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2600 ईसा पूर्व शुरू हुई प्रसिद्ध सभ्यताओं में से एक है, सिंधु घाटी सभ्यता

One of the famous civilizations started in 2600 BC, Indus Valley Civilization

Meerut
07-02-2021 12:18 PM

सिंधु घाटी सभ्यता लगभग 2600 ईसा पूर्व शुरू हुई सभ्यताओं में से एक है। इस सभ्यता के विभिन्न स्थलों पर समय-समय पर खुदाई की जाती रही है। इस सभ्यता में कई संरचनाएँ पायी गयी हैं, जिनमें विभिन्न प्रतिमाएँ, गहने, बर्तन, मकान आदि शामिल हैं। यहां विभिन्न शहरी केंद्र थे, जिनमें मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, धोलावीरा, लोथल आदि शामिल हैं। इस सभ्यता के इन सभी स्थलों से यह साक्ष्य प्राप्त होता है कि, उस समय लोगों द्वारा कृषि व्यापक रूप से की गई थी और पशुओं को भी पालतू बनाया गया था। उन्होंने उन अनाजों और दालों को उगाया, जिनकी उन्हें आवश्यकता थी। इस सभ्यता के बारे में जानने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन सभ्यता का केवल एक तिहाई हिस्सा ही अभी हमें ज्ञात हुआ है। यहां खुदाई तब शुरू हुई, जब भारत और पाकिस्तान संयुक्त देश थे। भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के राज्यों में इस महान सभ्यता के विभिन्न साक्ष्य मिल सकते हैं। इस सभ्यता के सभी घर एक ही आकार के थे, जिन्हें एक ही आकार की ईंटों से बनाया गया था, जो उस समय के एकल शासन के साक्ष्य प्रदान करते हैं। यह सभ्यता व्यापार के साक्ष्य भी प्रदान करती है, क्यों कि, खुदाई में विभिन्न प्रकार की मुहरें प्राप्त हुईं, जिनका उपयोग मेसोपोटामिया (Mesopotamia) जैसे आस-पास के क्षेत्रों के साथ व्यापार के लिए किया गया था। प्राकृतिक आपदा के कारण यह सभ्यता काफी हद तक समाप्त हो गई, किंतु इसने हमारे लिए एक ऐसे इतिहास को जन्म दिया है, जिसे हम हमेशा याद करते हैं और उसकी प्रशंसा करते हैं।

 

संदर्भ:

https://youtu.be/cXurNuduHCo

https://prarang.in/Meerut/2102075502





मेरठ के आलमगीरपुर का समृद्ध इतिहास

Rich history of Meerut's Alamgirpur

Meerut
08-07-2020 07:41 PM

संस्कृति किसी भी जगह के मूल को परिभाषित करती है कि वास्तव में वह जगह कैसी थी, किस तरह के लोग उसमें रहते थे। व्यक्ति की तरह राष्ट्र भी जीवित रहते हैं और मरते हैं, किंतु संस्कृति का कभी पतन नहीं होता।

मैजिनी (Mazzini)

मेरठ शहर अपनी संघर्ष गाथा के लिए ज्यादा जाना जाता है, लेकिन इसके पौराणिक संदर्भ जितने महत्वपूर्ण हैं, वे भी किसी से कम नहीं हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है यमुना किनारे स्थित आलमगीरपुर।

आलमगीरपुर सिंधु घाटी सभ्यता का एक पुरातात्विक स्थल है, जो यमुना नदी के किनारे फला-फूला। हड़प्पन-बारा bc 3300 से bc 1300 के बीच में भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मेरठ जिले में स्थित था। इसे सिंधु घाटी सभ्यता की पूर्वी सीमा माना जाता है।

ऐतिहासिक महत्व

आलमगीरपुर को 'परशुराम का खेड़ा' भी कहा जाता था। इसकी खोज आर एस एस (RSS) के एक कैंप द्वारा 1958 से पहले की गई थी।

