हस्तिनापुर में पाई गई 2400 वर्ष पहले की जंग प्रतिरोधी ब्लेड

मेरठ

 24-05-2021 10:17 AM
द्रिश्य 3 कला व सौन्दर्य

जंगरोधी इस्पात को कई वातावरणों यानि वायुमंडल तथा कार्बनिक और अकार्बनिक अम्लों से खराब नहीं होने की अपनी संक्षारक प्रतिरोधी क्षमता के लिए जाना जाता है। इस्पात की सतह पर बहुत पतली (लगभग 5 नैनोमीटर (Nanometer) ऑक्साइड (Oxide) परत इस्पात के उपकरणों को जंग से बचाते हैं। हालांकि इस ऑक्साइड परत को निष्क्रिय परत के रूप में संदर्भित किया जाता है क्योंकि यह संक्षारक वातावरण की उपस्थिति में सतह को विद्युत रासायनिक रूप से निष्क्रिय कर देती है। वहीं जंगरोधी इस्पात में क्रोमियम (Chromium) मिलाने के कारण यह निष्क्रिय परत बनती है। निष्क्रिय परत बनने के लिए जंगरोधी इस्पात में कम से कम 10.5% क्रोमियम होना चाहिए। जितना अधिक क्रोमियम मिश्रित किया जाता है, निष्क्रिय परत उतनी ही स्थिर होती जाती है, और बेहतर संक्षारण प्रतिरोध होता है। जंगरोधी इस्पात में संक्षारक प्रतिरोध को बढ़ाने के लिए निकल (Nickel), मैंगनीज (Manganese) और मोलिब्डेनम (Molybdenum) जैसे अन्य तत्वों को जोड़ा जा सकता है।
जंगरोधी इस्पात का उपयोग आधुनिक युग में ही नहीं बल्कि प्राचीन काल से होता आ रहा है, जिसका प्रमाण हमें मेरठ के समीप बसे हुए एक प्राचीन पौराणिक शहर हस्तिनापुर पर हुए विभिन्न उत्खननों में कई पुरावशेष से मिलता है।इन तमाम पुरावशेषों में लोहे की प्राप्ति एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण खोज है। यहाँ पर पिघले हुए लोहे के कई टुकड़े चित्रित धुषरमृद्भांड के उपरी सतह से मिले हैं। मिले हुए भंडारण को हस्तिनापुर के द्वितीय काल का अवशेष माना जाता है।हस्तिनापुर से 1940 के दशक की शुरुआत में 2400 साल पुराने जंग प्रतिरोधी सिकल-ब्लेड (Sickle-blade) पाई गई थी। सिकल-ब्लेड की खोज महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य है जो कृषि कार्यों में लोहे की प्रभावी भूमिका को प्रदर्शित करता है।
2300 से अधिक वर्षों तक दबे होने के बावजूद, ब्लेड काफी अच्छी स्थिति में पाई गई। जिसने इसके निर्माण तकनीक और संक्षारण व्यवहार को निर्धारित करने के लिए विवश कर दिया और इस प्राचीन भारतीय लोहे के संक्षारण व्यवहार की जांच के लिए अध्ययन किये गए। जिससे कई विश्लेषण से संबंधित संस्कृति की उत्पादन तकनीक के बारे में बहुमूल्य जानकारी का पता चला।
सिकलब्लेड का विश्लेषण ऑप्टिकल माइक्रोस्कोपी (Optical microscopy), स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (Scanning electron microscopy) के साथ ऊर्जा फैलाव स्पेक्ट्रोस्कोपी (Spectroscopy), और एक्स-रे डिफ्रेक्टोमीटर (X-ray diffractometer) का उपयोग करके किया गया। विश्लेषण के परिणाम इस तथ्य की ओर ले जाते हैं कि सिकलब्लेड फेराइट (Ferrite), विडमैनस्टेटन (Widmanstatten) और पर्लाइट (Pearlite) संरचनाओं से युक्त विषम सूक्ष्म संरचना को दर्शाता है जो कि फुल्लिका भट्टी प्रक्रिया द्वारा उत्पादित प्राचीन भारतीय गढ़ा लोहे की विशिष्ट है। वहीं इस ब्लेड में फॉस्फोरस (Phosphorous) की अपेक्षाकृत उच्च मात्रा में पाई गई और ऐसा माना जा रहा है कि ये सिकलब्लेड के संक्षारण प्रतिरोध व्यवहार के लिए जिम्मेदार हो सकती है।दिल्ली के लोहे के स्तंभ सहित प्राचीन भारतीय लोहे पर पहले के अध्ययनों से भी उच्च फास्फोरस सामग्री (0.25% तक) की उपस्थिति का पता चला था।सिकलब्लेड के नमूने में फास्फोरस की मात्रा अधिक होने का एक संभावित कारण फास्फोरस युक्त अयस्क का उपयोग हो सकता है क्योंकि भारतीय लौह अयस्कP2O5 में अपेक्षाकृत समृद्ध हैं।वहीं यदि हम आलमगीरपुर की बात करें तो यहाँ से भी जो लोहे के अवशेष प्राप्त हुए हैं वे भी चित्रित धूसर मृद्भांड भंडार से ही मिले हैं। यहाँ से प्राप्त अवशेषों में तीर, भाला, कील, पिन आदि मिले हैं। आलमगीरपुर से मिले अवशेषों को आलमगीरपुर की द्वीतीय काल से सम्बंधित माना गया है।
हाल के वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण और युगांतरकारी खोजों में से एक चित्रित धूसरचीनी मिट्टी के मृद्भांड की थी।चित्रित धूसर मृद्भांड उत्तर भारत में पश्चिमी गंगा के मैदान और घग्घर हाकरा घाटी की एक लौह युगीन संस्कृति से सम्बंधित मृद्भांड है। वहीं चित्रित धूसरमृद्भांड संस्कृति पश्चिमी गंगा के मैदान और भारतीय उपमहाद्वीप में घग्गर-हकरा घाटी की लौह युग की भारतीय संस्कृति है, जो परंपरागत रूप से 1200 से 600-500 ईसा पूर्व की है,हालांकि नए प्रकाशनों ने 1500 से 700 ईसा पूर्व या 1300 से 500-300 ईसा पूर्व तक के समय का सुझाव दिया है। इस मृद्भांड परंपरा के साथ ही एक और परंपरा प्रफुल्लित हुई और उसको हम लाल और काली मिश्रित मृद्भांड परंपरा के नाम से जानते हैं। यह परंपरा पूर्वी गंगा मैदान में पायी जाती है। अभी तक करीब 1100 से अधिक चित्रित धूसर मृद्भांड से सम्बंधित पुरास्थल खोजे जा चुके हैं। ये काले रंग के ज्यामितीय चित्रों द्वारा सजाये हुए भूरे रंग के मृद्भांड होते हैं। इनको पालतू घोड़ों, हाथी दांत के कार्य और लौह संस्कृति के समकालीन का माना जाता है।
चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति मध्य और उत्तर वैदिक काल से मेल खाती है जिसे की जनपद युग के पहले और सिन्धु सभ्यता के बाद वाले समय को माना जाता है।जबकि गेरू रंगीन मिट्टी के बर्तनों की संस्कृति आम तौर पर 2000-1500 ईसा पूर्व की है।राजस्थान के जोधपुर के पास पाए जाने वाले विशिष्ट मिट्टी के बर्तन के प्रारंभिक नमूने तीसरी सहस्राब्दी से हैं।यह संस्कृति दूसरी सहस्राब्दी की शुरुआत में गंगा के मैदान में पहुंच गई। हाल ही में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में इसकी खुदाई में तांबे की कुल्हाड़ियों और मिट्टी के बर्तनों के कुछ टुकड़ों की खोज की।मिट्टी के बर्तनों में एक लाल पट्टी थी, लेकिन पुरातत्वविदों की उंगलियों पर यह एक गेरू रंग छोड़ रही थी, इसलिए इसका नामगेरू रंगीन मिट्टी पड़ा। इसे कभी-कभी काले रंग की पट्टियों और कटे हुए पैटर्न (Pattern) से सजाया जाता था। यह अक्सर तांबे के ढेर के साथ पाया जाता है, जो तांबे के हथियारों और अन्य कलाकृतियों जैसे मानववंशीय आंकड़ों के संयोजन हैं।

