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औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों का भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पर प्रभाव

मेरठ

 19-03-2021 10:15 AM
उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक
उपनिवेशवाद एक ऐसी संरचना होती है, जिसके माध्यम से किसी भी देश का आर्थिक शोषण तथा उत्पीड़न होती है। इस संरचना के अंतर्गत कई प्रकार के विचार, व्यक्तित्वों और नीतियों का समावेश किया जा सकता है। यही वास्तव में उपनिवेशवादी नीति का निर्णायक तत्व होता है। उपनिवेशवाद का मूल तत्व 'आर्थिक शोषण' में निहित होता है, लेकिन किसी उपनिवेश पर राजनीतिक कब्ज़ा बनाए रखने की दृष्टि से इसका भी अपना महत्व होता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश प्रभाव मुगल शासक औरंगजेब की मृत्यु के बाद सहज ही परिलक्षित होने लगा था। मुगल शासकों द्वारा तत्कालीन यूरोपीयों को दी गयी उदारतापूर्वक रियायतों ने स्वदेशी व्यापारियों के हितों को नुकसान पहुंचाया। साथ ही, व्यापार और वाणिज्यिक व्यवस्था भी कमजोर पड़ती गयी। ऐसी स्थिति में यहाँ की घरेलू अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही था। भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना के उपरांत अपनाई गई आर्थिक नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को खोखला बना दिया। इन नीतियों में भू-राजस्व नीति, धन का निर्गमन सिद्धांत, कृषि का वाणिज्यिकरण, विऔद्योगीकरण, अप्रगतिशील आयात-निर्यात नीति आदि। ब्रिटिश राज के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था पर आर्थिक नीतियों और इसके प्रभावों को तीन चरणों में बांटा जा सकता है।
पहले चरण में व्यापारवाद की प्रधानता थी जो कि 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद शुरू हुआ और 1813 तक जारी रहा। इस चरण को भारत से धन की निकासी और ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) द्वारा अपनी व्यापार और अन्य नीतियों में एकाधिकार के माध्यम से प्रत्यक्ष औपनिवेशिक लूट का दौर कहा जाता था। यह भारत की अर्थव्यवस्था के औपनिवेशिक शोषण की शुरुआत थी। अंग्रेजो ने प्लासी (1757 ई।) और बक्सर (1764 ई।) के युद्धों के बाद बंगाल की समृद्धि पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। फलतः भारतीय अर्थव्यवस्था अधिशेष तथा आत्मनिर्भरतामूलक अर्थव्यवस्था से औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हो गयी। प्लासी के युद्ध के बाद बंगाल के अंतर्देशीय व्यापार में अंग्रेजो की भागीदारी बढ़ गयी। कंपनी के कर्मचारियों ने व्यापार के लिए प्रतिबंधित वस्तुओं जैसे नमक, सुपारी और तंबाकू के व्यापार पर भी अधिकार कर लिया। बंगाल विजय से पूर्व, अंग्रेजी सरकार ने अपने कपड़ा उद्योग के संरक्षण के लिए विविध प्रयास किए। इनमें भारत से आने वाले रंगीन तथा छपे हुए वस्त्रों के प्रयोग पर इंग्लैण्ड में प्रतिबंध आदि प्रमुख है। भारतीय अर्थव्यवस्था को ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में परिवर्तित करने के पीछे ब्रिटिश सरकार का मुख्य उद्देश्य अपने उद्योगों के लिए अच्छा व सस्ता माल प्राप्त करना और अपने उत्पादों को भारतीय बाजार में ऊंची कीमतों पर बेचना था।