उत्खनन

इसके बाद इस स्थल की खुदाई भारत सरकार के पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग द्वारा 1958 और 1959 में की गई।

कालखंड 1

खुदाई करने पर आलमगीरपुर के चार सांस्कृतिक चरणों का पता चला, जिनमें बीच-बीच में अंतराल भी थे। सबसे पुराने चरण की विशेषता थी 6 फीट की मोटाई वाली दीवार, जो हड़प्पा संस्कृति से जुड़ाव दर्शाती है। प्रमाण के तौर पर भट्टी में पकाई ईट मिली, लेकिन इस काल की कोई इमारत नहीं मिली।

शायद सीमित तरीके से की गई खुदाई इसकी वजह हो। ईटों का आकार 11.25 से 11.75 इंच लंबाई, 5.25 से 6.25 इंच चौड़ाई और 2.5 से 2.75 इंच मोटाई का था। बड़ी ईट औसतन 14 इंच की होती थी। जांच पड़ताल के बाद आलमगीरपुर का शुरुआती कालखंड 2600 ईसा पूर्व से 2200 ईसा पूर्व तय किया गया।

कलाकृतियां

यहाँ हड़प्पा काल के मिट्टी के बर्तन मिले और यह क्षेत्र खुद एक मिट्टी के बर्तनों की कार्यशाला था। चीनी मिट्टी से निर्मित सामग्री मिली, जिसमें छत की टाइल्स, प्लेट, कप , फूलदान, घनाकार पासा, मनके, टेराकोटा केक, कूबड़ वाले बैल और सांप की मूर्तियां शामिल थी। वहां मनके भी थे और आभूषण भी, जो साबुन के पत्थर, कांच, कार्नेलियन, बिल्लौर, गोमेद और काले जैस्पर से बने थे। थोड़े से धातु प्रमाण के रूप में एक टूटी हुई तांबे की पत्ती भी प्राप्त हुई।

अन्य प्राप्तियां

अलमगीरपुर में एक बर्तन पर ढक्कन की तरह इस्तेमाल किया गया भालू का सिर भी मिला। एक छोटी टेराकोटा की मनका जैसी आकृति सोने से मढ़ी मिली। कपड़े के होने के निशान भी मिले, कपड़े के लिए इस्तेमाल किया गया धागा बहुत अच्छी गुणवत्ता का था और बुनने का तरीका सादी बुनाई का था।

कालखंड 2

पहले और दूसरे कालखंड के बीच के अंतर का प्रतिनिधित्व तहों की शाब्दिक रचना और उनके सांस्कृतिक संयोजन में निहित है। कालखंड 1 से जुड़ी जमा सामग्री ठोस और पूरी थी, जबकि कालखंड 2 की सामग्री ढीली और सिलेटी थी तथा उस पर जली हुई राख के घेरे भी दिखाई दे रहे थे। हालांकि प्रमाण के तौर पर भट्टी में पकी ईट थी, लेकिन हड़प्पा काल का कोई निर्माण नहीं मिला, शायद सीमित खुदाई कार्यक्रम के कारण।

महत्त्व

आलमगीरपुर में हड़प्पा संस्कृति की खोज ने भारत की पूर्वी दिशाओं में सिंधु घाटी सभ्यता के आयामों को खूब विस्तार दिया। आलमगीरपुर के चार कालखंड क्रमानुसार

हड़प्पन
रंगे हुए सिलेटी गोदाम
उत्तर ऐतिहासिक और
उत्तर मध्ययुगीन काल का प्रतिनिधित्व करते हैं।

चित्र सन्दर्भ:
1. मुख्य चित्र में आलमगीरपुर के मुख्य स्थल का वर्तमान चित्र है। (Flickr)
2. दूसरे चित्र में सिंधु सभ्यता के मुख्य महानगरों को मानचित्र दर्शाया गया है। (Praramg)
3. तीसरे चित्र में आलमगीरपुर के मुख्य नगरीय अवशेषों को दिखाया गया है। (Flickr)
4. चौथे चित्र में आलमगीरपुर से प्राप्त पशु मूर्ति दिखाई दे रही है। (Wikipedia)
5. अंतिम चित्र में सिंधु सभ्यता से प्राप्त प्रमुख नासाग्र योगी की मूर्ति और धोलावीरा का प्रोजेक्टेड चित्र है। (Prarang)

