ग्लास बीच की अनोखी कहानी और समुद्र तट पर बने कांच के प्राकृतिक रत्न
समुद्र तट या बीच (Beaches) हमारी प्रकृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यहां हमें कई चीजें दिखाई दे सकती हैं, लेकिन टूटे हुए कांच के समूह का यहां मौजूद होना किसी आश्चर्य से कम नहीं है।कैलिफोर्निया (California, USA) के फोर्ट ब्रैग (Fort Bragg) में ग्लास बीच (Glass Beach) लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है, जिसके समुद्र तट में पॉलिश (polish) किए गए कांच के चमकदार छोटे टुकड़े पाए जाते हैं। दशकों से स्थानीय समुदायों ने अपने अवांछित सामान, यहां तक कि कारों को समुद्र के किनारे फेंक दिया था। यहां मौजूद कार्बनिक चीजें समय के साथ सड़ गईं, तथा धातु की वस्तुओं में या तो जंग लग गया, या उन्हें कहीं और ले जाया गया। लेकिन टूटे हुए कांच वहीं मौजूद रहे तथा समुद्र की लहरों के टकराव के कारण मुलायम टुकड़ों में परिवर्तित हो गए। यह समुद्र तट अब कानून द्वारा संरक्षित है, और यहां मौजूद प्रतिष्ठित कांच को आगंतुकों द्वारा हटाया नहीं जा सकता है। दुनिया भर के अन्य स्थानों में भी समुद्री कांच की उच्च सांद्रता है, जिसके लिए उन लोगों को धन्यवाद देना चाहिए, जिन्होंने कांच इन स्थानों में फेंका है। साइबेरिया (Siberia) में उससुरी (Ussuri) खाड़ी कांच बनाने वाली फैक्ट्रियों का केंद्र है, जो कांच अपशिष्ट को समुद्र में फेंक देते हैं। यहां अब समुद्र तट पत्थरों और समुद्री कांच का एक रंगीन मिश्रण बन गया है। संदर्भ:https://bit.ly/3VeCKPy https://bit.ly/3rD71Ko
मानव : 40000 ई.पू. से 10000 ई.पू.
मैमथ के रहस्य जीवाश्म और प्राचीन मानव इतिहास की रोचक कहानी
मैमथ (Mammoth), आधुनिक हाथियों के प्राचीन रिश्तेदार हुआ करते थे जो, लगभग 50,000 ईसा पूर्व से 10,000 ईसा पूर्व के दौरान हमारी पृथ्वी पर घूमा करते थे। ये काफी हद तक हाथियों जैसे दिखते थे, लेकिन वास्तव में हाथियों से बहुत बड़े होते थे। मैमथ का वैज्ञानिक नाम 'मैमुथस प्राइमिजीनियस' है, और अब यह पूरी तरह से विलुप्त हो चुके हैं। सालों पहले भारतीय वैज्ञानिकों को कॉर्बेट नेशनल पार्क (Corbett National Park) में इन्हीं का एक विशाल जीवाश्म मिला था। यद्यपि, भारत में अभी तक मनुष्यों द्वारा तराशे कोई भी मैमथ हाथी दांत नहीं मिले हैं। लेकिन जर्मनी (Germany) की वोगेलहर्ड नामक एक गुफा (Vogelherd Cave) में शोधकर्ताओं को अलग-अलग जानवरों के आकार की, बारीकी से शानदार नक्काशी किये हुए विशाल मैमथ के दांत मिले हैं । वोगेलहर्ड गुफा, दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी में पूर्वी स्वाबियन जुरा (Eastern Swabian Jura) नामक स्थान में मौजूद है। यह गुफा चूना पत्थर की चट्टान से बनी है। शोधकर्ताओं की इस गुफा पर नजर 1931 में पड़ी जब उन्हें इसके अंदर कुछ छोटी-छोटी मूर्तियां मिलीं। दरअसल 23 मई, 1931 में, हरमन मोन (Hermann Mohn) नामक एक व्यक्ति को यहां पर फ्लिंटस्टोन (Flintstones) के कुछ टुकड़े मिले। इसके बाद उन्होंने ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय (University Of Tübingen) को अपनी खोज के बारे में बताया। उसी वर्ष, ट्यूबिंगन के गुस्ताव रीक (Gustav Rieck) नामक एक वैज्ञानिक ने 15 जुलाई से 1 अक्टूबर 1931 तक तीन महीने तक इस गुफा में खुदाई की। इसके बाद जाकर उन्हें इस बात के प्रमाण मिले कि, “इस स्थान पर मनुष्य रहते थे, क्योंकि यहाँ पर उन्हें पुराने पाषाण युग से लेकर कांस्य युग तक, विभिन्न समय अवधि के औजार और अन्य वस्तुएँ मिलीं।” यहाँ उन्हें ऑरिग्नेशियाई काल (Aurignacian Period) की मिट्टी की एक परत में विशाल हाथी दांत से बनी कई छोटी-छोटी आकृतियाँ भी मिलीं। इन आकृतियों में बिंदु, रेखाएं और एक्स-आकार के निशान जैसी सजावट भी की गई थी। ये निशान यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि उनका उपयोग धार्मिक या अनुष्ठानिक उद्देश्यों के लिए किया गया होगा। साथ ही यहाँ पर उन्हें गहने और हाथी दांत से बनी बांसुरी के टुकड़े भी मिले। ये सभी कलाकृतियाँ ऊपरी पुरापाषाण काल (Upper Paleolithic) के दौरान ऑरिग्नेशियाई संस्कृति (Aurignacian Culture) के प्रारंभिक मनुष्यों द्वारा विशाल ऊनी मैमथ हाथी दांत से बनाई गई थीं। इन्हें दुनिया की सबसे पुरानी ज्ञात कला कृतियों में से एक माना जाता है। 2017 में इन्हें यूनेस्को (UNESCO) द्वारा, विश्व धरोहर स्थलों की सूची में भी शामिल कर लिया गया था। इन मूर्तियों में शामिल है: जंगली घोड़ा: यह एक घोड़े की मूर्ति है, जो लगभग 30,000 - 29,000 वर्ष पुरानी है। यह मूर्ति बहुत सटीक आकार की है। जानकार मानते हैं कि यह एक आक्रामक या प्रभावशाली घोड़े का प्रतिनिधित्व करती है। इसका केवल सिर ही पूरी तरह सुरक्षित है। शेर का सिर: यह मूर्ति लगभग 40,000 वर्ष पुरानी है। इसे 1931 में अधूरे सिर के साथ खोजा गया था। इसका एक अन्य खोया हुआ टुकड़ा 2005 और 2012 के बीच खुदाई के दौरान खोजा गया था और इसके बाद दोनों को सफलतापूर्वक पुनः जोड़ा गया था, जिससे यह पुष्टि हुई कि मूर्ति वास्तव में एक त्रि-आयामी मूर्तिकला है। इसकी रीढ़ पर लगभग 30 बारीक कटे हुए क्रॉस (Cross) हैं। मैमथ: यह लगभग 35,000 वर्ष पुरानी ऊनी मैमथ (Wooly Mammoth) की मूर्ति है। यह पूरी मूर्ति पूरी तरह से अक्षुण्ण (Intact) है, और इसमें विस्तृत नक्काशी की गई है। यह अपने पतले आकार, नुकीली पूंछ, मजबूत पैरों और गतिशील रूप से घुमावदार धड़ के कारण इन सभी में सबसे अलग दिखती है। वोगेलहर्ड गुफा में खोजी गई ऊनी मैमथ की यह नक्काशी बहुत छोटी (केवल 3.7 सेमी लंबी और वजन केवल 7.5 ग्राम) है। इसके अलावा शोधकर्ताओं को यहां पर 200,000 से अधिक पत्थर के औजार, हड्डी और हाथी दांत से बने औजार, पक्षियों की हड्डियों सहित अन्य जानवरों की लगभग 500 किलोग्राम हड्डियां और 28 किलोग्राम विशाल हाथी दांत मिले।यदि हम भारत में मैमथ की उपस्थिति पर नजर डालें तो ओडीशा राज्य के जाजपुर ज़िले सहित 2019 में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (Corbett Tiger Reserve) के बिजरानी क्षेत्र में भी एक 'विशाल मैमथ” का जीवाश्म खोजा गया। इस खोज ने वन्य जीवन रूचि रखने वाले लोगों और वैज्ञानिकों के बीच उत्सुकता बड़ा दी है। एमपीएस बिष्ट (MPS Bisht) नामक एक भूविज्ञानी, जो उत्तराखंड अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के निदेशक भी हैं और इस जीवाश्म की खोज करने वाली टीम का हिस्सा थे, के अनुसार यह विशाल मैमथ का एक का जबड़ा है और लगभग 1.2 मिलियन वर्ष पुराना हो सकता है। लेकिन इसकी पुष्टि के लिए उन्हें और परीक्षण करने की जरूरत है। हालांकि कश्मीर में गैलेंडर पंपोर नामक एक जगह में भी इसी तरह के एक मैमथ के जीवाश्म मिलने का दावा किया गया था। लेकिन अब शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि, गैलेंडर पंपोर में पाए गए जीवाश्म वास्तव में मैमथ के नहीं, बल्कि किसी अन्य प्राचीन हाथी के हैं। हाथी की खोपड़ी से पता चलता है कि वह पेलियोलोक्सोडोन प्रजाति (Palaeoloxodon Species) का था और लगभग 50 वर्ष का था।जीवाश्मों के साथ-साथ यहां पर प्रारंभिक मध्य पुरापाषाण युग के पत्थर के औजार भी खोजे गये हैं। ये सभी जीवाश्म और पत्थर के औजार अब जम्मू विश्वविद्यालय के प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय में रखे गए हैं। हालांकि इस जीवाश्म के कुछ हिस्से 2004 के बाद चोरी हो गए या नष्ट हो गए थे।मैमथ (Mammoth), आधुनिक हाथियों के प्राचीन रिश्तेदार हुआ करते थे जो, लगभग 50,000 ईसा पूर्व से 10,000 ईसा पूर्व के दौरान हमारी पृथ्वी पर घूमा करते थे। ये काफी हद तक हाथियों जैसे दिखते थे, लेकिन वास्तव में हाथियों से बहुत बड़े होते थे। यद्यपि, भारत में अभी तक मनुष्यों द्वारा तराशे कोई भी मैमथ हाथीदांत नहीं मिले हैं। लेकिन जर्मनी की वोगेलहर्ड नामक एक गुफा में, शोधकर्ताओं को शानदार नक्काशी के साथ विशाल मैमथ के दांत मिले हैं, जिन्हें मनुष्यों द्वारा अलग-अलग जानवरों के आकार में उकेरा गया है। संदर्भ https://tinyurl.com/2u577jzr https://tinyurl.com/4afjx5bb https://tinyurl.com/mrsphhw4 https://tinyurl.com/24u6ub24 https://tinyurl.com/345s5aay
फल और सब्जियाँ
काली मिर्च: स्वाद, खेती और वैश्विक व्यापार की एक रोचक यात्रा
भारत को “मसालों का देश” कहा जाता है। देश में ढेरों मसालों के बीच काली मिर्च का तड़का हमारे स्वादिष्ट व्यंजनों में जान फूंक देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मिर्च की भांति बिल्कुल भी नहीं दिखाई देने वाली, “काली मिर्च” भारत के मसाला व्यापार में भी जान फूंक देती है। चलिए जानते हैं कैसे?काली मिर्च ‘पाइपर नाइग्रम’ (Piper Nigrum) नामक पौधे में उगने वाला सूखा कच्चा फल होती है। अपनी तेज़ गंध, स्वाद और औषधीय गुणों के कारण काली मिर्च, दुनियाभर के सबसे लोकप्रिय मसालों में से एक मानी जाती है। भारत दुनिया में काली मिर्च के सबसे प्रमुख उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक देशों में से एक है। भारत में काली मिर्च की खेती मुख्य रूप से केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु तथा सीमित मात्रा में महाराष्ट्र, उत्तर पूर्वी राज्यों और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में की जाती है। देश में काली मिर्च का सर्वाधिक उत्पादन केरल और कर्नाटक राज्य में होता है। काली मिर्च 10 मीटर ऊंचाई तक फूलों वाली लताओं (Vine) पर उगती है। यह लताएँ सिल्वर ओक (Silver Oak) जैसे ऊंचे पेड़ों के सहारे बढ़ती हैं। लतायें पहली बार चौथे या पाँचवें वर्ष के बाद फल देना शुरू करती हैं और उसके बाद सात वर्षों तक फल देती रहती हैं। 7वीं शताब्दी से पहले, काली मिर्च की लतायें केवल जंगलों में उगती थीं। काली मिर्च नम उष्णकटिबंधीय पौधा है, जिसके लिए उच्च वर्षा और आर्द्रता की आवश्यकता होती है। भारत में पश्चिमी घाट के उपपर्वतीय इलाकों की गर्म और आर्द्र जलवायु, काली मिर्च की खेती लिए आदर्श मानी जाती है। यह फसल 20° उत्तर और दक्षिण अक्षांश के बीच तथा समुद्र तल से 1500 मीटर की ऊंचाई तक सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। यह फसल 10° से 40°C के बीच का तापमान सह सकती है। लेकिन बेहतर उत्पादन के लिए आदर्श तापमान 28°C के औसत के साथ 23 -32°C के बीच माना जाता है।