जौनपुर आइए समझते हैं, किन चुनौतियों को साधने से गज़ब का मुनाफ़ा दे सकती है, कोको की खेती

स्वाद- खाद्य का इतिहास
28-03-2025 09:16 AM
जौनपुर आइए समझते हैं, किन चुनौतियों को साधने से गज़ब का मुनाफ़ा दे सकती है, कोको की खेती

हाल ही में पूरी दुनिया ने वैलेंटाइन डे (14 फ़रवरी) मनाया। लेकिन भारत में इससे तीन दिन पहले, 9 फ़रवरी को चॉकलेट डे (Chocolate Day) के रूप में मनाया जाता है। यह दिन चॉकलेट प्रेमी के लिए खास होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दिन सिर्फ़ लोग ही नहीं, बल्कि चॉकलेट से जुड़े किसान और उद्योग भी ज़बरदस्त मुनाफ़ा कमाते हैं? चॉकलेट बनाने में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों की खेती और उत्पादन करने वालों को इसका सीधा फायदा मिलता है।

आश्चर्य की बात यह है कि 2023 में भारत का चॉकलेट बाज़ार करीब 3.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया था। और 2032 तक इसके 4.9 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। यह दिखाता है कि चॉकलेट अब सिर्फ़ एक मिठाई नहीं, बल्कि हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस कोको (Cocoa) से चॉकलेट बनती है, उसकी खेती उत्तर प्रदेश या उत्तर भारत के किसी भी राज्य में क्यों नहीं होती? आखिर ऐसा क्या कारण है कि उत्तर भारतीय किसान कोको की खेती से दूरी बनाए रखते हैं?

आज हम इसी सवाल का जवाब तलाशेंगे। हम समझेंगे कि कोको की खेती के लिए कैसी मिट्टी और जलवायु ज़रूरी होती है। फिर जानेंगे कि भारत में कोको की कौन-कौन सी किस्में उगाई जाती हैं और उनकी खासियतें क्या हैं। इसके अलावा, भारत में कोको खेती के तरीकों और उससे जुड़ी चुनौतियों को भी जानेंगे। और आखिर में, कोको की खेती से जुड़ा अर्थशास्त्र भी समझेंगे।

अफ़्रीका में कटाई के दौरान कोको उगाने वाले किसान | चित्र स्रोत : Wikimedia

आइए सबसे पहले जानते हैं कि उत्तर भारतीय किसान, कोको की खेती क्यों नहीं करते?

कोको (Cocoa) एक प्रकार का प्राकृतिक उत्पाद है, जिससे चॉकलेट, कोको पाउडर और चॉकलेट से जुड़े कई अन्य उत्पाद बनाए जाते हैं। यह कोकोआ (Cacao) नाम के पेड़ के बीजों से प्राप्त होता है, जिसे वैज्ञानिक रूप से थियोब्रोमा काकाओ (Theobroma cacao) कहा जाता है। यह पेड़ मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय (tropical) जलवायु वाले क्षेत्रों में उगता है, जहां गर्मी और नमी अधिक होती है। भारत में कोको की खेती ज़्यादा तर दक्षिणी राज्यों में होती है। आंध्र प्रदेश और केरल इस खेती के प्रमुख केंद्र हैं, जबकि तमिलनाडु और कर्नाटक के किसान भी धीरे-धीरे इसे अपना रहे हैं। लेकिन उत्तर भारतीय किसान कोको की खेती से दूरी बनाए रखते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यहाँ का मौसम और तापमान है।

दरअसल कोको की खेती के लिए एक खास जलवायु की जरूरत होती है। इसके लिए इष्टतम तापमान 20 से 35 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिए। साल में कम से कम 1500-2000 मिमी (mm) बारिश ज़रूरी होती है, और सिर्फ़ 2 महीने का सूखा मौसम होना चाहिए। अब अगर उत्तर भारत की बात करें, तो यहां सर्दियों में तापमान 20 डिग्री से नीचे चला जाता है और गर्मियों में 40 डिग्री से ऊपर पहुंच जाता है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में कोको की खेती मुश्किल हो जाती है।

ग्रीनहाउस में कोको उत्पादन | चित्र स्रोत : Wikimedia

क्या ग्रीनहाउस में कोको उगाया जा सकता है?