सन्दर्भ:
https://en.wikipedia.org/wiki/Alamgirpur
https://www.wikiwand.com/en/Alamgirpur
https://www.worldhistory.biz/ancient-history/60837-6-alamgirpur.html

https://prarang.in/Meerut/2007084613





विभिन्न सभ्यताओं की विशेषताओं की जानकारी प्रदान करते हैं उत्खनन में प्राप्त अवशेष

the remains of the past

Meerut
01-07-2020 11:55 AM

विभिन्न स्थानों में समय-समय पर अनेक उत्खनन कार्यों का संचालन होता है। मेरठ के निकट स्थित सिनौली महत्वपूर्ण उत्खनन स्थलों में से एक है, जहां किये गये उत्खनन कार्यों से विभिन्न सभ्यताओं की विशेषताओं की जानकारी प्राप्त हुई है। कुछ वर्ष पहले किये गये उत्खनन कार्य में यहां से कई वस्तुओं के साक्ष्य प्राप्त हुए, जिनमें मिट्टी के बर्तन, मानव कंकाल, दफन स्थल और कई कलाकृतियों जैसे ताबूत, तलवार, खंजर, कंघी, गहने, रथ आदि का पता लगाया गया। रथ की खोज प्राचीन सभ्यताओं जैसे मेसोपोटामिया, ग्रीस आदि का संकेत देती है, जहां इनका प्रयोग व्यापक रूप से होता था। ताबूतों पर मानवजनित आकृतियां - सींग और पीपल के पत्ते वाले मुकुट पाये गये, जिन्होंने शाही समाधि की संभावना का संकेत दिया। उत्खनन से प्राप्त तलवार, खंजर, ढाल आदि ने जहां एक योद्धा आबादी के अस्तित्व की पुष्टि की वहीं मिट्टी और तांबे के बर्तनों, अर्ध-कीमती मनकाओं आदि ने एक परिष्कृत शिल्प कौशल और जीवन शैली की ओर इशारा किया। इन सभी महत्वपूर्ण साक्ष्यों के चलते सिनौली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित स्थल बन गया। उत्खनन में मिट्टी के बर्तन भी प्राप्त हुए। मिट्टी के बर्तनों का भारतीय इतिहास के साथ गहरा संबंध है, जिसमें टेराकोटा (Terracotta) और सेरामिक (Ceramic) की ललित कला अभी भी जीवित और अच्छी स्थिति में है।

भारत में प्राचीन कला और संस्कृति को समझने का एक समृद्ध इतिहास है, जिसे देश के कई कारीगरों ने आज तक संरक्षित किया है। मेरठ बड़ी मात्रा में मिट्टी के बर्तनों का उत्पादन करता है, जो विभिन्न कलाओं और उनकी विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करती है। विभिन्न उत्खनन के माध्यम से यहाँ हस्तिनापुर के कई टेराकोटा (बर्तन, आभूषण आदि) कला और शिल्प भी खोजे गए हैं। टेराकोटा सिर्फ आजीविका या कौशल का साधन नहीं है, यह एक कला है, जो देश के ग्रामीण क्षेत्रों में पीढ़ियों से चली आ रही है। भारत में टेराकोटा का उपयोग सदियों से किया जाता रहा है।

