भगवान शिव के गंगाधर नाम का छुपा हुआ अर्थ

मेरठ

 04-03-2019 09:20 AM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

भगवान शिव को गंगाधर भी कहा जाता है, जिसके पीछे एक पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि एक समय था जब मां गंगा स्वर्ग लोक में बहती थी और यहां इन्हें आकाश गंगा के नाम से जाना जाता था तथा एक देवी थी। उनका उद्भव भी स्वर्ग लोक में ही हुआ था। परंतु हिंदू परंपरा के अनुसार, पृथ्वी के लोगों के उद्धार के लिये राजा भागीरथ ने मां गंगा को धरती पर लाने के लिए तपस्या की।

किन्तु गंगा का प्रवाह बहुत तेज और प्रचंड था, धरती उनके प्रवाह बल को सहन नहीं कर सकती थी। इसलिये मां गंगा ने भागीरथ से कहा कि स्वर्ग लोक से गंगा सीधे पृथ्वी पर प्रवाहित नहीं हो सकती है, क्योंकि उनके प्रवाह का वेग बहुत तेज है। केवल भगवान शिव ही है जो इस प्रचंड और तेज प्रवाह के बल को सहन कर सकते है। इसलिये भागीरथ ने पुनः तपस्या की ताकि भगवान शिव स्वर्ग-लोक से गंगा को धरती पर अवतरित करने में भागीरथ की सहायता कर सके। उनकी तपस्या से भगवान शिव मान भी गये। उन्होंने गंगा प्रचंड के प्रवाह को अपनी जटाओं में समा लिया और उन्हें बाँध लिया। इसके बाद वे जंगलों में जा कर अपने ध्यान में लीन हो गये। उस समय तक उन्होंने गंगा के जल को धरती पर बहने की अनुमति नहीं दी थी।

फिर भागीरथ के पुनः प्रार्थना के बाद भगवान शिव ने गंगा को धरती पर धीरे-धीरे बहने की अनुमति दी। इसलिए, भगवान शिव गंगाधर अर्थात गंगा को धारण करने वाले के रूप में प्रसिद्ध हुए। इसलिए भगवान शंकर को गंगाधर कहा जाता है। इस कहानी का एक आध्यात्मिक महत्व भी है जिसे बहुत कम लोग जानते है। इस कहानी में मां गंगा लौकिक, परम सत्य, परम वास्तविकता, मनुष्य में देवत्व तथा आत्मन् के ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती हैं जबकि शिव की जटाएं आत्म-नियंत्रण तथा अंतर्मुखी व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह कहानी यह दर्शाता है कि केवल शिव (जो आत्म-नियंत्रण और प्रताती व्यक्तित्व के थे) ही गंगा के प्रवाह बल (आध्यात्मिक ज्ञान या आत्मन् का ज्ञान और सत्य के प्रतीक) को धारण कर सकते हैं। अर्थात आत्मन् ज्ञान की प्राप्ति उसी मनुष्य को हो सकती है जो आत्म-नियंत्रण व्यक्तित्व का हो।

आत्मन् का ज्ञान प्रतीकात्मक रूप से स्वर्ग में सबसे ऊपर स्थित होने के रूप में दर्शाया गया है। एक भोगी, बहिर्मुखी मनुष्य आत्मन् के ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता है। यह ज्ञान केवल उसी को प्राप्त हो सकता है जो शिव के समान आत्म-नियंत्रण, अंतर्मुखी तथा चिंतन वाले व्यक्तित्व का हो। ज्ञान प्राप्ति के लिए आवश्यक प्राथमिक योग्यताएं शिव के व्यक्तित्व का प्रतीक हैं। शिव को उनके महान तपों, चिंतन और मनन के लिए जाना जाता है। इसलिये केवल शिव ही थे जो गंगा के प्रवाह रूपी आध्यात्मिक ज्ञान को अपने चिंतन मनन तथा आत्म-नियंत्रण से ग्रहण कर सकते थे। और इस कहानी में भगवान शिव द्वारा गंगा को धरती पर धीरे-धीरे बहने की अनुमति देना ये दर्शाया है कि धीरे-धीरे और धीमी गति से शिक्षा प्राप्त करके आध्यात्मिक ज्ञान को इस दुनिया में प्राप्त किया जा सकता है। आध्यात्मिक सत्य के ज्ञान को दुनिया के लोगों को धीरे-धीरे और सावधानी से समझना होगा।

भगवान शिव को कभी-कभी उनके हाथ में एक त्रिशूल के साथ भी दिखाया जाता है। भगवान शिव का ये त्रिशूल शरीर, मन और बुद्धि की आकांक्षाओं के साथ अहंकार के विनाश का प्रतीक है। इस त्रिशूल के माध्यम से भगवान शिव अपने अहंकार पर जीत और पूर्णता की स्थिति को प्राप्त करने का संकेत देते हैं।

संदर्भ:
1. Parthasarathy, A. (1989) The Symbolism Of Hindu Gods And Rituals. Vedanta Life Inst.

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