मेरठ के पास सहारनपुर की कारीगरी का राज़: फ़र्नीचर के लिए कौन-सी लकड़ी है सबसे बेहतर?
मेरठवासियों, जब भी टिकाऊ, सुंदर और लंबे समय तक चलने वाले फ़र्नीचर की बात होती है, तो सहारनपुर का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है। मेरठ के नज़दीक स्थित यह शहर केवल लकड़ी के फ़र्नीचर का उत्पादन केंद्र नहीं है, बल्कि सदियों से चली आ रही कारीगरी और अनुभव का प्रतीक भी है। यहाँ के कारीगर जानते हैं कि अच्छा फ़र्नीचर केवल डिज़ाइन से नहीं, बल्कि सही लकड़ी के चयन से बनता है। लकड़ी की गुणवत्ता, उसकी मजबूती और प्रकृति को समझकर ही वे ऐसा फ़र्नीचर तैयार करते हैं, जो समय के साथ और भी सुंदर लगता है।आज के इस लेख में हम सहारनपुर की लकड़ी कारीगरी की परंपरा को विस्तार से समझेंगे। इसके बाद फ़र्नीचर निर्माण में लकड़ी की गुणवत्ता के महत्व पर चर्चा करेंगे। फिर सागौन की लकड़ी को सबसे श्रेष्ठ क्यों माना जाता है, यह जानेंगे। आगे अन्य भारतीय लकड़ियों के गुणों को समझेंगे, तेज़ी से बढ़ने वाली लकड़ियों के आर्थिक पक्ष पर नज़र डालेंगे और अंत में लकड़ी उद्योग के भविष्य की संभावनाओं पर विचार करेंगे।सहारनपुर की लकड़ी कारीगरी: परंपरा, पहचान और वैश्विक प्रसिद्धिसहारनपुर की लकड़ी कारीगरी भारत की सबसे समृद्ध शिल्प परंपराओं में से एक मानी जाती है। यहाँ के कारीगर कई पीढ़ियों से लकड़ी पर बारीक नक्काशी, जाली का काम और जटिल डिज़ाइन उकेरते आ रहे हैं। यह कला केवल रोज़गार का साधन नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत के रूप में आगे बढ़ती रही है। मुगल और फ़ारसी प्रभावों से प्रेरित पुष्प आकृतियाँ, ज्यामितीय पैटर्न और सूक्ष्म जड़ाई सहारनपुर के फ़र्नीचर को विशिष्ट पहचान देती हैं। समय के साथ इस कारीगरी ने राष्ट्रीय सीमाओं को पार किया और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में भी अपनी जगह बनाई। आज सहारनपुर का नाम गुणवत्ता, धैर्य और शिल्प कौशल का पर्याय बन चुका है।फ़र्नीचर निर्माण में लकड़ी की भूमिका और गुणवत्ता का महत्वकिसी भी फ़र्नीचर की उम्र, मज़बूती और सौंदर्य सीधे तौर पर इस्तेमाल की गई लकड़ी पर निर्भर करता है। अच्छी गुणवत्ता वाली लकड़ी न केवल भारी भार सहने में सक्षम होती है, बल्कि उस पर की गई नक्काशी, पॉलिश और फिनिश भी लंबे समय तक बनी रहती है। सहारनपुर के कारीगर लकड़ी का चयन करते समय उसकी नमी, घनत्व, सिकुड़न और कीट-रोधी गुणों को ध्यान में रखते हैं। गलत लकड़ी के इस्तेमाल से फ़र्नीचर जल्दी टूट सकता है, मुड़ सकता है या दीमक का शिकार हो सकता है। इसलिए अनुभवी कारीगरों के लिए लकड़ी का सही चुनाव उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना डिज़ाइन और निर्माण प्रक्रिया।सागौन की लकड़ी: फ़र्नीचर के लिए सबसे श्रेष्ठ विकल्प क्यों?भारत में सागौन की लकड़ी को फ़र्नीचर निर्माण के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी असाधारण मजबूती और टिकाऊपन है। सागौन में प्राकृतिक तेल मौजूद होते हैं, जो इसे दीमक, सड़न और नमी से सुरक्षित रखते हैं। यही कारण है कि यह लकड़ी दशकों तक बिना ख़राब हुए उपयोग में लाई जा सकती है। पॉलिश के बाद सागौन की चिकनी सतह और गहरा भूरा रंग फ़र्नीचर को शाही रूप देता है। यही वजह है कि घरों, कार्यालयों और विरासत भवनों में सागौन से बने फ़र्नीचर को प्राथमिकता दी जाती है, भले ही इसकी क़ीमत अन्य लकड़ियों से अधिक क्यों न हो।सागौन के पेड़भारत में फ़र्नीचर निर्माण के लिए अन्य प्रमुख लकड़ियाँसागौन के अलावा भारत में कई अन्य लकड़ियाँ भी फ़र्नीचर निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। शीशम की लकड़ी अपनी कठोरता और लचीलेपन के कारण नक्काशी वाले फ़र्नीचर के लिए बेहद उपयुक्त मानी जाती है। इसकी प्राकृतिक बनावट इसे देखने में भी आकर्षक बनाती है। सैटिनवुड (Satinwood) अपनी चमकदार फिनिश और स्थायित्व के लिए जानी जाती है और अक्सर फर्श या सजावटी फ़र्नीचर में इस्तेमाल होती है। वहीं साल की लकड़ी अपनी मज़बूती, कीट-रोधी गुणों और लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता के कारण दरवाज़ों, फ्रेम और भारी फ़र्नीचर के लिए पसंद की जाती है। इन सभी लकड़ियों का सही उपयोग फ़र्नीचर को संतुलित और व्यावहारिक बनाता है।तेज़ी से बढ़ने वाली लकड़ियाँ: खेती और आर्थिक लाभ का दृष्टिकोणलकड़ी को केवल फ़र्नीचर निर्माण ही नहीं, बल्कि खेती और आर्थिक लाभ के नज़रिये से भी देखा जाता है। हाइब्रिड चिनार (Hybrid Poplar), नीलगिरी और पॉलाउनिया (Paulownia) जैसे पेड़ कम समय में तेज़ी से बढ़ते हैं और जल्दी लकड़ी उपलब्ध कराते हैं। इनका उपयोग पेपर पल्प (paper pulp), निर्माण सामग्री और कम लागत वाले फ़र्नीचर में किया जाता है। किसानों के लिए ये पेड़ आय का वैकल्पिक साधन बन सकते हैं, क्योंकि इन्हें अपेक्षाकृत कम समय में काटा जा सकता है। इस तरह तेज़ी से बढ़ने वाली लकड़ियाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लकड़ी उद्योग - दोनों के लिए लाभकारी सिद्ध होती हैं।फ़र्नीचर और लकड़ी उद्योग में शिल्प, संसाधन और भविष्य की संभावनाएँआज के समय में जब पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास पर ज़ोर दिया जा रहा है, तब लकड़ी उद्योग के सामने नई ज़िम्मेदारियाँ भी हैं। सहारनपुर जैसे शिल्प केंद्रों में पारंपरिक कारीगरी और आधुनिक डिज़ाइन का संतुलन इस उद्योग को नई दिशा दे रहा है। यदि लकड़ी के संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए, कारीगरों के कौशल को संरक्षित किया जाए और आधुनिक तकनीकों को अपनाया जाए, तो यह उद्योग भविष्य में और अधिक सशक्त हो सकता है। मेरठ और आसपास के क्षेत्रों के लिए यह न केवल रोज़गार का स्रोत है, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और आत्मनिर्भरता का भी माध्यम बन सकता है।संदर्भ - http://tinyurl.com/p39yv6tp ttps://tinyurl.com/yeuu3z69
वास्तुकला I - बाहरी इमारतें
मानव अनुभव और वास्तुकला: इतिहास, प्रकृति और स्थानीय ज्ञान की समन्वित यात्रा
इंसान और उसके आसपास बनी इमारतों के बीच संबंध केवल ईंट, पत्थर और सीमेंट तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह हमारे मन, भावनाओं और जीवन के अनुभवों से गहराई से जुड़ा होता है। हम जिन जगहों में रहते हैं, चलते हैं या समय बिताते हैं, उनकी बनावट हमारे सोचने, महसूस करने और जीने के तरीके को प्रभावित करती है - चाहे वह कोई ऐतिहासिक धरोहर हो, आधुनिक अस्पताल, पवित्र स्थल या पारंपरिक घर। वास्तुकला केवल आश्रय नहीं देती, बल्कि वह हमें सुरक्षा, शांति, जुड़ाव और पहचान का एहसास भी कराती है। यही कारण है कि शहरों की इमारतें, गलियाँ और खुले स्थान सिर्फ भौतिक ढाँचे नहीं, बल्कि मानव अनुभव को आकार देने वाली जीवंत संरचनाएँ बन जाती हैं।यह लेख आपको बताएगा कि इंसान और वास्तुकला के बीच संबंध कैसे बनता है। हम समझेंगे कि ऐतिहासिक स्थलों की डिजाइन हमारी भावनाओं को कैसे प्रभावित करती है, और आधुनिक स्वास्थ्य वास्तुकला में प्रकृति, रोशनी और हवा हमारे कल्याण को कैसे बढ़ाती है। साथ ही, हम देखेंगे कि पवित्र स्थानों की संरचना मन को शांति क्यों देती है, और स्थानीय वास्तुकला व उसकी सामग्रियाँ - जैसे बांस, मिट्टी और लकड़ी - आज भी टिकाऊ निर्माण के मॉडल क्यों मानी जाती हैं। अंत में, हम जानेंगे कि आधुनिक शहर इन पारंपरिक तरीकों से क्या महत्वपूर्ण सीख ले सकते हैं।सांस्कृतिक-ऐतिहासिक स्थलों की वास्तुकला और मानव अनुभव पर उसका प्रभावपुराने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल केवल इमारतें नहीं होते - वे समय, स्मृतियों, परंपराओं और मानव भावनाओं की परतों से बनी जीवित कहानियाँ होते हैं। इन स्थानों में मौजूद खुला आकाश, बड़े आँगन, मेहराबदार गलियाँ, पुरानी ईंटों की खुशबू और पत्थरों की ठंडक एक ऐसा अनुभव बनाते हैं जो आज की तेज़ रफ़्तार वाली दुनिया में मिलना मुश्किल है। जब कोई व्यक्ति ऐसे स्थानों से होकर गुजरता है, तो उसे एक अनकही शांति महसूस होती है, मानो जगह उसके भीतर की उलझनों को शांत कर रही हो। स्थापत्य कला की लय, प्राकृतिक रोशनी का गहरा खेल, हवा की धीमी आवाज़ और संतुलित अनुपात मन और शरीर को एक साथ सुकून देते हैं।ऐसे स्थल हममें 'जुड़ाव' की भावना पैदा करते हैं - जुड़ाव अपने अतीत से, अपनी संस्कृति से और अपने अस्तित्व से। ये स्थान केवल देखने के लिए नहीं होते; वे महसूस करने के लिए होते हैं। सामुदायिक स्तर पर भी ये जगहें लोगों के बीच अपनापन बढ़ाती हैं - क्योंकि साझा स्मृतियाँ हमेशा मजबूत सामाजिक बंधन बनाती हैं। यही वजह है कि सांस्कृतिक-ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण केवल दीवारों का संरक्षण नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान, भावनाओं और पहचान की रक्षा भी है। इनका खोना ऐसा है जैसे किसी शहर की आत्मा का खोना।आधुनिक स्वास्थ्य वास्तुकला: प्रकृति, प्रकाश और वायु का मानव कल्याण में योगदानदुनिया भर के डिज़ाइनर आज इस बात को गहराई से समझ चुके हैं कि स्वास्थ्य केवल दवाओं से नहीं, बल्कि वातावरण से भी सुधरता है। आधुनिक स्वास्थ्य वास्तुकला का मुख्य विचार यह है कि “स्वस्थ जगह = स्वस्थ इंसान”। अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में प्राकृतिक प्रकाश भरपूर देने के लिए बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ बनाई जाती हैं, क्योंकि प्राकृतिक रोशनी तनाव को कम करती है, मूड बेहतर बनाती है और शरीर के जैविक चक्र को संतुलित करती है।ठंडी और साफ हवा, हरियाली, आंतरिक पौधे और शोर-रहित वातावरण मरीजों की रिकवरी स्पीड को वास्तविक रूप से तेज़ करते हैं - यह अब वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध है। ओपन स्पेस (open space) और न्यूनतम डिज़ाइन का उद्देश्य यह होता है कि मरीज, उनके परिजन और स्टाफ सभी खुद को मानसिक रूप से हल्का महसूस करें।वास्तुकार कोशिश करते हैं कि अस्पताल कम 'कठोर' दिखें और अधिक ‘मनुष्यों के लिए बने स्थान’ प्रतीत हों। रंगों का चुनाव भी मनोवैज्ञानिक प्रभाव को ध्यान में रखकर किया जाता है - हल्के रंग मन और दिल दोनों को सहज बनाते हैं। हवाई रास्तों, प्रकाश-प्रवाह और ध्वनि-नियमन के संतुलित उपयोग से इंसान को लगता है कि वह बीमारी से लड़ने के बजाय, अपने भीतर ऊर्जा पा रहा है। आधुनिक स्वास्थ्य वास्तुकला का उद्देश्य सिर्फ इलाज देना नहीं बल्कि मनुष्य को बेहतर महसूस कराना है।पवित्र स्थानों का आध्यात्मिक व मनोवैज्ञानिक प्रभावधर्मस्थलों की वास्तुकला सदियों से मनुष्य के मन, विश्वास और आध्यात्मिक भावनाओं को समझकर बनाई जाती रही है। इन स्थानों में प्रवेश करते ही ऊँचे गुंबद, गूँजती घंटियाँ, सौम्य प्रकाश, अगरबत्ती की सुगंध और धीमा वातावरण मनुष्य के सोचने और महसूस करने के तरीके को तुरंत बदल देते हैं। यह परिवर्तन अचानक होता है, पर बहुत गहरा होता है - मानो जगह ही मन को शांत कर रही हो।धर्मस्थलों की डिज़ाइन अक्सर इस विचार पर आधारित होती है कि व्यक्ति अपनी चिंताओं को बाहर छोड़कर भीतर ‘हल्का’ महसूस करे। ऊँचाई वाला स्थापत्य मन में खुलेपन का भाव जगाता है, जबकि धीमी ध्वनिकी मन को स्थिर करती है। यह मनोवैज्ञानिक तौर पर व्यक्ति को आत्मचिंतन, जागरूकता और आंतरिक शांति की ओर ले जाता है।इन स्थानों का सामुदायिक प्रभाव भी बहुत महत्वपूर्ण है। जब लोग एक ही जगह पर बैठते हैं, प्रार्थना करते हैं या मौन महसूस करते हैं, तो उनके बीच एक ‘अदृश्य विश्वास’ बनता है। इससे सामाजिक तनाव कम होता है, आपसी संबंध मजबूत होते हैं और लोग अधिक संवेदनशील व सहयोगी बनते हैं।इसलिए पवित्र स्थानों की वास्तुकला केवल धार्मिक नहीं होती - वह मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और भावनात्मक भी होती है।स्थानीय (Vernacular) वास्तुकला: परंपरा, अनुकूलनशीलता और स्थिरता का मूल सिद्धांतस्थानीय वास्तुकला प्रकृति और मनुष्य के बीच तालमेल का सबसे सुंदर उदाहरण है। यह सदियों की समझ, अवलोकन और जीवन-शैली पर आधारित होती है - जिसमें जलवायु, संसाधन, सांस्कृतिक परंपराएँ और सामुदायिक आवश्यकताएँ सब शामिल होती हैं। भारतीय क्षेत्रों में मिट्टी की मोटी दीवारें, चूने की प्लास्टरिंग, लकड़ी की बीम, टेराकोटा की छतें, बांस की संरचनाएँ और जालीदार खिड़कियाँ न केवल किफायती होती थीं बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी अत्यंत प्रभावी होती थीं। यह वास्तुकला गर्मियों में प्राकृतिक ठंडक और सर्दियों में गर्माहट देती है - बिना किसी मशीनरी के। घरों में आँगन होना केवल सामाजिक कारणों से नहीं था, बल्कि हवा के प्रवाह, प्रकाश के संतुलन और तापमान नियंत्रण का भी एक प्राकृतिक तरीका था।स्थानीय वास्तुकला समय के साथ बहुत संवेदनशील रूप से विकसित हुई - हर मौसम को समझकर, हर संसाधन का मूल्य जानकर। इसलिए यह आज ‘स्थिरता’ (sustainability) का सबसे बड़ा उदाहरण मानी जाती है। आधुनिक शहरों में बढ़ती गर्मी, प्रदूषण और ऊँची ऊर्जा खपत के बीच स्थानीय वास्तुकला एक समाधान की तरह वापस लौट रही है। यह हमें याद दिलाती है कि विकास और परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी हो सकते हैं।स्थानीय निर्माण सामग्रियाँ और स्थायी निर्माण प्रथाएबांस, लकड़ी, मिट्टी, लेटराइट, कच्ची ईंटें, चूना - ये सारी सामग्री धरती के साथ एक बहुत प्राकृतिक रिश्ता रखती हैं। इनकी थर्मल (thermal) और पर्यावरणीय विशेषताएँ इन्हें आधुनिक निर्माण की तुलना में कहीं अधिक स्थायी बनाती हैं। मिट्टी या ईंटों से बने घरों में अंदरूनी तापमान संतुलित रहता है, जिससे एसी या हीटर की आवश्यकता कम हो जाती है। यही ऊर्जा बचत पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए फायदेमंद है।बांस अपनी लचक और मजबूती के कारण भूकंप-प्रभावित इलाकों में भी सुरक्षित माना जाता है। लकड़ी और लेटराइट (लेटराइट) जैसे तत्व न सिर्फ सुंदर लगते हैं, बल्कि प्राकृतिक इन्सुलेशन भी प्रदान करते हैं। इन सामग्रियों के उपयोग से कार्बन उत्सर्जन कम होता है, निर्माण की ऊर्जा लागत घटती है और प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग होता है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्थानीय सामग्री स्थानीय लोगों को रोजगार देती है, जिससे गांवों और कस्बों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ती हैं। यह निर्माण शैली 'प्रकृति के साथ चलने' पर आधारित होती है, न कि प्रकृति को बदलने पर। आज जब दुनिया पर्यावरणीय संकटों से जूझ रही है, स्थानीय सामग्रियाँ और टिकाऊ निर्माण प्रथाएँ एक आसान और प्रभावी समाधान प्रदान करती हैं।स्थानीय वास्तुकला से सीखें: सह-अस्तित्व, सांस्कृतिक संरक्षण और मानव-केंद्रित डिज़ाइनस्थानीय वास्तुकला हमें यह सिखाती है कि शहरों का विकास केवल कंक्रीट की ऊँची इमारतों से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से मापा जाता है कि शहर अपने लोगों के लिए कितना प्राकृतिक, मानवीय और संतुलित है। यह वास्तुकला समुदाय को केंद्र में रखकर डिज़ाइन करती है - जहाँ पड़ोस मिलकर रहता है, साझा स्थान होते हैं, हवा और रोशनी का संतुलन होता है, और खर्च कम आता है। आधुनिक शहरों में जहाँ शोर, भीड़ और प्रदूषण लगातार बढ़ रहे हैं, स्थानीय वास्तुकला इंसानों को फिर से प्रकृति और एक-दूसरे के करीब लाने का रास्ता दिखाती है।डिज़ाइनर्स और शहर योजनाकार इस बात से प्रेरणा लेते हैं कि कैसे पुराने घर बिना मशीनों के आरामदायक थे, कैसे मिट्टी-चूना पर्यावरण के साथ तालमेल में था, और कैसे समुदाय एक-दूसरे से जुड़े रहते थे। स्थानीय वास्तुकला हमें बताती है कि भविष्य स्थिर और मानवीय तभी होगा जब हम विकास को मानव-केंद्रित, पर्यावरण-संवेदनशील और सांस्कृतिक रूप से जड़ित बनाएं।संदर्भ https://tinyurl.com/2wu6apyfhttps://tinyurl.com/yb4janu3https://tinyurl.com/523puxt8https://tinyurl.com/bdfcsanw
शहरीकरण - नगर/ऊर्जा
कचरे में दबता शहरी भारत: लैंडफिल, स्वास्थ्य संकट और विकास की अनदेखी कहानी
मेरठ जैसे शहर, जिनकी पहचान इतिहास, संस्कृति और तेज़ी से बदलते आधुनिक जीवन से बनी है, आज एक ऐसी सच्चाई का सामना कर रहे हैं जिसे अनदेखा करना अब संभव नहीं रहा। बढ़ती आबादी, फैलती कॉलोनियाँ और रोज़मर्रा की सुविधाओं पर बढ़ती निर्भरता ने हमारे जीवन को आसान तो बनाया है, लेकिन इसके साथ कचरे का वह बोझ भी जोड़ दिया है, जो हर दिन चुपचाप शहर के सीने पर जमा होता जा रहा है। मेरठ की गलियों, सड़कों के किनारे, खाली पड़े मैदानों और शहर की सीमाओं पर उभरते कचरे के ढेर केवल गंदगी नहीं हैं, बल्कि वे हमारी शहरी जीवनशैली की सच्ची तस्वीर दिखाते हैं। यह कचरा हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि जिस विकास पर हमें गर्व है, क्या वह वास्तव में इंसान और पर्यावरण दोनों के लिए सुरक्षित है। यह समस्या अब सिर्फ़ नगर निगम की नहीं रही, बल्कि हर उस नागरिक से जुड़ गई है जो इस शहर में सांस लेता है, पानी पीता है और अपने बच्चों के भविष्य का सपना देखता है। यदि इस बढ़ते कचरे को समय रहते नहीं समझा गया, तो यह धीरे-धीरे मेरठ की हवा, ज़मीन और जीवन तीनों को प्रभावित करेगा। आज यह केवल शहर की बाहरी तस्वीर को बिगाड़ रहा है, लेकिन कल यह हमारे स्वास्थ्य, हमारी आजीविका और हमारी आने वाली पीढ़ियों पर गहरा असर डाल सकता है।आज हम इस लेख में सबसे पहले, हम देखेंगे कि तेज़ शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण कचरे की मात्रा कैसे लगातार बढ़ती जा रही है। इसके बाद, लैंडफिल (landfill) और लीगेसी डंप साइट्स (legacy dump sites) की समस्या को समझेंगे, जो शहरों में कचरे के पहाड़ का रूप ले चुकी हैं। फिर, इन डंप साइट्स से उत्पन्न स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरों पर बात करेंगे, जिनका सीधा असर आम नागरिकों के जीवन पर पड़ता है। अंत में, हम स्वच्छ भारत मिशन की सीमाओं और भविष्य में इस संकट से निपटने की संभावित दिशा पर संक्षेप में विचार करेंगे, ताकि समस्या का एक समग्र चित्र सामने आ सके।भारत में शहरीकरण और बढ़ते ठोस कचरे की गंभीर समस्याभारत में बीते कुछ दशकों में जिस गति से औद्योगीकरण और शहरीकरण बढ़ा है, उसने शहरों की संरचना और जीवनशैली दोनों को बदल दिया है। रोज़गार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लाखों लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। मेरठ, लखनऊ, दिल्ली जैसे शहर इस जनसंख्या दबाव को प्रतिदिन महसूस कर रहे हैं। बढ़ती आबादी के साथ उपभोग की संस्कृति भी तेज़ हुई है, जहाँ पैकेज्ड खाद्य पदार्थ, प्लास्टिक सामग्री, ऑनलाइन खरीदारी (online shopping) से निकलने वाला कचरा और इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट (electronic waste - e-waste) आम जीवन का हिस्सा बन चुका है। आज स्थिति यह है कि प्रतिदिन हज़ारों टन शहरी ठोस कचरा उत्पन्न हो रहा है, लेकिन उसका वैज्ञानिक तरीके से पृथक्करण और निपटान नहीं हो पा रहा। घरों से निकलने वाला गीला और सूखा कचरा अक्सर बिना छंटाई के एक साथ फेंक दिया जाता है, जिससे आगे चलकर समस्या और जटिल हो जाती है। यह केवल सफ़ाई की असफलता नहीं, बल्कि शहरी नियोजन, नागरिक जागरूकता और प्रशासनिक तैयारी की बड़ी कमी को भी उजागर करता है।लैंडफिल और लीगेसी डंप साइट्स: शहरों में बनते कचरे के पहाड़भारत में उत्पन्न होने वाले कुल शहरी कचरे का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा सीधे लैंडफिल स्थलों पर पहुंच जाता है। समय के साथ ये स्थान केवल कचरा निपटान केंद्र नहीं रहते, बल्कि विशाल और भयावह कचरे के पहाड़ों में बदल जाते हैं। देशभर में 1800 से अधिक लीगेसी डंप साइट्स मौजूद हैं, जहाँ वर्षों से जमा कचरा आज भी पड़ा हुआ है। उत्तर प्रदेश के कई शहर, जिनमें मेरठ भी शामिल है, इस समस्या से अछूते नहीं हैं। मेरठ के बाहरी इलाकों में स्थित पुराने डंप यार्ड आज भी सक्रिय हैं और शहर के विस्तार के साथ अब ये आबादी के बेहद करीब आ चुके हैं। कभी जो स्थान शहर से दूर हुआ करते थे, आज वहीं आसपास कॉलोनियाँ, स्कूल और बाज़ार बस चुके हैं। ये लैंडफिल न केवल भूमि की उपयोगिता को समाप्त कर देते हैं, बल्कि आसपास के पूरे क्षेत्र के लिए एक स्थायी पर्यावरणीय और स्वास्थ्य जोखिम बन जाते हैं।