Machine Translator

उत्तर भारत का ऐतिहासिक मेरठ नौचंदी मेला

मेरठ

 21-12-2018 07:00 AM
मध्यकाल 1450 ईस्वी से 1780 ईस्वी तक

उत्तर भारत का ऐतिहासिक मेला नौचंदी आज भी सद्भाव की खुशबू महका रहा है। कौमी एकता की जिंदा मिसाल सिद्ध होते इस मेले में बड़ी संख्या में हिन्दू-मुस्लिम और अन्य धर्मों के लोग मां चंडी मंदिर और बाले मियां की मज़ार के समीप होने वाले कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। हज़रत बाले मियां की दरगाह एवं नवचण्डी देवी (नौचन्दी देवी) का मंदिर एक दूसरे के निकट ही स्थित है। मेले के दौरान मंदिर की घंटियों के साथ अज़ान की आवाज़ एक सांप्रदायिक अध्यात्म की प्रतिध्वनि देती है। जहाँ मंदिर में भजन कीर्तन होते रहते हैं वहीं दरगाह पर कव्वाली आदि होती है।

346 साल पुराना नौचंदी का मेला अपने अन्दर कई सैकड़ों वर्षों का इतिहास समेटे हुए है। यह 1672 में पशु मेले के रूप में शुरू हुआ था। मुगल काल से चले आ रहा नौचंदी मेला स्वतंत्रता आंदोलनों का भी साक्षी रहा। 1857 में नाना साहेब स्थानीय लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने के लिए प्रेरित करने के लिए इस स्थान पर आए थे। चाहे कुछ भी हो जाए यह मेला हर वर्ष आयोजित होता है, केवल 1857 के विद्रोह के बाद 1858 में इसे आयोजित नहीं किया गया था। वहीं 1884 में एफ.एन.राइट, मेरठ जिले के तत्कालीन कलेक्टर, ने यहाँ पर एक घोड़ा प्रदर्शनी शुरू की जहां अच्छी नस्ल वाले घोड़ों को बेचा और खरीदा गया। इसके बाद व्यापार को आकर्षित करने के लिए अन्य कई कार्यकलापों को भी शुरु किया गया।

इंडो-पाक मुशायरा इस मेले की जान हुआ करता था, इसमें हिंदुस्तान के साथ पड़ोसी मुल्क के शायरों को भी न्योता दिया जाता था। कहते हैं कि नौचंदी का मेला पहले दिन के समय आस पास के गाँववासियों के लिए होता था और रात को मेरठ शहर का होता था। दिन में दूर-दूर से लोग इस मेले में खरीददारी करने आते थे, जबकि रात होते ही यहां शहरवासियों की भीड़ लग जाती थी। यहाँ पर कई अलग-अलग स्टॉल, धार्मिक अनुष्ठान, कलात्मक और वाणिज्यिक आनंद शामिल होते हैं। यहाँ लखनऊ की मशहूर चिकन कढ़ाई, मुरादाबाद के पीतल के बर्तन, वाराणसी के कालीन, रेशम साड़ियों, आगरा के जूतों, कानपुर और मेरठ के चमड़े के सामानों आदि के स्टॉल शामिल रहते हैं।

नौचंदी के मेले के समय यहां के मैदान में काफी चहल-पहल देखने को मिलती है, परंतु बाकी के 10 महीनों तक यह मैदान खाली और गंदा पड़ा रहता है, जब नौचंदी मेला नहीं लगा हुआ होता है। इसे देखते हुए 2016 में जिला प्रशासन ने इस मैदान पर शिल्प और सांस्कृतिक विषयों से संबंधित एक ‘सांस्कृतिक तथा शिल्प’ मेले को आयोजित करने की मंजूरी दे दी थी। इस प्रकार मेरठ में सांस्कृतिक तथा शिल्प मेले का प्रारम्भ 2 अक्टूबर 2016 से होने लगा। इस छः दिवसीय मेले में विभिन्न राज्यों के कलाकार अपनी प्रदर्शनियां लगाते हैं और साथ ही साथ यहां पर कमांडो नेट (Commando Net), ट्रैम्पोलिन बंजी (Trampoline bungee), तीरंदाजी जैसे कई साहसिक खेलों को भी देखा जाता है।

संदर्भ:
1.https://en.wikipedia.org/wiki/Nauchandi_Mela
2.https://bit.ly/2EESAz3
3.https://www.ixigo.com/tell-me-about-nauchandi-mela-fq-2002587
4.https://inextlive.jagran.com/cattle-fair-nauchandi-133592
5.https://bit.ly/2AaXY9k



RECENT POST

  • नवाबों की शानदार जीवन शैली की याद दिलाता है, मुस्तफा महल
    वास्तुकला 1 वाह्य भवन

     13-07-2020 04:38 PM


  • शास्त्रीय संगीत कार्टूनों के लिए इतना उपयुक्त क्यों है
    ध्वनि 1- स्पन्दन से ध्वनि

     12-07-2020 02:40 AM


  • सिन्धु सभ्यता के लेख
    ध्वनि 2- भाषायें

     10-07-2020 05:22 PM


  • कैसे उत्पन्न होता है टिड्डी का झुंड
    तितलियाँ व कीड़े

     10-07-2020 05:29 PM


  • एक महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय विश्व समूह है, रूस-भारत-चीन समूह
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     08-07-2020 06:44 PM


  • मेरठ के आलमगीरपुर का समृद्ध इतिहास
    सभ्यताः 10000 ईसापूर्व से 2000 ईसापूर्व

     08-07-2020 07:41 PM


  • भाषा स्थानांतरण के फलस्वरूप गुम हो रही हैं विभिन्न क्षेत्रीय बोलियां
    ध्वनि 2- भाषायें

     07-07-2020 04:50 PM


  • मेरठ और चिकनी बलुई मिट्टी के अद्भुत उपयोग
    भूमि प्रकार (खेतिहर व बंजर)

     06-07-2020 03:34 PM


  • क्या अन्य ग्रहों में होते हैं ग्रहण
    जलवायु व ऋतु

     04-07-2020 07:22 PM


  • भारत के शानदार देवदार के जंगल
    जंगल

     03-07-2020 03:12 PM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.