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ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
भावार्थ: हम भगवान शिव की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो सुगंधित हैं और हमारा पोषण करते हैं। जैसे फल शाखा के बंधन से मुक्त हो जाता है, वैसे ही हम भी मृत्यु और नश्वरता से मुक्त हो जाएं।
जौनपुर के नागरिक, इस बात से सहमत होंगे कि हमारे शहर में महाशिवरात्रि का पर्व, बड़ी ही श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। खासकर बदलापुर डिवीजन के प्रसिद्ध "गौरी शंकर धाम" जैसे शिव मंदिरों में, इस अवसर पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। लोग शिवलिंग पर जलाभिषेक करने के लिए एकत्रित होते हैं, पूरी रात उपवास रखते हैं और विशेष प्रार्थनाएँ करते हैं। साथ ही, यहाँ के शिव मंदिरों में धार्मिक मंत्रों का जाप होता है, तथा पूरे परिसर को भव्य रूप से सजाया जाता है।
भगवान शिव, हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक हैं। उन्हें सृजन, विनाश और पुनर्जन्म के चक्र का प्रतीक माना जाता है। उन्हें "महादेव" कहा जाता है, जिसका अर्थ ही "देवताओं के देवता" होता है। लेकिन क्या आपके दिमाग में भी महादेव की अनूठी वेशभूषा और श्रृंगार को लेकर जिज्ञासा पैदा हुई है? आज महाशिवरात्रि के इस पावन अवसर पर, हम भगवान शिव से जुड़े प्रतीकों के महत्व को समझने का प्रयास करेंगे। इस लेख में हम सबसे पहले, उनके मस्तक पर विराजमान अर्धचंद्र के महत्व को जानेंगे। इसके बाद हम, शिवलिंग के गूढ़ अर्थ को समझेंगे। फिर, शिव के अन्य आभूषणों और प्रतीकों जैसे उनकी तीसरी आँख, उनके गले में लिपटे नाग, उनका डमरू, नंदी और त्रिशूल के पीछे छिपे गहरे अर्थ को भी जानने का प्रयास करेंगे।
आइए, सबसे पहले जानते हैं कि भगवान शिव के सिर पर, अर्धचंद्र का महत्व क्या है ?
शिव तत्व वह स्थिति है, जहां दिमाग का अस्तित्व नहीं होता, जबकि चंद्रमा दिमाग का प्रतीक है। लेकिन जब दिमाग ही नहीं है, तो इसे कैसे व्यक्त किया जाए और कोई इसे कैसे समझे ? समझने, अनुभव और व्यक्त करने के लिए, दिमाग का थोड़ा अंश आवश्यक होता है। अनंत और निर्गुण चेतना को इस संसार में व्यक्त करने के लिए, दिमाग की थोड़ी मात्रा की ज़रुरत होती है। इसी कारण से भगवान शिव के सिर पर अर्धचंद्र दर्शाया जाता है। बुद्धि दिमाग से परे होती है, लेकिन उसे प्रकट करने के लिए, दिमाग के एक हल्के स्पर्श की आवश्यकता होती है। यही अर्धचंद्र का प्रतीकात्मक महत्व है। यह दर्शाता है कि शिव तत्व पूर्ण चेतना है, लेकिन उसे व्यक्त करने के लिए थोड़े से दिमाग की ज़रुरत पड़ती है।
शिवलिंग का महत्व क्या है ?
लिंगम का अर्थ ‘पहचान’ होता है, यानी एक ऐसा प्रतीक जिसके माध्यम से सत्य और वास्तविकता को पहचाना जा सकता है। जो प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखता, लेकिन फिर भी किसी विशेष चिह्न के माध्यम से पहचाना जाता है, वही लिंगम कहलाता है।
जब कोई बच्चा जन्म लेता है, तो हम यह कैसे पहचानते हैं कि वह लड़का है या लड़की ? शरीर के एक विशेष अंग से ही यह स्पष्ट हो जाता है। इसी कारण से जननांग को भी "लिंगम" कहा जाता है।
भगवान का कोई निश्चित रूप नहीं होता, इसलिए उन्हें पहचानने के लिए एक प्रतीक की आवश्यकता पड़ी। यह प्रतीक ऐसा होना चाहिए जो न केवल पुरुष और स्त्री दोनों को दर्शाए, बल्कि उनकी एकता को भी प्रकट करे। इसी संकल्पना के आधार पर शिवलिंग अस्तित्व में आया। शिवलिंग उस दिव्य सत्ता का प्रतीक है जो निराकार होते हुए भी संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। यह उस परम तत्व का चिन्ह है, जिसे किसी एक रूप में नहीं बांधा जा सकता, लेकिन जो सम्पूर्ण सृष्टि का मूल है।
आइए, अब भगवान् शिव के श्रृंगार में निहित तत्वों के गूढ़ अर्थ को समझने का प्रयास करते हैं!
