गुप्त काल में दिया गया था, भगवान विष्णु की मूर्ति को एक नया आयाम ?

रामपुर

 03-02-2020 02:00 PM
द्रिश्य 3 कला व सौन्दर्य

हिन्दू सभ्यता में मूर्तिविज्ञान का अपना एक अलग महत्व है। मूर्तिविज्ञान ही एक ऐसा साधन है जो कि मूर्तियों की महत्ता और उनकी पहचान में मदद करता है। भगवान विष्णु, हिन्दू त्रिदेवों में से एक देव हैं जिनकी महत्ता अत्यंत ही ऊंची है। भगवान विष्णु को मुख्य रूप से 10 अवतारों में दिखाया जाता है जो की निम्नवत प्रकार से हैं-

मतस्य अवतार, कुर्म अवतार, वराह अवतार, नरसिंह अवतार, वामन अवतार, परशुराम अवतार, रामावतार, कृष्णावतार, गौतम बुद्ध, कल्कि अवतार आदि। इन सभी अवतारों की मूर्तियों आदि को पहचानने का अपना एक तरीका है, जो कि विभिन्न वास्तुकला और मूर्तिविज्ञान के प्राचीन ग्रंथों में वर्णित हैं। ताल मान का भी महत्व प्राचीन मूर्ती परंपरा में दिखाई देता है। यदि भारत में कला का विकास देखा जाये तो सिन्धु घाटी की सभ्यता से ही प्रारम्भ हो चुका था परन्तु इसको करीब 3 हजार साल लगे एक आयाम पकड़ने के लिए। यह दौर था सम्राट अशोक का। सम्राट अशोक के दौर में भारतीय कला ने एक ऐसे प्रतिमान को पकड़ा जहाँ से बड़ी संख्या में मूर्तियाँ आनी शुरू हो जाती हैं उदाहरण स्वरुप दीदारगंज यक्षी। कालान्तर में भारतीय परम्परा में सबसे बड़ा बदलाव शुंगों और कुषाणों के काल में आया। यह वह दौर था जब भारतीय मूर्तिविज्ञान और मुद्राविज्ञान अपनी नयी ऊँचाई को छूने की ओर अग्रसर हुआ। हमें सिक्कों से कई ऐसी जानकारियाँ प्राप्त हो जाती है जो कि अन्य किसी भी माध्यम से प्राप्त होना संभव नहीं हो पाता है। वाशुदेव की प्रतिमा का प्राचीनतम अंकन एक मौर्यन पञ्च मार्क सिक्के से ही मिलता है। करीब 100 ईसापूर्व के समय में मथुरा मूर्ती विज्ञान की नयी परंपरा का प्रादुर्भाव हुआ और यह वही समय था जब अमरावती, साँची आदि का निर्माण होना शुरू हुआ था। मथुरा से प्राप्त विष्णु की प्रतिमा जो कि द्वितीय शताब्दी ईस्वी की है, को भारत के प्राचीनतम विष्णु प्रतिमाओं में से एक मानते हैं। यहाँ से जो समय शुरू हुआ वह भारतीय मूर्ती विज्ञान में एक नया आयाम जोड़ता है। गुप्त साम्राज्य को हिन्दू मूर्तियों का विकास करने वालों के रूप में जाना जाता है। इसके उदाहरण विष्णु की 5 वीं शताब्दी पुरानी मृण्मूर्ति है जो कि चतुरानन शैली की है।

विष्णु विश्वरूप प्रतिमा, पांचवी शताब्दी - मथुरा
मथुरा से गुप्त काल में मानो कला में एक क्रान्ति का जन्म हुआ था जिसने भगवान विष्णु की मूर्तिविज्ञान को एक नया आयाम प्रदान किया था। इसके अलावा शिव की भीबड़ी संख्या में मूर्तियों और मंदिरों की स्थापना की गयी उदाहरण के लिए- ललितपुर दशावतार मंदिर, नाचना कुठार मन्दिर, भूमरा शिव मंदिर आदि। कालान्तर में विभिन्न वंश आयें जिन्होंने विष्णु की मूर्ती शैली पर कुछ ना कुछ नया करने की कोशिश की।

विष्णु की प्रतिमा को पहचानने के लिए कुछ प्रमुख बिंदु हैं -
शंख, चक्र, गदा और पद्म, इन सभी में से कुछ या ये चारो ही विष्णु के हाथ में विराजित होंगे इसके अलावा विष्णु को किरीट मुकुट में प्रदर्शित किया जाता है। वराह अवतार में विष्णु को जंगली सूअर के मुख और मनुष्य के धड के रूप में दिखाया जाता है जो कि पृथ्वी को अपने दांत पर उठाकर खड़े होते हैं। त्रिविक्रम की प्रतिमा को पहचानने के लिए देखना पड़ता है कि विष्णु को तीन पैरों वाला दिखाया गया है या नहीं क्यूंकि ये तीनों पैर पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग को प्रस्तुत करते हैं। वामन अवतार में विष्णु को ठिगना दिखाया गया है और वे अपने आयुधों में से कोई न कोई आयुध लिए रहते हैं। कुर्म अवतार में विष्णु को कछुए जैसा दिखाया जाता है। विश्वरूप अवतार में विष्णु को अपने सभी दसों अवतार के साथ दिखाया जाता है। नरसिंह अवतार में विष्णु को आधे शेर और आधे मनुष्य के रूप में दिखाया जाता है बाकी का उनके कमर पर हिरण्याक्ष को दिखाया जाता है। वराह अवतार के लिए उदयगिरी विदिशा की वाराह की प्रतिमा को देखा जा सकता है।

सन्दर्भ:-
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Vishvarupa
2. https://vedicfeed.com/symbols-of-lord-vishnu/
3. https://en.wikipedia.org/wiki/Hindu_art#Development_of_the_iconography_of_Vishnu
4. https://en.wikipedia.org/wiki/Vaikuntha_Chaturmurti
5. https://en.wikipedia.org/wiki/Narasimha
6. https://en.wikipedia.org/wiki/Varaha



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