जड़ की वृद्धि के लिए मिट्टी का इष्टतम तापमान 26° से 28°C होना चाहिए। काली मिर्च की बेहतर पैदावार के लिए तकरीबन 125-200 से.मी (cm) की अच्छी तरह से वितरित वार्षिक वर्षा को आदर्श माना जाता है। काली मिर्च को 5.5 से 6.5 हाइड्रोजन क्षमता (Potential of Hydrogen(P.H) value) के साथ विविध प्रकार की मिट्टी में उगाया जाता है, हालांकि, प्राकृतिक तौर पर यह लाल लैटेराइट मिट्टी में अच्छी तरह से उगती है। भारत में काली मिर्च की 75 से अधिक किस्मों की खेती की जाती है। केरल में उगाई जाने वाली ‘करीमुंडा’ (Karimunda) काली मिर्च की सबसे लोकप्रिय किस्म है। काली मिर्च की अन्य महत्वपूर्ण किस्मों में ‘कोट्टनादन’ (Kottanadan) (दक्षिण केरल), ‘नारायणकोडी’ (Narayankodi) (मध्य केरल), ‘एम्पिरियन’ (Empirian) (वायनाड), ‘नीलामुंडी’ (Neelamundi) (इडुक्की), ‘कुथिरावली’ (Kuthiravalli) (कोझिकोड और इडुक्की), ‘कल्लुवली’ (Kalluvalli) (उत्तरी केरल), ‘मल्लिगेसरा’ और ‘उद्दगरे’ (Malligesara and Uddagare) (कर्नाटक) शामिल हैं। क्या आप जानते है कि काली मिर्च दुनिया के उन सबसे शुरुआती मसालों में से एक थी, जिनका व्यापार किया गया था। व्यापारिक दुनिया में काली मिर्च कई ऐतिहासिक घटनाओं की गवाह भी रही है। माना जाता है कि काली मिर्च के व्यापार के परिणामस्वरूप ही प्रसिद्ध मसाला मार्गों (Spice Routes) की खोज हुई थी। साथ ही मसाला मार्गों की बदौलत ही वैश्वीकरण की शुरुआत हुई थी। 30 ईसा पूर्व में प्रारंभिक रोमन साम्राज्य (Roman Empire) ने मिस्र पर विजय प्राप्त करने के बाद भारत में मालाबार तट से विदेशी मसालों की श्रृंखला तक सीधी पहुंच हासिल की थी। उस समय काली मिर्च की कीमत का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उस दौरान हूणों (Huns) द्वारा घिरे रोम को मुक्त करने के लिए फिरौती के रूप में सोने, चांदी और रेशमी अंगरखे के साथ-साथ 3,000 पाउंड काली मिर्च की मांग की गई थी। काली मिर्च, को आज भी काला सोना कहा जाता है। मध्य युग में इसका प्रयोग मुद्रा के रूप में भी किया जाता था। इसके अलावा किसी भी महंगी चीज के लिए “काली मिर्च के बराबर प्रिय” शब्द का प्रयोग किया जाता था। मध्य युग के दौरान काली मिर्च की कीमतें बहुत अधिक थीं। इस दौरान काली मिर्च का व्यापार पूरी तरह से रोमनों के अधीन था। 15वीं शताब्दी के मध्य में, पुर्तगाल पूरे यूरोप (Europe) में अग्रणी समुद्री राष्ट्र था। इसी समयान्तराल में नाविक प्रिंस हेनरी (Prince Henry) के नेतृत्व में, रोमनों के एकाधिकार को तोड़ने तथा पूर्व से विदेशी मसालों पर पकड़ बनाने के लिए भारत तक एक समुद्री मार्ग खोजने के प्रयास भी चल रहे थे। इसके परिणाम स्वरूप पुर्तगाली खोजकर्ता ‘वास्को डी गामा’ (Vasco Da Gama) को भारत आने के लिए नियुक्त किया गया। वह मध्य पूर्व और मध्य एशिया के माध्यम से ‘रेशम मार्ग’ (Silk Road) से बचते हुए, अफ्रीका के चारों ओर घुमावदार मार्ग लेते हुए यूरोप से भारत जाने वाले पहले व्यक्ति बने। वास्को डी गामा की सफल यात्रा, भारत पर पुर्तगाली उपनिवेशवाद के 450 वर्षों की शुरुआत मानी जाती है। दरसल, इस दौरान मसाले औषधीय रूप से महत्वपूर्ण माने जाते थे। किंतु वे केवल पूर्व के उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ही उगते थे, जिससे पश्चिम में उनकी बहुत मांग थी। इन मसालों का खाद्य-सुगंधित स्वादों के साथ-साथ औषधि, जहर के लिए मारक, मलहम और कुछ का तो अगरबत्ती के रूप में भी उपयोग किया जाता था। लगभग एक सदी तक मसालों के व्यापार पर पुर्तगालियों का वर्चस्व रहा। हालांकि, इस वर्चस्व को डचों (Dutch) द्वारा समाप्त कर दिया गया और 1635 की शुरुआत में अंग्रेजों ने काली मिर्च के बागान स्थापित किए। वर्तमान में, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु भारत के शीर्ष तीन काली मिर्च उत्पादक राज्य हैं। 2008 से 2012 के बीच कर्नाटक में इसका उत्पादन दोगुने से अधिक हो गया है। लेकिन इसी अवधि के दौरान केरल में यह उत्पादन आधे से भी कम हो गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि धीरे-धीरे किसान बहु-फसल और इलायची जैसी जल्दी उगने और महंगी बिकने वाली फसलों की ओर बढ़ रहे हैं।काली मिर्च के वैश्विक व्यापार में भारत, वियतनाम (Vietnam) और ब्राजील (Brazil) का दबदबा है। भारत काली मिर्च के दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक एवं निर्यातक देशों में से एक है, जो दुनिया की 34% काली मिर्च का उत्पादन करता है। सूखी और पकी हुई काली मिर्च का उपयोग प्राचीन काल से ही स्वाद और पारंपरिक औषधि दोनों के लिए किया जाता रहा है। काली मिर्च दुनिया में सबसे अधिक कारोबार किया जाने वाला मसाला है। काली मिर्च के वैश्विक बाजार को एशिया-प्रशांत (Asia-Pacific), यूरोप, उत्तरी अमेरिका (North America), दक्षिण अमेरिका (South America) और मध्य पूर्व और अफ्रीका (Africa) में विभाजित किया गया है। उत्पादन और निर्यात के मामले में एशिया-प्रशांत वैश्विक काली मिर्च बाजार पर हावी माना जाता है। वियतनाम (Vietnam) दुनिया भर में काली मिर्च का सबसे बड़ा निर्यातक है, क्योंकि काली मिर्च के पौधे उगाने के लिए वहां की जलवायु और परिस्थितियां अनुकूल मानी जाती हैं। ‘वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय’ के मसाला बोर्ड (Spices Board) द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में कोविड-19 (COVID-19) महामारी की संकटग्रस्त स्थिति के बावजूद भी भारत से काली मिर्च के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। काली मिर्च जैसे भारतीय मसाले दुनिया के सबसे लोकप्रिय मसालों में से एक हैं। जब काली मिर्च की मांग बढ़ने की बात आती है तो भारत स्वयं भी हमेशा से ही अग्रणी राष्ट्र रहा है। हमारा देश इस लोकप्रिय मसाले का एक प्रमुख निर्यातक भी रहा है। आंकड़ों के अनुसार 2020-2021 के दौरान भारत से काली मिर्च का निर्यात काफी बढ़ा है। संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) काली मिर्च का दुनिया में सबसे बड़ा आयातक (कुल आयात का 16.2% हिस्सा) है। अमेरिका के बाद नीदरलैंड (Netherlands), जर्मनी (Germany), यूके (UK) और जापान (Japan) हैं। यह देश दुनिया भर में आयात की जाने वाली कुल काली मिर्च का 50% से अधिक हिस्सा आयात करते हैं। वियतनाम अभी भी दुनिया का सबसे बड़ा काली मिर्च उत्पादक और निर्यातक देश है। 2022 में, वियतनाम का निर्यात 220,000 टन होने का अनुमान था, जो दुनिया भर में कुल काली मिर्च उत्पादन का 55% है। काली मिर्च को एक बुनियादी खाद्य मसाला माना जाता है, और संभवतः खाने की मेज पर नमक के साथ रखा जाने वाला एक मसाला है। किसने सोचा होगा कि खाने की मेज पर छोटी सी शीशी में रखी जाने वाली काली मिर्ची का दुनिया के व्यापार इतिहास पर इतना प्रभाव रहा होगा? संदर्भhttps://bit.ly/3HXz3Iu https://bit.ly/3HSsFCc https://bit.ly/3XnsmFd
स्वाद - भोजन का इतिहास
मेरठ के प्रसिद्ध व्यंजन: हलवा-पराठा और शहर की स्वादिष्ट खान-पान परंपरा
हम जानते हैं कि हमारे मेरठ शहर को खेल नगरी कहा जाता है। हालांकि मेरठ कैंची, खेल के सामान और गजक पट्टी के लिए भी विशेष रूप से प्रसिद्ध है। लेकिन इन सभी चीजों के अलावा एक अन्य ऐसी चीज है, जो इसे स्वर्ग बनाती है और वह है यहां का स्वादिष्ट व्यंजन। हमारा शहर अपने खान-पान के लिए भी बहुत मशहूर है। समृद्ध व्यंजनों के प्रति मेरठ के लोगों का प्रेम किसी से छिपा नहीं है। यहां का अनोखा स्थानीय भोजन पूरे देश में लोकप्रिय है। यहां के हलवा-पराठे की रेसिपी और इसका स्वाद सौ साल पुराना है। हलवा पराठा का नाम सुनते ही नौचंदी मेले की याद ताजा हो जाती है। तो आइए आज हम यहां के कुछ मशहूर स्थानीय व्यंजनों को देखते हैं और उनका मजा लेते हैं।संदर्भ:https://tinyurl.com/3zhv76b5https://tinyurl.com/3ntdsmnw
तितलियाँ और कीट
ब्लैक सोल्जर फ्लाई से पशुधन चारे के संकट का उभरता समाधान
एक या अधिक पशुओं के समूह को, जिन्हें कृषि सम्बन्धी परिवेश में भोजन, रेशे तथा श्रम आदि सामग्रियां प्राप्त करने के लिए पालतू बनाया जाता है, पशुधन के नाम से जाने जाते हैं। आपको बता दें कि उत्तर भारतीय राज्यों के किसानों को गेहूं उत्पादन के अभाव के कारण सूखे चारे की कमी का सामना करना पड़ रहा है। गेहूं की उपज में कमी के कारण कई उत्तरी राज्यों में पशुओं के चारे को लेकर संकट पैदा हो गया है, जो एक चिंतनीय विषय है। इस संकट से हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड जैसे कई उत्तरी राज्य ग्रसित है । परिणाम स्वरूप इन राज्यों ने अन्य राज्यों में पुआल (गेहूं या धान आदि के सूखे डंठल जिन में से दाने निकाल लिए गए हो) भेजने पर पूर्ण रूप से या अनिश्चितकालीन प्रतिबंध लगा दिया है। दुनिया की कुल कृषि में पशुधन का 70 से 80% हिस्सा है और फिर भी पशुधन द्वारा मनुष्यों द्वारा खपत की जाने वाली कैलोरी और प्रोटीन का क्रमशः केवल 18% और 25% ही उत्पन्न किया जाता है । पशुओं के लिए भोजन उगाने के लिए दुनिया की 33% फसल भूमि का उपयोग किया जाता है, फिर भी पशुओं के लिए चारे का संकट सदैव बना रहता है। इस समस्या के समाधान के लिए, पशुओं के चारे के रूप में, कीटों को चारे के मौजूदा स्रोतों, जिनमें ज्यादातर मछली और सोयाबीन शामिल हैं, का पूरक बनाया जा सकता है । पशुधन चारे के रूप में कीटों का उपयोग भोजन की स्थिरता में सुधार कर सकता है क्योंकि कीट कम मूल्य वाले जैविक कचरे (जैसे, फल, सब्जियां और यहां तक कि खाद) को उच्च गुणवत्ता वाले चारे में बदल सकते हैं। मवेशियों की आबादी को बनाए रखने में कीटों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ब्लैक सोल्जर फ्लाई लार्वा (Black Soldier Fly larvae ), जिसे हर्मेशिया इल्यूसेंस (Hermetia illucens) भी कहा जाता है , एक ऐसा सबसे आम कीट है, जिसका उपयोग पशु आहार के लिए कीट आहार के रूप में किया जाता है। ब्लैक सोल्जर फ्लाई लार्वा (BSFL) के सूखे वजन में 50% तक क्रूड प्रोटीन (Crude Protein (CP) तक, 35% तक लिपिड (Lipids) होते हैं और इसमें एक अमीनो एसिड (Amino Acid) होता है जो मछली के भोजन के समान होता है। इन कीटों को पोल्ट्री (Poultry), सूअर, मछली और झींगा की कई प्रजातियों के लिए प्रोटीन के वैकल्पिक स्रोतों के रूप में पहचाना और उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त इन कीटों द्वारा कृत्रिम वातावरण में भी कचरे को मूल्यवान प्रोटीन में कुशलता से परिवर्तित किया जा सकता है । जानवरों के चारे के रूप में इन कीटों का उपयोग करने से न केवल पोषण के मामले में बल्कि पशु स्वास्थ्य के मामले में भी अतिरिक्त लाभ होते हैं। कीटों की खेती, हालांकि अभी कम ज्ञात और कम चर्चित है, परंतु भारत और दुनिया भर में निरंतर एक फलता-फूलता उद्योग बन रहा है, जिसमें खपत और अन्य उपयोग-मामलों के लिए विभिन्न प्रकार के कीटों का प्रजनन, पालन और कटाई शामिल है। कीटों की खेती का चलन युगों पहले से चला आ रहा है। प्राचीन यूनानियों और रोमियों द्वारा उस समय के अभिजात वर्ग के लिएएक स्वादिष्ट भोजन बनाने के लिए आटे और शराब से बनने वाले आहार पर बीटल लार्वा का इस्तेमाल किया गया था। तब से लेकर अब तक, सभ्यताओं और संस्कृतियों के पार, कीट खेती बहुत विकसित हुई है। वर्षों से हमारे द्वारा प्रचुर मात्रा में खेती किए जाने वाले कुछ कीटों में, रेशम के कीड़े, मधुमक्खियाँ, टिड्डे, घर की मक्खियाँ, ततैया, टिड्डियाँ, खाने के कीड़े, केंचुए, इत्यादि शामिल हैं । आज, संभवतः खेती द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले कीटों का सबसे प्रमुख उपयोग पशुओं के लिए भोजन और चारा पैदा करने के लिए किया जाता है । जबकि कीट पालन के एक अन्य प्रमुख अनुप्रयोग में मानव उपभोग के लिए खाद्य कीटों जैसे झींगुर आदि का पालन शामिल है ।हालांकि, पोषण के दृष्टिकोण से कीट, प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्वों का एक बड़ा स्रोत हैं, फिर भी आज की तारीख में, शायद ही कभी मानव उपभोग के लिए इनका उपयोग किया जाता है । मोटे तौर पर, हमारे देश में समग्र जनमत कीटों को खाने की अवधारणा के खिलाफ है। हालांकि, भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र में, कीटाहारिता (Entomophagy), जो कीड़ों को खाने की प्रथा को संदर्भित करता है, क्षेत्र के स्थानीय-आदिवासी समुदायों द्वारा बड़े पैमाने पर कई वर्षों से अभ्यास किया गया है और साथ ही यह उनकी आजीविका में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। जबकि भारत के कई अन्य राज्यों में, अंत-उपभोक्ताओं की अस्वीकृति खाद्य कीटों से बने आहार को अपनाने की दिशा में एक प्रमुख बाधा के रूप में बनी हुई है, अक्सर यह घृणा की भावना के साथ-साथ कई बार अनिश्चित, आदिम जीवन शैली से जुड़ा हुआ माना जाता है। भारत में कीट पालन से जुड़े अन्य प्रमुख मुद्दों में पशुओं को कीट खिलाने से जुड़ी अन्य चिंताएं भी शामिल हैं, जैसे कि पशुओं में संभावित एलर्जी प्रतिक्रियाएं और संक्रामक रोगों के प्रति भेद्यता। इसी समय, भारत में कीट पालन से जुड़े नियामक कानून पूरी तरह से पूर्ण और अच्छी तरह से परिभाषित नहीं हैं, इसको बढ़ावा देने के विपरीत यह कीट कृषि क्षेत्र में कई स्टार्टअप/कंपनियों को उत्पादन (कीट-आधारित उत्पादों के) को औद्योगिक स्तर तक बढ़ाने और साथ ही वैश्विक बाजारों तक पहुंच स्थापित करने से रोक रहे है।संदर्भ: https://bit.ly/3w9KiI3 https://bit.ly/3w9KmaL https://bit.ly/3QM0ski
स्पर्श - बनावट/वस्त्र
पैनटोन सिस्टम: कैसे तय होता है दुनिया भर में रंगों का एक समान मानक
क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब हम चित्रकारी के लिए रंगों का चयन करते है, तब मानक रंगों की एक सूची के आधार पर हम किसी रंग का चयन करते हैं। वैसे ही, जब हम दुनिया में कहीं भी किसी वस्त्र या कपड़े के रंग का चयन करते हैं, तो हमें उस विशिष्ट रंग के चयन के लिए एक “कलर स्पेस” (Colour space) सिस्टम या ‘कलर शेड कार्ड’ (Colour Shade Card) दिखाया जाता है। यह प्रणाली “पैनटोन” (Pantone) नामक एक अमेरिकी कंपनी का एकाधिकार है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया भर में छोटी या बड़ी सभी कपड़ा बिक्री कंपनियां तथा दुकानें भी मानक रंगों की इस सूची को ही उनके कपड़ों का रंग चुनने हेतु उपयोग में लाती हैं?पैनटोन कंपनी रंग संचार और प्रेरणा सेवाओं की प्रदाता कंपनी है। पैनटोन कंपनी का मुख्यालय अमेरिकी राज्य न्यू जर्सी (New Jersey) के कार्लस्टेड (Carlstadt) शहर में स्थित है। यह कंपनी अपने ‘पैनटोन मैचिंग सिस्टम’ (पीएमएस) [Pantone Matching System, PMS] के लिए जानी जाती है। पीएमएस का उपयोग विभिन्न प्रकार के उद्योगों में, विशेष रूप से ग्राफिक डिजाइन (Graphic design), फैशन डिजाइन (Fashion design), उत्पाद डिजाइन (Product design), छपाई और निर्माण आदि में किया जाता है। पीएमएस द्वारा बनाया गया कलर स्पेस कार्ड, डिजाइन से लेकर उत्पादन तक किसी भी रंग के प्रबंधन का समर्थन करने के लिए, भौतिक या फिर डिजिटल (Digital) स्वरूपों में इस्तेमाल किया जाता है। एक कलर स्पेस या कलर शेड कार्ड में रंगों की एक विशिष्ट मानक व्यवस्था होती है। इस कलर स्पेस से संदर्भ लेकर हम किसी भी रंग को पहचान सकते है। पैनटोन मैचिंग सिस्टम या पीएमएस, जो कि एक मानकीकृत रंग प्रतिकृति प्रणाली है, पूरे विश्व में प्रयुक्त रंगों के लिए एक मानक रंग व्यवस्था के रूप में कार्य करती है, इस प्रणाली का उपयोग विश्व भर में कोई भी किसी विशिष्ट रंग की पहचान करने के लिए कर सकता है। कलर स्पेस, रंगों की एक ऐसी विशिष्ट व्यवस्था है, जो विभिन्न भौतिक उपकरणों द्वारा बनाए जाने वाले रंगों के संयोजन में, रंग के पुनरुत्पादित प्रतिनिधित्व का समर्थन करता है। इस तरह के प्रतिनिधित्व में सादृश्य या डिजिटल प्रतिनिधित्व भी शामिल हो सकता है। किसी विशेष उपकरण या डिजिटल फ़ाइल की रंग क्षमताओं को समझने के लिए “कलर स्पेस” एक उपयोगी वैचारिक उपकरण है। अतः एक कलर स्पेस की मदद से हम किसी भी रंग की सही पहचान कर सकते हैं और बता सकते हैं कि, हमारे कपड़े का मानक रंग कौन सा है।पीएमएस का उपयोग डिजाइनरों को, जब कोई डिजाइन उत्पादन चरण में प्रवेश करता है, तब विशिष्ट रंगों के लिए “रंग मिलान” की अनुमति देना है। फिर चाहे रंग का उत्पादन करने के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले उपकरण कैसे भी हो। इस प्रणाली को ग्राफिक डिजाइनरों एवं पुनरुत्पादन और मुद्रण गृहों द्वारा व्यापक रूप से अपनाया जाता है। हालांकि पीएमएस कलर गाइड्स (Colour Guides) को सालाना खरीदा एवं बदला जाता है, क्योंकि समय के साथ उनकी स्याही थोड़ी फीकी पड़ जाती है। पैनटोन कलर मैचिंग सिस्टम, काफी हद तक एक मानकीकृत रंग प्रतिकृति प्रणाली है। वर्ष 2019 तक इसमें कुल 2161 रंग थे। रंगों को मानकीकृत करके, विश्व के अलग-अलग स्थानों में विभिन्न निर्माता पैनटोन प्रणाली का उपयोग कर यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि रंग एक दूसरे के साथ सीधे संपर्क के बिना मेल खाएं ।ऐसा ही एक प्रयोग सीएमवाईके (CMYK) प्रक्रिया में रंगों का मानकीकरण करना है। सीएमवाईके प्रक्रिया स्याही के चार रंगों, सियान (Cyan), मैजेंटा ( Magenta), पीले (Yellow) और काले (Black) रंग का उपयोग करके प्रिंट करने की एक विधि है। दुनिया की अधिकांश मुद्रित सामग्री इसी प्रक्रिया का उपयोग करके निर्मित की जाती है। सीएमवाईके का उपयोग करके पैनटोन रंगों के एक विशेष उपसमूह को पुन: प्रस्तुत किया जा सकता है। वर्ष 2000 से, पैनटोन कलर संस्था द्वारा एक विशेष रंग को “कलर ऑफ द ईयर (Colour of the year)” भी घोषित किया जाता है। ‘कलर ऑफ द ईयर’ का मतलब एक पूरे वर्ष के लिए किसी विशिष्ट रंग को चुनना है। यह कंपनी एक वर्ष में दो बार विभिन्न देशों के रंग मानक समूहों के प्रतिनिधियों की एक गुप्त बैठक आयोजित करती है। दो दिनों की प्रस्तुतियों और बहस के बाद, इन प्रतिनिधियों द्वारा अगले वर्ष के लिए एक रंग को चुना जाता है ; उदाहरण के लिए, इस साल 2023 की गर्मियों के लिए 2022 में न्यूयॉर्क (New York) में विशेष रंग वीवा मैजेंटा (Viva Magenta) चुना गया था। पैनटोन के साथ–साथ इसकी कुछ प्रतिस्पर्धी कंपनियां भी विश्व में है, जिनका कार्य पैनटोन से थोड़ा बहुत मिलता जुलता है। परंतु आज भी, रंगों के मानकीकरण के लिए दुनिया में पैनटोन का ही बोलबाला है। पैनटोन की प्रतिस्पर्धी कंपनियां निम्न उल्लेखित हैं- डाटाकलर (Datacolor)-अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से रंग मापन, प्रबंधन, संचार और अंशशोधन के लिए समाधान प्रदान करता है। साइनआर्ट (Signart)- वाणिज्यिक, विद्युत, वास्तुकला, वित्तीय, स्वास्थ्य देखभाल, आतिथ्य क्षेत्रों आदि के लिए चिह्नों का निर्माता है। बिनयान स्टूडियोज (Binyan Studios)- एक वास्तुकला से संबंधित और डिज़ाइन कंपनी है।जैम फिल्ड (Jam Filled)- एक डिजिटल एनिमेशन (Animation) स्टूडियो है। इस तरह से हम पैनटोन मैचिंग सिस्टम या कलर स्पेस के आधार पर रंग चुनते हैं। इन प्रणालियों की मदद से हम अपने कपड़ों का रंग भी निर्धारित कर सकते हैं। चूंकि दुनिया के हर एक हिस्से में विभिन्न रंगों के नाम अलग-अलग होते हैं, इसलिए एक विशिष्ट रंग तय करने के लिए इस मानकीकृत प्रणाली को देखा जाना चाहिए।संदर्भhttps://bit.ly/3FHuOjI https://bit.ly/3Tzc4si https://bit.ly/3nenshq https://bit.ly/3M0dt9V
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
दांडी मार्च: नमक सत्याग्रह जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी
महात्मा गांधी, जिन्हें राष्ट्रपिता और बापू के नाम से भी जाना जाता है, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे महान नेताओं में से एक थे। उनका व्यक्तित्व और उनके विचार आज भी हर बच्चे, युवा और वृद्ध के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उन्होंने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए न केवल भारत को स्वतंत्रता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि पूरी दुनिया को शांतिपूर्ण संघर्ष की शक्ति का संदेश भी दिया। उनके नेतृत्व में चलाए गए कई आंदोलनों ने भारतीयों को एकजुट किया और उन्हें अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस दिया।स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए महात्मा गांधी ने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया और देश को आज़ाद कराने के लिए अनेक महत्वपूर्ण आंदोलन चलाए। इन्हीं आंदोलनों में से एक था नमक आंदोलन, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला कर रख दिया। इस आंदोलन को नमक सत्याग्रह या दांडी आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है। इस सत्याग्रह का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों द्वारा नमक पर लगाए गए करों और कठोर नियमों का विरोध करना था, ताकि भारतीय स्वयं नमक बना सकें और उन्हें यह आवश्यक वस्तु उचित मूल्य पर उपलब्ध हो सके। नमक के महत्व को समझते हुए महात्मा गांधी ने इस अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ आवाज उठाई और 12 मार्च 1930 को नमक सत्याग्रह की शुरुआत की, जो 6 अप्रैल 1930 तक चला।इस ऐतिहासिक सत्याग्रह की शुरुआत महात्मा गांधी ने अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से की, जिसका गंतव्य स्थान गुजरात का तटीय गांव दांडी था। दांडी अरब सागर के किनारे स्थित एक ऐसा स्थान था, जहां नमक आसानी से बनाया जा सकता था। इस यात्रा में गांधी जी के साथ 80 सत्याग्रहियों का एक समूह शामिल था, और दांडी पहुंचने में उन्हें 24 दिन का समय लगा। यह सत्याग्रह इतना प्रभावशाली था कि रास्ते में हर आयु वर्ग के लोग इस आंदोलन से जुड़ते चले गए। इस समूह में सबसे कम उम्र के सत्याग्रही 16 वर्षीय विट्ठल लीलाधर ठक्कर थे। गांधी जी ने इस मार्च की जानकारी पहले ही ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड इरविन को एक पत्र के माध्यम से दे दी थी और उनसे अन्यायपूर्ण नमक कानून पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था, लेकिन जब उनकी बात नहीं मानी गई, तब उन्होंने इस सत्याग्रह को शुरू करने का निर्णय लिया।इस सत्याग्रह में भारतीय दुग्ध विभाग के डिप्लोमा धारक और गौ सेवा संघ के एक कार्यकर्ता, 25 वर्षीय थेवरथुंडियिल टाइटस भी शामिल थे। सत्याग्रहियों ने अपनी यात्रा के दौरान अधिकांश समय गांवों में बिताया और अत्यंत साधारण भोजन ग्रहण किया, जिससे यह आंदोलन सादगी और आत्मसंयम का प्रतीक बन गया। इस दौरान कलकत्ता की लिली बिस्किट कंपनी ने सत्याग्रहियों को बिस्कुट देने की पेशकश की, लेकिन महात्मा गांधी ने इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वे इस आंदोलन को पूरी तरह सादगी और आत्मनिर्भरता के सिद्धांतों पर आधारित रखना चाहते थे।इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। गृहिणियों के एक समूह का नेतृत्व कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने किया, जिन्होंने पुलिस के लाठीचार्ज के बावजूद अपना विरोध जारी रखा और पीछे हटने से इनकार कर दिया। जब नमक बनाना शुरू हुआ, तो कमलादेवी द्वारा तैयार किया गया पहला नमक का पैकेट 501 रुपये में नीलाम हुआ, जो इस आंदोलन के प्रति लोगों के समर्थन और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक था।सत्याग्रह की एक महत्वपूर्ण शाम को महात्मा गांधी ने एक विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि यह संभवतः उनका अंतिम भाषण हो सकता है। उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि यदि उन्हें और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया जाए, तब भी आंदोलन को जारी रखा जाना चाहिए। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए इस संघर्ष को आगे बढ़ाएं और स्वतंत्रता की इस लड़ाई में अपने संकल्प को मजबूत बनाए रखें।अपने संबोधन में महात्मा गांधी ने स्पष्ट किया कि आंदोलन की आगामी योजनाओं को उसी प्रकार जारी रखा जाना चाहिए, जैसा पहले निर्धारित किया गया था। उन्होंने स्वयंसेवकों से अनुशासन बनाए रखने और आंदोलन की मर्यादा का पालन करने का आग्रह किया। उनका विश्वास था कि नमक कानून के विरुद्ध शुरू हुआ यह सत्याग्रह जल्द ही पूरे देश में नागरिक प्रतिरोध की एक अखंड धारा बन जाएगा।उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि यह संघर्ष पूरी तरह शांतिपूर्ण और अहिंसक होना चाहिए। उन्होंने लोगों को अपने क्रोध पर नियंत्रण रखने और सत्य तथा अहिंसा के सिद्धांतों को अपनाते हुए आगे बढ़ने की सलाह दी, ताकि आंदोलन की नैतिक शक्ति बनी रहे।अपने भाषण में उन्होंने यह आशा भी व्यक्त की कि यदि उन्हें और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया जाए या वे स्वयं इस संघर्ष को आगे न बढ़ा सकें, तब भी यह आंदोलन रुकना नहीं चाहिए। उन्होंने स्वयंसेवकों और देशवासियों से आह्वान किया कि वे साहस, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प के साथ सविनय अवज्ञा को जारी रखें और स्वराज की प्राप्ति के लिए इस संघर्ष को आगे बढ़ाएं।स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किए गए अपने अथक प्रयासों के दौरान महात्मा गांधी ने कई महत्वपूर्ण आंदोलन चलाए, जिनमें से नमक आंदोलन एक ऐतिहासिक आंदोलन था। ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला देने वाले इस आंदोलन को नमक सत्याग्रह या दांडी आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है। इस सत्याग्रह का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों द्वारा नमक पर लगाए गए करों और प्रतिबंधों को समाप्त करना था, ताकि भारतीय स्वयं नमक बना सकें और इसे सस्ती कीमत पर प्राप्त कर सकें। नमक की उपयोगिता और आवश्यकता को देखते हुए गांधी जी ने इस अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ आवाज उठाई और 12 मार्च 1930 को नमक सत्याग्रह की शुरुआत की, जो 6 अप्रैल 1930 तक चला।इस सत्याग्रह की शुरुआत महात्मा गांधी ने अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से की, जिसका गंतव्य दांडी था। दांडी, गुजरात का एक छोटा तटीय गांव है, जहां नमक बनाना संभव था। इस ऐतिहासिक यात्रा में उनके साथ 80 सत्याग्रही शामिल थे और दांडी पहुंचने में उन्हें 24 दिन लगे। यह आंदोलन इतना प्रभावशाली था कि जैसे-जैसे यह आगे बढ़ा, विभिन्न आयु वर्ग के लोग इसमें शामिल होते गए। इस समूह में सबसे कम उम्र के सत्याग्रही 16 वर्षीय विट्ठल लीलाधर ठक्कर थे। गांधी जी ने इस मार्च से पहले ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड इरविन को एक पत्र लिखकर औपनिवेशिक नीतियों पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था, लेकिन जब कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो उन्होंने सत्याग्रह शुरू कर दिया।संदर्भ: 1. https://tinyurl.com/5n7btcp2 2. https://tinyurl.com/2uf62y9u 3. https://tinyurl.com/4stddkk9
ध्वनि II - भाषाएँ
ब्राह्मी से देवनागरी तक: एक लिपि की ऐतिहासिक यात्रा
देवनागरी, उत्तरी भारत में उपयोग की जाने वाली सर्वाधिक लोकप्रिय लेखन प्रणाली या लिपि है। इसे भारत और नेपाल की आधिकारिक लिपियों में से एक माना जाता है। इसका उपयोग 120 से अधिक भाषाओं को लिखने में किया जाता है। लैटिन वर्णमाला, चीनी लिपि और अरबी लिपि के बाद यह दुनिया में चौथी सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली लेखन प्रणाली बन चुकी है। भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत को लिखने के लिए भी देवनागरी का ही उपयोग किया जाता है। देवनागरी लिपि का विकास 7वीं शताब्दी ई. में शुरू हुआ। यह गुप्त लिपि से बाद के वर्षों में विकसित हुई। 13वीं शताब्दी ई. के आसपास यह लिपि पूर्णतः विकसित हो चुकी थी। देवनागरी में 14 स्वर और 34 व्यंजन सहित कुल 48 मुख्य अक्षर होते हैं। देवनागरी बाएं से दाएं लिखी जाती है और इसमें अक्षरों के शीर्ष पर एक क्षैतिज रेखा होती है। इस रेखा को “शिरोरेखा” कहा जाता है। इसमें विशेषक यानी विशेष चिह्न भी होते हैं, जो अक्षरों की ध्वनि बदलने के लिए उनसे जुड़े रहते हैं। 'देवनागरी' शब्द दो शब्दों 'देव+नागरी' से मिलकर बना है। जहां देव का अर्थ "स्वर्गीय" या "दिव्य", और 'नागरी' का अर्थ "नगर" या "शहर" होता है। इस प्रकार 'देवनागरी' का अनुवाद "देवताओं के शहर" के रूप में किया जा सकता है। प्राचीन समय में इस लिपि का उपयोग मुख्य रूप से धार्मिक ग्रंथों और शिलालेखों में संस्कृत लिखने के लिए किया जाता था, लेकिन साथ ही इसका उपयोग उत्तरी और पश्चिमी भारत में स्थानीय भाषाओं को लिखने के लिए भी किया जाता था। दक्षिण भारत में इसे नंदिनागरी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ "नंदी की लेखनी" होता है। देवनागरी एक बहुत ही बहुमुखी लेखन प्रणाली है, जिस कारण यह सीखने के परिपेक्ष्य में भी बहुत आसान लिपि हो जाती है। अच्छी बात यह है कि “यह लिपि जैसी दिखाई देती है, वैसा ही इसका उच्चारण भी होता है।” पहली नज़र में, देवनागरी अन्य भारतीय लिपियों जैसे बंगाली-असमिया या गुरुमुखी से भिन्न नजर आ सकती है। लेकिन अगर आप करीब से देखेंगे, तो पाएंगे कि कुछ कोणों और जोर को छोड़कर इन सभी में काफी समानताएं हैं। देवनागरी का सबसे पुराना उदाहरण समनगढ़ नामक स्थान में खोजे गए एक अभिलेख में देखने को मिलता है। यह दंतिदुर्ग नामक राजा के समय में लिखा गया था, जो राष्ट्रकूट नामक एक बड़े क्षेत्र पर शासन करता था। इसे वर्ष 754 ई. में लिखा गया था। राष्ट्रकूट साम्राज्य के अन्य राजाओं और पश्चिमी चालुक्यों, यादवों और विजयनगर जैसे अन्य स्थानों / साम्राज्य में भी देवनागरी के प्रारंभिक प्रयोग के उदाहरण देखने को मिलते हैं। देवनागरी की उत्पत्ति “ब्राह्मी” नामक एक अन्य प्राचीन लिपि से हुई है, जिसका उपयोग पूरे भारत में किया जाता था। ब्राह्मी लिपि को वाणी और साहित्य के देवता “ब्रह्मा” द्वारा प्रदत्त माना जाता है। सम्राट अशोक के काल के बाद ब्राह्मी के विकास में तेज गति देखी गई। अशोक ने विभिन्न चट्टानों और स्तंभों पर अपने संदेश ब्राह्मी लिपि में ही लिखे थे। अशोक के बाद ब्राह्मी के विभिन्न प्रकार (सुंगन ब्राह्मी, कुषाण ब्राह्मी और गुप्त लिपि इत्यादि) विकसित हुए।। गुप्त लिपि का प्रयोग उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य के शासनकाल में किया जाता था। गुप्त लिपि, दक्कन और दक्षिण भारत जैसे अन्य स्थानों पर भी देखी गई है, जहाँ यह थोड़ी अलग दिखती है। छठी और सातवीं शताब्दी में गुप्त लिपि से एक अन्य प्रकार की लिपि प्रचलित हुई। इसे “सिद्धमातृका या सिद्धम लिपि” कहा जाता था। इसका उपयोग भारत और मध्य एशिया तथा जापान जैसे अन्य देशों में धार्मिक ग्रंथ लिखने के लिए किया जाता था। सिद्धम लिपि का सबसे पुराना उदाहरण जापान के एक मंदिर में एक पत्ते पर लिखे हुए लेख को माना जाता है। माना जाता है कि देवनागरी सिद्धम लिपि से प्रेरित एक नई तरह की लिपि का नाम है। हालांकि देवनागरी में कुछ ऐसी भी विशेषताएं (जैसे प्रतीकों के शीर्ष पर रेखाएं, तिरछे स्ट्रोक, छोटे कोण या नाखून की तरह दिखने वाले बिंदु आदि।) हैं, जो इसे सिद्धम लिपि से अलग बनाती हैं। ये विशेषताएं नागरी लिपि में भी देखी जाती हैं। 