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प्रथम तथा द्वितीय विश्‍वयुद्ध में मेरठ की भूमिका एवं उसका प्रभाव

मेरठ

 02-08-2019 12:32 PM
उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

विश्‍व के लिए वर्ष 1914-1918 और 1939-1945 अंधकारमय रहे, जिसकी भयावहता को विश्‍व इतिहास से मिटाना असंभव है। यह दौर था प्रथम विश्‍व युद्ध और द्वितीय विश्‍व युद्ध का, जिसके प्रभाव से विश्‍व का शायद ही कोई राष्‍ट्र अछूता रहा होगा। भारत में भी इसके प्रत्‍यक्ष प्रभाव देखे गए। प्रथम विश्व युद्ध (WWI) के दौरान ब्रिटिश के साथ लगभग 15 लाख भारतीय सैनिकों ने हिस्‍सा लिया, जबकि द्वितीय विश्‍व युद्ध में लगभग 25 लाख भारतीय सैनिकों ने हिस्‍सा लिया। यह सैनिक भारत की अत्‍यंत पिछड़ी पृष्‍ठभूमि से आए थे किंतु इन्‍होंने अंग्रेजों से अपनी बहादुरी का लोहा मनवा लिया।

ब्रिटेन की ओर से प्रथम विश्‍व युद्ध के दौरान यूरोप पहुंचने वाली पहली भारतीय सेना लाहौर डिवीज़न (Division) और मेरठ डिवीज़न की थी। जो 26 सितंबर 1914 को पहली बार मार्सिले (यूरोप) पहुंचे। अक्‍टूबर में भारतीय सैनिकों को इप्रेस (Ypres) की कुछ भयंकर लड़ाइयों में भेजा गया। मार्च 1915 में भारतीय सैनिकों ने न्‍यूव चैपल (Neuve Chapelle) के महासंग्राम की आधी बागडोर संभाली, जिसमें बड़ी मात्रा में सैनिक मारे गए। फ्रांस की लड़ाई में घायल हुए भारतीय सैनिकों को उपचार के लिए ब्रिटेन भेजा गया। ब्राइटन में, रॉयल पवेलियन (Royal Pavilion) को भारतीय सैनिकों के लिए एक सैन्य अस्पताल में बदल दिया गया था। कहा जाता है कि यूरोप में भारतीय सैनिकों की छोटी से छोटी जरूरतों का विशेष ध्‍यान रखा गया।

प्रथम विश्‍व युद्ध में 1,38,608 भारतीय सैनिकों (जिसमें दो पैदल सेना डिवीज़न, दो घुड़सवार डिवीज़न और चार मैदानी तोप वाहिनी सेना शामिल थी) ने पश्चिमी मोर्चे में भाग लिया। यहां, 7,700 भारतीय सैनिक मारे गए, 16,400 घायल हुए और 840 लापता हो गए या उन्हें कैदी बना लिया गया। युद्ध के बाद भारतियों को दिए गए बारह विक्टोरिया क्रॉस (Victoria Cross) में से छह पश्चिमी मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों को दिए गए थे। पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय सेना के लिए मुख्य स्मारक सर हर्बर्ट बेकर द्वारा डिज़ाइन (Design) किया गया था, जिसे 1927 में न्‍यूव चैपल में खोला गया था। लाहौर और मेरठ डिवीज़न के युद्ध में दिए गए योगदान को याद करने के लिए इंग्लैंड के ब्रोकेनहर्स्ट शहर की एक सड़क का नाम "मेरठ रोड" रखा गया है, जिसके विषय में हम अपने लेख में पहले लिख चुके हैं।

मेरठ कैवलरी ब्रिगेड (Meerut Cavalry Brigade) ने प्रथम तथा द्वितीय दोनों विश्‍व युद्ध में अपनी अतुलनीय सेवा दी। यह 1914 से 1940 तक अस्तित्‍व में रही। प्रथम विश्‍व युद्ध के दौरान मेरठ कैवलरी ब्रिगेड 7वीं मेरठ डिवीज़न का हिस्‍सा थी। 19 अक्टूबर को 7वां (मेरठ) कैवेलरी ब्रिगेड बॉम्बे से पश्चिमी मोर्चे के लिए रवाना हुआ। 21 नवंबर 1914 को मूल ब्रिगेड को 14वें (मेरठ) कैवलरी ब्रिगेड से प्रतिस्‍थापित कर दिया गया था। फरवरी 1915 में चौथे (मेरठ) कैवलरी ब्रिगेड के रूप में इसे पुनः प्रारंभ किया गया। सितंबर 1920 में इसे तीसरे भारतीय कैवलरी ब्रिगेड के रूप में नया स्वरूप दिया गया तथा बाद के दशक में यह तीसरा (मेरठ) कैवलरी ब्रिगेड के नाम से जाना गया। इस ब्रिगेड ने विश्‍व युद्ध के साथ-साथ अन्‍य कई युद्धों में भी भाग लिया।

