मेरठ को काफी प्रभावी लागत प्रदान करता है पुष्पकृषि(floriculture)

मेरठ

 17-02-2020 01:40 PM
बागवानी के पौधे (बागान)

भारत में फूल हमारे धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक अनुष्ठानों का एक अभिन्न हिस्सा है। जिसके चलते उनकी खेती सदियों से चली आ रही है। वहीं हाल ही में एक व्यावसायिक गतिविधि के रूप में पुष्पकृषि में निवेश काफी बढ़ रहा है। विविध जलवायु और भौतिक स्थितियों की उपलब्धता ने पूरे वर्ष के दौरान फूलों की एक विस्तृत श्रृंखला के उत्पादन की सुविधा प्रदान की है।

भारत में बड़ी वैज्ञानिक जनशक्ति और सस्ते श्रम की उपलब्धता ने इस उद्यम को प्रभावी लागत प्रदान करने में काफी मदद करी है। भारतीय पुष्पकृषि बाजार की 2018 में लगभग 157 बिलियन रुपए तक की कीमत बताई गई थी और 2020 तक इसके बाजार की कीमत 472 बिलियन रुपये तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया। वहीं महानगर और बड़े भारतीय शहर वर्तमान समय में देश में फूलों के प्रमुख उपभोक्ताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। पश्चिमी संस्कृतियों के बढ़ते शहरीकरण और प्रभाव के परिणामस्वरूप, फूलों का व्यापार कई अवसरों पर काफी लोकप्रिय हो रहा है जैसे वेलेंटाइन डे, जन्मदिन, त्योहार, वर्षगाँठ, विवाह, धार्मिक समारोह आदि। शहरीकरण के रुझान के रूप में फूलों की खपत और बढ़ेगी और आने वाले वर्षों में पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बढ़ने की उम्मीद है। सौंदर्य और सजावटी उद्देश्यों के अलावा, फूलों की खपत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा औद्योगिक अनुप्रयोगों में भी होता है, जिसमें सुवास, सुगंध, प्राकृतिक रंग, दवाएं आदि शामिल हैं।

पहले के समय में, अपनी आय के पूरक के लिए किसानों ने अपने खेत के एक छोटे से हिस्से में फूल उगाने के लिए आवंटित किया था। फूलों की खेती पारंपरिक रूप से गेंदा, चमेली, चाइना एस्टर, गुलदाउदी और गुलाब की बढ़ती फसलों तक ही सीमित थी, जिनका उपयोग अकेले फूलों के रूप में या कभी-कभी माला के रूप में किया जाता था। ये फ़सलें अभी भी देश में पुष्प उत्पादन के तहत कुल क्षेत्रफल का लगभग दो-तिहाई हिस्सा लेती हैं। गेंदे जैसी फसलें पूरे देश में उगाई जाती हैं और पूरे साल भर उपलब्ध रहती हैं। व्यापार के संदर्भ में, उनका मूल्य विपणन किए गए फूलों के कुल मूल्य का लगभग आधा होता है।

वाणिज्यिक फूलों की खेती में आमतौर पर छोटे किसान शामिल होते हैं, जो अभी भी अपनी पारंपरिक कृषि प्रणाली में एक खंड के रूप में केवल फूल उगाते हैं। वहीं आधुनिक समय की पुष्पकृषि में विभिन्न उच्च मूल्य वाले फूलों का उत्पादन अधिक किया जाता है, जैसे गुलाब, हैडिओलस, कार्नेशन, ऑर्किड, एंथोडियम, लिलियम और गेरबेरा से संबंधित। इसके साथ ही सुगंधित गुलाब की व्यावसायिक खेती कन्नौज, के हाथरस, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश), (कर्नाटक), मदुरै (तमिलनाडु) और आमरी (पंजाब) जिलों में की जाती है।

जैसा की हम सब जानते ही हैं कि भारत में धार्मिक अनुष्ठानों में फूलों का बहुत अधिक उपयोग किया जाता है। आमतौर पर गंगा जी के दर्शन के लिए जाने वाले या वहाँ कोई अनुष्ठान कराने वाले अधिकांश भारतीय द्वारा पूजा संपन्न होने के बाद गंगा जी में या मंदिर में पुष्प चढ़ाए जाते हैं। लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि ये पुष्प सड़ने के बाद दुर्गंध को उत्पन्न कर पानी को रुख बना देते हैं। साथ ही इन फूलों पर छिड़के गए रासायनिक कीटनाशक नदी में रिसते हैं और विषाक्तता के स्तर को बढ़ाते हैं।

वहीं गंगा नदी के तट पर उत्तर प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक शहरों में से एक कानपुर, 300 से अधिक मंदिरों और 100 मस्जिदों का भी घर है। यहाँ रोजाना मंदिर में लगभग 2,400 किलोग्राम फूलों का उत्पादन होता है और ये सभी पुष्प भक्तों द्वारा मंदिरों में चड़ाये जाते हैं। लेकिन जैसा कि भक्तों और तीर्थ अधिकारियों के मुताबिक वे सभी पुष्प पवित्र माने जाते हैं, इसलिए उन्हें जमीन में फेंकने के बजाए, गंगा जी में विसर्जित किया जाता है।

वहीं उत्तरप्रदेश में, 2015 में, 72,000 रुपए के प्रारंभिक निवेश के साथ, हेल्पअसग्रीन (HelpUsGreen) की स्थापना दो बचपन के दोस्तों ने की ताकि वे चढ़ाए गए फूलों को इकठ्ठा करके उन्हें विपणन योग्य उपभोक्ता उत्पादों के रूप में बना सके। वर्तमान में, हेल्पअसग्रीन द्वारा इन फूलों से तीन उत्पाद का निर्माण किया जा रहा है: फूल - फूलों के कचरे और प्राकृतिक राल जैसे कार्बनिक उत्पादों से अगरबत्ती और शंकु को बनाया गया है।

मिटटी – वहीं वर्मीकम्पोस्ट नामक ब्रांड जो फूलों के कचरे के हरे भागों, खाद, 17 प्राकृतिक अवयवों और केंचुओं से बना है।

फ़्लोरफ़ोम (Florafoam) – हालांकि यह अभी व्यवसायिक नहीं हुआ है, लेकिन ये दुनिया का पहला फूलों और प्राकृतिक कवक से बनाया गया बायोडिग्रेडेबल थर्मोकोल अपशिष्ट है।

संदर्भ :-

https://bit.ly/2ULDpeK https://www.imarcgroup.com/flower-floriculture-industry-india https://bit.ly/31WTKPn http://www.preservearticles.com/articles/complete-information-on-floriculture/20320 https://bit.ly/2OO5zSj


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