8वीं शताब्दी से देवनागरी का उपयोग राजाओं के नाम और उनके हस्ताक्षर लिखने के लिए किया जाता था। उदाहरण के लिए, गुजरात में जय भट्ट नाम के एक राजा ने देवनागरी लिपि का उपयोग कर संस्कृत भाषा में अपना नाम "स्व हस्तो मम जयभट्टस्य" लिखा था, जिसका अनुवाद व् अर्थ है: "यह मेरे हस्ताक्षर हैं, जय भट्ट" । कई भाषाओं में देवनागरी का उपयोग मुख्य या माध्यमिक लिपि के रूप में किया जाता है। इन भाषाओं में मराठी, पाली, संस्कृत, हिंदी, बोरो, नेपाली, शेरपा, प्राकृत, अपभ्रंश, अवधी, भोजपुरी, ब्रज भाषा, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, मगही, नागपुरी, राजस्थानी, खानदेशी, भीली, डोगरी, कश्मीरी, मैथिली, कोंकणी, सिंधी, मुंडारी, अंगिका, बज्जिका और संथाली शामिल हैं। भारत में पुराने समय में लोग अलग-अलग लिपियों का उपयोग, अलग-अलग उद्देश्यों के लिए करते थे। उदाहरण के लिए, मोदी लिपि, (जिसे तेजी से लिखना आसान होता है), का उपयोग मराठी में रोजमर्रा के लेखन के लिए किया जाता था, जबकि देवनागरी का उपयोग औपचारिक मराठी शिलालेखों के लिए किया जाता था। मुद्रण के आविष्कार से पहले, देवनागरी का उपयोग ज्यादातर पेशेवर लेखकों द्वारा लिखे गए औपचारिक ग्रंथों के लिए किया जाता था। ये ग्रंथ आमतौर पर पांडुलिपियों पर लिखे गए थे। ब्राह्मी से गुप्त और देवनागरी तक के विकास को निम्नलिखित तालिका में दर्शाया गया है। देवनागरी लिपि के अंक निम्नवत दर्शाए गए हैं: आज, देवनागरी का उपयोग तीन प्रमुख भाषाओं (हिंदी (520 मिलियन से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली), मराठी (83 मिलियन से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली), और नेपाली (14 मिलियन से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली) को लिखने के लिए किया जाता है। इस प्रकार यह आधुनिक दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली लिपि है, जिस प्रकार प्राचीन काल में भूतपूर्व ब्राह्मी लिपि थी । साथ ही हिंदी, भारत सरकार की आधिकारिक भाषाओं में से एक है (अंग्रेजी के साथ), जबकि नेपाली, नेपाल की आधिकारिक भाषा है। मराठी, महाराष्ट्र की आधिकारिक भाषा है और इसे गोवा में भी आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। हिंदी का उपयोग पूरे भारत में केंद्र सरकार के संस्थानों द्वारा भी किया जाता है और हिंदी भाषी राज्यों के बाहर दूसरी भाषा के रूप में इसे व्यापक रूप से पढ़ाया और बोला जाता है। देवनागरी का उपयोग भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त कई अन्य भाषाओं (बोडो, मैथिली, कश्मीरी, सिंधी, डोगरी और कोंकणी) को लिखने के लिए भी किया जाता है।प्राचीन भारत में लेखन एक जटिल प्रक्रिया हुआ करती थी। लेखक, श्रोता, संदर्भ और उद्देश्य के आधार पर लोग, एक ही भाषा लिखने के लिए विभिन्न लिपियों का उपयोग करते थे। इसके अलावा विभिन्न सामाजिक वर्गों और धार्मिक समूहों के लोग अलग-अलग लिपियों का उपयोग करते थे। उदाहरण के लिए, ब्राह्मण (पुजारी) अक्सर देवनागरी लिपि का इस्तेमाल करते थे, जबकि मुसलमान अक्सर फारसी-अरबी लिपि का इस्तेमाल करते थे। हालांकि, 19वीं शताब्दी में मुद्रण की शुरुआत ने सब कुछ बदल दिया। मुद्रण तकनीक के आगमन के बाद बड़ी मात्रा में पुस्तकें और अन्य पाठ्य सामग्री तैयार करना संभव हो गया। इससे हस्तलिखित पांडुलिपियों के उपयोग में गिरावट आई और मुद्रित ग्रंथों के उपयोग में वृद्धि हुई। मुद्रित ग्रंथ प्रायः देवनागरी लिपि में लिखे जाते थे। यही कारण है कि देवनागरी अब भारत में सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली लिपि बन गई है। देवनागरी का प्रयोग भारत के बाहर भी किया जाता रहा है। उदाहरण के लिए, सिद्ध मातृका लिपि, जिसका देवनागरी से गहरा संबंध है, पूर्वी एशिया में बौद्धों द्वारा उपयोग की जाती थी। आज भारत में देवनागरी एक अत्यंत महत्वपूर्ण लिपि बन चुकी है और इसका प्रयोग प्रतिदिन लाखों लोग करते हैं। संदर्भ https://tinyurl.com/bdfvwume https://tinyurl.com/2spsrfrr https://tinyurl.com/57mf96ux
खदानें
ग्रेफाइट की अनोखी दुनिया और हमारे जीवन में उसका बढ़ता महत्व
हम सभी का बचपन से लेकर वयस्क होने तक पेंसिल के साथ एक मजबूत भावनात्मक संबंध रहा है! पेंसिल एक बच्चे की पहली कलम होती है। लेकिन क्या आप जानते थे की पेंसिल को बनाने में प्रयुक्त तत्व "ग्रेफाइट" को बहुपयोगी तत्व के रूप में जाना जाता है, जिसका प्रमुख कारण है यह है की इसका उपयोग पेंसिल के अलावा भी अन्य कई बेहद आवश्यक उत्पादों के निर्माण में किया जाता है!ग्रेफाइट (graphite) कार्बन तत्व का एक क्रिस्टलीय रूप होता है, और मानक परिस्थितियों में कार्बन का सबसे स्थिर रूप भी है। पेंसिल, स्नेहक और इलेक्ट्रोड में उपयोग के लिए बड़े पैमाने पर सिंथेटिक और प्राकृतिक ग्रेफाइट की खपत की जाती है। उच्च दबाव और तापमान में यह हीरे में परिवर्तित हो जाता है।ग्रेफाइट प्राकृतिक रूप से रॉक फ्रैक्चर (rock fracture) के भीतर या अनाकार गांठ के रूप में फ्लेक्स (Flex) और नसों के रूप में होता है। ग्रेफाइट की मूल क्रिस्टलीय संरचना हेक्सागोनल कोशिकाओं (hexagonal cells) में दृढ़ता से बंधे कार्बन परमाणुओं की एक सपाट शीट होती है। चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में, दक्षिण-पूर्वी यूरोप में नवपाषाण युग के दौरान, मारिआ संस्कृति (Maria Culture) ने मिट्टी के बर्तनों को सजाने के लिए पहली बार सिरेमिक पेंट (ceramic paint) में ग्रेफाइट का इस्तेमाल किया गया। 1565 से कुछ समय पहले ग्रे नॉट्स के पास ग्रेफाइट के एक विशाल ढेर की खोज की गई थी, जिसे स्थानीय लोगों ने भेड़ों को चिह्नित करने के लिए उपयोगी पाया था। एलिजाबेथ प्रथम (1558-1603) के शासनकाल के दौरान, बोरोडेल ग्रेफाइट (Borodell Graphite) को तोप के गोले हेतु लाइन मोल्ड्स (line moulds) के लिए एक दुर्दम्य सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया गया था। 19 वीं शताब्दी के दौरान, स्टोव पॉलिश, स्नेहक, पेंट, क्रूसिबल, फाउंड्री फेसिंग (Stove Polish, Lubricant, Paint, Crucible, Foundry Facing) और पेंसिल के निर्माण में ग्रेफाइट के उपयोग करने से इसका बहुत विस्तार हुआ, जो जनता के लिए शिक्षा के पहले महान उदय के दौरान शैक्षिक उपकरणों के विस्तार में एक प्रमुख कारक बना।ग्रेफाइट के कुछ वर्तमान उपयोग निम्नवत दिए गए हैं:1. लेखन सामग्री: ग्रेफाइट शब्द ग्रीक भाषा से आया है जिसका अनुवाद 'लिखने के लिए' के रूप में किया जाता है। इस प्रकार ग्रेफाइट का सबसे आम उपयोग पेंसिल में उसका सिरा (Lead) बनाने में होता है। "लेड (Lead)" पेंसिल कोर मिट्टी और ग्रेफाइट के मिश्रण से बने होते हैं, जो एक अनाकार रूप में होते हैं। ग्रेफाइट का उपयोग एक मार्कर के रूप में उत्तरी इंग्लैंड में 16वीं शताब्दी से होता रहा है, जहां स्थानीय किंवदंती कहती है कि चरवाहों ने भेड़ को चिह्नित करने के लिए एक नए खोजे गए ग्रेफाइट का उपयोग किया था।2. स्नेहक/विकर्षक: ग्रेफाइट, स्नेहक जैसे ग्रीस आदि में मुख्य अवयवों में से एक होता है। ग्रेफाइट किसी भी आसन्न सतहों के बीच के घर्षण को कम करता है। यह तेल में एक निलंबन बनाता है और कार के ब्रेक और क्लच जैसे दो चलती भागों के बीच घर्षण को भी कम करता है। ग्रेफाइट 787 डिग्री सेल्सियस (1,450 डिग्री फारेनहाइट) के तापमान तक स्नेहक के रूप में और 1,315 डिग्री सेल्सियस (2,399 डिग्री फारेनहाइट) तक एक एंटी-सीज़ सामग्री (anti-seize material) के रूप में काम करता है। यह शक्तिशाली खनिज एक अच्छे विकर्षक के रूप में कार्य करता है; इसलिए कई निर्माण कंपनियां विकर्षक समाधानों में एक घटक के रूप में ग्रेफाइट का उपयोग करती हैं।3. पेंट: यदि आपको कभी ऐसे पेंट मिले हैं जो दीवारों की सुरक्षा की गारंटी देते हैं, तो आमतौर पर उनमें भी ग्रेफाइट का प्रयोग होता है। फैक्ट्रियां दीवारों हेतु प्रामाणिक सुरक्षा बनाने के लिए पाउडर ग्रेफाइट को पेंट में मिलाती हैं।4. रिफ्रैक्ट्री: ग्रेफाइट एक सामान्य दुर्दम्य सामग्री है क्योंकि यह रासायनिक रूप से बदले बिना उच्च तापमान और सहनशीलता का सामना कर सकता है। इसका उपयोग स्टील और कांच बनाने से लेकर लोहे के प्रसंस्करण तक की निर्माण प्रक्रियाओं में किया जाता है। यह ऑटोमोबाइल ब्रेक लाइनिंग में एक एस्बेस्टस (an asbestos in automobile brake linings) विकल्प भी है।5. परमाणु रिएक्टर: ग्रेफाइट की तेज गति वाले न्यूट्रॉन को अवशोषित करने की क्षमता बहुत अधिक होती है, इसलिए अधिकांश समय, यह खनिज न्यूट्रॉन की प्रतिक्रियाओं को स्थिर या बेअसर करने के लिए बहुत अधिक उपयोग होता है।6. विद्युत उद्योग: क्रिस्टलीय परत ग्रेफाइट का उपयोग कार्बन इलेक्ट्रोड, ब्रश, शुष्क सेल बैटरी और विद्युत उद्योग में आवश्यक प्लेटों के निर्माण में किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि प्राकृतिक ग्रेफाइट को सिंथेटिक ग्रेफाइट में भी संसाधित किया जाता है। इस प्रकार का ग्रेफाइट लिथियम आयन बैटरी (lithium ion batteries) में उपयोगी होता है।