शहरी लैंडफिल से उत्पन्न स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरेलैंडफिल केवल बदबूदार स्थान नहीं होते, बल्कि ये लगातार ज़हर उगलने वाले केंद्र बन जाते हैं। यहां सड़ते कचरे से निकलने वाली मीथेन और अन्य जहरीली गैसें वायु प्रदूषण को गंभीर रूप से बढ़ाती हैं। इसका सीधा असर आसपास रहने वाले लोगों के फेफड़ों, आंखों और त्वचा पर पड़ता है। बरसात के मौसम में स्थिति और भी भयावह हो जाती है, जब कचरे से रिसने वाला जहरीला तरल मिट्टी में समाकर भूजल और नज़दीकी जल स्रोतों को दूषित कर देता है। कई बार लैंडफिल में आग लगने की घटनाएँ सामने आती हैं, जो दिनों तक जलती रहती हैं और पूरा इलाका धुएँ से भर जाता है। मेरठ जैसे घनी आबादी वाले शहरों में यह स्थिति आम नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन जाती है और अस्पतालों में सांस संबंधी रोगियों की संख्या अचानक बढ़ जाती है।डंप यार्ड के आसपास रहने वाले समुदायों की दयनीय स्थितिडंप यार्ड (dump yard) के आसपास रहने वाले लोग इस पूरे कचरा संकट के सबसे अदृश्य और उपेक्षित शिकार हैं। अत्यधिक गरीबी और रोज़गार के अभाव के कारण कई परिवार कचरा बीनने को मजबूर होते हैं। ये लोग वही कचरा छांटते हैं, जिसे शहर ने बेकार समझकर फेंक दिया होता है। दुखद यह है कि इस काम में छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल होते हैं, जो शिक्षा और सुरक्षित बचपन से वंचित रह जाते हैं। इन इलाकों में रहने वाले लोगों की जीवन प्रत्याशा कम होती है। त्वचा रोग, दमा, टीबी, पेट के संक्रमण और अन्य गंभीर बीमारियाँ यहाँ आम हैं। दूषित हवा और पानी इनके जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। यह स्थिति केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता और शहरी विकास की अमानवीय सच्चाई को भी सामने लाती है।स्वच्छ भारत मिशन और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की सीमाएँस्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत सरकार ने शहरों की सफ़ाई और कचरा प्रबंधन के लिए बड़े बजट और महत्वाकांक्षी योजनाएँ शुरू कीं। इन प्रयासों से कुछ क्षेत्रों में सुधार भी दिखा, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कई सीमाएँ अब भी बनी हुई हैं। कचरे का स्रोत पर पृथक्करण, यानी घरों से ही गीले और सूखे कचरे को अलग करना, आज भी अधिकांश शहरों में प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पाया है। कई नगर निकायों में आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित कर्मचारियों और निरंतर निगरानी की कमी है। नीति और प्रशासन के बीच समन्वय का अभाव भी एक बड़ी बाधा है। मेरठ जैसे शहरों में यह साफ़ दिखाई देता है कि योजनाएँ तो मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभाव अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा।कचरा संकट से निपटने की आवश्यकता और भविष्य की दिशाभारत के शहरों को इस संकट से बाहर निकालने के लिए केवल कचरा हटाना ही पर्याप्त नहीं है। हमें लैंडफिल शून्य लक्ष्य की ओर गंभीरता से बढ़ना होगा। इसके लिए कचरे को एक समस्या नहीं, बल्कि संसाधन के रूप में देखना होगा। पुनर्चक्रण, कंपोस्टिंग (composting), जैविक कचरे से खाद और ऊर्जा उत्पादन जैसे उपायों को व्यापक स्तर पर अपनाना समय की मांग है। साथ ही, डंप यार्ड के आसपास रहने वाले समुदायों के पुनर्वास, स्वास्थ्य सुरक्षा और वैकल्पिक आजीविका पर विशेष ध्यान देना होगा। जब तक मानवीय और पर्यावरणीय दोनों दृष्टिकोण से समाधान नहीं खोजे जाएंगे, तब तक शहरी जीवन की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार संभव नहीं है।संदर्भ:https://rb.gy/dbc6x https://rb.gy/xndj7 https://rb.gy/c67th https://tinyurl.com/4uwcyzn7https://tinyurl.com/3yupfczu
आधुनिक राज्य : 1947 ई. से वर्तमान तक
बीटिंग रिट्रीट की शान बढ़ाने वाले बैंड वाद्ययंत्रों का मेरठ से जुड़ा विशेष संबंध
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ!मेरठवासियों, हमारा शहर केवल क्रांति और सैन्य इतिहास के लिए ही नहीं, बल्कि उन अदृश्य परंपराओं के लिए भी जाना जाता है जो राष्ट्रीय गौरव के क्षणों में अपनी छाप छोड़ती हैं। हर वर्ष जब गणतंत्र दिवस के समापन पर विजय चौक में बीटिंग रिट्रीट की गूंज सुनाई देती है, तब उस संगीत की आत्मा में कहीं न कहीं मेरठ की जाली कोठी क्षेत्र की मेहनत, शिल्प और परंपरा समाई होती है। पीतल से बने वे वाद्ययंत्र, जिनकी ध्वनि राष्ट्रपति से लेकर आम नागरिक तक को राष्ट्रभक्ति से भर देती है, मेरठ को भारत की सैन्य-सांस्कृतिक परंपरा से गहराई से जोड़ते हैं।इस लेख में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि किस प्रकार मेरठ का जाली कोठी क्षेत्र देशभर के बैंड वाद्ययंत्रों की रीढ़ बना, बीटिंग रिट्रीट समारोह कैसे गणतंत्र दिवस का गरिमामय समापन बनता है, इसमें राष्ट्रपति और तीनों सेनाओं की क्या भूमिका होती है, कौन-सी ऐतिहासिक धुनें इसकी पहचान हैं, इसका ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय स्वरूप कैसे विकसित हुआ, तथा आधुनिक समय में यह परंपरा किन नए रूपों में सामने आई है।मेरठ का जाली कोठी क्षेत्र और पीतल के बैंड वाद्ययंत्रों की राष्ट्रीय आपूर्तिमेरठ का जाली कोठी क्षेत्र दशकों से देश में पीतल के बैंड वाद्ययंत्रों का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यहाँ निर्मित तुरही, बिगुल, ट्रम्पेट, ड्रम और अन्य वाद्ययंत्र केवल सामाजिक आयोजनों या शादी-ब्याह के बैंडों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि भारतीय सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस बैंडों तक नियमित रूप से पहुँचते हैं। यह माना जाता है कि भारत में उपयोग होने वाले लगभग 95 प्रतिशत पीतल के बैंड वाद्ययंत्रों की आपूर्ति इसी क्षेत्र से होती है। जाली कोठी के कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी इस शिल्प से जुड़े रहे हैं और हाथों से वाद्ययंत्रों को तराशते हुए उनमें ऐसी ध्वनि गुणवत्ता विकसित करते हैं, जो अनुशासन, शौर्य और गरिमा को अभिव्यक्त करती है। जब राष्ट्रीय समारोहों में ये वाद्ययंत्र गूंजते हैं, तो उनके पीछे छिपी मेहनत और परंपरा मेरठ को देश की सांगीतिक सैन्य पहचान का मौन आधार बना देती है।गणतंत्र दिवस का बीटिंग रिट्रीट समारोह: आयोजन और सैन्य सहभागिताहर वर्ष गणतंत्र दिवस के तीसरे दिन, यानी 29 जनवरी की संध्या को, राष्ट्रीय उत्सव का औपचारिक और गरिमामय समापन बीटिंग रिट्रीट (Beating Retreat) समारोह के साथ होता है। नई दिल्ली के विजय चौक पर आयोजित इस आयोजन में थल सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना के बैंड एक साथ मंच पर उतरते हैं। यह समारोह केवल संगीत प्रस्तुति भर नहीं होता, बल्कि सैन्य अनुशासन, समन्वय और परंपरा का जीवंत प्रदर्शन होता है। तीनों सेनाओं के सामूहिक मार्च और तालबद्ध धुनें यह संदेश देती हैं कि राष्ट्र की रक्षा में सभी अंग एकजुट होकर कार्य करते हैं। बीटिंग रिट्रीट इस बात का प्रतीक है कि गणतंत्र दिवस का उत्सव शौर्य, अनुशासन और सम्मान के साथ पूर्ण हुआ है।बीटिंग रिट्रीट में राष्ट्रपति की भूमिका और औपचारिक सैन्य परंपराएँबीटिंग रिट्रीट समारोह की गरिमा का केंद्र भारत के राष्ट्रपति होते हैं, जो इस आयोजन के मुख्य अतिथि होते हैं। उनके विजय चौक में प्रवेश करते ही तुरही की विशेष धुन बजाई जाती है, जो सर्वोच्च संवैधानिक पद के प्रति सम्मान का प्रतीक होती है। इसके बाद राष्ट्रपति अंगरक्षक द्वारा राष्ट्रीय सलामी दी जाती है। सामूहिक सैन्य बैंड ‘जन गण मन’ का वादन करता है और ध्वज स्तंभ से राष्ट्रीय ध्वज को विधिपूर्वक उतारा जाता है। इस अवसर पर राष्ट्रपति भवन को विशेष रोशनी से सजाया जाता है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में नागरिक एकत्रित होते हैं। ये सभी औपचारिक सैन्य परंपराएँ इस समारोह को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक बना देती हैं।बीटिंग रिट्रीट में बजाई जाने वाली ऐतिहासिक और लोकप्रिय सैन्य धुनेंबीटिंग रिट्रीट समारोह की पहचान उसकी विशिष्ट और ऐतिहासिक सैन्य धुनों से होती है। कर्नल बोगी मार्च (Colonel Bogey March), सन्स ऑफ़ द ब्रेव (Sons of the Brave) और ‘क़दम क़दम बढ़ाए जा’ जैसी रचनाएँ पूरे वातावरण में देशभक्ति और गर्व की भावना भर देती हैं। ड्रमरों द्वारा प्रस्तुत ‘ड्रमर कॉल’ (Drummer Call) अनुशासन और सैन्य तालमेल का प्रतीक होती है, जबकि सूर्यास्त के समय बजाया जाने वाला बिगुल समारोह को भावनात्मक ऊँचाई पर पहुँचा देता है। इन धुनों के माध्यम से केवल संगीत नहीं, बल्कि बलिदान, शौर्य और कर्तव्यबोध की भावना भी व्यक्त होती है, जो दर्शकों के मन में गहरी छाप छोड़ती है।बीटिंग रिट्रीट समारोह का ऐतिहासिक उद्भव और अंतरराष्ट्रीय संबंधभारत में बीटिंग रिट्रीट समारोह की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी, जब ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय और प्रिंस फिलिप स्वतंत्र भारत की यात्रा पर आए थे। इस अवसर को विशेष और स्मरणीय बनाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने थल सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट के अधिकारी मेजर जी. ए. रॉबर्ट्स को एक विशेष सामूहिक बैंड प्रदर्शन की योजना बनाने का निर्देश दिया। यहीं से बीटिंग रिट्रीट को गणतंत्र दिवस के औपचारिक समापन के रूप में स्थापित किया गया। समय के साथ यह समारोह न केवल राष्ट्रीय परंपरा बना, बल्कि विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के सम्मान और भारत की कूटनीतिक संस्कृति का भी प्रतीक बन गया।बीटिंग रिट्रीट की वैश्विक सैन्य परंपरा और विदेशी बैंडों की भागीदारीबीटिंग रिट्रीट की परंपरा की जड़ें 17वीं शताब्दी के इंग्लैंड में मिलती हैं, जहाँ सूर्यास्त के समय इसे सैनिकों को उनकी चौकियों से वापस बुलाने के संकेत के रूप में प्रयोग किया जाता था। प्रारंभ में इसे ‘वॉच सेटिंग’ कहा जाता था और यह शाम की तोप की आवाज़ से जुड़ा होता था। धीरे-धीरे यह एक औपचारिक सैन्य समारोह में परिवर्तित हो गया। आज ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और भारत सहित कई देशों में यह परंपरा निभाई जाती है। कुछ विशेष अवसरों पर विदेशी सैन्य बैंडों की भागीदारी ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया है, जिससे सैन्य संगीत के माध्यम से सांस्कृतिक संवाद भी स्थापित होता है।आधुनिक बीटिंग रिट्रीट: नए प्रयोग, विशेष रचनाएँ और समकालीन संदर्भआधुनिक समय में बीटिंग रिट्रीट समारोह में कई नए प्रयोग देखने को मिले हैं। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और दिल्ली पुलिस के बैंडों की भागीदारी ने इसके दायरे को और व्यापक बनाया है। आर्मी सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा और पारंपरिक कलाकारों की प्रस्तुतियाँ सैन्य संगीत को शास्त्रीय और लोक तत्वों से जोड़ती हैं। 1971 के युद्ध में भारत की विजय के 50 वर्ष पूरे होने पर प्रस्तुत विशेष रचना ‘स्वर्णिम विजय’ ने इस समारोह को ऐतिहासिक स्मृति से जोड़ दिया। कोविड काल जैसी चुनौतियों के बावजूद यह परंपरा निरंतर अपनी गरिमा, अनुशासन और राष्ट्रीय भावनाओं को बनाए हुए आगे बढ़ती रही है।संदर्भ :-https://bit.ly/35jVsQt https://bit.ly/3nT5eiV https://bit.ly/3KEQBtq https://tinyurl.com/23jxb4yt
तितलियाँ और कीट
इंडियन रेड एडमिरल: प्रकृति की लाल-काली कलाकृति और बाग़ों की शोभा
इंडियन रेड एडमिरल बटरफ्लाई (Indian Red Admiral Butterfly) भारत में पाई जाने वाली एक बेहद आकर्षक और रंगीन तितली है, जो अपने लाल, नारंगी और काले रंग के सुंदर पंखों के लिए जानी जाती है। इसके पंखों का ऊपरी भाग गहरे नारंगी रंग का होता है, जिस पर काले निशान बने होते हैं, जबकि निचला भाग भूरे रंग का होता है जिसमें हल्के रंग की आकृतियाँ दिखाई देती हैं। यह तितली मध्यम आकार की होती है और इसके पंखों का फैलाव लगभग 60 से 70 मिलीमीटर तक होता है, जो इसे देखने में बेहद संतुलित और आकर्षक बनाता है।यह तितली भारत सहित दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में पाई जाती है और आमतौर पर बगीचों, पार्कों, घास के मैदानों और जंगलों के आसपास देखी जा सकती है। इंडियन रेड एडमिरल की उड़ान शैली भी इसे खास बनाती है, जिसमें यह पहले तेज़ी से पंख फड़फड़ाती है और फिर अचानक हवा में फिसलते हुए आगे बढ़ती है। यह तितली लैंटाना (Lantana) और यूपेटोरियम (Eupatorium) जैसे फूलों के रस पर निर्भर रहती है, जिससे परागण की प्रक्रिया में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान होता है।हालांकि इंडियन रेड एडमिरल तितली को फिलहाल विलुप्तप्राय नहीं माना जाता, लेकिन हाल के वर्षों में इसके प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने और कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग के कारण इसकी संख्या में कमी देखी गई है। ऐसे में इसके संरक्षण और प्राकृतिक वातावरण की सुरक्षा बेहद आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस खूबसूरत तितली की रंगीन उड़ान और सौंदर्य का आनंद ले सकें।संदर्भ -https://tinyurl.com/mrw8n2achttps://tinyurl.com/5dtz6r2m https://tinyurl.com/2fphzf8u
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
पराक्रम दिवस विशेष: मेरठवासियों के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अनसुनी कहानी
मेरठवासियों,पराक्रम दिवस का यह अवसर हमें उस महान व्यक्तित्व को स्मरण करने का अवसर देता है, जिनका नाम लेते ही साहस, त्याग और निर्भीक राष्ट्रभक्ति का भाव मन में जाग उठता है। सुभाष चंद्र बोस को सामान्यतः हम आज़ाद हिंद फ़ौज के सेनानायक और ब्रिटिश शासन को खुली चुनौती देने वाले क्रांतिकारी के रूप में जानते हैं। लेकिन मेरठ जैसे ऐतिहासिक नगर के लिए, जिसने 1857 में स्वतंत्रता की पहली संगठित चिंगारी देखी, नेताजी को केवल सैन्य पराक्रम तक सीमित करके देखना उनके व्यक्तित्व को अधूरा समझना होगा।नेताजी के भीतर एक गहरा, शांत और आत्मिक संसार भी था, जिसने उनके हर निर्णय को दिशा दी। आज हम जानेंगे कि नेताजी के जीवन में आध्यात्मिकता का क्या स्थान था, स्वामी विवेकानंद ने उनके विचारों को कैसे आकार दिया, बचपन की कौन सी घटना ने उनके भीतर आत्मचिंतन की नींव रखी, एक पत्रकार के साथ हुआ कौन सा संवाद उनके त्याग को स्पष्ट करता है, और अंत में यह समझेंगे कि भगवद गीता ने उनके संघर्षपूर्ण जीवन में उन्हें मानसिक और नैतिक शक्ति कैसे दी।विशाखापत्तनम के आरके बीच पर सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमानेताजी का आध्यात्मिक और दार्शनिक स्वरूपनेताजी सुभाष चंद्र बोस केवल राजनीतिक संघर्ष के नेता नहीं थे, बल्कि भीतर से एक गंभीर विचारक थे। वे जीवन को केवल सत्ता, पद या उपलब्धियों के माध्यम से नहीं देखते थे। उनके लिए स्वतंत्रता आत्मसम्मान और कर्तव्य का विषय थी। यही कारण था कि उनका जीवन अनुशासन, सादगी और आत्मसंयम से भरा हुआ था।भौतिक सुख, व्यक्तिगत आराम और निजी महत्वाकांक्षाएँ उनके जीवन के केंद्र में नहीं थीं। वे मानते थे कि जब तक व्यक्ति भीतर से मज़बूत नहीं होता, तब तक बाहरी संघर्षों में स्थिर रहना संभव नहीं है। यह आंतरिक शक्ति उनके पूरे जीवन में दिखाई देती है।स्वामी विवेकानंद से मिली वैचारिक दिशाकिशोरावस्था में स्वामी विवेकानंद के विचारों से परिचय नेताजी के जीवन का निर्णायक मोड़ बना। विवेकानंद की शिक्षाओं ने उन्हें यह समझाया कि राष्ट्रसेवा केवल राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना भी हो सकती है। सेवा, त्याग और मातृभूमि को देवी स्वरूप मानने की भावना उनके भीतर गहराई से बैठ गई।नेताजी का विश्वास था कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी आध्यात्मिक चेतना में निहित है। विवेकानंद का यह विचार कि पहले स्वयं को सशक्त बनाओ, फिर समाज और राष्ट्र को सशक्त करो, उनके जीवन दर्शन की आधारशिला बना।बचपन की वह कथा जिसने आत्मचिंतन को दिशा दीनेताजी के बचपन की एक कथा उनके भीतर की आध्यात्मिक खोज को स्पष्ट रूप से सामने लाती है। एक बार कटक में एक अत्यंत वृद्ध संन्यासी आए, जिन्हें कुछ स्रोत भोलानंद गिरीजी के रूप में पहचानते हैं। सुभाष और उनके मित्रों ने उनका आदर किया। उस संन्यासी ने सुभाष को तीन बातें बताईं। पहली, शाकाहार अपनाने की सलाह। दूसरी, कुछ विशेष श्लोकों का नियमित पाठ करने की बात। तीसरी और सबसे कठिन सलाह थी कि वे प्रतिदिन अपने माता पिता के चरणों में प्रणाम करें। यह तीसरी बात बालक सुभाष के लिए सबसे कठिन थी, फिर भी उन्होंने उसी दृढ़ता के साथ इसका पालन किया, जैसी वे अपने हर कार्य में दिखाते थे। हर सुबह वे अपने माता पिता के सामने झुकते। प्रारंभ में उन्हें संकोच और अपमान का अनुभव हुआ, और उनके माता पिता भी आश्चर्यचकित हुए। पर धीरे धीरे यह उनके घर की स्वाभाविक दिनचर्या बन गई।कुछ समय बाद सुभाष को यह महसूस हुआ कि ये अभ्यास उनकी आध्यात्मिक जिज्ञासा को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं। तब उन्होंने इन सबको छोड़कर अपना ध्यान पूरी तरह रामकृष्ण और विवेकानंद के विचारों पर केंद्रित कर दिया। इसके बाद उन्होंने स्वामी विवेकानंद की शिक्षा के अनुसार सेवा को अपनाया। जो भी उनके घर आता, उसकी सेवा करना वे अपना कर्तव्य मानते थे और दूसरों की आवश्यकता पूरी करके उन्हें गहरा संतोष मिलता था।1906 में सुभाष चंद्र बोस बालक रूप में।पत्रकार के साथ वह संवाद जो नेताजी के त्याग को परिभाषित करता हैनेताजी के जीवन की एक घटना उनके त्याग और स्पष्ट सोच को अत्यंत प्रभावी ढंग से सामने लाती है। जब वे आज़ाद हिंद फ़ौज को सशक्त करने के लिए विश्व भ्रमण पर थे, तब एक महिला पत्रकार ने उनसे पूछा कि क्या वे जीवन भर अविवाहित रहने का विचार रखते हैं।नेताजी ने मुस्कराते हुए कहा कि वे विवाह अवश्य करते, लेकिन कोई उनकी माँग के अनुसार दहेज देने को तैयार नहीं है। पत्रकार ने हैरानी से पूछा कि ऐसी कौन सी माँग है जिसे कोई पूरा नहीं कर सकता। इस पर नेताजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया कि वे दहेज में अपने देश की स्वतंत्रता चाहते हैं, और पूछा कि क्या कोई उन्हें यह दे सकता है।यह उत्तर सुनकर पत्रकार स्तब्ध रह गई। धन, सौंदर्य और व्यक्तिगत सुख से इस तरह का वैराग्य देखकर उसके मन में नेताजी के प्रति गहरा सम्मान जाग उठा। यह संवाद नेताजी के भीतर बसे उस संन्यासी को उजागर करता है, जिसके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था।भगवद गीता: नेताजी के कर्म और साहस का आधारनेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए भगवद गीता केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं थी, बल्कि उनके कर्मों और निर्णयों की दार्शनिक आधारशिला थी। गीता में वर्णित निष्काम कर्म और धर्म की अवधारणा ने उनके जीवन को स्पष्ट दिशा दी। नेताजी का विश्वास था कि भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना उनका धर्म है, और इस धर्म का पालन उन्हें बिना किसी व्यक्तिगत लाभ की चिंता किए करना है।गीता का निर्भयता का संदेश उनकी क्रांतिकारी सोच को निरंतर बल देता रहा। कठिन परिस्थितियों, निर्वासन और संघर्ष के बीच भी वे मानसिक रूप से अडिग बने रहे। बहुत कम लोग जानते हैं कि नेताजी प्रायः अपने साथ श्रीमद् भगवद गीता की एक प्रति रखते थे और चुनौतीपूर्ण समय में उसके श्लोकों से मानसिक शक्ति प्राप्त करते थे। आज़ाद हिंद फ़ौज के संघर्षपूर्ण दिनों में भी गीता उनके आत्मबल का स्रोत बनी रही।वे एक आस्थावान हिंदू थे और वेदांत तथा गीता से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपने राष्ट्रवादी विचारों को आकार दिया। श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं ने उनके भीतर भक्ति और शक्ति का संतुलन रचा।संदर्भ -https://tinyurl.com/45kddn2ehttps://tinyurl.com/2fe74tu8https://tinyurl.com/2fwez58khttps://tinyurl.com/8my53u4uhttps://tinyurl.com/4jnwuyb8https://tinyurl.com/ykhws3se
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
