स्वस्थ और खुशहाल जीवन प्रदान करने की अवधारणा पर आधारित है, नया शहरीवाद

रामपुर

 09-04-2020 01:50 PM
नगरीकरण- शहर व शक्ति

वर्तमान समय में शहरी विकास के साथ-साथ कई समस्याएं उभरी, जिसने विचारकों को वर्तमान शहरों को पारंपरिक शहरों की भांति निर्मित करने तथा नियोजित करने का विचार दिया। नया शहरीवाद (New Urbanism) इसी विचार का परिणाम है। यह एक शहरी डिजाइन (design) आंदोलन है, जो विभिन्न आवासों और नौकरियों की एक विस्तृत श्रृंखला के साथ शहर की गलियों या आस-पडोस को चलने योग्य बनाकर पर्यावरण के अनुकूल बनाता है। इसकी शुरूआत संयुक्त राज्य अमेरिका में 1980 के दशक में हुई थी, जिसने धीरे-धीरे रियल एस्टेट (real estate) विकास, शहरी नियोजन और नगरपालिका भूमि-उपयोग रणनीतियों के कई पहलुओं को प्रभावित किया। नया शहरीवाद शहरी फैलाव से जुड़ी बीमारियों को दूर करने का प्रयास करता है। दूसरे शब्दों में यह शहरी क्षेत्रों के अत्यधिक या अनियंत्रित फैलाव को कम करने का प्रयास करता है। इसका लक्ष्य लोगों की कार या वाहनों पर निर्भरता को कम करके आवास, नौकरी और वाणिज्यिक क्षेत्रों की घनी संयुक्त श्रृंखला के साथ शहरों की गलियों या आस- पड़ौस को रहने या चलने योग्य बनाना है। नया शहरीवाद मानव-आवर्धित (human-scaled) शहरी डिजाइन (design) पर केंद्रित है। इसके डिजाइन और विकास के सिद्धांतों को नए विकास, शहरी भरण (infill) एवं पुनरोद्धार और संरक्षण के लिए लागू किया जा सकता है। नया शहरीवाद इस विचार पर केंद्रित है कि जिस प्रकार पारंपरिक शहरों का निर्माण और नियोजन किया जाता था ठीक वैसे ही नए शहरो का भी किया जाए। क्योंकि ऐसे शहरों में आसानी से चलने योग्य मुख्य सड़कें, पार्क इत्यादि बनाये गए थे। सुविधाजनक तथा पर्यावरण के अनुकूल भी थे।

इस अवधारणा के भीतर मुख्य विचार ये हैं कि शहर चलने योग्य होने चाहिए। अर्थात किसी भी निवासी को समुदाय में कहीं भी जाने के लिए वाहन या कार की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए और उन्हें किसी भी बुनियादी सेवा या वस्तु को प्राप्त करने के लिए से पांच मिनट की पैदल दूरी से अधिक की दूरी तय न करनी पड़े। इसे प्राप्त करने के लिए समुदायों को फुटपाथ (foot path) और संकरी गलियों में निवेश करना चाहिए। नया शहरीवाद शहर में समुदायों पर मजबूत जोर देता है। अर्थात उच्च घनत्व, पार्कों, खुले स्थानों और सामुदायिक एकत्रित केंद्रों जैसे प्लाज़ा (plaza) या पड़ोस वर्ग के लोगों के बीच संबंध बने रहे, इस तरह से शहर का नियोजन आवश्यक है। दैनिक बातचीत और सार्वजनिक जीवन के लिए चौक, फुटपाथ, कैफे (cafe) और बरामदे बनाए गये हैं। नए शहरीवाद का अन्य मुख्य विचार यह है कि इमारतों को उनकी शैली, आकार, मूल्य और कार्य के आधार पर बनाया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, छोटे शहर के घरों को बड़े, एकल परिवार के घरों के पास मिश्रित करके बनाया जाना चाहिए। नया शहरीवाद व्यावहारिक है, इसके अनुसार बड़े डिजाइन उपयोगी नहीं होते अगर उन्हें बनाया न जा सके। नया शहरीवाद डिजाइन पर केंद्रित है, जो समुदायिक कार्य के लिए महत्वपूर्ण है। बाजारों या चौक की आकृति तथा आकार यह निर्धारित करने में मदद करेगा कि, यह लगातार लोगों से भरा रहेगा या खाली रहेगा। वातावरण में इमारतों का संगठन इसके स्वरूप या विशेषता को स्थापित करने में मदद करेगा। इसके अलावा यह समग्रता पर भी ध्यान केंद्रित करता है। अर्थात महानगरीय क्षेत्र से लेकर एकल इमारत तक सभी एक दूसरे से संबंधित होंगे। कम उपयोग होने वाले तथा उपेक्षित स्थानों को पुनः प्राप्त करना नए शहरी डिज़ाइन और भवन का विशेष केंद्र है। नए शहरीवाद ने खराब सार्वजनिक आवासों को रहने योग्य मिश्रित आय वाले स्थानों में बदल दिया है। इन सबसे ऊपर, नया शहरीवाद स्थायी, मानव-प्रवर्धित जगहें बनाने के बारे में है जहाँ लोग स्वस्थ और खुशहाल जीवन जी सकते हैं। चलने योग्य, जीवंत, सुंदर जगहें, व्यवसाय, स्थानीय सरकारों और उनके निवासियों के लिए बेहतर काम करती हैं।

