बदलती जलवायु में कैसे बढ़े चॉकलेट उत्पादन, कि न बदले रामपुर के हर बच्चे के चेहरे की मुस्कान

स्वाद- खाद्य का इतिहास
28-03-2025 09:20 AM
बदलती जलवायु में कैसे बढ़े चॉकलेट उत्पादन, कि न बदले रामपुर के हर बच्चे के चेहरे की मुस्कान

भारत में हर साल करीब 27,000 टन कोको (Cocoa) का उत्पादन होता है! इसे ज़्यादाज़्यादातर केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में उगाया जाता है। आज के इस लेख में हम भारत में कोको के उत्पादन की मौजूदा स्थिति को समझने की कोशिश करेंगे। फिर हम जानेंगे कि भारत कितना कोको आयात करता है और इसे किन देशों से इसे मंगवाया जाता है। इसके बाद, हम समझेंगे कि कोको की खेती के लिए भारत की जलवायु कितनी उपयुक्त है! साथ ही, यह भी जानेंगे कि पश्चिम अफ्रीका में कोको का उत्पादन तेजी से क्यों घट रहा है। अंत में, हम कुछ महत्वपूर्ण उपायों पर चर्चा करेंगे जो भारत में कोको उत्पादन बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।

कोको का पेड़ | चित्र स्रोत : Wikimedia

आइए, सबसे पहले भारत में कोको उत्पादन की वर्तमान स्थिति को समझते हैं?

कोको एक उष्णकटिबंधीय फ़सल (Tropical crop) है, जिससे चॉकलेट बनाई जाती है। यह कोकोआ पेड़ (Theobroma cacao) के बीजों से प्राप्त होता है। भारत में कोको एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक फ़सल है, जिसे मुख्य रूप से केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में उगाया जाता है। देश में हर साल करीब 27,000 टन कोको का उत्पादन होता है। लेकिन भारतीय चॉकलेट और कन्फेक्शनरी उद्योग की मांग इससे कहीं ज़्यादा है। इस बढ़ती जरूरत को पूरा करने के लिए भारत को आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। वर्तमान में, भारत हर साल करीब 1,00,000 टन कोको-आधारित उत्पाद आयात करता है।

2023 में, भारत में 438 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के कोको और उससे जुड़े उत्पाद आयात किए गए। यह आंकड़ा पिछले साल की तुलना में 4.9% कम है, लेकिन पिछले पांच वर्षों में भारत का कोको आयात हर साल 10.6% (Compound annual growth rate (CAGR)) की दर से बढ़ा है। आयातित कोको से बने उत्पादों में सबसे ज़्यादा मांग कोको पाउडर (US$ 130.73 मिलियन) और कोको बटर, वसा और तेल (US$ 100.9 मिलियन) की रही। भारत में कोको की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन घरेलू उत्पादन इसे पूरा नहीं कर पा रहा। यही वजह है कि आयात पर निर्भरता बढ़ रही है।

 निर्यात के लिए तैयार सूखे कोको बीन्स को पकड़े हुए एक कोको किसान। | चित्र स्रोत : Wikimedia

भारत अपने कोको बीन्स का आयात कहां से करता है?

मार्च 2023 से फ़रवरी 2024 के बीच, भारत ने कुल 437 खेपें (shipments) कोको बीन्स की आयात कीं। ये खेपें 56 विदेशी निर्यातकों द्वारा 37 भारतीय खरीदारों को भेजी गईं। पिछले 12 महीनों की तुलना में यह 10% की वृद्धि को दिखाता है। सिर्फ फ़रवरी 2024 में ही 66 खेपें भारत आईं, जो फ़रवरी 2023 के मुकाबले 175% अधिक और जनवरी 2024 से 136% ज़्यादा है।

अब सवाल ये उठता है कि भारत कोको बीन्स खरीदता कहां से है? 