संदर्भ :-
https://bit.ly/3vkgAON
https://bit.ly/3f665sm
https://bit.ly/3oD2A00
https://bit.ly/3u0OV3O
https://bit.ly/3oAmGru

चित्र संदर्भ
1. हस्तिनापुर में पायी गयी 2400 साल पहले के जंग प्रतिरोधी ब्लेड का एक चित्रण (nopr.niscair.res.in)
2. जंग प्रतिरोधी ब्लेड का एक चित्रण (nopr.niscair.res.in)
3. धूसर चीनी मिट्टी के मृदभाण्ड का चित्रण एक (prarang)


RECENT POST

  • ऑनलाइन गेमिंग से पैसे की चमक कहीं जीवन भर का अंधकार न बन जाए
    हथियार व खिलौने

     27-09-2021 11:46 AM


  • तालाब या जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी है, वाटर फ्ली
    कीटाणु,एक कोशीय जीव,क्रोमिस्टा, व शैवाल

     26-09-2021 12:06 PM


  • डिजिटलीकरण की तीव्रता के साथ साइबर सुरक्षा और इसके नियमन की है अत्यधिक आवश्यकता
    संचार एवं संचार यन्त्र

     25-09-2021 10:16 AM


  • पौधों के विकास में सूक्ष्मजीवों की वही भूमिका है जो है स्वस्थ इंसानों में प्रोबायोटिक्स की
    कीटाणु,एक कोशीय जीव,क्रोमिस्टा, व शैवाल

     24-09-2021 09:11 AM


  • कैंसर का इतिहास व् उपचार, कैसे कम किया जाए कैंसर विकास के जोखिम को
    विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

     23-09-2021 11:08 AM


  • सिर ढकने के लिए छत ढूँढना कोई हर्मिट केकड़े से सीखे
    मछलियाँ व उभयचर

     22-09-2021 09:01 AM


  • जब कंपनी पेंटिंग ने आधुनिक कैमरा का काम किया
    द्रिश्य 3 कला व सौन्दर्य

     21-09-2021 09:42 AM


  • वृक्ष संरक्षण अधिनियम के उद्देश्य व अतिक्रमण से बचाव के उपाय
    पेड़, झाड़ियाँ, बेल व लतायें

     20-09-2021 09:26 AM


  • दुनिया की सबसे बड़ी अपतटीय तेल आपदा है, पाइपर अल्फा प्लेटफॉर्म में हुआ विस्फोट
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     19-09-2021 12:31 PM


  • मेरठ छावनियों में आज भी मौजूद हैं कुछ शुरुआती अंग्रेजी बंगले
    वास्तुकला 1 वाह्य भवन

     18-09-2021 10:18 AM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.

    login_user_id