परंपरागत रूप से, इसे चार महत्वपूर्ण तत्वों - वायु, पृथ्वी, अग्नि और जल के संयोजन के कारण एक रहस्यमय सामग्री के रूप में देखा जाता है। यह सिंधु घाटी सभ्यता जोकि 3300 से 1700 ईसा पूर्व के बीच अस्तित्व में थी, के बाद से भारतीय निर्माण और संस्कृति का मुख्य आधार रहा है। कई प्राचीन टेराकोटा कलाकृतियों को भारत में पाया गया, जिनमें अक्सर देवताओं का चित्रण दिखाई दिया। अब तक की सबसे प्रसिद्ध एवं सबसे बड़ी टेराकोटा की मूर्ति तमिलनाडु में बनाया गया अयनायर घोड़ा (Ayanaar horse) है। टेराकोटा का उपयोग आज भी घरों और अन्य स्थानों के लिए मिट्टी के बर्तनों और कला के लिए किया जाता है। राजस्थान और गुजरात जैसे क्षेत्र अपने सफेद रंग के टेराकोटा मर्तबान या जार (Jar) के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि मध्य प्रदेश को अलंकृत टेराकोटा छत के लिए जाना जाता है। पारंपरिक टेराकोटा पॉट (Pot) सबसे प्रतिष्ठित टेराकोटा वस्तुओं में से एक है, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर घर में पौधों या छोटे पेड़ों के लिए किया जाता है। वे विविध आकार में उपलब्ध हैं, जिन्हें या तो सादा रखा जा सकता है या फिर अलंकृत किया जा सकता है। मिट्टी के बर्तनों का भारतीय इतिहास के साथ गहरा संबंध है तथा टेराकोटा और सिरेमिक की ललित कला अभी भी जीवित और सुदृढ़ है। यह प्राचीन शिल्प भारत में विभिन्न कला रूपों की समझ को दर्शाता है और यह कला न केवल युगों तक जीवित रही है, बल्कि समय के साथ व्यापक भी हो गयी है। नवीन आकृतियों और रंगों के साथ प्रयोग कुछ ऐसी विशेषताएं हैं, जो इन कलाओं को प्रमुख बनाते हैं। भारत में पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, हरियाणा, दिल्ली, ओडिशा और असम में टेराकोटा कला आज भी पनप रही है। टेराकोटा की तरह ही सिरेमिक कला स्वदेशी शिल्प से सजावटी वस्तु के रूप में एक उत्कृष्ट कला है। वर्तमान समय में सिरेमिक मिट्टी के पात्र कला बाजार में धूम मचा रहे हैं। चीनी मिट्टी से बने फूलदान हमेशा से कीमती रहे हैं, एक कला के रूप में चीनी मिट्टी की चीज़ें बहुत परिष्कृत है, हालांकि भारत में यह बहुत नवजात है। वर्तमान समय सिरेमिक निर्माण कार्य से जुडे लोगों के लिए एक अच्छा समय है क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, अल्प अवधि में तेजी से वृद्धि कर रही है। कलाकार अब इस माध्यम का विभिन्न तरीकों से उपयोग करते हैं। सिरेमिक में नए और रोमांचक काम ने लोगों को प्रेरित किया है।