दोनों ही विश्‍व युद्ध में भारतीय सैनिकों ने अपना अदम्‍य साहस दिखाया। इन सैनिकों में से अधिकांश के नाम आज इतिहास के पन्‍नों में कहीं खो गए हैं। इन बहादुर सैनिकों में से एक थी नूर इनायत खान जिन्‍हें ब्रिटिश सेना के एक गुप्‍त संगठन स्‍पेशल ऑपरेशन एक्जीक्यूटिव (Special Operation Executive (SOE)), में शामिल किया गया तथा इन्‍हें एक वायरलेस ऑपरेटर (Wireless operator) के रूप में प्रशिक्षित किया गया था। किंतु इनके समूह का पर्दाफाश हो गया, लेकिन फिर भी इन्‍होंने अकेले काम करते हुए ब्रिटिश सैन्य कमान में वायरलेस पर कोडित संदेशों को प्रसारित किया। 1943 में उन्हें जर्मनों द्वारा मार दिया गया। इनके साहस के लिए इन्‍हें मरणोपरांत फ्रांसिसी सरकार ने गोल्ड स्टार (Gold Star) के साथ क्रॉय डी गुएर (Croix de Guerre) तथा 1949 में ब्रिटिश सरकार ने जॉर्ज क्रॉस (George Cross) से सम्‍मानित किया।

पूर्व में, भारतीय सैनिक, ब्रिटिश भारतीय सेना की ओर से, जापानियों के विरूद्ध लड़े तथा दक्षिण पूर्व एशिया (सिंगापुर, मलय प्रायद्वीप और बर्मा) को सुरक्षित किया। भारतियों ने विश्‍व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भूमि पर श्रमिक से लेकर चिकित्‍सीय क्षेत्रों में अपनी सेवा दीं, जिसमें महिलाएं एवं पुरूष दोनों शामिल थे। दूसरे, युद्ध के बाद के सैन्य सुधारों से भारतीय सेना को आधुनिक बल में बदलने की प्रक्रिया शुरू हुयी। 1946 तक, भारतीय सेना एक शक्तिशाली सेना बन गयी थी। इसी वर्ष हुए रॉयल इण्डियन नेवी (Royal Indian Navy) के विद्रोह ने ब्रिटिश सेना को अपने निर्णय में परिवर्तन करने के लिए विवश कर दिया। हालांकि आज यह विद्रोह भुला दिया गया है। युद्ध के पश्‍चात भारत में कई सामाजिक आर्थिक बदलाव आए, शिक्षा का स्‍तर बढ़ा। सामाजिक और सांस्कृतिक मानदंडों में भी परिवर्तन आया, समाज में महिलाओं की भूमिका बदली। भारतीय उद्योगों के विकास और निर्यात में वृद्धि हुयी। इस युद्ध के बाद जहां भारत की स्थिति सुधरने लगी तो वहीं ब्रिटेन की स्थिति काफी पिछड़ गयी। अब ब्रिटेन इस अवस्‍था में नहीं था कि वह लंबे समय तक भारत पर शासन कर सके, इसके साथ ही भारत में भी स्‍वतंत्रता की मांग परवान चढ़ने लगी थी। अंततः 15 अगस्‍त 1947 को ब्रिटेन को भारत को स्‍वतंत्रता देनी पड़ी और यहीं से स्‍वतंत्र भारत का सफर प्रारंभ हुआ।

संदर्भ:
1.https://bit.ly/2OAGlcI
2.https://bit.ly/335OGYZ
3.https://bit.ly/2yvcmb5
4.https://bit.ly/2KjPsJo
5.https://bit.ly/1koOFbM
6.https://bit.ly/2LXYZJ6
7.https://en.wikipedia.org/wiki/3rd_(Meerut)_Cavalry_Brigade



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