आइए जानें, समुद्र की तलहटी से खनिज निकालने की प्रक्रिया और इससे संबंधित चुनौतियों को

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आइए जानें, समुद्र की तलहटी से खनिज निकालने की प्रक्रिया और इससे संबंधित चुनौतियों को

लखनऊ के कुछ लोग, ‘डीप सी माइनिंग’ (गहरे समुद्र में खनन) के बारे में सुन चुके होंगे। यह एक प्रक्रिया है जिसमें समुद्र की गहराइयों से निकलने वाले खनिजों को निकाला जाता है। इनमें निकल, कोबाल्ट, तांबा, जस्ता, मैंगनीज़, चांदी और सोना जैसे खनिज शामिल होते हैं। इस खनन के लिए खास मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है, जो समुद्र की तलहटी से खनिज इकठ्ठा कर उन्हें जहाज़ तक पहुंचाती हैं।

 आज हम डीप सी माइनिंग को विस्तार से समझेंगे। सबसे पहले, हम जानेंगे कि यह प्रक्रिया अभी दुनिया में किस स्तर पर चल रही है और इसे नियंत्रित करने के लिए कौन से नियम बनाए गए हैं। इसके बाद, हम समझेंगे कि समुद्र की तलहटी से इन खनिजों को निकालने की पूरी प्रक्रिया कैसे होती है और इसमें किस तरह के उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है।

  फिर हम, इस खनन से होने वाले पर्यावरणीय और आर्थिक नुकसान पर चर्चा करेंगे। अंत में, हम उन पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों के बारे में जानेंगे जो ऊर्जा के स्रोत को बदलने में मदद कर सकते हैं।

डीप सी माइनिंग क्यों की जाती है ?

डीप सी माइनिंग का मतलब, समुद्र की गहराइयों से खनिज निकालना है। यह खनन मुख्य रूप से पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स (कई धातुओं से बने छोटे पत्थर) के लिए किया जाता है, जो समुद्र की तलहटी पर 4 से 6 किलोमीटर (2.5–3.7 मील) की गहराई में पाए जाते हैं। ये नोड्यूल्स (nodules), खासतौर पर एबिसल प्लेन नामक क्षेत्र में मिलते हैं।
 

आर ओ वी कील 6000 (ROV KIEL 6000) नामक एक कैमरे से ली गई क्लेरियन क्लिपरटन ज़ोन की एक तस्वीर | चित्र स्रोत : Wikimedia 

क्लैरियन-क्लिपरटन ज़ोन (Clarion-Clipperton Zone (CCZ)) में ही करीब 21 अरब मीट्रिक टन नोड्यूल्स मौजूद हैं, जिनमें तांबा, निकल और कोबाल्ट जैसे महत्त्वपूर्ण खनिज होते हैं। इन नोड्यूल्स का करीब 2.5% हिस्सा इन्हीं खनिजों से बना होता है। अनुमान लगाया गया है कि समुद्र की तलहटी में 120 मिलियन टन से अधिक कोबाल्ट मौजूद है, जो ज़मीन पर मिलने वाले भंडार से पांच गुना अधिक है।

डीप सी माइनिंग का मुख्य उद्देश्य, इन बहुमूल्य खनिजों को निकालकर औद्योगिक कामों में इस्तेमाल करना है, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरियों और अन्य आधुनिक तकनीकों के लिए ये खनिज बहुत ज़रूरी होते हैं।

डीप सी माइनिंग की वर्तमान स्थिति और इसका संचालन

वर्तमान में डीप सी माइनिंग को लेकर वैश्विक स्तर पर कई विवाद और चर्चाएँ चल रही हैं। यह खनन, मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्रों में किया जाता है, जहाँ किसी एक देश का अधिकार नहीं होता। इसकी निगरानी, संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (United Nations Convention on the Law of the Sea (UNCLOS)) के तहत 1994 में गठित इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी (International Seabed Authority (ISA)) द्वारा की जाती है।

