 2000 में 10वां स्थान हासिल करने के लिए प्रसिद्ध हैं। ओलंपिक खेलों में किसी भी भारतीय तीरंदाज द्वारा यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। उनका जन्म 19 सितंबर 1979 को, हमारे राज्य उत्तर प्रदेश में हुआ था। उन्होंने कम उम्र में ही तीरंदाजी खेलना शुरू कर दिया था। प्रसिद्ध तीरंदाज लिंबा राम की सफलता से प्रेरित होकर, उन्होंने खेल में आगे बढ़ने के लिए कड़ी मेहनत की।सत्यदेव, पहली बार साल 1997 में सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने जमशेदपुर में आयोजित राष्ट्रीय तीरंदाजी चैंपियनशिप में रजत पदक हासिल किया। उसी वर्ष, उन्होंने मलेशिया (Malaysia) में आयोजित एशियाई टीम चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। उन्होंने रोम (Rome) विश्व चैंपियनशिप 1999 में भी भाग लिया, जहां वे 59वें स्थान पर रहे। जबकि, बीजिंग विश्व चैंपियनशिप 2001 में उन्होंने संघ स्पर्धा में 12वां और व्यक्तिगत स्पर्धा में 31वां स्थान हासिल किया। न्यूयॉर्क (New York) विश्व चैंपियनशिप 2003 में, सत्यदेव प्रसाद ने भारतीय तीरंदाजी संघ को चौथा स्थान दिलाने में मदद की, जबकि व्यक्तिगत रूप से वह 12वें स्थान पर रहने में सफल रहे। उसी वर्ष, म्यांमार (Myanmar) में आयोजित एशियाई तीरंदाजी चैंपियनशिप में, सत्यदेव प्रसाद, तरूणदीप राय, विश्वास और माझी सवैयन के भारतीय संघ ने ओलंपिक राउंड संघ स्पर्धा में रजत पदक जीता।संदर्भ1. https://tinyurl.com/mtj3fb23 2. https://tinyurl.com/3psm9ax2 3. https://tinyurl.com/32n98uht 4. https://tinyurl.com/y796e3p2 5. https://tinyurl.com/3zc3panf 6. https://tinyurl.com/2pd9d86h 7. https://tinyurl.com/4jsnfjsr
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
मौखिक परंपराओं से पुस्तकालयों तक, और फिर प्रिंटिंग व एआई से कैसे हुआ है ज्ञान का प्रसार?
रामपुर, आज हम समझेंगे कि प्राचीन समाजों में ज्ञान, सबसे पहले मौखिक परंपराओं के माध्यम से कैसे प्रसारित किया जाता था। फिर हम पता लगाएंगे कि, इसे लेखन और पांडुलिपियों के माध्यम से कैसे दर्ज किया जाने लगा। आगे, हम देखेंगे कि कैसे पुस्तकालयों और विश्वविद्यालयों जैसे संस्थानों ने, ज्ञान को संरक्षित करने और फैलाने में मदद की। हम यह भी पढ़ेंगे कि, प्रिंटिंग प्रेस ने ज्ञान के प्रसार में कैसे क्रांति लाई। जबकि लेख के अंत में, हम जानेंगे कि इंटरनेट और एआई जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकियां, आज ज्ञान साझा करने के तरीके को कैसे बदल रही हैं।मौखिक परंपरा, मानव संचार का पहला और आज भी सबसे व्यापक तरीका है। मौखिक परंपरा, सिर्फ बात करने के तरीके को ही नहीं, बल्कि ज्ञान, कला और विचारों को विकसित करने, संग्रहीत करने तथा प्रसारित करने हेतु, एक गतिशील व विविध मौखिक-श्रव्य माध्यम को भी संदर्भित करती है। इसकी तुलना आमतौर पर साक्षरता से की जाती है।लेखन के आविष्कार से पहले सहस्राब्दियों तक, मौखिक परंपरा, समाज और उनके संस्थानों को बनाने और उन्हें बनाए रखने के लिए संचार के एकमात्र साधन के रूप में कार्य करती थी। इसके अलावा, पूरे विश्व में हुए कई अध्ययनों से पता चला है कि, साक्षरता की बढ़ती दर के बावजूद, मौखिक परंपरा, इक्कीसवीं सदी में संचार का प्रमुख माध्यम बनी हुई है।कुछ तत्कालीन प्राचीन कवियों ने अभिव्यक्ति के व्यवस्थित रूप, सूत्रबद्ध वाक्यांशों, विशिष्ट दृश्यों और कहानी पैटर्न की एक विशेष मौखिक भाषा का इस्तेमाल किया था। यह उनकी स्मरणीय और कलात्मक गतिविधियों को सक्षम बनाती है। कई शुरुआती एवं प्राचीन कविताएं, तब लंबे समय से चली आ रही मौखिक परंपरा से ही निकली थी। मौखिक परंपरा में जड़ें रखने वाले अन्य परिचित कार्यों में, ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल (Bible), गिलगमेश के महाकाव्य (Epic of Gilgamesh) और मध्ययुगीन अंग्रेजी कथा बियोवुल्फ़ (Beowulf), आदि शामिल हैं। इन कार्यों के कुछ घटक यह भी बताते हैं कि, कैसे लचीली मौखिक-पारंपरिक प्रणालियां कई पीढ़ियों में अलग-अलग लेकिन संबंधित विचारों का उत्पादन कर सकती हैं।बियोवुल्फ़ तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक, लेखन का उपयोग विशेष रूप से लेखांकन के लिए किया जाता था। फिर धीरे-धीरे विभिन्न प्रतीकों से ध्वन्यात्मक शब्दांश संकेतों का आविष्कार हुआ, जिससे लिपि और वर्णमालाओं का जन्म हुआ। सूचना एकत्र करने, उसमें हेरफेर करने, उसका भंडारण व संचार करने, तथा उसे पुनर्प्राप्त और प्रसारित करने के लिए, लेखन मानव जाति की प्रमुख तकनीक है। माना जाता है कि, लेखन का आविष्कार, दुनिया के विभिन्न हिस्सों में स्वतंत्र रूप से, तीन बार हुआ होगा। ये स्थल निकट पूर्व, चीन और मेसोअमेरिका (Mesoamerica) में होंगे। विभिन्न शिलालेख, उत्कीर्णित ग्रंथ एवं प्रतीक, लेखन के विकास का सुझाव देते हैं। माना जाता है कि, यह काल 600 से 1200 ईसा पूर्व का रहा होगा।इन तीन लेखन प्रणालियों में से सबसे प्रारंभिक - मेसोपोटामिया (Mesopotamia) की क्यूनिफॉर्म लिपि (Cuneiform script) है, जिसका आविष्कार वर्तमान इराक में हुआ था। केवल इसी लिपि के विकास को 3200 ईसा पूर्व प्रागैतिहासिक पूर्वकाल से लेकर आज की वर्णमाला तक, 10,000 वर्षों की अवधि में बिना किसी विच्छेद के देखा जा सकता है। इसके विकास को चार चरणों में विभाजित किया गया है:1. विक्रय के माल की इकाइयों का प्रतिनिधित्व करने वाले मिट्टी के टोकन (Token) का लेखांकन के रूप में उपयोग;2. त्रि-आयामी टोकन का दो-आयामी चित्रात्मक संकेतों में बदलाव;3. व्यक्तियों के नाम लिखने के लिए पेश किए गए ध्वन्यात्मक संकेत; और4. फिर कुछ दो दर्जन अक्षरों के साथ, प्रत्येक आवाज की एक ही ध्वनि के लिए बनी वर्णमाला ने, भाषण की प्रस्तुति को परिपूर्ण किया।इन घटनाओं के विकास के साथ ही, विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों और संग्रहालयों ने लंबे समय से मानव संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्राचीन काल में, पुस्तकालय वे स्थान थे, जहां ज्ञान को एकत्र और संरक्षित किया जाता था। जबकि आज, ज्ञान संस्थान, पुस्तकालय और संग्रहालय इसके महत्वपूर्ण केंद्र बन रहे हैं। लेकिन, डिजिटल युग के विकास के साथ सूचना भंडारण में लगातार बदलाव भी आ रहा है।ज्ञान के भंडार के रूप में पुस्तकालयों की शुरुआत, एक सहस्राब्दी पहले विद्वानों, दार्शनिकों और अभिलेखीय दस्तावेजों से लिखित जानकारी के भंडारण के साथ हुई थी। प्रारंभिक पुस्तकालय केवल पुस्तकों, स्क्रॉल (Scroll) और अन्य दस्तावेजों का संग्रह थे। इन्हें अद्वितीय इमारतों में रखा गया था। पहला प्रलेखित पुस्तकालय, सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व में स्थापित किया गया था। इसे प्राचीन मध्य पूर्व में, वर्तमान इराक में स्थापित किया गया था। इस संग्रह में, कुछ विषयों के आधार पर वर्गीकृत लगभग 30,000 क्यूनिफॉर्म पट्टियां शामिल थीं। अधिकांश कार्य, विद्वतापूर्ण ग्रंथ और साहित्य के कार्य थे, जिनमें गिलगमेश का प्राचीन महाकाव्य भी शामिल था।इस बिंदु से आगे बढ़ते हुए, लगभग सभी महान सभ्यताओं ने साझा ज्ञान और ज्ञान के भंडारण का मूल्य सीखा, और उसे संग्रहीत करने के लिए पुस्तकालयों का निर्माण किया। ‘पुनर्जागरण काल’ के दौरान पुस्तकों की संख्या में नाटकीय वृद्धि हुई, और यूरोपीय देशों में पुस्तकालय स्थापित किए गए। यूरोप में सबसे पहले ज्ञात सार्वजनिक पुस्तकालय वेनिस (Venice) और मैड्रिड (Madrid) में थे।अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान, बढ़ती संख्या वाली पुस्तकों को रखने के लिए कई पुस्तकालय बनाए गए। ज्ञान के ये संस्थान, भावी पीढ़ियों के लिए शिक्षण और नया ज्ञान साझा करने के बारे में हैं।इसके पश्चात, पांच शताब्दियों से भी पहले, जोहान्स गुटेनबर्ग (Johannes Gutenberg) के प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार ने समाज के सीखने, सोचने और विचारों को साझा करने के तरीके को बदल दिया। ज्ञान पर अब एक छोटे से अभिजात वर्ग का नियंत्रण नहीं रहा। प्रिंटिंग के आविष्कार से किताबें सस्ती हो गईं; मठों और शाही दरबारों से जानकारी आगे बढ़ गई; और साक्षरता का विस्तार हुआ। इससे शिक्षा का प्रसार हुआ, और आम लोगों को जीवन बदलने में सक्षम विचारों तक पहुंच प्राप्त हुई। प्रिंटिंग प्रेस ने सामाजिक प्रगति, वैज्ञानिक जांच और लोकतांत्रिक सोच की नींव रखने में भी मदद की। हालांकि, उन्हीं प्रिंटिंग प्रेस का उपयोग प्रचार, झूठे सिद्धांत, भड़काऊ पर्चे और नफरत फैलाने के लिए भी किया जाता था।जबकि वर्तमान समय में, डिजिटल प्रौद्योगिकियों की तीव्र प्रगति ने व्यक्तियों, कंपनियों और समाजों को महत्वपूर्ण रूप से बदल दिया है। डिजिटल युग में, इस तरह की प्रगति ने मोबाइल डिवाइस, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और क्लाउड कंप्यूटिंग (Cloud computing) जैसी सस्ती, तेज़ और अधिक सुलभ डिजिटल तकनीकों को जन्म दिया है। डिजिटल प्रौद्योगिकियां आज हमारे दैनिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन गई हैं, जो नवीनतम ज्ञान के कई अवसर प्रदान करती हैं। जबकि डिजिटल प्रौद्योगिकियां हमें अधिक जानकारी तक पहुंचने में सक्षम बनाती हैं, वे गलत सूचना फैलने की मात्रा और गति को भी बढ़ाती हैं। इसलिए, इन प्रौद्योगिकियों के प्रभाव को समझना तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है।हाल के वर्षों में सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के उपयोग में तेजी से वृद्धि हुई है, जिससे हमारी वैचारिक दुनिया मौलिक रूप से बदल गई है। इन प्लेटफार्मों पर हमारी निर्भरता ने, उन्हें हमारे दैनिक जीवन में जानकारी का अनिवार्य स्रोत बना दिया है। इन ऑनलाइन प्लेटफार्मों के साथ, लोगों के पास अब जानकारी प्राप्त करने, गलत सूचना के हस्तांतरण या प्रसार को तेज करने के लिए कई विकल्प हैं।आज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) या एआई, इंटरनेट की जगह ले रहा है। एआई, पिछली सूचना प्रौद्योगिकियों से मौलिक विचलन का प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि यह जानकारी को संग्रहीत और पुनर्प्राप्त ही नहीं, बल्कि इसे संसाधित और परिवर्तित भी करता है।पुस्तकों या डेटाबेस जैसे पारंपरिक ज्ञान भंडार में निश्चित जानकारी होती है। जबकि एआई सिस्टम, सक्रिय रूप से जानकारी के साथ जुड़ते हैं, तथा वास्तविक समय में नई अंतर्दृष्टि और समाधान उत्पन्न करते हैं। पिछली प्रौद्योगिकियों ने हमें यह बताया है कि, क्या सोचना है; जबकि एआई हमें बताता है कि, इसके बारे में कैसे सोचना है। पारंपरिक ज्ञान के साथ, मनुष्य को अर्थ और प्रासंगिकता की व्याख्या करनी होती है। लेकिन, एआई सिस्टम संदर्भ को समझ सकते हैं, पैटर्न को पहचान सकते हैं, और किसी स्थिति में क्या मायने रखता है, इसके बारे में निर्णय ले सकते हैं। दूसरी ओर, पुस्तकें और शैक्षिक पाठ्यक्रम सामान्य दर्शकों के ज्ञान प्राप्ति के लिएं डिज़ाइन किए गए हैं। जबकि, एआई अपनी बुद्धिमत्ता को विशिष्ट समस्याओं, संदर्भों और व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप बना सकता है। संदर्भ1. https://tinyurl.com/34krk5wy 2. https://tinyurl.com/y6btef34 3. https://tinyurl.com/5yt82u69 4. https://tinyurl.com/548xcbwm 5. https://tinyurl.com/553njjjb 6. https://tinyurl.com/yc5hw7vm
अवधारणा I - मापन उपकरण (कागज़/घड़ी)
गूगल से दशकों पहले, विश्व ज्ञान कोष 'मंडेनियम' में कागज़ों पर बना, पहला भौतिक सर्च इंजन
रामपुर के जागरूक पाठकों के लिए इतिहास के पन्नों से एक ऐसी खोज की कहानी प्रस्तुत है जिसने आज के डिजिटल युग की नींव दशकों पहले ही रख दी थी। आज हम जिस इंटरनेट और कंप्यूटर पर पूरी तरह निर्भर हैं, उसकी कल्पना इन तकनीकों के आविष्कार से बहुत पहले ही कर ली गई थी। पहले माइक्रोचिप के बनने से पच्चीस साल पहले, पहले पर्सनल कंप्यूटर से चालीस साल पहले और पहले वेब ब्राउज़र के आने से पचास साल पहले ही एक व्यक्ति ने आज के इंटरनेट जैसी संरचना का खाका तैयार कर लिया था। यह कहानी एक ऐसे दूरदर्शी की है जिसने बिना कंप्यूटर और बिना किसी डिजिटल सर्वर के, महज़ कागज़ों और अनुक्रमणिका कार्डों के ज़रिए पूरी दुनिया के ज्ञान को एक सूत्र में पिरोने का महात्वाकांक्षी सपना देखा था।पॉल ओटले कौन थे और उन्होंने दुनिया का ज्ञान एक जगह कैसे इकट्ठा करना चाहा?पॉल ओटले एक बेल्जियन आदर्शवादी, अन्वेषक और सूचना वैज्ञानिक थे जिनका जन्म तेईस अगस्त अठारह सौ अड़सठ को हुआ था। उनका मुख्य लक्ष्य दुनिया भर की सूचनाओं को व्यवस्थित करना और हर महत्वपूर्ण प्रकाशित विचार को सूचीबद्ध करना था। अठारह सौ पचानवे में उन्होंने वकील और अंतर्राष्ट्रीयतावादी हेनरी ला फोंटेन के साथ मिलकर इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बिब्लियोग्राफी की स्थापना की। इस संस्थान का उद्देश्य संपूर्ण मानव ज्ञान और दस्तावेज़ों पर एक व्यवस्थित नियंत्रण स्थापित करना था। ज्ञान को वर्गीकृत करने के लिए ओटले और ला फोंटेन ने उन्नीस सौ चार में 'यूनिवर्सल डेसिमल क्लासिफिकेशन' नामक एक क्रांतिकारी प्रणाली प्रकाशित की। इस प्रणाली में दुनिया भर के ज्ञान को नौ मुख्य श्रेणियों में बांटा गया था और इसके सत्तर हज़ार से अधिक विस्तृत उपखंड बनाए गए थे। ओटले का सपना केवल ज्ञान को व्यवस्थित करने तक सीमित नहीं था, बल्कि वह एक ऐसा नया विश्व शहर बनाना चाहते थे जो दुनिया भर के देशों के बीच शांति और बौद्धिक विकास का केंद्र बन सके। उनकी इस महात्वाकांक्षी योजना का एक हिस्सा लीग ऑफ नेशंस के निर्माण से भी जुड़ा हुआ था।सूचनाओं को एक जगह इकट्ठा करना ज्ञान और फ़ैसलों के लिए क्यों ज़रूरी है?मानव इतिहास में जब से लेखन की शुरुआत हुई है, तभी से ज्ञान को व्यवस्थित करने की कोशिशें भी होती रही हैं। प्राचीन काल में इसका सबसे बड़ा उदाहरण मिस्र के अलेक्जेंड्रिया शहर का पुस्तकालय था जहाँ करीब सात लाख पेपिरस के स्क्रॉल रखे गए थे, जो आज के समय की एक लाख किताबों के बराबर माने जाते हैं। आज के समय में सूचनाओं का विस्फोट इतना भयानक हो चुका है कि केवल साल दो हज़ार ग्यारह में ही मानवता ने करीब दो ट्रिलियन गीगाबाइट का विशाल डेटा उत्पन्न किया था। यह अथाह डेटा हर दो साल में दोगुना हो रहा है। इस भारी और अव्यवस्थित डेटा के कारण आज के व्यवसायियों, लेखकों और शोधकर्ताओं को अपने काम की सही जानकारी निकालने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ओटले ने इस समस्या को बहुत पहले ही भांप लिया था। उनका मानना था कि किसी भी दस्तावेज़ या सूचना को अकेले नहीं समझा जा सकता, बल्कि उसका अर्थ अन्य दस्तावेज़ों के साथ उसके संबंधों से स्पष्ट होता है। उनका लक्ष्य ज्ञान को एक ऐसी सुगठित प्रणाली में पिरोना था जहाँ तथ्यों की पुष्टि की जा सके और भ्रामक जानकारियों के जाल से बचा जा सके।दुनिया भर की किताबों की सूचीओटले ने ब्रुसेल्स में एक वैश्विक लाइब्रेरी की योजना कैसे बनाई और ज्ञान तक सार्वभौमिक पहुँच के लिए उनका नज़रिया क्या था?उन्नीस सौ दस में ओटले और ला फोंटेन ने ज्ञान का एक विशाल केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव रखा जिसे मुंडेनम नाम दिया गया। इस मुंडेनम को शुरुआत में बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स के पले डु सिनक्वांटेनेयर नामक सरकारी इमारत में रखा गया था। ओटले ने एक विशाल प्रणाली विकसित की जिसमें एक करोड़ पचास लाख से अधिक इंडेक्स कार्ड और दस्तावेज़ों का संग्रह शामिल था। ये इंडेक्स कार्ड अमेरिकी लाइब्रेरियन मेल्विल डेवी द्वारा मानकीकृत तीन गुणा पाँच इंच के आकार के थे। मुंडेनम में लोगों के लिए एक डाक सेवा भी शुरू की गई थी जहाँ लोग एक निश्चित शुल्क देकर अपने सवालों के जवाब मंगवा सकते थे। उन्नीस सौ बारह तक ओटले की टीम हर साल ऐसे पंद्रह सौ से अधिक सवालों के जवाब दे रही थी। इसके बाद उन्नीस सौ चौंतीस में ओटले ने 'इलेक्ट्रिक टेलीस्कोप' नामक नेटवर्क की कल्पना की। इस प्रणाली के तहत एक उपयोगकर्ता टेलीफोन के ज़रिए अपना सवाल भेज सकता था और उसका जवाब एक निजी स्क्रीन पर दिखाई देता था। उन्होंने कल्पना की थी कि लोग दूर बैठकर भी एक-दूसरे से जुड़ सकेंगे, जानकारी साझा कर सकेंगे और सामाजिक नेटवर्क बना सकेंगे।इस महान परियोजना का पतन कैसे हुआ और द्वितीय विश्व युद्ध का मुंडेनम पर क्या असर पड़ा?ओटले की यह महान परियोजना समय के साथ कई राजनीतिक और आर्थिक मुश्किलों में घिर गई। उन्नीस सौ चौबीस तक बेल्जियम सरकार का इस परियोजना से मोहभंग होने लगा था क्योंकि लीग ऑफ नेशंस ने अपना नया मुख्यालय ब्रुसेल्स की बजाय जिनेवा में बना लिया था। इसके कारण मुंडेनम को कई छोटी और अजीबोगरीब जगहों पर स्थानांतरित होना पड़ा, यहाँ तक कि एक समय इसे पार्किंग गैराज में भी रखा गया था। उन्नीस सौ उनतीस में वास्तुकार ली कोर्बुसीयर को जिनेवा में एक नया मुंडेनम डिज़ाइन करने का काम सौंपा गया, लेकिन यह परियोजना कभी ज़मीन पर नहीं उतर सकी। लगातार वित्तीय संकट के कारण उन्नीस सौ चौंतीस में ओटले को मुंडेनम के संचालन को बंद करना पड़ा। जब उन्नीस सौ चालीस में नाज़ी जर्मनी ने बेल्जियम पर कब्ज़ा किया, तो हालात और बदतर हो गए। नाज़ी सैनिकों ने मुंडेनम को महज़ कबाड़ का ढेर समझा और तिरेसठ टन से अधिक अनमोल दस्तावेज़ों को नष्ट कर दिया ताकि वहाँ थर्ड रीच की कला प्रदर्शनी लगाई जा सके। ओटले ने अमेरिकी राष्ट्रपति रूज़वेल्ट को टेलीग्राम भेजकर इस ज्ञान के खज़ाने को अमेरिका ले जाने की गुहार भी लगाई थी, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। ओटले का उन्नीस सौ चवालीस में निधन हो गया।टिम बर्नर्स-लीटिम बर्नर्स-ली ने वर्ल्ड वाइड वेब कैसे बनाया और वे ओटले के विचारों से कैसे जुड़े हैं?आज हम जो वर्ल्ड वाइड वेब इस्तेमाल करते हैं, उसका आविष्कार टिम बर्नर्स-ली और उनके साथी रॉबर्ट कैलिआउ ने किया था। लेकिन ओटले के विचार इंटरनेट के इस आधुनिक स्वरूप से काफी पहले सामने आ चुके थे। ओटले ने वेब के जिस स्वरूप की कल्पना की थी, वह आज के इंटरनेट से थोड़ा अलग और ज़्यादा व्यवस्थित था। उन्होंने एक अत्यधिक नियंत्रित प्रणाली की परिकल्पना की थी जहाँ तथ्यों को विशेषज्ञों द्वारा वर्गीकृत किया जाता था। इसके विपरीत आज का इंटरनेट अनियंत्रित है जहाँ करोड़ों वेबसाइट्स और अरबों यूज़र्स का डेटा बिना किसी कठोर पदानुक्रम के मौजूद है। टिम बर्नर्स-ली ने साल दो हज़ार एक में 'सिमेंटिक वेब' का प्रस्ताव रखा था, जिसका उद्देश्य वेब पेजों में ऐसा डेटा जोड़ना था जिसे कंप्यूटर आसानी से पढ़ और समझ सकें। ओटले ने दशकों पहले ऐसे ही 'लिंक्स' की कल्पना की थी जो केवल दस्तावेज़ों को जोड़ते नहीं थे, बल्कि उनके बीच के गहरे अर्थ और वैचारिक संबंधों को भी स्पष्ट करते थे। आज ओटले का मुंडेनम मॉन्स शहर के एक संग्रहालय में तब्दील हो चुका है, जहाँ उनके पुराने इंडेक्स कार्ड आज भी लकड़ी की अलमारियों में सहेज कर रखे गए हैं जो हमें इस भूली-बिसरी विरासत की याद दिलाते हैं।संदर्भ 1. https://tinyurl.com/273h8xlr2. https://tinyurl.com/2aq8wlyh3. https://tinyurl.com/ujsxbak4. https://tinyurl.com/2aga2bq85. https://tinyurl.com/2y4l7qj56. https://tinyurl.com/2xrbncph7. https://tinyurl.com/22lc9gad
धर्म का युग : 600 ई.पू. से 300 ई.