भारत में टेराकोटा और सिरेमिक पात्रों को ढूंढना अपेक्षाकृत आसान है। यह कुछ स्थानीय शिल्प भंडारों एवं बड़े व्यवसाय संघ जहां फर्श और टाइल्स (Tiles) का सौदा होता है, में आसानी से मिल सकते हैं। इसका एक अन्य विकल्प बगीचा केंद्र (Garden center) भी है। इसके अलावा एक बुनियादी किट (Kit) के साथ घर पर भी मिट्टी के बर्तन बनाने का प्रयास किया जा सकता है। यह कहना अतिशियोक्ति नहीं होगी कि लगभग हर भारतीय घर में किसी न किसी तरह के मिट्टी से प्राप्त उत्पाद का उपयोग किया जाता है, जैसे पानी के भंडारण के लिए बर्तन और घड़े, पौधों और फूलों को उगाने के लिए मिट्टी के बर्तन, घरों को रोशन करने के लिए सभी आकार और सुंदर डिजाइन (Design) के लैंप (Lamp) या दीये, मर्तबान, विभिन्न प्रकार के बर्तन आदि। त्यौहारी मौसम के दौरान इन वस्तुओं की अधिक मांग होती है। उदाहरण के लिए, दीवाली के त्यौहार के दौरान, हिंदू घरों को बड़ी संख्या में दीपों से सजाया जाता है और विभिन्न प्रकार के बर्तन खरीदे जाते हैं। इन पारंपरिक वस्तुओं के प्रति दीवानगी अब न केवल शहरी भारत में बल्कि कई अंतर्राष्ट्रीय केंद्रों में भी बढ़ रही है, इसलिए कलाकारों द्वारा इन कलाओं का संरक्षण किया गया है। मिट्टी से बनी वस्तुओं की मांग लगातार बढ़ती जा रही है और लोग अपने बगीचों और अंदरूनी हिस्सों को मिट्टी से बनी वस्तुओं से सजाना पसंद कर रहे हैं। समय के साथ विलुप्त होते जा रहे अन्य पारंपरिक हस्तशिल्पों के विपरीत, टेराकोटा का भविष्य उज्ज्वल, लाभदायक एवं सरकार द्वारा अच्छी तरह से संरक्षित है और मांग में इतनी अधिक है कि कलाकारों को लगातार बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अधिक श्रम करने की आवश्यकता है।


चित्र सन्दर्भ:

1.सिनौली की उत्खनन खोज (youtube)

2.टेराकोटा हनुमान (wikimedia)

3.गुप्ता वंश से टेराकोटा मूर्ति (wikimedia)



संदर्भ:

https://timesofindia.indiatimes.com/city/meerut/asi-unearths-first-ever-physical-evidence-of-chariots-in-copper-bronze-age/articleshow/64469616.cms

https://mediaindia.eu/art-culture/terracotta-clay-art-an-ancient-indian-craft-still-going-strong/

https://timesofindia.indiatimes.com/city/meerut/human-skeleton-potteries-found-during-excavation-at-baghpats-sinauli/articleshow/67714955.cms

https://economictimes.indiatimes.com/magazines/panache/ceramic-works-are-finally-finding-a-new-audience-market-and-status/articleshow/66101770.cms?from=mdr

https://www.floma.in/guides/overall-home/the-history-of-terracotta-in-india-and-how-you-can-use-it-in-your-home

https://contentwriter.in/terracotta-art-india/


https://prarang.in/Meerut/2007014586





आलमगीरपुर गाँव से मिले सिंधु सभ्यता से जुड़े साक्ष्य

Evidence related to Indus civilization found from Alamgirpur village

Meerut
21-01-2020 10:00 AM

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में आलमगीरपुर गाँव में स्थित पुरातात्विक महत्त्व का स्थल सिंधु घाटी सभ्यता के पूर्व दिशा में सबसे अंतिम स्थलों में से एक है। इस स्थल को “परसराम का खेड़ा” भी कहा जाता था। इस स्थल की खोज 1974 में पंजाब विश्वविद्यालय ने की थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के द्वारा इसका उत्खनन 1958-59 में हुआ। यहां प्राप्त ईंटों का आकार, लम्बाई में 11.25 इंच से 11.75 इंच, चौड़ाई में 5.25 इंच से 6.25 इंच और मोटाई में 2.5 इंच से 2.75 इंच है।

वहीं खुदाई में यहाँ विशिष्ट हड़प्पा की मिट्टी के बर्तनों को पाया गया था और जिस जगह इन्हें पाया गया वह स्थान स्वयं एक मिट्टी के बर्तन बनाने की कार्यशाला जैसी प्रतीत हुई। साथ ही सिरेमिक (Ceramic) वस्तुओं में छत की टाइल (Tile), बर्तन, कप, फूलदान, घनाकार पासा, मोती, टेराकोटा केक (Terracotta Cakes), गाड़ियां और एक कूबड़ वाले बैल और सांप की मूर्तियां शामिल थीं। धातु का यहाँ कम सबूत था परन्तु, इसमें एक तांबे से बना टूटा हुआ ब्लेड (Blade) पाया गया था। प्रारंभिक व्यवसाय में मिट्टी की ईंट, लकड़ी आदि से बने घरों का निर्माण पाया गया था। ये घर एक विशिष्ट हड़प्पा सामग्री संस्कृति से जुड़े थे, जिसमें सिंधु लिपि, जानवरों, स्टीटाइट (Steatite) मोतियों आदि से सुशोभित बर्तन शामिल थे।