 आई एस ए अब तक 30 से अधिक अनुबंध जारी कर चुकी है, जिससे लगभग 1.5 मिलियन वर्ग किलोमीटर समुद्री क्षेत्र में अन्वेषण की अनुमति दी गई है। हालांकि, डीप सी माइनिंग को लेकर वैश्विक नियम और नीतियाँ अभी पूरी तरह से विकसित नहीं हुई हैं। 2021 से आई एस ए पर दबाव बढ़ रहा है कि वह इस खनन के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश तैयार करे। 2023 में आई एस ए ने एक रोडमैप प्रकाशित किया, जिसमें 2025 तक इस पर ठोस नियम बनाने की योजना का उल्लेख किया गया है।

दूसरी ओर, कई देश और पर्यावरणविद इस खनन के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर चिंतित हैं। कुछ देश, जैसे कनाडा और न्यूज़ीलैंड, इस पर पूर्ण प्रतिबंध (moratorium) की मांग कर रहे हैं, जबकि कुछ, जैसे चिली और वनुआटु, इसे रोकने के लिए और शोध की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं। इसके अलावा, बड़ी कंपनियाँ और वित्तीय संस्थान भी इससे जुड़ी जोखिमों को देखते हुए सतर्क रुख अपना रही हैं।

 इस अनिश्चितता के बीच, डीप सी माइनिंग के भविष्य को लेकर बहस जारी है, और यह तय करना बाकी है कि इसे वैश्विक स्तर पर कैसे नियंत्रित किया जाएगा।

चित्र स्रोत : pexels

 डीप-सी माइनिंग के लिए कौन-कौन से उपकरण जरूरी हैं ?

1. उत्पादन सहायता पोत (Production Support Vessel)

उत्पादन सहायता पोत, जिसे पी एस वी (PSV) भी कहते हैं, गहरे समुद्र में धात्विक पत्थरों (पॉलीमेटेलिक नोड्यूल्स) को इकट्ठा करने, उठाने और संग्रहीत करने के लिए बनाया जाता है। यह आमतौर पर तेल और गैस उद्योग में इस्तेमाल होने वाले गहरे समुद्र के ड्रिलशिप से बदले हुए जहाज़ होते हैं।

 पी एस वी वह प्लेटफ़ॉर्म होता है, जिससे समुद्र के नीचे काम करने वाला कलेक्टर (Subsea Collector) संचालित किया जाता है। इस कलेक्टर को एक विशेष प्रणाली (Launch and Recovery System - LARS) की मदद से समुद्र की गहराई में उतारा जाता है। इसके अलावा, पी एस वी में एक ड्रिलिंग मशीन होती है, जिससे समुद्र की गहराई से धात्विक पत्थर निकालने के लिए एक विशेष पाइपलाइन (Riser Air Lift System - RALS) बनाई जाती है।

 इस पोत में डीज़ल इंजनों से चलने वाले जनरेटर लगे होते हैं, जो सभी उपकरणों को बिजली प्रदान करते हैं। इसमें एक डायनामिक पोज़िशनिंग सिस्टम (Dynamic Posiiton System) होता है, जिससे जहाज़ को एक जगह स्थिर रखा जा सकता है। जहाज़ में चालक दल के लिए रहने की सुविधा होती है, जिसमें एक बड़ा आवासीय क्षेत्र, नियंत्रण कक्ष (ब्रिज) और एक हेलिपैड भी शामिल होता है।

 पी एस वी के महत्वपूर्ण मापदंड

• बिस्तर: 120-200

• लंबाई: 200-260 मीटर

• चौड़ाई: 40-45 मीटर

• वजन: 50,000-70,000 टन

• क्षमता: 30,000-100,000 टन

 2. समुद्र के नीचे काम करने वाला कलेक्टर (Subsea Collector)

समुद्र में गहराई से धात्विक पत्थर (पॉलीमेटेलिक नोड्यूल्स) इकट्ठा करने के लिए एक विशेष मशीन होती है, जिसे “समुद्र के नीचे काम करने वाला कलेक्टर” या “खनन वाहन” (Harvester) कहा जाता है।

 प्रत्येक पी एस वी के पास एक या अधिक कलेक्टर होते हैं। ये कलेक्टर, पी एस वी द्वारा संचालित और नियंत्रित किए जाते हैं। इन्हें एक मोटे केबल (Umbilical Cable) के ज़रिए बिजली, संचार और नियंत्रण दिया जाता है।

