जिज्ञासु चीनी यात्री फ़ाहियान द्वारा किया गया भारत का वर्णन

मेरठ

 22-12-2021 03:34 PM
छोटे राज्य 300 ईस्वी से 1000 ईस्वी तक

बचपन से ही हम अपने देश के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास को पुस्तकों के माध्यम से पढ़ते और समझते आये हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की किताबों में दर्ज इस बहुमूल्य जानकारी का बड़ा हिस्सा हमें प्राचीन घुमक्कड़ (wanderer) और जिज्ञासु प्रवर्ति के लेखकों और भिक्षुओं से प्राप्त हुआ है। प्राचीन समय में कई ऐसे महान खानाबदोश व्यक्ति रहे हैं, जिन्होंने विभिन्न देशों में घूम-घूम कर वहां की संस्कृति और इतिहास का अवलोकन किया। इतना ही नहीं उन्होंने अपने द्वारा अर्जित ज्ञान को व्यर्थ जाने से बचाने के लिए दूसरे देशों की किताबों (पांडुलिपियों) को अपनी मूल भाषा में भी अनुवादित किया, जिस कारण आज तक कई महान साम्राज्यों और संस्कृतियों की गौरवगाथाएं संरक्षित रह पाई हैं। ज्ञान के भूखे और घुमक्कड़ किस्म के व्यक्तियों में चीनी यात्री ह्वेनसांग का जिक्र आमतौर पर किया जाता है। लेकिन उनके अलावा भी कई खानाबदोश भिक्षु अथवा यात्री रहे हैं, जिहोने दुनियाभर में घूमकर विभिन्न देशों का ज्ञान इकठ्ठा किया एवं उसे अगली पीढ़ी तक प्रेषित किया। जिज्ञासु प्रवर्ति के चीनी बौद्ध भिक्षु एवं लेखक फ़ाहियान भी ऐसे ही महान यात्रियों में से एक माने जाते हैं।
337 सीई में चीन में जन्मे बौद्ध भिक्षु फ़ाहियान या फ़ाशियान एक प्रसिद्द यात्री, लेखक एवं अनुवादक थे, जो AD 399 ईसवी से लेकर AD 412 ईसवी तक भारत, श्रीलंका और आधुनिक नेपाल में स्थित गौतम बुद्ध के जन्मस्थलकपिलवस्तु धर्मयात्रा पर आए। उनका यहां आने का उद्द्येश्य इन देशों और क्षेत्रों से बौद्ध ग्रन्थ एकत्रित करके उन्हें चीन ले जाना था। उन्होंने अपनी यात्रा का वर्णन करते हुए अपने वृत्तांत में लिखा की “उन्होंने बौद्ध अभ्यास-पुस्तकों की खोज में भारत और सीलोन की यात्रा की। उनकी यात्रा के दौरान भारत में गुप्त राजवंश के चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का काल चल रहा था और चीन में जिन राजवंश काल चल रहा था। उन्होंने 60 साल की उम्र में अपनी कठिन यात्रा शुरू करते हुए, 399 और 412 सीई के बीच मध्य, दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में पवित्र बौद्ध स्थलों का दौरा किया, जिस दौरान उन्होंने 10 साल भारत में बिताए। उन्होंने अपनी यात्रा का वर्णन अपने यात्रा वृतांत, बौद्ध साम्राज्यों का एक रिकॉर्ड फोगुओ जी ((Foguo-ji)) में किया है। उनके संस्मरण में भारत में प्रारंभिक बौद्ध धर्म के उल्लेखनीय स्वतंत्र रिकॉर्ड हैं। वह अपने साथ बड़ी संख्या में संस्कृत ग्रंथ ले गए, जिनके अनुवादों ने पूर्वी एशियाई बौद्ध धर्म को प्रभावित किया, और जो कई ऐतिहासिक नामों, घटनाओं, ग्रंथों और विचारों के लिए एक भिन्न नजरिया प्रदान करते हैं।
अपनी यात्रा की शुरुआत उन्होंने मध्य चीन में जियान से दक्षिणी सिल्क रोड पर पश्चिम की ओर से मध्य एशिया में यात्रा की और वहां के मठों, भिक्षुओं और शिवालयों का वर्णन किया। इसके बाद उन्होंने हिमालय के दर्रे को पार करते हुए भारत में प्रवेश किया और फिर दक्षिण में श्रीलंका और अंत में चीन वापस जाने से पहले, उन्होंने जावा वर्तमान इंडोनेशिया से अपनी यात्रा पूरी की। इस यात्रा में उन्हें 15 साल लगे।