कैसे बौद्ध जातक कथाओं में प्राचीन 'इन्दपत्त' यानी आज की दिल्ली थी उच्च नैतिकता का केंद्र
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई महापुरुष केवल करुणा के वशीभूत होकर अपने प्राणों की आहुति दे दे और एक भूखी बाघिन के सामने खुद को भोजन के रूप में पेश कर दे ताकि वह बाघिन अपने ही नवजात शावकों को न खा जाए । यह कोई कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि बौद्ध धर्म की सबसे पुरानी और प्रसिद्ध जातक कथाओं में से एक 'द स्टार्विंग टाइग्रेस' का हिस्सा है । जातक कथाओं में भगवान बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति से पहले के पूर्व जन्मों की 547 कहानियों का ज़िक्र मिलता है, जिनमें उन्होंने इंसान से लेकर जानवरों तक का रूप धारण किया था । इन प्राचीन कथाओं में आज के दिल्ली यानी इन्द्रप्रस्थ का भी गहरा इतिहास छिपा है, जिसे बौद्ध साहित्यों में 'इन्दपत्त' के नाम से जाना जाता था। यह नगर अपनी शहरी भव्यता, न्यायपूर्ण शासन और नैतिकता के लिए इतना प्रसिद्ध था कि बोधिसत्व ने यहाँ कई बार जन्म लिया। आइए, इन कथाओं के ज़रिए समझते हैं कि प्राचीन भारत में इन्दपत्त की क्या अहमियत थी और क्यों ये जातक कथाएँ आज भी हमारे जीवन को सही दिशा दिखा सकती हैं। जातक कथाएँ क्या हैं और इनमें बुद्ध के पूर्व जन्मों का क्या रहस्य छिपा है?जातक शब्द का अर्थ “जन्म” से है, और ये कथाएँ भगवान बुद्ध के उस अंतिम जन्म से पहले के जीवन की कहानियाँ हैं जब वे सिद्धार्थ गौतम थे । बौद्ध धर्म की सभी शाखाएँ इन कथाओं को प्रामाणिक मानती हैं । यह माना जाता है कि ज्ञान प्राप्ति से ठीक पहले बुद्ध ने अपने सभी पूर्व जन्मों को स्पष्ट रूप से देखा था । थेरवाद ग्रंथों में खुद्दक निकाय के सुत्त पिटक में ऐसी 547 कहानियों का एक बड़ा संग्रह पद्य रूप में मौजूद है । इन कहानियों का मुख्य उद्देश्य कर्म के सिद्धांत को समझाना है । जातक कथाएँ यह दर्शाती हैं कि इंसान के अच्छे या बुरे कर्म ही उसके भविष्य के अनुभवों और आध्यात्मिक प्रगति को तय करते हैं । हर कहानी में यह साबित किया गया है कि वर्तमान जीवन में मिलने वाले दुख या सुख के तार हमारे पिछले जन्मों की घटनाओं से जुड़े होते हैं । चीन के डुनहुआंग में मोगाओ गुफाओं में 'सूत्र ऑफ़ द वाइज़ एंड द फ़ूलिश' नामक एक लोकप्रिय ग्रंथ मिला है जो जातक कथाओं का ही चीनी अनुवाद है । माना जाता है कि मध्य एशिया के खोतानी भिक्षुओं के प्रवचनों को सुनकर चीनी भिक्षुओं ने इसे लिखा था, जिसे बाद में तिब्बती और मंगोलियाई भाषा में 'ओशन ऑफ़ नैरेटिव्स' के नाम से अनुवादित किया गया।बौद्ध साहित्य में इन्द्रप्रस्थ को इन्दपत्त के रूप में कैसे दर्शाया गया है?प्राचीन भारत, जिसे बौद्ध ब्रह्मांड विज्ञान में जम्बुदीप कहा जाता था, के तीन प्रमुख शहरों में से एक इन्दपत्त यानी इन्द्रप्रस्थ था। यह शहर सात योजन तक फैला हुआ था और यह तीन सौ योजन में फैले विशाल कुरु साम्राज्य की राजधानी था। बुद्ध के समय में कुरु 16 महाजनपदों में से एक था जो मज्झिमदेस में स्थित था। इन्दपत्त एक पहाड़ पर बना एक बेहद ऊँचा और सुरक्षित किला था। यह नगर बहुत ही समृद्ध और उपजाऊ था, जहाँ सोना, हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना भारी मात्रा में मौजूद थे। यहाँ से एक सीधी सड़क वाराणसी तक जाती थी। यहाँ के राजा युधिट्ठिल गोत के धनंजय कोरव्य थे। कुरु साम्राज्य अपनी शहरी जीवनशैली, न्यायपूर्ण शासन प्रणाली और उच्च नैतिकता के लिए इतना जाना जाता था कि यही वजह थी कि बोधिसत्व ने यहाँ कई जन्म लिए। यहाँ तक कि स्वयं भगवान बुद्ध ने अपने कई सबसे गहरे और महत्वपूर्ण उपदेश कुरु साम्राज्य के निगम यानी व्यापारिक मार्गों के मुख्य बाज़ार में दिए थे।विधुर पण्डित जातक में इन्दपत्त नगर और राजा धनंजय का क्या उल्लेख मिलता है?जातक संख्या 545 जिसे विधुर पण्डित जातक के नाम से जाना जाता है, उसमें कुरु साम्राज्य, इन्दपत्त नगर और वहाँ के राजा व उनके योग्य मंत्री का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है। इस ग्रंथ में लिखा गया है:कुरु-रट्ठे इन्दपत्त-नगरे धनञ्जयो नामा राजा रज्जं कारेसि ।इस पंक्ति का अर्थ यह है कि कुरु साम्राज्य में, इन्दपत्त शहर में, धनंजय नाम के एक राजा शासन करते थे।इसी ग्रंथ में आगे इन्दपत्त नगर की सुंदरता और एक कुशल मंत्री के बारे में बताया गया है:इन्दपत्ते पुरे रम्मे, कुरु-राजस्स राजिनोविधुरू'ति अयं अमच्चो, सब्ब-किच्चेसु कोविदो ।इसका अर्थ है कि कुरु राजा के इस रमणीय और आनंददायक शहर इन्दपत्त में, विधुर नाम का यह मंत्री रहता है, जो सभी तरह के मामलों और कार्यों में पूरी तरह से कुशल और निपुण है।विधुर पण्डित जातककुरुधम्म जातक में बारिश लाने वाले हाथी और सदाचार की क्या अद्भुत कहानी है?जातक संख्या 276 जिसे कुरुधम्म जातक कहा जाता है, में बोधिसत्व का जन्म इन्दपत्त में कुरु राजा धनंजय के पुत्र के रूप में होता है। उस समय राज्य में हर व्यक्ति पाँच नैतिक सिद्धांतों का इतनी पूर्णता के साथ पालन करता था कि वह भूमि हमेशा समृद्ध रहती थी। इस कथा में अञ्जनवसभ नाम के एक राजकीय हाथी का ज़िक्र है जिसके बारे में माना जाता था कि उसमें बारिश लाने की जादुई शक्ति है। एक बार कलिंग साम्राज्य में भयंकर सूखा पड़ा, तो वहाँ के राजा ने इन्दपत्त में अपने दूत भेजे ताकि वे अञ्जनवसभ हाथी को उधार माँग सकें, इस उम्मीद में कि वह उनके राज्य में बारिश लाएगा। जब हाथी के जाने के बाद भी कलिंग में बारिश नहीं हुई, तो कलिंग के राजा को यह अहसास हुआ कि प्राकृतिक तत्वों को अनुकूल बनाने की शक्ति किसी हाथी में नहीं, बल्कि कुरुधम्म यानी उन नैतिक आचरणों के पालन में है जो इन्दपत्त के लोग करते थे।इस कथा में एक बेहद महत्वपूर्ण श्लोक आता है:पुनापरं यदा होमि, इन्दपत्ते पुरे उत्तमे;राजा धनञ्जयो नाम, कुसले दसेहि उपागतो ।इसका अर्थ है कि और फिर, जब मैं इन्दपत्त के शानदार शहर में धनंजय नाम का राजा था, तो मैं दस कुशल और शुभ कर्मों के मार्ग से संपन्न था।कुरुधम्म जातकजातक कथाओं में करुणा और आत्म-बलिदान के कौन से बेमिसाल उदाहरण मिलते हैं?जातक कथाओं में बोधिसत्व को इंसान और जानवर दोनों रूपों में करुणा और दया का सागर दिखाया गया है । डुनहुआंग की गुफाओं की दीवारों पर सिबि राजा की कथा चित्रित है, जिसमें एक बाज़ एक कबूतर का शिकार करना चाहता है । जब कबूतर राजा की शरण में आता है, तो बाज़ राजा से कबूतर के वज़न के बराबर उनका माँस माँगता है । राजा खुशी-खुशी अपने शरीर का माँस काटकर दे देते हैं ।इसी तरह 'नौ रंगों वाले हिरण' की कथा है । एक दुर्लभ हिरण ने एक डूबते हुए गरीब आदमी की जान बचाई । लेकिन उस आदमी ने इनाम के लालच में राजा के शिकारियों को हिरण का पता बता दिया । जब हिरण ने इंसानी आवाज़ में राजा को उस आदमी के विश्वासघात की कहानी बताई, तो राजा ने उस आदमी को फटकार लगाई और हिरण को हमेशा के लिए आज़ाद कर दिया ।एक अन्य कथा में बोधिसत्व एक बंदरों के राजा थे । जब उनके दल पर ख़तरा आया, तो उन्होंने एक बाँस की छड़ी को अपने पैरों से बाँधकर एक पेड़ से दूसरे पहाड़ तक अपने शरीर का पुल बना लिया, ताकि सभी बंदर उनके शरीर के ऊपर से गुज़र कर सुरक्षित स्थान पर पहुँच सकें । इस प्रयास में उनका शरीर सुन्न हो गया, लेकिन अपनी प्रजा की जान बचाना ही उनका इकलौता लक्ष्य था । 'सुपारग' नामक एक कुशल समुद्री कप्तान की कथा में बोधिसत्व एक भयंकर तूफ़ान में फँसे व्यापारियों की नाव को केवल अपने सत्य और सदाचार की शक्ति से बचा लेते हैं और देवताओं से प्रार्थना करके उन्हें सुरक्षित किनारे लगा देते हैं। सुतोसोमा जातकआज के समय में बच्चों और बड़ों दोनों के लिए ये कथाएँ क्यों प्रासंगिक हैं?जातक कथाएँ महज़ प्राचीन साहित्य नहीं हैं; इनमें चार आर्य सत्य, बोधिसत्व की प्रतिज्ञाएँ, अष्टांगिक मार्ग और छह पारमिताओं का पूरा सार छिपा है । इन कहानियों की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि ये बुद्ध को एक साधारण इंसान और प्राणी के स्तर पर लाकर खड़ा करती हैं । कहानियों की शुरुआत में अक्सर कहा जाता है, "जब मैं केवल एक अज्ञानी बोधिसत्व था" । यह बात हम जैसे साधारण इंसानों को यह उम्मीद देती है कि कोई भी व्यक्ति ज्ञान और मोक्ष प्राप्त कर सकता है ।इन कथाओं में बोधिसत्व ने राजा, किसान, निचले और उच्च वर्ग के व्यक्ति, महिला, व्यापारी और जानवरों का जीवन जिया है, जो हमें सिखाता है कि हमें बिना किसी भेदभाव के सभी जीवों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि हर प्राणी में बुद्धत्व प्राप्त करने की क्षमता होती है । एक खजांची की कथा में दिखाया गया है कि कैसे एक सास के कम सुनने की वजह से फैली ग़लतफ़हमी के कारण लोग उसे इतना गुणी मान लेते हैं कि वह लोगों के इस सम्मान को बनाए रखने के लिए सच में अपना घर छोड़कर संन्यासी बन जाता है । ये कथाएँ हमें सिखाती हैं कि हमारा हर छोटा-बड़ा कर्म हमारे भविष्य को आकार देता है । करुणा, दया और निस्वार्थ सेवा जैसे गुण केवल धर्म की बातें नहीं हैं, बल्कि एक सफल और शांत जीवन जीने के सबसे मज़बूत आधार हैं । संदर्भ 1. https://tinyurl.com/2bdbf2eh2. https://tinyurl.com/24vnz33y3. https://tinyurl.com/286yx2p9
तितलियाँ और कीट
तितलियों और फूलों का सुंदर रिश्ता और परागण में उनकी अहम भूमिका
तितलियाँ केवल अपनी सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि प्रकृति में परागण करने के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। वे चमकीले रंगों और मीठी खुशबू वाले फूलों की ओर आकर्षित होती हैं। फूलों पर बैठकर तितलियाँ अपनी लंबी सूंड की मदद से रस पीती हैं और इसी दौरान उनके शरीर पर परागकण चिपक जाते हैं। जब वे एक फूल से दूसरे फूल तक जाती हैं, तो ये परागकण भी साथ पहुँचते हैं, जिससे परागण की प्रक्रिया पूरी होती है।मधुमक्खियों की तुलना में तितलियाँ फूलों के बाहरी हिस्सों पर भी बैठती हैं, इसलिए वे उन भागों तक भी पराग पहुँचा देती हैं जहाँ मधुमक्खियाँ अक्सर नहीं पहुँच पातीं। इस कारण तितलियाँ कई पौधों और फूलों के लिए महत्वपूर्ण परागणकर्ता मानी जाती हैं।विशेष रूप से मोनार्क जैसी तितलियाँ मिल्कवीड जैसे पौधों के साथ गहरा संबंध रखती हैं। फूलों से रस लेते समय वे अनजाने में पौधों के पराग को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाकर प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में मदद करती हैं।इस तरह तितलियाँ केवल बगीचों की शोभा नहीं बढ़ातीं, बल्कि पौधों के जीवन चक्र और जैव विविधता को बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती हैं।संदर्भ:https://tinyurl.com/3uey6fdnhttps://tinyurl.com/msbwndvk https://tinyurl.com/yxrd6mr8https://tinyurl.com/4th6ys9f
वास्तुकला II - कार्यालय/कार्य उपकरण
रामपुर, जरूर पढ़ें, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में भंडारण और एमएसपी की क्या है भूमिका?
आज के लेख में, हम समझेंगे कि कृषि में भंडारण क्यों महत्वपूर्ण है, और यह फसल के नुकसान को कैसे रोकता है। फिर, हम देखेंगे कि आपूर्ति और कीमतों को स्थिर करने में उचित भंडारण कैसे मदद करता है। उसके बाद, हम पढ़ेंगे कि सरकार एमएसपी क्यों तय करती है, और किसानों से फसल क्यों खरीदती है। और लेख के अंत में, हम खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में भंडारण और खरीद प्रणालियों के फायदों और चुनौतियों की जांच करेंगे।अच्छे भंडारण समाधान किसानों के लिए बहुत आवश्यक हैं। हर साल, किसानों द्वारा कड़ी मेहनत से उगाई गई कई फसलें बर्बाद हो जाती हैं, क्योंकि उनका भंडारण अच्छे से नहीं किया जाता है। अच्छे भंडारण के बिना, फ़सलें फफूंद, कीटों या खराब मौसम के कारण बर्बाद हो सकती हैं। उचित भंडारण, इस बर्बादी को रोकने में मदद कर सकता है। उदाहरण के लिए जलवायु-नियंत्रित साइलो (Silo) और प्लास्टिक अनाज कोष्ठ से, किसान अपनी फसलों की रक्षा कर सकते हैं। इन उन्नत भंडारण विकल्पों के उपयोग से, किसान अपनी फसलों को खोने की चिंता को कम कर सकते हैं। इससे यह भी सुनिश्चित होता है कि, सभी के लिए अधिक भोजन उपलब्ध हो।जब बाजार में एक साथ बहुत सारी फसलें आती हैं, तो किसानों को अक्सर एक अन्य बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता है। इस अधिक आपूर्ति के कारण कीमतें तेजी से गिर सकती हैं, और किसानों को अपनी मेहनत का मूल्य नहीं मिलता है। परंतु, यदि किसानों के पास अच्छी भंडारण सुविधाएं हैं, तो वे ऐसी स्थिति में अपनी फसल बेचने से बच सकते हैं। तब, वे अधिक अनुकूल बाज़ार स्थितियों की प्रतीक्षा करने का विकल्प चुन सकते हैं, ताकि, अधिक मूल्य कमाया जाए। इसके अलावा, खाद्य सुरक्षा न केवल व्यक्तियों के लिए, बल्कि समुदायों के स्वास्थ्य और स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण है। भोजन सुरक्षित होने से, लोगों को काम करने और बेहतर सीखने में मदद मिलती है, क्योंकि वे भूख या खराब पोषण से प्रभावित नहीं होते हैं। मजबूत भंडारण प्रणाली का होना, भोजन के लिए बचत खाता रखने जैसा है। जब किसान अपनी फसलों का सुरक्षित भंडारण करते हैं, तो भोजन बर्बाद नहीं होता है। भोजन को बचाया जा सकता है, और इसका उपयोग तब किया जा सकता है, जब इसकी वास्तव में आवश्यकता हो।अच्छे भंडारण बुनियादी ढांचे में निवेश करने से लंबे समय तक फलों, सब्जियों एवं अनाज की गुणवत्ता और ताजगी बनाए रखने में मदद मिलती है। तापमान में उतार-चढ़ाव करने, तथा आर्द्रता और कीट नियंत्रण जैसे उच्च गुणवत्ता वाले भंडारण समाधान यह सुनिश्चित करते हैं कि, उत्पाद अपने पोषण मूल्य और दृश्य अपील को बरकरार रखता है। गुणवत्ता का यह संरक्षण न केवल उपभोक्ता संतुष्टि को बढ़ाता है, बल्कि बाजार में अच्छी कीमतें भी प्रदान करता है। जब किसान अपने फसल घाटे को कम कर सकते हैं, अपनी फसलें बेहतर कीमतों पर बेच सकते हैं, और अपनी उपज की गुणवत्ता बनाए रख सकते हैं, तो वे अधिक धन कमाते हैं। आय में इस बढ़ोतरी से किसानों को काफी मदद मिलती है। अधिक धन पाकर, वे अपनी खेती के तरीकों में सुधार कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, वे नए उपकरणों में निवेश कर सकते हैं, जो उन्हें अधिक कुशलता से खेती करने में मदद करते हैं। इसके अलावा, जब किसान आर्थिक रूप से स्थिर होते हैं, तो उन्हें धन प्राप्त करने के लिए ऋण या अन्य जोखिम भरे तरीकों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है।यहां यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि, केवल भंडारण ही समस्याओं को दूर नहीं करेगा। अगर भंडारण ढांचा खराब है, तब भी फसल बर्बादी हो सकती हैं। दरअसल, निम्नलिखित कारकों की वजह से भारत में भंडारण हानि होती हैं -1. आज भी, कई किसान बोरियों और खुले यार्डों जैसी पारंपरिक भंडारण विधियों पर निर्भर हैं, जिनमें आर्द्रता और कीट क्षति का खतरा होता है।2. कृंतक, कीड़े और कवक, संग्रहीत अनाज के बड़े हिस्से को नष्ट कर देते हैं, जिससे गुणवत्ता और वजन में गिरावट आती है।3. उच्च आर्द्रता और तापमान में उतार-चढ़ाव से, फफूंद की वृद्धि और एफ्लाटॉक्सिन दूषितकरण (Aflatoxin contamination) होता है, जिससे अनाज उपभोग के लिए अनुपयुक्त हो जाता है।4. कई गोदामों में उचित वायु-संचालन, धूमन और तापमान नियंत्रण का अभाव है, जिससे अधिक बर्बादी होती है।5. खराब रसद और परिवहन देरी के परिणामस्वरूप भंडारण अवधि लंबी हो जाती है, जिससे फसल खराब होने का खतरा बढ़ जाता है।6. भारत की भंडारण क्षमता का एक बड़ा हिस्सा अनियमित है, जिससे अक्षमताएं और इष्टतम भंडारण की स्थिति नहीं है।इन्हीं कारणों से, फसल कटाई के बाद भंडारण संबंधी समस्याओं के कारण, भारत अपनी कुल कृषि उपज का 5-10% हिस्सा खो देता है, जिसकी राशि सालाना 90,000-1,00,000 करोड़ है। इससे किसानों की आय कम होती है, और खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ती है।शीतगृह भंडारण (Cold storage) इस समस्या का एक समाधान हो सकता है। शीतगृह बुनियादी ढांचा फल, सब्जियां, डेयरी उत्पाद, मांस और समुद्री भोजन जैसी जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ये तापमान-नियंत्रित सुविधाएं उत्पाद में ताजगी, गुणवत्ता और पोषण मूल्य बनाए रखने में मदद करती हैं, जिससे कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। शीतगृह बुनियादी ढांचे में पहले ठंडा करना, वजन, छंटाई, ग्रेडिंग, पैकेजिंग, नियंत्रित वातावरण में भंडारण, ब्लास्ट फ्रीजिंग (Blast freezing) और रीफर वैन (Reefer vans) जैसी शीत परिवहन सुविधाएं शामिल हैं। हमारी सरकार प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, वैकल्पिक निवेश फंड, आदि विभिन्न योजनाओं या पहलों के माध्यम से शीतगृह भंडारण परियोजनाओं की स्थापना के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता प्रदान करती है। 30 जून, 2025 तक, भारत में 402.18 लाख मीट्रिक टन की संयुक्त क्षमता के साथ 8,815 शीतगृह हैं।इसके अलावा, सरकार फसलों के लिए एक विशिष्ट मूल्य निर्धारित करके भी किसानों की मदद करती है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बाजार की स्थितियों के बावजूद, किसानों की फसलों के लिए सरकार द्वारा निर्धारित गारंटीकृत मूल्य है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि, किसानों को उनकी उपज का उचित मुआवजा मिले। हर साल 22 फसलों के लिए एमएसपी की घोषणा की जाती है, जिनमें चावल, गेहूं, दालें और तिलहन जैसे प्रमुख अनाज शामिल हैं। ये कीमतें किसानों को मूल्य अस्थिरता से बचाने और आवश्यक फसलों की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए निर्धारित की गई हैं। इसके तहत, किसानों को उनकी फसलों के लिए आधार मूल्य का आश्वासन दिया जाता है, जिससे बाजार में उतार-चढ़ाव का जोखिम कम हो जाता है। अर्थात, प्रतिकूल बाजार स्थितियों में भी खरीदारों या सरकार को इसी मूल्य पर किसानों से फसल खरीदनी पड़ती है।एमएसपी वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे किसानों को अपने निवेश की योजना बनाने और जोखिमों का प्रबंधन करने में मदद मिलती है। आवश्यक फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहित करके, एमएसपी राष्ट्र के लिए भोजन की स्थिर आपूर्ति भी सुनिश्चित करता है। साथ ही, एमएसपी गरीबी को कम करके और कृषि आजीविकाओं को बनाए रखकर ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं का समर्थन करता है। स्थिर कीमतों के साथ, भारत वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा कर सकता है, एवं कृषि निर्यात बढ़ा सकता है।इसके अतिरिक्त, एमएसपी बाजार की कीमतों को स्थिर करने में मदद करता है, जिससे कृषि उपज के लिए उचित मुआवजा सुनिश्चित होता है। यह आवश्यक फसलों की खेती को प्रोत्साहित करता है, तथा खाद्य सुरक्षा और संतुलित कृषि विकास का समर्थन करता है। इस प्रकार, हम खाद्यान्न भंडारण का महत्व जान सकते हैं। भंडारण, फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करता है, और उचित भंडारण मात्रा और गुणवत्ता को बरकरार रखता है। अनाज भंडारण, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और राष्ट्रीय आपात स्थितियों के लिए अनाज स्टॉक बनाए रखता है, जिससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है। रणनीतिक भंडारण, अत्यधिक कीमत में उतार-चढ़ाव को भी रोकता है और किसानों की आय का समर्थन करता है। साथ ही, यह खाद्य प्रसंस्करण और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करता है, क्योंकि यह उद्योगों के लिए कच्चे माल की उपलब्धता और निर्यात क्षमता प्रदान करता है। संदर्भ 1. https://tinyurl.com/3dzykb3f 2. https://tinyurl.com/3nks76e5 3. https://tinyurl.com/mrvx87w9 4. https://tinyurl.com/3dyxa5b8 5. https://tinyurl.com/bdf4pwsy
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
भारतीय क्रिकेट का पितामह कौन है, जिसके नाम पर खेली जाती है 'रणजी ट्रॉफी'?
