मेरठ के शिव मंदिर: स्थापत्य और इतिहास

मेरठ

 14-02-2018 10:47 AM
वास्तुकला 2 कार्यालय व कार्यप्रणाली

मेरठ का अधिकांश स्थापत्य अंग्रेजों के काल का है जिसमे बहुतायता से चर्च, गिरिजाघर आदि हैं लेकिन इनके अलावा मेरठ में पुराने मंदिर भी हैं। मेरठ के गिरिजाघर तथा चर्च इंडो-सारसेनिक गोथिक-रिवाइवल स्थापत्य की धरती पर निर्माण किये गए हैं। मेरठ का संत जॉन गिरिजाघर और संत जोसेफ गिरिजाघर इस स्थापत्य कला के अप्रतिम नमूने हैं। मेरठ के इन गिरिजाघरों के साथ यहाँ के मंदिरों का स्थापत्य भी काफी रोचक है। इन मंदिरों के साथ मेरठ का गौरवशाली इतिहास जुड़ा हुआ है। मेरठ का औघड़नाथ मंदिर तथा श्री बिल्वेश्वर मंदिर धार्मिक तथा ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हैं। श्री औघड़नाथ मंदिर की स्थापना कब हुई उसके कोई निश्चित परिणाम उपलब्ध नहीं हैं लेकिन यह एक प्राचीन सिद्धपीठ माना जाता है। इस मंदिर को काली पल्टन मंदिर इस नाम से भी जाना जाता है क्यूंकि मेरठ के सन 1857 के क्रान्ति की शुरुवात यहीं से हुई थी जब ब्रिटिश सैन्य के भारतीय सैनिक जिनकी पल्टन को काली पल्टन कहा जाता था उन्होंने इस संग्राम कि आग़ाज़ की। इस मंदिर को हिन्दू शास्त्रों अनुसार स्थापित किया गया है। मेरठ के श्री बिल्वेश्वर मंदिर का स्थापत्य बहुत ही अलग तथा रोचक है। यह भी एक ऐतिहासिक सिद्धपीठ है मात्र इसका स्थापत्य एक किले के जैसा है। इसके चारो तरफ बड़ी ऊँची युग्मित या दोहरी दिवारें हैं। इन दो दीवारे की चौड़ाई के अनुसार इनके बीच में कमरे एवं कुठार बने हैं। इन चार दीवारों के बीचो बीच शिव का मंदिर है। यह मंदिर तीन विभागों में बांटा गया है। मध्यभाग तथा इसके एक तरफ और एक शिवलिंग है तथा दूसरी तरफ एक और मंदिर है। मध्य शिवलिंग के मंदिर के विभाग के एकदम सामने छोटे घर जैसे अलग मंदिर में नंदी की संगमरमर की मूर्ति है। मंदिर के सामने एक खुला मंडप है जिसे मंदिर जैसे इस्तेमाल किया जाता है। मंदिर की संपूर्ण बनावट बाहरी किले जैसी दीवारों से लेकर अंदरूनी मंदिरों एवं कमरों तक की, पेशवा-मराठा कालीन मालुम होती है। मंदिर के स्थापत्य पर पेशवा-मराठा कालीन प्रभाव दिखता है जिसमे थोड़े इस्लामी तत्त्व भी हैं खास कर उनके दरवाज़ों एवं घुमट का आकार जो महाराष्ट्र एवं कर्नाटक और थोड़ा बहुत मध्यप्रदेश के मंदिरों में भी दिखता है। मंदिर में अन्दर जाने के लिए झुक कर जाना पड़ता है क्यूंकि दरवाज़े की ऊंचाई बहुत ही कम है, तक़रीबन साड़ेचार-पांच फीट। मंदिर के दरवाज़े मेहराब के आकर में बने हुए हैं तथा तीनो विभागों में जाने के लिए भी इसी प्रकार के दरवाज़े हैं। मेरठ के स्थापत्य इतिहास का श्री बिल्वेश्वर मंदिर एक अहम हिस्सा है। चित्र 1: श्री बिल्वेश्वर मंदिर के दरवाज़े का है। चित्र 2: श्री बिल्वेश्वर मंदिर का है। चित्र 3: श्री बिल्वेश्वर मंदिर के युग्मित दीवारों के कमरों एवं कुठारों का है। चित्र 4: श्री बिल्वेश्वर मुख्य मंदिर के सामने वाले मंडप का है।



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