मेरठ में बसंत पंचमी: विद्या, पीले रंग और नवजीवन से जुड़ा वसंत उत्सव
मेरठवासियो, बसंत पंचमी का आगमन मेरठ की धरती पर एक विशेष उमंग और चेतना के साथ होता है। ठंडी हवाओं की विदाई और हल्की धूप की उपस्थिति के साथ यह पर्व न केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत देता है, बल्कि जीवन में नई ऊर्जा, आशा और रचनात्मकता का संदेश भी लेकर आता है। शहर के मंदिरों में सरस्वती पूजा, विद्यार्थियों द्वारा विद्या आरंभ की परंपरा, पीले वस्त्रों और प्रसाद की सजावट—ये सभी दृश्य मेरठ में बसंत पंचमी को एक जीवंत सांस्कृतिक अनुभव बना देते हैं। बसंत पंचमी पूरे उत्तर भारत में प्रकृति और मानव जीवन के बीच सामंजस्य का उत्सव है। सरसों के पीले खेत, खिलते फूल, पतंगों से सजा आकाश और घरों में बनने वाले पीले व्यंजन इस पर्व को उल्लासपूर्ण बनाते हैं। यह दिन ज्ञान, विवेक और सृजनशीलता की देवी सरस्वती को समर्पित होता है, इसलिए इसे बौद्धिक जागरण और सकारात्मक शुरुआत के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। मेरठ हो या देश का कोई अन्य भाग, बसंत पंचमी हमें यह सिखाती है कि प्रकृति के साथ तालमेल, ज्ञान का सम्मान और सामूहिक आनंद ही सभ्यता की वास्तविक पहचान हैं।इस लेख में हम सबसे पहले यह समझेंगे कि सभ्यताओं के अस्तित्व में संस्कृति और उत्सवों की क्या भूमिका रही है। इसके बाद विश्व की प्रमुख सभ्यताओं में उत्सवों की वैश्विक परंपराओं पर नज़र डालेंगे। फिर भारतीय उप-महाद्वीप में बसंत पंचमी के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थान को समझेंगे। आगे चलकर हम बसंत पंचमी से जुड़े लोक रंगों, प्रतीकों और सामाजिक अभिव्यक्तियों पर चर्चा करेंगे। इसके बाद सरस्वती पूजा और बसंत पंचमी के दार्शनिक अर्थ को जानेंगे, और अंत में युधिष्ठिर की कथा के माध्यम से विवेक और आत्मविश्वास के जीवन संदेश को समझने का प्रयास करेंगे।सभ्यताओं के अस्तित्व में संस्कृति और उत्सवों की भूमिकासभ्यताएँ केवल सत्ता, शासन व्यवस्था या भौगोलिक सीमाओं के सहारे लंबे समय तक जीवित नहीं रह पातीं, बल्कि संस्कृति उनके अस्तित्व की वास्तविक आत्मा होती है। लोक परंपराएँ, संगीत, कला, कथाएँ, मिथक और उत्सव मिलकर समाज की सामूहिक स्मृति को आकार देते हैं। जब कोई समुदाय अपने त्योहारों को मनाता है, तो वह केवल एक दिन का उत्सव नहीं मनाता, बल्कि अपने अतीत से जुड़कर वर्तमान को अर्थ देता है और भविष्य की दिशा तय करता है। मेरठ जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र में यह बात और स्पष्ट दिखाई देती है, जहाँ लोकगीतों की परंपरा, धार्मिक आयोजन और मौसमी पर्व आज भी सामाजिक एकता, सामूहिक भावनाओं और सांस्कृतिक निरंतरता को मज़बूती प्रदान करते हैं।विद्यालय में सरस्वती पूजाविश्व की प्रमुख सभ्यताओं में उत्सवों की वैश्विक परंपरादुनिया के हर कोने में उत्सव मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं और अलग-अलग सभ्यताओं ने इन्हें अपनी जीवनशैली के अनुसार ढाला है। अफ्रीकी समाजों में नृत्य और अनुष्ठान सामुदायिक चेतना, प्रकृति और पूर्वजों से जुड़ाव का प्रतीक होते हैं। लैटिन अमेरिका में मनाया जाने वाला कार्निवल जीवन के उत्साह, रंगीन अभिव्यक्ति और सामूहिक उल्लास को दर्शाता है। चीन में वसंत उत्सव परिवार, पुनर्नवकरण और नए आरंभ का संदेश देता है, जबकि यूरोपीय संस्कृतियों में गायन, नृत्य और उत्सव ऋतु परिवर्तन के साथ गहराई से जुड़े होते हैं। इन विविध उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि भौगोलिक दूरी और सांस्कृतिक भिन्नताओं के बावजूद, उत्सव मानव सभ्यता की एक साझा और सार्वभौमिक भाषा हैं।भारतीय उप-महाद्वीप में बसंत पंचमी का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थानभारतीय उप-महाद्वीप में बसंत पंचमी का स्थान विशेष और गहन रहा है। इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों और ऋग्वैदिक परंपराओं में मिलता है, जहाँ इसे ज्ञान, ऋतु परिवर्तन और नवजीवन से जोड़ा गया है। यह पर्व माघ शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है और सर्दी के कठोर तथा नीरस दिनों के बाद बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है। बसंत पंचमी केवल भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में भी इसे विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। इस व्यापक क्षेत्रीय प्रसार ने बसंत पंचमी को एक ऐसे सांस्कृतिक सेतु का रूप दिया है, जो भिन्न समाजों और परंपराओं को एक भावनात्मक सूत्र में बाँधता है।बसंत पंचमी के लोक रंग, प्रतीक और सामाजिक अभिव्यक्तियाँबसंत पंचमी का उत्सव रंगों, प्रतीकों और लोक अभिव्यक्तियों से भरपूर होता है। इस पर्व में पीला रंग प्रमुख माना जाता है, जो ऊर्जा, आशा, उल्लास और नई शुरुआत का प्रतीक है। सरसों के पीले खेत, लोगों के पीले वस्त्र, भोजन में केसर का प्रयोग और खुले आकाश में उड़ती पतंगें—ये सभी स्वतंत्रता, प्रसन्नता और जीवन के विस्तार का भाव व्यक्त करते हैं।मेरठ जैसे क्षेत्रों में बसंत पंचमी केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि एक सामाजिक अवसर भी बन जाती है, जहाँ लोग प्रकृति के साथ अपने संबंध को पुनः महसूस करते हैं और सामूहिक रूप से मौसम के परिवर्तन का स्वागत करते हैं।सरस्वती पूजा और बसंत पंचमी का दार्शनिक व आध्यात्मिक अर्थबसंत पंचमी को सरस्वती पूजा के रूप में मनाने की परंपरा इसके दार्शनिक और आध्यात्मिक पक्ष को और गहरा बनाती है। देवी सरस्वती परा और अपरा विद्या की प्रतीक मानी जाती हैं। परा विद्या आत्मिक और शाश्वत ज्ञान की ओर ले जाती है, जबकि अपरा विद्या सांसारिक सुख और भौतिक सफलता प्रदान करती है। देवी के चरणों में विराजमान हंस विवेक का प्रतीक है, जो सही और गलत, शाश्वत और अशाश्वत के बीच भेद करने की क्षमता को दर्शाता है। यह दर्शन हमें यह सिखाता है कि केवल बाहरी उपलब्धियाँ ही नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण ज्ञान ही जीवन में स्थायी संतोष और संतुलन प्रदान कर सकता है।युधिष्ठिर की कथा से विवेक और आत्मविश्वास का नैतिक संदेशयुधिष्ठिर की कथा विवेक और आत्मविश्वास के महत्व को गहराई से उजागर करती है। यह कहानी बताती है कि जब विवेक व्यक्ति का साथ छोड़ देता है, तो धर्म, समृद्धि और प्रतिष्ठा भी धीरे-धीरे उससे दूर हो जाती हैं। युधिष्ठिर के जीवन में विवेक के लुप्त होने के साथ पतन का आरंभ होता है, लेकिन जैसे ही आत्मविश्वास पुनः जागृत होता है, विवेक और धर्मनिष्ठा भी लौट आती हैं। यह कथा हमें यह समझाती है कि जीवन के संकटपूर्ण क्षणों में आत्मविश्वास सबसे बड़ी शक्ति बनता है, जो व्यक्ति को पुनः संतुलन, स्थिरता और सही मार्ग की ओर ले जा सकता है।संदर्भ :-https://tinyurl.com/yske72t8 https://tinyurl.com/yny59ev7 https://tinyurl.com/y48dcj4p
फल और सब्जियाँ
मेरठवासियों, सर्दियों की सेहत और मौसमी फल: शरीर, किसान और पोषण का संतुलन
मेरठ, जो अपनी उपजाऊ भूमि, खेतों और परंपरागत खान-पान के लिए जाना जाता है, सर्दियों के मौसम में एक अलग ही रंग में नज़र आता है। ठंडी हवाएँ, धुंध भरी सुबहें और बदलती दिनचर्या न केवल हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं, बल्कि हमारे शरीर की ज़रूरतों को भी बदल देती हैं। इस मौसम में मेरठ के घरों और बाज़ारों में मौसमी फलों की मौजूदगी हमेशा से सेहत का सहारा रही है। सर्दियाँ हमें यह सिखाती हैं कि भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि शरीर को मौसम के अनुसार संतुलित रखने का माध्यम भी है। ऐसे समय में सर्दियों में उगने वाले फल मेरठवासियों के लिए पोषण और ऊर्जा का प्राकृतिक स्रोत बनते हैं।इस लेख में हम समझने का प्रयास करेंगे कि सर्दियों का मौसम मानव शरीर पर किस प्रकार प्रभाव डालता है, सर्दियों में उगने वाले फलों का पोषण और स्वास्थ्य से क्या संबंध है, वैश्विक जलवायु में इन फलों की भूमिका क्या है, मौसमी बीमारियों से बचाव में ये फल कैसे सहायक होते हैं, भारत में इन फलों का उपभोक्ताओं और किसानों के लिए क्या महत्व है, और अंत में अंगूर, अमरूद, संतरा व अनार जैसे प्रमुख सर्दियों के फलों की खेती व विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।सर्दियों का मौसम और मानव शरीर पर उसका प्रभावसर्दियों के मौसम में तापमान गिरने के साथ ही मानव शरीर की कार्यप्रणाली में भी कई स्वाभाविक परिवर्तन देखने को मिलते हैं। ठंड से बचाव के लिए शरीर अधिक ऊर्जा खर्च करता है, जिसके कारण भूख और प्यास सामान्य दिनों की तुलना में बढ़ जाती है। वहीं दिन छोटे होने और धूप की उपलब्धता कम होने से शारीरिक सक्रियता घटने लगती है, जिसका सीधा असर रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है। मेरठ जैसे मैदानी क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान सर्दी-जुकाम, खांसी, फ्लू और जोड़ों के दर्द की शिकायतें आम हो जाती हैं। ठंड के कारण रक्त संचार भी धीमा पड़ता है, जिससे शरीर में जकड़न और थकान महसूस होती है। ऐसे समय में शरीर को अतिरिक्त पोषण, विटामिन (vitamin) और प्राकृतिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिसे केवल भारी या तला-भुना भोजन नहीं, बल्कि संतुलित और मौसमी आहार के ज़रिये ही बेहतर ढंग से पूरा किया जा सकता है।सर्दियों में उगने वाले फलों का पोषण और स्वास्थ्य महत्वसर्दियों में उगने वाले फल शरीर की मौसमी ज़रूरतों के अनुरूप पोषण प्रदान करते हैं, इसलिए इन्हें इस मौसम का सबसे उपयुक्त आहार माना जाता है। संतरा और नींबू जैसे खट्टे फल विटामिन सी (vitamin C) से भरपूर होते हैं, जो ठंड के मौसम में कमजोर होती प्रतिरक्षा प्रणाली को मज़बूती देते हैं। अमरूद और अनार जैसे फल एंटीऑक्सीडेंट्स (antioxidants) से भरपूर होते हैं, जो शरीर में सूजन को कम करने के साथ-साथ कोशिकाओं को क्षति से बचाने में मदद करते हैं। सर्दियों में जोड़ों के दर्द, सुस्ती और थकान की समस्या आम होती है, ऐसे में ये फल शरीर को प्राकृतिक रूप से ऊर्जा प्रदान करते हैं। इनका नियमित सेवन न केवल रोगों से बचाव करता है, बल्कि शरीर को अंदर से मज़बूत बनाकर सर्दियों के प्रभाव को संतुलित करने में भी सहायक सिद्ध होता है।वैश्विक जलवायु और सर्दियों के फल: एक अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्ययदि सर्दियों के फलों को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि सर्दी हर स्थान पर एक-सी नहीं होती। जब उत्तरी गोलार्ध में सर्दी का मौसम होता है, तब दक्षिणी गोलार्ध में गर्मी रहती है। ध्रुवीय और समशीतोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में सर्दियों के फल कठोर परिस्थितियों में भी उगने की क्षमता रखते हैं। दक्षिण अफ़्रीका जैसे देशों में संतरे, अंगूर, कीवी और एवोकाडो (Avocado) सर्दियों के दौरान उगते हैं और स्थानीय तथा अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह दर्शाता है कि सर्दियों के फल केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक पोषण और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला का अहम हिस्सा हैं, जो अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में मानव स्वास्थ्य को सहारा देते हैं।सर्दियों के फल और मौसमी स्वास्थ्य समस्याओं से सुरक्षासर्दियों में मौसमी बीमारियाँ सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आती हैं। ठंड, नमी और धूप की कमी के कारण विटामिन डी (Vitamin D) की कमी आम हो जाती है, जिससे हड्डियाँ कमजोर होने लगती हैं और प्रतिरक्षा तंत्र प्रभावित होता है। ऐसे में सर्दियों के फल विटामिन, खनिज और प्राकृतिक शर्करा का संतुलित संयोजन प्रदान करते हैं। ये तत्व शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाते हैं और सामान्य सर्दी-जुकाम, फ्लू तथा थकान जैसी समस्याओं से बचाव में सहायक होते हैं। नियमित रूप से मौसमी फलों का सेवन करने से शरीर मौसम के अनुसार खुद को ढालने लगता है, जिससे दवाओं पर निर्भरता भी कम हो सकती है।भारत में सर्दियों के फल: उपभोक्ता स्वास्थ्य और किसानों की आजीविकाभारत में सर्दियों के फल केवल उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये लाखों किसानों की आजीविका से भी गहराई से जुड़े हुए हैं। सर्दियों के मौसम में फलों का उत्पादन अपेक्षाकृत सीमित होता है, जबकि मांग लगातार बढ़ती रहती है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त होता है। महामारी के बाद लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ने से मौसमी और पौष्टिक फलों की मांग और अधिक हो गई है। मेरठ जैसे कृषि प्रधान क्षेत्रों में यह रुझान किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को ताज़ा और पौष्टिक फल उपलब्ध कराने में भी सहायक सिद्ध हो रहा है।प्रमुख सर्दियों के फल और उनकी खेती की विशेषताएँसर्दियों में उगने वाले प्रमुख फलों में अंगूर, अमरूद, संतरा और अनार विशेष स्थान रखते हैं। अंगूर समशीतोष्ण जलवायु में अच्छी फसल देते हैं और सर्दियों के अंत तक कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं। अमरूद, जो आमतौर पर दिसंबर में पकता है, फाइबर (fiber) और विटामिन का सस्ता तथा सुलभ स्रोत माना जाता है। संतरा अपने आसान परिवहन, लंबे भंडारण और पोषण गुणों के कारण सर्दियों का सबसे लोकप्रिय फल बन चुका है। वहीं अनार अपने एंटीऑक्सीडेंट गुणों के चलते स्वास्थ्य के लिहाज़ से विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है। इन सभी फलों की खेती सही जलवायु, उपयुक्त मिट्टी और समय पर कटाई पर निर्भर करती है, जिससे उनकी गुणवत्ता और पोषण मूल्य बना रहता है।संदर्भhttp://tinyurl.com/5c59f3sk http://tinyurl.com/y3j377e8https://tinyurl.com/3yhrzm58
पक्षी
मेरठवासियों जानिए, पेंगुइन की दुनिया: बर्फ़ीले समुद्रों से संस्कृति तक का अनोखा सफ़र
मेरठवासियों, जब भी हम ध्रुवीय क्षेत्रों, बर्फ़ से ढकी धरती और समुद्र की अथाह गहराइयों की कल्पना करते हैं, तो पेंगुइन (penguin) की छवि अपने आप हमारे मन में उभर आती है। भले ही पेंगुइन का मेरठ या इसके आसपास के क्षेत्र से कोई प्रत्यक्ष भौगोलिक संबंध न हो, फिर भी प्रकृति के ये अनोखे जीव आज पूरी दुनिया की जिज्ञासा, वैज्ञानिक अध्ययन और सांस्कृतिक आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। उड़ान न भर पाने वाले ये पक्षी समुद्री जीवन के लिए इस तरह अनुकूलित हैं कि उनकी जीवनशैली हमें प्रकृति की अद्भुत रचनात्मकता और अनुकूलन क्षमता से परिचित कराती है।इस लेख में हम सबसे पहले यह समझेंगे कि पेंगुइन किस प्रकार समुद्री जीवन के लिए अनुकूलित उड़ान रहित पक्षी हैं और उनकी शारीरिक संरचना उन्हें उत्कृष्ट तैराक कैसे बनाती है। इसके बाद, हम पेंगुइन की वैश्विक प्रजातियों और उनके भौगोलिक वितरण पर नज़र डालेंगे। आगे, एम्परर पेंगुइन (Emperor Penguin) जैसी सबसे बड़ी प्रजाति की विशेषताओं और जीवन चक्र को जानेंगे। फिर, सबसे छोटी पेंगुइन प्रजाति और आकार के अनुसार उनके आवास में अंतर को समझेंगे। इसके साथ ही, पेंगुइन के व्यवहार और मनुष्यों के प्रति उनकी विशिष्टता पर चर्चा करेंगे। अंत में, पॉप संस्कृति (pop culture), मीडिया और पौराणिक कथाओं में पेंगुइन के सांस्कृतिक चित्रण को देखेंगे।पेंगुइन: समुद्री जीवन के लिए अनुकूलित उड़ान रहित पक्षीपेंगुइन ऐसे पक्षी हैं जो उड़ान नहीं भर सकते, लेकिन समुद्र में तैरने और गहराई तक गोता लगाने में अत्यंत कुशल होते हैं। उनकी शारीरिक संरचना समुद्री जीवन के अनुसार विकसित हुई है। उनके फ्लिपर्स (flippers) पंखों के स्थान पर काम करते हैं, जिनकी सहायता से वे पानी में तेज़ी से आगे बढ़ते हैं। पेंगुइन अपने पैरों और पूंछ का उपयोग पतवार की तरह करते हैं, जिससे उनकी दिशा नियंत्रित रहती है। उनके शरीर पर काले और सफ़ेद रंग के छोटे, अतिव्यापी पंखों की एक जलरोधक परत होती है, जो ठंडे पानी में उन्हें सुरक्षित रखती है। भोजन के रूप में वे क्रिल (krill), मछली और स्क्विड (squid) खाते हैं, जबकि लेपर्ड सील (leopard seal) और किलर व्हेल (killer whale) जैसे समुद्री जीव उनके प्रमुख शिकारी हैं। अंडों और चूजों को स्कुआ (skuas) और शीथबिल (sheathbill) जैसे पक्षियों से खतरा रहता है।पेंगुइन की वैश्विक प्रजातियाँ और उनका भौगोलिक वितरणदुनिया भर में पेंगुइन की कुल 18 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से पाँच प्रजातियाँ अंटार्कटिका में और चार उप-अंटार्कटिक द्वीपों पर निवास करती हैं। पेंगुइन मुख्य रूप से दक्षिणी गोलार्ध में पाए जाते हैं। गैलापागोस पेंगुइन (Galapagos Penguins) एकमात्र ऐसी प्रजाति है जो भूमध्य रेखा के उत्तर में भी पाई जाती है। इनका सबसे अधिक घनत्व अंटार्कटिक तटों और आसपास के द्वीपों में देखा जाता है। सामान्यतः बड़े पेंगुइन ठंडे क्षेत्रों में रहते हैं, जबकि छोटे पेंगुइन समशीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय जलवायु वाले इलाकों में पाए जाते हैं।एम्परर पेंगुइन: सबसे बड़ी और अंटार्कटिका-विशेष प्रजातिएम्परर पेंगुइन पेंगुइन की सबसे बड़ी और सबसे भारी प्रजाति है, जो केवल अंटार्कटिका में पाई जाती है। इसकी लंबाई लगभग 1.1 मीटर तक होती है और वजन 22 से 45 किलोग्राम के बीच होता है। यह प्रजाति 500 मीटर से अधिक गहराई तक गोता लगा सकती है और लगभग 20 मिनट तक पानी में रह सकती है। एम्परर पेंगुइन की सबसे अनोखी विशेषता इसका प्रजनन व्यवहार है। यह एकमात्र पेंगुइन है जो अंटार्कटिक सर्दियों में प्रजनन करता है। मादा एक ही अंडा देती है, जिसे नर दो महीने से अधिक समय तक अपने पैरों पर संभालकर सेता है। इनका औसत जीवनकाल लगभग 20 वर्ष होता है, हालांकि कुछ पेंगुइन इससे अधिक समय तक भी जीवित रहते हैं।सबसे छोटी पेंगुइन प्रजाति और आकार के अनुसार आवास का अंतरसबसे छोटी पेंगुइन प्रजाति यूडिप्टुला माइनर (Eudyptula minor) है, जिसे फेयरी पेंगुइन (fairy penguin) या छोटे नीले पेंगुइन के नाम से भी जाना जाता है। इसकी लंबाई लगभग 33 सेंटीमीटर और वजन करीब 1 किलोग्राम होता है। यह मुख्य रूप से दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के समुद्र तटों पर पाई जाती है। आकार के आधार पर देखा जाए तो छोटे पेंगुइन अपेक्षाकृत गर्म या समशीतोष्ण क्षेत्रों में रहते हैं, जबकि बड़े पेंगुइन ठंडे इलाकों में पाए जाते हैं। लेख में यह भी उल्लेख मिलता है कि कुछ प्रागैतिहासिक पेंगुइन प्रजातियाँ आकार में अत्यंत विशाल थीं, जो लगभग एक वयस्क मानव जितनी बड़ी होती थीं।पेंगुइन का व्यवहार और मनुष्यों के प्रति उनकी विशिष्टतापेंगुइन अपने सीधे खड़े होने, डगमगाती चाल और निर्भीक स्वभाव के कारण दुनिया भर में पहचाने जाते हैं। अन्य पक्षियों की तुलना में वे मनुष्यों से कम डरते हैं, जो उन्हें और भी रोचक बनाता है। उनकी तैराकी क्षमता, समूह में रहने की प्रवृत्ति और चतुराई ने उन्हें प्रकृति प्रेमियों और वैज्ञानिकों के बीच विशेष स्थान दिलाया है। उनके काले और सफ़ेद पंखों की तुलना अक्सर औपचारिक पोशाक से की जाती है, जिससे उनका व्यक्तित्व और भी आकर्षक प्रतीत होता है।पॉप संस्कृति, मीडिया और पौराणिक कथाओं में पेंगुइन का चित्रणपेंगुइन का सांस्कृतिक चित्रण भी उतना ही रोचक है जितना उनका प्राकृतिक जीवन। मार्च ऑफ़ द पेंगुइन्स (March of the Penguins), मेडागास्कर (Madagascar), हैप्पी फीट (Happy Feet) और सर्फ़्स (Surfs) अप जैसी फ़िल्मों ने पेंगुइन को पॉप संस्कृति में विशेष लोकप्रियता दिलाई। 2008 में बीबीसी (BBC) द्वारा अप्रैल फूल दिवस पर जारी एक हास्य फिल्म में पेंगुइन को उड़ते हुए दिखाया गया, जिसने लोगों का खूब मनोरंजन किया। विज्ञापनों, ब्रांड लोगो, चॉकलेट बिस्कुट और वीडियो गेम्स में भी पेंगुइन की छवि का उपयोग किया गया है। माओरी पौराणिक कथाओं में भी पेंगुइन का विशेष स्थान है, जहाँ विभिन्न प्रजातियों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है।संदर्भ:https://bit.ly/2ZGOtOI https://bit.ly/39J0XqX https://bit.ly/3CSJSqN https://bit.ly/3um4Njhhttps://tinyurl.com/bdf558ux
भूमि और मिट्टी के प्रकार : कृषि योग्य, बंजर, मैदान
मेरठ के खेतों से देश की थाली तक: गंगा का मैदान कैसे तय करता है भारत की खाद्य सुरक्षा?
