शिक्षक की बुद्धि और छात्र की आज्ञाकारिता पर आधारित है गुरू-शिष्य परंपरा

मेरठ

 05-09-2020 09:34 AM
विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

समाज और किसी व्यक्ति के जीवन में उसके शिक्षक या गुरु की विशेष भूमिका होती है और इसी भूमिका के महत्व को उजागर करने के लिए अनेक देश भिन्न-भिन्न समय पर शिक्षक दिवस का आयोजन करते हैं। भारत में शिक्षक दिवस प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को मनाया जाता है ताकि समाज में शिक्षकों द्वारा किए गए और दिये जा रहे योगदान को सराहा और प्रोत्साहित किया जा सके। यह दिवस मुख्य रूप से डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती से जुडा हुआ है जो कि एक प्रसिद्ध राजनयिक, विद्वान, भारत के राष्ट्रपति और सबसे ऊपर एक शिक्षक थे। शिक्षण से उन्हें बहुत लगाव था और इसलिए जब उनके छात्रों ने उनका जन्मदिवस मनाने की अनुमति मांगी तो उन्होंने कहा कि, मेरा जन्मदिन अलग से मनाने की बजाय, यह मेरे लिए गौरव की बात होगी कि इसे 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए। तब से, प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को भारत में शिक्षक दिवस मनाया जाता है।

प्राचीन भारत की यदि बात करें तो उस समय हिंदू धर्म, जैन धर्म, सिख धर्म और बौद्ध धर्म में गुरु-शिष्य परंपरा का प्रचलन था जिसके अंतर्गत शिक्षा चाहे वह धार्मिक शिक्षा हो या फिर सांस्कृतिक, सामाजिक, या आध्यात्मिक, गुरू द्वारा प्रदान की जाती थी। गुरू जो ज्ञान अपने शिष्यों को देते वो ही ज्ञान फिर उनके शिष्य गुरू रूप में अपने शिष्यों को देते और इस प्रकार ये क्रम यूं ही चलता रहता। प्रत्येक परंपरा एक विशिष्ट सम्प्रदाय की होती थी, और उसके अपने गुरुकुल हुआ करते थे। गुरूओं द्वारा दिया जाने वाला ज्ञान हर क्षेत्र जैसे वैदिक, कृषि, वास्तु, संगीत, आध्यात्मिक आदि से सम्बंधित होता था। भारतीय अवधारणा के अनुसार एक शिक्षक विद्यार्थी का आध्यात्मिक और बौद्धिक पिता है। शिक्षक की मदद के बिना कोई शिक्षा संभव नहीं है, उन्हें ‘गुरु’ रूप में माना जाता है जो कि एक मित्र भी है, एक दार्शनिक भी और एक मार्गदर्शक भी। गुरु शब्द का अर्थ है, एक ऐसा व्यक्ति जो अंधेरे में फंसे व्यक्ति को प्रकाश या ज्ञान की ओर ले जाता है। उस समय संपूर्ण शिक्षा का उद्देश्य एक खाली दिमाग को एक ज्ञानवान दिमाग, संतुलित व्यक्तित्व को उच्च नैतिक मूल्यों के साथ बदलना था। बदले में छात्र अपने घर के काम में गुरुओं की मदद करते थे और जो सक्षम थे वे गुरुदक्षिणा के रूप में पैसे देते थे। यह पारस्परिक संबंध शिक्षक की बुद्धि और छात्र की आज्ञाकारिता पर आधारित था। ऐसे गुरु-शिष्य संबंध में, एक समर्थ गुरु के कंधों पर सब कुछ छोड़ दिया जाता था, जो एक निर्माता के रूप में कार्य करके, अपने शिष्यों या छात्रों को आकार देते थे। गुरु-शिष्य परम्परा में गुरु और विद्यार्थी एक जीवंत और सीखने या ज्ञान के रिश्ते में बंधे होते थे, जो उनके बीच भावनात्मक, बौद्धिक और आध्यात्मिक संबंध को दर्शाता था। गुरु और शिष्य के बीच का यह मजबूत बंधन गुरु को शिष्य के लिए एक संरक्षक बनाता था जो शिष्य को अज्ञान से ज्ञान और आत्मज्ञान तक ले जाता था। इस प्रकार गुरु-शिष्य की निकटता न केवल हमारे सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है, बल्कि समाज में मनुष्य के जीवन में भी एक मील का पत्थर साबित होता है। गुरू को भगवान से भी ऊपर का दर्जा दिया गया है, क्योंकि संसार में गुरू ही एक ऐसा माध्यम है जो शिष्य के सम्पूर्ण विकास जैसे मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक, संवेगात्मक, सामाजिक आदि में सहायक है।