दूसरे चरण (1813-1858) में स्‍वतंत्र औद्योगिक पूंजीवाद का दौर शुरू हुआ। इस अवधि में भारत में औद्योगीकरण, ग्रामीणकरण और भारतीय कृषि का व्यवसायीकरण हुआ। इसने ब्रिटिश वस्तुओं और कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता के लिए भारत की अर्थव्यवस्था को एक बाजार के रूप में बदल दिया। ब्रिटिश भारत में आर्थिक क्रियाकलाप पहले से ज़्यादा हुए। शुरुआती समय में कृषि ही प्रमुख व्यवसाय था। करों के माध्यम से अंग्रेज़ों ने इस क्षेत्र को बर्बाद कर दिया। जब किसान करों के दबाव में टूट चुके थे, तब ब्रिटिशों ने भारत में उन फसलों की शुरुआत की जिनकी अंग्रेज़ों को ज़रूरत थी या अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में अधिक मूल्य मिलता हो। नील, रबर, चाय, कॉफी आदि के उत्पादन के लिये किसानों को बाध्य करके उनका शोषण किया जाता रहा। इससे भारत की खाद्य सुरक्षा प्रभावित हुई। करों की अधिक दर के कारण भारत से बहुत-सा धन विदेश चला जा रहा था। इसे धन का निर्गमन (Drain of Wealth) कहा गया। भारत में कुटीर उद्योग को जानबूझकर अंग्रेज़ों ने खत्म किया और इसके बदले विदेशी उद्योगों के लिये भारत में बाज़ार पैदा किया। एक तरह से भारत कच्चे माल का आपूर्तिकर्त्ता बन गया, जिसका दाम अंग्रेज़ तय करते थे। साथ ही, उसी माल से बने उत्पादों की कीमत भी अंग्रेज़ ही तय करते थे। एक तरह से यह दोहरा शोषण था। उद्योगों के मामले में, भारत में सिर्फ उन्हीं उद्योगों को लगाया गया जिनका हित अंग्रेज़ों के लिये हो। रेलवे की शुरुआत अंग्रेज़ों ने ज़रूर की, किंतु सिर्फ अपने व्यापारिक हितों को ध्यान में रखकर ही रेलवे लाइनें बिछाईं।
तीसरा चरण वित्तीय पूंजीवाद का दौर था। यह 19 वीं शताब्दी के उत्‍तरार्ध से शुरू हुआ। इस दौरान मैनेजिंग एजेंसी फॉर्म (managing agency forms), एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट फर्म (Export-Import firms), एक्सचेंज बैंक (exchange banks) आदि के माध्यम से वित्त साम्राज्यवाद को देखा गया। अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति के बाद 3000 मील की दूरी पर रेलवे का निर्माण करवाया, जो कि कंपनी के शासन काल में निर्मित 288 मील की तुलना में बहुत अधिक था। क्रांति से पहले छोटी दूरी के लिए भी रेल लाइनें नहीं थीं, इस लाइन के अस्तित्‍व में आने के बाद ब्रिटिशों को व्यापार में फायदा हुआ ही वरन् सेना को आसानी से कहीं भी स्‍थानां‍तरित करने का रास्‍ता भी सरल हो गया। इससे ब्रिटिशों की संपत्ति में अप्रत्‍याशित वृद्धि हुयी।
अलग-थलग रहने वाले आत्मनिर्भर गाँवों के कवच को इस्पात की रेल ने बेध दिया तथा उनकी प्राण-शक्ति को छीन लिया। अंग्रेज़ों की शिक्षा नीति भी यही थी कि उन्हें कंपनी के लिये भरोसेमंद कर्मचारी मिल सकें। किसी प्रकार की तकनीकी एवं मेडिकल शिक्षा के अच्छे अवसर नहीं के बराबर थे। ऐसे में जब भारत स्वतंत्र हुआ तो उसके सामने दोनों ओर से संकट था। एक तो उद्योगों एवं आधारभूत संरचनाओं का अभाव एवं दूसरी तरफ कुशल मानव संसाधन की कमी। आज़ादी के 60 साल बाद भी औद्योगिक रूप से भारत आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है, जिसका एक कारण ब्रिटिश भारत की आर्थिक नीतियाँ भी हैं।

संदर्भ:
https://bit.ly/2OC2N5u
https://bit.ly/3qBnfRc
https://bit.ly/3t6UJZy
https://bit.ly/2O9YPBp
https://bit.ly/2ObERGq

चित्र संदर्भ:
मुख्य चित्र में वीर मंगल पांडे और अंग्रेजी सेना दिखाई देते हैं। (प्रारंग)
दूसरी तस्वीर में 1857 में राज्यों के भारतीय विद्रोह को दिखाया गया है। (विकिपीडिया)
तीसरी तस्वीर में 1883 ब्रिटिश भारतीया सेना की वर्दी है। (फ़्लिकर)


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