भारत में चीनी भोजन का इतिहास

मेरठ

 22-04-2020 10:35 AM
स्वाद- खाद्य का इतिहास

पकवान लज़ीज़ हो तो किसे पसंद नहीं है? जैसे ही स्वादिष्ट पकवानों का जिक्र होता है, वैसे ही मुह में पानी आ जाता है। यदि चार्वाक के शब्दों में देखें तो भोजन से बड़ा कोई और ईश्वर नहीं है। उन्होंने ही कहा है-

यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।

अर्थात जब तक जियो सुख से जियो और कर्जा लेकर घी पीयो। भारत में तमाम प्रकार के स्वादिष्ट पकवान पाए जाते हैं जिनमें से कुछ तो भारत से ही सम्बंधित हैं और कुछ विदेशों से यहाँ पर आये हैं। भारत प्राचीन काल से ही एक ऐसा देश रहा है जहाँ दुनिया भर के लोग आते जाते रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से महान यात्री आदि भी भारत देश की यात्रा कर चुके हैं। विभिन्न देशों से भारत के व्यापारिक सम्बन्ध थे तथा विदेशों से बड़ी संख्या में लोग इस देश में आकर यहीं के हो गए। वे लोग जो यहाँ पर आये वे अपने साथ में जो अत्यंत ही महत्वपूर्ण चीज लायें उसे संस्कृति और पाक कला के नाम से जाना जाता है। आज यही कारण है की भारत में इतने भिन्न प्रकार के व्यंजन पाए जाते हैं। भारत में चीनी व्यंजन का एक बड़ा बाजार है जो कि अब पूरे भारत में फ़ैल चुका है। भारत में पाए जाने वाले चीनी खाने को इंडो-चाइनीज (Indo-Chinese) भोजन के रूप में जाना जाता है। भारत में चीनी भोजन भारतीय नागरिकों के अनुसार स्वाद में परिवर्तन कर के बनाया जाता है, जिसमें शाकाहार भी शामिल है। अब यह सवाल उठना जरूरी है कि भारत में चीनी भोजन का इतिहास क्या है और यह भारत में आया कहाँ से। भारतीय चीनी भोजन का इतिहास 18वीं शताब्दी के कलकत्ता से सम्बंधित है जिसे ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) ने उपनिवेशिक भारत की राजधानी बनाया था। कलकत्ता एक ऐसे स्थान पर बसा हुआ शहर है जो उस काल में व्यापार के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण था, जहाँ पर चाय और रेशम का व्यापार चीन से ब्रिटेन (Britain) के लिए होता था और यही कारण है कि चीन से कई कुशल और गैर कुशल श्रमिकों के समुदाय यहाँ आये। सबसे शुरूआती चीनी श्रमिक या प्रवासी चाय का व्यापारी था जिसका नाम यांग दज्हाओ (Yang Dazhao) था। वह यांग अत्चेव (Yang Atchew) के नाम से भी जाना जाता है, वह सन 1778 में कलकत्ता एक शक्कर मिल डालने के लिए आया था। यांग को शक्कर मिल के लिए जमीन ब्रिटिश (British) शासन से मिली थी। वह अपने साथ श्रमिको को भी चीन से लाता था।

सन 1901 की जनगणना के अनुसार भारत में चीन के कुल 1,640 लोग रहते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय तक उनकी संख्या 26,250 तक पहुँच गयी थी। भारत में चीन के कई प्रांतों से लोग आये लेकिन जिन्होंने भारत में चीनी खाने की नीव डाली। इन्ही में से एक थे हक्का प्रांत के लोग जिन्होंने इस खाने में एक अहम् योगदान दिया। शुरूआती दौर में यह खाना मात्र चीन के लोगों के लिए उनके ही क्षेत्र चाइना टाउन (China Town) में बनाया जाता था। भारत में पहला चीनी रेस्तरां (Restaurant) सन 1924 में कलकत्ता में खुला। यह एक भव्य तरीके से खोला गया था जिसमे हिंदी फिल्मों के सितारे और ब्रितानी लोग खाना खाने जाते थे। इस रेस्तरां का नाम याऊ चिउ (Eau Chew) था। भारत भर में फिर यहीं से यह खाना प्रसारित हुआ और प्रत्येक स्थानों पर इस खाने को उस स्थान के खाने की परंपरा के साथ ढलने के कारण उसमें विभिन्न बदलाव भी आये। उदाहरण के लिए पश्चिमी निमाड़ जिलों में चीनी खाने में शक्कर का प्रयोग किया जाता है। यह खाना भारतीय परम्परा के साथ भी जुड़ा जैसा कि चीनी सम्प्रदाय के लोगों ने नूडल (Noodle), सोया चाप (Chop Suey), चावल आदि का भोग काली माता को त्योहारों के समय चढ़ाया। यह एक एकता के प्रतीक के रूप में जाना गया था। अब यह भी समझना जरूरी है कि भारत में चीनी भोजन इतना प्रसिद्ध क्यूँ हुआ? इस प्रश्न का जवाब यह है कि यहाँ के लोगों को तेल व मसालेदार खाने अत्यंत ही पसंद है और चीनी खाने अपने मसाले आदि के लिए ही जाने जाते हैं।

चित्र (सन्दर्भ):
1.
ऊपर दिए गए दोनों ही चित्र इंडो चाइनीज व्यंजनों को प्रदर्शित कर रहे है।
सन्दर्भ:
1.
https://qz.com/india/1420618/how-chinese-cuisine-became-indian-food/
2. https://edition.cnn.com/travel/article/india-chinese-food-fusion/index.html
3. https://scroll.in/magazine/898067/the-story-of-how-india-fell-in-love-with-chinese-food
4. https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_Chinese_cuisine

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