योग का सर्वोत्तम फल पाने के लिए, इसके नियमों से अवगत हों !

य़ातायात और व्यायाम व व्यायामशाला
25-03-2025 09:21 AM
योग का सर्वोत्तम फल पाने के लिए, इसके नियमों से अवगत हों !

कई शोध, यह प्रमाणित करते हैं कि, योग हमारे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। यही कारण है कि, पिछले कुछ वर्षों में, इंटरनेट और प्रौद्योगिकी के विकास के साथ, मेरठ वासियों की भी योग में रूचि बढ़ रही है। क्या आप जानते हैं कि, योग और 'नियम' के बीच गहरा संबंध है! नियम उन सकारात्मक आदतों या कर्तव्य को कहा जाता है, जो योग और धर्म में सुझाए गए हैं। इनका उद्देश्य, लोगों को स्वस्थ जीवन जीने, आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने और मुक्त अवस्था तक पहुँचने में मदद करना होता है। इसलिए, आज के इस लेख में, हम इन नियमों के बारे में विस्तार से जानेंगे। खासतौर पर, हम योग के पाँच नियमों (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान) पर चर्चा करेंगे। इसकी क्रम में, हम इनके अर्थ और महत्व को समझेंगे। इसके बाद, हम यह भी जानेंगे कि, इन पाँच नियमों को अपने दैनिक जीवन में कैसे लागू किया जा सकता है। अंत में, हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि, योग के 8 अंगों का अभ्यास हमारे जीवन में क्यों ज़रूरी है।

नियम का क्या अर्थ है?

'नियम' एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ 'योग दर्शन और शिक्षा द्वारा सुझाए गए कर्तव्य या पालन' होता है। ये कर्तव्य, योग के मार्ग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पतंजलि के योग सूत्र में नियमों को योग के दूसरे अंग के रूप में प्रस्तुत किया गया है। नियम योग के नैतिक नियमों को व्यक्ति के मन, शरीर और आत्मा पर लागू करने का तरीका हैं। इनसे व्यक्ति के भीतर एक सकारात्मक वातावरण बनाने में मदद मिलती है। नियमों का अभ्यास एक योगी को आंतरिक शक्ति, स्पष्टता और अनुशासन प्रदान करता है। ये गुण उसकी आध्यात्मिक यात्रा में प्रगति करने के लिए बहुत ज़रूरी होते हैं।

सप्तऋषि | Source : Wikimedia

योग के 5 नियमों को निम्नवत दिया गया है:

1. शौच (स्वच्छता): शौच का अर्थ है ‘स्वच्छता’, लेकिन, यह केवल शारीरिक सफ़ाई तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य, हमारे मन, विचार और आदतों की स्वच्छता पर भी ध्यान देना है। शौच की आदत डालने से, हमें यह समझने में मदद मिलती है कि कौन-सी आदतें हमारे जीवन में उपयोगी नहीं हैं। जब तक हम अपनी नकारात्मकता और 'अशुद्धियों' को दूर नहीं करेंगे, तब तक योग का अभ्यास कठिन हो सकता है। इसलिए, शौच हमें आंतरिक और बाहरी स्वच्छता बनाए रखने की सीख देता है।

2. संतोष (संतुष्टि): संतोष का अर्थ, संतुष्टि होता है, लेकिन इसे प्राप्त करना आसान नहीं है। हम अक्सर सोचते हैं, "मैं तब खुश होऊंगा जब यह होगा" या "अगर यह मिल जाए तो।" लेकिन संतोष हमें सिखाता है कि वर्तमान में जो हमारे पास है, उसे स्वीकार करें और उसकी सराहना करें। जब हम संतोष का अभ्यास करते हैं, तो हमारे मन की बेचैनी कम होती है। इससे हम अपने जीवन में सहजता और संतुष्टि के साथ आगे बढ़ सकते हैं।

3. तपस (अनुशासन): तपस का अर्थ, अनुशासन और भीतर से उत्साह का विकास होता है। यह नियम, हमें आत्म-अनुशासन और जुनून को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित करता है। तपस का अर्थ, हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है, लेकिन, इसका मूल उद्देश्य एक ही है:- हमारे अंदर छिपे साहस और उद्देश्य की भावना को जगाना। यह हमें, अपने लक्ष्य की ओर दृढ़ता से बढ़ने की शक्ति देता है।