गुरू शिष्य परंपरा और 21 वीं सदी के शिक्षक और छात्र के बीच आज अनेकों परिवर्तन आ गये हैं, जिनका एक प्रमुख कारण सोशल मीडिया (Social media) भी है। जहां शिक्षक और छात्र पहले एक निश्चित समय और सीमा के अंदर एक-दूसरे के सम्पर्क में होते थे वहीं अब सोशल मीडिया के जरिए छात्र निरंतर अपने शिक्षकों के सम्पर्क में होते हैं तथा व्हॉट्सेप (Whatsapp), फेसबुक (Facebook) आदि के माध्यम से पढाई से सम्बंधित अपनी शंकाएं दूर करते हैं और विभिन्न सूचनाएं प्राप्त करते हैं। इस प्रकार शिक्षक और छात्र के बीच सम्बंध ने एक मित्रतापूर्ण रूप ले लिया है। कई विचारक इस व्यवहार को सकारात्मक बताते हैं जबकि कई इसका विरोध भी करते हैं क्योंकि यह शिक्षक और छात्र के बीच आवश्यक दूरी को कम कर रहा है। वर्तमान समय में नैतिक मूल्य और मानक इतने कम हो गए हैं कि इसका प्रभाव इस पवित्र संबंध पर भी पडा है। हर दिन हम ऐसी अनेकों घटनाओं के बारे में सुनते हैं जो यह इंगित करती है कि वर्तमान समय में शिक्षा का नैतिक मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं रह गया है। इसके प्रभाव से निश्चित रूप से शिक्षक-छात्र संबंध की परिभाषा बदल रही है और बिगड़ रही है। इस प्रकार शिक्षा में नैतिक मूल्यों को निर्धारित करना अत्यंत आवश्यक है। आज का परिदृश्य पहले जैसा नहीं है। आज, शिक्षण कर्तव्य नहीं बल्कि पैसे कमाने का एक तरीका बन गया है। स्कूलों में शिक्षकों को अच्छा भुगतान नहीं किया जाता जिसकी वजह से उन्हें अतिरिक्त ट्यूशन (Tuition) लेने पडते हैं। इसके साथ ही, ग्रामीण स्कूलों में और यहां तक कि कुछ शहरी स्कूलों में भी बुनियादी सुविधाओं की गुणवत्ता बहुत खराब है। सुविधाओं की कमी इस समस्या को और बढ़ा देती है। आज इंटरनेट (Internet) की दुनिया है और इसके कई फायदे हैं लेकिन, साथ ही इसने समाज को इसके नुकसान भी बताए हैं क्योंकि सब कुछ इतना खुला और आसानी से सुलभ हो गया है।