युगांडा (Uganda), इक्वाडोर (Ecuador) और कांगो (Congo) भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ता (suppliers) हैं। अगर हम वैश्विक स्तर पर देखें, तो संयुक्त राज्य अमेरिका (USA), इंडोनेशिया (Indonesia) और रूस (Russia) दुनिया में सबसे ज़्यादा कोको बीन्स आयात करते हैं। अमेरिका 37,694 खेपों के साथ नंबर 1 पर है, इंडोनेशिया 11,491 खेपों के साथ दूसरे स्थान पर और रूस 8,213 खेपों के साथ तीसरे नंबर पर आता है। पश्चिमी अफ़्रीका में कोको प्रचुरता से होता था लेकिन वहां भी इसका उत्पादन तेजी से घट रहा है। पश्चिम अफ्रीका में 2023 से औसत तापमान में तेज़ी से बढ़ोतरी देखी जा रही है। 2024 की शुरुआत में यहाँ का अधिकतम तापमान 41 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। यह तापमान कोको के पेड़ों के लिए आदर्श सीमा से काफ़ी ज़्यादा है। आमतौर पर, कोको के पौधे 21 डिग्री से 30 डिग्री सेल्सियस के बीच अच्छे से बढ़ते हैं।


कोको पाउडर | चित्र स्रोत : Wikimedia

पश्चिमी अफ़्रीका में कोको उत्पादन में आई गिरावट के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:- 

1. पर्यावरणीय कारण: एल नीनो मौसम की घटना के कारण यहाँ का मौसम शुष्क होता जा रहा है। सूखे की वजह से खेतों में स्वेलन शूट वायरस जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। इसका सीधा असर कोको की फ़सल पर पड़ रहा है। घाना में हाल के वर्षों में करीब 5 लाख हेक्टेयर भूमि पर कोको की फ़सल बर्बाद हो चुकी है।

2. आर्थिक कारण: पहले, जब खेतों की उत्पादकता घटती थी, तो किसान नए जंगलों में जाकर खेती शुरू कर देते थे। लेकिन अब नए जंगल मिलना मुश्किल होता जा रहा है। टिकाऊ कोको उत्पादन (Sustainable cocoa production) के लिए उचित न मिलना भी एक बड़ी समस्या है। किसानों को उनकी मेहनत के हिसाब से सही दाम नहीं मिल रहा, जिससे वे खेती छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं।

3. मानवीय कारण: अवैध खनन (Illegal Mining) भी कोको उत्पादन में गिरावट का एक बड़ा कारण है। घाना में कई किसान पैसे के बदले अपनी ज़मीन खननकर्ताओं को किराए पर दे रहे हैं। ये खनन गतिविधियाँ मिट्टी की गुणवत्ता को खराब कर देती हैं, जिससे वह खेती के लिए अनुपयुक्त हो जाती है।

चित्र स्रोत : Wikimedia

इन तीनों वजहों से पश्चिमी अफ्रीका में कोको उत्पादन लगातार गिरता जा रहा है। अगर जल्द समाधान नहीं निकाला गया, तो आने वाले सालों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

भारत में कोको की खेती के लिए आदर्श तापमान 24-28 डिग्री सेल्सियस (न्यूनतम) और 32-34 डिग्री सेल्सियस (अधिकतम) होता है। इसके अलावा, कोको को नमी वाला मौसम पसंद होता है। यही कारण है कि भारत के कुछ हिस्सों में इसकी खेती तेज़ी से बढ़ रही है। कोको का पौधा छाया में अच्छा बढ़ता है। यह सुपारी और जायफल जैसे लंबे पेड़ों के नीचे अच्छी तरह फलता-फूलता है। यही वजह है कि किसान बिना अलग से ज़मीन जोड़े, अपनी मौजूदा ज़मीन पर उगाकर अधिक कमाई कर सकते हैं। कोको की खेती में पानी की बड़ी भूमिका होती है। इसे सालाना 2,000 मिमी से अधिक बारिश वाले क्षेत्रों में उगाना सबसे बेहतर रहता है। भारत में इसकी खेती को अधिक क्षेत्र में फैलाने में कोई कठिनाई नहीं है, क्योंकि इसे बहु-फ़सल के रूप में उगाया जाता है। वैश्विक स्तर पर कोको का औसत उत्पादन प्रति पेड़ प्रति वर्ष 0.25 किलोग्राम होता है। लेकिन भारत में यह आंकड़ा कहीं ज़्यादा है। केरल में प्रति पेड़ प्रति वर्ष 2.5 किलोग्राम उत्पादन हो रहा है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में यह उत्पादन 4-5 किलोग्राम तक पहुंच गया है। यह भारत में कोको की खेती की बेहतर आनुवंशिक क्षमता को दर्शाता है। बढ़ती मांग और उपयुक्त जलवायु को देखते हुए, भारत कोको उत्पादन में एक प्रमुख खिलाड़ी बन सकता है।

कोको फ़ार्म | चित्र स्रोत : Wikimedia

भारत में कोको उत्पादन कैसे बढ़ाएं ?

