आधुनिक और प्राचीन निर्माण दर्शन का अतंर समझाते हैं, वाराणसी और साबरमती रिवरफ़्रंट !

नदियाँ
03-04-2025 09:15 AM
आधुनिक और प्राचीन निर्माण दर्शन का अतंर समझाते हैं, वाराणसी और साबरमती रिवरफ़्रंट !

हमारे पड़ोसी शहर वाराणसी का प्रसिद्ध रिवरफ़्रंट, गंगा नदी के किनारे बसा हुआ है। इसमें 88 घाट, ऐतिहासिक इमारतें और संकरी गलियाँ शामिल हैं। अलग-अलग समय पर बनाए गए इन घाटों से सीढ़ियों के ज़रिए नदी तक पंहुचा जाता है। 12वीं शताब्दी से ही यह क्षेत्र हिंदू धर्म के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है।

वाराणसी रिवरफ़्रंट को प्राचीन आवासीय संरचना का बेहतरीन उदाहरण माना जाता है। इसका विकास गंगा के पश्चिमी तट पर केंद्रित रहा, जिससे अनुष्ठानों के दौरान श्रद्धालु आसानी से पूर्व दिशा की ओर मुख कर सकते हैं। यह डिज़ाइन आधुनिक शहरी नियोजन से बिल्कुल अलग है, क्योंकि आजकल आमतौर पर नदियों के दोनों किनारों पर विकास किया जाता है। अहमदाबाद का साबरमती रिवरफ़्रंट इसका प्रमुख उदाहरण है।

साबरमती रिवरफ़्रंट परियोजना (Sabarmati Riverfront Project), गुजरात में साबरमती नदी के किनारे एक सुव्यवस्थित  वॉटरफ़्रंट विकसित करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। इस लेख में हम इन दोनों रिवरफ्रंट्स को समझने और उनकी तुलना करने की कोशिश करेंगे। सबसे पहले, हम वाराणसी के रिवरफ़्रंट के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को जानेंगे। फिर, हम वाराणसी के घाटों की स्थापत्य शैली पर नजर डालेंगे। इसके बाद, हम साबरमती रिवरफ़्रंट परियोजना की आवश्यकता को समझेंगे और यह जानेंगे कि इसने अहमदाबाद में बाढ़ नियंत्रण को कैसे बेहतर बनाया। अंत में, हम इस परियोजना के स्थानीय निवासियों पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों का भी विश्लेषण करेंगे।

आइए सबसे पहले यह समझते हैं कि वाराणसी रिवरफ़्रंट हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

हिंदू धर्म में गंगा नदी को देवी का स्वरूप और आत्मिक शुद्धि का स्रोत माना जाता है। वाराणसी के घाटों से सीधे गंगा तक पहुँचा जा सकता है, जहाँ भक्त स्नान, प्रार्थना और दाह संस्कार जैसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान करते हैं। ऐसी मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से पापों से मुक्ति मिलती है, जबकि इसके घाटों पर किए गए दाह संस्कार, आत्मा को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त करने में सहायक होते हैं। लेकिन ये घाट सिर्फ़ पत्थरों की बनी संरचनाएँ नहीं हैं। ये आस्था, श्रद्धा और आध्यात्मिकता के प्रतीक भी हैं। हर साल लाखों तीर्थयात्री और श्रद्धालु दुनिया भर से यहाँ आते हैं। यही वजह है कि इन घाटों को धार्मिक केंद्र होने के साथ-साथ सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

बनारस के घाट | चित्र स्रोत : wikimedia 

वाराणसी के घाटों की वास्तुकला में हिंदू और मुगल शैली का प्रभाव साफ़ देखा जा सकता है। यहाँ की पत्थर की सीढ़ियाँ, जिन्हें "घाट सीढ़ियाँ" कहा जाता है, सीधे गंगा तक जाती हैं। ये सीढ़ियाँ न केवल धार्मिक अनुष्ठानों बल्कि सामाजिक समारोहों को भी आसान बनाती हैं।

इन घाटों के निर्माण में बलुआ पत्थर, चूना पत्थर और संगमरमर जैसी मज़बूत सामग्रियों का उपयोग किया गया है। ऐसा इसलिए ताकि ये गंगा के जल स्तर में होने वाले मौसमी बदलावों को सहन कर सकें। घाटों की संरचनाओं पर की गई बारीक नक्काशी, गुंबददार मंडप और देवी-देवताओं की मूर्तियाँ इनके सौंदर्य और आध्यात्मिक आकर्षण को और बढ़ा देती हैं।

वाराणसी के घाटों का डिज़ाइन आधुनिक शहरी नियोजन से बिल्कुल अलग है। आमतौर पर, नदियों के दोनों किनारों पर विकास किया जाता है, लेकिन वाराणसी में ऐसा नहीं है। उदाहरण के तौर पर, साबरमती रिवरफ़्रंट को देख सकते हैं।

