भारत में बसी अफ्रीकी मूल की आबादी का देश में योगदान

मेरठ

 02-01-2020 03:59 AM
सिद्धान्त 2 व्यक्ति की पहचान

कई बार रास्ते पर चलते हुए हमें कई ऐसी चीजें दिखाई दे जाती हैं जो कि अचानक ही यह प्रश्न पूछ जाती हैं कि आखिर यह यहाँ कैसे? ऐसे ही मांडू, मुंबई, लखनऊ आदि का सफ़र करते हुए बाओबाब (Baobab) का पेड़ दिखाई दे जाता है। आखिर यह पेड़ यहाँ आया कैसे यह एक बड़ा प्रश्न है क्यूंकि यह तो अफ्रीकी मूल का पेड़ है? परन्तु बहुत कम लोग ये जानते हैं कि अफ्रीका और भारत का रिश्ता बहुत ही पुराना है। यह ऐसे भी समय की बात करता है जिसे काला इतिहास भी कहा जाता है। काला इतिहास अर्थात जब लोगों को खरीदा और बेचा जाना एक आम बात थी। अफ्रीका के लोग शरीर से मज़बूत और लड़ाके हुआ करते थे। ऐसे में पूरी दुनिया भर के लोग इनको अपनी ओर बुलाने का कार्य किया करते थे। अफ्रिका में प्राचीन काल से दास प्रथा का आगमन हो गया था लेकिन इसमें तेज़ी तब आई जब फ़्रांस, इंग्लॅण्ड, पुर्तगाल और डच आदि ने दुनिया भर में फैलना और अपनी ताकत दिखाना शुरू किया।

भारत में इनका पहला आगमन करीब 628 ईस्वी में भरूच के बंदरगाह पर हुआ था। तब से लेकर अंग्रेजों के शासन काल तक अफ़्रीकी लोगों को खरीदा और बेचा जाना शुरू रहा था। भारत में कुछ अत्यंत ही महान शासक भी हुए जो कि अफ़्रीकी मूल के ही थे- उदाहरण के लिए जौनपुर की ही शर्की सल्तनत को ले लिया जाए। जौनपुर की शर्की सल्तनत की स्थापना मलिक सरवार ने की थी। ऐसा कहा जाता है कि मलिक सरवार अफ्रीकी मूल का था। संगीत की ओर भी अफ्रीकियों का एक बड़ा योगदान रहा है। जैसा कि अफ़्रीकी सिदी लोग गायन और नृत्य कला में पारंगत थे तो इनका प्रभाव ज़रूर ही भारत के संगीत और नृत्य पर भी पड़ा। माना जाता है कि शर्की सुल्तान ने राग जौनपुरी को एक बहुत ही महत्वपूर्ण राग के रूप में विकसित किया था तो हो सकता है कि इसमें अफ़्रीकी शैली का मिश्रण हो। सिदीयों ने भारत में कालान्तर में अपने राज्यों की भी स्थापना की जिनमें से मध्यकाल के जंजीरा और सचिन हैं। ये दोनों स्थान सिदीयों द्वारा बसाए गए और इनपर उनका ही राज काफी लम्बे समय तक रहा था। सिदीयों की वास्तुकला भी भिन्न है जिसमें अन्य वास्तुओं की तरह विशाल गुम्बद तो नहीं होते परन्तु हाँ इनमें मेहराब अधिक ऊंचे होते हैं। सिदीयों की वास्तुकला में हमें अफ़्रीकी झलक देखने को मिलती है। इस वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है गुजरात के अहमदाबाद में स्थित सिदी सय्यद मस्जिद।

वर्तमान काल में ये एक ज़िल्लत का जीवन जी रहे हैं जिसका कारण यह है इनकी संख्या और मुख्य धारा से इनका कटाव। सिदी शारीरिक रूप से अत्यधिक सक्षम होते हैं जिस कारण से आज के समय में दौड़ आदि खेल में इनकी भूमिका को प्रमुखता से देखा जा सकता है। अभी हाल ही में सिदी लड़कियों का खेल के क्षेत्र में योगदान उभर कर सामने आया था। यह समाज आज उपेक्षित है जिसका संरक्षण किया जाना अत्यंत आवश्यक है।

संदर्भ:
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Siddi
2. https://on.nypl.org/36d3W7s
3. https://www.indiantribalheritage.org/?p=11852
4. https://bit.ly/2F90kYm

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