आज, भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली न केवल आकार में, बल्कि पाठ्यक्रमों की विविधता और अन्य चीजों स्तरों में भी दुनिया में सबसे बड़ी है। विश्व में उच्च शिक्षा के लिए नामांकित हर आठवां छात्र भारतीय है। उच्च शिक्षा का विकास राष्ट्रीय और अन्य किसी भी क्षेत्र जैसे कृषि, उद्योग, बैंकिंग (Banking) या परिवहन के क्षेत्र में प्रभावशाली रहा है। भारत में सबसे साक्षर राज्य केरल है। राज्य में उच्च शिक्षा की न केवल अकादमिक खोज और ज्ञान में वृद्धि के लिए, बल्कि राष्ट्रीय विकास के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका है। कई शिक्षाविदों द्वारा यह देखा गया है कि उच्चतर शैक्षिक संस्थानों की संख्या में वृद्धि हुई है, लेकिन यह वृद्धि केवल मात्रात्मक है गुणात्मक तौर पर देखा जाए तो मानकों में भारी गिरावट आई है। केरल में उच्च शिक्षा का ढांचा समग्र रूप से देश से अलग नहीं है। केरल और देश के अन्य क्षेत्रों ने संस्थानों, छात्रों और शिक्षकों की संख्या के संदर्भ में मात्रात्मक विस्तार पर अधिक जोर दिया है।
एक अध्ययन के उद्देश्यों के आधार पर निम्नलिखित परिकल्पनाएँ तैयार की गई हैं:
• उच्च शिक्षा की गुणवत्ता शिक्षकों की गुणवत्ता पर अत्यधिक निर्भर करती है। शिक्षकों की गुणवत्ता और शिक्षित की गुणवत्ता के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध होता है।
• उच्च शिक्षा की गुणवत्ता मुख्य रूप से नैतिक और शैक्षणिक सिद्धांतों की ताकत से आंकी जाती है।
• गुणवत्ता का आश्वासन शिक्षकों पर ही निर्भर नहीं है बल्कि, यह शैक्षणिक संस्थानों के साथ संबंधित शिक्षकों, छात्रों, माता-पिता, प्रबंधन और सरकार, सभी के सहक्रियात्मक संबंध का परिणाम होता है।
• उच्च शिक्षा की गुणवत्ता एक बार निर्धारित करके सदैव के लिए निश्चित करने का प्रयास नहीं है, बल्कि, यह सुधार और परिवर्तन की एक सतत प्रक्रिया है।
• केरल में उच्च शिक्षा के लिए मुद्दे कई हैं: वित्त में कमी; स्वायत्तता की कमी; पुराना पाठ्यक्रम; शिक्षक, मंत्रालयिक कर्मचारियों और प्रबंधन की जवाबदेही की कमी, आदि। ये सभी केरल में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।

वहीं सबसे प्रमुख कारण भ्रष्टाचार, भारतीय शिक्षा प्रणाली में शिक्षा की गुणवत्ता को नष्ट कर रहा है और समाज के लिए दीर्घकालिक नकारात्मक परिणाम पैदा कर रहा है। भारत में शैक्षिक भ्रष्टाचार को काले धन के प्रमुख योगदानकर्ताओं में से एक माना जाता है।

संदर्भ:
https://www.careerindia.com/news/2013/09/04/why-we-celebrate-teachers-day-on-5th-september/articlecontent-pf941-006376.html
https://www.mapsofindia.com/my-india/education/changing-teacher-student-relationship
https://timesofindia.indiatimes.com/city/chennai/students-teachers-becoming-social-buddies-raises-concern-among-schools/articleshow/63162562.cms
https://en.wikipedia.org/wiki/Guru%E2%80%93shishya_tradition
http://www.yourarticlelibrary.com/education/indian-education/teacher-pupil-relation-in-ancient-india/63493

चित्र सन्दर्भ :
मुख्य चित्र में प्राचीन भारत की गुरु शिष्य परंपरा को इंगित किया गया है। (Wikimedia)
दूसरे चित्र में 5 सितम्बर के दिन सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती पर श्रद्धांजलि का चित्रण है। (Prarang)
तीसरे चित्र में शिक्षक दिवस के मौके पर केक काटकर ख़ुशी मनाते स्कूली बच्चे और उनकी शिक्षिका। (Prarang)
चौथे चित्र में ऑनलाइन (Online) माध्यम से पढ़ाता एक शिक्षक। (Pexels)
पांचवें चित्र में बच्चों को माधुर्यतापूर्ण ढंग से पढ़ाती हुई एक शिक्षिका। (Pexels)

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