1990 के दशक के अंत तक, यह साफ़ हो चुका था कि शहरों के विकास को नए  नज़रिए से देखने की ज़रूरत है। इसी सोच ने साबरमती रिवरफ़्रंट विकास परियोजना की नींव रखी। इस परियोजना का नेतृत्व प्रसिद्ध वास्तुकार बिमल पटेल ने किया। उनकी सोच टिकाऊ और समावेशी शहरी विकास पर केंद्रित रही है।

साबरमती नदी और निर्माणाधीन सैरगाह |  चित्र स्रोत : wikimedia 

उन्होंने 11.25 किलोमीटर लंबे नदी किनारे को एक जीवंत सार्वजनिक स्थान में बदलने का लक्ष्य रखा। इस परियोजना का उद्देश्य पर्यावरण, समाज और बुनियादी ढांचे को एक साथ जोड़ना था। आज, साबरमती रिवरफ़्रंट सिर्फ़ एक नदी किनारा नहीं, बल्कि शहरी जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।

साबरमती रिवरफ़्रंट ने लोगों के जीवन को कैसे बदला ?

साबरमती रिवरफ़्रंट परियोजना से बाढ़ नियंत्रण में बड़ा सुधार हुआ। नदी की गहराई बढ़ाने और तटबंधों को मज़बूत करने से बाढ़ का खतरा काफी कम हुआ। पहले, हर साल शहर की लगभग 20% आबादी बाढ़ से प्रभावित होती थी, लेकिन अब यह समस्या  काफ़ी हद तक खत्म हो गई है।

इस परियोजना के तहत जैव विविधता को फिर से बहाल करने के प्रयास किए गए। साथ ही, अपशिष्ट जल उपचार प्रणाली के ज़रिए नदी के प्रदूषण को नियंत्रित किया गया। इससे न सिर्फ़ पर्यावरण सुधरा, बल्कि आसपास रहने वाले लोगों को भी स्वच्छ वातावरण मिला।

साबरमती रिवरफ़्रंट अब सिर्फ़ एक नदी का किनारा नहीं, बल्कि अहमदाबाद की पहचान बन चुका है। इस परियोजना के तहत 200 हेक्टेयर से ज़्यादा नए सार्वजनिक स्थल बनाए गए। पैदल पथ, पार्क और सांस्कृतिक केंद्रों के निर्माण से शहरवासियों के लिए एक नया सामाजिक और मनोरंजन केंद्र विकसित हुआ। 8 मिलियन से अधिक की आबादी वाले इस शहर में अब लोग अधिक से अधिक समय बाहर बिताने लगे हैं, जिससे सामुदायिक मेलजोल भी बढ़ा है।

17 सितंबर 2014 को साबरमती रिवरफ्रंट पर चीनी नेता शी जिनपिंग | चित्र स्रोत : wikimedia

साबरमती रिवरफ़्रंट एक स्याह पहलू भी है, जिसके बारे में पता होना बहुत ज़रूरी है:

 हज़ारों झुग्गीवासियों का विस्थापन: 9 नवंबर 2011 को इस परियोजना के तहत विस्थापन की प्रक्रिया शुरू हुई। उस समय, नदी के दोनों किनारों पर करीब 1,20,000 झुग्गियाँ थीं। सरकार ने इनमें से कुछ परिवारों को शहर की सीमा के भीतर 10,000 नए घर दिए। करीब 1,500 परिवारों को अस्थायी आवास में भेज दिया गया। लेकिन हजारों ऐसे भी थे जिन्हें कोई घर नहीं मिला।

जून 2015 में अहमदाबाद में साबरमती रिवरफ़्रंट का विहंगम दृश्य | चित्र स्रोत : wikimedia 

इस परियोजना के तहत, झुग्गीवासियों के पुनर्वास का वादा किया गया था। लेकिन जिन लोगों को नए फ्लैट नहीं मिले, उन्हें गणेशनगर नामक इलाके में भेज दिया गया। यह इलाका साफ़-सफ़ाईके मामले में बेहद बदहाल है। वहाँ के लोग गंदगी से घिरे कच्चे घरों में रहने को मजबूर हैं। पानी और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी नदारद हैं।

गणेशनगर एक डंपिंग साइट के बेहद करीब है। यहाँ पूरे इलाके में हमेशा कचरे की बदबू फैली रहती है। साफ़-सफ़ाई की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं होने के कारण लोगों के लिए जीवन कठिन हो गया है।

विकास के नाम पर इन परिवारों को बेहतर जिंदगी देने का वादा किया गया था, लेकिन हकीकत में उन्हें और बदतर हालात में धकेल दिया गया। आज भी वे मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं और अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।

 

संदर्भ: 

https://tinyurl.com/2bxotq7r
https://tinyurl.com/2452meuf
https://tinyurl.com/28amsz33

मुख्य चित्र: रात में साबरमती रिवरफ़्रंट का दृश्य (Wikimedia) 

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