7. ग्रेफाइट का उपयोग पेंसिल और स्नेहक में किया जाता है। यह गर्मी और बिजली का अच्छा संवाहक है। इसकी उच्च चालकता इसे इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों जैसे इलेक्ट्रोड, बैटरी और सौर पैनलों में उपयोगी बनाती है। लेकिन ग्रेफाइट के कई औद्योगिक अनुप्रयोग भी है:1. रासायनिक उद्योग में: रासायनिक क्षेत्र में, ग्रेफाइट कई उच्च तापमान अनुप्रयोगों जैसे चाप भट्टियों में फास्फोरस और कैल्शियम कार्बाइड के उत्पादन में कार्यरत होता है। ग्रेफाइट का उपयोग विशिष्ट जलीय इलेक्ट्रोलाइटिक प्रक्रियाओं जैसे हैलोजन (क्लोरीन और फ्लोरीन) के उत्पादन में एनोड के रूप में किया जाता है।2. विद्युत अनुप्रयोग: ग्रेफाइट का उपयोग मुख्य रूप से इलेक्ट्रिक मोटर में कार्बन ब्रश के निर्माण में विद्युत सामग्री के रूप में किया जाता है।3. यांत्रिक अनुप्रयोग: ग्रेफाइट व्यापक रूप से विभिन्न प्रकार के अनुप्रयोगों जैसे पिस्टन रिंग, थ्रस्ट बियरिंग्स, जर्नल बेयरिंग और वैन (Piston Rings, Thrust Bearings, Journal Bearings and Vanes) में इंजीनियरिंग सामग्री के रूप में उपयोग किया जाता है। कार्बन आधारित सील का उपयोग कई विमान जेट इंजनों के ईंधन पंप और शाफ्ट में किया जाता है।माना जा रहा है की मानव निर्मित 'सुपर मिनरल' ग्रेफीन ('Super Mineral' Graphene) बैटरी के लिए बहुत बड़ी क्षमता रखता है। ग्रेफाइट और ग्रेफाइट से व्युत्पन्न ग्रेफीन, दोनों वस्तुओं में आने वाले वर्षों में भारी वृद्धि देखने की उम्मीद की जा रही है। ग्रेफीन ग्रेफाइट की एक 2डी परमाणु परत होती है, जिसे आम तौर पर मैनचेस्टर विश्वविद्यालय (Manchester University) द्वारा विकसित यांत्रिक तकनीक के माध्यम से बनाया गया है। माना जा रहा है कि 2040 तक, दुनिया भर में 530 मिलियन इलेक्ट्रिक वाहन होंगे। इस प्रकार पहले से ही कंपनियां बैटरी तकनीक के अपने उत्पादन को बढ़ा रही हैं, जिसमें टेस्ला और इसकी गीगाफैक्ट्री जैसी कंपनियां (Companies like Tesla and its Gigafactory) सबसे आगे हैं। लिथियम आयन बैटरी में लिथियम की तुलना में 40 गुना अधिक ग्रेफाइट होता है। यह खनिज की बढ़ती मांग के लिए प्रमुख चालकों में से एक है, जो 2020 तक 200% तक बढ़ने के लिए तैयार है। इस मांग ने दिसंबर 2016 और दिसंबर 2017 के बीच ग्रेफाइट की कीमत में 25% की वृद्धि को भी प्रेरित किया।हाल ही में विकसित 'सुपर-मिनरल' भी बैटरी प्रौद्योगिकियों में नाटकीय रूप से सुधार कर सकता है। इस साल की शुरुआत में, सैमसंग ने अपने फोन की बैटरी में ग्राफीन आयन (graphene ion) को शामिल करने की योजना की घोषणा की, जिससे इसे तेजी से चार्ज करने और लंबे समय तक होल्डर चार्ज करने में मदद मिली। विशेषज्ञों के अनुसार "ग्राफीन एक क्रांतिकारी उत्पाद है जो इंटरनेट कनेक्शन को तेज़ बना सकता है, नमक के पानी को फ़िल्टर कर सकता है और फोन स्क्रीन को अटूट बना सकता है! साथ ही यह स्पष्ट रूप से वैश्विक स्तर पर विनिर्माण के परिदृश्य को बदलने के लिए ब्रिटिश कंपनियों की अभिनव क्षमता का एक प्रमुख उदाहरण है।" ग्रेफीन अब तक खोजा गया सबसे मजबूत खनिज है! ग्रेफाइट शुद्ध कार्बन का नरम रूप है, और आमतौर पर प्राकृतिक वातावरण में या तो गुच्छे या द्रव्यमान में पाया जाता है। इसका निर्माण कृत्रिम रूप से किया जा सकता है, लेकिन इस प्रक्रिया की उच्च लागत के कारण, इसे आमतौर पर खनन से ही प्राप्त किया जाता है।ब्राजील, भारत और मेडागास्कर सहित दुनिया भर में ग्रेफाइट का खनन किया जाता है। चीन ग्रेफाइट का सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन प्रदूषण को कम करने और पर्यावरण की रक्षा के लिए देश के प्रयासों के कारण हालिया कमी इसे बदल सकती है।वर्तमान में, ग्रेफाइट का सबसे बड़ा उपयोग स्टील के निर्माण में होता है; 2015 में बैटरियों में केवल 5% ग्रेफाइट का उपयोग किया गया था। हालांकि, यह बदलने के लिए तैयार है, क्यों की ग्रेफीन की भावी उपयोगिता को नजर में रखते हुए स्टील की दिग्गज कंपनी टाटा स्टील भी ग्रेफीन पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है, जिसे प्लास्टिक के साथ मिश्रित किया जा सकता है और अन्य विशेषताओं के साथ नए उत्पादों की तरह पुनर्नवीनीकरण किया जा सकता है। प्रौद्योगिकी और नई सामग्री व्यवसाय के उपाध्यक्ष देबाशीष भट्टाचार्जी के अनुसार “कंपनी का ग्राफीन व्यवसाय लगभग 500 करोड़ रुपये का है, लेकिन विस्तार की योजनाएं अभी भी चल रही हैं, जिसमें ग्राफीन से समृद्ध उत्पादों का निर्यात भी शामिल है। "हमने एमडीपीई और एचडीपीई पाइपों (MDPE and HDPE Pipes) में एक योज्य के रूप में ग्राफीन का व्यवसायीकरण किया है। हम कन्वेयर बेल्ट (conveyor belt) में ग्राफीन का उपयोग कर रहे हैं।ग्राफीन जंग प्रतिरोधी पेंट में भी इस्तेमाल होता है।' टाटा स्टील ने डिजिटल यूनिवर्सिटी केरल (digital university kerala) के साथ समझौता किया है, जो देश का पहला ऑन-कैंपस डिजिटल यूनिवर्सिटी और सेंटर फॉर मैटेरियल्स फॉर इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजीज (सी-मेट) (On-Campus Digital University and Center for Materials for Electronics Technologies (C-MET) है। देश के पहले ग्राफीन अनुसंधान और नवाचार केंद्र के लिए एक वास्तविकता बनने के लिए, इंडिया इनोवेशन सेंटर ग्राफीन और 2 डी सामग्री पारिस्थितिकी के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास, उत्पाद नवाचार और क्षमता निर्माण गतिविधियों का कार्य करेगा।संदर्भhttps://bit.ly/3cHMSyL https://bit.ly/3BeACzT
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
एक स्वर, एक सदी: लता मंगेशकर और भारत की भावनात्मक स्मृति
लता मंगेशकर (1929–2022) केवल एक महान पार्श्वगायिका नहीं थीं, बल्कि 20वीं शताब्दी के भारत की सांस्कृतिक आत्मा की आवाज़ थीं। इंदौर में जन्मी लता जी ने बहुत कम आयु में अपने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर के सान्निध्य में संगीत की शिक्षा प्राप्त की और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण किशोरावस्था में ही पेशेवर गायन शुरू कर दिया। 1940 के दशक के उत्तरार्ध में हिंदी सिनेमा में उनकी पहचान बनी और शीघ्र ही उनकी पतली, स्वच्छ और भावपूर्ण आवाज़ ने पार्श्वगायन की परिभाषा बदल दी। उन्होंने सात दशकों से अधिक लंबे करियर में 30 से अधिक भाषाओं में हज़ारों गीत गाए और भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम युग से लेकर आधुनिक दौर तक अपनी उपस्थिति बनाए रखी। भारत रत्न, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और अनेक राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों से सम्मानित लता जी अनुशासन, साधना और पेशेवर गरिमा की मिसाल मानी जाती हैं।उनकी गायकी ने केवल लोकप्रियता ही नहीं अर्जित की, बल्कि भारत की सामूहिक भावनात्मक स्मृति को आकार दिया। प्रेम, विरह, भक्ति, आशा और देशभक्ति—हर भावना को उन्होंने ऐसी सादगी और सच्चाई से स्वर दिया कि श्रोता अपने जीवन के अनुभव उन गीतों में खोजने लगे। उल्लेखित वीडियो प्रस्तुतियों में भी उनकी वही आत्मीयता और भावनात्मक गहराई स्पष्ट दिखाई देती है, जिसने उनके गीतों को व्यक्तिगत यादों और राष्ट्रीय स्मृतियों का हिस्सा बना दिया। लता मंगेशकर की आवाज़ समय के साथ पुरानी नहीं हुई; वह पीढ़ियों को जोड़ने वाली ध्वनि बनकर भारत की भावनात्मक पहचान में स्थायी रूप से बस गई। संदर्भ:https://tinyurl.com/2eycv83ehttps://tinyurl.com/4595wkufhttps://tinyurl.com/2myfenvb https://tinyurl.com/5vbhahx6
वास्तुकला II - कार्यालय/कार्य उपकरण
भीड़भाड़ से समाधान तक: मेरठ, RRTS और मेट्रो की ऊर्जा दक्ष दुनिया
मेरठ वासियों के लिए हाल ही में एक ऐतिहासिक क्षण आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा क्षेत्रीय तीव्र परिवहन प्रणाली (RRTS) का उद्घाटन किया गया। यह आधुनिक रैपिड ट्रांज़िट प्रणाली, मेट्रो रेल की तरह ही उन्नत तकनीक और ऊर्जा दक्षता पर आधारित है। मेट्रों के प्रति यहां के लोगों की जिज्ञासा किसी से छिपी नहीं है। यह जिज्ञासा जायज़ भी है, क्योंकि मेट्रो रेल प्रणाली शहरों को अनगिनत लाभ प्रदान करती है। मेट्रो से होने वाले अनगिनत लाभों में वाहनों की भीड़भाड़, वायु प्रदूषण और निजी वाहनों पर निर्भरता में कमी आदि शामिल हैं। कई बार एक निजी वाहन के बजाय, मेट्रो से सफ़र करना अधिक सुविधाजनक और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प साबित होता है। आज के इस लेख में, हम यही जानने का प्रयास करेंगे कि बड़े-बड़े शहरों के अनगिनत लोगों को उर्जावान रखने वाली मेट्रो रेल प्रणाली, ख़ुद कैसे उर्जावान रहती है? इसके अलावा, आज हम उन प्रमुख भारतीय कंपनियों के बारे में भी जानने की कोशिश करेंगे, जो मेट्रो ट्रेनों के साथ-साथ संबंधित तकनीक और उपकरणों का डिज़ाइन, निर्माण और आपूर्ति करती हैं।परियोजना संख्या 1351, दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) द्वारा पंजीकृत पहली स्वच्छ विकास तंत्र (CDM) परियोजना है। DMRC, बिजली से चलने वाली मास रैपिड प्रणाली संचालित करती है। यह प्रणाली विभिन्न सेवा लाइनों पर 4-कार या 6-कार रोलिंग स्टॉक का उपयोग करती है। ये सभी ट्रेनें, तीन-चरण एसी ट्रैक्शन मोटर्स (Three-Phase AC Traction Motors) से सुसज्जित हैं। एक पुनर्योजी ब्रेकिंग सिस्टम (Regenerative Braking System) भी है। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस तकनीक की बदौलत, ट्रेनों के ब्रेक लगाने पर बिजली उत्पन्न होती है। इसकी वजह से औसतन, ट्रेनें अपने द्वारा उपयोग की जाने वाली बिजली का लगभग 35% हिस्सा स्वयं ही बना लेती हैं। ये ट्रेनें प्रति किलोमीटर लगभग 5.26 kWh बिजली उत्पन्न करती हैं।ब्रेक लगाने के दौरान उत्पन्न बिजली को सिस्टम में वापस भेज दिया जाता है। इस बिजली का उपयोग उसी ट्रैक पर चल रही अन्य ट्रेनें कर सकती हैं। यह प्रक्रिया राष्ट्रीय ग्रिड (National Grid) पर पड़ने वाले भारी लोड को कम करती है। यदि पुनर्योजी ब्रेकिंग सिस्टम न हो तो, DMRC को राष्ट्रीय ग्रिड से अधिक बिजली खींचने की आवश्यकता पड़ सकती है। इसके अलावा, बिजली संयंत्रों में अक्सर कोयले का इस्तेमाल होता है, जिससे बड़ी मात्रा में CO2 निकलती है। इसलिए, पुनर्योजी ब्रेकिंग का उपयोग करके, DMRC इन उत्सर्जनों को काबू करने में बहुत बड़ी भूमिका निभा रही है। यही उन्नत तकनीक आज देश की आधुनिक मेट्रो और RRTS जैसी प्रणालियों को भी अधिक ऊर्जा दक्ष और पर्यावरण के अनुकूल बनाती है।