 ये कलेक्टर, समुद्र की सतह से धीरे-धीरे समुद्र की गहराई में उतारे जाते हैं और अलग-अलग तकनीकों की मदद से समुद्र की तलहटी से धात्विक पत्थर इकट्ठा करते हैं। इनमें हाइड्रोलिक उपकरण, यांत्रिक सिस्टम, या रोबोटिक भुजाएँ लगी हो सकती हैं। ये उपकरण, समुद्र की सतह पर वापस आने के लिए आमतौर पर कैटरपिलर ट्रैक (Caterpillar Tracks) का इस्तेमाल करते हैं।

 3. राइज़र एयर लिफ़्ट सिस्टम (Riser Air Lift System - RALS)

समुद्र की गहराई से पॉलीमेटेलिक नोड्यूल्स को सतह तक लाने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए जाते हैं। इनमें सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली तकनीक राइज़र एयर लिफ़्ट सिस्टम होती है।

 इस प्रणाली के ज़रिए, कलेक्टर द्वारा इकट्ठा किए गए पत्थर समुद्र की 4000-5000 मीटर गहराई से उठाकर पी एस वी तक लाए जाते हैं। पी एस वी से हवा को पाइपलाइन के माध्यम से समुद्र की गहराई में भेजा जाता है। यह हवा पानी और पॉलीमेटेलिक नोड्यूल्स के मिश्रण में मिलती है, जिससे पानी की घनत्व कम हो जाती है और पत्थर ऊपर की ओर बढ़ने लगते हैं।

 यदि पर्याप्त हवा डाली जाए, तो इस प्रणाली के अंदर का दबाव समुद्र के बाहरी पानी के दबाव से कम हो जाता है, जिससे पानी नीचे से अंदर आता है और पत्थरों को ऊपर ले जाता है। जब पानी का प्रवाह इतना तेज़ हो जाता है कि पत्थर नीचे न गिर सकें, तब वे सीधे सतह तक पहुँच जाते हैं।

 4. सतह पर अलगाव प्रणाली (Surface Separator Equipment)

जब पॉलीमेटेलिक नोड्यूल्स, सतह तक आ जाते हैं, तो उन्हें पानी और हवा से अलग किया जाता है। इसके लिए सेंट्रीफ़्यूगल सेपरेटर (Centrifugal Separators) और ड्रिलिंग शेकर्स (Drilling Shakers) नामक उपकरणों का उपयोग किया जाता है।

 

  • सेंट्रीफ़्यूगल सेपरेटर

इसमें पानी और धात्विक पत्थरों को अलग करने के लिए गोलाकार गति (Centrifugal Force) का उपयोग किया जाता है। भारी पत्थर बाहरी किनारे पर चले जाते हैं, जबकि हल्का पानी बीच में रहता है।

 

  • ड्रिलिंग शेकर्स

यह एक विशेष प्रकार का स्क्रीन होता है, जो कंपन (Vibration) करके पानी और पत्थरों को अलग करती है। पत्थर स्क्रीन के ऊपर रह जाते हैं और पानी नीचे गिर जाता है।

 इसके बाद, धात्विक पत्थरों को पी एस वी के भंडारण हिस्से में भेज दिया जाता है और बचा हुआ पानी वापस समुद्र में लौटा दिया जाता है, ताकि पर्यावरण पर कम से कम प्रभाव पड़े।

गहरे समुद्र तल पर मैंगनीज़ नोड्यूल्स (manganese nodules) के खनन का एक रेखाचित्र  | चित्र स्रोत : Wikimedia 

गहरे समंदर में खनन के नकारात्मक पारिस्थितिक और आर्थिक प्रभाव

1.) समुद्री जीवों को सीधा नुकसान: भारी खनन मशीनों के सीधा संपर्क में आने से गहरे समुद्र में रहने वाले धीमी गति वाले जीव मर सकते हैं। इसके अलावा, ये मशीनें, समुद्र तल से गाद (कीचड़) उड़ाकर जीवों को ढक सकती हैं, जिससे वे सांस नहीं ले पाएंगे और मर सकते हैं। खनन से निकलने वाला गर्म अपशिष्ट पानी भी समुद्री जीवों के लिए ज़हरीला हो सकता है और उन्हें नुकसान पहुँचा सकता है।