रामपुर शहर के हमारे पाठकों के लिए क्रिकेट के इतिहास की यह कहानी बेहद दिलचस्प होने वाली है, क्योंकि इस खेल की जड़ें हमारे देश की ऐतिहासिक रियासतों और शाही घरानों से बहुत गहराई से जुड़ी हुई हैं। आज भारत में क्रिकेट महज़ एक खेल नहीं बल्कि एक धर्म की तरह माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में इस खेल की शुरुआत और इसकी लोकप्रियता के पीछे का इतिहास क्या है? प्रसिद्ध विचारक आशीष नंदी ने क्रिकेट को लेकर एक बेहद मशहूर और सटीक बात कही है कि क्रिकेट असल में एक भारतीय खेल है, जिसे ग़लती से अंग्रेज़ों ने ईजाद कर दिया था। यह वाक्य सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन जब हम भारत में क्रिकेट के इतिहास के पन्ने पलटते हैं, तो यह बात बिल्कुल सच साबित होती है। शुरुआत में यह आम जनता का खेल नहीं था, बल्कि इसे औपनिवेशिक काल के दौरान राजघरानों और अमीरों का खेल माना जाता था।ब्रिटिश राज में क्रिकेट कैसे बना रसूख और सत्ता का प्रतीक?भारत में क्रिकेट की शुरुआत अठारहवीं सदी में ब्रिटिश नाविकों और ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों द्वारा की गई थी। लेकिन भारतीयों के बीच इस खेल को अपनाने की कहानी केवल शौक तक सीमित नहीं थी। औपनिवेशिक काल के दौरान पारसी समुदाय, अंग्रेज़ी तौर-तरीकों को अपनाने वाले भारतीय समुदायों और सामंती राजकुमारों (रियासतों के राजा-महाराजाओं) ने सबसे पहले इस खेल को खेलना शुरू किया। उन्होंने इस खेल को महज़ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज में अपना रसूख (सोशल स्टेटस) स्थापित करने और ब्रिटिश राज के सत्ताधारी एलीट (उच्च वर्ग) तक अपनी पहुँच बनाने के एक साधन के रूप में अपनाया था। अंग्रेज़ों के साथ क्रिकेट खेलना उस दौर में उनके करीब जाने और उनके समाज का हिस्सा दिखने का एक बेहद कारगर तरीका माना जाता था। पटियाला के महाराजा ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के साथक्रिकेट ने भारतीयों को अंग्रेज़ी शासन और नियमों का सम्मान करना कैसे सिखाया?क्रिकेट का प्रभाव केवल खेल के मैदान तक सीमित नहीं था; इसका राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज पर भी बहुत व्यापक असर पड़ा। इस बात को सी.एल.आर. जेम्स ने अपनी शानदार किताब 'बियॉन्ड द बाउंड्री (Beyond the Boundary)' में बहुत ही बेहतरीन ढंग से समझाया है। जेम्स अपनी किताब में बताते हैं कि क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो नियमों, कानूनों और अंपायरों के निष्पक्ष अधिकार का सम्मान करना सिखाता है। ब्रिटिश शासकों ने बहुत ही चालाकी से इस खेल का इस्तेमाल भारतीयों के मनोविज्ञान को ढालने के लिए किया। अंपायर के फैसलों को बिना सवाल किए मान लेने की इस खेल की परंपरा ने धीरे-धीरे भारतीयों के भीतर औपनिवेशिक नियमों, उनके कानूनों और उनकी सत्ता के प्रति सम्मान और आज्ञाकारिता की भावना पैदा कर दी। इस तरह, क्रिकेट अनजाने में ही ब्रिटिश साम्राज्य के शासन को मज़बूत करने का एक वैचारिक उपकरण बन गया था।रियासतों के राजा-महाराजाओं ने क्रिकेट और क्रिकेटरों को कैसे संरक्षण दिया?जैसे-जैसे क्रिकेट का प्रभाव बढ़ा, भारत की बड़ी-बड़ी रियासतों ने इसे पूरी तरह से अपना लिया। इस दिशा में सबसे अहम कदम पटियाला के महाराजा राजिंदर सिंहजी ने उठाया, जिन्होंने अपना एक अलग क्रिकेट क्लब बनाया। पटियाला की देखादेखी भोपाल, बड़ौदा, होल्कर और अन्य कई रियासतों के शासकों ने भी क्रिकेट को गले लगा लिया। इन राजा-महाराजाओं ने न केवल इस खेल को आर्थिक समर्थन दिया, बल्कि उन्होंने बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए रोज़गार के अवसर भी पैदा किए। उदाहरण के लिए, होल्कर के महाराजा ने भारत के पहले क्रिकेट सुपरस्टार सी.के. नायडू को अपनी सेना में कर्नल के पद पर नियुक्त किया था। इसी तरह, महाराजा धनराजगीरजी ने मशहूर खिलाड़ी मुश्ताक अली को अपना संरक्षण दिया, जबकि जतीथी के राजा ने महान बल्लेबाज़ विजय हजारे को संरक्षण प्रदान किया था। शाही घरानों के इस वित्तीय और सामाजिक समर्थन ने ही भारत में पेशेवर क्रिकेट की शुरुआती नींव रखी थी। भारतीय क्रिकेट का पितामह किसे कहा जाता है?जब शाही घरानों और क्रिकेट के रिश्ते की बात होती है, तो एक नाम ऐसा है जिसके बिना भारत का क्रिकेट इतिहास हमेशा अधूरा रहेगा। यह नाम है कुमार श्री रणजीतसिंहजी का, जिन्हें दुनिया भर में 'रणजी' के नाम से भी जाना जाता है। वे नवानगर की रियासत के शासक थे। उनकी असाधारण खेल प्रतिभा और क्रिकेट के प्रति उनके योगदान को देखते हुए ही उन्हें 'भारतीय क्रिकेट का पिता' कहा जाता है। इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान उन्होंने ससेक्स काउंटी और बाद में इंग्लैंड की राष्ट्रीय टीम के लिए क्रिकेट खेला। उनकी बल्लेबाज़ी की शैली इतनी अनोखी और कलात्मक थी कि दुनिया ने पहले कभी वैसा कुछ नहीं देखा था। वे पारंपरिक नियमों से बंधकर नहीं खेलते थे, बल्कि उन्होंने क्रिकेट की दुनिया को 'लेट कट' और 'लेग ग्लांस' जैसे बिल्कुल नए शॉट दिए। उनकी इस जादुई बल्लेबाज़ी ने अंग्रेज़ों को भी उनका मुरीद बना दिया था। रणजीतसिंहजी की विरासत भारत की सबसे बड़ी घरेलू प्रतियोगिता कैसे बनी?हालांकि रणजीतसिंहजी ने अपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर में ज़्यादातर मैच इंग्लैंड की तरफ से खेले और भारतीय ज़मीन पर उनका क्रिकेट खेलना बहुत सीमित रहा, लेकिन उनका रुतबा और नाम इतना बड़ा था कि भारतीय क्रिकेट हमेशा के लिए उनके नाम के साथ जुड़ गया। एक भारतीय राजकुमार का अंग्रेज़ों के ही खेल में अंग्रेज़ों से बेहतर प्रदर्शन करना, उस दौर में भारतीयों के लिए बहुत बड़े गर्व की बात थी। उनके इसी अभूतपूर्व योगदान और क्रिकेट में उनके ऐतिहासिक दर्जे का सम्मान करने के लिए, भारत की सबसे प्रतिष्ठित घरेलू क्रिकेट प्रतियोगिता का नाम उनके नाम पर रखा गया। जिसे आज हम 'रणजी ट्रॉफी' के नाम से जानते हैं, वह नवानगर के इसी महान राजकुमार की विरासत है। आज भी भारतीय क्रिकेट टीम में जगह बनाने का सपना देखने वाला हर युवा खिलाड़ी सबसे पहले इसी रणजी ट्रॉफी में खुद को साबित करने की कोशिश करता है।संदर्भ https://tinyurl.com/26yca7eyhttps://tinyurl.com/22mepjejhttps://tinyurl.com/24dfaof2https://tinyurl.com/25q26wnlhttps://tinyurl.com/2aevwdonhttps://tinyurl.com/y67uzm7f
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
जानिए, सॉवरेन या संप्रभु एआई के लिए देशों की चाहत कैसे बढ़ रही है एवं यह उपयुक्त क्यों है?
आज के लेख में हम समझेंगे कि, सॉवरेन एआई (Sovereign AI) या संप्रभु एआई क्या है, और इससे संबंधित प्रमुख पहलू क्या हैं। फिर, हम उन देशों की सूची देखेंगे, जिनके पास स्वतंत्र नियंत्रित इंटरनेट सिस्टम (Internet System) हैं। इसके अलावा, हम पूरी तरह से संप्रभु इंटरनेट के बिना, संप्रभु एआई प्राप्त करने की चुनौतियों का पता लगाएंगे। अंततः हम जांच करेंगे कि, क्या एक परस्पर जुड़ी वैश्विक प्रणाली में सच्ची डिजिटल संप्रभुता वास्तव में संभव है या नहीं।सॉवरेन या संप्रभु एआई का उद्देश्य, एआई के देशज उत्पादन को सुनिश्चित करना है। इसमें एआई को प्रशिक्षित करने हेतु उपयोग किया जाने वाला डेटा, किसी क्वेरी (Query) या प्रश्न पर शोध करते समय एआई द्वारा खोजा गया डेटा, और किसी प्रश्न के जवाब में एआई द्वारा आउटपुट के रूप में उत्पन्न डेटा शामिल है।इस संदर्भ में, संप्रभु एआई में "कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence)" के रूप में लेबल की गई किसी भी या सभी प्रकार की प्रौद्योगिकियां शामिल हो सकती हैं। इसमें डेटा रुझानों को समझने और विसंगतियों को पहचानने के लिए मशीन लर्निंग (Machine Learning) भी शामिल है। ऐसे एआई में, एआई प्रौद्योगिकियों के उपयोग को नियंत्रित करने वाले नियम भी शामिल हो सकते हैं, जैसे कि गोपनीयता (Privacy) से संबंधित नियम।संप्रभु एआई, डेटा संप्रभुता से संबंधित है। किसी कंपनी या संगठन को राष्ट्रीय नियमों पर विचार करना चाहिए कि, उनका डेटा कहां संग्रहीत और संसाधित किया जा सकता है। आज अधिकांश संगठनों के पास डेटा प्रशासन नीतियां मौजूद हैं। परीक्षण के आरंभ में ही उन नीतियों को एआई तक विस्तारित करने से, भविष्य में आने वाली समस्याओं से बचा जा सकता है। इसी के साथ, इन्हें स्वीकार्य उपयोग को निर्देशित किया जा सकता है। यहां यह विचार भी महत्वपूर्ण है कि, एल्गोरिदम (Algorithm) को प्रशिक्षित करने के लिए डेटा का उपयोग कैसे किया जाता है, और तैयार एआई मॉडल क्या उत्तर प्रदान करते हैं।संप्रभु एआई से संबंधित विचार करने के लिए, छह मुख्य पहलू निम्नलिखित हैं: आपके संगठन पर लागू होने वाले नियमों को समझना; आपके पसंदीदा एआई बुनियादी ढांचे का निर्धारण करना; डेटा स्थानीयकरण नियंत्रण लागू करना; डेटा गोपनीयता नियंत्रण स्थापित करना; कानूनी नियंत्रण स्थापित करना और अपने एआई स्टैक (Data stack) को सुरक्षित करना। उदाहरण के तौर पर, वांछित एआई बुनियादी ढांचे के निर्धारण में क्लाउड (Cloud) शामिल है, जिसमें एआई बुनियादी ढांचे का निर्माण, संकलन और प्रबंधन करना अक्सर आसान होता है। इसके साथ ही, यदि आपका क्लाउड डेटा संप्रभुता मुद्दों को प्रबंधित करने में आपकी सहायता कर सकता है, तो आपके लिए एआई संप्रभुता के साथ काम करना आसान हो जाएगा।एक तरफ डेटा गोपनीयता, डेटा के प्रकार और इसका उपयोग कैसे किया जा सकता है, पर केंद्रित है। इसके लिए, आपके सॉफ़्टवेयर को एक लचीली नियंत्रण प्रणाली की आवश्यकता हो सकती है, जो जटिल उपयोग के मामलों को संभालने में सहायक हो। जबकि, एआई स्टैक को सुरक्षित करना, आखिरी पहलू है। कभी-कभी कंपनियां चाहती हैं कि एआई उनके सुरक्षा नियमों के अंदर काम करे। लेकिन इसके लिए ज्यादा जांच और परीक्षण करना पड़ता है। इसलिए वे ऐसे मामलों को पकड़ने के लिए टेस्ट करती हैं, जहां यूज़र (user) गलत तरीके से संवेदनशील जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं।चलिए, अब राष्ट्रीय इंट्रानेट (National intranet) के बारे में पढ़ते हैं। यह एक इंटरनेट शिष्टाचार-आधारित बंद नेटवर्क होता है, जिसे एक राष्ट्र द्वारा वैश्विक इंटरनेट के राष्ट्रीय विकल्प के रूप में बनाए रखा जाता है। इसका उद्देश्य अपने निवासियों के संचार को नियंत्रित करना और उसकी निगरानी करना है। साथ ही, बाहरी मीडिया तक उनकी पहुंच को यह प्रतिबंधित करता है। ईरान (Iran) में इसके लिए ‘हलाल इंटरनेट’ शब्द का उपयोग किया गया है। ऐसे नेटवर्क आम तौर पर राज्य-नियंत्रित मीडिया और विदेशी संचालित इंटरनेट सेवाओं के राष्ट्रीय विकल्पों तक पहुंच के साथ आते हैं, जैसे कि - खोज इंजन (search engine), वेब-आधारित ईमेल (Web-based email), इत्यादि।राष्ट्रीय इंट्रानेट वाले देशों की सूची निम्नलिखित है-1. म्यांमार (Myanmar),2. क्यूबा (Cuba),3. उत्तर कोरिया (North Korea),4. रूस (Russia),5. चीन (China),6. ईरान।एआई स्टैक पर पूर्ण स्वायत्तता का विचार, अधिकांश उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए आर्थिक और संस्थागत रूप से निषेधात्मक है। हर चीज़ स्वयं बनाना भी महंगा है। जब कोई राष्ट्र एआई स्टैक के हर स्तर का मालिक बनना चुनता है, तो जरूरी नहीं कि वह अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर रहा हो। एक हालिया अध्ययन में पाया गया है कि, अमेरिकी कंपनियों ने 18% डेटा सेंटर (Data Center) परियोजनाओं के लिए ऑपरेटर (Operator) के रूप में काम किया है। "संप्रभु" सुविधाओं का निर्माण करने वाले देश भी संचालन के लिए, अक्सर अमेरिकी हाइपरस्केलर्स (Hyperscalers) जैसे एडब्ल्यूएस (AWS), माइक्रोसॉफ्ट एज्यूर( Microsoft Azure), या गूगल क्लाउड (Google Cloud) पर निर्भर रहते हैं। जब क्षेत्रीय और परिचालन क्षेत्राधिकार पर विचार किया जाता है, तो एआई क्षमता सहित वैश्विक गणना पर अमेरिका का पर्याप्त प्रभाव है। व्यवहार में, अधिकांश "संप्रभु गणना" अमेरिकी प्रौद्योगिकी पर निर्भर रहती है। यह प्रश्न मौजूद है कि, एआई आपूर्ति श्रृंखला के किन हिस्सों पर एक राष्ट्र का स्वामित्व, नियंत्रण या शासन होना चाहिए; और एक राष्ट्र किन हिस्सों के साथ सुरक्षित रूप से साझेदारी कर सकता है, किराए पर ले सकता है या साझा कर सकता है? इस प्रश्न का उत्तर परिस्थिति के आधार पर बदलता रहता है। सामान्य रूप से संप्रभुता पाने के बजाय, इन परिस्थितियों को सही करना ही 2026 की रणनीतिक चुनौती है।हाल ही में, यूरोपीय संघ (European Union) और भारत ने एआई विकास के लिए अधिक संप्रभु दृष्टिकोण की इच्छा व्यक्त की है। हालांकि अभी के लिए, यूरोपीय संघ और भारत के ‘एआई स्टैक’ आपूर्ति श्रृंखलाओं में मजबूती से अंतर्निहित हैं, जो कुछ अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों द्वारा नियंत्रित हैं। चीन द्वारा नियंत्रित महत्वपूर्ण खनिज प्रसंस्करण और हार्डवेयर विनिर्माण (Hardware manufacturing) पर इनकी निर्भरता है। अमेरिका और भारत के बीच सहयोग, बुनियादी ढांचे, कॉर्पोरेट भागीदारी और आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण पर केंद्रित है। उन्नत प्रोसेसर (Processor) और अच्छी कंप्यूटिंग क्षमता (Computing capacity) पर ध्यान देने के साथ, भारतीय कंपनियों को अमेरिकी अग्रणी एआई कंपनियों के साथ जोड़ने के लिए समझौते किए गए हैं। इससे भारत मौजूदा वैश्विक एआई आपूर्ति श्रृंखलाओं में अधिक गहराई से एकीकृत होगा। इस प्रवृत्ति को भारत के अमेरिकी पहल ‘पैक्स सिलिका (Pax Silica)’ में शामिल होने से स्पष्ट किया गया है। इसका उद्देश्य चयनित भागीदारों के बीच एआई आपूर्ति श्रृंखलाओं में समन्वय और लचीलेपन को मजबूत करना है।पूर्ण-स्टैक एआई संप्रभुता, लगभग किसी भी देश के लिए संरचनात्मक रूप से अव्यवहार्य है। क्योंकि एआई खनिजों, ऊर्जा, कंप्यूट हार्डवेयर, नेटवर्क, डिजिटल बुनियादी ढांचे (digital infrastructure), डेटा परिसंपत्तियों, मॉडलों, अनुप्रयोगों, प्रतिभा के क्रॉसकटिंग एनबलर्स (Crosscutting enablers) तथा शासन में केंद्रित एक अंतरराष्ट्रीय स्टैक है। इसलिए, विकल्प यह है कि एआई स्टैक में जोखिमों को कम करने के लिए रणनीतिक गठबंधन और साझेदारी पर काम करना चाहिए। अगर आपसी निर्भरता को सही तरीके से संभाला जाए, तो खुले बाजार और देशों के सहयोग के फायदे बने रहते हैं और साथ ही मजबूती भी बढ़ती है।भारत डिजिटल संप्रभुता की बात करता है, और हमने डेटा स्थानीयकरण और देशज स्टार्टअप को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाए हैं। रूस, ब्राज़ील (Brazil) और अन्य देशों ने अपने डिजिटल ढांचे को अधिक नियंत्रित करने की इच्छा व्यक्त की है। विश्व में आज विदेशी प्रौद्योगिकी पर कम निर्भर होने की चाहत, काफी सार्वभौमिक हो गई है। आधुनिक तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र वैश्वीकृत है, और कोई भी एक राष्ट्र संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला को नियंत्रित नहीं करता है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/zwhcj5xj 2. https://tinyurl.com/4ratzyea 3. https://tinyurl.com/4zdunpvb 4. https://tinyurl.com/3mbhjrnh 5. https://tinyurl.com/4j6nk324 6. https://tinyurl.com/5cccbf7f
शहरीकरण - नगर/ऊर्जा
भारत में क्लीन एनर्जी के दौर में भी काले कोयले का राज क्यों कायम है?
गुजरात के सफ़ेद रण में बन रहा खावड़ा नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र साल 2030 तक 30 गीगावाट सौर और पवन ऊर्जा पैदा करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा स्वच्छ ऊर्जा प्रतिष्ठान बनने जा रहा है। लेकिन उसी समय महाराष्ट्र के चंद्रपुर में एक 3 गीगावाट का कोयला आधारित संयंत्र लगातार धुआं उगल रहा है, जो उन सैकड़ों संयंत्रों में से एक है जो आज भी भारत के 60 प्रतिशत से अधिक बिजली तंत्र को शक्ति प्रदान करते हैं। रामपुर और इसके आस-पास के बिजली उपभोक्ताओं के लिए यह जानना बहुत दिलचस्प होगा कि जब भारत में सौर ऊर्जा की क़ीमत 30 डॉलर प्रति मेगावाट घंटे तक गिर गई है, जो कोयले की क़ीमत से लगभग आधी है, फिर भी सरकार के अनुमान के मुताबिक साल 2047 तक भारत में कोयले की मांग 1755 मीट्रिक टन (metric ton) तक क्यों पहुंच जाएगी। विकास और जलवायु लक्ष्यों के बीच फँसे भारत के लिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर हमारी अर्थव्यवस्था कोयले पर इतनी निर्भर क्यों है, इसके क्या फ़ायदे और नुक़सान हैं, और साफ़ ऊर्जा की तरफ़ कैसे बढ़ा जा सकता है। भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा में कोयले का क्या महत्व है? भारत की ऊर्जा ज़रूरतों के लिए कोयला एक आधारशिला है, जो हमारी प्राथमिक ऊर्जा ज़रूरतों के आधे से अधिक हिस्से का योगदान देता है और उद्योगों की रीढ़ की हड्डी बना हुआ है। पिछले एक दशक में देश के कुल बिजली उत्पादन में थर्मल पावर की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक रही है। इसके अलावा कोयला क्षेत्र का आर्थिक महत्व ऊर्जा उत्पादन से कहीं आगे तक फैला हुआ है। भारतीय रेलवे को माल ढुलाई से जो कमाई होती है, उसमें करीब 49% हिस्सा सिर्फ कोयले से आता है, जो वित्तीय वर्ष 2022-23 में 82,275 करोड़ रुपये रही थी। यह क्षेत्र केंद्र और राज्य सरकारों को रॉयल्टी (Royalty) और अन्य करों के माध्यम से सालाना 70,000 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व देता है। रोज़गार के मामले में भी यह क्षेत्र काफ़ी अहम है, विशेष रूप से पूर्वी राज्यों में, जहाँ कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Limited) और उसकी सहायक कंपनियों में 2,39,210 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं और इसके अलावा हज़ारों लोग ठेके और आउटसोर्सिंग (Outsourcing) के ज़रिए जुड़े हुए हैं। कोयले के इस्तेमाल के मुख्य फ़ायदे और नुक़सान क्या हैं?कोयला दुनिया भर में ऊर्जा के सबसे प्रचुर स्रोतों में से एक है और यह तेल या प्राकृतिक गैस जैसे अन्य जीवाश्म ईंधनों की तुलना में सस्ता है। सौर या पवन ऊर्जा के विपरीत, जो पूरी तरह से मौसम पर निर्भर होते हैं, कोयला बिजली संयंत्र किसी भी मौसम में दिन-रात चल सकते हैं। कोयले का ऊर्जा घनत्व भी अधिक होता है, जिसका अर्थ है कि यह प्रति किलोग्राम बड़ी मात्रा में ऊर्जा पैदा कर सकता है। इसके अलावा कोयले से सिंथेटिक ईंधन (synthetic fuel) और रोज़मर्रा के सामान में इस्तेमाल होने वाले रसायन भी बनाए जा सकते हैं। लेकिन इन फ़ायदों के साथ इसके बड़े नुक़सान भी जुड़े हुए हैं। कोयला जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) जैसी ग्रीनहाउस गैसों (greenhouse gases) का भारी उत्सर्जन होता है जो जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण है। कोयले के प्रदूषण से अस्थमा और हृदय रोग का ख़तरा बढ़ता है, और खदानों में काम करने वाले मज़दूरों को ब्लैक लंग डिज़ीज़ (Black Lung Disease) जैसी जानलेवा बीमारियां होती हैं। इसके खनन के लिए जंगलों और पहाड़ों को नष्ट किया जाता है और बिजली संयंत्रों को ठंडा करने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। इन संयंत्रों से निकलने वाली ज़हरीली राख ज़मीन और पानी दोनों को दूषित करती है। सौर ऊर्जा सस्ती होने के बावजूद भारत कोयले पर इतना निर्भर क्यों है?भारत में सौर ऊर्जा अब कोयले से सस्ती हो चुकी है, फिर भी नए कोयला संयंत्र (coal plant) बनाए जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि सौर और पवन ऊर्जा हमेशा उपलब्ध नहीं रहती है। एक सौर संयंत्र एक वर्ष में अपने अधिकतम उत्पादन का केवल 15 से 25 प्रतिशत ही पैदा कर पाता है और पवन संयंत्र 25 से 35 प्रतिशत पैदा करता है। इसकी तुलना में कोयला संयंत्र दिन-रात सातों दिन चल सकते हैं और इनका क्षमता उपयोग कारक 70 से 90 प्रतिशत तक होता है। भारत में बिजली की मांग दिन में दो बार चरम पर होती है, एक बार दोपहर में और दूसरी बार सूर्यास्त के बाद। सौर ऊर्जा दिन की मांग को तो पूरा कर देती है, लेकिन जब लोग शाम को घर लौटते हैं और बिजली की मांग बढ़ती है, तब सूरज ढल चुका होता है। इस समस्या को सुलझाने के लिए विशाल बैटरी स्टोरेज (Battery Storage) की ज़रूरत है, जो अभी व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य नहीं है। इसके अलावा एक बड़ी भौगोलिक चुनौती भी है क्योंकि भारत में नवीकरणीय ऊर्जा मुख्य रूप से छह दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में केंद्रित है, जबकि कोयले वाले राज्य मध्य और पूर्वी भारत में हैं। इन क्षेत्रों को जोड़ने के लिए ट्रांसमिशन बुनियादी ढांचा(Transmission infrastructure) अभी भी कमज़ोर है, जिस कारण कोयले पर निर्भरता कम करना आसान नहीं है। कोयले पर निर्भर इस व्यवस्था को साफ़ ऊर्जा में कैसे बदला जा सकता है? भारत को कार्बन मुक्त बनाने के लिए कोयला संयंत्रों को साफ़ ऊर्जा की ओर ले जाना सबसे बड़ी चुनौती है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के एक हालिया शोध में भारत के 806 कोयला संयंत्रों के डेटा का विश्लेषण किया गया है। इस शोध के अनुसार, यदि केवल नवीकरणीय ऊर्जा पर भारी निवेश किया जाता है, तो बिजली सस्ती तो होगी लेकिन सामाजिक असमानता बढ़ेगी। अमीर पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में हवा और सूरज की रोशनी होने के कारण सारा निवेश वहीं होगा, जबकि पूर्वी भारत के ग़रीब कोयला उत्पादक राज्य पीछे छूट जाएंगे। शोध में पाया गया है कि बिजली की लागत और सामाजिक न्याय दोनों को संतुलित करने का सबसे अच्छा तरीक़ा मौजूदा उच्च दक्षता वाले कोयला संयंत्रों में कार्बन कैप्चर एंड सिक्वेस्ट्रेशन (Carbon Capture and Sequestration) तकनीक लगाना है, जिसके तहत धुएं से कार्बन सोख लिया जाता है। इसके साथ ही कोयले के साथ बायोमास को मिलाकर जलाना भी एक बेहतर विकल्प है। अगर इन तकनीकों को अपनाया जाता है, तो बिजली की लागत में 22 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है और कोयला संयंत्रों का बेहतर उपयोग भी हो सकेगा। हालांकि भारत इस नई कार्बन सोखने वाली तकनीक को लेकर अभी बहुत सतर्क है, लेकिन विदेशी सहयोग और बेहतर नीतियों से इस संकट को सुलझाकर देश एक स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा वाले भविष्य की ओर बढ़ सकता है। संदर्भ https://tinyurl.com/2y25ybm9https://tinyurl.com/2c28hvevhttps://tinyurl.com/22e5fmj6https://tinyurl.com/295pdwy2https://tinyurl.com/24uqa5jl
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
आशा भोसले और माइकल स्टाइप का 'द वे यू ड्रीम' में सुरीला संगम
आशा भोसले (Asha Bhosle) भारतीय सिनेमा की सबसे बहुमुखी और प्रसिद्ध गायिकाओं में से एक हैं, जिनकी आवाज़ ने संगीत की सीमाओं को पार करते हुए दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने केवल फिल्मी गीतों तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ भी काम करके अपनी कला को एक वैश्विक रूप दिया।इसी कड़ी में उनका एक खास सहयोग अंग्रेज़ी संगीत समूह 1 जायंट लीप (1 Giant Leap) और गायक माइकल स्टाइप (Michael Stipe) के साथ देखने को मिलता है। “द वे यू ड्रीम” (The Way You Dream) गीत में आशा भोसले की आवाज़ सबसे पहले सुनाई देती है, जो पूरे गीत को एक गहराई और शांति देती है। यह गीत अलग अलग देशों की ध्वनियों और विचारों को जोड़कर एकता का संदेश देता है।दिलचस्प बात यह है कि यह सहयोग पहले से तय नहीं था। जयपुर में अचानक मुलाकात के दौरान उन्हें एक धुन सुनाई गई और उन्होंने उसी समय गाना रिकॉर्ड किया। उनकी सहज और भावपूर्ण गायकी ने इस गीत को एक खास पहचान दी।यह सहयोग दिखाता है कि आशा भोसले की आवाज़ सिर्फ भारत की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की है। उनका संगीत लोगों को जोड़ता है और यह एहसास कराता है कि अलग अलग संस्कृतियों के बीच भी एक गहरी समानता होती है। संदर्भ:https://tinyurl.com/35y794vx https://tinyurl.com/53u8rhur https://tinyurl.com/mvucaw7a https://tinyurl.com/3frjzcrk
मध्यकाल : 1450 ई. से 1780 ई.