आलमगीरपुर में हड़प्पा संस्कृति की खोज ने भारत में पूर्वी दिशा में सिंधु घाटी सभ्यता के क्षितिज को काफी बढ़ा दिया। आलमगीरपुर के चार काल क्रमशः (I) हड़प्पा, (II) चित्रित ग्रे वेयर (Painted Grey Ware) (III) प्रारंभिक ऐतिहासिक और (IV) गत मध्यकालीन काल के थे। वहीं अवधि I और अवधि II के बीच के अंतराल को उनके संबंधित सांस्कृतिक संयोजन के अलावा परतों की बनावट संरचना द्वारा दर्शाया गया था। अवधि I से संबंधित चीज़ें ठोस और भूरी थीं। दूसरी ओर अवधि II की चीज़ें राख में लिपटी हुई तथा ढीली और ग्रे (Grey) थीं। यद्यपि भट्ठे में बनीं ईंटें साक्ष्य में मौजूद थीं, लेकिन शायद उत्खनन की सीमित प्रकृति के कारण हड़प्पा काल की कोई संरचना इनमें नहीं मिली थी।

संदर्भ:
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Alamgirpur
2.https://www.wikiwand.com/en/Alamgirpur
3.https://www.worldhistory.biz/ancient-history/60837-6-alamgirpur.html

https://prarang.in/Meerut/2001213897





मेरठ के लौह युगीन इतिहास का साक्ष्य है हस्तिनापुर और आलमगीरपुर

Hastinapur and Alamgirpur are evidence of the Iron Age history of Meerut

Meerut
21-12-2019 03:20 PM

किसी भी स्थल का ज्ञान वहां से प्राप्त पुरातात्विक संपदाओं पर निर्भर करता है। मेरठ भारत का एक बड़ा ही महत्वपूर्ण शहर है और यहाँ की ऐतिहासिकता को यदि देखा जाए तो ये भी अत्यंत प्राचीन काल तक जाती है। मेरठ के नजदीक ही दो पुरातात्विक स्थल हैं जिन्हें की आलमगीरपुर और हस्तिनापुर के नाम से जाना जाता है। ये दोनों पुरातात्विक स्थल मेरठ की और इसके आस पास के क्षेत्रों की ऐतिहासिकता सिन्धु सभ्यता, लौह युग आदि तक लेकर जाते हैं। इस लेख में हम हस्तिनापुर और आलमगीरपुर से मिले लोहे के अवशेषों और वहां से मिले इस युग के मृद्भांडों के विषय में भी चर्चा करेंगे।
पहले हम हस्तिनापुर के विषय में चर्चा करते हैं-
हस्तिनापुर मेरठ के समीप बसा हुआ एक प्राचीन पौराणिक शहर है। यहाँ पर हुए विभिन्न उत्खननों में कई पुरावशेष सामने आये। इन तमाम पुरावशेषों में लोहे की प्राप्ति एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण खोज है। यहाँ पर पिघले हुए लोहे कई कई टुकड़े चित्रित धुषर मृद्भांड के उपरी सतह से मिले हैं। मिले हुए डिपाजिट को हस्तिनापुर का द्वितीय काल का अवशेष माना जाता है। हांलाकि यहाँ से लोहे के बने हुए कोई भी सामान की प्राप्ति अभी तक नहीं हुयी है परन्तु पिघले हुए लोहे के टुकड़ों को कम आकना बेमानी हो सकती है। लोहे से बनी वस्तुओं की प्राप्ति यह भी साबित कर सकती है कि ये लोहे से बनी वस्तु कहीं से लेकर आये होंगे लेकिन पिघला हुआ लोहा यह साबित करता है कि ये यहीं का है।