4. स्वाध्याय (स्व-अध्ययन): स्वाध्याय का मतलब है, स्वयं का अध्ययन। पतंजलि ने कहा है, "स्वयं का अध्ययन करो और दिव्यता को खोजो।" इसका अभ्यास हमें आत्म-चिंतन और खुद को समझने की कला सिखाता है। इससे, हमें यह पहचानने में मदद मिलती है कि, कौन-सी चीज़ें हमारे लिए हानिकारक हैं और कौन-सी हमारे लिए फ़ायदेमंद। स्वाध्याय हमें जीवन के बारे में सीखने और अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है।

5. ईश्वर प्रणिधान (उच्च शक्ति के प्रति समर्पण): ईश्वर प्रणिधान का अर्थ है ईश्वर या किसी उच्च शक्ति के प्रति समर्पण। इसका उद्देश्य अपनी अपेक्षाओं को छोड़कर जीवन को पूरी तरह से जीना होता है। हमें अपनी ओर से पूरी कोशिश करनी चाहिए, प्रामाणिक रहना चाहिए, लेकिन परिणाम के बारे में चिंता नहीं करनी चाहिए। ईश्वर प्रणिधान का अभ्यास हमारे तनाव और चिंता को कम करता है। इससे हम अपने दैनिक जीवन में अधिक सशक्त और शांत महसूस करते हैं।

Source : Rawpixel

 योग के पाँच नियमों का अपने दैनिक जीवन में कैसे अभ्यास करें?

योग को केवल एक शारीरिक व्यायाम के रूप में देखना सही नहीं है। यह जीवन जीने का एक संपूर्ण तरीका है। योग के पाँच नियमों को अपनाकर हम अपने जीवन को संतुलित, शांतिपूर्ण और आनंदमय बना सकते हैं। आइए, इन पाँच नियमों को समझें और इन्हें मैट (योग अभ्यास) पर और अपने जीवन में कैसे लागू करें।

1. शौच (स्वच्छता)

मैट पर:

  • योग अभ्यास शुरू करने से पहले अपने मन को मौन ध्यान के माध्यम से शांत करें।
  • शवासन करते समय गहरी शांति अनुभव करने की कोशिश करें।
  • हर अभ्यास के पहले और बाद में अपनी योग चटाई साफ रखें।

मैट से बाहर:

  1. रोज़ नहाने और हाथ धोने की आदत डालें।
  2. ऐसा खाना पकाएँ, जो न केवल शरीर को बल्कि मन को भी सुखद लगे।

2. संतोष (संतुष्टि)

मैट पर:

  • बाहरी शोर, जैसे निर्माण के शोर को नज़रअंदाज़ करें और अपने ध्यान को स्थिर रखें।
  • कठिन योगासन करते समय शांति बनाए रखें।
  • अपनी सीमाओं को समझें और उन्हें स्वीकार करें।

मैट से बाहर:

  1. जो कुछ भी आपके पास है, उसमें संतुष्ट रहना सीखें।
  2. दूसरों के नाटकीय जीवन या समस्याओं में उलझने से बचें।

3. तपस (संयम और अनुशासन)

मैट पर:

  • कठिन योग मुद्रा को थोड़ी देर तक बनाए रखने की कोशिश करें, बशर्ते यह दर्द न करे।
  • किसी नए कौशल पर काम करें और इसे पूरा करने के लिए दृढ़ संकल्पित रहें।
  • हर अभ्यास से पहले एक संकल्प लें और उसे पूरा करने का प्रयास करें।

मैट से बाहर:

  1. उन मुश्किल बातचीतों को करें जो आपके विकास में सहायक हो सकती हैं। (लेकिन यदि यह केवल नकारात्मकता या बहस है, तो इसे छोड़ दें।)
  2. कठिन कामों को तुरंत पूरा करें, ताकि आप अपनी ऊर्जा, सकारात्मक और सुखद कार्यों में लगा सकें।

4. स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)

मैट पर:

  • अपने योग अभ्यास को रिकॉर्ड करें।
  • अभ्यास के दौरान अपने शरीर की ज़रूरतों को सुनें। ज़्यादा प्रयास की ज़रूरत कहाँ है और कहाँ पीछे हटने की आवश्यकता है, इसे समझें।

मैट से बाहर:

  1. खुद से सवाल करें कि, आप किन सिद्धांतों के लिए खड़े हैं। क्या आप अपने मूल्यों के अनुसार जी रहे हैं?
  2. यह जानें कि, आप अपनी ऊर्जा कहाँ और कैसे खर्च कर रहे हैं। क्या आप इसे किसी बेहतर उद्देश्य के लिए उपयोग कर सकते हैं?