50 हज़ार शेरों वाला फ़ारसी महाकाव्य 'शाहनामा' यूपी के रामपुर कैसे पहुँचा?
क्या आपने कभी सोचा है कि एक 1010 ईसवी में लगभग पचास हज़ार शेरों में लिखा गया एक ऐसा महाकाव्य, जो दुनिया के निर्माण से लेकर सातवीं शताब्दी के इस्लामी आक्रमण तक की कहानी बयां करता है, हमारे रामपुर शहर की सबसे सुरक्षित और ऐतिहासिक तिजोरी तक कैसे पहुँचा? यह दास्तान है 'शाहनामा' की, जिसे हकीम अबुल-कासिम फिरदौसी (Hakim Abul-Qasim Firdausi) ने लिखा था। फ़ारस से उठी यह साहित्यिक लहर मुग़ल बादशाहों के दरबारों से होती हुई, रामपुर के नवाबों के उस जुनून तक पहुँची, जिन्होंने दुनिया के दुर्लभ ग्रंथों को हासिल करने के लिए इस्तांबुल, काहिरा, बग़दाद, तेहरान और समरकंद तक खाली चेक देकर अपने नुमाइंदे भेजे थे। यह केवल एक किताब का सफ़र नहीं है, बल्कि यह इंसानी इतिहास, कला और सभ्यताओं के आपसी जुड़ाव की एक ऐसी जीती-जागती कहानी है, जो आज भी रामपुर की रज़ा लाइब्रेरी की अलमारियों में महक रही है। शाहनामा क्या है और यह फ़ारसी पौराणिक कथाओं तथा इतिहास को कैसे प्रस्तुत करता है?शाहनामा, जिसे राजाओं की किताब के रूप में भी जाना जाता है, ग्रेटर ईरान (ईरान ज़मीन) के इतिहास और पौराणिक कथाओं का एक निर्विवाद राष्ट्रीय महाकाव्य है। यह महाकाव्य दुनिया के निर्माण से शुरू होकर सातवीं शताब्दी में अरबों की विजय तक के कालखंड को समेटता है। इस ग्रंथ में रुस्तम जैसे महान योद्धाओं और सिकंदर महान जैसे ऐतिहासिक राजाओं की दिलचस्प कहानियाँ दर्ज हैं। ईरान, अफ़ग़ानिस्तान (Afghanistan), ताजिकिस्तान (Tajikistan) और काकेशस (Caucasus) के लोग इस ग्रंथ को अपनी साझा सांस्कृतिक विरासत मानते हैं। फिरदौसी ने पूर्व-इस्लामी ईरानी पौराणिक कथाओं को शामिल करके फ़ारसी भाषा और संस्कृति को सहेजने का महान काम किया था। हालांकि बीसवीं सदी में कई राष्ट्रवादियों और विशेष रूप से पहलवी राजवंश ने इस ग्रंथ का राजनीतिकरण किया। उन्होंने इसे अरब और तुर्क प्रभाव के खिलाफ ईरानी श्रेष्ठता का प्रतीक बना दिया और यह भ्रांति फैलाई कि शाहनामा में कोई अरबी शब्द नहीं है और यह इस्लाम या अरबों के ख़िलाफ़ है।शाहनामा वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट है। राष्ट्रवादी विचारों ने शाहनामा को एक धर्मनिरपेक्ष और शुद्ध फ़ारसी ग्रंथ साबित करने की कोशिश की, लेकिन तथ्य बताते हैं कि इस महाकाव्य में लगभग नौ प्रतिशत अरबी शब्दों का इस्तेमाल हुआ है। फिरदौसी ने अपनी किताब की शुरुआत में ईश्वर, ग़ज़नी के सुल्तान महमूद, पैगंबर और उनके परिवार (अहल-ए बैत) की भरपूर प्रशंसा की है, जो उनकी आस्था को दर्शाता है। इस ग्रंथ में बुराई का स्रोत बाहरी दुनिया को नहीं, बल्कि 'अह्रिमन' के रूप में समाज के भीतर ही दिखाया गया है। सियावश और सोहराब जैसे ईरानी नायकों ने ईरानी पठार की सीमाओं के पार जाकर रिश्ते बनाए थे। फिरदौसी ने अपनी कहानी में सुदाबेह और अयोग्य राजा के कवुस जैसे भ्रष्ट ईरानी किरदारों को भी जगह दी है, जो साबित करता है कि यह महाकाव्य केवल खोखले राष्ट्रवाद की वकालत नहीं करता। 1934 में जब तूस शहर में फिरदौसी के मकबरे का पुनर्निर्माण हुआ, तो उसमें सफ़ेद पत्थर का इस्तेमाल इसी तथाकथित भाषाई शुद्धता को दर्शाने के लिए किया गया था और पारसी प्रतीक 'फ़रहर' को परसेपोलिस (Persepolis) से हूबहू नकल किया गया था। तेरहवीं शताब्दी में मंगोल आक्रमणों के बाद जब व्यापारिक मार्ग फिर से खुले, तो इलखानी और तैमूरी काल के चित्रकारों ने शाहनामा के चित्रों में चीनी कला को भी अपनाया। मशहूर ईरानी पौराणिक पक्षी 'सीमूर्घ' के चित्रण पर चीनी ड्रैगन (Chinese dragon) और फ़ीनिक्स (Phoenix) का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। मुग़ल साम्राज्य ने शाहनामा और अन्य फ़ारसी साहित्य को कैसे सहेजा और बढ़ावा दिया?भारत में मुग़ल साम्राज्य की नींव 1526 में बाबर ने रखी थी। बाबर महान विजेता तैमूर और चंगेज़ ख़ान का वंशज था। वह मूल रूप से उज़्बेकिस्तान (Uzbekistan) की फ़रग़ना घाटी से आया था और उसका सपना समरकंद पर कब्ज़ा करना था। जब वह तीन बार असफल रहा, तो उसने काबुल और फिर भारत का रुख किया, जहाँ उसने अफ़ग़ान शासक इब्राहिम लोदी को हराया। मुग़ल मूल रूप से तुर्क थे, लेकिन वे फ़ारसी संस्कृति को बहुत परिष्कृत और महान मानते थे। इसी कारण उन्होंने फ़ारसी को अपने दरबार और प्रशासन की आधिकारिक भाषा बना दिया। बाबर कला और साहित्य का प्रेमी था; उसने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' (Baburnama) अपनी मातृभाषा चगताई तुर्की में लिखी थी, जिसमें उसने अपने युद्धों और भारत की गर्मी का ज़िक्र किया था।बाबर के बाद उसके बेटे हुमायूँ को अफ़ग़ान शासक शेर शाह सूरी से हारकर भागना पड़ा और उसने ईरान में सफ़वी शासक शाह तहमास्प के दरबार में पनाह ली। यह निर्वासन मुग़ल इतिहास और कला के लिए एक वरदान साबित हुआ। शाह की मदद से हुमायूँ को राजनीतिक ताकत तो मिली ही, साथ ही उसने तबरीज़ में शाह के स्टूडियो (studio) में बेहतरीन कलाकृतियाँ भी देखीं। वापसी में हुमायूँ अपने साथ कम से कम दो महान फ़ारसी कलाकारों को भारत ले आया, जिन्होंने मुग़ल चित्रकला स्टूडियो की नींव रखी। बाद में अनपढ़ होने के बावजूद बादशाह अकबर ने किताबों के प्रति अपने गहरे प्रेम के कारण अपने पिता की इस परंपरा को बहुत आगे बढ़ाया। अकबर ने हमज़ानामा (Hamzanama) बनवाया, जिसमें चौदह सौ चित्र थे और जिसे पूरा होने में पंद्रह साल लगे थे। अकबर के समय में बाबरनामा का तुर्की से फ़ारसी में अनुवाद किया गया और निज़ामी, फ़िरदौसी, हाफ़िज़ तथा सादी के ग्रंथों को चित्रित करवाया गया। इस प्रकार मुग़ल काल में फ़ारसी कला और साहित्य ने भारतीय संस्कृति के साथ मिलकर एक नया मुकाम हासिल किया। हमज़ानामा मुग़ल लघु चित्रकला की उत्पत्ति कैसे हुई और सचित्र पांडुलिपियों से इसका क्या संबंध है?मुग़ल लघु चित्रकला वास्तव में फ़ारसी और भारतीय कला शैलियों का एक अनूठा संगम है, जो सोलहवीं शताब्दी में अपने चरम पर पहुँची। जब हुमायूँ ईरान से लौटा, तो वह अपने साथ मीर सैयद अली और अब्द अल-समद जैसे महान फ़ारसी कलाकारों को लाया था। इन कलाकारों ने भारतीय कला में आलंकारिक शैली, जटिल विवरण और जीवंत रंगों को पिरोया। सम्राट अकबर के शासनकाल में इस कला को सबसे ज़्यादा संरक्षण मिला और मुग़ल चित्रकला की एक बिल्कुल नई शैली का जन्म हुआ। इन लघु चित्रों के ज़रिए न केवल दरबार की भव्यता को दर्शाया गया, बल्कि हिंदू महाकाव्यों जैसे रामायण और महाभारत को भी मुग़ल शैली में सचित्र किया गया।इन चित्रों को बनाने की तकनीक बहुत ही बारीक और मेहनत भरी होती थी। मुग़ल चित्रकार मुख्य रूप से कागज़ पर चित्र बनाते थे, जो ताड़ के पत्तों पर चित्रकारी करने की पुरानी भारतीय परंपरा से एक बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव था। रंग भरने के लिए खनिजों, पौधों और यहां तक कि कीमती पत्थरों से निकले प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता था। सबसे दिलचस्प बात यह है कि चित्रकारी के लिए इस्तेमाल होने वाले ब्रश गिलहरी या बिल्ली के बालों से बनाए जाते थे। इन चित्रों में पदानुक्रमित पैमाने का उपयोग किया जाता था, जिसका अर्थ है कि बादशाह या मुख्य व्यक्ति को हमेशा अन्य आकृतियों की तुलना में बड़ा दिखाया जाता था। चित्रों में गहरे लाल, नीले, हरे और सुनहरे रंगों का भरपूर इस्तेमाल होता था और छाया के ज़रिए एक गहरी जीवंतता पैदा की जाती थी। इस तरह लघु चित्रकला ने पांडुलिपियों को केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि देखने और महसूस करने वाली कला का खजाना बना दिया। रामपुर की रज़ा लाइब्रेरी में संरक्षित सचित्र शाहनामा का क्या सांस्कृतिक महत्व है?अठारहवीं सदी के अंत में जब मुग़ल साम्राज्य का पतन हो रहा था और दिल्ली में उथल-पुथल मची थी, तब रामपुर के पहले नवाब फैज़ुल्लाह ख़ान (1774 से 1794) ने भागते हुए कलाकारों, कवियों और विद्वानों को अपने यहां पनाह दी। नवाब फैज़ुल्लाह ख़ान एक उत्कृष्ट नज़रिए और गहरी बुद्धि वाले इंसान थे। उन्होंने सत्ता के साथ-साथ ज्ञान को सहेजने के महत्व को समझा और पुरानी पांडुलिपियों को इकट्ठा करना शुरू किया, जिससे महान रज़ा लाइब्रेरी की नींव पड़ी। बाद में नवाब कल्ब अली ख़ान और उनके बेटे नवाब हामिद अली ख़ान के दौर में यह लाइब्रेरी पूरी दुनिया में मशहूर हो गई। इन नवाबों ने इस्तांबुल, काहिरा, बग़दाद, तेहरान और समरकंद जैसी जगहों पर अपने विशेष लोग भेजे और उन्हें खाली चेक देकर दुनिया की सबसे दुर्लभ पांडुलिपियों को रामपुर लाने का काम सौंपा। आज रामपुर के शानदार हामिद मंज़िल में स्थित इस लाइब्रेरी में सत्रह हज़ार से ज़्यादा पांडुलिपियां और अस्सी हज़ार से ज़्यादा मुद्रित किताबें मौजूद हैं।इसी विशाल और अनमोल संग्रह में सफ़वी फ़ारसी शासक शाह तहमास्प के आदेश पर तैयार किए गए 'शाहनामा' का एक शानदार सचित्र पन्ना भी सुरक्षित रखा गया है। इसके हर पन्ने पर बनी जटिल मुग़ल और फ़ारसी चित्रकारी फ़ारसी नायकों की कहानियों को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाती है। इसके अलावा यहाँ बारहवीं सदी की एक ऐसी कुरान भी मौजूद है जिसे केवल स्याही से नहीं, बल्कि सोने से लिखा गया है। यहाँ मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब आलमगीर द्वारा अपने हाथों से लिखी गई 'दीवान-ए-हाफ़िज़' (Diwan-e-hafiz) की एक प्रति और ग्यारहवीं सदी के महान विद्वान अल-बरूनी की मूल पांडुलिपि भी सहेजी गई है। इस लाइब्रेरी में अरबी, फ़ारसी, संस्कृत, हिंदी, तुर्की, पश्तो और उर्दू की बेशकीमती पांडुलिपियां हैं, साथ ही बाबर, हुमायूँ और अकबर के मूल शाही फ़रमान भी मौजूद हैं। 1951 में नवाब सैयद मुर्तज़ा अली ख़ान ने इस लाइब्रेरी को एक ट्रस्ट को सौंप दिया और अंततः 1975 में भारत सरकार ने संसद के एक अधिनियम के माध्यम से इसे राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित कर दिया। आज यह रज़ा लाइब्रेरी केवल किताबों का संग्रह नहीं है, बल्कि दुनिया भर के शोधकर्ताओं के लिए एक तीर्थस्थल है, जो रामपुर शहर को वैश्विक इतिहास के नक्शे पर हमेशा के लिए अमर कर देता है। संदर्भ 1. https://tinyurl.com/2ytjm3ub 2. https://tinyurl.com/29ohewd6 3. https://tinyurl.com/23nk87f7 4. https://tinyurl.com/2cvrtw2e
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
21-06-2026 09:15 AM • Rampur-Hindi
वाका वाका - फीफा विश्व कप 2010 की वह धुन जो आज भी दिलों में बसती है
वर्ष 2010 के फीफा विश्व कप के साथ यदि कोई गीत सबसे अधिक जुड़ गया, तो वह था वाका वाका (थिस टाइम फॉर अफ्रीका) (Waka Waka (This Time for Africa))। कोलंबियाई गायिका शकीरा (Shakira) और दक्षिण अफ्रीकी बैंड फ्रेशलीग्रॉउंड (Freshlyground) द्वारा प्रस्तुत यह गीत दक्षिण अफ्रीका में आयोजित विश्व कप का आधिकारिक गीत था। इसकी ऊर्जावान धुन, प्रेरणादायक बोल और अफ्रीकी संगीत की झलक ने इसे दुनिया भर में लोकप्रिय बना दिया।
इस गीत की रचना शकीरा और जॉन हिल (John Hill) ने मिलकर की थी। इसके बोल खिलाड़ियों को चुनौतियों का सामना करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। गीत में कैमरून के प्रसिद्ध मकौसा गीत “ज़ामीना मीना” की धुन का भी उपयोग किया गया, जिसने इसे एक विशिष्ट अफ्रीकी पहचान दी।
हालाँकि, शुरुआत में कुछ दक्षिण अफ्रीकी लोगों ने यह सवाल उठाया कि विश्व कप के आधिकारिक गीत के लिए किसी स्थानीय कलाकार को चुना जाना चाहिए था। इसके बावजूद “वाका वाका” ने जल्द ही पूरी दुनिया का दिल जीत लिया। यह अनेक देशों के संगीत चार्ट में पहले स्थान पर पहुँचा और वर्ष 2010 के सबसे लोकप्रिय गीतों में शामिल रहा।
समय के साथ यह गीत केवल एक विश्व कप गीत नहीं रहा, बल्कि फुटबॉल, उत्साह और वैश्विक एकता का प्रतीक बन गया। आज भी जब फीफा विश्व कप की बात होती है, तो “वाका वाका” की धुन लाखों प्रशंसकों के मन में गूंज उठती है।
उत्तर प्रदेश के सत्यदेव प्रसाद जैसे तीरंदाज खेलते हैं, हमारा प्राचीन व सांस्कृतिक खेल
रामपुर वासियों, आज हम तीरंदाजी खेल के इतिहास को समझेंगे, और जानेंगे कि, यह शिकार और युद्ध के रूप में कैसे शुरू हुई। फिर हम धनुर्वेद, प्राचीन भारतीय ग्रंथों और महाभारत जैसे महाकाव्यों में तीरंदाजी के उल्लेख का पता लगाएंगे। आगे, हम तीरंदाजी में उपयोग किए जाने वाले उपकरणों और इस खेल का अभ्यास कैसे किया जाता है, इस पर गौर करेंगे। फिर हम अंतरराष्ट्रीय तीरंदाजी में भारत के प्रदर्शन और उपलब्धियों की जांच करेंगे। लेख के अंत में, हम हमारे राज्य उत्तर प्रदेश के सत्यदेव प्रसाद जैसे तीरंदाजों और इस खेल में उनके योगदान के बारे में जानेंगे।
धनुष और बाण का इतिहास, मानवता के इतिहास से जुड़ा हुआ है। तीरंदाजी, शुरुआत में शिकार और बाद में युद्ध तकनीक के रूप में उभरी। तीरंदाजी का सबसे पहला साक्ष्य - चकमक पत्थर से बने तीर-कमान - लगभग 20,000 ईसा पूर्व का है। संभव है कि, प्रारंभिक मानव पहले भी धनुष और तीर का उपयोग करते थे। एशिया में, घोड़े पर सवार योद्धाओं के पास छोटे मिश्रित धनुष आम थे। जबकि, यू (Yew) पेड़ की लकड़ी से बने लंबे धनुष, मध्य युग में इंग्लैंड (England) सैन्य में आम थे।
बारूद के आविष्कार के साथ, युद्ध में तीरंदाजी अप्रचलित हो गई, और बाद में एक खेल के रूप में विकसित हुई। पहली ज्ञात तीरंदाजी प्रतियोगिता, 1583 में इंग्लैंड में आयोजित की गई थी, और इसमें 3000 प्रतिभागी थे। लेकिन, तीरंदाजी को पहली बार 1900 से 1908 और 1920 में आधुनिक ओलंपिक खेलों में प्रदर्शित किया गया। इस खेल को स्थायी पहचान दिलाने के लिए, 1931 में ‘विश्व तीरंदाजी’ की स्थापना की गई थी।
तीरंदाजी को अक्सर मिथकों और किंवदंतियों के साथ-साथ, आधुनिक साहित्य एवं फिल्मों में भी दिखाया जाता है। धनुष और तीर अक्सर नियंत्रण, सटीकता, आत्मनिर्भरता और धैर्य का प्रतीक होते हैं। सबसे प्रसिद्ध पौराणिक तीरंदाजों में से एक रॉबिन हुड (Robin Hood) है, जिसकी कहानी मध्य युग में इंग्लैंड में उत्पन्न हुई।
प्रागैतिहासिक काल से ही, धनुष, दुनिया भर में युद्ध और शिकार का एक प्रमुख हथियार था। प्राचीन मिस्र और यूनानियों के बीच सैन्य तथा मनोरंजक तीरंदाजी का अभ्यास किया जाता था। हूण (Hun), सेल्जूक तुर्क (Seljuq Turks), मंगोल (Mongol) और अन्य खानाबदोश घुड़सवार तीरंदाजों ने पहली शताब्दी ईसवी से लगभग 15 शताब्दियों तक एशिया के बड़े हिस्से पर प्रभुत्व बनाए रखा। अंग्रेजी धनुर्धरों ने सौ साल के युद्ध (1337-1453) में तीरंदाजी की मदद से ही सैन्य जीत हासिल की। जबकि महाद्वीपीय यूरोप (Europe) में क्रॉसबो (Crossbow) का व्यापक रूप से उपयोग किया जाने लगा था। हालांकि, आग्नेयास्त्रों के आगमन के साथ धनुष युद्धों से दूर हो गए।
तब, धनुष को एक शिकार हथियार के रूप में रखा गया था। एक तरफ, इंग्लैंड में जनता द्वारा एक खेल के रूप में, तीरंदाजी का अभ्यास जारी था। बाद में, वहां इस खेल को संरक्षण प्राप्त हुआ, तथा इससे संबंधित कई संगठन बने। तब इसके नियम भी बनाए गए। फिर, 1931 में पेरिस (Paris) में फेडरेशन ऑफ इंटरनेशनल टारगेट आर्चरी (Federation of International Target Archery) की स्थापना के साथ, अंतर्राष्ट्रीय नियमों को मानकीकृत किया गया था।
पहले अमेरिकी तीरंदाजी संगठन की स्थापना 1828 में हुई थी। 1870 के दशक में कई तीरंदाजी क्लब उभरे, और 1879 में उनमें से आठ क्लबों ने संयुक्त राज्य अमेरिका के ‘राष्ट्रीय तीरंदाजी संघ’ का गठन किया। 1939 में शिकार, नौकायन और मैदानी तीरंदाजी को बढ़ावा देने के लिए, अमेरिका में ‘राष्ट्रीय फील्ड तीरंदाजी संघ’ की स्थापना की गई थी। 1930 के बाद, अमेरिका में इस खेल की उल्लेखनीय वृद्धि के कारण, दुनिया भर में तीरंदाजों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।
इंग्लैंड और अमेरिका के साथ, हमारे देश भारत में भी तीरंदाजी का लंबा इतिहास रहा है। ‘धनुर्वेद’ अर्थात तीरंदाजी का विज्ञान, युद्ध और तीरंदाजी पर लिखा गया एक संस्कृत ग्रंथ है। इसे यजुर्वेद (1100 - 800 ईसा पूर्व) से जुड़ा एक उपवेद माना जाता है। शौनक द्वारा लिखित ‘चरणव्यूह’ में चार उपवेदों का उल्लेख है, जिनमें तीरंदाजी (धनुर्वेद) और सैन्य विज्ञान (शास्त्रशास्त्र) शामिल हैं। इनमें महारत हासिल करना एक योद्धा का कर्तव्य (धर्म) माना जाता था।
ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद भी, धनुष और तीर के उपयोग पर जोर देते हैं। प्राचीन साहित्य की अनेक कृतियां धनुर्वेद का उल्लेख करती हैं। विष्णु पुराण इसे ज्ञान की अठारह शाखाओं में से एक के रूप में संदर्भित करता है, और महाभारत में उल्लेख है कि, इसमें अन्य वेदों की तरह कुछ सूत्र हैं।