चलिए, अब भारत की उन प्रमुख कंपनियों के बारे में जानते हैं, जो मेट्रो, रेलगाड़ियों और संबंधित प्रौद्योगिकी और उपकरणों का विनिर्माण कर रही हैं।रेल विकास निगम लिमिटेड (Rail Vikas Nigam Limited): रेल विकास निगम लिमिटेड (Rail Vikas Nigam Limited) की स्थापना 2003 में भारत सरकार द्वारा की गई थी। यह कंपनी रेल मंत्रालय द्वारा सौंपी गई विभिन्न रेल अवसंरचना परियोजनाओं को लागू करने पर ध्यान केंद्रित करती है। RVNL पूरे रेल कोच का निर्माण नहीं करती है। इसके बजाय, यह इन कोचों के संचालन के लिए आवश्यक अवसंरचना को विकसित करती है। रेल परियोजनाओं के अलावा, RVNL प्रमुख शहरों और उपनगरीय क्षेत्रों में मेट्रो लाइनें स्थापित करने का काम भी करती है। अभी तक यह कंपनी 120 परियोजनाएँ पूरी कर चुकी है। साथ ही वर्तमान में 72 परियोजनाएँ कार्यान्वयन में हैं।टीटागढ़ रेल सिस्टम (Titagarh Rail Systems): टीटागढ़ रेल सिस्टम मालवाहक वैगन (Freight Wagons), यात्री कोच (Passenger Coaches), मेट्रो ट्रेन (Metro Trains) तथा जहाज़ों के निर्माण एवं इन्हें बेचने में माहिर है। यह कंपनी भारत के सबसे बड़े वैगन निर्माताओं में से एक है। इसकी उत्पादन क्षमता प्रति वर्ष 8,400 वैगन है। टीटागढ़ के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा भारतीय रेलवे से आता है। जून 2023 में, टीटागढ़ रेल सिस्टम और बीएचईएल (BHEL) के नेतृत्व वाले एक संघ को एक बड़ा ऑर्डर मिला। यह आर्डर 240 बिलियन रुपये का है, जिसके तहत 2029 तक 80 पूरी तरह से असेंबल की गई वंदे भारत स्लीपर ट्रेन सेट (Vande Bharat Sleeper Train Sets) का निर्माण किया जाना है। इसके अलावा, यह संघ इन ट्रेनों का 35 साल तक रखरखाव भी करेगा।टेक्समैको रेल एंड इंजीनियरिंग (Texmaco Rail & Engineering): टेक्समैको रेल (Texmaco Rail), ऐडवेंट्ज़ ग्रुप (Adventz Group) का हिस्सा है। इसे भारतीय रेलवे को वैगनों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता माना जाता है। यह कंपनी मालवाहक कारें (Freight Cars), ऑटो कार वैगन (Auto Car Wagons), लोकोमोटिव बोगियां (Locomotive Bogies), कोच बोगियां (Coach Bogies), हाइड्रो-मैकेनिकल उपकरण (Hydro-Mechanical Equipment) और स्टील कास्टिंग (Steel Castings) बनाती है। टेक्समैको मेनलाइन रेलवे और मेट्रो ट्रैक की डिज़ाइनिंग, आपूर्ति, स्थापना और कमीशनिंग में भी शामिल है। भारतीय रेलवे की मेगा खर्च योजना के बाद रेल वैगनों की मांग काफ़ी हद तक बढ़ सकती है। वैगन निर्माण में अपनी मज़बूत स्थिति को देखते हुए यह मांग टेक्समैको रेल के लिए फ़ायदेमंद हो सकती है।बिटसोर्स सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड (Bitsource Solutions Private Limited): बिटसोर्स सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड उच्च गुणवत्ता वाले रेलवे घटकों के उत्पादन के लिए जानी जाती है। इन घटकों में ब्रेक ब्लॉक (Brake Blocks) और घर्षण सामग्री (Friction Materials) शामिल हैं। यह कंपनी सुरक्षा और विश्वसनीयता के प्रति प्रतिबद्ध नज़र आती है। इस प्रतिबद्धता ने बिटसोर्स को कई रेलवे ऑपरेटरों के लिए एक पसंदीदा आपूर्तिकर्ता बना दिया है।भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (Bharat Earth Movers Limited): भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (Bharat Earth Movers Limited) एक सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी है। यह कंपनी रेल और मेट्रो विनिर्माण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बीईएमएल (BEML) रेल और मेट्रो से जुड़े उत्पादों की एक विविध श्रेणी का उत्पादन करती है। इन उत्पादों में रेल कोच (Rail Coaches), मेट्रो कार (Metro Cars) और अर्थमूविंग उपकरण (Earthmoving Equipment) शामिल हैं। स्वदेशी विनिर्माण में BEML का योगदान वाक़ई में उल्लेखनीय है।उक्त सभी के अलावा, कुछ विदेशी कंपनियां भी हैं, जिन्हें मेट्रो और संबंधित प्रौद्योगिकी के उत्पादन हेतु अनुबंधित किया गया है। जिस प्रकार देश में आधुनिक मेट्रो नेटवर्क का विस्तार हो रहा है और मेरठ में हाल ही में उद्घाटित RRTS जैसी अत्याधुनिक प्रणालियाँ विकसित की जा रही हैं, उसी प्रकार इन वैश्विक कंपनियों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। इन कंपनियों में शामिल हैं:एल्सटॉम (Alstom): एल्सटॉम को स्मार्ट और संधारणीय गतिशीलता (Sustainable Mobility) के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी माना जाता है। कंपनी ने दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (Delhi Metro Rail Corporation) के लिए अत्याधुनिक मेट्रोपोलिस ट्रेनसेट (Metropolis Trainsets) का उत्पादन शुरू भी कर दिया है। यह उत्पादन चरण IV परियोजना के हिस्से के रूप में फरवरी 2024 में शुरू हुआ था। नवंबर 2022 में दिए गए ऑर्डर में 52 ट्रेनसेट (Trainsets) की डिलीवरी शामिल है। प्रत्येक ट्रेनसेट में छह कारें होती हैं। यह परियोजना DMRC की तीन अलग-अलग लाइनों का समर्थन करेगी। इनमें से दो लाइनों को मौजूदा लाइन 7 और लाइन 8 का विस्तार करके बनाया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, एक नई गोल्ड लाइन (Gold Line) (लाइन 10) होगी जो एरोसिटी (Aerocity) को तुगलकाबाद से जोड़ेगी। यह नई लाइन कुल 64.67 किमी की दूरी तय करेगी।चेन्नई मेट्रो रेल अनुबंध (Chennai Metro Rail Contract): 2023 में, चेन्नई मेट्रो रेल लिमिटेड (Chennai Metro Rail Limited) ने जापान की मित्सुई एंड कंपनी लिमिटेड (Mitsui & Co. Ltd.) को ₹163.31 करोड़ का अनुबंध प्रदान किया था। यह अनुबंध 60 किलोग्राम हेड-हार्डेन्ड (Head-Hardened) के 1080 ग्रेड रेल (Grade Rail) की आपूर्ति हेतु किया गया था। इन रेलों का उपयोग मेट्रो परियोजना के दूसरे चरण के 52 किलोमीटर के हिस्से पर चालक रहित ट्रेनों के लिए किया जाएगा। सीएमआरएल (CMRL) के अनुसार, मित्सुई कंपनी कुल 13,885 मेट्रिक टन ग्रेड रेल की आपूर्ति करेगी। इन रेलों का उत्पादन और परीक्षण अप्रैल 2023 में शुरू हुआ। रेल की आपूर्ति तीन लॉट में होगी। ये डिलीवरी सितंबर 2023 और फरवरी 2025 के बीच निर्धारित की गई है। पूरा चरण-2 प्रोजेक्ट (Phase-2 Project) 118.9 किलोमीटर तक फैला है और इसमें तीन कॉरिडोर (Corridors) शामिल हैं। इस परियोजना के 2026 तक पूरा होने की उम्मीद है।संदर्भhttps://tinyurl.com/2xlfuzsk https://tinyurl.com/2yektff6 https://tinyurl.com/2a6tjxpb https://tinyurl.com/27kjanps https://tinyurl.com/24x6cpqr
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
होली की अनोखी परंपराएं और रंगों से जुड़ी रोचक सांस्कृतिक विरासत
अपने चटख रंगों, पानी और तमाम तरह की मस्तियों के कारण होली को मजाक-मस्ती करने वाले लोगों द्वारा अत्यधिक पसंद किया जाता है। यह त्यौहार अपने साथ बहुत उत्साह और उमंग लेकर आता है, जिसमें अत्यंत उत्साह-पूर्ण मजाक लोगों द्वारा किये जाते हैं। कपड़ों से लेकर खाद्य पदार्थों तक, सभी चीजें इस मस्ती भरे उत्सव के लिए विशेष रूप से चुनी जाती हैं। इस त्यौहार को लेकर कई मजेदार परंपराएं भी हमारे समाज में मौजूद हैं। होलिका दहन के अलावा, होली को सही मायने में मनाने के कई अन्य पारंपरिक तरीके हैं। चूंकि, हमारे देश में अलग-अलग सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोग रहते हैं, इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है, कि यहां होली के त्यौहार के संबंध में बहुत सारी अलग-अलग परंपराएं मौजूद हैं। ये परंपराएं इस त्यौहार को और भी अधिक मजेदार बनाती हैं, हालांकि, कुछ रस्में अजीब भी प्रतीत होती हैं। इन विचित्र परंपराओं में उत्तर प्रदेश की लठमार होली, हुरंग होली, बिच्छू की होली, राजस्थान की हाथी होली, पंजाब में होला मोहल्ला आदि शामिल हैं। तो चलिए सबसे पहले बात करते हैं, लठमार होली की, जिसमें महिलाओं द्वारा पुरूषों पर लाठी मारकर होली मनायी जाती है। उत्तर प्रदेश में मथुरा जिले के सभी हिस्सों से हजारों पुरुष बरसाना नामक गाँव के राधा रानी मंदिर में आते हैं। एक छोटे से अनुष्ठान समारोह के बाद, हर कोई मंदिर परिसर और उसके सामने बनी प्रसिद्ध 'रंग रंगीली गली' में एकत्रित होता है। सबसे पहले महिलाओं द्वारा पुरुषों पर रंग लगाया जाता है। ग्रामीणों द्वारा लोक गीत गाए जाते हैं, तथा महिलाओं द्वारा नृत्य किया जाता है। मिठाई की दुकानों पर भांग से बनी ठंडाई को सबको परोसा जाता है। अगले दिन, पुरुष फिर से बरसाना पहुंचते हैं, और इस बार वे गाँव की महिलाओं पर रंग डालने की कोशिश करते हैं। फिर, महिलाएं लाठियां लेती हैं और पुरुषों को पीटने की कोशिश करती हैं तथा पुरूष खुद को ढाल से बचाने की कोशिश करते हैं। यह सब मजाक में किया जाता है और हर कोई इकट्ठा होकर इस मजाक में भाग लेता है। इस परंपरा को निभाने का कारण भगवान कृष्ण और राधा से जुड़ा हुआ है। किवदंती के अनुसार भगवान कृष्ण नंदगांव से राधा की नगरी बरसाना में आया करते तथा राधा और उनकी सहेलियों को छेड़ा करते। परिणामस्वरूप उन्हें बरसाना से निकाल दिया जाता। इस प्रकार हर साल जब भी नंदगांव से पुरूष बरसाना जाते, तब उन पर महिलाओं द्वारा लाठियों से प्रहार किया जाता। पुरुष खुद को बचाने की कोशिश करते, लेकिन जो बचने में असफल हो जाते, उन्हें महिलाओं द्वारा पकड़ लिया जाता तथा महिला का परिधान पहनाकर सार्वजनिक रूप से नृत्य करवाया जाता। तब से इस परंपरा को मथुरा जिले में निभाया जा रहा है। जबकि, होली के कुछ दिन पहले मनायी जाने वाली लठमार होली से लगभग सभी लोग परिचित हैं, वहीं मथुरा के निकट दाऊजी मंदिर में हुरंगा उत्सव की जानकारी कम ही लोगों को है। होली के एक दिन बाद मनाया जाने वाला हुरंगा उत्सव एक विचित्र अनुष्ठान है। दाऊजी मंदिर में सुबह के दर्शन के तुरंत बाद, बलदेव और पड़ोसी गांवों के लगभग 10,000 भक्त मंदिर प्रांगण में इकट्ठा होते हैं। इसके दो घंटे बाद मंदिर परिसर लड़ाई का मैदान बन जाता है। पुरुष महिलाओं पर केसरी रंग का पानी डालते हैं, तथा बदले में महिलाएं पुरुषों की कमीज फाड़कर उन्हें उससे पीटती हैं। सामान्य रूप