हड़प्पा सभ्यता के समकालीन थी गेरू रंग के बर्तनों की संस्कृति

रामपुर

 10-02-2020 01:00 PM
म्रिदभाण्ड से काँच व आभूषण

बी.बी. लाल (ब्रज बासी लाल (जन्म 2 मई 1921), जिन्हें बी.बी. लाल के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय पुरातत्वविद् हैं। वह 1968 से 1972 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के महानिदेशक थे और इन्होंने शिमला के भारतीय उन्नत अध्ययन संस्थान के निदेशक के रूप में कार्य किया है। लाल विभिन्न यूनेस्को समितियों में भी कार्य कर चुके हैं।) की परिकल्पना से भिन्न, उत्तर प्रदेश के सनौली और चंदायण में उत्खनन से वर्तमान पुरातत्वविदों के लिए नई संस्कृतियों की खुली संभावनाएं पैदा हुई हैं। जहां लाल ने महाभारत से पुरातत्व के 'चित्रित ग्रे रंग के बर्तनों' (Painted Grey Ware) को सहसंबद्ध किया था और उन्हें 1100 ईसा पूर्व से संबंधित बताया था, वहीं नई परिकल्पना अब महाभारत संस्कृति के साथ गेरू रंग के बर्तनों के बीच के संबंध पर ज़ोर दे रही है। चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व से दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के कांस्य युग में पाए जाने वाले गेरू रंग के बर्तनों का भारत में काफी चलन था।

इन बर्तनों का चलन उस समय पूर्वी पंजाब से उत्तर-पूर्वी राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैला हुआ था। इन मिट्टी के बर्तनों में एक लाल रंग दिखाई देता है, लेकिन ये खुदाई करने वाले पुरातत्वविदों की उंगलियों पर एक गेरू रंग छोड़ते थे। इसी वजह से इनका नाम गेरू रंग के बर्तन पड़ा था। इसके साथ ही इन्हें कभी-कभी काले रंग की चित्रित पट्टी और उकेरे गए पैटर्न (Pattern) से सजाया जाता था। दूसरी ओर, पुरातत्वविदों का कहना है कि गेरू रंग के बर्तनों को उन्नत हथियारों और उपकरणों, भाला और कवच, तांबे के धातु और अग्रिम रथ के साथ चिह्नित किया गया है। इसके साथ ही, इनकी वैदिक अनुष्ठानों के साथ भी समानता को देखा गया है।

ये अक्सर तांबे के ढेर, तांबे के हथियार और अन्य कलाकृतियों जैसे कि मानवाकृतीय मूर्ति के साथ पाए जाते हैं। इस मिट्टी के बर्तन के सबसे बड़े संग्रह का साक्ष्य राजस्थान के जोधपुरा (यह जोधपुरा जयपुर जिले में स्थित है और इसे जोधपुर शहर से भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए) के पास से मिला था। वहीं गंगा जमुना दोआब के सनौली को गेरू रंग के बर्तनों की संस्कृति/तांबे के ढेर वाला स्थल माना जाता है। इसके साथ ही ऐसा माना जाता है कि गेरू रंग के बर्तन वाली संस्कृति हड़प्पा सभ्यता की समकालीन थी। क्योंकि 2500 ईसा पूर्व और 2000 ईसा पूर्व के बीच, ऊपरी गंगा घाटी के लोग सिंधु लिपि का उपयोग कर रहे थे। जबकि पूर्वी गेरू रंग के बर्तनों वाली संस्कृति द्वारा सिंधु लिपि का उपयोग नहीं किया गया था, पूरे गेरू रंग के बर्तनों वाली संस्कृति की लगभग एक ही भौतिक संस्कृति थी और संभवतः इसके विस्तार के दौरान एक ही भाषा बोली जाती थी।

संदर्भ:
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Ochre_Coloured_Pottery_culture
2. https://bit.ly/3b3e71c
चित्र सन्दर्भ:-
1.
https://www.flickr.com/photos/internetarchivebookimages/17801642373
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Pottery_in_the_Indian_subcontinent



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