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शिवाजी महाराज व अफजल खान का खौफनाक किस्सा, बयां कर रहा प्रतापगढ़ किला

मेरठ

 19-02-2024 10:24 AM
वास्तुकला 1 वाह्य भवन

भारत माता के वीर सपूत – छत्रपति शिवाजी महाराज, नैतिक प्रथाओं में विश्वास रखते थे, और लोगों के साथ सम्मान और निष्पक्षता से व्यवहार करते थे। सैन्य रणनीति, बुनियादी ढांचे और प्रशासन के प्रति उनके अभिनव दृष्टिकोण ने उनके राज्य को बढ़ने और समृद्ध होने में मदद की।
एक महान नेता और दूरदर्शी के रूप में शिवाजी महाराज की विरासत दुनिया भर के लोगों को प्रेरित करती रहती है। इसलिए, आज 19 फरवरी को उनके जन्मदिन पर, ‘शिवाजी महाराज जयंती’ बड़े उत्साह के साथ, मनाई जाती है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि, छत्रपति शिवाजी महाराज महाराष्ट्र के इतिहास में सबसे प्रतिष्ठित शासकों और योद्धाओं में से एक हैं। कई अन्य महत्त्वपूर्ण बातों के अलावा, शिवाजी महाराज रणनीतिक स्थानों पर किले स्थापित करने में अपनी विशेषज्ञता के लिए जाने जाते थे। इसी प्रक्रिया में, प्रतापगढ़ किला भी वास्तुशिल्प चमत्कार से कम नहीं था। तो आइए, आज शिवाजी जयंती के मौके पर, महाराष्ट्र में स्थित इस प्रतापगढ़ किले तथा, इस किले से जुड़ी एक महत्त्वपूर्ण घटना के बारे में भी जानते हैं। भारतीय इतिहास के कई प्रसंगों को नाटकीय कहानियों में बदल दिया गया है, जिन्हें भारत के बाहर भी दर्शक मिले हैं, जबकि, कुछ प्रसंग आज भी कई दर्शकों तक पहुंचने बाकी हैं। ऐसी ही एक कहानी, प्रतापगढ़ किले की है, जो महाराष्ट्र की जनसांख्यिकी से परे शायद ही कभी कही और सुनी जाती है। प्रतापगढ़ किला भारत में मराठा समुदाय के इतिहास एवं गौरव का प्रतीक है। यह किला अपने आप में मराठा सरदार छत्रपति शिवाजी की बीजापुर सल्तनत के मुख्य सेनापति अफजल खान पर भारी जीत की एक जीवित किंवदंती भी है।