धनुर्वेद में तीरंदाजी की प्रथाओं, उपयोग, धनुष और बाण बनाने की कला, सैन्य प्रशिक्षण तथा युद्ध के नियमों का वर्णन मिलता है। यह ग्रंथ योद्धाओं, सारथियों, घुड़सवार सेना, हाथी योद्धाओं, पैदल सेना आदि के प्रशिक्षण के संबंध में युद्ध तकनीक की चर्चा करता है। धनुष की घुमावदार आकृति को अर्थवेद में वक्र कहा गया है। धनुष की प्रत्यंचा को ‘ज्या’ कहा जाता था, और इसे आवश्यकता पड़ने पर ही बांधा जाता था। जबकि, तीर को ‘इशु’ कहा जाता था, और तरकश को ‘इशुधि’ कहा जाता था।
द्वापर युग में भी युद्ध में तीरंदाजी आम थी। महाभारत काल में धनुर्विद्या को उसके पूर्ण वैभव के साथ प्रस्तुत किया गया। परशुराम, अग्निवेश और द्रोण जैसे प्रतिष्ठित शिक्षकों ने, तीरंदाजी को उच्चतम स्तर तक पहुंचाया, और अपने छात्रों को उत्कृष्ट तीरंदाज बनने के लिए प्रशिक्षित किया। महाभारत काल में तीरंदाजी प्रमुख युद्ध कौशलों में से एक थी। तब, तीर की नोकें लोहे से बनी होती थीं, और बाण सरकण्डे और बाँस से बने होते थे। अर्धचंद्र, नाराच, विपता और अन्य प्रकार के तीर उस समय उपयोग किए जाते थे।
हालांकि, आधुनिक तीरंदाजी उपकरण काफी अलग हैं। ‘विश्व तीरंदाजी नियम पुस्तिका’ में अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में उपयोग के लिए अनुमत उपकरणों का विवरण दिया गया है। तीरों के मुख्य प्रकारों में रिकर्व धनुष (Recurve bow), कंपाउंड धनुष (Compound bow), और बेयरबो (Barebow) शामिल हैं।
रिकर्व धनुष, पारंपरिक धनुषों का आधुनिक संस्करण है। यह ओलंपिक खेलों में उपयोग किए जाने वाले धनुष की शैली है। धनुष खींचे जाने पर, खिलाड़ी के अंगों में संग्रहीत ऊर्जा, तीर छोड़ने पर तीर में स्थानांतरित हो जाती है। इससे वह 200 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति से छूटता है। आधुनिक रिकर्व धनुष तकनीकी रूप से उन्नत सामग्रियों और विधियों का उपयोग करके बनाए जाते हैं, हालांकि कई निर्माता प्राकृतिक सामग्रियों को एकीकृत करते हैं। दूसरी तरफ, मिश्रित धनुष का आविष्कार 1960 के दशक में तीरंदाजी के यांत्रिक रूप से कुशल उपकरण के रूप में किया गया था। अधिकांश प्रमुख प्रतियोगिताओं में यह प्रयुक्त होता है। इसमें मौजूद पुली और केबल की एक प्रणाली से, धनुष को पूरी तरह से पकड़ना आसान होता है, और तीर में अधिक कुशलता से ऊर्जा स्थानांतरित होती है। जबकि, बेयरबो, धनुष की एक मूल शैली है, जो यांत्रिक रूप से रिकर्व के समान है। लेकिन, लक्ष्य या स्थिरीकरण में सहायता के लिए इसमें अन्य उपकरण का उपयोग नहीं होता है। ऐतिहासिक रूप से, इस धनुष का उपयोग मुख्य रूप से फ़ील्ड तीरंदाजी में किया गया है, लेकिन अब इसे लक्ष्य तीरंदाजी के लिए भी मान्यता प्राप्त है।
आधुनिक प्रतिस्पर्धा के तीर एल्यूमीनियम, कार्बन फाइबर या दोनों सामग्रियों के संयोजन से बने होते हैं। एक सेट में प्रत्येक तीर वजन और आकार में बारीकी से मेल खाता है। तीर का डंठल खोखला होता है। इसे बनाने के लिए उपयोग की जाने वाली सामग्री की मोटाई और ताकत, तीर की रीढ़ को परिभाषित करती है। धनुष जितना अधिक शक्तिशाली होगा, तीर की रीढ़ उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। तीर के अंत में लगे पर, सीधे, मुड़े हुए या पंख वाले हो सकते हैं, और वे उड़ान के दौरान तीर को स्थिर करते हैं।
क्या आप जानते हैं कि, 1989 में, राजस्थान के तीरंदाज लिम्बा राम ने बीजिंग (Beijing) में एशियाई तीरंदाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर, भारत को पहली बार अंतरराष्ट्रीय सफलता दिलाई थी। भारत ने 1988 के सियोल ओलंपिक (Seoul Olympics) में, तीरंदाजी में अपना ओलंपिक पदार्पण किया। इन शुरुआती मुकाबलों ने भारतीय तीरंदाजों को बहुमूल्य अनुभव प्रदान किया। अब, इक्कीसवीं सदी में वैश्विक मंच पर भारतीय तीरंदाजों के प्रदर्शन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। डोला बैनर्जी, जयंत तालुकदार और तरूणदीप राय जैसे तीरंदाज विश्व चैंपियनशिप और एशियाई खेलों में पदक जीतकर प्रमुख शख्सियत बनकर उभरे हैं। 2007 तीरंदाजी विश्व कप में, डोला बैनर्जी का स्वर्ण पदक भारतीय तीरंदाजी के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।
भारत की सबसे मशहूर तीरंदाजों में से एक दीपिका कुमारी ने लगातार उच्चतम स्तर पर प्रदर्शन किया है। उन्होंने कई विश्व कप पदक जीते हैं, और महिला रिकर्व तीरंदाजी में विश्व नंबर एक रैंकिंग हासिल की है। 2019 में, दीपिका कुमारी, लैशराम बोम्बायला देवी और लक्ष्मीरानी माझी सहित भारतीय महिला संघ ने विश्व तीरंदाजी चैंपियनशिप में रजत पदक जीता, जो इस आयोजन में भारत का पहला संघ पदक था। 2021 में, अभिषेक वर्मा ने पेरिस (Paris) में विश्व कप के दौरान, पुरुषों की कंपाउंड स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता, जिससे कंपाउंड तीरंदाजी में भारत की शक्ति का प्रदर्शन हुआ।
सत्यदेव प्रसाद
दूसरी ओर, सत्यदेव प्रसाद, एक अन्य भारतीय तीरंदाज है, और सिडनी (Sydney) ओलंपिक खेल 2000 में 10वां स्थान हासिल करने के लिए प्रसिद्ध हैं। ओलंपिक खेलों में किसी भी भारतीय तीरंदाज द्वारा यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। उनका जन्म 19 सितंबर 1979 को, हमारे राज्य उत्तर प्रदेश में हुआ था। उन्होंने कम उम्र में ही तीरंदाजी खेलना शुरू कर दिया था। प्रसिद्ध तीरंदाज लिंबा राम की सफलता से प्रेरित होकर, उन्होंने खेल में आगे बढ़ने के लिए कड़ी मेहनत की।
सत्यदेव, पहली बार साल 1997 में सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने जमशेदपुर में आयोजित राष्ट्रीय तीरंदाजी चैंपियनशिप में रजत पदक हासिल किया। उसी वर्ष, उन्होंने मलेशिया (Malaysia) में आयोजित एशियाई टीम चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। उन्होंने रोम (Rome) विश्व चैंपियनशिप 1999 में भी भाग लिया, जहां वे 59वें स्थान पर रहे। जबकि, बीजिंग विश्व चैंपियनशिप 2001 में उन्होंने संघ स्पर्धा में 12वां और व्यक्तिगत स्पर्धा में 31वां स्थान हासिल किया। न्यूयॉर्क (New York) विश्व चैंपियनशिप 2003 में, सत्यदेव प्रसाद ने भारतीय तीरंदाजी संघ को चौथा स्थान दिलाने में मदद की, जबकि व्यक्तिगत रूप से वह 12वें स्थान पर रहने में सफल रहे। उसी वर्ष, म्यांमार (Myanmar) में आयोजित एशियाई तीरंदाजी चैंपियनशिप में, सत्यदेव प्रसाद, तरूणदीप राय, विश्वास और माझी सवैयन के भारतीय संघ ने ओलंपिक राउंड संघ स्पर्धा में रजत पदक जीता।
मौखिक परंपराओं से पुस्तकालयों तक, और फिर प्रिंटिंग व एआई से कैसे हुआ है ज्ञान का प्रसार?
रामपुर, आज हम समझेंगे कि प्राचीन समाजों में ज्ञान, सबसे पहले मौखिक परंपराओं के माध्यम से कैसे प्रसारित किया जाता था। फिर हम पता लगाएंगे कि, इसे लेखन और पांडुलिपियों के माध्यम से कैसे दर्ज किया जाने लगा। आगे, हम देखेंगे कि कैसे पुस्तकालयों और विश्वविद्यालयों जैसे संस्थानों ने, ज्ञान को संरक्षित करने और फैलाने में मदद की। हम यह भी पढ़ेंगे कि, प्रिंटिंग प्रेस ने ज्ञान के प्रसार में कैसे क्रांति लाई। जबकि लेख के अंत में, हम जानेंगे कि इंटरनेट और एआई जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकियां, आज ज्ञान साझा करने के तरीके को कैसे बदल रही हैं।
मौखिक परंपरा, मानव संचार का पहला और आज भी सबसे व्यापक तरीका है। मौखिक परंपरा, सिर्फ बात करने के तरीके को ही नहीं, बल्कि ज्ञान, कला और विचारों को विकसित करने, संग्रहीत करने तथा प्रसारित करने हेतु, एक गतिशील व विविध मौखिक-श्रव्य माध्यम को भी संदर्भित करती है। इसकी तुलना आमतौर पर साक्षरता से की जाती है।
लेखन के आविष्कार से पहले सहस्राब्दियों तक, मौखिक परंपरा, समाज और उनके संस्थानों को बनाने और उन्हें बनाए रखने के लिए संचार के एकमात्र साधन के रूप में कार्य करती थी। इसके अलावा, पूरे विश्व में हुए कई अध्ययनों से पता चला है कि, साक्षरता की बढ़ती दर के बावजूद, मौखिक परंपरा, इक्कीसवीं सदी में संचार का प्रमुख माध्यम बनी हुई है।
कुछ तत्कालीन प्राचीन कवियों ने अभिव्यक्ति के व्यवस्थित रूप, सूत्रबद्ध वाक्यांशों, विशिष्ट दृश्यों और कहानी पैटर्न की एक विशेष मौखिक भाषा का इस्तेमाल किया था। यह उनकी स्मरणीय और कलात्मक गतिविधियों को सक्षम बनाती है। कई शुरुआती एवं प्राचीन कविताएं, तब लंबे समय से चली आ रही मौखिक परंपरा से ही निकली थी। मौखिक परंपरा में जड़ें रखने वाले अन्य परिचित कार्यों में, ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल (Bible), गिलगमेश के महाकाव्य (Epic of Gilgamesh) और मध्ययुगीन अंग्रेजी कथा बियोवुल्फ़ (Beowulf), आदि शामिल हैं। इन कार्यों के कुछ घटक यह भी बताते हैं कि, कैसे लचीली मौखिक-पारंपरिक प्रणालियां कई पीढ़ियों में अलग-अलग लेकिन संबंधित विचारों का उत्पादन कर सकती हैं।
बियोवुल्फ़
तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक, लेखन का उपयोग विशेष रूप से लेखांकन के लिए किया जाता था। फिर धीरे-धीरे विभिन्न प्रतीकों से ध्वन्यात्मक शब्दांश संकेतों का आविष्कार हुआ, जिससे लिपि और वर्णमालाओं का जन्म हुआ। सूचना एकत्र करने, उसमें हेरफेर करने, उसका भंडारण व संचार करने, तथा उसे पुनर्प्राप्त और प्रसारित करने के लिए, लेखन मानव जाति की प्रमुख तकनीक है। माना जाता है कि, लेखन का आविष्कार, दुनिया के विभिन्न हिस्सों में स्वतंत्र रूप से, तीन बार हुआ होगा। ये स्थल निकट पूर्व, चीन और मेसोअमेरिका (Mesoamerica) में होंगे। विभिन्न शिलालेख, उत्कीर्णित ग्रंथ एवं प्रतीक, लेखन के विकास का सुझाव देते हैं। माना जाता है कि, यह काल 600 से 1200 ईसा पूर्व का रहा होगा।
इन तीन लेखन प्रणालियों में से सबसे प्रारंभिक - मेसोपोटामिया (Mesopotamia) की क्यूनिफॉर्म लिपि (Cuneiform script) है, जिसका आविष्कार वर्तमान इराक में हुआ था। केवल इसी लिपि के विकास को 3200 ईसा पूर्व प्रागैतिहासिक पूर्वकाल से लेकर आज की वर्णमाला तक, 10,000 वर्षों की अवधि में बिना किसी विच्छेद के देखा जा सकता है। इसके विकास को चार चरणों में विभाजित किया गया है:
1. विक्रय के माल की इकाइयों का प्रतिनिधित्व करने वाले मिट्टी के टोकन (Token) का लेखांकन के रूप में उपयोग;
2. त्रि-आयामी टोकन का दो-आयामी चित्रात्मक संकेतों में बदलाव;
3. व्यक्तियों के नाम लिखने के लिए पेश किए गए ध्वन्यात्मक संकेत; और
4. फिर कुछ दो दर्जन अक्षरों के साथ, प्रत्येक आवाज की एक ही ध्वनि के लिए बनी वर्णमाला ने, भाषण की प्रस्तुति को परिपूर्ण किया।
इन घटनाओं के विकास के साथ ही, विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों और संग्रहालयों ने लंबे समय से मानव संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्राचीन काल में, पुस्तकालय वे स्थान थे, जहां ज्ञान को एकत्र और संरक्षित किया जाता था। जबकि आज, ज्ञान संस्थान, पुस्तकालय और संग्रहालय इसके महत्वपूर्ण केंद्र बन रहे हैं। लेकिन, डिजिटल युग के विकास के साथ सूचना भंडारण में लगातार बदलाव भी आ रहा है।
ज्ञान के भंडार के रूप में पुस्तकालयों की शुरुआत, एक सहस्राब्दी पहले विद्वानों, दार्शनिकों और अभिलेखीय दस्तावेजों से लिखित जानकारी के भंडारण के साथ हुई थी। प्रारंभिक पुस्तकालय केवल पुस्तकों, स्क्रॉल (Scroll) और अन्य दस्तावेजों का संग्रह थे। इन्हें अद्वितीय इमारतों में रखा गया था। पहला प्रलेखित पुस्तकालय, सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व में स्थापित किया गया था। इसे प्राचीन मध्य पूर्व में, वर्तमान इराक में स्थापित किया गया था। इस संग्रह में, कुछ विषयों के आधार पर वर्गीकृत लगभग 30,000 क्यूनिफॉर्म पट्टियां शामिल थीं। अधिकांश कार्य, विद्वतापूर्ण ग्रंथ और साहित्य के कार्य थे, जिनमें गिलगमेश का प्राचीन महाकाव्य भी शामिल था।
इस बिंदु से आगे बढ़ते हुए, लगभग सभी महान सभ्यताओं ने साझा ज्ञान और ज्ञान के भंडारण का मूल्य सीखा, और उसे संग्रहीत करने के लिए पुस्तकालयों का निर्माण किया। ‘पुनर्जागरण काल’ के दौरान पुस्तकों की संख्या में नाटकीय वृद्धि हुई, और यूरोपीय देशों में पुस्तकालय स्थापित किए गए। यूरोप में सबसे पहले ज्ञात सार्वजनिक पुस्तकालय वेनिस (Venice) और मैड्रिड (Madrid) में थे।
अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान, बढ़ती संख्या वाली पुस्तकों को रखने के लिए कई पुस्तकालय बनाए गए। ज्ञान के ये संस्थान, भावी पीढ़ियों के लिए शिक्षण और नया ज्ञान साझा करने के बारे में हैं।
इसके पश्चात, पांच शताब्दियों से भी पहले, जोहान्स गुटेनबर्ग (Johannes Gutenberg) के प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार ने समाज के सीखने, सोचने और विचारों को साझा करने के तरीके को बदल दिया। ज्ञान पर अब एक छोटे से अभिजात वर्ग का नियंत्रण नहीं रहा। प्रिंटिंग के आविष्कार से किताबें सस्ती हो गईं; मठों और शाही दरबारों से जानकारी आगे बढ़ गई; और साक्षरता का विस्तार हुआ। इससे शिक्षा का प्रसार हुआ, और आम लोगों को जीवन बदलने में सक्षम विचारों तक पहुंच प्राप्त हुई। प्रिंटिंग प्रेस ने सामाजिक प्रगति, वैज्ञानिक जांच और लोकतांत्रिक सोच की नींव रखने में भी मदद की। हालांकि, उन्हीं प्रिंटिंग प्रेस का उपयोग प्रचार, झूठे सिद्धांत, भड़काऊ पर्चे और नफरत फैलाने के लिए भी किया जाता था।
जबकि वर्तमान समय में, डिजिटल प्रौद्योगिकियों की तीव्र प्रगति ने व्यक्तियों, कंपनियों और समाजों को महत्वपूर्ण रूप से बदल दिया है। डिजिटल युग में, इस तरह की प्रगति ने मोबाइल डिवाइस, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और क्लाउड कंप्यूटिंग (Cloud computing) जैसी सस्ती, तेज़ और अधिक सुलभ डिजिटल तकनीकों को जन्म दिया है। डिजिटल प्रौद्योगिकियां आज हमारे दैनिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन गई हैं, जो नवीनतम ज्ञान के कई अवसर प्रदान करती हैं। जबकि डिजिटल प्रौद्योगिकियां हमें अधिक जानकारी तक पहुंचने में सक्षम बनाती हैं, वे गलत सूचना फैलने की मात्रा और गति को भी बढ़ाती हैं। इसलिए, इन प्रौद्योगिकियों के प्रभाव को समझना तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
हाल के वर्षों में सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के उपयोग में तेजी से वृद्धि हुई है, जिससे हमारी वैचारिक दुनिया मौलिक रूप से बदल गई है। इन प्लेटफार्मों पर हमारी निर्भरता ने, उन्हें हमारे दैनिक जीवन में जानकारी का अनिवार्य स्रोत बना दिया है। इन ऑनलाइन प्लेटफार्मों के साथ, लोगों के पास अब जानकारी प्राप्त करने, गलत सूचना के हस्तांतरण या प्रसार को तेज करने के लिए कई विकल्प हैं।
आज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) या एआई, इंटरनेट की जगह ले रहा है। एआई, पिछली सूचना प्रौद्योगिकियों से मौलिक विचलन का प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि यह जानकारी को संग्रहीत और पुनर्प्राप्त ही नहीं, बल्कि इसे संसाधित और परिवर्तित भी करता है।
पुस्तकों या डेटाबेस जैसे पारंपरिक ज्ञान भंडार में निश्चित जानकारी होती है। जबकि एआई सिस्टम, सक्रिय रूप से जानकारी के साथ जुड़ते हैं, तथा वास्तविक समय में नई अंतर्दृष्टि और समाधान उत्पन्न करते हैं। पिछली प्रौद्योगिकियों ने हमें यह बताया है कि, क्या सोचना है; जबकि एआई हमें बताता है कि, इसके बारे में कैसे सोचना है। पारंपरिक ज्ञान के साथ, मनुष्य को अर्थ और प्रासंगिकता की व्याख्या करनी होती है। लेकिन, एआई सिस्टम संदर्भ को समझ सकते हैं, पैटर्न को पहचान सकते हैं, और किसी स्थिति में क्या मायने रखता है, इसके बारे में निर्णय ले सकते हैं। दूसरी ओर, पुस्तकें और शैक्षिक पाठ्यक्रम सामान्य दर्शकों के ज्ञान प्राप्ति के लिएं डिज़ाइन किए गए हैं। जबकि, एआई अपनी बुद्धिमत्ता को विशिष्ट समस्याओं, संदर्भों और व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप बना सकता है।
गूगल से दशकों पहले, विश्व ज्ञान कोष 'मंडेनियम' में कागज़ों पर बना, पहला भौतिक सर्च इंजन
रामपुर के जागरूक पाठकों के लिए इतिहास के पन्नों से एक ऐसी खोज की कहानी प्रस्तुत है जिसने आज के डिजिटल युग की नींव दशकों पहले ही रख दी थी। आज हम जिस इंटरनेट और कंप्यूटर पर पूरी तरह निर्भर हैं, उसकी कल्पना इन तकनीकों के आविष्कार से बहुत पहले ही कर ली गई थी। पहले माइक्रोचिप के बनने से पच्चीस साल पहले, पहले पर्सनल कंप्यूटर से चालीस साल पहले और पहले वेब ब्राउज़र के आने से पचास साल पहले ही एक व्यक्ति ने आज के इंटरनेट जैसी संरचना का खाका तैयार कर लिया था। यह कहानी एक ऐसे दूरदर्शी की है जिसने बिना कंप्यूटर और बिना किसी डिजिटल सर्वर के, महज़ कागज़ों और अनुक्रमणिका कार्डों के ज़रिए पूरी दुनिया के ज्ञान को एक सूत्र में पिरोने का महात्वाकांक्षी सपना देखा था।