तकनीकी रूप से हां, लेकिन व्यावहारिक रूप से नहीं। ग्रीनहाउस में (Greenhouse) कोको उगाने का खर्च बहुत ज़्यादा होगा, जिससे किसान को फ़ायदा नहीं होगा। किसान हमेशा ऐसी फसलों की तलाश में रहते हैं, जिनमें कम मेहनत और ज़्यादा मुनाफ़ा हो। ग्रीनहाउस में कोको उगाना संभव तो है, लेकिन यह आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं है।

आइए सबसे पहले भारत में उगाई जाने वाली विभिन्न कोको किस्मों के बारे में जानते हैं: 

भारत में कोको की कई उन्नत किस्में उगाई जाती हैं, जो उत्पादन, स्वाद और गुणवत्ता के मामले में बेहद अनूठी होती हैं। 

यहां हम दो प्रमुख किस्मों (NC-45/53 और II-67 x NC-42/94) के बारे में जानेंगे।

1. NC-45/53: यह किस्म, नाइजीरियाई क्लोन (Nigerian clone) से विकसित की गई है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि यह जल्दी फल देती है और अधिक उत्पादन करती है। यह स्व-परागण और क्रॉस-परागण दोनों के लिए उपयुक्त है।

  •  फलों का रंग: कच्ची अवस्था में हरा और पकने के बाद पीला।

उत्पादन क्षमता:

  • प्रति पेड़ प्रति वर्ष लगभग 75 फलियाँ।
  • एक फली का औसत वज़न 321 ग्राम।
  • एक फली में लगभग 37 बीन्स।
  • एक सूखी फलियों का वज़न 1.05 ग्राम।
  • प्रति पेड़ औसत सूखी बीन्स की उपज 1.33 किलोग्राम/वर्ष।
  • अधिकतम संभावित उपज 2.5 किलोग्राम/वर्ष।
  • प्रति हेक्टेयर औसत उपज 911 किलोग्राम।

 गुणवत्ता:

  • बीन्स में वसा की मात्रा 52.5%।
  • छिलका प्रतिशत 12%।

अनुशंसित क्षेत्र:

यह किस्म मुख्य रूप से कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के सुपारी और नारियल के बागानों के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

2. II-67 x NC-42/94: यह किस्म मलेशियाई और नाइजीरियाई क्लोन के संकरण से विकसित हुई है। यह भी जल्दी फल देने वाली और भारी उत्पादन करने वाली किस्म है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कम पानी वाली जगहों पर भी अच्छी उपज देती है।

फलों का रंग: कच्ची अवस्था में लाल और पकने के बाद गुलाबी।

उत्पादन क्षमता:

  • प्रति पेड़ प्रति वर्ष लगभग 40 फलियाँ।
  • एक फली का औसत वज़न 429.5 ग्राम।
  • एक फली में लगभग 43 बीन्स।
  • एक सूखी फलियों का वज़न 1.01 ग्राम।
  • प्रति पेड़ औसत सूखी बीन्स की उपज 1.25 किलोग्राम/वर्ष।
  • प्रति हेक्टेयर औसत उपज 856 किलोग्राम।

गुणवत्ता:

  • बीन्स में वसा की मात्रा 45.95%।
  • छिलका प्रतिशत 12%।
  • स्टोमेटल प्रतिरोध 2.41 S/cm (जो इसे सूखे क्षेत्रों में अधिक सहनशील बनाता है)।

अनुशंसित क्षेत्र:

इस किस्म को कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और गोवा के वर्षा आधारित और सिंचित सुपारी व नारियल के बागानों के लिए उपयुक्त माना गया है।

कोको की खेती भारत में धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रही है, लेकिन अभी भी इस क्षेत्र से जुड़ी कई चुनौतियाँ हैं। 

चित्र स्रोत : Wikimedia

अगर सही तरीके अपनाए जाएँ, तो यह एक लाभदायक खेती बन सकती है। 

आइए इन तरीकों को आसान भाषा में समझते हैं।

1. उपयुक्त जलवायु और मिट्टी का चयन: कोको की खेती के लिए सही जलवायु और मिट्टी का चुनाव बहुत ज़रूरी है। भारत में इसे उष्णकटिबंधीय इलाकों में उगाया जाता है, जहाँ तापमान और नमी अनुकूल हो। कुछ खास प्रयोगशालाएँ और कृषि संस्थान किसानों को सही प्रशिक्षण और जानकारी देते हैं, ताकि वे इसे बेहतर तरीके से उगा सकें।

2. कृषि वानिकी और अंतर-फ़सल तकनीक: कोको को अकेले नहीं, बल्कि अन्य फसलों के साथ मिलाकर उगाया जाता है। इसे अंतर-फ़सल (Intercropping) कहा जाता है। इससे ज़मीन का बेहतर उपयोग होता है और मिट्टी की सेहत भी बनी रहती है। यह तरीका किसानों की आमदनी को भी बढ़ा सकता है, क्योंकि एक ही खेत में कई फ़सलें उगाई जा सकती हैं।

3. नमी और जल प्रबंधन: कोको के पौधों के लिए नमी बहुत ज़रूरी होती है। अगर बारिश कम होती है, तो सिंचाई की उचित व्यवस्था करनी पड़ती है। इसके अलावा, खेतों में जल निकासी का सही इंतज़ाम भी होना चाहिए, ताकि पानी ज़रूरत से ज़्यादा इकट्ठा न हो और जड़ों को नुकसान न पहुँचे।