मेरठ, जो गंगा के मैदान का एक अहम हिस्सा है, केवल अपनी ऐतिहासिक पहचान या तेज़ी से बढ़ते शहरी स्वरूप के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा में इसके योगदान के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस लेख में हम सबसे पहले यह समझेंगे कि गंगा का मैदान और विशेष रूप से मेरठ, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में क्यों महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके बाद, हम जलवायु परिवर्तन के कारण गंगा के मैदान की कृषि पर बढ़ते दबाव और उसके प्रभावों पर चर्चा करेंगे। आगे, चावल-गेहूं प्रणाली पर मंडराते संभावित खतरों और मिट्टी की बिगड़ती सेहत को समझने की कोशिश करेंगे। फिर, वैश्विक परिप्रेक्ष्य में खाद्य असुरक्षा और गरीबी की स्थिति को भारत से जोड़कर देखेंगे। अंत में, हम उन अनुकूलन रणनीतियों और नीतिगत प्रयासों पर बात करेंगे, जिनके माध्यम से कृषि उत्पादन और किसान आय बढ़ाकर गंगा का मैदान राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में अपना योगदान और बढ़ा सकता है।गंगा का मैदान और मेरठ की राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में भूमिकागंगा का मैदान, जिसे इंडो-गैंगेटिक प्लेन (Indo-Gangetic Plane) कहा जाता है, भारत की कृषि संरचना की रीढ़ माना जाता है। यह मैदान 2.5 मिलियन (million) वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है और देश की लगभग 40 प्रतिशत आबादी के लिए भोजन का मुख्य स्रोत है। मेरठ इसी विशाल और उपजाऊ क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहाँ की भौगोलिक स्थिति, समतल भूमि और ऐतिहासिक रूप से विकसित कृषि परंपराएँ इसे खाद्यान्न उत्पादन के लिए विशेष बनाती हैं। यहां की उपजाऊ मिट्टी, पर्याप्त जल संसाधन और पीढ़ियों से चली आ रही खेती की पद्धतियाँ लंबे समय से देश के खाद्यान्न भंडार को मज़बूती देती आई हैं। ऐसे में, यदि मेरठ जैसे ज़िलों में कृषि उत्पादन को सुरक्षित, टिकाऊ और खाद्य मानकों के अनुरूप बनाए रखा जाए, तो इसका सीधा और सकारात्मक प्रभाव राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है।जलवायु परिवर्तन और गंगा के मैदान की कृषि पर बढ़ता दबाववर्तमान समय में गंगा का मैदान तेज़ी से बदलते जलवायु पैटर्न के गंभीर दबाव में है। मानसून की अनियमितता, कभी अत्यधिक वर्षा तो कभी लंबे सूखे की स्थिति, बेमौसम बारिश और तीव्र गर्मी की लहरें अब असामान्य नहीं रहीं। ये सभी परिवर्तन सीधे तौर पर कृषि उत्पादन की स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं। मेरठ सहित इस पूरे क्षेत्र के छोटे और सीमांत किसान, जो पहले ही सीमित संसाधनों, पानी और पूंजी पर निर्भर हैं, इन जलवायु परिवर्तनों से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन ने न केवल फसल चक्र को असंतुलित किया है, बल्कि किसानों की आय, उनकी आजीविका और खाद्य सुरक्षा को भी गंभीर जोखिम में डाल दिया है।चावल–गेहूं प्रणाली पर जलवायु परिवर्तन का संभावित खतरागंगा के मैदान की कृषि व्यवस्था मुख्य रूप से चावल और गेहूं की पारंपरिक प्रणाली पर आधारित है, जो दशकों से देश की खाद्य ज़रूरतों को पूरा करती आई है। लेकिन अनुमान है कि 2050 के दशक तक यह प्रणाली जलवायु परिवर्तन के कारण और अधिक संवेदनशील हो सकती है। चावल की उपज में लगभग 12 प्रतिशत और गेहूं की उपज में 24 प्रतिशत तक की संभावित गिरावट इस खतरे को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। लगातार अधिक उत्पादन लेने की प्रवृत्ति और रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से मिट्टी की सेहत भी प्रभावित हुई है, जिससे उपज का स्तर अब स्थिर होने लगा है। इसका सीधा असर उन किसान परिवारों पर पड़ेगा, जिनकी आजीविका पूरी तरह इन्हीं दो फसलों पर निर्भर है और जिनके पास जोखिम सहने की क्षमता सीमित है।खाद्य असुरक्षा, गरीबी और वैश्विक परिदृश्य में भारत की स्थितिवैश्विक स्तर पर खाद्य असुरक्षा आज एक गंभीर और बढ़ती हुई चुनौती बन चुकी है। 2019 से 2022 के बीच तीव्र खाद्य असुरक्षा से प्रभावित लोगों की संख्या 82 देशों में 135 मिलियन से बढ़कर 345 मिलियन तक पहुँच गई है। दक्षिण एशिया, उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे क्षेत्र फसल विफलता, भूख और कुपोषण के सबसे बड़े जोखिम क्षेत्र बन चुके हैं। भारत भी इसी संवेदनशील क्षेत्र का हिस्सा है। कुपोषण, पानी की कमी, प्रति एकड़ कम कृषि उत्पादन और जलवायु परिवर्तन मिलकर देश के सामने खाद्य सुरक्षा की चुनौती को और अधिक जटिल और गंभीर बना रहे हैं, जिसका प्रभाव आने वाले वर्षों में और गहराने की आशंका है।अनुकूलन रणनीतियाँ: कृषि उत्पादन और किसान आय बढ़ाने की संभावनाएँहालांकि परिस्थितियाँ चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन समाधान की संभावनाएँ भी पूरी तरह मौजूद हैं। बेहतर बुवाई तकनीकों, जलवायु के अनुकूल फसल किस्मों और उत्पादन प्रणाली में सुधार के माध्यम से चावल की उपज में 7 से 15 प्रतिशत तथा गेहूं की पैदावार में 12 से 19 प्रतिशत तक वृद्धि संभव बताई गई है। इन अनुकूलन रणनीतियों के परिणामस्वरूप औसत शुद्ध कृषि प्रतिफल में 11 से 14 प्रतिशत और प्रति व्यक्ति आय में 7 से 8 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी गई है। भविष्य में यदि अधिक किसान इन तरीकों को अपनाते हैं, तो इससे न केवल उत्पादन बढ़ेगा बल्कि क्षेत्रीय गरीबी को भी उल्लेखनीय रूप से कम किया जा सकेगा।पारंपरिक ज्ञान, आधुनिक तकनीक और नीति समर्थन की आवश्यकताजलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के बावजूद, पारंपरिक कृषि ज्ञान, स्थानीय अनुभव, आधुनिक कृषि पद्धतियों और उभरती प्रौद्योगिकियों का विवेकपूर्ण संयोजन भारत में खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके लिए व्यापक स्तर पर अनुसंधान, निवेश और मज़बूत नीति समर्थन की आवश्यकता है। फसल संरक्षण और कृषि संवर्धन को राष्ट्रीय सुरक्षा संरचना के एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में पहचानना आज समय की मांग बन चुका है। ऐसी पहलें किसानों की क्षमता को बढ़ाने के साथ-साथ गंगा के मैदान, विशेषकर मेरठ, को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में अपनी भूमिका और अधिक सशक्त करने में सहायक सिद्ध हो सकती हैं।संदर्भhttps://bit.ly/45Kaiuq https://bit.ly/3qncZSn https://rb.gy/2sqhe https://tinyurl.com/3shv6r37
स्पर्श - बनावट/वस्त्र
क्यों मेरठ में कपड़ा उद्योग, आज भी रोज़गार और उद्यमिता की सबसे मज़बूत बुनियाद है?
मेरठ को यूँ ही लघु उद्योगों, खादी और स्वदेशी परंपराओं का शहर नहीं कहा जाता। यहाँ की गलियों और बाज़ारों में आज भी कपड़ा बुनने, सिलने और बेचने की सदियों पुरानी मेहनत की धड़कन महसूस की जा सकती है। ऐसे में जब हम कपड़ों के इतिहास और भारत के विशाल वस्त्र उद्योग की बात करते हैं, तो मेरठ अपने आप इस कहानी का अहम हिस्सा बन जाता है। कपड़ा सिर्फ़ तन ढकने का साधन नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता, संस्कृति, रोज़गार और आत्मनिर्भरता से गहराई से जुड़ा हुआ है - और मेरठ आज भी इस परंपरा की एक जीवंत और सशक्त मिसाल बना हुआ है।इस लेख में हम कपड़ा उद्योग की पूरी यात्रा को सरल और मानवीय ढंग से समझेंगे - जहाँ कपड़ों के ऐतिहासिक विकास और मानव सभ्यता में उनकी भूमिका से शुरुआत होगी, फिर भारत के कपड़ा उद्योग की संरचना और उसकी वैश्विक पहचान पर बात करेंगे। इसके साथ-साथ वर्तमान बाज़ार की स्थिति और भविष्य की संभावनाओं को समझेंगे, सरकारी योजनाओं और नीतिगत समर्थन की भूमिका जानेंगे, मेरठ और खादी उद्योग के विशेष ऐतिहासिक संबंध पर नज़र डालेंगे, और अंत में कपड़ा व्यवसाय शुरू करने के व्यावहारिक अवसरों व ज़रूरी मार्गदर्शन को भी संक्षेप में समझेंगे।कपड़ों का ऐतिहासिक विकास और मानव सभ्यता में वस्त्रों की भूमिकामानव इतिहास में कपड़ों की शुरुआत विशुद्ध रूप से आवश्यकता से हुई थी - ठंड, गर्मी और प्राकृतिक खतरों से स्वयं को बचाने के लिए। प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य जानवरों की खाल, पत्तियों और पेड़ों की छाल से अपने शरीर को ढकता था। गुफा चित्रों और पुरातात्विक अवशेषों से यह स्पष्ट होता है कि लगभग 30,000 वर्ष पहले तक कपड़े मानव जीवन का नियमित हिस्सा बन चुके थे। समय के साथ जैसे-जैसे मानव ने बुनाई की तकनीक, धागे और करघे का विकास किया, वैसे-वैसे वस्त्र अधिक टिकाऊ, आरामदायक और सौंदर्यपूर्ण होते चले गए। धीरे-धीरे कपड़े केवल शरीर ढकने का साधन नहीं रहे, बल्कि सामाजिक पहचान, वर्ग, संस्कृति और परंपरा का प्रतीक बन गए। धार्मिक अनुष्ठानों, त्योहारों और सामाजिक रीति-रिवाजों में वस्त्रों की भूमिका ने मानव सभ्यता को एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान प्रदान की।भारत का कपड़ा उद्योग: संरचना, विविधता और वैश्विक योगदानभारत का कपड़ा उद्योग विश्व के सबसे प्राचीन, व्यापक और विविध उद्योगों में गिना जाता है। कपास, जूट, रेशम और ऊन जैसे प्राकृतिक रेशों से लेकर आधुनिक सिंथेटिक फाइबर (synthetic fiber) तक - भारत हर स्तर पर उत्पादन करने में सक्षम है। इस उद्योग की सबसे बड़ी विशेषता इसका विकेंद्रीकृत स्वरूप है, जिसमें हथकरघा, पावरलूम (power loom) और लघु इकाइयाँ लाखों ग्रामीण परिवारों की आजीविका से जुड़ी हैं। यही कारण है कि कपड़ा उद्योग भारत में केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता का आधार भी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “मेड इन इंडिया” (Made in India) वस्त्र अपनी गुणवत्ता, विविधता और कारीगरी के लिए पहचाने जाते हैं। वैश्विक कपड़ा व्यापार में भारत की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, जिससे देश की आर्थिक स्थिति को भी मजबूती मिल रही है।वर्तमान परिदृश्य और भविष्य की संभावनाएँ: आंकड़े, बाज़ार और निर्यातवर्तमान समय में भारत का कपड़ा और परिधान उद्योग तेज़ी से विकास के पथ पर अग्रसर है। घरेलू बाज़ार में बढ़ती आय, बदलती जीवनशैली, फैशन के प्रति जागरूकता और संगठित रिटेल (retail) की बढ़ती पहुँच ने कपड़ों की मांग को नई ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भी भारत एक भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता के रूप में उभर चुका है, विशेष रूप से अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े बाज़ारों में। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह उद्योग और तेज़ी से बढ़ेगा, जिससे नए निवेशकों, स्टार्टअप्स (startups) और उद्यमियों के लिए बड़े अवसर उपलब्ध होंगे। तकनीक, डिज़ाइन और टिकाऊ उत्पादन इस विकास की प्रमुख धुरी बनते जा रहे हैं।सरकारी योजनाएँ और नीतियाँ: कपड़ा उद्योग को मिलने वाला समर्थनभारत सरकार ने कपड़ा उद्योग की संभावनाओं को देखते हुए इसे मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएँ और नीतियाँ लागू की हैं। टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन फंड योजना टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फ़ंड स्कीम (Technology Development Fund (TDF) Scheme) के माध्यम से आधुनिक मशीनरी को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता और क्षमता दोनों में सुधार हो सके। इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल पार्क (Integrated Textile Park) और मेगा टेक्सटाइल रीजन (Mega Textile Region) जैसी पहलें उद्योग को संगठित ढाँचा और बेहतर अवसंरचना प्रदान करती हैं। इन योजनाओं का मुख्य उद्देश्य निवेश को आकर्षित करना, रोजगार के अवसर बढ़ाना और भारत को वैश्विक कपड़ा केंद्र के रूप में स्थापित करना है। विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यमियों के लिए यह नीतिगत समर्थन आत्मविश्वास और स्थिरता का स्रोत बना है।मेरठ और खादी उद्योग: स्वदेशी आंदोलन से आधुनिक उद्यमिता तकमेरठ का खादी उद्योग केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम और स्वदेशी आंदोलन की जीवंत विरासत है। आज़ादी के दौर में खादी आत्मनिर्भरता, सादगी और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बनी, और मेरठ इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा। समय के साथ खादी उद्योग ने खुद को आधुनिक बाज़ार के अनुरूप ढाल लिया है। आज खादी केवल ग्रामीण परिधान नहीं, बल्कि फैशन, टिकाऊ वस्त्र और जागरूक उपभोक्ता संस्कृति का प्रतीक बन चुकी है। मेरठ में खादी उत्पादन से जुड़े हजारों कारीगर और परिवार आज भी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। बदलते समय में खादी ने स्थानीय उद्यमियों के लिए नए बाज़ार और नए अवसर खोल दिए हैं।कपड़ा व्यवसाय शुरू करने के अवसर और व्यावहारिक मार्गदर्शनकपड़ा व्यवसाय में प्रवेश करने के इच्छुक लोगों के लिए आज अनेक रास्ते उपलब्ध हैं - चाहे वह विनिर्माण हो, थोक व्यापार, खुदरा बिक्री या आयात-निर्यात। इस क्षेत्र में सफलता के लिए एक स्पष्ट व्यवसाय योजना, सही कानूनी पंजीकरण, आवश्यक लाइसेंस, उपयुक्त स्थान का चयन और प्रभावी विपणन रणनीति बेहद ज़रूरी है। मेरठ जैसे शहर में पहले से मौजूद कारीगरी, श्रम शक्ति और बाज़ार की समझ नए उद्यमियों को स्वाभाविक बढ़त प्रदान करती है। यदि व्यवसाय को सही दिशा, धैर्य और गुणवत्ता के साथ आगे बढ़ाया जाए, तो कपड़ा उद्योग एक दीर्घकालिक, स्थिर और लाभकारी उद्यम साबित हो सकता है।संदर्भ https://tinyurl.com/2hr3ahmp https://tinyurl.com/2un4da7b https://tinyurl.com/bdyr5ynt https://tinyurl.com/zchk723x
आवास के अनुसार वर्गीकरण
नागपुर का संतरा: खट्टे-मीठे स्वाद से जीआई पहचान तक, भारतीय कृषि की खास कहानी
नागपुर संतरा आज भारत में सबसे ज़्यादा पसंद किए जाने वाले संतरों में गिना जाने लगा है। अपने खट्टे-मीठे स्वाद, भरपूर रस और ख़ास सुगंध के कारण इस संतरे ने देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भी अलग पहचान बनाई है। हालाँकि इसका नाम महाराष्ट्र के नागपुर शहर से जुड़ा हुआ है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसकी उत्पत्ति मूल रूप से नागपुर में नहीं हुई थी। नागपुर संतरा वास्तव में मंदारिन संतरे की एक किस्म है, जिसकी त्वचा ऊपर से थोड़ी खुरदरी होती है, लेकिन अंदर से यह बेहद मीठा और रसदार होता है। भारत में इस संतरे को आधिकारिक पहचान अप्रैल 2014 में मिली, जब इसे भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग (GI Tag) प्रदान किया गया।नागपुर संतरे की खेती दो प्रमुख मौसमों में की जाती है। पहली फसल को ‘अंबिया’ कहा जाता है, जो सितंबर से दिसंबर के बीच आती है और इसका स्वाद अपेक्षाकृत खट्टा होता है। दूसरी फसल ‘मृग’ कहलाती है, जो जनवरी के आसपास तैयार होती है और अधिक मीठी मानी जाती है। किसान आमतौर पर अपनी ज़मीन और बाज़ार की मांग के अनुसार इन दोनों में से किसी एक किस्म को उगाना चुनते हैं। नागपुर संतरे को ‘सिन्त्रा’ या ‘कूलंग’ के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि इसे भारत में पुर्तगालियों द्वारा लाया गया था और बाद में नागपुर के बागवानों ने ग्राफ्टिंग (grafting) जैसी उन्नत तकनीकों के ज़रिये इसकी गुणवत्ता में लगातार सुधार किया।नागपुर संतरा केवल स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र के किसानों की आय का एक बड़ा स्रोत है और भारत के प्रमुख कृषि निर्यात उत्पादों में शामिल है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, भारत हर साल लगभग डेढ़ लाख टन नागपुर संतरे का निर्यात करता है, जिसकी क़ीमत सैकड़ों करोड़ रुपये आँकी जाती है। इसी वजह से नागपुर को अक्सर “ऑरेंज सिटी” (orange city) भी कहा जाता है। संतरे के साथ-साथ यह शहर अपने ऐतिहासिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए भी जाना जाता है।संदर्भ - https://tinyurl.com/3y9edfcv https://tinyurl.com/pfs7hakk
घर - आंतरिक सज्जा/कुर्सियाँ/कालीन
29-01-2026 09:22 AM • Meerut-Hindi
मेरठ के पास सहारनपुर की कारीगरी का राज़: फ़र्नीचर के लिए कौन-सी लकड़ी है सबसे बेहतर?