पॉल ओटले कौन थे और उन्होंने दुनिया का ज्ञान एक जगह कैसे इकट्ठा करना चाहा? पॉल ओटले एक बेल्जियन आदर्शवादी, अन्वेषक और सूचना वैज्ञानिक थे जिनका जन्म तेईस अगस्त अठारह सौ अड़सठ को हुआ था। उनका मुख्य लक्ष्य दुनिया भर की सूचनाओं को व्यवस्थित करना और हर महत्वपूर्ण प्रकाशित विचार को सूचीबद्ध करना था। अठारह सौ पचानवे में उन्होंने वकील और अंतर्राष्ट्रीयतावादी हेनरी ला फोंटेन के साथ मिलकर इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बिब्लियोग्राफी की स्थापना की। इस संस्थान का उद्देश्य संपूर्ण मानव ज्ञान और दस्तावेज़ों पर एक व्यवस्थित नियंत्रण स्थापित करना था। ज्ञान को वर्गीकृत करने के लिए ओटले और ला फोंटेन ने उन्नीस सौ चार में 'यूनिवर्सल डेसिमल क्लासिफिकेशन' नामक एक क्रांतिकारी प्रणाली प्रकाशित की। इस प्रणाली में दुनिया भर के ज्ञान को नौ मुख्य श्रेणियों में बांटा गया था और इसके सत्तर हज़ार से अधिक विस्तृत उपखंड बनाए गए थे। ओटले का सपना केवल ज्ञान को व्यवस्थित करने तक सीमित नहीं था, बल्कि वह एक ऐसा नया विश्व शहर बनाना चाहते थे जो दुनिया भर के देशों के बीच शांति और बौद्धिक विकास का केंद्र बन सके। उनकी इस महात्वाकांक्षी योजना का एक हिस्सा लीग ऑफ नेशंस के निर्माण से भी जुड़ा हुआ था।
सूचनाओं को एक जगह इकट्ठा करना ज्ञान और फ़ैसलों के लिए क्यों ज़रूरी है? मानव इतिहास में जब से लेखन की शुरुआत हुई है, तभी से ज्ञान को व्यवस्थित करने की कोशिशें भी होती रही हैं। प्राचीन काल में इसका सबसे बड़ा उदाहरण मिस्र के अलेक्जेंड्रिया शहर का पुस्तकालय था जहाँ करीब सात लाख पेपिरस के स्क्रॉल रखे गए थे, जो आज के समय की एक लाख किताबों के बराबर माने जाते हैं। आज के समय में सूचनाओं का विस्फोट इतना भयानक हो चुका है कि केवल साल दो हज़ार ग्यारह में ही मानवता ने करीब दो ट्रिलियन गीगाबाइट का विशाल डेटा उत्पन्न किया था। यह अथाह डेटा हर दो साल में दोगुना हो रहा है। इस भारी और अव्यवस्थित डेटा के कारण आज के व्यवसायियों, लेखकों और शोधकर्ताओं को अपने काम की सही जानकारी निकालने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ओटले ने इस समस्या को बहुत पहले ही भांप लिया था। उनका मानना था कि किसी भी दस्तावेज़ या सूचना को अकेले नहीं समझा जा सकता, बल्कि उसका अर्थ अन्य दस्तावेज़ों के साथ उसके संबंधों से स्पष्ट होता है। उनका लक्ष्य ज्ञान को एक ऐसी सुगठित प्रणाली में पिरोना था जहाँ तथ्यों की पुष्टि की जा सके और भ्रामक जानकारियों के जाल से बचा जा सके।
दुनिया भर की किताबों की सूची
ओटले ने ब्रुसेल्स में एक वैश्विक लाइब्रेरी की योजना कैसे बनाई और ज्ञान तक सार्वभौमिक पहुँच के लिए उनका नज़रिया क्या था? उन्नीस सौ दस में ओटले और ला फोंटेन ने ज्ञान का एक विशाल केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव रखा जिसे मुंडेनम नाम दिया गया। इस मुंडेनम को शुरुआत में बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स के पले डु सिनक्वांटेनेयर नामक सरकारी इमारत में रखा गया था। ओटले ने एक विशाल प्रणाली विकसित की जिसमें एक करोड़ पचास लाख से अधिक इंडेक्स कार्ड और दस्तावेज़ों का संग्रह शामिल था। ये इंडेक्स कार्ड अमेरिकी लाइब्रेरियन मेल्विल डेवी द्वारा मानकीकृत तीन गुणा पाँच इंच के आकार के थे। मुंडेनम में लोगों के लिए एक डाक सेवा भी शुरू की गई थी जहाँ लोग एक निश्चित शुल्क देकर अपने सवालों के जवाब मंगवा सकते थे। उन्नीस सौ बारह तक ओटले की टीम हर साल ऐसे पंद्रह सौ से अधिक सवालों के जवाब दे रही थी। इसके बाद उन्नीस सौ चौंतीस में ओटले ने 'इलेक्ट्रिक टेलीस्कोप' नामक नेटवर्क की कल्पना की। इस प्रणाली के तहत एक उपयोगकर्ता टेलीफोन के ज़रिए अपना सवाल भेज सकता था और उसका जवाब एक निजी स्क्रीन पर दिखाई देता था। उन्होंने कल्पना की थी कि लोग दूर बैठकर भी एक-दूसरे से जुड़ सकेंगे, जानकारी साझा कर सकेंगे और सामाजिक नेटवर्क बना सकेंगे।
इस महान परियोजना का पतन कैसे हुआ और द्वितीय विश्व युद्ध का मुंडेनम पर क्या असर पड़ा? ओटले की यह महान परियोजना समय के साथ कई राजनीतिक और आर्थिक मुश्किलों में घिर गई। उन्नीस सौ चौबीस तक बेल्जियम सरकार का इस परियोजना से मोहभंग होने लगा था क्योंकि लीग ऑफ नेशंस ने अपना नया मुख्यालय ब्रुसेल्स की बजाय जिनेवा में बना लिया था। इसके कारण मुंडेनम को कई छोटी और अजीबोगरीब जगहों पर स्थानांतरित होना पड़ा, यहाँ तक कि एक समय इसे पार्किंग गैराज में भी रखा गया था। उन्नीस सौ उनतीस में वास्तुकार ली कोर्बुसीयर को जिनेवा में एक नया मुंडेनम डिज़ाइन करने का काम सौंपा गया, लेकिन यह परियोजना कभी ज़मीन पर नहीं उतर सकी। लगातार वित्तीय संकट के कारण उन्नीस सौ चौंतीस में ओटले को मुंडेनम के संचालन को बंद करना पड़ा। जब उन्नीस सौ चालीस में नाज़ी जर्मनी ने बेल्जियम पर कब्ज़ा किया, तो हालात और बदतर हो गए। नाज़ी सैनिकों ने मुंडेनम को महज़ कबाड़ का ढेर समझा और तिरेसठ टन से अधिक अनमोल दस्तावेज़ों को नष्ट कर दिया ताकि वहाँ थर्ड रीच की कला प्रदर्शनी लगाई जा सके। ओटले ने अमेरिकी राष्ट्रपति रूज़वेल्ट को टेलीग्राम भेजकर इस ज्ञान के खज़ाने को अमेरिका ले जाने की गुहार भी लगाई थी, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। ओटले का उन्नीस सौ चवालीस में निधन हो गया।
टिम बर्नर्स-ली
टिम बर्नर्स-ली ने वर्ल्ड वाइड वेब कैसे बनाया और वे ओटले के विचारों से कैसे जुड़े हैं? आज हम जो वर्ल्ड वाइड वेब इस्तेमाल करते हैं, उसका आविष्कार टिम बर्नर्स-ली और उनके साथी रॉबर्ट कैलिआउ ने किया था। लेकिन ओटले के विचार इंटरनेट के इस आधुनिक स्वरूप से काफी पहले सामने आ चुके थे। ओटले ने वेब के जिस स्वरूप की कल्पना की थी, वह आज के इंटरनेट से थोड़ा अलग और ज़्यादा व्यवस्थित था। उन्होंने एक अत्यधिक नियंत्रित प्रणाली की परिकल्पना की थी जहाँ तथ्यों को विशेषज्ञों द्वारा वर्गीकृत किया जाता था। इसके विपरीत आज का इंटरनेट अनियंत्रित है जहाँ करोड़ों वेबसाइट्स और अरबों यूज़र्स का डेटा बिना किसी कठोर पदानुक्रम के मौजूद है। टिम बर्नर्स-ली ने साल दो हज़ार एक में 'सिमेंटिक वेब' का प्रस्ताव रखा था, जिसका उद्देश्य वेब पेजों में ऐसा डेटा जोड़ना था जिसे कंप्यूटर आसानी से पढ़ और समझ सकें। ओटले ने दशकों पहले ऐसे ही 'लिंक्स' की कल्पना की थी जो केवल दस्तावेज़ों को जोड़ते नहीं थे, बल्कि उनके बीच के गहरे अर्थ और वैचारिक संबंधों को भी स्पष्ट करते थे। आज ओटले का मुंडेनम मॉन्स शहर के एक संग्रहालय में तब्दील हो चुका है, जहाँ उनके पुराने इंडेक्स कार्ड आज भी लकड़ी की अलमारियों में सहेज कर रखे गए हैं जो हमें इस भूली-बिसरी विरासत की याद दिलाते हैं।
कैसे बौद्ध जातक कथाओं में प्राचीन 'इन्दपत्त' यानी आज की दिल्ली थी उच्च नैतिकता का केंद्र
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई महापुरुष केवल करुणा के वशीभूत होकर अपने प्राणों की आहुति दे दे और एक भूखी बाघिन के सामने खुद को भोजन के रूप में पेश कर दे ताकि वह बाघिन अपने ही नवजात शावकों को न खा जाए । यह कोई कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि बौद्ध धर्म की सबसे पुरानी और प्रसिद्ध जातक कथाओं में से एक 'द स्टार्विंग टाइग्रेस' का हिस्सा है । जातक कथाओं में भगवान बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति से पहले के पूर्व जन्मों की 547 कहानियों का ज़िक्र मिलता है, जिनमें उन्होंने इंसान से लेकर जानवरों तक का रूप धारण किया था । इन प्राचीन कथाओं में आज के दिल्ली यानी इन्द्रप्रस्थ का भी गहरा इतिहास छिपा है, जिसे बौद्ध साहित्यों में 'इन्दपत्त' के नाम से जाना जाता था। यह नगर अपनी शहरी भव्यता, न्यायपूर्ण शासन और नैतिकता के लिए इतना प्रसिद्ध था कि बोधिसत्व ने यहाँ कई बार जन्म लिया। आइए, इन कथाओं के ज़रिए समझते हैं कि प्राचीन भारत में इन्दपत्त की क्या अहमियत थी और क्यों ये जातक कथाएँ आज भी हमारे जीवन को सही दिशा दिखा सकती हैं।
जातक कथाएँ क्या हैं और इनमें बुद्ध के पूर्व जन्मों का क्या रहस्य छिपा है? जातक शब्द का अर्थ “जन्म” से है, और ये कथाएँ भगवान बुद्ध के उस अंतिम जन्म से पहले के जीवन की कहानियाँ हैं जब वे सिद्धार्थ गौतम थे । बौद्ध धर्म की सभी शाखाएँ इन कथाओं को प्रामाणिक मानती हैं । यह माना जाता है कि ज्ञान प्राप्ति से ठीक पहले बुद्ध ने अपने सभी पूर्व जन्मों को स्पष्ट रूप से देखा था । थेरवाद ग्रंथों में खुद्दक निकाय के सुत्त पिटक में ऐसी 547 कहानियों का एक बड़ा संग्रह पद्य रूप में मौजूद है । इन कहानियों का मुख्य उद्देश्य कर्म के सिद्धांत को समझाना है । जातक कथाएँ यह दर्शाती हैं कि इंसान के अच्छे या बुरे कर्म ही उसके भविष्य के अनुभवों और आध्यात्मिक प्रगति को तय करते हैं । हर कहानी में यह साबित किया गया है कि वर्तमान जीवन में मिलने वाले दुख या सुख के तार हमारे पिछले जन्मों की घटनाओं से जुड़े होते हैं । चीन के डुनहुआंग में मोगाओ गुफाओं में 'सूत्र ऑफ़ द वाइज़ एंड द फ़ूलिश' नामक एक लोकप्रिय ग्रंथ मिला है जो जातक कथाओं का ही चीनी अनुवाद है । माना जाता है कि मध्य एशिया के खोतानी भिक्षुओं के प्रवचनों को सुनकर चीनी भिक्षुओं ने इसे लिखा था, जिसे बाद में तिब्बती और मंगोलियाई भाषा में 'ओशन ऑफ़ नैरेटिव्स' के नाम से अनुवादित किया गया।
बौद्ध साहित्य में इन्द्रप्रस्थ को इन्दपत्त के रूप में कैसे दर्शाया गया है? प्राचीन भारत, जिसे बौद्ध ब्रह्मांड विज्ञान में जम्बुदीप कहा जाता था, के तीन प्रमुख शहरों में से एक इन्दपत्त यानी इन्द्रप्रस्थ था। यह शहर सात योजन तक फैला हुआ था और यह तीन सौ योजन में फैले विशाल कुरु साम्राज्य की राजधानी था। बुद्ध के समय में कुरु 16 महाजनपदों में से एक था जो मज्झिमदेस में स्थित था। इन्दपत्त एक पहाड़ पर बना एक बेहद ऊँचा और सुरक्षित किला था। यह नगर बहुत ही समृद्ध और उपजाऊ था, जहाँ सोना, हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना भारी मात्रा में मौजूद थे। यहाँ से एक सीधी सड़क वाराणसी तक जाती थी। यहाँ के राजा युधिट्ठिल गोत के धनंजय कोरव्य थे। कुरु साम्राज्य अपनी शहरी जीवनशैली, न्यायपूर्ण शासन प्रणाली और उच्च नैतिकता के लिए इतना जाना जाता था कि यही वजह थी कि बोधिसत्व ने यहाँ कई जन्म लिए। यहाँ तक कि स्वयं भगवान बुद्ध ने अपने कई सबसे गहरे और महत्वपूर्ण उपदेश कुरु साम्राज्य के निगम यानी व्यापारिक मार्गों के मुख्य बाज़ार में दिए थे।
विधुर पण्डित जातक में इन्दपत्त नगर और राजा धनंजय का क्या उल्लेख मिलता है? जातक संख्या 545 जिसे विधुर पण्डित जातक के नाम से जाना जाता है, उसमें कुरु साम्राज्य, इन्दपत्त नगर और वहाँ के राजा व उनके योग्य मंत्री का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है। इस ग्रंथ में लिखा गया है:
कुरु-रट्ठे इन्दपत्त-नगरे धनञ्जयो नामा राजा रज्जं कारेसि ।
इस पंक्ति का अर्थ यह है कि कुरु साम्राज्य में, इन्दपत्त शहर में, धनंजय नाम के एक राजा शासन करते थे।
इसी ग्रंथ में आगे इन्दपत्त नगर की सुंदरता और एक कुशल मंत्री के बारे में बताया गया है:
इन्दपत्ते पुरे रम्मे, कुरु-राजस्स राजिनो
विधुरू'ति अयं अमच्चो, सब्ब-किच्चेसु कोविदो ।
इसका अर्थ है कि कुरु राजा के इस रमणीय और आनंददायक शहर इन्दपत्त में, विधुर नाम का यह मंत्री रहता है, जो सभी तरह के मामलों और कार्यों में पूरी तरह से कुशल और निपुण है।
विधुर पण्डित जातक
कुरुधम्म जातक में बारिश लाने वाले हाथी और सदाचार की क्या अद्भुत कहानी है? जातक संख्या 276 जिसे कुरुधम्म जातक कहा जाता है, में बोधिसत्व का जन्म इन्दपत्त में कुरु राजा धनंजय के पुत्र के रूप में होता है। उस समय राज्य में हर व्यक्ति पाँच नैतिक सिद्धांतों का इतनी पूर्णता के साथ पालन करता था कि वह भूमि हमेशा समृद्ध रहती थी। इस कथा में अञ्जनवसभ नाम के एक राजकीय हाथी का ज़िक्र है जिसके बारे में माना जाता था कि उसमें बारिश लाने की जादुई शक्ति है। एक बार कलिंग साम्राज्य में भयंकर सूखा पड़ा, तो वहाँ के राजा ने इन्दपत्त में अपने दूत भेजे ताकि वे अञ्जनवसभ हाथी को उधार माँग सकें, इस उम्मीद में कि वह उनके राज्य में बारिश लाएगा। जब हाथी के जाने के बाद भी कलिंग में बारिश नहीं हुई, तो कलिंग के राजा को यह अहसास हुआ कि प्राकृतिक तत्वों को अनुकूल बनाने की शक्ति किसी हाथी में नहीं, बल्कि कुरुधम्म यानी उन नैतिक आचरणों के पालन में है जो इन्दपत्त के लोग करते थे।
इस कथा में एक बेहद महत्वपूर्ण श्लोक आता है:
पुनापरं यदा होमि, इन्दपत्ते पुरे उत्तमे;
राजा धनञ्जयो नाम, कुसले दसेहि उपागतो ।
इसका अर्थ है कि और फिर, जब मैं इन्दपत्त के शानदार शहर में धनंजय नाम का राजा था, तो मैं दस कुशल और शुभ कर्मों के मार्ग से संपन्न था।
कुरुधम्म जातक
जातक कथाओं में करुणा और आत्म-बलिदान के कौन से बेमिसाल उदाहरण मिलते हैं? जातक कथाओं में बोधिसत्व को इंसान और जानवर दोनों रूपों में करुणा और दया का सागर दिखाया गया है । डुनहुआंग की गुफाओं की दीवारों पर सिबि राजा की कथा चित्रित है, जिसमें एक बाज़ एक कबूतर का शिकार करना चाहता है । जब कबूतर राजा की शरण में आता है, तो बाज़ राजा से कबूतर के वज़न के बराबर उनका माँस माँगता है । राजा खुशी-खुशी अपने शरीर का माँस काटकर दे देते हैं ।
इसी तरह 'नौ रंगों वाले हिरण' की कथा है । एक दुर्लभ हिरण ने एक डूबते हुए गरीब आदमी की जान बचाई । लेकिन उस आदमी ने इनाम के लालच में राजा के शिकारियों को हिरण का पता बता दिया । जब हिरण ने इंसानी आवाज़ में राजा को उस आदमी के विश्वासघात की कहानी बताई, तो राजा ने उस आदमी को फटकार लगाई और हिरण को हमेशा के लिए आज़ाद कर दिया ।
एक अन्य कथा में बोधिसत्व एक बंदरों के राजा थे । जब उनके दल पर ख़तरा आया, तो उन्होंने एक बाँस की छड़ी को अपने पैरों से बाँधकर एक पेड़ से दूसरे पहाड़ तक अपने शरीर का पुल बना लिया, ताकि सभी बंदर उनके शरीर के ऊपर से गुज़र कर सुरक्षित स्थान पर पहुँच सकें । इस प्रयास में उनका शरीर सुन्न हो गया, लेकिन अपनी प्रजा की जान बचाना ही उनका इकलौता लक्ष्य था । 'सुपारग' नामक एक कुशल समुद्री कप्तान की कथा में बोधिसत्व एक भयंकर तूफ़ान में फँसे व्यापारियों की नाव को केवल अपने सत्य और सदाचार की शक्ति से बचा लेते हैं और देवताओं से प्रार्थना करके उन्हें सुरक्षित किनारे लगा देते हैं।
सुतोसोमा जातक
आज के समय में बच्चों और बड़ों दोनों के लिए ये कथाएँ क्यों प्रासंगिक हैं? जातक कथाएँ महज़ प्राचीन साहित्य नहीं हैं; इनमें चार आर्य सत्य, बोधिसत्व की प्रतिज्ञाएँ, अष्टांगिक मार्ग और छह पारमिताओं का पूरा सार छिपा है । इन कहानियों की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि ये बुद्ध को एक साधारण इंसान और प्राणी के स्तर पर लाकर खड़ा करती हैं । कहानियों की शुरुआत में अक्सर कहा जाता है, "जब मैं केवल एक अज्ञानी बोधिसत्व था" । यह बात हम जैसे साधारण इंसानों को यह उम्मीद देती है कि कोई भी व्यक्ति ज्ञान और मोक्ष प्राप्त कर सकता है ।
इन कथाओं में बोधिसत्व ने राजा, किसान, निचले और उच्च वर्ग के व्यक्ति, महिला, व्यापारी और जानवरों का जीवन जिया है, जो हमें सिखाता है कि हमें बिना किसी भेदभाव के सभी जीवों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि हर प्राणी में बुद्धत्व प्राप्त करने की क्षमता होती है । एक खजांची की कथा में दिखाया गया है कि कैसे एक सास के कम सुनने की वजह से फैली ग़लतफ़हमी के कारण लोग उसे इतना गुणी मान लेते हैं कि वह लोगों के इस सम्मान को बनाए रखने के लिए सच में अपना घर छोड़कर संन्यासी बन जाता है । ये कथाएँ हमें सिखाती हैं कि हमारा हर छोटा-बड़ा कर्म हमारे भविष्य को आकार देता है । करुणा, दया और निस्वार्थ सेवा जैसे गुण केवल धर्म की बातें नहीं हैं, बल्कि एक सफल और शांत जीवन जीने के सबसे मज़बूत आधार हैं ।
तितलियों और फूलों का सुंदर रिश्ता और परागण में उनकी अहम भूमिका
तितलियाँ केवल अपनी सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि प्रकृति में परागण करने के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। वे चमकीले रंगों और मीठी खुशबू वाले फूलों की ओर आकर्षित होती हैं। फूलों पर बैठकर तितलियाँ अपनी लंबी सूंड की मदद से रस पीती हैं और इसी दौरान उनके शरीर पर परागकण चिपक जाते हैं। जब वे एक फूल से दूसरे फूल तक जाती हैं, तो ये परागकण भी साथ पहुँचते हैं, जिससे परागण की प्रक्रिया पूरी होती है।
मधुमक्खियों की तुलना में तितलियाँ फूलों के बाहरी हिस्सों पर भी बैठती हैं, इसलिए वे उन भागों तक भी पराग पहुँचा देती हैं जहाँ मधुमक्खियाँ अक्सर नहीं पहुँच पातीं। इस कारण तितलियाँ कई पौधों और फूलों के लिए महत्वपूर्ण परागणकर्ता मानी जाती हैं।
विशेष रूप से मोनार्क जैसी तितलियाँ मिल्कवीड जैसे पौधों के साथ गहरा संबंध रखती हैं। फूलों से रस लेते समय वे अनजाने में पौधों के पराग को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाकर प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में मदद करती हैं।
इस तरह तितलियाँ केवल बगीचों की शोभा नहीं बढ़ातीं, बल्कि पौधों के जीवन चक्र और जैव विविधता को बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती हैं।
रामपुर, जरूर पढ़ें, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में भंडारण और एमएसपी की क्या है भूमिका?