4. कीट और रोग नियंत्रण: कोको की खेती में कीट और बीमारियों का खतरा बना रहता है। किसानों को इसके लिए जैविक और वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए। जैविक नियंत्रण में प्राकृतिक कीटनाशकों और मित्र कीटों का उपयोग किया जाता है, जबकि ज़रूरत पड़ने पर उचित मात्रा में रसायनों का भी सहारा लिया जाता है।

5. कटाई और कटाई के बाद की देखभाल: कोको की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए कटाई और उसके बाद की प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण होती है। कटाई के बाद कोको बीजों को किन्वन (Fermentation) और सुखाने (Drying) की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है। इससे उनके स्वाद और गुणवत्ता में सुधार होता है। अगर यह प्रक्रिया सही तरीके से न की जाए, तो कोको के बीज कमज़ोर गुणवत्ता के हो सकते हैं।

आइए अब जानते हैं कि भारत में कोको की खेती से जुड़ी क्या चुनौतियाँ हैं?

1. जागरूकता और तकनीकी जानकारी की कमी: कई किसान अभी भी कोको की खेती और कटाई के सही तरीकों से परिचित नहीं हैं। इसके लिए उन्हें आधुनिक तकनीकों और खेती के उन्नत तरीकों के बारे में जागरूक करना ज़रूरी है।

2. बाज़ार में उतार-चढ़ाव: कोको का वैश्विक बाज़ार बहुत अस्थिर है। कीमतों में बार-बार उतार-चढ़ाव होते रहते हैं, जिससे किसानों की आमदनी प्रभावित होती है। छोटे किसान इस जोखिम को झेलने में कठिनाई महसूस करते हैं।

3. जलवायु परिवर्तन का असर: जलवायु परिवर्तन का सीधा असर कोको की खेती पर पड़ रहा है। अनियमित बारिश, बढ़ता तापमान और बदलते मौसम के कारण उत्पादन और गुणवत्ता प्रभावित होती है। इससे किसानों के लिए खेती करना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। अगर आप चॉकलेट की खेती यानी कोको की खेती करना चाहते हैं, तो आपको सबसे पहले इसकी लागत और संभावित मुनाफ़े को समझना होगा।

कोको के सूखे बीज | चित्र स्रोत : Wikimedia

कोको की खेती में शुरुआती लागत कितनी आती है?

भारत में कोको की खेती शुरू करने के लिए लगभग ₹30,000 से ₹ 35,000 की लागत आती है। इस लागत में ज़मीन की जुताई, खाद, और पौधों की खरीद शामिल होती है। अगर आपके पास 1 से 2 एकड़ ज़मीन है, तो आप इससे अच्छा मुनाफ़ा कमा सकते हैं। 

कितना मुनाफ़ा हो सकता है?

अगर आप 1-2 एकड़ ज़मीन पर कोको उगाते हैं, तो हर साल ₹70,000 से ₹80,000 तक का मुनाफ़ा कमा सकते हैं। एक पेड़ से 300 से 400 किलोग्राम तक कोको बीन्स मिलते हैं, जिससे आपकी कमाई और भी बढ़ सकती है।

कोको की कीमतें कब ज़्यादा होती हैं?

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कोको की कीमतें समय-समय पर बदलती रहती हैं। जुलाई से अक्टूबर के बीच कीमत ₹160 प्रति किलोग्राम रहती है। फ़रवरी से जून के दौरान यह बढ़कर ₹200 से ₹210 प्रति किलोग्राम हो जाती है।

कितने पौधे लगाने होंगे?

अगर आपके पास 1-2 एकड़ ज़मीन है, तो आप 200 से 250 पौधे आराम से लगा सकते हैं। इन पौधों से निकला कोको सीधे चॉकलेट बनाने में इस्तेमाल होता है, जिसकी बाज़ार में ज़बरदस्त मांग रहती है।

बाफ़िया,कैमरून में कच्चे कोको के फलों की एक विक्रेता | चित्र स्रोत : Wikimedia

क्या कोको की खेती एक अच्छा बिज़नेस है?

बिल्कुल। चॉकलेट की मांग हमेशा बनी रहती है, इसलिए कोको की खेती एक फ़ायदे का सौदा हो सकती है। अगर आपके पास सही जानकारी और थोड़ी मेहनत करने का जज़्बा है, तो आप इस खेती को एक सफल बिज़नेस में बदल सकते हैं।

इसलिए अगर आप खेती से अच्छा मुनाफ़ा कमाना चाहते हैं और आर्थिक रूप से मज़बूत बनना चाहते हैं, तो कोको की खेती आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है। 

 

संदर्भ: 

https://tinyurl.com/2cope836
https://tinyurl.com/24ylfv5f
https://tinyurl.com/28rpvh6a
https://tinyurl.com/2894zgu7

मुख्य चित्र: कोको का फल (Wikimedia) 

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