मेरठवासियों, जब भी टिकाऊ, सुंदर और लंबे समय तक चलने वाले फ़र्नीचर की बात होती है, तो सहारनपुर का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है। मेरठ के नज़दीक स्थित यह शहर केवल लकड़ी के फ़र्नीचर का उत्पादन केंद्र नहीं है, बल्कि सदियों से चली आ रही कारीगरी और अनुभव का प्रतीक भी है। यहाँ के कारीगर जानते हैं कि अच्छा फ़र्नीचर केवल डिज़ाइन से नहीं, बल्कि सही लकड़ी के चयन से बनता है। लकड़ी की गुणवत्ता, उसकी मजबूती और प्रकृति को समझकर ही वे ऐसा फ़र्नीचर तैयार करते हैं, जो समय के साथ और भी सुंदर लगता है। आज के इस लेख में हम सहारनपुर की लकड़ी कारीगरी की परंपरा को विस्तार से समझेंगे। इसके बाद फ़र्नीचर निर्माण में लकड़ी की गुणवत्ता के महत्व पर चर्चा करेंगे। फिर सागौन की लकड़ी को सबसे श्रेष्ठ क्यों माना जाता है, यह जानेंगे। आगे अन्य भारतीय लकड़ियों के गुणों को समझेंगे, तेज़ी से बढ़ने वाली लकड़ियों के आर्थिक पक्ष पर नज़र डालेंगे और अंत में लकड़ी उद्योग के भविष्य की संभावनाओं पर विचार करेंगे।
सहारनपुर की लकड़ी कारीगरी: परंपरा, पहचान और वैश्विक प्रसिद्धि सहारनपुर की लकड़ी कारीगरी भारत की सबसे समृद्ध शिल्प परंपराओं में से एक मानी जाती है। यहाँ के कारीगर कई पीढ़ियों से लकड़ी पर बारीक नक्काशी, जाली का काम और जटिल डिज़ाइन उकेरते आ रहे हैं। यह कला केवल रोज़गार का साधन नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत के रूप में आगे बढ़ती रही है। मुगल और फ़ारसी प्रभावों से प्रेरित पुष्प आकृतियाँ, ज्यामितीय पैटर्न और सूक्ष्म जड़ाई सहारनपुर के फ़र्नीचर को विशिष्ट पहचान देती हैं। समय के साथ इस कारीगरी ने राष्ट्रीय सीमाओं को पार किया और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में भी अपनी जगह बनाई। आज सहारनपुर का नाम गुणवत्ता, धैर्य और शिल्प कौशल का पर्याय बन चुका है।
फ़र्नीचर निर्माण में लकड़ी की भूमिका और गुणवत्ता का महत्व किसी भी फ़र्नीचर की उम्र, मज़बूती और सौंदर्य सीधे तौर पर इस्तेमाल की गई लकड़ी पर निर्भर करता है। अच्छी गुणवत्ता वाली लकड़ी न केवल भारी भार सहने में सक्षम होती है, बल्कि उस पर की गई नक्काशी, पॉलिश और फिनिश भी लंबे समय तक बनी रहती है। सहारनपुर के कारीगर लकड़ी का चयन करते समय उसकी नमी, घनत्व, सिकुड़न और कीट-रोधी गुणों को ध्यान में रखते हैं। गलत लकड़ी के इस्तेमाल से फ़र्नीचर जल्दी टूट सकता है, मुड़ सकता है या दीमक का शिकार हो सकता है। इसलिए अनुभवी कारीगरों के लिए लकड़ी का सही चुनाव उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना डिज़ाइन और निर्माण प्रक्रिया।
सागौन की लकड़ी: फ़र्नीचर के लिए सबसे श्रेष्ठ विकल्प क्यों? भारत में सागौन की लकड़ी को फ़र्नीचर निर्माण के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी असाधारण मजबूती और टिकाऊपन है। सागौन में प्राकृतिक तेल मौजूद होते हैं, जो इसे दीमक, सड़न और नमी से सुरक्षित रखते हैं। यही कारण है कि यह लकड़ी दशकों तक बिना ख़राब हुए उपयोग में लाई जा सकती है। पॉलिश के बाद सागौन की चिकनी सतह और गहरा भूरा रंग फ़र्नीचर को शाही रूप देता है। यही वजह है कि घरों, कार्यालयों और विरासत भवनों में सागौन से बने फ़र्नीचर को प्राथमिकता दी जाती है, भले ही इसकी क़ीमत अन्य लकड़ियों से अधिक क्यों न हो।
सागौन के पेड़
भारत में फ़र्नीचर निर्माण के लिए अन्य प्रमुख लकड़ियाँ सागौन के अलावा भारत में कई अन्य लकड़ियाँ भी फ़र्नीचर निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। शीशम की लकड़ी अपनी कठोरता और लचीलेपन के कारण नक्काशी वाले फ़र्नीचर के लिए बेहद उपयुक्त मानी जाती है। इसकी प्राकृतिक बनावट इसे देखने में भी आकर्षक बनाती है। सैटिनवुड (Satinwood) अपनी चमकदार फिनिश और स्थायित्व के लिए जानी जाती है और अक्सर फर्श या सजावटी फ़र्नीचर में इस्तेमाल होती है। वहीं साल की लकड़ी अपनी मज़बूती, कीट-रोधी गुणों और लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता के कारण दरवाज़ों, फ्रेम और भारी फ़र्नीचर के लिए पसंद की जाती है। इन सभी लकड़ियों का सही उपयोग फ़र्नीचर को संतुलित और व्यावहारिक बनाता है।
तेज़ी से बढ़ने वाली लकड़ियाँ: खेती और आर्थिक लाभ का दृष्टिकोण लकड़ी को केवल फ़र्नीचर निर्माण ही नहीं, बल्कि खेती और आर्थिक लाभ के नज़रिये से भी देखा जाता है। हाइब्रिड चिनार (Hybrid Poplar), नीलगिरी और पॉलाउनिया (Paulownia) जैसे पेड़ कम समय में तेज़ी से बढ़ते हैं और जल्दी लकड़ी उपलब्ध कराते हैं। इनका उपयोग पेपर पल्प (paper pulp), निर्माण सामग्री और कम लागत वाले फ़र्नीचर में किया जाता है। किसानों के लिए ये पेड़ आय का वैकल्पिक साधन बन सकते हैं, क्योंकि इन्हें अपेक्षाकृत कम समय में काटा जा सकता है। इस तरह तेज़ी से बढ़ने वाली लकड़ियाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लकड़ी उद्योग - दोनों के लिए लाभकारी सिद्ध होती हैं।
फ़र्नीचर और लकड़ी उद्योग में शिल्प, संसाधन और भविष्य की संभावनाएँ आज के समय में जब पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास पर ज़ोर दिया जा रहा है, तब लकड़ी उद्योग के सामने नई ज़िम्मेदारियाँ भी हैं। सहारनपुर जैसे शिल्प केंद्रों में पारंपरिक कारीगरी और आधुनिक डिज़ाइन का संतुलन इस उद्योग को नई दिशा दे रहा है। यदि लकड़ी के संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए, कारीगरों के कौशल को संरक्षित किया जाए और आधुनिक तकनीकों को अपनाया जाए, तो यह उद्योग भविष्य में और अधिक सशक्त हो सकता है। मेरठ और आसपास के क्षेत्रों के लिए यह न केवल रोज़गार का स्रोत है, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और आत्मनिर्भरता का भी माध्यम बन सकता है।
मानव अनुभव और वास्तुकला: इतिहास, प्रकृति और स्थानीय ज्ञान की समन्वित यात्रा
इंसान और उसके आसपास बनी इमारतों के बीच संबंध केवल ईंट, पत्थर और सीमेंट तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह हमारे मन, भावनाओं और जीवन के अनुभवों से गहराई से जुड़ा होता है। हम जिन जगहों में रहते हैं, चलते हैं या समय बिताते हैं, उनकी बनावट हमारे सोचने, महसूस करने और जीने के तरीके को प्रभावित करती है - चाहे वह कोई ऐतिहासिक धरोहर हो, आधुनिक अस्पताल, पवित्र स्थल या पारंपरिक घर। वास्तुकला केवल आश्रय नहीं देती, बल्कि वह हमें सुरक्षा, शांति, जुड़ाव और पहचान का एहसास भी कराती है। यही कारण है कि शहरों की इमारतें, गलियाँ और खुले स्थान सिर्फ भौतिक ढाँचे नहीं, बल्कि मानव अनुभव को आकार देने वाली जीवंत संरचनाएँ बन जाती हैं। यह लेख आपको बताएगा कि इंसान और वास्तुकला के बीच संबंध कैसे बनता है। हम समझेंगे कि ऐतिहासिक स्थलों की डिजाइन हमारी भावनाओं को कैसे प्रभावित करती है, और आधुनिक स्वास्थ्य वास्तुकला में प्रकृति, रोशनी और हवा हमारे कल्याण को कैसे बढ़ाती है। साथ ही, हम देखेंगे कि पवित्र स्थानों की संरचना मन को शांति क्यों देती है, और स्थानीय वास्तुकला व उसकी सामग्रियाँ - जैसे बांस, मिट्टी और लकड़ी - आज भी टिकाऊ निर्माण के मॉडल क्यों मानी जाती हैं। अंत में, हम जानेंगे कि आधुनिक शहर इन पारंपरिक तरीकों से क्या महत्वपूर्ण सीख ले सकते हैं।
सांस्कृतिक-ऐतिहासिक स्थलों की वास्तुकला और मानव अनुभव पर उसका प्रभाव पुराने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल केवल इमारतें नहीं होते - वे समय, स्मृतियों, परंपराओं और मानव भावनाओं की परतों से बनी जीवित कहानियाँ होते हैं। इन स्थानों में मौजूद खुला आकाश, बड़े आँगन, मेहराबदार गलियाँ, पुरानी ईंटों की खुशबू और पत्थरों की ठंडक एक ऐसा अनुभव बनाते हैं जो आज की तेज़ रफ़्तार वाली दुनिया में मिलना मुश्किल है। जब कोई व्यक्ति ऐसे स्थानों से होकर गुजरता है, तो उसे एक अनकही शांति महसूस होती है, मानो जगह उसके भीतर की उलझनों को शांत कर रही हो। स्थापत्य कला की लय, प्राकृतिक रोशनी का गहरा खेल, हवा की धीमी आवाज़ और संतुलित अनुपात मन और शरीर को एक साथ सुकून देते हैं। ऐसे स्थल हममें 'जुड़ाव' की भावना पैदा करते हैं - जुड़ाव अपने अतीत से, अपनी संस्कृति से और अपने अस्तित्व से। ये स्थान केवल देखने के लिए नहीं होते; वे महसूस करने के लिए होते हैं। सामुदायिक स्तर पर भी ये जगहें लोगों के बीच अपनापन बढ़ाती हैं - क्योंकि साझा स्मृतियाँ हमेशा मजबूत सामाजिक बंधन बनाती हैं। यही वजह है कि सांस्कृतिक-ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण केवल दीवारों का संरक्षण नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान, भावनाओं और पहचान की रक्षा भी है। इनका खोना ऐसा है जैसे किसी शहर की आत्मा का खोना।
आधुनिक स्वास्थ्य वास्तुकला: प्रकृति, प्रकाश और वायु का मानव कल्याण में योगदान दुनिया भर के डिज़ाइनर आज इस बात को गहराई से समझ चुके हैं कि स्वास्थ्य केवल दवाओं से नहीं, बल्कि वातावरण से भी सुधरता है। आधुनिक स्वास्थ्य वास्तुकला का मुख्य विचार यह है कि “स्वस्थ जगह = स्वस्थ इंसान”। अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में प्राकृतिक प्रकाश भरपूर देने के लिए बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ बनाई जाती हैं, क्योंकि प्राकृतिक रोशनी तनाव को कम करती है, मूड बेहतर बनाती है और शरीर के जैविक चक्र को संतुलित करती है। ठंडी और साफ हवा, हरियाली, आंतरिक पौधे और शोर-रहित वातावरण मरीजों की रिकवरी स्पीड को वास्तविक रूप से तेज़ करते हैं - यह अब वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध है। ओपन स्पेस (open space) और न्यूनतम डिज़ाइन का उद्देश्य यह होता है कि मरीज, उनके परिजन और स्टाफ सभी खुद को मानसिक रूप से हल्का महसूस करें। वास्तुकार कोशिश करते हैं कि अस्पताल कम 'कठोर' दिखें और अधिक ‘मनुष्यों के लिए बने स्थान’ प्रतीत हों। रंगों का चुनाव भी मनोवैज्ञानिक प्रभाव को ध्यान में रखकर किया जाता है - हल्के रंग मन और दिल दोनों को सहज बनाते हैं। हवाई रास्तों, प्रकाश-प्रवाह और ध्वनि-नियमन के संतुलित उपयोग से इंसान को लगता है कि वह बीमारी से लड़ने के बजाय, अपने भीतर ऊर्जा पा रहा है। आधुनिक स्वास्थ्य वास्तुकला का उद्देश्य सिर्फ इलाज देना नहीं बल्कि मनुष्य को बेहतर महसूस कराना है।
पवित्र स्थानों का आध्यात्मिक व मनोवैज्ञानिक प्रभाव धर्मस्थलों की वास्तुकला सदियों से मनुष्य के मन, विश्वास और आध्यात्मिक भावनाओं को समझकर बनाई जाती रही है। इन स्थानों में प्रवेश करते ही ऊँचे गुंबद, गूँजती घंटियाँ, सौम्य प्रकाश, अगरबत्ती की सुगंध और धीमा वातावरण मनुष्य के सोचने और महसूस करने के तरीके को तुरंत बदल देते हैं। यह परिवर्तन अचानक होता है, पर बहुत गहरा होता है - मानो जगह ही मन को शांत कर रही हो। धर्मस्थलों की डिज़ाइन अक्सर इस विचार पर आधारित होती है कि व्यक्ति अपनी चिंताओं को बाहर छोड़कर भीतर ‘हल्का’ महसूस करे। ऊँचाई वाला स्थापत्य मन में खुलेपन का भाव जगाता है, जबकि धीमी ध्वनिकी मन को स्थिर करती है। यह मनोवैज्ञानिक तौर पर व्यक्ति को आत्मचिंतन, जागरूकता और आंतरिक शांति की ओर ले जाता है। इन स्थानों का सामुदायिक प्रभाव भी बहुत महत्वपूर्ण है। जब लोग एक ही जगह पर बैठते हैं, प्रार्थना करते हैं या मौन महसूस करते हैं, तो उनके बीच एक ‘अदृश्य विश्वास’ बनता है। इससे सामाजिक तनाव कम होता है, आपसी संबंध मजबूत होते हैं और लोग अधिक संवेदनशील व सहयोगी बनते हैं। इसलिए पवित्र स्थानों की वास्तुकला केवल धार्मिक नहीं होती - वह मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और भावनात्मक भी होती है।
स्थानीय (Vernacular) वास्तुकला: परंपरा, अनुकूलनशीलता और स्थिरता का मूल सिद्धांत स्थानीय वास्तुकला प्रकृति और मनुष्य के बीच तालमेल का सबसे सुंदर उदाहरण है। यह सदियों की समझ, अवलोकन और जीवन-शैली पर आधारित होती है - जिसमें जलवायु, संसाधन, सांस्कृतिक परंपराएँ और सामुदायिक आवश्यकताएँ सब शामिल होती हैं। भारतीय क्षेत्रों में मिट्टी की मोटी दीवारें, चूने की प्लास्टरिंग, लकड़ी की बीम, टेराकोटा की छतें, बांस की संरचनाएँ और जालीदार खिड़कियाँ न केवल किफायती होती थीं बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी अत्यंत प्रभावी होती थीं। यह वास्तुकला गर्मियों में प्राकृतिक ठंडक और सर्दियों में गर्माहट देती है - बिना किसी मशीनरी के। घरों में आँगन होना केवल सामाजिक कारणों से नहीं था, बल्कि हवा के प्रवाह, प्रकाश के संतुलन और तापमान नियंत्रण का भी एक प्राकृतिक तरीका था। स्थानीय वास्तुकला समय के साथ बहुत संवेदनशील रूप से विकसित हुई - हर मौसम को समझकर, हर संसाधन का मूल्य जानकर। इसलिए यह आज ‘स्थिरता’ (sustainability) का सबसे बड़ा उदाहरण मानी जाती है। आधुनिक शहरों में बढ़ती गर्मी, प्रदूषण और ऊँची ऊर्जा खपत के बीच स्थानीय वास्तुकला एक समाधान की तरह वापस लौट रही है। यह हमें याद दिलाती है कि विकास और परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी हो सकते हैं।
स्थानीय निर्माण सामग्रियाँ और स्थायी निर्माण प्रथाए बांस, लकड़ी, मिट्टी, लेटराइट, कच्ची ईंटें, चूना - ये सारी सामग्री धरती के साथ एक बहुत प्राकृतिक रिश्ता रखती हैं। इनकी थर्मल (thermal) और पर्यावरणीय विशेषताएँ इन्हें आधुनिक निर्माण की तुलना में कहीं अधिक स्थायी बनाती हैं। मिट्टी या ईंटों से बने घरों में अंदरूनी तापमान संतुलित रहता है, जिससे एसी या हीटर की आवश्यकता कम हो जाती है। यही ऊर्जा बचत पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए फायदेमंद है। बांस अपनी लचक और मजबूती के कारण भूकंप-प्रभावित इलाकों में भी सुरक्षित माना जाता है। लकड़ी और लेटराइट (लेटराइट) जैसे तत्व न सिर्फ सुंदर लगते हैं, बल्कि प्राकृतिक इन्सुलेशन भी प्रदान करते हैं। इन सामग्रियों के उपयोग से कार्बन उत्सर्जन कम होता है, निर्माण की ऊर्जा लागत घटती है और प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्थानीय सामग्री स्थानीय लोगों को रोजगार देती है, जिससे गांवों और कस्बों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ती हैं। यह निर्माण शैली 'प्रकृति के साथ चलने' पर आधारित होती है, न कि प्रकृति को बदलने पर। आज जब दुनिया पर्यावरणीय संकटों से जूझ रही है, स्थानीय सामग्रियाँ और टिकाऊ निर्माण प्रथाएँ एक आसान और प्रभावी समाधान प्रदान करती हैं।
स्थानीय वास्तुकला से सीखें: सह-अस्तित्व, सांस्कृतिक संरक्षण और मानव-केंद्रित डिज़ाइन स्थानीय वास्तुकला हमें यह सिखाती है कि शहरों का विकास केवल कंक्रीट की ऊँची इमारतों से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से मापा जाता है कि शहर अपने लोगों के लिए कितना प्राकृतिक, मानवीय और संतुलित है। यह वास्तुकला समुदाय को केंद्र में रखकर डिज़ाइन करती है - जहाँ पड़ोस मिलकर रहता है, साझा स्थान होते हैं, हवा और रोशनी का संतुलन होता है, और खर्च कम आता है। आधुनिक शहरों में जहाँ शोर, भीड़ और प्रदूषण लगातार बढ़ रहे हैं, स्थानीय वास्तुकला इंसानों को फिर से प्रकृति और एक-दूसरे के करीब लाने का रास्ता दिखाती है। डिज़ाइनर्स और शहर योजनाकार इस बात से प्रेरणा लेते हैं कि कैसे पुराने घर बिना मशीनों के आरामदायक थे, कैसे मिट्टी-चूना पर्यावरण के साथ तालमेल में था, और कैसे समुदाय एक-दूसरे से जुड़े रहते थे। स्थानीय वास्तुकला हमें बताती है कि भविष्य स्थिर और मानवीय तभी होगा जब हम विकास को मानव-केंद्रित, पर्यावरण-संवेदनशील और सांस्कृतिक रूप से जड़ित बनाएं।
कचरे में दबता शहरी भारत: लैंडफिल, स्वास्थ्य संकट और विकास की अनदेखी कहानी
मेरठ जैसे शहर, जिनकी पहचान इतिहास, संस्कृति और तेज़ी से बदलते आधुनिक जीवन से बनी है, आज एक ऐसी सच्चाई का सामना कर रहे हैं जिसे अनदेखा करना अब संभव नहीं रहा। बढ़ती आबादी, फैलती कॉलोनियाँ और रोज़मर्रा की सुविधाओं पर बढ़ती निर्भरता ने हमारे जीवन को आसान तो बनाया है, लेकिन इसके साथ कचरे का वह बोझ भी जोड़ दिया है, जो हर दिन चुपचाप शहर के सीने पर जमा होता जा रहा है। मेरठ की गलियों, सड़कों के किनारे, खाली पड़े मैदानों और शहर की सीमाओं पर उभरते कचरे के ढेर केवल गंदगी नहीं हैं, बल्कि वे हमारी शहरी जीवनशैली की सच्ची तस्वीर दिखाते हैं। यह कचरा हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि जिस विकास पर हमें गर्व है, क्या वह वास्तव में इंसान और पर्यावरण दोनों के लिए सुरक्षित है। यह समस्या अब सिर्फ़ नगर निगम की नहीं रही, बल्कि हर उस नागरिक से जुड़ गई है जो इस शहर में सांस लेता है, पानी पीता है और अपने बच्चों के भविष्य का सपना देखता है। यदि इस बढ़ते कचरे को समय रहते नहीं समझा गया, तो यह धीरे-धीरे मेरठ की हवा, ज़मीन और जीवन तीनों को प्रभावित करेगा। आज यह केवल शहर की बाहरी तस्वीर को बिगाड़ रहा है, लेकिन कल यह हमारे स्वास्थ्य, हमारी आजीविका और हमारी आने वाली पीढ़ियों पर गहरा असर डाल सकता है। आज हम इस लेख में सबसे पहले, हम देखेंगे कि तेज़ शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण कचरे की मात्रा कैसे लगातार बढ़ती जा रही है। इसके बाद, लैंडफिल (landfill) और लीगेसी डंप साइट्स (legacy dump sites) की समस्या को समझेंगे, जो शहरों में कचरे के पहाड़ का रूप ले चुकी हैं। फिर, इन डंप साइट्स से उत्पन्न स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरों पर बात करेंगे, जिनका सीधा असर आम नागरिकों के जीवन पर पड़ता है। अंत में, हम स्वच्छ भारत मिशन की सीमाओं और भविष्य में इस संकट से निपटने की संभावित दिशा पर संक्षेप में विचार करेंगे, ताकि समस्या का एक समग्र चित्र सामने आ सके।
भारत में शहरीकरण और बढ़ते ठोस कचरे की गंभीर समस्या भारत में बीते कुछ दशकों में जिस गति से औद्योगीकरण और शहरीकरण बढ़ा है, उसने शहरों की संरचना और जीवनशैली दोनों को बदल दिया है। रोज़गार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लाखों लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। मेरठ, लखनऊ, दिल्ली जैसे शहर इस जनसंख्या दबाव को प्रतिदिन महसूस कर रहे हैं। बढ़ती आबादी के साथ उपभोग की संस्कृति भी तेज़ हुई है, जहाँ पैकेज्ड खाद्य पदार्थ, प्लास्टिक सामग्री, ऑनलाइन खरीदारी (online shopping) से निकलने वाला कचरा और इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट (electronic waste - e-waste) आम जीवन का हिस्सा बन चुका है। आज स्थिति यह है कि प्रतिदिन हज़ारों टन शहरी ठोस कचरा उत्पन्न हो रहा है, लेकिन उसका वैज्ञानिक तरीके से पृथक्करण और निपटान नहीं हो पा रहा। घरों से निकलने वाला गीला और सूखा कचरा अक्सर बिना छंटाई के एक साथ फेंक दिया जाता है, जिससे आगे चलकर समस्या और जटिल हो जाती है। यह केवल सफ़ाई की असफलता नहीं, बल्कि शहरी नियोजन, नागरिक जागरूकता और प्रशासनिक तैयारी की बड़ी कमी को भी उजागर करता है। लैंडफिल और लीगेसी डंप साइट्स: शहरों में बनते कचरे के पहाड़ भारत में उत्पन्न होने वाले कुल शहरी कचरे का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा सीधे लैंडफिल स्थलों पर पहुंच जाता है। समय के साथ ये स्थान केवल कचरा निपटान केंद्र नहीं रहते, बल्कि विशाल और भयावह कचरे के पहाड़ों में बदल जाते हैं। देशभर में 1800 से अधिक लीगेसी डंप साइट्स मौजूद हैं, जहाँ वर्षों से जमा कचरा आज भी पड़ा हुआ है। उत्तर प्रदेश के कई शहर, जिनमें मेरठ भी शामिल है, इस समस्या से अछूते नहीं हैं। मेरठ के बाहरी इलाकों में स्थित पुराने डंप यार्ड आज भी सक्रिय हैं और शहर के विस्तार के साथ अब ये आबादी के बेहद करीब आ चुके हैं। कभी जो स्थान शहर से दूर हुआ करते थे, आज वहीं आसपास कॉलोनियाँ, स्कूल और बाज़ार बस चुके हैं। ये लैंडफिल न केवल भूमि की उपयोगिता को समाप्त कर देते हैं, बल्कि आसपास के पूरे क्षेत्र के लिए एक स्थायी पर्यावरणीय और स्वास्थ्य जोखिम बन जाते हैं।