1.) तीसरी आँख: भगवान् शिव को ‘त्रयम्बक’ कहा जाता है, क्योंकि उनकी एक तीसरी आँख भी है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उनके माथे से कोई आँख बाहर आ गई। इसका मूल अर्थ —अनुभूति का एक नया आयाम खुल जाना-- होता है। अगर हमें अपनी अनुभूति को बढ़ाना है, तो सबसे पहले अपनी ऊर्जा को विकसित करना होगा। योग का पूरा विज्ञान ही इसी एक विचार पर आधारित है। यह ऊर्जा को इस तरह परिष्कृत करता है कि अनुभूति तेज़ हो जाए और तीसरी आँख खुल सके।
2.) नंदी: नंदी प्रतीक्षा का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में प्रतीक्षा को एक महान गुण माना गया है। जो व्यक्ति, बस शांति से प्रतीक्षा करना जानता है, वह स्वाभाविक रूप से ध्यानमग्न हो जाता है। नंदी को कोई उम्मीद नहीं कि शिव कल बाहर आएंगे। वह न किसी आशा में है, न किसी अपेक्षा में। वह बस पूर्ण समर्पण के साथ प्रतीक्षा कर रहे हैं —हमेशा के लिए। यही गुण, सच्ची ग्रहणशीलता का सार है। मंदिरों में प्रवेश करने से पहले, हमें नंदी का यह गुण अपनाना चाहिए। न स्वर्ग जाने की इच्छा, न किसी चीज़ को पाने की चाह! शांति से बैठकर प्रतीक्षा करना, आत्मसाक्षात्कार की ओर पहला कदम है।
3.) गले में लिपटा सांप: सांप अहंकार का प्रतीक है। जब हम अपने अहंकार पर काबू पा लेते हैं, तो यह एक मूल्यवान आभूषण की भांति हमारी पहचान का हिस्सा बन जाता है। लेकिन अगर इसे नियंत्रित न किया जाए, तो यह विषैले सांप की तरह हमें नुकसान भी पहुँचा सकता है। शिव के गले में तीन बार लिपटा हुआ सांप, समय के तीन रूपों—भूत, वर्तमान और भविष्य—का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि, हम इन सभी अवस्थाओं से गुज़रते हैं।
4.) त्रिशूल: त्रिशूल, भगवान् शिव का शक्तिशाली हथियार है। इसके तीन नुकीले सिरे तीन महत्वपूर्ण शक्तियों—इच्छा, ज्ञान और क्रिया—का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब ये तीनों संतुलित होते हैं, तो जीवन में सफलता प्राप्त करना आसान हो जाता है। साथ ही, यह चेतना की तीन अवस्थाओं—जाग्रत, स्वप्न और गहरी नींद—का भी प्रतीक है, जिन्हें हर इंसान अनुभव करता है।
5.) प्रवाहित माँ गंगा: भगवान् शिव के सिर से बहने वाली गंगा, केवल एक नदी नहीं, बल्कि पवित्रता और जीवनदायिनी शक्ति का प्रतीक है। यह ऊर्जा, ज्ञान और शुद्धता के प्रवाह को दर्शाती है। ठीक वैसे ही जैसे गंगा अनवरत बहती रहती है, हमें भी अपने जीवन में प्रवाह बनाए रखना चाहिए और परिवर्तन को अपनाना चाहिए।
6.) डमरू: त्रिशूल से जुड़ा हुआ डमरू, ब्रह्मांडीय ध्वनि ऊर्जा का प्रतीक है। इसकी ध्वनि से बनने वाली तरंगें, मंत्रों और शब्दों की शक्ति को दर्शाती हैं। ये तरंगें, लय और कंपन के माध्यम से हमारे आसपास प्रभाव डालती हैं। इसका गहरा अर्थ यह है कि, जैसे ध्वनि तरंगें ऊर्जा को बढ़ाती हैं, वैसे ही हम भी अपने आंतरिक कंपन को ऊर्जावान बना सकते हैं।
संदर्भ
https://tinyurl.com/28ls4o7x
https://tinyurl.com/2a5he266
मुख्य चित्र स्रोत : Wikimedia
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