चित्र स्रोत : Wikimedia

2.) प्रजातियों और पर्यावरण का दीर्घकालिक नुकसान: खनन गतिविधियों से गहरे समुद्र के जीवों के खाने और प्रजनन में बाधा आ सकती है। समुद्र की गहराइयों में अंधेरा और शांति होती है, लेकिन खनन के दौरान, तेज़ रोशनी और शोर के कारण, यह संतुलन बिगड़ सकता है। खासतौर पर तेज़ आवाज़ व्हेल जैसे विशाल जीवों को नुकसान पहुँचा सकती है, जो पहले से ही जलवायु परिवर्तन और अन्य मानवीय गतिविधियों से प्रभावित हैं।

 3.) मछली पकड़ने और खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव: खनन जहाज़ों से निकलने वाला अपशिष्ट पानी समुद्र में दूर-दूर तक फैल सकता है, जिससे खुले समुद्र में रहने वाली मछलियाँ और अन्य जीव प्रभावित हो सकते हैं। इनमें ट्यूना मछली जैसी प्रजातियाँ भी शामिल हैं, जो कई छोटे द्वीप देशों की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, जैसे कि किरिबाती, वानुआतु और मार्शल द्वीप।

 4.) आर्थिक और सामाजिक खतरे: भले ही खनन समुद्र में किया जाएगा, लेकिन इसके लिए तटों पर विशेष सुविधाओं की ज़रूरत होगी, जहाँ निकाले गए पदार्थों को प्रोसेस या भेजा जा सके। इसके लिए ज़मीन अधिग्रहण और निर्माण कार्य करना होगा, जिससे तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों और समुद्री जीवों पर बुरा असर पड़ेगा।

 5.) जलवायु पर संभावित प्रभाव: महासागर दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन सिंक (कार्बन अवशोषण क्षेत्र) है, जो लगभग 25% कार्बन डाइऑक्साइड (Carbon dioxide) को अवशोषित करता है। समुद्र में मौजूद सूक्ष्मजीव इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे कार्बन गहरे समुद्र में जमा होता है और मीथेन जैसी हानिकारक गैसों का उत्सर्जन कम होता है। लेकिन गहरे समुद्र में खनन करने से जैव विविधता कम हो सकती है, जिससे महासागर के कार्बन चक्र पर बुरा असर पड़ेगा और वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने की इसकी क्षमता घट सकती है।

ऊर्जा परिवर्तन के लिए गहरे समुद्र खनन के विकल्प:

1.) अब अधिक से अधिक शहरों में यह देखा जा रहा है कि कम निजी कारों का उपयोग, चाहे वह इलेक्ट्रिक हो या नहीं, से बहुत लाभ हो रहा है। सार्वजनिक परिवहन, चलना, साइकिल चलाना और साझा यात्रा करने से शहर अधिक किफ़ायती, स्वच्छ, सुरक्षित और स्वस्थ बनते हैं। इससे बैटरी धातुओं की मांग कम होगी।

2.) अब कार कंपनियाँ नई इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी का उपयोग कर रही हैं, जिसमें कोबाल्ट और निकल नहीं होते – ये दोनों धातुएं गहरे समुद्र खनन द्वारा निकाली जाने वाली धातुएं हैं। वे छोटे, अधिक प्रभावी कारें भी बना सकती हैं जिनमें छोटी बैटरियाँ हों।

3.) बैटरी सामग्री की पुनर्प्राप्ति और पुनर्चक्रण को सुधारना (जैसा कि यूरोपीय संघ ने एक नए कानून में अनिवार्य किया है) का मतलब है कि नई खनन की आवश्यकता कम होगी।

 

संदर्भ

https://tinyurl.com/3pdk9bwb 

https://tinyurl.com/yckh2tdt 

https://tinyurl.com/mww5ew3j 

https://tinyurl.com/58crvxve 

https://tinyurl.com/2p9k7wvh 

मुख्य चित्र: डीप सी माइनिंग (Deep Sea Mining) : Wikimedia

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