आज के लेख में, हम समझेंगे कि कृषि में भंडारण क्यों महत्वपूर्ण है, और यह फसल के नुकसान को कैसे रोकता है। फिर, हम देखेंगे कि आपूर्ति और कीमतों को स्थिर करने में उचित भंडारण कैसे मदद करता है। उसके बाद, हम पढ़ेंगे कि सरकार एमएसपी क्यों तय करती है, और किसानों से फसल क्यों खरीदती है। और लेख के अंत में, हम खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में भंडारण और खरीद प्रणालियों के फायदों और चुनौतियों की जांच करेंगे।
अच्छे भंडारण समाधान किसानों के लिए बहुत आवश्यक हैं। हर साल, किसानों द्वारा कड़ी मेहनत से उगाई गई कई फसलें बर्बाद हो जाती हैं, क्योंकि उनका भंडारण अच्छे से नहीं किया जाता है। अच्छे भंडारण के बिना, फ़सलें फफूंद, कीटों या खराब मौसम के कारण बर्बाद हो सकती हैं। उचित भंडारण, इस बर्बादी को रोकने में मदद कर सकता है। उदाहरण के लिए जलवायु-नियंत्रित साइलो (Silo) और प्लास्टिक अनाज कोष्ठ से, किसान अपनी फसलों की रक्षा कर सकते हैं। इन उन्नत भंडारण विकल्पों के उपयोग से, किसान अपनी फसलों को खोने की चिंता को कम कर सकते हैं। इससे यह भी सुनिश्चित होता है कि, सभी के लिए अधिक भोजन उपलब्ध हो।
जब बाजार में एक साथ बहुत सारी फसलें आती हैं, तो किसानों को अक्सर एक अन्य बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता है। इस अधिक आपूर्ति के कारण कीमतें तेजी से गिर सकती हैं, और किसानों को अपनी मेहनत का मूल्य नहीं मिलता है। परंतु, यदि किसानों के पास अच्छी भंडारण सुविधाएं हैं, तो वे ऐसी स्थिति में अपनी फसल बेचने से बच सकते हैं। तब, वे अधिक अनुकूल बाज़ार स्थितियों की प्रतीक्षा करने का विकल्प चुन सकते हैं, ताकि, अधिक मूल्य कमाया जाए। इसके अलावा, खाद्य सुरक्षा न केवल व्यक्तियों के लिए, बल्कि समुदायों के स्वास्थ्य और स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण है। भोजन सुरक्षित होने से, लोगों को काम करने और बेहतर सीखने में मदद मिलती है, क्योंकि वे भूख या खराब पोषण से प्रभावित नहीं होते हैं। मजबूत भंडारण प्रणाली का होना, भोजन के लिए बचत खाता रखने जैसा है। जब किसान अपनी फसलों का सुरक्षित भंडारण करते हैं, तो भोजन बर्बाद नहीं होता है। भोजन को बचाया जा सकता है, और इसका उपयोग तब किया जा सकता है, जब इसकी वास्तव में आवश्यकता हो।
अच्छे भंडारण बुनियादी ढांचे में निवेश करने से लंबे समय तक फलों, सब्जियों एवं अनाज की गुणवत्ता और ताजगी बनाए रखने में मदद मिलती है। तापमान में उतार-चढ़ाव करने, तथा आर्द्रता और कीट नियंत्रण जैसे उच्च गुणवत्ता वाले भंडारण समाधान यह सुनिश्चित करते हैं कि, उत्पाद अपने पोषण मूल्य और दृश्य अपील को बरकरार रखता है। गुणवत्ता का यह संरक्षण न केवल उपभोक्ता संतुष्टि को बढ़ाता है, बल्कि बाजार में अच्छी कीमतें भी प्रदान करता है। जब किसान अपने फसल घाटे को कम कर सकते हैं, अपनी फसलें बेहतर कीमतों पर बेच सकते हैं, और अपनी उपज की गुणवत्ता बनाए रख सकते हैं, तो वे अधिक धन कमाते हैं। आय में इस बढ़ोतरी से किसानों को काफी मदद मिलती है। अधिक धन पाकर, वे अपनी खेती के तरीकों में सुधार कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, वे नए उपकरणों में निवेश कर सकते हैं, जो उन्हें अधिक कुशलता से खेती करने में मदद करते हैं। इसके अलावा, जब किसान आर्थिक रूप से स्थिर होते हैं, तो उन्हें धन प्राप्त करने के लिए ऋण या अन्य जोखिम भरे तरीकों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है।
यहां यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि, केवल भंडारण ही समस्याओं को दूर नहीं करेगा। अगर भंडारण ढांचा खराब है, तब भी फसल बर्बादी हो सकती हैं। दरअसल, निम्नलिखित कारकों की वजह से भारत में भंडारण हानि होती हैं -
1. आज भी, कई किसान बोरियों और खुले यार्डों जैसी पारंपरिक भंडारण विधियों पर निर्भर हैं, जिनमें आर्द्रता और कीट क्षति का खतरा होता है।
2. कृंतक, कीड़े और कवक, संग्रहीत अनाज के बड़े हिस्से को नष्ट कर देते हैं, जिससे गुणवत्ता और वजन में गिरावट आती है।
3. उच्च आर्द्रता और तापमान में उतार-चढ़ाव से, फफूंद की वृद्धि और एफ्लाटॉक्सिन दूषितकरण (Aflatoxin contamination) होता है, जिससे अनाज उपभोग के लिए अनुपयुक्त हो जाता है।
4. कई गोदामों में उचित वायु-संचालन, धूमन और तापमान नियंत्रण का अभाव है, जिससे अधिक बर्बादी होती है।
5. खराब रसद और परिवहन देरी के परिणामस्वरूप भंडारण अवधि लंबी हो जाती है, जिससे फसल खराब होने का खतरा बढ़ जाता है।
6. भारत की भंडारण क्षमता का एक बड़ा हिस्सा अनियमित है, जिससे अक्षमताएं और इष्टतम भंडारण की स्थिति नहीं है।
इन्हीं कारणों से, फसल कटाई के बाद भंडारण संबंधी समस्याओं के कारण, भारत अपनी कुल कृषि उपज का 5-10% हिस्सा खो देता है, जिसकी राशि सालाना 90,000-1,00,000 करोड़ है। इससे किसानों की आय कम होती है, और खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ती है।
शीतगृह भंडारण (Cold storage) इस समस्या का एक समाधान हो सकता है। शीतगृह बुनियादी ढांचा फल, सब्जियां, डेयरी उत्पाद, मांस और समुद्री भोजन जैसी जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ये तापमान-नियंत्रित सुविधाएं उत्पाद में ताजगी, गुणवत्ता और पोषण मूल्य बनाए रखने में मदद करती हैं, जिससे कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। शीतगृह बुनियादी ढांचे में पहले ठंडा करना, वजन, छंटाई, ग्रेडिंग, पैकेजिंग, नियंत्रित वातावरण में भंडारण, ब्लास्ट फ्रीजिंग (Blast freezing) और रीफर वैन (Reefer vans) जैसी शीत परिवहन सुविधाएं शामिल हैं। हमारी सरकार प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, वैकल्पिक निवेश फंड, आदि विभिन्न योजनाओं या पहलों के माध्यम से शीतगृह भंडारण परियोजनाओं की स्थापना के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता प्रदान करती है। 30 जून, 2025 तक, भारत में 402.18 लाख मीट्रिक टन की संयुक्त क्षमता के साथ 8,815 शीतगृह हैं।
इसके अलावा, सरकार फसलों के लिए एक विशिष्ट मूल्य निर्धारित करके भी किसानों की मदद करती है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बाजार की स्थितियों के बावजूद, किसानों की फसलों के लिए सरकार द्वारा निर्धारित गारंटीकृत मूल्य है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि, किसानों को उनकी उपज का उचित मुआवजा मिले। हर साल 22 फसलों के लिए एमएसपी की घोषणा की जाती है, जिनमें चावल, गेहूं, दालें और तिलहन जैसे प्रमुख अनाज शामिल हैं। ये कीमतें किसानों को मूल्य अस्थिरता से बचाने और आवश्यक फसलों की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए निर्धारित की गई हैं। इसके तहत, किसानों को उनकी फसलों के लिए आधार मूल्य का आश्वासन दिया जाता है, जिससे बाजार में उतार-चढ़ाव का जोखिम कम हो जाता है। अर्थात, प्रतिकूल बाजार स्थितियों में भी खरीदारों या सरकार को इसी मूल्य पर किसानों से फसल खरीदनी पड़ती है।
एमएसपी वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे किसानों को अपने निवेश की योजना बनाने और जोखिमों का प्रबंधन करने में मदद मिलती है। आवश्यक फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहित करके, एमएसपी राष्ट्र के लिए भोजन की स्थिर आपूर्ति भी सुनिश्चित करता है। साथ ही, एमएसपी गरीबी को कम करके और कृषि आजीविकाओं को बनाए रखकर ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं का समर्थन करता है। स्थिर कीमतों के साथ, भारत वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा कर सकता है, एवं कृषि निर्यात बढ़ा सकता है।
इसके अतिरिक्त, एमएसपी बाजार की कीमतों को स्थिर करने में मदद करता है, जिससे कृषि उपज के लिए उचित मुआवजा सुनिश्चित होता है। यह आवश्यक फसलों की खेती को प्रोत्साहित करता है, तथा खाद्य सुरक्षा और संतुलित कृषि विकास का समर्थन करता है।
इस प्रकार, हम खाद्यान्न भंडारण का महत्व जान सकते हैं। भंडारण, फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करता है, और उचित भंडारण मात्रा और गुणवत्ता को बरकरार रखता है। अनाज भंडारण, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और राष्ट्रीय आपात स्थितियों के लिए अनाज स्टॉक बनाए रखता है, जिससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है। रणनीतिक भंडारण, अत्यधिक कीमत में उतार-चढ़ाव को भी रोकता है और किसानों की आय का समर्थन करता है। साथ ही, यह खाद्य प्रसंस्करण और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करता है, क्योंकि यह उद्योगों के लिए कच्चे माल की उपलब्धता और निर्यात क्षमता प्रदान करता है।
भारतीय क्रिकेट का पितामह कौन है, जिसके नाम पर खेली जाती है 'रणजी ट्रॉफी'?
रामपुर शहर के हमारे पाठकों के लिए क्रिकेट के इतिहास की यह कहानी बेहद दिलचस्प होने वाली है, क्योंकि इस खेल की जड़ें हमारे देश की ऐतिहासिक रियासतों और शाही घरानों से बहुत गहराई से जुड़ी हुई हैं। आज भारत में क्रिकेट महज़ एक खेल नहीं बल्कि एक धर्म की तरह माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में इस खेल की शुरुआत और इसकी लोकप्रियता के पीछे का इतिहास क्या है? प्रसिद्ध विचारक आशीष नंदी ने क्रिकेट को लेकर एक बेहद मशहूर और सटीक बात कही है कि क्रिकेट असल में एक भारतीय खेल है, जिसे ग़लती से अंग्रेज़ों ने ईजाद कर दिया था। यह वाक्य सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन जब हम भारत में क्रिकेट के इतिहास के पन्ने पलटते हैं, तो यह बात बिल्कुल सच साबित होती है। शुरुआत में यह आम जनता का खेल नहीं था, बल्कि इसे औपनिवेशिक काल के दौरान राजघरानों और अमीरों का खेल माना जाता था।
ब्रिटिश राज में क्रिकेट कैसे बना रसूख और सत्ता का प्रतीक? भारत में क्रिकेट की शुरुआत अठारहवीं सदी में ब्रिटिश नाविकों और ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों द्वारा की गई थी। लेकिन भारतीयों के बीच इस खेल को अपनाने की कहानी केवल शौक तक सीमित नहीं थी। औपनिवेशिक काल के दौरान पारसी समुदाय, अंग्रेज़ी तौर-तरीकों को अपनाने वाले भारतीय समुदायों और सामंती राजकुमारों (रियासतों के राजा-महाराजाओं) ने सबसे पहले इस खेल को खेलना शुरू किया। उन्होंने इस खेल को महज़ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज में अपना रसूख (सोशल स्टेटस) स्थापित करने और ब्रिटिश राज के सत्ताधारी एलीट (उच्च वर्ग) तक अपनी पहुँच बनाने के एक साधन के रूप में अपनाया था। अंग्रेज़ों के साथ क्रिकेट खेलना उस दौर में उनके करीब जाने और उनके समाज का हिस्सा दिखने का एक बेहद कारगर तरीका माना जाता था।
पटियाला के महाराजा ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के साथ
क्रिकेट ने भारतीयों को अंग्रेज़ी शासन और नियमों का सम्मान करना कैसे सिखाया? क्रिकेट का प्रभाव केवल खेल के मैदान तक सीमित नहीं था; इसका राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज पर भी बहुत व्यापक असर पड़ा। इस बात को सी.एल.आर. जेम्स ने अपनी शानदार किताब 'बियॉन्ड द बाउंड्री (Beyond the Boundary)' में बहुत ही बेहतरीन ढंग से समझाया है। जेम्स अपनी किताब में बताते हैं कि क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो नियमों, कानूनों और अंपायरों के निष्पक्ष अधिकार का सम्मान करना सिखाता है। ब्रिटिश शासकों ने बहुत ही चालाकी से इस खेल का इस्तेमाल भारतीयों के मनोविज्ञान को ढालने के लिए किया। अंपायर के फैसलों को बिना सवाल किए मान लेने की इस खेल की परंपरा ने धीरे-धीरे भारतीयों के भीतर औपनिवेशिक नियमों, उनके कानूनों और उनकी सत्ता के प्रति सम्मान और आज्ञाकारिता की भावना पैदा कर दी। इस तरह, क्रिकेट अनजाने में ही ब्रिटिश साम्राज्य के शासन को मज़बूत करने का एक वैचारिक उपकरण बन गया था।
रियासतों के राजा-महाराजाओं ने क्रिकेट और क्रिकेटरों को कैसे संरक्षण दिया? जैसे-जैसे क्रिकेट का प्रभाव बढ़ा, भारत की बड़ी-बड़ी रियासतों ने इसे पूरी तरह से अपना लिया। इस दिशा में सबसे अहम कदम पटियाला के महाराजा राजिंदर सिंहजी ने उठाया, जिन्होंने अपना एक अलग क्रिकेट क्लब बनाया। पटियाला की देखादेखी भोपाल, बड़ौदा, होल्कर और अन्य कई रियासतों के शासकों ने भी क्रिकेट को गले लगा लिया। इन राजा-महाराजाओं ने न केवल इस खेल को आर्थिक समर्थन दिया, बल्कि उन्होंने बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए रोज़गार के अवसर भी पैदा किए। उदाहरण के लिए, होल्कर के महाराजा ने भारत के पहले क्रिकेट सुपरस्टार सी.के. नायडू को अपनी सेना में कर्नल के पद पर नियुक्त किया था। इसी तरह, महाराजा धनराजगीरजी ने मशहूर खिलाड़ी मुश्ताक अली को अपना संरक्षण दिया, जबकि जतीथी के राजा ने महान बल्लेबाज़ विजय हजारे को संरक्षण प्रदान किया था। शाही घरानों के इस वित्तीय और सामाजिक समर्थन ने ही भारत में पेशेवर क्रिकेट की शुरुआती नींव रखी थी।
भारतीय क्रिकेट का पितामह किसे कहा जाता है? जब शाही घरानों और क्रिकेट के रिश्ते की बात होती है, तो एक नाम ऐसा है जिसके बिना भारत का क्रिकेट इतिहास हमेशा अधूरा रहेगा। यह नाम है कुमार श्री रणजीतसिंहजी का, जिन्हें दुनिया भर में 'रणजी' के नाम से भी जाना जाता है। वे नवानगर की रियासत के शासक थे। उनकी असाधारण खेल प्रतिभा और क्रिकेट के प्रति उनके योगदान को देखते हुए ही उन्हें 'भारतीय क्रिकेट का पिता' कहा जाता है। इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान उन्होंने ससेक्स काउंटी और बाद में इंग्लैंड की राष्ट्रीय टीम के लिए क्रिकेट खेला। उनकी बल्लेबाज़ी की शैली इतनी अनोखी और कलात्मक थी कि दुनिया ने पहले कभी वैसा कुछ नहीं देखा था। वे पारंपरिक नियमों से बंधकर नहीं खेलते थे, बल्कि उन्होंने क्रिकेट की दुनिया को 'लेट कट' और 'लेग ग्लांस' जैसे बिल्कुल नए शॉट दिए। उनकी इस जादुई बल्लेबाज़ी ने अंग्रेज़ों को भी उनका मुरीद बना दिया था।
रणजीतसिंहजी की विरासत भारत की सबसे बड़ी घरेलू प्रतियोगिता कैसे बनी? हालांकि रणजीतसिंहजी ने अपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर में ज़्यादातर मैच इंग्लैंड की तरफ से खेले और भारतीय ज़मीन पर उनका क्रिकेट खेलना बहुत सीमित रहा, लेकिन उनका रुतबा और नाम इतना बड़ा था कि भारतीय क्रिकेट हमेशा के लिए उनके नाम के साथ जुड़ गया। एक भारतीय राजकुमार का अंग्रेज़ों के ही खेल में अंग्रेज़ों से बेहतर प्रदर्शन करना, उस दौर में भारतीयों के लिए बहुत बड़े गर्व की बात थी। उनके इसी अभूतपूर्व योगदान और क्रिकेट में उनके ऐतिहासिक दर्जे का सम्मान करने के लिए, भारत की सबसे प्रतिष्ठित घरेलू क्रिकेट प्रतियोगिता का नाम उनके नाम पर रखा गया। जिसे आज हम 'रणजी ट्रॉफी' के नाम से जानते हैं, वह नवानगर के इसी महान राजकुमार की विरासत है। आज भी भारतीय क्रिकेट टीम में जगह बनाने का सपना देखने वाला हर युवा खिलाड़ी सबसे पहले इसी रणजी ट्रॉफी में खुद को साबित करने की कोशिश करता है।
जानिए, सॉवरेन या संप्रभु एआई के लिए देशों की चाहत कैसे बढ़ रही है एवं यह उपयुक्त क्यों है?
आज के लेख में हम समझेंगे कि, सॉवरेन एआई (Sovereign AI) या संप्रभु एआई क्या है, और इससे संबंधित प्रमुख पहलू क्या हैं। फिर, हम उन देशों की सूची देखेंगे, जिनके पास स्वतंत्र नियंत्रित इंटरनेट सिस्टम (Internet System) हैं। इसके अलावा, हम पूरी तरह से संप्रभु इंटरनेट के बिना, संप्रभु एआई प्राप्त करने की चुनौतियों का पता लगाएंगे। अंततः हम जांच करेंगे कि, क्या एक परस्पर जुड़ी वैश्विक प्रणाली में सच्ची डिजिटल संप्रभुता वास्तव में संभव है या नहीं।
सॉवरेन या संप्रभु एआई का उद्देश्य, एआई के देशज उत्पादन को सुनिश्चित करना है। इसमें एआई को प्रशिक्षित करने हेतु उपयोग किया जाने वाला डेटा, किसी क्वेरी (Query) या प्रश्न पर शोध करते समय एआई द्वारा खोजा गया डेटा, और किसी प्रश्न के जवाब में एआई द्वारा आउटपुट के रूप में उत्पन्न डेटा शामिल है।
इस संदर्भ में, संप्रभु एआई में "कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence)" के रूप में लेबल की गई किसी भी या सभी प्रकार की प्रौद्योगिकियां शामिल हो सकती हैं। इसमें डेटा रुझानों को समझने और विसंगतियों को पहचानने के लिए मशीन लर्निंग (Machine Learning) भी शामिल है। ऐसे एआई में, एआई प्रौद्योगिकियों के उपयोग को नियंत्रित करने वाले नियम भी शामिल हो सकते हैं, जैसे कि गोपनीयता (Privacy) से संबंधित नियम।
संप्रभु एआई, डेटा संप्रभुता से संबंधित है। किसी कंपनी या संगठन को राष्ट्रीय नियमों पर विचार करना चाहिए कि, उनका डेटा कहां संग्रहीत और संसाधित किया जा सकता है। आज अधिकांश संगठनों के पास डेटा प्रशासन नीतियां मौजूद हैं। परीक्षण के आरंभ में ही उन नीतियों को एआई तक विस्तारित करने से, भविष्य में आने वाली समस्याओं से बचा जा सकता है। इसी के साथ, इन्हें स्वीकार्य उपयोग को निर्देशित किया जा सकता है। यहां यह विचार भी महत्वपूर्ण है कि, एल्गोरिदम (Algorithm) को प्रशिक्षित करने के लिए डेटा का उपयोग कैसे किया जाता है, और तैयार एआई मॉडल क्या उत्तर प्रदान करते हैं।
संप्रभु एआई से संबंधित विचार करने के लिए, छह मुख्य पहलू निम्नलिखित हैं: आपके संगठन पर लागू होने वाले नियमों को समझना; आपके पसंदीदा एआई बुनियादी ढांचे का निर्धारण करना; डेटा स्थानीयकरण नियंत्रण लागू करना; डेटा गोपनीयता नियंत्रण स्थापित करना; कानूनी नियंत्रण स्थापित करना और अपने एआई स्टैक (Data stack) को सुरक्षित करना। उदाहरण के तौर पर, वांछित एआई बुनियादी ढांचे के निर्धारण में क्लाउड (Cloud) शामिल है, जिसमें एआई बुनियादी ढांचे का निर्माण, संकलन और प्रबंधन करना अक्सर आसान होता है। इसके साथ ही, यदि आपका क्लाउड डेटा संप्रभुता मुद्दों को प्रबंधित करने में आपकी सहायता कर सकता है, तो आपके लिए एआई संप्रभुता के साथ काम करना आसान हो जाएगा।
एक तरफ डेटा गोपनीयता, डेटा के प्रकार और इसका उपयोग कैसे किया जा सकता है, पर केंद्रित है। इसके लिए, आपके सॉफ़्टवेयर को एक लचीली नियंत्रण प्रणाली की आवश्यकता हो सकती है, जो जटिल उपयोग के मामलों को संभालने में सहायक हो। जबकि, एआई स्टैक को सुरक्षित करना, आखिरी पहलू है। कभी-कभी कंपनियां चाहती हैं कि एआई उनके सुरक्षा नियमों के अंदर काम करे। लेकिन इसके लिए ज्यादा जांच और परीक्षण करना पड़ता है। इसलिए वे ऐसे मामलों को पकड़ने के लिए टेस्ट करती हैं, जहां यूज़र (user) गलत तरीके से संवेदनशील जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं।
चलिए, अब राष्ट्रीय इंट्रानेट (National intranet) के बारे में पढ़ते हैं। यह एक इंटरनेट शिष्टाचार-आधारित बंद नेटवर्क होता है, जिसे एक राष्ट्र द्वारा वैश्विक इंटरनेट के राष्ट्रीय विकल्प के रूप में बनाए रखा जाता है। इसका उद्देश्य अपने निवासियों के संचार को नियंत्रित करना और उसकी निगरानी करना है। साथ ही, बाहरी मीडिया तक उनकी पहुंच को यह प्रतिबंधित करता है। ईरान (Iran) में इसके लिए ‘हलाल इंटरनेट’ शब्द का उपयोग किया गया है। ऐसे नेटवर्क आम तौर पर राज्य-नियंत्रित मीडिया और विदेशी संचालित इंटरनेट सेवाओं के राष्ट्रीय विकल्पों तक पहुंच के साथ आते हैं, जैसे कि - खोज इंजन (search engine), वेब-आधारित ईमेल (Web-based email), इत्यादि।
राष्ट्रीय इंट्रानेट वाले देशों की सूची निम्नलिखित है-
1. म्यांमार (Myanmar),
2. क्यूबा (Cuba),
3. उत्तर कोरिया (North Korea),
4. रूस (Russia),
5. चीन (China),
6. ईरान।
एआई स्टैक पर पूर्ण स्वायत्तता का विचार, अधिकांश उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए आर्थिक और संस्थागत रूप से निषेधात्मक है। हर चीज़ स्वयं बनाना भी महंगा है। जब कोई राष्ट्र एआई स्टैक के हर स्तर का मालिक बनना चुनता है, तो जरूरी नहीं कि वह अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर रहा हो। एक हालिया अध्ययन में पाया गया है कि, अमेरिकी कंपनियों ने 18% डेटा सेंटर (Data Center) परियोजनाओं के लिए ऑपरेटर (Operator) के रूप में काम किया है। "संप्रभु" सुविधाओं का निर्माण करने वाले देश भी संचालन के लिए, अक्सर अमेरिकी हाइपरस्केलर्स (Hyperscalers) जैसे एडब्ल्यूएस (AWS), माइक्रोसॉफ्ट एज्यूर( Microsoft Azure), या गूगल क्लाउड (Google Cloud) पर निर्भर रहते हैं। जब क्षेत्रीय और परिचालन क्षेत्राधिकार पर विचार किया जाता है, तो एआई क्षमता सहित वैश्विक गणना पर अमेरिका का पर्याप्त प्रभाव है। व्यवहार में, अधिकांश "संप्रभु गणना" अमेरिकी प्रौद्योगिकी पर निर्भर रहती है। यह प्रश्न मौजूद है कि, एआई आपूर्ति श्रृंखला के किन हिस्सों पर एक राष्ट्र का स्वामित्व, नियंत्रण या शासन होना चाहिए; और एक राष्ट्र किन हिस्सों के साथ सुरक्षित रूप से साझेदारी कर सकता है, किराए पर ले सकता है या साझा कर सकता है? इस प्रश्न का उत्तर परिस्थिति के आधार पर बदलता रहता है। सामान्य रूप से संप्रभुता पाने के बजाय, इन परिस्थितियों को सही करना ही 2026 की रणनीतिक चुनौती है।
हाल ही में, यूरोपीय संघ (European Union) और भारत ने एआई विकास के लिए अधिक संप्रभु दृष्टिकोण की इच्छा व्यक्त की है। हालांकि अभी के लिए, यूरोपीय संघ और भारत के ‘एआई स्टैक’ आपूर्ति श्रृंखलाओं में मजबूती से अंतर्निहित हैं, जो कुछ अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों द्वारा नियंत्रित हैं। चीन द्वारा नियंत्रित महत्वपूर्ण खनिज प्रसंस्करण और हार्डवेयर विनिर्माण (Hardware manufacturing) पर इनकी निर्भरता है। अमेरिका और भारत के बीच सहयोग, बुनियादी ढांचे, कॉर्पोरेट भागीदारी और आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण पर केंद्रित है। उन्नत प्रोसेसर (Processor) और अच्छी कंप्यूटिंग क्षमता (Computing capacity) पर ध्यान देने के साथ, भारतीय कंपनियों को अमेरिकी अग्रणी एआई कंपनियों के साथ जोड़ने के लिए समझौते किए गए हैं। इससे भारत मौजूदा वैश्विक एआई आपूर्ति श्रृंखलाओं में अधिक गहराई से एकीकृत होगा। इस प्रवृत्ति को भारत के अमेरिकी पहल ‘पैक्स सिलिका (Pax Silica)’ में शामिल होने से स्पष्ट किया गया है। इसका उद्देश्य चयनित भागीदारों के बीच एआई आपूर्ति श्रृंखलाओं में समन्वय और लचीलेपन को मजबूत करना है।
पूर्ण-स्टैक एआई संप्रभुता, लगभग किसी भी देश के लिए संरचनात्मक रूप से अव्यवहार्य है। क्योंकि एआई खनिजों, ऊर्जा, कंप्यूट हार्डवेयर, नेटवर्क, डिजिटल बुनियादी ढांचे (digital infrastructure), डेटा परिसंपत्तियों, मॉडलों, अनुप्रयोगों, प्रतिभा के क्रॉसकटिंग एनबलर्स (Crosscutting enablers) तथा शासन में केंद्रित एक अंतरराष्ट्रीय स्टैक है। इसलिए, विकल्प यह है कि एआई स्टैक में जोखिमों को कम करने के लिए रणनीतिक गठबंधन और साझेदारी पर काम करना चाहिए। अगर आपसी निर्भरता को सही तरीके से संभाला जाए, तो खुले बाजार और देशों के सहयोग के फायदे बने रहते हैं और साथ ही मजबूती भी बढ़ती है।
भारत डिजिटल संप्रभुता की बात करता है, और हमने डेटा स्थानीयकरण और देशज स्टार्टअप को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाए हैं। रूस, ब्राज़ील (Brazil) और अन्य देशों ने अपने डिजिटल ढांचे को अधिक नियंत्रित करने की इच्छा व्यक्त की है। विश्व में आज विदेशी प्रौद्योगिकी पर कम निर्भर होने की चाहत, काफी सार्वभौमिक हो गई है। आधुनिक तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र वैश्वीकृत है, और कोई भी एक राष्ट्र संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला को नियंत्रित नहीं करता है।
भारत में क्लीन एनर्जी के दौर में भी काले कोयले का राज क्यों कायम है?