25 साल की उम्र में फ़ाशियान ने भारत में बौद्ध परंपराओं के बारे में जानने और प्रामाणिक बौद्ध लेखन की खोज शुरू की। सुमात्रा, सीलोन, भारत और तिब्बत में उनकी यात्रा, एक सामान्य जिज्ञासा के साथ शुरू हुई। उन्होंने जितने भी बौद्ध पवित्र तीर्थस्थलों का दौरा किया, वे विशेष रूप से बुद्ध की उपस्थिति से जुड़े हुए थे। फ़ाशियान भारत की यात्रा करने वाले पहले और संभवतः सबसे पुराने चीनी भिक्षुओं में से एक थे।
गोबी रेगिस्तान, खोतान, पामीर, स्वात और गांधार के पहाड़ी इलाकों की कठिनाइयों और खतरों को पार करते हुए गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय (375-415) के शासनकाल के दौरान, फ़ाशियान, चीन से भारत में आए। उन्होंने पेशावर पहुंचकर, उत्तर और पश्चिम की पहाड़ियों में एक चक्कर लगाया, फिर पंजाब , मथुरा, संकश्य, कन्नौज, श्रावस्ती, कपिलवस्तु, कुशीनगर, वैसल, पाटलिपुत्र, काशी आदि स्थानों पर का भ्रमण किया। आखिर में उन्होंने ताम्रलिप्ति (तमलुक, मिदनापुर जिला) से सीलोन और जावा के लिए अपनी गृह यात्रा शुरू की। फ़ाशियान 60 वर्ष की उम्र में चीन से भारत आए एवं उन्होंने यहां के रीति-रिवाजों का अध्ययन करने और पवित्र बौद्ध ग्रंथों की नकल करने के लिए कई मठों में रुकते हुए गंगा के मैदान की यात्रा की। हालांकि अपनी इस धर्म खोजी यात्रा में उन्होंने हस्तिनापुर या मेरठ का वर्णन नहीं किया है, लेकिन उन्होंने उनके द्वारा उस समय के मथुरा, कन्नौज और मगध क्षेत्र का विस्तृत विवरण उल्लेखनीय है। अपनी भारत यात्रा वृतांत करते हुए उन्होंने लिखा की “इस देश के शहर और कस्बे [मगध] मध्य साम्राज्य [मथुरा से दक्कन] सबसे महान हैं।” यहाँ के निवासी धनी और समृद्ध हैं, और परोपकार और धार्मिकता के अभ्यास में एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। हर साल दूसरे महीने के आठवें दिन वे छवियों का जुलूस मनाते हैं।” वे सोने, चांदी, और लापीस लजुली के साथ देवों की आकृतियाँ बनाते हैं, जो भव्य रूप से मिश्रित होती हैं और उनके ऊपर रेशमी धाराएँ और छतरियाँ लटकी होती हैं। उनके पास गायक और कुशल संगीतकार हैं। वे फूल और धूप के साथ अपनी भक्ति करते हैं। ब्राह्मण आते हैं और बुद्धों को शहर में प्रवेश करने के लिए आमंत्रित करते हैं। वे रात भर दीपक जलाते रहते हैं, वे देश के सभी गरीब, निराश्रित, अनाथ, विधुर, और निःसंतान पुरुष, अपंग और अपंग, और वे सभी जो रोगी हैं, उनके घरों में जाते हैं, उन्हें हर तरह की मदद प्रदान की जाती है, और डॉक्टर उनकी बीमारियों की जांच करते हैं। और उन्हें सहज महसूस कराया जाता है। उन्होंने अपनी यात्राओं का एक लेखा-जोखा लिखा, जिसने आधुनिक विद्वानों को गुप्त साम्राज्य के शासन में अंतर्दृष्टि प्रदान की है।

संदर्भ
https://bit.ly/32q67aU
https://bit.ly/3mmWFw9
https://bit.ly/3J0M4jY
https://en.wikipedia.org/wiki/Faxian

चित्र संदर्भ   
1. फाहियान at Daishō-in मंदिर, Miyajima को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
2. मैरीटाइम एक्सपेरिमेंटल म्यूज़ियम और एक्वेरियम सिंगापुर में फाहियान मूर्ति को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
3. फाहियान की यात्रा विवरण विवरण को दर्शाता एक चित्रण (flickr)

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