आलमगीरपुर की बात करें तो
यहाँ से भी जो लोहे के अवशेष प्राप्त हुए हैं वे भी चित्रित धूसर मृद्भांड डिपाजिट से ही मिले हैं। यहाँ से प्राप्त अवशेषों में तीर, भाला, कील, पिन आदि मिले हैं। आलमगीरपुर से मिले अवशेषों को आलमगीरपुर की द्वीतीय काल से सम्बंधित हैं।
अब उपरोक्त लिखे तथ्यों की माने तो यह समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है की आखिर यह चित्रित धूसर मृद्भांड है क्या और इनकी परंपरा क्या है? इसको समझने से पहले यह भी समझना जरूरी है की आलमगीरपुर और हस्तिनापुर दोनों मैदानी इलाकों में बसे हुए पुरास्थल हैं जहाँ पर हेमाटाईट मिलने की संभावना नगण्य है अतः यह सिद्ध होता है कि यहाँ पर कच्चा लोहा कहीं और से मंगाया जाता रहा होगा।

चित्रित धूसर मृद्भांड उत्तर भारत में पश्चिमी गंगा के मैदान और घग्घर हाकरा घाटी की एक लौह युगीन संस्कृति से सम्बंधित मृद्भांड है। इसका तिथिनुसार यदि अध्ययन किया जाए तो यह करीब 1200 ईसा पूर्व से लेकर के 600 ईसा पूर्व तक की मानी जाती है। इस मृद्भांड परंपरा के साथ ही एक और परंपरा प्रफुल्लित हुयी और उसको हम लाल और काली मिश्रित मृद्भांड परंपरा के नाम से जानते हैं। यह परंपरा पूर्वी गंगा मैदान में पायी जाती है। अभी तक करीब 1100 से अधिक चित्रित धूसर मृद्भांड से सम्बंधित पुरास्थल अबतक खोजे जा चुके हैं। ये काले रंग के ज्यामितीय चित्रों द्वारा सजाये हुए भूरे रंग के मृद्भांड होते हैं। इनको पालतू घोड़ों, हाथी दांत के कार्य और लौह संस्कृति के समकालीन का माना जाता है। चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति मध्य और उत्तर .वैदिक काल से मेल खाती है जिसे की जनपद युग के पहले और सिन्धु सभ्यता के बाद वाले समय को माना जाता है।

सन्दर्भ:-
1.
https://archive.org/details/in.gov.ignca.73624/page/n30
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Painted_Grey_Ware_culture
3. https://en.wikipedia.org/wiki/Ochre_Coloured_Pottery_culture