शहरी लैंडफिल से उत्पन्न स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरे लैंडफिल केवल बदबूदार स्थान नहीं होते, बल्कि ये लगातार ज़हर उगलने वाले केंद्र बन जाते हैं। यहां सड़ते कचरे से निकलने वाली मीथेन और अन्य जहरीली गैसें वायु प्रदूषण को गंभीर रूप से बढ़ाती हैं। इसका सीधा असर आसपास रहने वाले लोगों के फेफड़ों, आंखों और त्वचा पर पड़ता है। बरसात के मौसम में स्थिति और भी भयावह हो जाती है, जब कचरे से रिसने वाला जहरीला तरल मिट्टी में समाकर भूजल और नज़दीकी जल स्रोतों को दूषित कर देता है। कई बार लैंडफिल में आग लगने की घटनाएँ सामने आती हैं, जो दिनों तक जलती रहती हैं और पूरा इलाका धुएँ से भर जाता है। मेरठ जैसे घनी आबादी वाले शहरों में यह स्थिति आम नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन जाती है और अस्पतालों में सांस संबंधी रोगियों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। डंप यार्ड के आसपास रहने वाले समुदायों की दयनीय स्थिति डंप यार्ड (dump yard) के आसपास रहने वाले लोग इस पूरे कचरा संकट के सबसे अदृश्य और उपेक्षित शिकार हैं। अत्यधिक गरीबी और रोज़गार के अभाव के कारण कई परिवार कचरा बीनने को मजबूर होते हैं। ये लोग वही कचरा छांटते हैं, जिसे शहर ने बेकार समझकर फेंक दिया होता है। दुखद यह है कि इस काम में छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल होते हैं, जो शिक्षा और सुरक्षित बचपन से वंचित रह जाते हैं। इन इलाकों में रहने वाले लोगों की जीवन प्रत्याशा कम होती है। त्वचा रोग, दमा, टीबी, पेट के संक्रमण और अन्य गंभीर बीमारियाँ यहाँ आम हैं। दूषित हवा और पानी इनके जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। यह स्थिति केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता और शहरी विकास की अमानवीय सच्चाई को भी सामने लाती है।
स्वच्छ भारत मिशन और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की सीमाएँ स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत सरकार ने शहरों की सफ़ाई और कचरा प्रबंधन के लिए बड़े बजट और महत्वाकांक्षी योजनाएँ शुरू कीं। इन प्रयासों से कुछ क्षेत्रों में सुधार भी दिखा, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कई सीमाएँ अब भी बनी हुई हैं। कचरे का स्रोत पर पृथक्करण, यानी घरों से ही गीले और सूखे कचरे को अलग करना, आज भी अधिकांश शहरों में प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पाया है। कई नगर निकायों में आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित कर्मचारियों और निरंतर निगरानी की कमी है। नीति और प्रशासन के बीच समन्वय का अभाव भी एक बड़ी बाधा है। मेरठ जैसे शहरों में यह साफ़ दिखाई देता है कि योजनाएँ तो मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभाव अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा। कचरा संकट से निपटने की आवश्यकता और भविष्य की दिशा भारत के शहरों को इस संकट से बाहर निकालने के लिए केवल कचरा हटाना ही पर्याप्त नहीं है। हमें लैंडफिल शून्य लक्ष्य की ओर गंभीरता से बढ़ना होगा। इसके लिए कचरे को एक समस्या नहीं, बल्कि संसाधन के रूप में देखना होगा। पुनर्चक्रण, कंपोस्टिंग (composting), जैविक कचरे से खाद और ऊर्जा उत्पादन जैसे उपायों को व्यापक स्तर पर अपनाना समय की मांग है। साथ ही, डंप यार्ड के आसपास रहने वाले समुदायों के पुनर्वास, स्वास्थ्य सुरक्षा और वैकल्पिक आजीविका पर विशेष ध्यान देना होगा। जब तक मानवीय और पर्यावरणीय दोनों दृष्टिकोण से समाधान नहीं खोजे जाएंगे, तब तक शहरी जीवन की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार संभव नहीं है।
बीटिंग रिट्रीट की शान बढ़ाने वाले बैंड वाद्ययंत्रों का मेरठ से जुड़ा विशेष संबंध
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ!
मेरठवासियों, हमारा शहर केवल क्रांति और सैन्य इतिहास के लिए ही नहीं, बल्कि उन अदृश्य परंपराओं के लिए भी जाना जाता है जो राष्ट्रीय गौरव के क्षणों में अपनी छाप छोड़ती हैं। हर वर्ष जब गणतंत्र दिवस के समापन पर विजय चौक में बीटिंग रिट्रीट की गूंज सुनाई देती है, तब उस संगीत की आत्मा में कहीं न कहीं मेरठ की जाली कोठी क्षेत्र की मेहनत, शिल्प और परंपरा समाई होती है। पीतल से बने वे वाद्ययंत्र, जिनकी ध्वनि राष्ट्रपति से लेकर आम नागरिक तक को राष्ट्रभक्ति से भर देती है, मेरठ को भारत की सैन्य-सांस्कृतिक परंपरा से गहराई से जोड़ते हैं। इस लेख में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि किस प्रकार मेरठ का जाली कोठी क्षेत्र देशभर के बैंड वाद्ययंत्रों की रीढ़ बना, बीटिंग रिट्रीट समारोह कैसे गणतंत्र दिवस का गरिमामय समापन बनता है, इसमें राष्ट्रपति और तीनों सेनाओं की क्या भूमिका होती है, कौन-सी ऐतिहासिक धुनें इसकी पहचान हैं, इसका ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय स्वरूप कैसे विकसित हुआ, तथा आधुनिक समय में यह परंपरा किन नए रूपों में सामने आई है।
मेरठ का जाली कोठी क्षेत्र और पीतल के बैंड वाद्ययंत्रों की राष्ट्रीय आपूर्ति मेरठ का जाली कोठी क्षेत्र दशकों से देश में पीतल के बैंड वाद्ययंत्रों का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यहाँ निर्मित तुरही, बिगुल, ट्रम्पेट, ड्रम और अन्य वाद्ययंत्र केवल सामाजिक आयोजनों या शादी-ब्याह के बैंडों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि भारतीय सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस बैंडों तक नियमित रूप से पहुँचते हैं। यह माना जाता है कि भारत में उपयोग होने वाले लगभग 95 प्रतिशत पीतल के बैंड वाद्ययंत्रों की आपूर्ति इसी क्षेत्र से होती है। जाली कोठी के कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी इस शिल्प से जुड़े रहे हैं और हाथों से वाद्ययंत्रों को तराशते हुए उनमें ऐसी ध्वनि गुणवत्ता विकसित करते हैं, जो अनुशासन, शौर्य और गरिमा को अभिव्यक्त करती है। जब राष्ट्रीय समारोहों में ये वाद्ययंत्र गूंजते हैं, तो उनके पीछे छिपी मेहनत और परंपरा मेरठ को देश की सांगीतिक सैन्य पहचान का मौन आधार बना देती है।
गणतंत्र दिवस का बीटिंग रिट्रीट समारोह: आयोजन और सैन्य सहभागिता हर वर्ष गणतंत्र दिवस के तीसरे दिन, यानी 29 जनवरी की संध्या को, राष्ट्रीय उत्सव का औपचारिक और गरिमामय समापन बीटिंग रिट्रीट (Beating Retreat) समारोह के साथ होता है। नई दिल्ली के विजय चौक पर आयोजित इस आयोजन में थल सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना के बैंड एक साथ मंच पर उतरते हैं। यह समारोह केवल संगीत प्रस्तुति भर नहीं होता, बल्कि सैन्य अनुशासन, समन्वय और परंपरा का जीवंत प्रदर्शन होता है। तीनों सेनाओं के सामूहिक मार्च और तालबद्ध धुनें यह संदेश देती हैं कि राष्ट्र की रक्षा में सभी अंग एकजुट होकर कार्य करते हैं। बीटिंग रिट्रीट इस बात का प्रतीक है कि गणतंत्र दिवस का उत्सव शौर्य, अनुशासन और सम्मान के साथ पूर्ण हुआ है।
बीटिंग रिट्रीट में राष्ट्रपति की भूमिका और औपचारिक सैन्य परंपराएँ बीटिंग रिट्रीट समारोह की गरिमा का केंद्र भारत के राष्ट्रपति होते हैं, जो इस आयोजन के मुख्य अतिथि होते हैं। उनके विजय चौक में प्रवेश करते ही तुरही की विशेष धुन बजाई जाती है, जो सर्वोच्च संवैधानिक पद के प्रति सम्मान का प्रतीक होती है। इसके बाद राष्ट्रपति अंगरक्षक द्वारा राष्ट्रीय सलामी दी जाती है। सामूहिक सैन्य बैंड ‘जन गण मन’ का वादन करता है और ध्वज स्तंभ से राष्ट्रीय ध्वज को विधिपूर्वक उतारा जाता है। इस अवसर पर राष्ट्रपति भवन को विशेष रोशनी से सजाया जाता है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में नागरिक एकत्रित होते हैं। ये सभी औपचारिक सैन्य परंपराएँ इस समारोह को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक बना देती हैं।
बीटिंग रिट्रीट में बजाई जाने वाली ऐतिहासिक और लोकप्रिय सैन्य धुनें बीटिंग रिट्रीट समारोह की पहचान उसकी विशिष्ट और ऐतिहासिक सैन्य धुनों से होती है। कर्नल बोगी मार्च (Colonel Bogey March), सन्स ऑफ़ द ब्रेव (Sons of the Brave) और ‘क़दम क़दम बढ़ाए जा’ जैसी रचनाएँ पूरे वातावरण में देशभक्ति और गर्व की भावना भर देती हैं। ड्रमरों द्वारा प्रस्तुत ‘ड्रमर कॉल’ (Drummer Call) अनुशासन और सैन्य तालमेल का प्रतीक होती है, जबकि सूर्यास्त के समय बजाया जाने वाला बिगुल समारोह को भावनात्मक ऊँचाई पर पहुँचा देता है। इन धुनों के माध्यम से केवल संगीत नहीं, बल्कि बलिदान, शौर्य और कर्तव्यबोध की भावना भी व्यक्त होती है, जो दर्शकों के मन में गहरी छाप छोड़ती है।
बीटिंग रिट्रीट समारोह का ऐतिहासिक उद्भव और अंतरराष्ट्रीय संबंध भारत में बीटिंग रिट्रीट समारोह की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी, जब ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय और प्रिंस फिलिप स्वतंत्र भारत की यात्रा पर आए थे। इस अवसर को विशेष और स्मरणीय बनाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने थल सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट के अधिकारी मेजर जी. ए. रॉबर्ट्स को एक विशेष सामूहिक बैंड प्रदर्शन की योजना बनाने का निर्देश दिया। यहीं से बीटिंग रिट्रीट को गणतंत्र दिवस के औपचारिक समापन के रूप में स्थापित किया गया। समय के साथ यह समारोह न केवल राष्ट्रीय परंपरा बना, बल्कि विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के सम्मान और भारत की कूटनीतिक संस्कृति का भी प्रतीक बन गया।
बीटिंग रिट्रीट की वैश्विक सैन्य परंपरा और विदेशी बैंडों की भागीदारी बीटिंग रिट्रीट की परंपरा की जड़ें 17वीं शताब्दी के इंग्लैंड में मिलती हैं, जहाँ सूर्यास्त के समय इसे सैनिकों को उनकी चौकियों से वापस बुलाने के संकेत के रूप में प्रयोग किया जाता था। प्रारंभ में इसे ‘वॉच सेटिंग’ कहा जाता था और यह शाम की तोप की आवाज़ से जुड़ा होता था। धीरे-धीरे यह एक औपचारिक सैन्य समारोह में परिवर्तित हो गया। आज ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और भारत सहित कई देशों में यह परंपरा निभाई जाती है। कुछ विशेष अवसरों पर विदेशी सैन्य बैंडों की भागीदारी ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया है, जिससे सैन्य संगीत के माध्यम से सांस्कृतिक संवाद भी स्थापित होता है। आधुनिक बीटिंग रिट्रीट: नए प्रयोग, विशेष रचनाएँ और समकालीन संदर्भ आधुनिक समय में बीटिंग रिट्रीट समारोह में कई नए प्रयोग देखने को मिले हैं। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और दिल्ली पुलिस के बैंडों की भागीदारी ने इसके दायरे को और व्यापक बनाया है। आर्मी सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा और पारंपरिक कलाकारों की प्रस्तुतियाँ सैन्य संगीत को शास्त्रीय और लोक तत्वों से जोड़ती हैं। 1971 के युद्ध में भारत की विजय के 50 वर्ष पूरे होने पर प्रस्तुत विशेष रचना ‘स्वर्णिम विजय’ ने इस समारोह को ऐतिहासिक स्मृति से जोड़ दिया। कोविड काल जैसी चुनौतियों के बावजूद यह परंपरा निरंतर अपनी गरिमा, अनुशासन और राष्ट्रीय भावनाओं को बनाए हुए आगे बढ़ती रही है।
इंडियन रेड एडमिरल: प्रकृति की लाल-काली कलाकृति और बाग़ों की शोभा
इंडियन रेड एडमिरल बटरफ्लाई (Indian Red Admiral Butterfly) भारत में पाई जाने वाली एक बेहद आकर्षक और रंगीन तितली है, जो अपने लाल, नारंगी और काले रंग के सुंदर पंखों के लिए जानी जाती है। इसके पंखों का ऊपरी भाग गहरे नारंगी रंग का होता है, जिस पर काले निशान बने होते हैं, जबकि निचला भाग भूरे रंग का होता है जिसमें हल्के रंग की आकृतियाँ दिखाई देती हैं। यह तितली मध्यम आकार की होती है और इसके पंखों का फैलाव लगभग 60 से 70 मिलीमीटर तक होता है, जो इसे देखने में बेहद संतुलित और आकर्षक बनाता है।
यह तितली भारत सहित दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में पाई जाती है और आमतौर पर बगीचों, पार्कों, घास के मैदानों और जंगलों के आसपास देखी जा सकती है। इंडियन रेड एडमिरल की उड़ान शैली भी इसे खास बनाती है, जिसमें यह पहले तेज़ी से पंख फड़फड़ाती है और फिर अचानक हवा में फिसलते हुए आगे बढ़ती है। यह तितली लैंटाना (Lantana) और यूपेटोरियम (Eupatorium) जैसे फूलों के रस पर निर्भर रहती है, जिससे परागण की प्रक्रिया में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान होता है।
हालांकि इंडियन रेड एडमिरल तितली को फिलहाल विलुप्तप्राय नहीं माना जाता, लेकिन हाल के वर्षों में इसके प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने और कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग के कारण इसकी संख्या में कमी देखी गई है। ऐसे में इसके संरक्षण और प्राकृतिक वातावरण की सुरक्षा बेहद आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस खूबसूरत तितली की रंगीन उड़ान और सौंदर्य का आनंद ले सकें।
पराक्रम दिवस विशेष: मेरठवासियों के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अनसुनी कहानी
मेरठवासियों,पराक्रम दिवस का यह अवसर हमें उस महान व्यक्तित्व को स्मरण करने का अवसर देता है, जिनका नाम लेते ही साहस, त्याग और निर्भीक राष्ट्रभक्ति का भाव मन में जाग उठता है। सुभाष चंद्र बोस को सामान्यतः हम आज़ाद हिंद फ़ौज के सेनानायक और ब्रिटिश शासन को खुली चुनौती देने वाले क्रांतिकारी के रूप में जानते हैं। लेकिन मेरठ जैसे ऐतिहासिक नगर के लिए, जिसने 1857 में स्वतंत्रता की पहली संगठित चिंगारी देखी, नेताजी को केवल सैन्य पराक्रम तक सीमित करके देखना उनके व्यक्तित्व को अधूरा समझना होगा।नेताजी के भीतर एक गहरा, शांत और आत्मिक संसार भी था, जिसने उनके हर निर्णय को दिशा दी। आज हम जानेंगे कि नेताजी के जीवन में आध्यात्मिकता का क्या स्थान था, स्वामी विवेकानंद ने उनके विचारों को कैसे आकार दिया, बचपन की कौन सी घटना ने उनके भीतर आत्मचिंतन की नींव रखी, एक पत्रकार के साथ हुआ कौन सा संवाद उनके त्याग को स्पष्ट करता है, और अंत में यह समझेंगे कि भगवद गीता ने उनके संघर्षपूर्ण जीवन में उन्हें मानसिक और नैतिक शक्ति कैसे दी।
विशाखापत्तनम के आरके बीच पर सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा
नेताजी का आध्यात्मिक और दार्शनिक स्वरूप नेताजी सुभाष चंद्र बोस केवल राजनीतिक संघर्ष के नेता नहीं थे, बल्कि भीतर से एक गंभीर विचारक थे। वे जीवन को केवल सत्ता, पद या उपलब्धियों के माध्यम से नहीं देखते थे। उनके लिए स्वतंत्रता आत्मसम्मान और कर्तव्य का विषय थी। यही कारण था कि उनका जीवन अनुशासन, सादगी और आत्मसंयम से भरा हुआ था।भौतिक सुख, व्यक्तिगत आराम और निजी महत्वाकांक्षाएँ उनके जीवन के केंद्र में नहीं थीं। वे मानते थे कि जब तक व्यक्ति भीतर से मज़बूत नहीं होता, तब तक बाहरी संघर्षों में स्थिर रहना संभव नहीं है। यह आंतरिक शक्ति उनके पूरे जीवन में दिखाई देती है।
स्वामी विवेकानंद से मिली वैचारिक दिशा किशोरावस्था में स्वामी विवेकानंद के विचारों से परिचय नेताजी के जीवन का निर्णायक मोड़ बना। विवेकानंद की शिक्षाओं ने उन्हें यह समझाया कि राष्ट्रसेवा केवल राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना भी हो सकती है। सेवा, त्याग और मातृभूमि को देवी स्वरूप मानने की भावना उनके भीतर गहराई से बैठ गई।नेताजी का विश्वास था कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी आध्यात्मिक चेतना में निहित है। विवेकानंद का यह विचार कि पहले स्वयं को सशक्त बनाओ, फिर समाज और राष्ट्र को सशक्त करो, उनके जीवन दर्शन की आधारशिला बना।
बचपन की वह कथा जिसने आत्मचिंतन को दिशा दी नेताजी के बचपन की एक कथा उनके भीतर की आध्यात्मिक खोज को स्पष्ट रूप से सामने लाती है। एक बार कटक में एक अत्यंत वृद्ध संन्यासी आए, जिन्हें कुछ स्रोत भोलानंद गिरीजी के रूप में पहचानते हैं। सुभाष और उनके मित्रों ने उनका आदर किया। उस संन्यासी ने सुभाष को तीन बातें बताईं। पहली, शाकाहार अपनाने की सलाह। दूसरी, कुछ विशेष श्लोकों का नियमित पाठ करने की बात। तीसरी और सबसे कठिन सलाह थी कि वे प्रतिदिन अपने माता पिता के चरणों में प्रणाम करें। यह तीसरी बात बालक सुभाष के लिए सबसे कठिन थी, फिर भी उन्होंने उसी दृढ़ता के साथ इसका पालन किया, जैसी वे अपने हर कार्य में दिखाते थे। हर सुबह वे अपने माता पिता के सामने झुकते। प्रारंभ में उन्हें संकोच और अपमान का अनुभव हुआ, और उनके माता पिता भी आश्चर्यचकित हुए। पर धीरे धीरे यह उनके घर की स्वाभाविक दिनचर्या बन गई।कुछ समय बाद सुभाष को यह महसूस हुआ कि ये अभ्यास उनकी आध्यात्मिक जिज्ञासा को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं। तब उन्होंने इन सबको छोड़कर अपना ध्यान पूरी तरह रामकृष्ण और विवेकानंद के विचारों पर केंद्रित कर दिया। इसके बाद उन्होंने स्वामी विवेकानंद की शिक्षा के अनुसार सेवा को अपनाया। जो भी उनके घर आता, उसकी सेवा करना वे अपना कर्तव्य मानते थे और दूसरों की आवश्यकता पूरी करके उन्हें गहरा संतोष मिलता था।
1906 में सुभाष चंद्र बोस बालक रूप में।
पत्रकार के साथ वह संवाद जो नेताजी के त्याग को परिभाषित करता है नेताजी के जीवन की एक घटना उनके त्याग और स्पष्ट सोच को अत्यंत प्रभावी ढंग से सामने लाती है। जब वे आज़ाद हिंद फ़ौज को सशक्त करने के लिए विश्व भ्रमण पर थे, तब एक महिला पत्रकार ने उनसे पूछा कि क्या वे जीवन भर अविवाहित रहने का विचार रखते हैं।नेताजी ने मुस्कराते हुए कहा कि वे विवाह अवश्य करते, लेकिन कोई उनकी माँग के अनुसार दहेज देने को तैयार नहीं है। पत्रकार ने हैरानी से पूछा कि ऐसी कौन सी माँग है जिसे कोई पूरा नहीं कर सकता। इस पर नेताजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया कि वे दहेज में अपने देश की स्वतंत्रता चाहते हैं, और पूछा कि क्या कोई उन्हें यह दे सकता है।यह उत्तर सुनकर पत्रकार स्तब्ध रह गई। धन, सौंदर्य और व्यक्तिगत सुख से इस तरह का वैराग्य देखकर उसके मन में नेताजी के प्रति गहरा सम्मान जाग उठा। यह संवाद नेताजी के भीतर बसे उस संन्यासी को उजागर करता है, जिसके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था।
भगवद गीता: नेताजी के कर्म और साहस का आधार नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए भगवद गीता केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं थी, बल्कि उनके कर्मों और निर्णयों की दार्शनिक आधारशिला थी। गीता में वर्णित निष्काम कर्म और धर्म की अवधारणा ने उनके जीवन को स्पष्ट दिशा दी। नेताजी का विश्वास था कि भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना उनका धर्म है, और इस धर्म का पालन उन्हें बिना किसी व्यक्तिगत लाभ की चिंता किए करना है।गीता का निर्भयता का संदेश उनकी क्रांतिकारी सोच को निरंतर बल देता रहा। कठिन परिस्थितियों, निर्वासन और संघर्ष के बीच भी वे मानसिक रूप से अडिग बने रहे। बहुत कम लोग जानते हैं कि नेताजी प्रायः अपने साथ श्रीमद् भगवद गीता की एक प्रति रखते थे और चुनौतीपूर्ण समय में उसके श्लोकों से मानसिक शक्ति प्राप्त करते थे। आज़ाद हिंद फ़ौज के संघर्षपूर्ण दिनों में भी गीता उनके आत्मबल का स्रोत बनी रही।वे एक आस्थावान हिंदू थे और वेदांत तथा गीता से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपने राष्ट्रवादी विचारों को आकार दिया। श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं ने उनके भीतर भक्ति और शक्ति का संतुलन रचा।
मेरठ में बसंत पंचमी: विद्या, पीले रंग और नवजीवन से जुड़ा वसंत उत्सव