गुजरात के सफ़ेद रण में बन रहा खावड़ा नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र साल 2030 तक 30 गीगावाट सौर और पवन ऊर्जा पैदा करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा स्वच्छ ऊर्जा प्रतिष्ठान बनने जा रहा है। लेकिन उसी समय महाराष्ट्र के चंद्रपुर में एक 3 गीगावाट का कोयला आधारित संयंत्र लगातार धुआं उगल रहा है, जो उन सैकड़ों संयंत्रों में से एक है जो आज भी भारत के 60 प्रतिशत से अधिक बिजली तंत्र को शक्ति प्रदान करते हैं। रामपुर और इसके आस-पास के बिजली उपभोक्ताओं के लिए यह जानना बहुत दिलचस्प होगा कि जब भारत में सौर ऊर्जा की क़ीमत 30 डॉलर प्रति मेगावाट घंटे तक गिर गई है, जो कोयले की क़ीमत से लगभग आधी है, फिर भी सरकार के अनुमान के मुताबिक साल 2047 तक भारत में कोयले की मांग 1755 मीट्रिक टन (metric ton) तक क्यों पहुंच जाएगी। विकास और जलवायु लक्ष्यों के बीच फँसे भारत के लिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर हमारी अर्थव्यवस्था कोयले पर इतनी निर्भर क्यों है, इसके क्या फ़ायदे और नुक़सान हैं, और साफ़ ऊर्जा की तरफ़ कैसे बढ़ा जा सकता है।
भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा में कोयले का क्या महत्व है? भारत की ऊर्जा ज़रूरतों के लिए कोयला एक आधारशिला है, जो हमारी प्राथमिक ऊर्जा ज़रूरतों के आधे से अधिक हिस्से का योगदान देता है और उद्योगों की रीढ़ की हड्डी बना हुआ है। पिछले एक दशक में देश के कुल बिजली उत्पादन में थर्मल पावर की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक रही है। इसके अलावा कोयला क्षेत्र का आर्थिक महत्व ऊर्जा उत्पादन से कहीं आगे तक फैला हुआ है। भारतीय रेलवे को माल ढुलाई से जो कमाई होती है, उसमें करीब 49% हिस्सा सिर्फ कोयले से आता है, जो वित्तीय वर्ष 2022-23 में 82,275 करोड़ रुपये रही थी। यह क्षेत्र केंद्र और राज्य सरकारों को रॉयल्टी (Royalty) और अन्य करों के माध्यम से सालाना 70,000 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व देता है। रोज़गार के मामले में भी यह क्षेत्र काफ़ी अहम है, विशेष रूप से पूर्वी राज्यों में, जहाँ कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Limited) और उसकी सहायक कंपनियों में 2,39,210 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं और इसके अलावा हज़ारों लोग ठेके और आउटसोर्सिंग (Outsourcing) के ज़रिए जुड़े हुए हैं।
कोयले के इस्तेमाल के मुख्य फ़ायदे और नुक़सान क्या हैं? कोयला दुनिया भर में ऊर्जा के सबसे प्रचुर स्रोतों में से एक है और यह तेल या प्राकृतिक गैस जैसे अन्य जीवाश्म ईंधनों की तुलना में सस्ता है। सौर या पवन ऊर्जा के विपरीत, जो पूरी तरह से मौसम पर निर्भर होते हैं, कोयला बिजली संयंत्र किसी भी मौसम में दिन-रात चल सकते हैं। कोयले का ऊर्जा घनत्व भी अधिक होता है, जिसका अर्थ है कि यह प्रति किलोग्राम बड़ी मात्रा में ऊर्जा पैदा कर सकता है। इसके अलावा कोयले से सिंथेटिक ईंधन (synthetic fuel) और रोज़मर्रा के सामान में इस्तेमाल होने वाले रसायन भी बनाए जा सकते हैं। लेकिन इन फ़ायदों के साथ इसके बड़े नुक़सान भी जुड़े हुए हैं। कोयला जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) जैसी ग्रीनहाउस गैसों (greenhouse gases) का भारी उत्सर्जन होता है जो जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण है। कोयले के प्रदूषण से अस्थमा और हृदय रोग का ख़तरा बढ़ता है, और खदानों में काम करने वाले मज़दूरों को ब्लैक लंग डिज़ीज़ (Black Lung Disease) जैसी जानलेवा बीमारियां होती हैं। इसके खनन के लिए जंगलों और पहाड़ों को नष्ट किया जाता है और बिजली संयंत्रों को ठंडा करने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। इन संयंत्रों से निकलने वाली ज़हरीली राख ज़मीन और पानी दोनों को दूषित करती है।
सौर ऊर्जा सस्ती होने के बावजूद भारत कोयले पर इतना निर्भर क्यों है? भारत में सौर ऊर्जा अब कोयले से सस्ती हो चुकी है, फिर भी नए कोयला संयंत्र (coal plant) बनाए जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि सौर और पवन ऊर्जा हमेशा उपलब्ध नहीं रहती है। एक सौर संयंत्र एक वर्ष में अपने अधिकतम उत्पादन का केवल 15 से 25 प्रतिशत ही पैदा कर पाता है और पवन संयंत्र 25 से 35 प्रतिशत पैदा करता है। इसकी तुलना में कोयला संयंत्र दिन-रात सातों दिन चल सकते हैं और इनका क्षमता उपयोग कारक 70 से 90 प्रतिशत तक होता है। भारत में बिजली की मांग दिन में दो बार चरम पर होती है, एक बार दोपहर में और दूसरी बार सूर्यास्त के बाद। सौर ऊर्जा दिन की मांग को तो पूरा कर देती है, लेकिन जब लोग शाम को घर लौटते हैं और बिजली की मांग बढ़ती है, तब सूरज ढल चुका होता है। इस समस्या को सुलझाने के लिए विशाल बैटरी स्टोरेज (Battery Storage) की ज़रूरत है, जो अभी व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य नहीं है। इसके अलावा एक बड़ी भौगोलिक चुनौती भी है क्योंकि भारत में नवीकरणीय ऊर्जा मुख्य रूप से छह दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में केंद्रित है, जबकि कोयले वाले राज्य मध्य और पूर्वी भारत में हैं। इन क्षेत्रों को जोड़ने के लिए ट्रांसमिशन बुनियादी ढांचा(Transmission infrastructure) अभी भी कमज़ोर है, जिस कारण कोयले पर निर्भरता कम करना आसान नहीं है। कोयले पर निर्भर इस व्यवस्था को साफ़ ऊर्जा में कैसे बदला जा सकता है? भारत को कार्बन मुक्त बनाने के लिए कोयला संयंत्रों को साफ़ ऊर्जा की ओर ले जाना सबसे बड़ी चुनौती है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के एक हालिया शोध में भारत के 806 कोयला संयंत्रों के डेटा का विश्लेषण किया गया है। इस शोध के अनुसार, यदि केवल नवीकरणीय ऊर्जा पर भारी निवेश किया जाता है, तो बिजली सस्ती तो होगी लेकिन सामाजिक असमानता बढ़ेगी। अमीर पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में हवा और सूरज की रोशनी होने के कारण सारा निवेश वहीं होगा, जबकि पूर्वी भारत के ग़रीब कोयला उत्पादक राज्य पीछे छूट जाएंगे। शोध में पाया गया है कि बिजली की लागत और सामाजिक न्याय दोनों को संतुलित करने का सबसे अच्छा तरीक़ा मौजूदा उच्च दक्षता वाले कोयला संयंत्रों में कार्बन कैप्चर एंड सिक्वेस्ट्रेशन (Carbon Capture and Sequestration) तकनीक लगाना है, जिसके तहत धुएं से कार्बन सोख लिया जाता है। इसके साथ ही कोयले के साथ बायोमास को मिलाकर जलाना भी एक बेहतर विकल्प है। अगर इन तकनीकों को अपनाया जाता है, तो बिजली की लागत में 22 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है और कोयला संयंत्रों का बेहतर उपयोग भी हो सकेगा। हालांकि भारत इस नई कार्बन सोखने वाली तकनीक को लेकर अभी बहुत सतर्क है, लेकिन विदेशी सहयोग और बेहतर नीतियों से इस संकट को सुलझाकर देश एक स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा वाले भविष्य की ओर बढ़ सकता है।
आशा भोसले और माइकल स्टाइप का 'द वे यू ड्रीम' में सुरीला संगम
आशा भोसले (Asha Bhosle) भारतीय सिनेमा की सबसे बहुमुखी और प्रसिद्ध गायिकाओं में से एक हैं, जिनकी आवाज़ ने संगीत की सीमाओं को पार करते हुए दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने केवल फिल्मी गीतों तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ भी काम करके अपनी कला को एक वैश्विक रूप दिया।
इसी कड़ी में उनका एक खास सहयोग अंग्रेज़ी संगीत समूह 1 जायंट लीप (1 Giant Leap) और गायक माइकल स्टाइप (Michael Stipe) के साथ देखने को मिलता है। “द वे यू ड्रीम” (The Way You Dream) गीत में आशा भोसले की आवाज़ सबसे पहले सुनाई देती है, जो पूरे गीत को एक गहराई और शांति देती है। यह गीत अलग अलग देशों की ध्वनियों और विचारों को जोड़कर एकता का संदेश देता है।
दिलचस्प बात यह है कि यह सहयोग पहले से तय नहीं था। जयपुर में अचानक मुलाकात के दौरान उन्हें एक धुन सुनाई गई और उन्होंने उसी समय गाना रिकॉर्ड किया। उनकी सहज और भावपूर्ण गायकी ने इस गीत को एक खास पहचान दी।
यह सहयोग दिखाता है कि आशा भोसले की आवाज़ सिर्फ भारत की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की है। उनका संगीत लोगों को जोड़ता है और यह एहसास कराता है कि अलग अलग संस्कृतियों के बीच भी एक गहरी समानता होती है।
50 हज़ार शेरों वाला फ़ारसी महाकाव्य 'शाहनामा' यूपी के रामपुर कैसे पहुँचा?
क्या आपने कभी सोचा है कि एक 1010 ईसवी में लगभग पचास हज़ार शेरों में लिखा गया एक ऐसा महाकाव्य, जो दुनिया के निर्माण से लेकर सातवीं शताब्दी के इस्लामी आक्रमण तक की कहानी बयां करता है, हमारे रामपुर शहर की सबसे सुरक्षित और ऐतिहासिक तिजोरी तक कैसे पहुँचा? यह दास्तान है 'शाहनामा' की, जिसे हकीम अबुल-कासिम फिरदौसी (Hakim Abul-Qasim Firdausi) ने लिखा था। फ़ारस से उठी यह साहित्यिक लहर मुग़ल बादशाहों के दरबारों से होती हुई, रामपुर के नवाबों के उस जुनून तक पहुँची, जिन्होंने दुनिया के दुर्लभ ग्रंथों को हासिल करने के लिए इस्तांबुल, काहिरा, बग़दाद, तेहरान और समरकंद तक खाली चेक देकर अपने नुमाइंदे भेजे थे। यह केवल एक किताब का सफ़र नहीं है, बल्कि यह इंसानी इतिहास, कला और सभ्यताओं के आपसी जुड़ाव की एक ऐसी जीती-जागती कहानी है, जो आज भी रामपुर की रज़ा लाइब्रेरी की अलमारियों में महक रही है।
शाहनामा क्या है और यह फ़ारसी पौराणिक कथाओं तथा इतिहास को कैसे प्रस्तुत करता है?शाहनामा, जिसे राजाओं की किताब के रूप में भी जाना जाता है, ग्रेटर ईरान (ईरान ज़मीन) के इतिहास और पौराणिक कथाओं का एक निर्विवाद राष्ट्रीय महाकाव्य है। यह महाकाव्य दुनिया के निर्माण से शुरू होकर सातवीं शताब्दी में अरबों की विजय तक के कालखंड को समेटता है। इस ग्रंथ में रुस्तम जैसे महान योद्धाओं और सिकंदर महान जैसे ऐतिहासिक राजाओं की दिलचस्प कहानियाँ दर्ज हैं। ईरान, अफ़ग़ानिस्तान (Afghanistan), ताजिकिस्तान (Tajikistan) और काकेशस (Caucasus) के लोग इस ग्रंथ को अपनी साझा सांस्कृतिक विरासत मानते हैं। फिरदौसी ने पूर्व-इस्लामी ईरानी पौराणिक कथाओं को शामिल करके फ़ारसी भाषा और संस्कृति को सहेजने का महान काम किया था। हालांकि बीसवीं सदी में कई राष्ट्रवादियों और विशेष रूप से पहलवी राजवंश ने इस ग्रंथ का राजनीतिकरण किया। उन्होंने इसे अरब और तुर्क प्रभाव के खिलाफ ईरानी श्रेष्ठता का प्रतीक बना दिया और यह भ्रांति फैलाई कि शाहनामा में कोई अरबी शब्द नहीं है और यह इस्लाम या अरबों के ख़िलाफ़ है।
शाहनामा
वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट है। राष्ट्रवादी विचारों ने शाहनामा को एक धर्मनिरपेक्ष और शुद्ध फ़ारसी ग्रंथ साबित करने की कोशिश की, लेकिन तथ्य बताते हैं कि इस महाकाव्य में लगभग नौ प्रतिशत अरबी शब्दों का इस्तेमाल हुआ है। फिरदौसी ने अपनी किताब की शुरुआत में ईश्वर, ग़ज़नी के सुल्तान महमूद, पैगंबर और उनके परिवार (अहल-ए बैत) की भरपूर प्रशंसा की है, जो उनकी आस्था को दर्शाता है। इस ग्रंथ में बुराई का स्रोत बाहरी दुनिया को नहीं, बल्कि 'अह्रिमन' के रूप में समाज के भीतर ही दिखाया गया है। सियावश और सोहराब जैसे ईरानी नायकों ने ईरानी पठार की सीमाओं के पार जाकर रिश्ते बनाए थे। फिरदौसी ने अपनी कहानी में सुदाबेह और अयोग्य राजा के कवुस जैसे भ्रष्ट ईरानी किरदारों को भी जगह दी है, जो साबित करता है कि यह महाकाव्य केवल खोखले राष्ट्रवाद की वकालत नहीं करता। 1934 में जब तूस शहर में फिरदौसी के मकबरे का पुनर्निर्माण हुआ, तो उसमें सफ़ेद पत्थर का इस्तेमाल इसी तथाकथित भाषाई शुद्धता को दर्शाने के लिए किया गया था और पारसी प्रतीक 'फ़रहर' को परसेपोलिस (Persepolis) से हूबहू नकल किया गया था। तेरहवीं शताब्दी में मंगोल आक्रमणों के बाद जब व्यापारिक मार्ग फिर से खुले, तो इलखानी और तैमूरी काल के चित्रकारों ने शाहनामा के चित्रों में चीनी कला को भी अपनाया। मशहूर ईरानी पौराणिक पक्षी 'सीमूर्घ' के चित्रण पर चीनी ड्रैगन (Chinese dragon) और फ़ीनिक्स (Phoenix) का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है।
मुग़ल साम्राज्य ने शाहनामा और अन्य फ़ारसी साहित्य को कैसे सहेजा और बढ़ावा दिया? भारत में मुग़ल साम्राज्य की नींव 1526 में बाबर ने रखी थी। बाबर महान विजेता तैमूर और चंगेज़ ख़ान का वंशज था। वह मूल रूप से उज़्बेकिस्तान (Uzbekistan) की फ़रग़ना घाटी से आया था और उसका सपना समरकंद पर कब्ज़ा करना था। जब वह तीन बार असफल रहा, तो उसने काबुल और फिर भारत का रुख किया, जहाँ उसने अफ़ग़ान शासक इब्राहिम लोदी को हराया। मुग़ल मूल रूप से तुर्क थे, लेकिन वे फ़ारसी संस्कृति को बहुत परिष्कृत और महान मानते थे। इसी कारण उन्होंने फ़ारसी को अपने दरबार और प्रशासन की आधिकारिक भाषा बना दिया। बाबर कला और साहित्य का प्रेमी था; उसने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' (Baburnama) अपनी मातृभाषा चगताई तुर्की में लिखी थी, जिसमें उसने अपने युद्धों और भारत की गर्मी का ज़िक्र किया था।
बाबर के बाद उसके बेटे हुमायूँ को अफ़ग़ान शासक शेर शाह सूरी से हारकर भागना पड़ा और उसने ईरान में सफ़वी शासक शाह तहमास्प के दरबार में पनाह ली। यह निर्वासन मुग़ल इतिहास और कला के लिए एक वरदान साबित हुआ। शाह की मदद से हुमायूँ को राजनीतिक ताकत तो मिली ही, साथ ही उसने तबरीज़ में शाह के स्टूडियो (studio) में बेहतरीन कलाकृतियाँ भी देखीं। वापसी में हुमायूँ अपने साथ कम से कम दो महान फ़ारसी कलाकारों को भारत ले आया, जिन्होंने मुग़ल चित्रकला स्टूडियो की नींव रखी। बाद में अनपढ़ होने के बावजूद बादशाह अकबर ने किताबों के प्रति अपने गहरे प्रेम के कारण अपने पिता की इस परंपरा को बहुत आगे बढ़ाया। अकबर ने हमज़ानामा (Hamzanama) बनवाया, जिसमें चौदह सौ चित्र थे और जिसे पूरा होने में पंद्रह साल लगे थे। अकबर के समय में बाबरनामा का तुर्की से फ़ारसी में अनुवाद किया गया और निज़ामी, फ़िरदौसी, हाफ़िज़ तथा सादी के ग्रंथों को चित्रित करवाया गया। इस प्रकार मुग़ल काल में फ़ारसी कला और साहित्य ने भारतीय संस्कृति के साथ मिलकर एक नया मुकाम हासिल किया।
हमज़ानामा
मुग़ल लघु चित्रकला की उत्पत्ति कैसे हुई और सचित्र पांडुलिपियों से इसका क्या संबंध है? मुग़ल लघु चित्रकला वास्तव में फ़ारसी और भारतीय कला शैलियों का एक अनूठा संगम है, जो सोलहवीं शताब्दी में अपने चरम पर पहुँची। जब हुमायूँ ईरान से लौटा, तो वह अपने साथ मीर सैयद अली और अब्द अल-समद जैसे महान फ़ारसी कलाकारों को लाया था। इन कलाकारों ने भारतीय कला में आलंकारिक शैली, जटिल विवरण और जीवंत रंगों को पिरोया। सम्राट अकबर के शासनकाल में इस कला को सबसे ज़्यादा संरक्षण मिला और मुग़ल चित्रकला की एक बिल्कुल नई शैली का जन्म हुआ। इन लघु चित्रों के ज़रिए न केवल दरबार की भव्यता को दर्शाया गया, बल्कि हिंदू महाकाव्यों जैसे रामायण और महाभारत को भी मुग़ल शैली में सचित्र किया गया।
इन चित्रों को बनाने की तकनीक बहुत ही बारीक और मेहनत भरी होती थी। मुग़ल चित्रकार मुख्य रूप से कागज़ पर चित्र बनाते थे, जो ताड़ के पत्तों पर चित्रकारी करने की पुरानी भारतीय परंपरा से एक बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव था। रंग भरने के लिए खनिजों, पौधों और यहां तक कि कीमती पत्थरों से निकले प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता था। सबसे दिलचस्प बात यह है कि चित्रकारी के लिए इस्तेमाल होने वाले ब्रश गिलहरी या बिल्ली के बालों से बनाए जाते थे। इन चित्रों में पदानुक्रमित पैमाने का उपयोग किया जाता था, जिसका अर्थ है कि बादशाह या मुख्य व्यक्ति को हमेशा अन्य आकृतियों की तुलना में बड़ा दिखाया जाता था। चित्रों में गहरे लाल, नीले, हरे और सुनहरे रंगों का भरपूर इस्तेमाल होता था और छाया के ज़रिए एक गहरी जीवंतता पैदा की जाती थी। इस तरह लघु चित्रकला ने पांडुलिपियों को केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि देखने और महसूस करने वाली कला का खजाना बना दिया।
रामपुर की रज़ा लाइब्रेरी में संरक्षित सचित्र शाहनामा का क्या सांस्कृतिक महत्व है? अठारहवीं सदी के अंत में जब मुग़ल साम्राज्य का पतन हो रहा था और दिल्ली में उथल-पुथल मची थी, तब रामपुर के पहले नवाब फैज़ुल्लाह ख़ान (1774 से 1794) ने भागते हुए कलाकारों, कवियों और विद्वानों को अपने यहां पनाह दी। नवाब फैज़ुल्लाह ख़ान एक उत्कृष्ट नज़रिए और गहरी बुद्धि वाले इंसान थे। उन्होंने सत्ता के साथ-साथ ज्ञान को सहेजने के महत्व को समझा और पुरानी पांडुलिपियों को इकट्ठा करना शुरू किया, जिससे महान रज़ा लाइब्रेरी की नींव पड़ी। बाद में नवाब कल्ब अली ख़ान और उनके बेटे नवाब हामिद अली ख़ान के दौर में यह लाइब्रेरी पूरी दुनिया में मशहूर हो गई। इन नवाबों ने इस्तांबुल, काहिरा, बग़दाद, तेहरान और समरकंद जैसी जगहों पर अपने विशेष लोग भेजे और उन्हें खाली चेक देकर दुनिया की सबसे दुर्लभ पांडुलिपियों को रामपुर लाने का काम सौंपा। आज रामपुर के शानदार हामिद मंज़िल में स्थित इस लाइब्रेरी में सत्रह हज़ार से ज़्यादा पांडुलिपियां और अस्सी हज़ार से ज़्यादा मुद्रित किताबें मौजूद हैं।
इसी विशाल और अनमोल संग्रह में सफ़वी फ़ारसी शासक शाह तहमास्प के आदेश पर तैयार किए गए 'शाहनामा' का एक शानदार सचित्र पन्ना भी सुरक्षित रखा गया है। इसके हर पन्ने पर बनी जटिल मुग़ल और फ़ारसी चित्रकारी फ़ारसी नायकों की कहानियों को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाती है। इसके अलावा यहाँ बारहवीं सदी की एक ऐसी कुरान भी मौजूद है जिसे केवल स्याही से नहीं, बल्कि सोने से लिखा गया है। यहाँ मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब आलमगीर द्वारा अपने हाथों से लिखी गई 'दीवान-ए-हाफ़िज़' (Diwan-e-hafiz) की एक प्रति और ग्यारहवीं सदी के महान विद्वान अल-बरूनी की मूल पांडुलिपि भी सहेजी गई है। इस लाइब्रेरी में अरबी, फ़ारसी, संस्कृत, हिंदी, तुर्की, पश्तो और उर्दू की बेशकीमती पांडुलिपियां हैं, साथ ही बाबर, हुमायूँ और अकबर के मूल शाही फ़रमान भी मौजूद हैं। 1951 में नवाब सैयद मुर्तज़ा अली ख़ान ने इस लाइब्रेरी को एक ट्रस्ट को सौंप दिया और अंततः 1975 में भारत सरकार ने संसद के एक अधिनियम के माध्यम से इसे राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित कर दिया। आज यह रज़ा लाइब्रेरी केवल किताबों का संग्रह नहीं है, बल्कि दुनिया भर के शोधकर्ताओं के लिए एक तीर्थस्थल है, जो रामपुर शहर को वैश्विक इतिहास के नक्शे पर हमेशा के लिए अमर कर देता है।