https://prarang.in/Meerut/1912213764





मध्य पाषाण मानव की विभिन्न गतिविधियों को प्रदर्शित करते शैलचित्र

Rock paintings showing various activities of Middle Stone age human

Meerut
24-09-2019 12:01 PM

मानव विकास एक क्रमिक परिवर्तन है। इन क्रमिक परिवर्तनों में विभिन्न काल या युग शामिल हुए जिनमें कई सभ्यताएं विकसित हुईं। इन सभ्यताओं को मानव द्वारा अपने विकास के लिए अपनाया गया था। मध्यपाषाण काल भी इन्हीं युगों में से एक है जो पुरापाषाण युग और नवपाषाण युग के बीच का एक माध्यमिक काल था। इस काल में लोग शिकार करने, मछली पकड़ने और भोजन जुटाने में व्यस्त रहते थे। बाद में उन्होंने जानवरों को अपना पालतू पशु बनाना भी सीखा। भारत में इस काल की समय सीमा 9,000 ई.पू से 4,000 ई.पू बताई जाती है। मानव द्वारा छोटे माइक्रोलिथ्स (Microliths) या लघु अश्म के औज़ारों का उपयोग इस युग की विशेषता बताई जाती है।
इस युग की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
औज़ार: इस युग के लोग माइक्रोलिथ्स या लघु अश्म का उपयोग करते थे जिनका आकार बहुत छोटा होता था तथा लम्बाई 1-8 से.मी. के बीच होती थी। इस काल के औज़ारों या हथियारों में आयताकार, चंद्राकार, चिकने तथा पैने ब्लेड (Blade), चाकू, फरसा, भाला इत्यादि शामिल थे। यह प्रायः कैलेडोनी (Chaledoni), क्रिस्टल (Crystal), जैस्पर (Jasper), कार्नेलियन (Carnelian), अगेट (Agate) आदि से बने होते थे। इस युग में मानव ने हथियारों में हत्थे लगाना भी सीखा।
कला: इस युग के लोग चित्रकला के शौकीन थे तथा उन्होंने पत्थरों पर चित्रों को बनाने का अभ्यास किया। इनकी चित्रकारी में प्रायः पशुओं, जानवरों और मानवों के चित्रों को शामिल किया जाता था जिन्हें वे अपनी गुफा की दीवारों पर उकेरा करते थे। अपना संदेश दूसरों तक पंहुचाने के लिए प्रायः उनके द्वारा यह चित्रकारी की जाती थी।

इस काल के साक्ष्य भारत में कई स्थलों से प्राप्त हुए हैं जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:
• गुजरात में लंगहनाज
• राजस्थान में बागोर
• उत्तर प्रदेश में सराय नाहर राय, चोपनी मांडो, महदहा, और दमदमा
• मध्य प्रदेश में भीमबेटका और आदमगढ़
• ओडिशा
• केरल
• आंध्र प्रदेश

राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश में इन स्थलों में रहने वाले समुदाय शिकारी, भोजन-संग्रहकर्ता और मछुआरे थे। इसके अतिरिक्त इन स्थलों से कृषि के कुछ अवशेष भी पाए गये। उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में क्रमशः स्थित दमदमा और भीमबेटका शैलाश्रय भारत में इस युग के सबसे प्रसिद्ध आवासीय पुरास्थल हैं। भीमबेटका में पशुओं और मानवों के विभिन्न चित्रों को उस समय के मानव द्वारा पत्थरों पर उकेरा गया था। यह भारतीय उपमहाद्वीप में मानव जीवन के सबसे प्राचीनतम चिह्न हैं। भीमबेटका में 500 से भी अधिक चित्रित शैलाश्रय देखने को मिलते हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के मुर्हाना पहाड़ में भी कई शैलाश्रय देखने को मिलते हैं जिनमें कई जानवरों, पक्षियों आदि के चित्रों को शामिल किया गया है। इन शैल चित्रों में मानव की विभिन्न गतिविधियों जैसे कि नृत्य, दौड़ना, शिकार करना, खेल खेलना, और लड़ाई करना आदि को उस समय के मानव ने चित्रित किया। शैल चित्रों में प्रयुक्त रंग गहरे लाल, हरे, सफेद और पीले दिखाई देते हैं। इन रंगों को इस प्रकार बनाया गया था कि हज़ारों साल बाद भी चित्र धूमिल न हों तथा स्पष्ट रूप से नजर आयें।

संदर्भ:
1.
https://www.jagranjosh.com/general-knowledge/the-mesolithic-age-1430564980-1
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Bhimbetka_rock_shelters
3. https://bit.ly/2mLUKW1
4. https://www.brainyias.com/mesolithic-age/
5. https://en.wikipedia.org/wiki/Mesolithic
चित्र सन्दर्भ:
1.
https://www.flickr.com/photos/nagarjun/6536836345
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Bhimbetka_rock_shelters
3. https://www.needpix.com/photo/1312446/bhimbetka-painting-prehistory-rock-people

https://prarang.in/Meerut/1909243406





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