5. ईश्वर प्रणिधान (समर्पण)

मैट पर:

  • अपना अभ्यास किसी ऐसे व्यक्ति या शक्ति को समर्पित करें, जिसे आप महत्वपूर्ण मानते हैं।
  • भक्ति की भावना जगाएँ। यह आपके विश्वास, विचार या किसी सुंदर दृष्टि के रूप में हो सकती है।

मैट से बाहर:

  1. किसी अच्छे उद्देश्य के लिए स्वेच्छा से काम करें, जो आपको आंतरिक संतोष दे।
  2. अपने व्यक्तिगत मार्गदर्शक सिद्धांतों की एक सूची बनाएँ और यह सोचें कि आप उनके माध्यम से अपना सर्वश्रेष्ठ कैसे बन सकते हैं।

योग का अभ्यास, केवल शरीर को मज़बूत करने के लिए नहीं, बल्कि मन और आत्मा को भी शुद्ध करने के लिए है। इन पाँच नियमों को अपनाकर आप अपने जीवन को बेहतर दिशा में ले जा सकते हैं। योग को अपने दैनिक जीवन में शामिल करें और इसके सकारात्मक प्रभावों को महसूस करें।

योग के आठ अंगों का अभ्यास क्यों करना चाहिए?

ऋषि पतंजलि ने योग सूत्र के दूसरे अध्याय में योग के आठ अंगों की महत्ता को समझाया है। सूत्र 2.28 में वे कहते हैं:

"योगाङ्गनुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरा विवेकख्यातेः।"

अर्थात, "योग के आठ अंगों के निरंतर अभ्यास से अशुद्धियाँ समाप्त हो जाती हैं और ज्ञान व विवेक का प्रकाश फैलता है।"

योग के आठ अंगों का अभ्यास, हमें अपने सच्चे स्वरूप को पहचानने में मदद करता है। जब हम इन अंगों को गहराई से अपनाते हैं, तो आंतरिक संघर्ष और द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं। हमारे भीतर का प्रकाश, जो हमारा असली स्वरूप है, प्रकट होने लगता है। जैसा कि गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी ने समझाया है, "योग के आठ अंग, एक कुर्सी के चार पैरों की तरह हैं। ये आपस में इस तरह जुड़े हुए हैं कि यदि आप एक को खींचेंगे, तो बाकी सभी अपने आप खिंचकर आ जाएँगे।"

Source : Wikimedia

यह तुलना समझने में मदद करती है कि, जब हम शरीर को विकसित करते हैं, तो यह समग्रता में विकसित होता है। जैसे शरीर के सभी अंग एक साथ बढ़ते हैं, वैसे ही योग के ये आठ अंग भी, एक साथ अभ्यास किए जाते हैं। यह चरणबद्ध प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक सामूहिक अनुभव है।

योग के आठ अंग, हमें शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से संतुलित करते हैं। जब हम इनका अभ्यास करते हैं, तो यह एक ऐसा अनमोल उपहार बन जाता है, जो हमें जीवन में शांति, संतुलन और आनंद प्रदान करता है। इसलिए, योग के आठ अंगों का अभ्यास न केवल हमारे जीवन को सरल और शुद्ध बनाता है, बल्कि हमें हमारे असली स्वरूप से जोड़ता है। यह अभ्यास, जीवन के हर पहलू में संतुलन लाता है।

 

संदर्भ 

https://tinyurl.com/27lxho2l

https://tinyurl.com/24p9yneg

https://tinyurl.com/2xlehd89

https://tinyurl.com/2yfjqybj

मुख्य चित्र : तांत्रिक योग के छह चक्रों का चित्रण (Wikimedia)

 

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