औघड़नाथ मंदिर : अटूट आस्था और उत्कृष्ट नक्काशी का बेजोड़ नमूना।

मेरठ

 20-04-2021 11:49 AM
वास्तुकला 1 वाह्य भवन


भारत में अनेक ऐसे मंदिर हैं, जो किसी ऐतिहासिक घटना का साक्ष्य हैं। और इन्ही मंदिरों के बीच मेरठ में स्थित औघड़नाथ मंदिर भी है, जो की कुछ बेहद रोचक प्रसगों की वजह से पूरी दुनिया में विख्यात है। यह मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं से बढ़कर अपने ऐतिहासिक घटनाओं की वजह से लोकप्रिय है।
इतिहासकारों के अनुसार भारत की आज़ादी की नीवं मेरठ की इसी औघड़नाथ मंदिर को माना जाता है। इस मंदिर का वर्णन 1857 की क्रांति के परिपेक्ष्य में मिलता है। यहाँ भारतीय सेना के जवान जिन्हे “काली पल्टन” नाम से सम्बोधित करते थे, वे लोग पूजा-अर्चना और जलपान हेतु इस मंदिर में आते थे। जानकारों के अनुसार जब देश अंग्रेजी हुकूमत के अधीन था उस समय भारतीय सेना में जिस बंदूक का इस्तेमाल होता था, उस बन्दूक में प्रयोग किया जाने वाला कारतूस गाय की चर्बी से निर्मित होता था। जिसके खोल को मुंह से खोलना पड़ता था। एक बार सेना के कुछ जवान इस मंदिर से होकर निकले और उन्होंने पुजारी से पानी माँगा। परन्तु उन्होंने गाय की चर्बी का सन्दर्भ देते हुए सैनिकों को मंदिर परिसर से पानी देने से मना कर दिया। पुजारी की बात को सैनिक भी समझे और उन्हें भी इस बात का अहसास हुआ कि यह उचित नहीं हो रहा है। और घटना से प्रभावित होकर हुकूमत के खिलाफ पहली बार सेनिकों ने 10 मई 1857 को क्रांति का बिगुल बजा दिया। जानकारों के अनुसार जिस कुएं पर आकर सैनिक पानी पीते थे, वहां पर तत्कालीन मेजर जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा द्वारा स्थापित शहीद स्मारक पर पहली क्रांति का पूरा इतिहास वर्णित है। मंदिर के आस-पास का वातावण बेहद शांत और सुरक्षित प्रतीत होता था। जिस कारण उस समय अंग्रेज़ों ने यहाँ पर अपने सैन्य ठिकाने बनाये जहां पर बैठकें होती थी, और बड़े अंग्रेजी अधिकारी भी रात्रि में विश्राम करते थे। यहाँ भारतीय पलटनों से भी गुप्त चर्चाएं होती थी, ब्रिटिश काल में भारतीय सेना को "काली पलटन" के नाम से सम्बोधित किया जाता था, और यह मंदिर सैन्य ठिकानों के समीप भी था, जिस कारण इस मंदिर को "काली पलटन मंदिर" के नाम से भी जाना जाने लगा।
इस मंदिर के दर्शन हेतु का फाल्गुन और श्रावण महीना सबसे उचित माना गया है। क्यों की इस समय हिन्दू धर्म में शिवरात्रि, होली जैसे पावन पर्वों को मनाया जाता है। भगवान शिव के प्रति आस्था रखने वाले भक्तजन यहाँ साल के इन दिनों में पूरे देश भर से आते हैं, और शिव से प्रति अपने अगाध प्रेम और आस्था को व्यक्त करते हैं।
इस मंदिर की लोकप्रियता देश-व्याप्त हैं। मान्यताओं के अनुसार यहाँ पर स्थापित शिवलिंग को स्वयं-भू माना गया है। अर्थात यह शिवलिंग किसी के द्वारा स्थापित नहीं किया गया वरन स्वयं ही धरती से प्रकट हुआ। जिस पर एक लोटा जल, बेलपत्री, तथा खास तरह के पुष्प चढ़ाने पर भगवान शिव प्रसन्न होते हैं तथा उनका आशीर्वाद मिलता है। ऐसा माना जाता है मेरठ में स्थित इस मंदिर में मांगी गयी हर इच्छा पूरी होती है। यहाँ पर आकर अनेक भारतीय राजनेता और लोकप्रिय हस्तियां भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त कर चुकी हैं। जिनमे से लाल कृष्ण अडवाणी, मुलायम सिंह, मायावती, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे बड़े नेता भी शामिल हैं।
मंदिर की स्थापना का कोई स्पष्ट इतिहास देखने को नहीं मिलता लेकिन 2 अक्टूबर 1967 को ब्रह्मलीन ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरुशंकराचार्य कृष्णबोधाश्रम जी महाराज द्वारा मंदिर के नए स्वरूप का शिलान्यास किया गया। औघड़नाथ का यह मंदिर वास्तुकला की दृष्टि से एक उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर पूरी तरह सफ़ेद संगमरमर से निर्मित है। तथा जिस बेहद सुन्दर ढंग से नक्काशी की गयी है, मंदिर के शिखर पर ऊँचा गुम्बद बना है, जिस के ऊपर एक कलश की स्थापना की गयी है। मंदिर के गर्भगृह में भगवती और भगवान की शांत अवस्था में मूर्ति विराजमान है। बीच में शवलिंग स्थापित है और सामने की तरफ विशाल नन्दी विराजमान हैं। मंदिर परिसर में कांच की बेहद आकर्षक कलाकृतियां भी देखने को मिल जाती हैं। पिछले सालों की तुलना में वर्ष 2020-2021 में मंदिरों में भक्तों की संख्या में भारी कमी देखी गयी है, जिसका प्रमुख कारण कोरोना महामारी है। भले ही महामारी ने मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ को प्रभावित किया है, परन्तु ईश्वर के प्रति आस्था और विश्वास को निश्चित ही मजबूत और अधिक मजबूत किया है।

संदर्भ:
● https://bit.ly/3x5xOjZ
● https://bit.ly/3eavboy
● https://bit.ly/3ttrEbh
● https://bit.ly/3x7taSs
● https://bit.ly/3geKu26

चित्र संदर्भ:
मुख्य चित्र मेरठ के औघड़नाथ मंदिर को दर्शाता है। (TripAdvisor)
दूसरा चित्र मेरठ के औघड़नाथ मंदिर को दर्शाता है। (TripAdvisor)
तीसरा चित्र औघड़नाथ मंदिर के अंदर दिखाया गया है। (TripAdvisor)

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