रोटी की आजादी या देश की आजादी

मेरठ

 20-08-2020 10:31 AM
उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

भारत को कई वर्षों के संघर्ष और हजारों वीरों की शहादत के बाद आजादी प्राप्त हुई थी। आज यहाँ जन्मा हर एक बच्चा अपने आप को भाग्यशाली समझता है कि उसने एक स्वतंत्र देश में जन्म लिया। भारत की आजादी की लड़ाई में मेरठ का एक अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मेरठ वही स्थल है, जहाँ से सर्वप्रथम आज़ादी की मांग उठी तथा उसने पूरे देश को जगा के रख दिया था तथा पूरी ब्रिटिश सल्तनत की जड़ों को हिला के रख दिया था। यही कारण है कि स्वतंत्रता की इस लड़ाई को देश की पहली लड़ाई के रूप में जाना जाता है। इस लड़ाई के मुखिया के रूप में मुगलिया सल्तनत के आखिरी शासक बहादुर शाह जफ़र को चुना गया था तथा यह पूरी लड़ाई दिल्ली के लाल किले से केन्द्रित थी। बहादुर शाह जफ़र ने उस समय इस पूरी लड़ाई के लिए एक विशेष प्रकार के झंडे को चुना था और उस झंडे पर जो छपा और बना हुआ था, उसे हम सभी को समझने की आवश्यकता है। उस झंडे पर कुल दो चिन्ह थे, पहला कमल के पुष्प का और दूसरा रोटी/चपाती का। यह एक अत्यंत ही दुर्लभ तरीके का झंडा था क्यूंकि यह पहली बार हुआ था कि किसी के झंडे पर रोटी का अंकन किया गया हो। हांलाकि इस चिन्ह ने एक आन्दोलन को जन्म दिया, जिसे 'चपाती आन्दोलन' के नाम से जाना गया। इस आन्दोलन के दौरान हजारों गावों में बड़ी संख्या में चपाती, ब्रेड (Bread) आदि का वितरण किया जाता था, इन चपातियों को बाटने के मध्य, एक महत्वपूर्ण सन्देश भी छिपा हुआ था।

इस कार्य से ब्रिटिश सेना की नींद उड़ चुकी थी तथा उन्होंने सोचा की इसमें कुछ गुप्त सन्देश हो सकते हैं, अतः तत्काल प्रभाव से उन चपातियों के निरिक्षण का सन्देश दिया गया परन्तु उसमे उनको कोई भी गुप्त सन्देश नहीं मिला। यह आन्दोलन 1 फरवरी 1857 में पहली बार प्रकाश में आया तथा अंग्रेजी शासन के एक अधिकारी मार्क थोर्नहिल (Mark Thornhill) के कार्यालय में चपाती लायी गई, जो कि एक चौकीदार से प्राप्त हुई थी। उन चपातियों की जांच करने पर उन्हें उनमे कुछ प्राप्त नहीं हुआ और उन्हें तब पता चला की हजारों की संख्या में ये चपातियाँ पूरे देश भर में, जिसमे दक्षिण भारत के हिस्से भी शामिल है से लेकर के नेपाल तक वितरित की जा रही हैं। यह कहा जाता था कि जंगल से एक व्यक्ति आता है, जो कि चपातियाँ गावों के चौकीदारों को देता था तथा उनसे कहता था कि वो और अधिक चपातियाँ बनाए और आस पास के चौकीदारों को वितरित करे।

चौकीदार चपातियाँ अपनी पगड़ी में रखकर यात्रा करता था, जिससे यह चपातियाँ बड़ी संख्या में दूसरे स्थानों पर भी पहुंचा करती थी। इन चपातियों के मूल स्थल के विषय में किसी प्रकार की कोई जानकारी हमें नहीं प्राप्त हुई है। उस दौर में आम भारतीयों का मत था की यह अंग्रेजों का काम था। श्रीरामपुर से प्रकाशित अंग्रजी अखबार फ्रेंड ऑफ़ इंडिया (Friend of India) की माने तो इस प्रकार से चपातियों के वितरण से ब्रिटिश अधिकारी भ्रमित और डरे हुए थे। हांलाकि जिस तेज गति से चपातियाँ पहुँच रही थी, ब्रिटिश अधिकारियों के लिए वह एक अत्यंत ही चिंता का विषय था। इन चपातियों के साथ कमल का फूल और बकरे का मांस भी कभी-कभी वितरित किया जाता था और यही कारण है कि उस समय के झंडे पर कमल के पुष्प का और चपातियों का विवरण किया गया था। आज तक हमें इस आन्दोलन के विषय में अधिक जानकारी नहीं प्राप्त हो सकी है।

सन्दर्भ
https://www.smithsonianmag.com/history/pass-it-on-the-secret-that-preceded-the-indian-rebellion-of-1857-105066360/
https://www.thebetterindia.com/59404/chapati-movement-india-revolt/
https://en.wikipedia.org/wiki/Chapati_Movement

चित्र सन्दर्भ :
मुख्य चित्र में बहादुर शाह जफ़र द्वारा जारी कमल और चपाती के चिन्ह वाला ध्वज दिखाया गया है। (Wikimedia)
दूसरे चित्र में चपाती आंदोलन का सांकेतिक चित्रण है। (Prarang)
अंतिम चित्र में अंग्रेज़ों द्वारा बहादुर शाह जफ़र की गिरफ्त का चित्रण है। (Wikipedia)



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