भारत का शहरी विस्तार इस प्रकार के नियोजन सिद्धांतो को प्रयोग करने तथा इन्हें अनुकूलित करने के कई अवसर प्रदान करता है। भारतीय दृष्टिकोण के रूप में इसे सतत विकास क्षेत्र कहा जा सकता है। यह अवधारणा आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक पहलूओं पर अपना प्रभाव डालती है। इस तरह की अवधारणा कम आय वाले निवासियों और सामान्य आबादी के बीच स्पष्ट अलगाव प्रदर्शित करती है जिसका प्रभाव शहरी परिदृश्य और गतिशील पर पड़ेगा। सतत विकास क्षेत्र शहरी भारत को घने समुदायों और मिश्रित उपयोग केंद्र में पुनर्गठित करना चाहते हैं। यह लोगों के निवास और कार्य स्थलों को एकीकृत कर दिन-प्रतिदिन होने वाली यात्राओं को कम कर देगा। विकास के अधिकारों के हस्तांतरण के माध्यम से घने शहरी कोर (core) का निर्माण संभव होगा। सतत विकास क्षेत्र भारत में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में सहायक होगा। भारत के लिए यह अवधारणा आम तौर पर अच्छी है, लेकिन कई मान्यताओं पर आधारित है, जो गम्भीर मुद्दों का कारण बन सकती है। घने शहरी क्षेत्र से दूर एक अलग आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्र का निर्माण अनिवार्य रूप से अलगाव को वैधता देता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह का भेद अस्वीकार्य है। यह अधिक संगठित मलिन बस्तियों की क्षमता में भी बाधा डालती है, जो आवश्यकता के जवाब में उभरती है। सामाजिक एकीकरण के लिए जाति व्यवस्था एक ऐसी बाधा है जिससे पार पाने के लिए एक बाधा के रूप में निपटा जाना चाहिए। शहरी परिदृश्य को पुनर्गठित करने के लिए आवश्यक मौजूदा प्रणालियों की वास्तविक व्यवस्था का नवीनीकरण अपरिहार्य है। परिवर्तन प्रक्रिया शुरू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और लोकप्रिय समर्थन की प्रचुरता से मौजूद रहने की आवश्यकता होगी। सतत विकास क्षेत्र के लिए अधिक व्यापक वित्तीय योजना विकसित करने की आवश्यकता है। एक अधिक समावेशी डिजाइन जो सभी सामाजिक-आर्थिक वर्गों को एक ही उच्च घनत्व वाले केंद्रीय कोर में एकीकृत करता है, को शामिल किया जाना चाहिए, और स्पष्ट वित्तीय योजनाओं और कार्यान्वयन विवरणों को विकसित किया जाना चाहिए।

संदर्भ:
1.
https://www.cnu.org/resources/what-new-urbanism
2. https://www.cnu.org/sites/default/files/sustainable_development_zones_indias_new_urbanism_pories.pdf
3. https://www.newgeography.com/content/006328-new-urbanism-and-jane-jacobs-a-tangled-disconnect
चित्र सन्दर्भ:
1.
pexels.in - new urbanism
2. prarang Archive
3. youtube.com - meerut urban area
4. pixabay.com - india urbanisation



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