प्रतापगढ़ किले में पर्यटक आकर्षण की विशेषताएं – सुंदर परिदृश्य, चारो तरफ फैली हरियाली, शांत वातावरण और रमणीय तटीय जमाव है। वर्ष 1656 में शिवाजी महाराज द्वारा निर्मित, प्रतापगढ़ किला कोंकण तट पर, एक विशाल परिसर के साथ स्थित, एक मजबूत गढ़ है। यह महाराष्ट्र के सातारा जिले में स्थित, महाबलेश्वर से लगभग 24 किलोमीटर दूर है। इस किले के परिसर के अंदर कुछ तालाब, कक्ष और बगीचे हैं। किले के चारों ओर, शांत और हरा-भरा ग्रामीण इलाका उन लोगों के लिए एक आदर्श ठिकाना है, जो शांति से कुछ समय बिताना चाहते हैं। परिसर से अंदर की ओर जाने वाले और अंदरूनी हिस्से को भेदने वाले अंधेरे रास्ते, किले के रहस्य को उजागर करते हैं। प्रतापगढ़ किले की विशाल संरचना को दो खंडों – ऊपरी और निचले – में विभाजित करने वाली दोहरी किलेबंदी, प्रतापगढ़ किले की एक दुर्लभ संरचनात्मक विशेषता है। अब आइए, इससे जुड़ी रोमांचक घटना के बारे में जानते हैं। मावल क्षेत्र में शिवाजी के बढ़ते प्रभाव से असुरक्षित महसूस करने वाले, तत्कालीन बीजापुर में आदिलशाही शासन का उद्देश्य, शिवाजी महाराज की हत्या करना था। इस प्रकार, आदिलशाही सेना के सेनाध्यक्ष, यानी अफ़ज़ल खान ने शिवाजी के खिलाफ अभियान का नेतृत्व किया, ताकि शिवाजी को मैदानी इलाकों में लाया जा सके। क्योंकि, इससे उनकी ताकत बढ़ सकती थी। ऐसे कदम में, अफ़ज़ल खान ने शिवाजी के राज्य में स्थित पवित्र शहर – पंढरपुर पर हमला किया, और बाद में तुलजापुर में भवानी देवी के मंदिर को ध्वस्त कर दिया।
प्रतापगढ़ की लड़ाई 10 नवंबर, 1659 को ‘प्रतापगढ़ के किले’ में शिवाजी और अफ़ज़ल खान के बीच लड़ी गई थी। यह किसी क्षेत्रीय शक्ति के खिलाफ मराठों की पहली बड़ी जीत थी, जिसके कारण अंततः मराठा साम्राज्य की स्थापना हुई। अफ़ज़ल खान ने युद्ध में शिवाजी के भाई को मार डाला था, लेकिन, शिवाजी युद्ध नहीं चाहते थे। इसलिए, समझौता वार्ता करने हेतु, बैठक की व्यवस्था की गई थी। दोनों के बीच निहत्थे मिलने के समझौते के बावजूद, दोनों के पास हथियार छिपे हुए थे। जहां अफ़ज़ल खान ने शिवाजी को मारने के लिए खंजर ले रखा था, वहीं शिवाजी ने अपनी रक्षा के लिए, बाघ नखों(हाथों की उंगलियों में पहना जाने वाला, बाघों के नखों जैसा एक हथियार) को अपने कपड़ों में छुपा लिया था। शिवाजी ने भी अपनी सुरक्षा के लिए कवच पहन रखा था, क्योंकि, उन्हें पता था कि अफ़ज़ल ख़ान भरोसेमंद नहीं है। हालांकि, खुद को बचाने के लिए शिवाजी का विचार सफल साबित हुआ, क्योंकि अफ़ज़ल खान ने अपने शैतानी इरादे के तहत, शिवाजी को गले लगाने के लिए, उनकी पीठ में छुरा घोंपने की कोशिश की। लेकिन शिवाजी को मारने का दुष्ट प्रयास विफल हो गया, क्योंकि खंजर उनके कवच से विक्षेपित हो गया। इसके बाद, शिवाजी महाराज ने, खान के पेट पर बाघ नखों से वार करते हुए, उसे मार दिया। यह लड़ाई आदिलशाहियों के लिए एक बड़ी हार साबित हुई, क्योंकि इसमें इनके सेनाध्यक्ष के साथ, कुल 5000 सैनिकों की हानि हुई थी।
ऐसी कई घटनाओं के साक्षी बनें, किलों पर सुरक्षा के लिए, किलेबंदी होती थी। भारतीय उपमहाद्वीप में किलेबंदी पहली बार संभवतः चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के आसपास, हड़प्पाकालीन बस्तियों के रूप में दिखाई दी थी। वास्तुशिल्प और अनिवार्य रूप से मानव बस्तियों को परिभाषित करने और उनकी रक्षा करने वाली परिधि वाली दीवारें थीं। इनकी निर्माण सामग्री मिट्टी या पकी हुई ईंटें, मिट्टी के गारे से तैयार पत्थर की चिनाई और मिट्टी के लेप से संरक्षित थी। ऐसी ही किलेबंदी बाद में, हमारे देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित किलों की भी प्रमुख विशेषता थी। और, शिवाजी महाराज के किले तो ऐसी सुरक्षा रणनीतियों के लिए, काफ़ी प्रसिद्ध थे। इसलिए, देश के पुरातत्व निदेशालय और महाराष्ट्र राज्य ने, राज्य से कुल 12 किलों को आकर्षण, महत्त्व और राज्य के इतिहास में प्रदर्शित उनके अपने अद्वितीय मूल्य के आधार पर, यूनेस्को विश्व विरासत स्थलों (UNESCO World Heritage Sites) की सूची के लिए चुना है। यह हम सभी भारतवासियों के लिए, गर्व की बात है।

संदर्भ
http://tinyurl.com/hy7btne8
http://tinyurl.com/nhz4bxvy
http://tinyurl.com/yc86ppex

चित्र संदर्भ
1. अफ़ज़ल ख़ान का वध करते छत्रपति शिवाजी महाराज और प्रतापगढ़ दुर्ग को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia, picryl)
2. घोड़े पर बैठे छत्रपति शिवाजी महाराज को संदर्भित करता एक चित्रण (picryl)
3. भागने की कोशिश करते हुए शिवाजी (दाएं) द्वारा शाइस्ता खान पर हमला करने का 20वीं सदी का चित्रण। (wikimedia)
4. बाघ नख को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)
5. रायगढ़ दुर्ग को संदर्भित करता एक चित्रण (wikimedia)

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