मेरठवासियो, बसंत पंचमी का आगमन मेरठ की धरती पर एक विशेष उमंग और चेतना के साथ होता है। ठंडी हवाओं की विदाई और हल्की धूप की उपस्थिति के साथ यह पर्व न केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत देता है, बल्कि जीवन में नई ऊर्जा, आशा और रचनात्मकता का संदेश भी लेकर आता है। शहर के मंदिरों में सरस्वती पूजा, विद्यार्थियों द्वारा विद्या आरंभ की परंपरा, पीले वस्त्रों और प्रसाद की सजावट—ये सभी दृश्य मेरठ में बसंत पंचमी को एक जीवंत सांस्कृतिक अनुभव बना देते हैं। बसंत पंचमी पूरे उत्तर भारत में प्रकृति और मानव जीवन के बीच सामंजस्य का उत्सव है। सरसों के पीले खेत, खिलते फूल, पतंगों से सजा आकाश और घरों में बनने वाले पीले व्यंजन इस पर्व को उल्लासपूर्ण बनाते हैं। यह दिन ज्ञान, विवेक और सृजनशीलता की देवी सरस्वती को समर्पित होता है, इसलिए इसे बौद्धिक जागरण और सकारात्मक शुरुआत के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। मेरठ हो या देश का कोई अन्य भाग, बसंत पंचमी हमें यह सिखाती है कि प्रकृति के साथ तालमेल, ज्ञान का सम्मान और सामूहिक आनंद ही सभ्यता की वास्तविक पहचान हैं। इस लेख में हम सबसे पहले यह समझेंगे कि सभ्यताओं के अस्तित्व में संस्कृति और उत्सवों की क्या भूमिका रही है। इसके बाद विश्व की प्रमुख सभ्यताओं में उत्सवों की वैश्विक परंपराओं पर नज़र डालेंगे। फिर भारतीय उप-महाद्वीप में बसंत पंचमी के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थान को समझेंगे। आगे चलकर हम बसंत पंचमी से जुड़े लोक रंगों, प्रतीकों और सामाजिक अभिव्यक्तियों पर चर्चा करेंगे। इसके बाद सरस्वती पूजा और बसंत पंचमी के दार्शनिक अर्थ को जानेंगे, और अंत में युधिष्ठिर की कथा के माध्यम से विवेक और आत्मविश्वास के जीवन संदेश को समझने का प्रयास करेंगे।
सभ्यताओं के अस्तित्व में संस्कृति और उत्सवों की भूमिका सभ्यताएँ केवल सत्ता, शासन व्यवस्था या भौगोलिक सीमाओं के सहारे लंबे समय तक जीवित नहीं रह पातीं, बल्कि संस्कृति उनके अस्तित्व की वास्तविक आत्मा होती है। लोक परंपराएँ, संगीत, कला, कथाएँ, मिथक और उत्सव मिलकर समाज की सामूहिक स्मृति को आकार देते हैं। जब कोई समुदाय अपने त्योहारों को मनाता है, तो वह केवल एक दिन का उत्सव नहीं मनाता, बल्कि अपने अतीत से जुड़कर वर्तमान को अर्थ देता है और भविष्य की दिशा तय करता है। मेरठ जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र में यह बात और स्पष्ट दिखाई देती है, जहाँ लोकगीतों की परंपरा, धार्मिक आयोजन और मौसमी पर्व आज भी सामाजिक एकता, सामूहिक भावनाओं और सांस्कृतिक निरंतरता को मज़बूती प्रदान करते हैं।
विद्यालय में सरस्वती पूजा
विश्व की प्रमुख सभ्यताओं में उत्सवों की वैश्विक परंपरा दुनिया के हर कोने में उत्सव मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं और अलग-अलग सभ्यताओं ने इन्हें अपनी जीवनशैली के अनुसार ढाला है। अफ्रीकी समाजों में नृत्य और अनुष्ठान सामुदायिक चेतना, प्रकृति और पूर्वजों से जुड़ाव का प्रतीक होते हैं। लैटिन अमेरिका में मनाया जाने वाला कार्निवल जीवन के उत्साह, रंगीन अभिव्यक्ति और सामूहिक उल्लास को दर्शाता है। चीन में वसंत उत्सव परिवार, पुनर्नवकरण और नए आरंभ का संदेश देता है, जबकि यूरोपीय संस्कृतियों में गायन, नृत्य और उत्सव ऋतु परिवर्तन के साथ गहराई से जुड़े होते हैं। इन विविध उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि भौगोलिक दूरी और सांस्कृतिक भिन्नताओं के बावजूद, उत्सव मानव सभ्यता की एक साझा और सार्वभौमिक भाषा हैं।
भारतीय उप-महाद्वीप में बसंत पंचमी का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थान भारतीय उप-महाद्वीप में बसंत पंचमी का स्थान विशेष और गहन रहा है। इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों और ऋग्वैदिक परंपराओं में मिलता है, जहाँ इसे ज्ञान, ऋतु परिवर्तन और नवजीवन से जोड़ा गया है। यह पर्व माघ शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है और सर्दी के कठोर तथा नीरस दिनों के बाद बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है। बसंत पंचमी केवल भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में भी इसे विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। इस व्यापक क्षेत्रीय प्रसार ने बसंत पंचमी को एक ऐसे सांस्कृतिक सेतु का रूप दिया है, जो भिन्न समाजों और परंपराओं को एक भावनात्मक सूत्र में बाँधता है।
बसंत पंचमी के लोक रंग, प्रतीक और सामाजिक अभिव्यक्तियाँ बसंत पंचमी का उत्सव रंगों, प्रतीकों और लोक अभिव्यक्तियों से भरपूर होता है। इस पर्व में पीला रंग प्रमुख माना जाता है, जो ऊर्जा, आशा, उल्लास और नई शुरुआत का प्रतीक है। सरसों के पीले खेत, लोगों के पीले वस्त्र, भोजन में केसर का प्रयोग और खुले आकाश में उड़ती पतंगें—ये सभी स्वतंत्रता, प्रसन्नता और जीवन के विस्तार का भाव व्यक्त करते हैं।मेरठ जैसे क्षेत्रों में बसंत पंचमी केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि एक सामाजिक अवसर भी बन जाती है, जहाँ लोग प्रकृति के साथ अपने संबंध को पुनः महसूस करते हैं और सामूहिक रूप से मौसम के परिवर्तन का स्वागत करते हैं।
सरस्वती पूजा और बसंत पंचमी का दार्शनिक व आध्यात्मिक अर्थ बसंत पंचमी को सरस्वती पूजा के रूप में मनाने की परंपरा इसके दार्शनिक और आध्यात्मिक पक्ष को और गहरा बनाती है। देवी सरस्वती परा और अपरा विद्या की प्रतीक मानी जाती हैं। परा विद्या आत्मिक और शाश्वत ज्ञान की ओर ले जाती है, जबकि अपरा विद्या सांसारिक सुख और भौतिक सफलता प्रदान करती है। देवी के चरणों में विराजमान हंस विवेक का प्रतीक है, जो सही और गलत, शाश्वत और अशाश्वत के बीच भेद करने की क्षमता को दर्शाता है। यह दर्शन हमें यह सिखाता है कि केवल बाहरी उपलब्धियाँ ही नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण ज्ञान ही जीवन में स्थायी संतोष और संतुलन प्रदान कर सकता है।
युधिष्ठिर की कथा से विवेक और आत्मविश्वास का नैतिक संदेश युधिष्ठिर की कथा विवेक और आत्मविश्वास के महत्व को गहराई से उजागर करती है। यह कहानी बताती है कि जब विवेक व्यक्ति का साथ छोड़ देता है, तो धर्म, समृद्धि और प्रतिष्ठा भी धीरे-धीरे उससे दूर हो जाती हैं। युधिष्ठिर के जीवन में विवेक के लुप्त होने के साथ पतन का आरंभ होता है, लेकिन जैसे ही आत्मविश्वास पुनः जागृत होता है, विवेक और धर्मनिष्ठा भी लौट आती हैं। यह कथा हमें यह समझाती है कि जीवन के संकटपूर्ण क्षणों में आत्मविश्वास सबसे बड़ी शक्ति बनता है, जो व्यक्ति को पुनः संतुलन, स्थिरता और सही मार्ग की ओर ले जा सकता है।
मेरठवासियों, सर्दियों की सेहत और मौसमी फल: शरीर, किसान और पोषण का संतुलन
मेरठ, जो अपनी उपजाऊ भूमि, खेतों और परंपरागत खान-पान के लिए जाना जाता है, सर्दियों के मौसम में एक अलग ही रंग में नज़र आता है। ठंडी हवाएँ, धुंध भरी सुबहें और बदलती दिनचर्या न केवल हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं, बल्कि हमारे शरीर की ज़रूरतों को भी बदल देती हैं। इस मौसम में मेरठ के घरों और बाज़ारों में मौसमी फलों की मौजूदगी हमेशा से सेहत का सहारा रही है। सर्दियाँ हमें यह सिखाती हैं कि भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि शरीर को मौसम के अनुसार संतुलित रखने का माध्यम भी है। ऐसे समय में सर्दियों में उगने वाले फल मेरठवासियों के लिए पोषण और ऊर्जा का प्राकृतिक स्रोत बनते हैं। इस लेख में हम समझने का प्रयास करेंगे कि सर्दियों का मौसम मानव शरीर पर किस प्रकार प्रभाव डालता है, सर्दियों में उगने वाले फलों का पोषण और स्वास्थ्य से क्या संबंध है, वैश्विक जलवायु में इन फलों की भूमिका क्या है, मौसमी बीमारियों से बचाव में ये फल कैसे सहायक होते हैं, भारत में इन फलों का उपभोक्ताओं और किसानों के लिए क्या महत्व है, और अंत में अंगूर, अमरूद, संतरा व अनार जैसे प्रमुख सर्दियों के फलों की खेती व विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
सर्दियों का मौसम और मानव शरीर पर उसका प्रभाव सर्दियों के मौसम में तापमान गिरने के साथ ही मानव शरीर की कार्यप्रणाली में भी कई स्वाभाविक परिवर्तन देखने को मिलते हैं। ठंड से बचाव के लिए शरीर अधिक ऊर्जा खर्च करता है, जिसके कारण भूख और प्यास सामान्य दिनों की तुलना में बढ़ जाती है। वहीं दिन छोटे होने और धूप की उपलब्धता कम होने से शारीरिक सक्रियता घटने लगती है, जिसका सीधा असर रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है। मेरठ जैसे मैदानी क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान सर्दी-जुकाम, खांसी, फ्लू और जोड़ों के दर्द की शिकायतें आम हो जाती हैं। ठंड के कारण रक्त संचार भी धीमा पड़ता है, जिससे शरीर में जकड़न और थकान महसूस होती है। ऐसे समय में शरीर को अतिरिक्त पोषण, विटामिन (vitamin) और प्राकृतिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिसे केवल भारी या तला-भुना भोजन नहीं, बल्कि संतुलित और मौसमी आहार के ज़रिये ही बेहतर ढंग से पूरा किया जा सकता है।
सर्दियों में उगने वाले फलों का पोषण और स्वास्थ्य महत्व सर्दियों में उगने वाले फल शरीर की मौसमी ज़रूरतों के अनुरूप पोषण प्रदान करते हैं, इसलिए इन्हें इस मौसम का सबसे उपयुक्त आहार माना जाता है। संतरा और नींबू जैसे खट्टे फल विटामिन सी (vitamin C) से भरपूर होते हैं, जो ठंड के मौसम में कमजोर होती प्रतिरक्षा प्रणाली को मज़बूती देते हैं। अमरूद और अनार जैसे फल एंटीऑक्सीडेंट्स (antioxidants) से भरपूर होते हैं, जो शरीर में सूजन को कम करने के साथ-साथ कोशिकाओं को क्षति से बचाने में मदद करते हैं। सर्दियों में जोड़ों के दर्द, सुस्ती और थकान की समस्या आम होती है, ऐसे में ये फल शरीर को प्राकृतिक रूप से ऊर्जा प्रदान करते हैं। इनका नियमित सेवन न केवल रोगों से बचाव करता है, बल्कि शरीर को अंदर से मज़बूत बनाकर सर्दियों के प्रभाव को संतुलित करने में भी सहायक सिद्ध होता है।
वैश्विक जलवायु और सर्दियों के फल: एक अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य यदि सर्दियों के फलों को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि सर्दी हर स्थान पर एक-सी नहीं होती। जब उत्तरी गोलार्ध में सर्दी का मौसम होता है, तब दक्षिणी गोलार्ध में गर्मी रहती है। ध्रुवीय और समशीतोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में सर्दियों के फल कठोर परिस्थितियों में भी उगने की क्षमता रखते हैं। दक्षिण अफ़्रीका जैसे देशों में संतरे, अंगूर, कीवी और एवोकाडो (Avocado) सर्दियों के दौरान उगते हैं और स्थानीय तथा अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह दर्शाता है कि सर्दियों के फल केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक पोषण और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला का अहम हिस्सा हैं, जो अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में मानव स्वास्थ्य को सहारा देते हैं।
सर्दियों के फल और मौसमी स्वास्थ्य समस्याओं से सुरक्षा सर्दियों में मौसमी बीमारियाँ सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आती हैं। ठंड, नमी और धूप की कमी के कारण विटामिन डी (Vitamin D) की कमी आम हो जाती है, जिससे हड्डियाँ कमजोर होने लगती हैं और प्रतिरक्षा तंत्र प्रभावित होता है। ऐसे में सर्दियों के फल विटामिन, खनिज और प्राकृतिक शर्करा का संतुलित संयोजन प्रदान करते हैं। ये तत्व शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाते हैं और सामान्य सर्दी-जुकाम, फ्लू तथा थकान जैसी समस्याओं से बचाव में सहायक होते हैं। नियमित रूप से मौसमी फलों का सेवन करने से शरीर मौसम के अनुसार खुद को ढालने लगता है, जिससे दवाओं पर निर्भरता भी कम हो सकती है।
भारत में सर्दियों के फल: उपभोक्ता स्वास्थ्य और किसानों की आजीविका भारत में सर्दियों के फल केवल उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये लाखों किसानों की आजीविका से भी गहराई से जुड़े हुए हैं। सर्दियों के मौसम में फलों का उत्पादन अपेक्षाकृत सीमित होता है, जबकि मांग लगातार बढ़ती रहती है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त होता है। महामारी के बाद लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ने से मौसमी और पौष्टिक फलों की मांग और अधिक हो गई है। मेरठ जैसे कृषि प्रधान क्षेत्रों में यह रुझान किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को ताज़ा और पौष्टिक फल उपलब्ध कराने में भी सहायक सिद्ध हो रहा है।
प्रमुख सर्दियों के फल और उनकी खेती की विशेषताएँ सर्दियों में उगने वाले प्रमुख फलों में अंगूर, अमरूद, संतरा और अनार विशेष स्थान रखते हैं। अंगूर समशीतोष्ण जलवायु में अच्छी फसल देते हैं और सर्दियों के अंत तक कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं। अमरूद, जो आमतौर पर दिसंबर में पकता है, फाइबर (fiber) और विटामिन का सस्ता तथा सुलभ स्रोत माना जाता है। संतरा अपने आसान परिवहन, लंबे भंडारण और पोषण गुणों के कारण सर्दियों का सबसे लोकप्रिय फल बन चुका है। वहीं अनार अपने एंटीऑक्सीडेंट गुणों के चलते स्वास्थ्य के लिहाज़ से विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है। इन सभी फलों की खेती सही जलवायु, उपयुक्त मिट्टी और समय पर कटाई पर निर्भर करती है, जिससे उनकी गुणवत्ता और पोषण मूल्य बना रहता है।
मेरठवासियों जानिए, पेंगुइन की दुनिया: बर्फ़ीले समुद्रों से संस्कृति तक का अनोखा सफ़र
मेरठवासियों, जब भी हम ध्रुवीय क्षेत्रों, बर्फ़ से ढकी धरती और समुद्र की अथाह गहराइयों की कल्पना करते हैं, तो पेंगुइन (penguin) की छवि अपने आप हमारे मन में उभर आती है। भले ही पेंगुइन का मेरठ या इसके आसपास के क्षेत्र से कोई प्रत्यक्ष भौगोलिक संबंध न हो, फिर भी प्रकृति के ये अनोखे जीव आज पूरी दुनिया की जिज्ञासा, वैज्ञानिक अध्ययन और सांस्कृतिक आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। उड़ान न भर पाने वाले ये पक्षी समुद्री जीवन के लिए इस तरह अनुकूलित हैं कि उनकी जीवनशैली हमें प्रकृति की अद्भुत रचनात्मकता और अनुकूलन क्षमता से परिचित कराती है। इस लेख में हम सबसे पहले यह समझेंगे कि पेंगुइन किस प्रकार समुद्री जीवन के लिए अनुकूलित उड़ान रहित पक्षी हैं और उनकी शारीरिक संरचना उन्हें उत्कृष्ट तैराक कैसे बनाती है। इसके बाद, हम पेंगुइन की वैश्विक प्रजातियों और उनके भौगोलिक वितरण पर नज़र डालेंगे। आगे, एम्परर पेंगुइन (Emperor Penguin) जैसी सबसे बड़ी प्रजाति की विशेषताओं और जीवन चक्र को जानेंगे। फिर, सबसे छोटी पेंगुइन प्रजाति और आकार के अनुसार उनके आवास में अंतर को समझेंगे। इसके साथ ही, पेंगुइन के व्यवहार और मनुष्यों के प्रति उनकी विशिष्टता पर चर्चा करेंगे। अंत में, पॉप संस्कृति (pop culture), मीडिया और पौराणिक कथाओं में पेंगुइन के सांस्कृतिक चित्रण को देखेंगे।
पेंगुइन: समुद्री जीवन के लिए अनुकूलित उड़ान रहित पक्षी पेंगुइन ऐसे पक्षी हैं जो उड़ान नहीं भर सकते, लेकिन समुद्र में तैरने और गहराई तक गोता लगाने में अत्यंत कुशल होते हैं। उनकी शारीरिक संरचना समुद्री जीवन के अनुसार विकसित हुई है। उनके फ्लिपर्स (flippers) पंखों के स्थान पर काम करते हैं, जिनकी सहायता से वे पानी में तेज़ी से आगे बढ़ते हैं। पेंगुइन अपने पैरों और पूंछ का उपयोग पतवार की तरह करते हैं, जिससे उनकी दिशा नियंत्रित रहती है। उनके शरीर पर काले और सफ़ेद रंग के छोटे, अतिव्यापी पंखों की एक जलरोधक परत होती है, जो ठंडे पानी में उन्हें सुरक्षित रखती है। भोजन के रूप में वे क्रिल (krill), मछली और स्क्विड (squid) खाते हैं, जबकि लेपर्ड सील (leopard seal) और किलर व्हेल (killer whale) जैसे समुद्री जीव उनके प्रमुख शिकारी हैं। अंडों और चूजों को स्कुआ (skuas) और शीथबिल (sheathbill) जैसे पक्षियों से खतरा रहता है।
पेंगुइन की वैश्विक प्रजातियाँ और उनका भौगोलिक वितरण दुनिया भर में पेंगुइन की कुल 18 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से पाँच प्रजातियाँ अंटार्कटिका में और चार उप-अंटार्कटिक द्वीपों पर निवास करती हैं। पेंगुइन मुख्य रूप से दक्षिणी गोलार्ध में पाए जाते हैं। गैलापागोस पेंगुइन (Galapagos Penguins) एकमात्र ऐसी प्रजाति है जो भूमध्य रेखा के उत्तर में भी पाई जाती है। इनका सबसे अधिक घनत्व अंटार्कटिक तटों और आसपास के द्वीपों में देखा जाता है। सामान्यतः बड़े पेंगुइन ठंडे क्षेत्रों में रहते हैं, जबकि छोटे पेंगुइन समशीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय जलवायु वाले इलाकों में पाए जाते हैं।
एम्परर पेंगुइन: सबसे बड़ी और अंटार्कटिका-विशेष प्रजाति एम्परर पेंगुइन पेंगुइन की सबसे बड़ी और सबसे भारी प्रजाति है, जो केवल अंटार्कटिका में पाई जाती है। इसकी लंबाई लगभग 1.1 मीटर तक होती है और वजन 22 से 45 किलोग्राम के बीच होता है। यह प्रजाति 500 मीटर से अधिक गहराई तक गोता लगा सकती है और लगभग 20 मिनट तक पानी में रह सकती है। एम्परर पेंगुइन की सबसे अनोखी विशेषता इसका प्रजनन व्यवहार है। यह एकमात्र पेंगुइन है जो अंटार्कटिक सर्दियों में प्रजनन करता है। मादा एक ही अंडा देती है, जिसे नर दो महीने से अधिक समय तक अपने पैरों पर संभालकर सेता है। इनका औसत जीवनकाल लगभग 20 वर्ष होता है, हालांकि कुछ पेंगुइन इससे अधिक समय तक भी जीवित रहते हैं।
सबसे छोटी पेंगुइन प्रजाति और आकार के अनुसार आवास का अंतर सबसे छोटी पेंगुइन प्रजाति यूडिप्टुला माइनर (Eudyptula minor) है, जिसे फेयरी पेंगुइन (fairy penguin) या छोटे नीले पेंगुइन के नाम से भी जाना जाता है। इसकी लंबाई लगभग 33 सेंटीमीटर और वजन करीब 1 किलोग्राम होता है। यह मुख्य रूप से दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के समुद्र तटों पर पाई जाती है। आकार के आधार पर देखा जाए तो छोटे पेंगुइन अपेक्षाकृत गर्म या समशीतोष्ण क्षेत्रों में रहते हैं, जबकि बड़े पेंगुइन ठंडे इलाकों में पाए जाते हैं। लेख में यह भी उल्लेख मिलता है कि कुछ प्रागैतिहासिक पेंगुइन प्रजातियाँ आकार में अत्यंत विशाल थीं, जो लगभग एक वयस्क मानव जितनी बड़ी होती थीं।
पेंगुइन का व्यवहार और मनुष्यों के प्रति उनकी विशिष्टता पेंगुइन अपने सीधे खड़े होने, डगमगाती चाल और निर्भीक स्वभाव के कारण दुनिया भर में पहचाने जाते हैं। अन्य पक्षियों की तुलना में वे मनुष्यों से कम डरते हैं, जो उन्हें और भी रोचक बनाता है। उनकी तैराकी क्षमता, समूह में रहने की प्रवृत्ति और चतुराई ने उन्हें प्रकृति प्रेमियों और वैज्ञानिकों के बीच विशेष स्थान दिलाया है। उनके काले और सफ़ेद पंखों की तुलना अक्सर औपचारिक पोशाक से की जाती है, जिससे उनका व्यक्तित्व और भी आकर्षक प्रतीत होता है।
पॉप संस्कृति, मीडिया और पौराणिक कथाओं में पेंगुइन का चित्रण पेंगुइन का सांस्कृतिक चित्रण भी उतना ही रोचक है जितना उनका प्राकृतिक जीवन। मार्च ऑफ़ द पेंगुइन्स (March of the Penguins), मेडागास्कर (Madagascar), हैप्पी फीट (Happy Feet) और सर्फ़्स (Surfs) अप जैसी फ़िल्मों ने पेंगुइन को पॉप संस्कृति में विशेष लोकप्रियता दिलाई। 2008 में बीबीसी (BBC) द्वारा अप्रैल फूल दिवस पर जारी एक हास्य फिल्म में पेंगुइन को उड़ते हुए दिखाया गया, जिसने लोगों का खूब मनोरंजन किया। विज्ञापनों, ब्रांड लोगो, चॉकलेट बिस्कुट और वीडियो गेम्स में भी पेंगुइन की छवि का उपयोग किया गया है। माओरी पौराणिक कथाओं में भी पेंगुइन का विशेष स्थान है, जहाँ विभिन्न प्रजातियों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है।
भूमि और मिट्टी के प्रकार : कृषि योग्य, बंजर, मैदान
20-01-2026 09:18 AM • Meerut-Hindi
मेरठ के खेतों से देश की थाली तक: गंगा का मैदान कैसे तय करता है भारत की खाद्य सुरक्षा?