भारत में कोको उत्पादन को बढ़ाने के लिए हमें कई महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे। इसमें वैज्ञानिक तकनीकों, संसाधनों का बेहतर उपयोग और किसानों की भागीदारी भी जरूरी है। 

1. बेहतर और टिकाऊ कोको किस्में विकसित करें: - हमें कोको की ऐसी किस्में तैयार करनी होंगी जो गर्मी, सूखे और कीटों के प्रति ज़्यादा टिकाऊ हों। इसके अलावा, उनमें बायोएक्टिव यौगिक और पोषक तत्व अधिक होने चाहिए। साथ ही, वे पानी का भी कुशलता से उपयोग कर सकें। इसे संभव बनाने के लिए पारंपरिक खेती के साथ जैव प्रौद्योगिकी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाए, जिससे अच्छी फ़सल उगाने वाले जीन को पहचाना जा सके।

2. उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग करें: - कोको उत्पादन को बढ़ाने के लिए हमें प्राकृतिक संसाधनों का सही इस्तेमाल करना होगा। इसके लिए क्षेत्र विशेष प्रौद्योगिकी पर ध्यान देना होगा। पानी और पोषक तत्वों का सही उपयोग करने के लिए नई उत्पादन प्रणालियाँ विकसित करनी होंगी। इसके अलावा, पेड़ों की छायादार कैनोपी प्रबंधन तकनीक अपनाकर सूरज की रोशनी, हवा और पानी का बेहतरीन उपयोग किया जा सकता है।

3. उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार करें: - उत्पाद की गुणवत्ता को सुधारने और पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने के लिए उन्नत तकनीकों की जरूरत है। कटाई के बाद की प्रक्रियाओं को बेहतर बनाकर फ़सल का नुकसान कम किया जा सकता है। इससे न केवल उपज बढ़ेगी, बल्कि गुणवत्ता भी सुधरेगी और बाजार में अच्छी कीमत मिलेगी।

4. गांव स्तर पर प्रोसेसिंग और मार्केटिंग को मजबूत करें:- कोको किसानों को उनकी उपज का सही दाम तभी मिलेगा जब प्रोसेसिंग और मार्केटिंग सिस्टम मज़बूत होगा। इसके लिए गांव स्तर पर कोको बीन्स के किण्वन और सुखाने की यूनिट्स बनाई जानी चाहिए। साथ ही, महिला स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups (SHGs)) और ग्रामीण युवाओं को इसमें शामिल करना जरूरी है। उच्च गुणवत्ता वाले कोको उत्पादों के लिए विशेष मार्केट यार्ड (Market Yard) और असेंबलिंग (Assembling) स्थान बनाए जाने चाहिए ताकि किसानों को उनकी मेहनत का सही मूल्य मिल सके।

5. किसानों को उन्नत तकनीक से जोड़ें:- कोको की खेती को अधिक लाभदायक बनाने के लिए किसानों को उन्नत तकनीकों से जोड़ना होगा। उच्च गुणवत्ता वाली कोको किस्मों को अपनाने, सही तरीके से उर्वरकों के इस्तेमाल और आधुनिक खेती की ट्रेनिंग देने की ज़रुरत है। अगर कॉर्पोरेट कंपनियां, इस क्षेत्र में निवेश करें और किसानों के लिए प्रशिक्षण व वितरण नेटवर्क विकसित करें, तो कोको उत्पादन में बड़ा सुधार हो सकता है। अगर हम इन सभी बिंदुओं पर ध्यान दें, तो भारत में कोको उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक ले जाया जा सकता है। 

 

संदर्भ: 

https://tinyurl.com/274drfvr
https://tinyurl.com/29rfso3z
https://tinyurl.com/26dv9db9
https://tinyurl.com/245sgovg
https://tinyurl.com/2xtkcuv2

मुख्य चित्र: कोको बीन्स सुखाता एक व्यक्ति (Wikimedia) 

 

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