मेरठ, जो गंगा के मैदान का एक अहम हिस्सा है, केवल अपनी ऐतिहासिक पहचान या तेज़ी से बढ़ते शहरी स्वरूप के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा में इसके योगदान के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस लेख में हम सबसे पहले यह समझेंगे कि गंगा का मैदान और विशेष रूप से मेरठ, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में क्यों महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके बाद, हम जलवायु परिवर्तन के कारण गंगा के मैदान की कृषि पर बढ़ते दबाव और उसके प्रभावों पर चर्चा करेंगे। आगे, चावल-गेहूं प्रणाली पर मंडराते संभावित खतरों और मिट्टी की बिगड़ती सेहत को समझने की कोशिश करेंगे। फिर, वैश्विक परिप्रेक्ष्य में खाद्य असुरक्षा और गरीबी की स्थिति को भारत से जोड़कर देखेंगे। अंत में, हम उन अनुकूलन रणनीतियों और नीतिगत प्रयासों पर बात करेंगे, जिनके माध्यम से कृषि उत्पादन और किसान आय बढ़ाकर गंगा का मैदान राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में अपना योगदान और बढ़ा सकता है।
गंगा का मैदान और मेरठ की राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में भूमिका गंगा का मैदान, जिसे इंडो-गैंगेटिक प्लेन (Indo-Gangetic Plane) कहा जाता है, भारत की कृषि संरचना की रीढ़ माना जाता है। यह मैदान 2.5 मिलियन (million) वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है और देश की लगभग 40 प्रतिशत आबादी के लिए भोजन का मुख्य स्रोत है। मेरठ इसी विशाल और उपजाऊ क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहाँ की भौगोलिक स्थिति, समतल भूमि और ऐतिहासिक रूप से विकसित कृषि परंपराएँ इसे खाद्यान्न उत्पादन के लिए विशेष बनाती हैं। यहां की उपजाऊ मिट्टी, पर्याप्त जल संसाधन और पीढ़ियों से चली आ रही खेती की पद्धतियाँ लंबे समय से देश के खाद्यान्न भंडार को मज़बूती देती आई हैं। ऐसे में, यदि मेरठ जैसे ज़िलों में कृषि उत्पादन को सुरक्षित, टिकाऊ और खाद्य मानकों के अनुरूप बनाए रखा जाए, तो इसका सीधा और सकारात्मक प्रभाव राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है।
जलवायु परिवर्तन और गंगा के मैदान की कृषि पर बढ़ता दबाव वर्तमान समय में गंगा का मैदान तेज़ी से बदलते जलवायु पैटर्न के गंभीर दबाव में है। मानसून की अनियमितता, कभी अत्यधिक वर्षा तो कभी लंबे सूखे की स्थिति, बेमौसम बारिश और तीव्र गर्मी की लहरें अब असामान्य नहीं रहीं। ये सभी परिवर्तन सीधे तौर पर कृषि उत्पादन की स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं। मेरठ सहित इस पूरे क्षेत्र के छोटे और सीमांत किसान, जो पहले ही सीमित संसाधनों, पानी और पूंजी पर निर्भर हैं, इन जलवायु परिवर्तनों से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन ने न केवल फसल चक्र को असंतुलित किया है, बल्कि किसानों की आय, उनकी आजीविका और खाद्य सुरक्षा को भी गंभीर जोखिम में डाल दिया है।
चावल–गेहूं प्रणाली पर जलवायु परिवर्तन का संभावित खतरा गंगा के मैदान की कृषि व्यवस्था मुख्य रूप से चावल और गेहूं की पारंपरिक प्रणाली पर आधारित है, जो दशकों से देश की खाद्य ज़रूरतों को पूरा करती आई है। लेकिन अनुमान है कि 2050 के दशक तक यह प्रणाली जलवायु परिवर्तन के कारण और अधिक संवेदनशील हो सकती है। चावल की उपज में लगभग 12 प्रतिशत और गेहूं की उपज में 24 प्रतिशत तक की संभावित गिरावट इस खतरे को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। लगातार अधिक उत्पादन लेने की प्रवृत्ति और रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से मिट्टी की सेहत भी प्रभावित हुई है, जिससे उपज का स्तर अब स्थिर होने लगा है। इसका सीधा असर उन किसान परिवारों पर पड़ेगा, जिनकी आजीविका पूरी तरह इन्हीं दो फसलों पर निर्भर है और जिनके पास जोखिम सहने की क्षमता सीमित है।
खाद्य असुरक्षा, गरीबी और वैश्विक परिदृश्य में भारत की स्थिति वैश्विक स्तर पर खाद्य असुरक्षा आज एक गंभीर और बढ़ती हुई चुनौती बन चुकी है। 2019 से 2022 के बीच तीव्र खाद्य असुरक्षा से प्रभावित लोगों की संख्या 82 देशों में 135 मिलियन से बढ़कर 345 मिलियन तक पहुँच गई है। दक्षिण एशिया, उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे क्षेत्र फसल विफलता, भूख और कुपोषण के सबसे बड़े जोखिम क्षेत्र बन चुके हैं। भारत भी इसी संवेदनशील क्षेत्र का हिस्सा है। कुपोषण, पानी की कमी, प्रति एकड़ कम कृषि उत्पादन और जलवायु परिवर्तन मिलकर देश के सामने खाद्य सुरक्षा की चुनौती को और अधिक जटिल और गंभीर बना रहे हैं, जिसका प्रभाव आने वाले वर्षों में और गहराने की आशंका है।
अनुकूलन रणनीतियाँ: कृषि उत्पादन और किसान आय बढ़ाने की संभावनाएँ हालांकि परिस्थितियाँ चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन समाधान की संभावनाएँ भी पूरी तरह मौजूद हैं। बेहतर बुवाई तकनीकों, जलवायु के अनुकूल फसल किस्मों और उत्पादन प्रणाली में सुधार के माध्यम से चावल की उपज में 7 से 15 प्रतिशत तथा गेहूं की पैदावार में 12 से 19 प्रतिशत तक वृद्धि संभव बताई गई है। इन अनुकूलन रणनीतियों के परिणामस्वरूप औसत शुद्ध कृषि प्रतिफल में 11 से 14 प्रतिशत और प्रति व्यक्ति आय में 7 से 8 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी गई है। भविष्य में यदि अधिक किसान इन तरीकों को अपनाते हैं, तो इससे न केवल उत्पादन बढ़ेगा बल्कि क्षेत्रीय गरीबी को भी उल्लेखनीय रूप से कम किया जा सकेगा।
पारंपरिक ज्ञान, आधुनिक तकनीक और नीति समर्थन की आवश्यकता जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के बावजूद, पारंपरिक कृषि ज्ञान, स्थानीय अनुभव, आधुनिक कृषि पद्धतियों और उभरती प्रौद्योगिकियों का विवेकपूर्ण संयोजन भारत में खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके लिए व्यापक स्तर पर अनुसंधान, निवेश और मज़बूत नीति समर्थन की आवश्यकता है। फसल संरक्षण और कृषि संवर्धन को राष्ट्रीय सुरक्षा संरचना के एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में पहचानना आज समय की मांग बन चुका है। ऐसी पहलें किसानों की क्षमता को बढ़ाने के साथ-साथ गंगा के मैदान, विशेषकर मेरठ, को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में अपनी भूमिका और अधिक सशक्त करने में सहायक सिद्ध हो सकती हैं।
क्यों मेरठ में कपड़ा उद्योग, आज भी रोज़गार और उद्यमिता की सबसे मज़बूत बुनियाद है?
मेरठ को यूँ ही लघु उद्योगों, खादी और स्वदेशी परंपराओं का शहर नहीं कहा जाता। यहाँ की गलियों और बाज़ारों में आज भी कपड़ा बुनने, सिलने और बेचने की सदियों पुरानी मेहनत की धड़कन महसूस की जा सकती है। ऐसे में जब हम कपड़ों के इतिहास और भारत के विशाल वस्त्र उद्योग की बात करते हैं, तो मेरठ अपने आप इस कहानी का अहम हिस्सा बन जाता है। कपड़ा सिर्फ़ तन ढकने का साधन नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता, संस्कृति, रोज़गार और आत्मनिर्भरता से गहराई से जुड़ा हुआ है - और मेरठ आज भी इस परंपरा की एक जीवंत और सशक्त मिसाल बना हुआ है। इस लेख में हम कपड़ा उद्योग की पूरी यात्रा को सरल और मानवीय ढंग से समझेंगे - जहाँ कपड़ों के ऐतिहासिक विकास और मानव सभ्यता में उनकी भूमिका से शुरुआत होगी, फिर भारत के कपड़ा उद्योग की संरचना और उसकी वैश्विक पहचान पर बात करेंगे। इसके साथ-साथ वर्तमान बाज़ार की स्थिति और भविष्य की संभावनाओं को समझेंगे, सरकारी योजनाओं और नीतिगत समर्थन की भूमिका जानेंगे, मेरठ और खादी उद्योग के विशेष ऐतिहासिक संबंध पर नज़र डालेंगे, और अंत में कपड़ा व्यवसाय शुरू करने के व्यावहारिक अवसरों व ज़रूरी मार्गदर्शन को भी संक्षेप में समझेंगे।
कपड़ों का ऐतिहासिक विकास और मानव सभ्यता में वस्त्रों की भूमिका मानव इतिहास में कपड़ों की शुरुआत विशुद्ध रूप से आवश्यकता से हुई थी - ठंड, गर्मी और प्राकृतिक खतरों से स्वयं को बचाने के लिए। प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य जानवरों की खाल, पत्तियों और पेड़ों की छाल से अपने शरीर को ढकता था। गुफा चित्रों और पुरातात्विक अवशेषों से यह स्पष्ट होता है कि लगभग 30,000 वर्ष पहले तक कपड़े मानव जीवन का नियमित हिस्सा बन चुके थे। समय के साथ जैसे-जैसे मानव ने बुनाई की तकनीक, धागे और करघे का विकास किया, वैसे-वैसे वस्त्र अधिक टिकाऊ, आरामदायक और सौंदर्यपूर्ण होते चले गए। धीरे-धीरे कपड़े केवल शरीर ढकने का साधन नहीं रहे, बल्कि सामाजिक पहचान, वर्ग, संस्कृति और परंपरा का प्रतीक बन गए। धार्मिक अनुष्ठानों, त्योहारों और सामाजिक रीति-रिवाजों में वस्त्रों की भूमिका ने मानव सभ्यता को एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान प्रदान की।
भारत का कपड़ा उद्योग: संरचना, विविधता और वैश्विक योगदान भारत का कपड़ा उद्योग विश्व के सबसे प्राचीन, व्यापक और विविध उद्योगों में गिना जाता है। कपास, जूट, रेशम और ऊन जैसे प्राकृतिक रेशों से लेकर आधुनिक सिंथेटिक फाइबर (synthetic fiber) तक - भारत हर स्तर पर उत्पादन करने में सक्षम है। इस उद्योग की सबसे बड़ी विशेषता इसका विकेंद्रीकृत स्वरूप है, जिसमें हथकरघा, पावरलूम (power loom) और लघु इकाइयाँ लाखों ग्रामीण परिवारों की आजीविका से जुड़ी हैं। यही कारण है कि कपड़ा उद्योग भारत में केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता का आधार भी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “मेड इन इंडिया” (Made in India) वस्त्र अपनी गुणवत्ता, विविधता और कारीगरी के लिए पहचाने जाते हैं। वैश्विक कपड़ा व्यापार में भारत की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, जिससे देश की आर्थिक स्थिति को भी मजबूती मिल रही है।
वर्तमान परिदृश्य और भविष्य की संभावनाएँ: आंकड़े, बाज़ार और निर्यात वर्तमान समय में भारत का कपड़ा और परिधान उद्योग तेज़ी से विकास के पथ पर अग्रसर है। घरेलू बाज़ार में बढ़ती आय, बदलती जीवनशैली, फैशन के प्रति जागरूकता और संगठित रिटेल (retail) की बढ़ती पहुँच ने कपड़ों की मांग को नई ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भी भारत एक भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता के रूप में उभर चुका है, विशेष रूप से अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े बाज़ारों में। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह उद्योग और तेज़ी से बढ़ेगा, जिससे नए निवेशकों, स्टार्टअप्स (startups) और उद्यमियों के लिए बड़े अवसर उपलब्ध होंगे। तकनीक, डिज़ाइन और टिकाऊ उत्पादन इस विकास की प्रमुख धुरी बनते जा रहे हैं।
सरकारी योजनाएँ और नीतियाँ: कपड़ा उद्योग को मिलने वाला समर्थन भारत सरकार ने कपड़ा उद्योग की संभावनाओं को देखते हुए इसे मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएँ और नीतियाँ लागू की हैं। टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन फंड योजना टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फ़ंड स्कीम (Technology Development Fund (TDF) Scheme) के माध्यम से आधुनिक मशीनरी को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता और क्षमता दोनों में सुधार हो सके। इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल पार्क (Integrated Textile Park) और मेगा टेक्सटाइल रीजन (Mega Textile Region) जैसी पहलें उद्योग को संगठित ढाँचा और बेहतर अवसंरचना प्रदान करती हैं। इन योजनाओं का मुख्य उद्देश्य निवेश को आकर्षित करना, रोजगार के अवसर बढ़ाना और भारत को वैश्विक कपड़ा केंद्र के रूप में स्थापित करना है। विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यमियों के लिए यह नीतिगत समर्थन आत्मविश्वास और स्थिरता का स्रोत बना है।
मेरठ और खादी उद्योग: स्वदेशी आंदोलन से आधुनिक उद्यमिता तक मेरठ का खादी उद्योग केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम और स्वदेशी आंदोलन की जीवंत विरासत है। आज़ादी के दौर में खादी आत्मनिर्भरता, सादगी और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बनी, और मेरठ इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा। समय के साथ खादी उद्योग ने खुद को आधुनिक बाज़ार के अनुरूप ढाल लिया है। आज खादी केवल ग्रामीण परिधान नहीं, बल्कि फैशन, टिकाऊ वस्त्र और जागरूक उपभोक्ता संस्कृति का प्रतीक बन चुकी है। मेरठ में खादी उत्पादन से जुड़े हजारों कारीगर और परिवार आज भी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। बदलते समय में खादी ने स्थानीय उद्यमियों के लिए नए बाज़ार और नए अवसर खोल दिए हैं।
कपड़ा व्यवसाय शुरू करने के अवसर और व्यावहारिक मार्गदर्शन कपड़ा व्यवसाय में प्रवेश करने के इच्छुक लोगों के लिए आज अनेक रास्ते उपलब्ध हैं - चाहे वह विनिर्माण हो, थोक व्यापार, खुदरा बिक्री या आयात-निर्यात। इस क्षेत्र में सफलता के लिए एक स्पष्ट व्यवसाय योजना, सही कानूनी पंजीकरण, आवश्यक लाइसेंस, उपयुक्त स्थान का चयन और प्रभावी विपणन रणनीति बेहद ज़रूरी है। मेरठ जैसे शहर में पहले से मौजूद कारीगरी, श्रम शक्ति और बाज़ार की समझ नए उद्यमियों को स्वाभाविक बढ़त प्रदान करती है। यदि व्यवसाय को सही दिशा, धैर्य और गुणवत्ता के साथ आगे बढ़ाया जाए, तो कपड़ा उद्योग एक दीर्घकालिक, स्थिर और लाभकारी उद्यम साबित हो सकता है।
नागपुर का संतरा: खट्टे-मीठे स्वाद से जीआई पहचान तक, भारतीय कृषि की खास कहानी
नागपुर संतरा आज भारत में सबसे ज़्यादा पसंद किए जाने वाले संतरों में गिना जाने लगा है। अपने खट्टे-मीठे स्वाद, भरपूर रस और ख़ास सुगंध के कारण इस संतरे ने देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भी अलग पहचान बनाई है। हालाँकि इसका नाम महाराष्ट्र के नागपुर शहर से जुड़ा हुआ है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसकी उत्पत्ति मूल रूप से नागपुर में नहीं हुई थी। नागपुर संतरा वास्तव में मंदारिन संतरे की एक किस्म है, जिसकी त्वचा ऊपर से थोड़ी खुरदरी होती है, लेकिन अंदर से यह बेहद मीठा और रसदार होता है। भारत में इस संतरे को आधिकारिक पहचान अप्रैल 2014 में मिली, जब इसे भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग (GI Tag) प्रदान किया गया।
नागपुर संतरे की खेती दो प्रमुख मौसमों में की जाती है। पहली फसल को ‘अंबिया’ कहा जाता है, जो सितंबर से दिसंबर के बीच आती है और इसका स्वाद अपेक्षाकृत खट्टा होता है। दूसरी फसल ‘मृग’ कहलाती है, जो जनवरी के आसपास तैयार होती है और अधिक मीठी मानी जाती है। किसान आमतौर पर अपनी ज़मीन और बाज़ार की मांग के अनुसार इन दोनों में से किसी एक किस्म को उगाना चुनते हैं। नागपुर संतरे को ‘सिन्त्रा’ या ‘कूलंग’ के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि इसे भारत में पुर्तगालियों द्वारा लाया गया था और बाद में नागपुर के बागवानों ने ग्राफ्टिंग (grafting) जैसी उन्नत तकनीकों के ज़रिये इसकी गुणवत्ता में लगातार सुधार किया।
नागपुर संतरा केवल स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र के किसानों की आय का एक बड़ा स्रोत है और भारत के प्रमुख कृषि निर्यात उत्पादों में शामिल है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, भारत हर साल लगभग डेढ़ लाख टन नागपुर संतरे का निर्यात करता है, जिसकी क़ीमत सैकड़ों करोड़ रुपये आँकी जाती है। इसी वजह से नागपुर को अक्सर “ऑरेंज सिटी” (orange city) भी कहा जाता है। संतरे के साथ-साथ यह शहर अपने ऐतिहासिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए भी जाना जाता है।
जनसंख्या (2025)Source:
Census 2011; population projections based on 2011 city growth rates.
1,605,532
इंटरनेट उपयोगकर्ता
इंटरनेट उपयोगकर्ताSource:
The number of Internet connections was determined by multiplying the number of urban Internet subscribers with the percentage of the District Headquarters (DHQ) population in relation to the total urban population. The value was allocated to DHQs based on population ratio. Urban population is distributed in a 1.5:1 ratio between DHQ and non-DHQ cities. (TRAI September 2025 Report / Number)
2,040,803
फेसबुक उपयोगकर्ता
फेसबुक उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Facebook Users. (As per Facebook Ad Module, 31 December 2025)
609,950
लिंक्डइन उपयोगकर्ता
लिंक्डइन उपयोगकर्ताSource:
The number of unique member accounts that could be potentially reached in the city. (LinkedIn Ad Module, December 2025)
800,000
ट्विटर उपयोगकर्ता
ट्विटर उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Twitter Users (X Ad Module,December 2025)
421,500
इंस्टाग्राम उपयोगकर्ता
इंस्टाग्राम उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Instagram Users (Instagram Ad Module,December 2025)