से यह खेल देवर और भाभी के बीच खेला जाता है। होली की एक अन्य विचित्र परंपरा इटावा जिले की ताखा तहसील के सौंथाना गाँव में भी देखने को मिलती है, जहां लोग होली के अवसर पर बिच्छुओं के साथ खेलते हैं तथा उनकी पूजा करते हैं। अनुष्ठान के दौरान, लोग भाईसन (Bhaisan) देवी टीला में इकट्ठा होते हैं, तथा ढोल बजाकर 'फाग' (लोकगीत) गाते हैं। वे भाईसन देवी टीला की चट्टानों से बिच्छू पकड़ते हैं तथा उन्हें अपने शरीर के विभिन्न हिस्सों पर डालते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है, कि बिच्छू उन्हें काटते नहीं हैं। माना जाता है कि, होली के दिन 'फाग' सुनने पर, बिच्छू अपने आप झाड़ियों से निकलकर टीले में आ जाते हैं। फाग गाने के बाद, बिच्छुओं को वापस उसी स्थान पर छोड़ दिया जाता है। राजस्थान में इस मस्ती भरी होली को हाथियों के साथ मनाया जाता है। जयपुर शहर में, हाथियों के लिए एक सौंदर्य प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। यहां हाथियों की शोभायात्रा निकाली जाती है, तथा उनके बीच रस्साकशी का खेल भी आयोजित किया जाता है। पंजाब में सिख इस त्यौहार को एक योद्धा शैली में मनाते हैं। वे आनंदपुर साहिब में होला मोहल्ला नामक एक प्रदर्शनी आयोजित करते हैं, जिसमें मार्शल आर्ट (Martial arts), कुश्ती, तलवार-बाजी आदि का प्रदर्शन किया जाता है। वाराणसी में, होली के मौके पर श्मशान घाट की राख को रंगों के साथ मिलाया जाता है तथा उससे होली खेली जाती है। वे ऐसा इसलिए करते हैं, क्यों कि, उनका मानना है, कि मृत्यु मोक्ष का मार्ग है और हमें मृत्यु से नहीं डरना चाहिए। इसी प्रकार की विचित्र परंपराओं का अनुसरण देश के विभिन्न हिस्सों में किया जा रहा है।संदर्भ: https://bit.ly/3covgoL https://bit.ly/3fh51Cs https://bit.ly/3w0z87k https://bit.ly/3faXpl8
महासागर
22-03-2026 09:02 AM • Meerut-Hindi
ग्लास बीच की अनोखी कहानी और समुद्र तट पर बने कांच के प्राकृतिक रत्न
समुद्र तट या बीच (Beaches) हमारी प्रकृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यहां हमें कई चीजें दिखाई दे सकती हैं, लेकिन टूटे हुए कांच के समूह का यहां मौजूद होना किसी आश्चर्य से कम नहीं है।कैलिफोर्निया (California, USA) के फोर्ट ब्रैग (Fort Bragg) में ग्लास बीच (Glass Beach) लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है, जिसके समुद्र तट में पॉलिश (polish) किए गए कांच के चमकदार छोटे टुकड़े पाए जाते हैं। दशकों से स्थानीय समुदायों ने अपने अवांछित सामान, यहां तक कि कारों को समुद्र के किनारे फेंक दिया था। यहां मौजूद कार्बनिक चीजें समय के साथ सड़ गईं, तथा धातु की वस्तुओं में या तो जंग लग गया, या उन्हें कहीं और ले जाया गया। लेकिन टूटे हुए कांच वहीं मौजूद रहे तथा समुद्र की लहरों के टकराव के कारण मुलायम टुकड़ों में परिवर्तित हो गए। यह समुद्र तट अब कानून द्वारा संरक्षित है, और यहां मौजूद प्रतिष्ठित कांच को आगंतुकों द्वारा हटाया नहीं जा सकता है। दुनिया भर के अन्य स्थानों में भी समुद्री कांच की उच्च सांद्रता है, जिसके लिए उन लोगों को धन्यवाद देना चाहिए, जिन्होंने कांच इन स्थानों में फेंका है। साइबेरिया (Siberia) में उससुरी (Ussuri) खाड़ी कांच बनाने वाली फैक्ट्रियों का केंद्र है, जो कांच अपशिष्ट को समुद्र में फेंक देते हैं। यहां अब समुद्र तट पत्थरों और समुद्री कांच का एक रंगीन मिश्रण बन गया है।
मैमथ के रहस्य जीवाश्म और प्राचीन मानव इतिहास की रोचक कहानी
मैमथ (Mammoth), आधुनिक हाथियों के प्राचीन रिश्तेदार हुआ करते थे जो, लगभग 50,000 ईसा पूर्व से 10,000 ईसा पूर्व के दौरान हमारी पृथ्वी पर घूमा करते थे। ये काफी हद तक हाथियों जैसे दिखते थे, लेकिन वास्तव में हाथियों से बहुत बड़े होते थे। मैमथ का वैज्ञानिक नाम 'मैमुथस प्राइमिजीनियस' है, और अब यह पूरी तरह से विलुप्त हो चुके हैं। सालों पहले भारतीय वैज्ञानिकों को कॉर्बेट नेशनल पार्क (Corbett National Park) में इन्हीं का एक विशाल जीवाश्म मिला था। यद्यपि, भारत में अभी तक मनुष्यों द्वारा तराशे कोई भी मैमथ हाथी दांत नहीं मिले हैं। लेकिन जर्मनी (Germany) की वोगेलहर्ड नामक एक गुफा (Vogelherd Cave) में शोधकर्ताओं को अलग-अलग जानवरों के आकार की, बारीकी से शानदार नक्काशी किये हुए विशाल मैमथ के दांत मिले हैं । वोगेलहर्ड गुफा, दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी में पूर्वी स्वाबियन जुरा (Eastern Swabian Jura) नामक स्थान में मौजूद है। यह गुफा चूना पत्थर की चट्टान से बनी है। शोधकर्ताओं की इस गुफा पर नजर 1931 में पड़ी जब उन्हें इसके अंदर कुछ छोटी-छोटी मूर्तियां मिलीं। दरअसल 23 मई, 1931 में, हरमन मोन (Hermann Mohn) नामक एक व्यक्ति को यहां पर फ्लिंटस्टोन (Flintstones) के कुछ टुकड़े मिले। इसके बाद उन्होंने ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय (University Of Tübingen) को अपनी खोज के बारे में बताया। उसी वर्ष, ट्यूबिंगन के गुस्ताव रीक (Gustav Rieck) नामक एक वैज्ञानिक ने 15 जुलाई से 1 अक्टूबर 1931 तक तीन महीने तक इस गुफा में खुदाई की। इसके बाद जाकर उन्हें इस बात के प्रमाण मिले कि, “इस स्थान पर मनुष्य रहते थे, क्योंकि यहाँ पर उन्हें पुराने पाषाण युग से लेकर कांस्य युग तक, विभिन्न समय अवधि के औजार और अन्य वस्तुएँ मिलीं।” यहाँ उन्हें ऑरिग्नेशियाई काल (Aurignacian Period) की मिट्टी की एक परत में विशाल हाथी दांत से बनी कई छोटी-छोटी आकृतियाँ भी मिलीं। इन आकृतियों में बिंदु, रेखाएं और एक्स-आकार के निशान जैसी सजावट भी की गई थी। ये निशान यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि उनका उपयोग धार्मिक या अनुष्ठानिक उद्देश्यों के लिए किया गया होगा। साथ ही यहाँ पर उन्हें गहने और हाथी दांत से बनी बांसुरी के टुकड़े भी मिले। ये सभी कलाकृतियाँ ऊपरी पुरापाषाण काल (Upper Paleolithic) के दौरान ऑरिग्नेशियाई संस्कृति (Aurignacian Culture) के प्रारंभिक मनुष्यों द्वारा विशाल ऊनी मैमथ हाथी दांत से बनाई गई थीं। इन्हें दुनिया की सबसे पुरानी ज्ञात कला कृतियों में से एक माना जाता है। 2017 में इन्हें यूनेस्को (UNESCO) द्वारा, विश्व धरोहर स्थलों की सूची में भी शामिल कर लिया गया था। इन मूर्तियों में शामिल है: जंगली घोड़ा: यह एक घोड़े की मूर्ति है, जो लगभग 30,000 - 29,000 वर्ष पुरानी है। यह मूर्ति बहुत सटीक आकार की है। जानकार मानते हैं कि यह एक आक्रामक या प्रभावशाली घोड़े का प्रतिनिधित्व करती है। इसका केवल सिर ही पूरी तरह सुरक्षित है।शेर का सिर: यह मूर्ति लगभग 40,000 वर्ष पुरानी है। इसे 1931 में अधूरे सिर के साथ खोजा गया था। इसका एक अन्य खोया हुआ टुकड़ा 2005 और 2012 के बीच खुदाई के दौरान खोजा गया था और इसके बाद दोनों को सफलतापूर्वक पुनः जोड़ा गया था, जिससे यह पुष्टि हुई कि मूर्ति वास्तव में एक त्रि-आयामी मूर्तिकला है। इसकी रीढ़ पर लगभग 30 बारीक कटे हुए क्रॉस (Cross) हैं।मैमथ: यह लगभग 35,000 वर्ष पुरानी ऊनी मैमथ (Wooly Mammoth) की मूर्ति है। यह पूरी मूर्ति पूरी तरह से अक्षुण्ण (Intact) है, और इसमें विस्तृत नक्काशी की गई है। यह अपने पतले आकार, नुकीली पूंछ, मजबूत पैरों और गतिशील रूप से घुमावदार धड़ के कारण इन सभी में सबसे अलग दिखती है। वोगेलहर्ड गुफा में खोजी गई ऊनी मैमथ की यह नक्काशी बहुत छोटी (केवल 3.7 सेमी लंबी और वजन केवल 7.5 ग्राम) है। इसके अलावा शोधकर्ताओं को यहां पर 200,000 से अधिक पत्थर के औजार, हड्डी और हाथी दांत से बने औजार, पक्षियों की हड्डियों सहित अन्य जानवरों की लगभग 500 किलोग्राम हड्डियां और 28 किलोग्राम विशाल हाथी दांत मिले। यदि हम भारत में मैमथ की उपस्थिति पर नजर डालें तो ओडीशा राज्य के जाजपुर ज़िले सहित 2019 में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (Corbett Tiger Reserve) के बिजरानी क्षेत्र में भी एक 'विशाल मैमथ” का जीवाश्म खोजा गया। इस खोज ने वन्य जीवन रूचि रखने वाले लोगों और वैज्ञानिकों के बीच उत्सुकता बड़ा दी है। एमपीएस बिष्ट (MPS Bisht) नामक एक भूविज्ञानी, जो उत्तराखंड अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के निदेशक भी हैं और इस जीवाश्म की खोज करने वाली टीम का हिस्सा थे, के अनुसार यह विशाल मैमथ का एक का जबड़ा है और लगभग 1.2 मिलियन वर्ष पुराना हो सकता है। लेकिन इसकी पुष्टि के लिए उन्हें और परीक्षण करने की जरूरत है। हालांकि कश्मीर में गैलेंडर पंपोर नामक एक जगह में भी इसी तरह के एक मैमथ के जीवाश्म मिलने का दावा किया गया था। लेकिन अब शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि, गैलेंडर पंपोर में पाए गए जीवाश्म वास्तव में मैमथ के नहीं, बल्कि किसी अन्य प्राचीन हाथी के हैं। हाथी की खोपड़ी से पता चलता है कि वह पेलियोलोक्सोडोन प्रजाति (Palaeoloxodon Species) का था और लगभग 50 वर्ष का था। जीवाश्मों के साथ-साथ यहां पर प्रारंभिक मध्य पुरापाषाण युग के पत्थर के औजार भी खोजे गये हैं। ये सभी जीवाश्म और पत्थर के औजार अब जम्मू विश्वविद्यालय के प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय में रखे गए हैं। हालांकि इस जीवाश्म के कुछ हिस्से 2004 के बाद चोरी हो गए या नष्ट हो गए थे। मैमथ (Mammoth), आधुनिक हाथियों के प्राचीन रिश्तेदार हुआ करते थे जो, लगभग 50,000 ईसा पूर्व से 10,000 ईसा पूर्व के दौरान हमारी पृथ्वी पर घूमा करते थे। ये काफी हद तक हाथियों जैसे दिखते थे, लेकिन वास्तव में हाथियों से बहुत बड़े होते थे। यद्यपि, भारत में अभी तक मनुष्यों द्वारा तराशे कोई भी मैमथ हाथीदांत नहीं मिले हैं। लेकिन जर्मनी की वोगेलहर्ड नामक एक गुफा में, शोधकर्ताओं को शानदार नक्काशी के साथ विशाल मैमथ के दांत मिले हैं, जिन्हें मनुष्यों द्वारा अलग-अलग जानवरों के आकार में उकेरा गया है।
काली मिर्च: स्वाद, खेती और वैश्विक व्यापार की एक रोचक यात्रा
भारत को “मसालों का देश” कहा जाता है। देश में ढेरों मसालों के बीच काली मिर्च का तड़का हमारे स्वादिष्ट व्यंजनों में जान फूंक देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मिर्च की भांति बिल्कुल भी नहीं दिखाई देने वाली, “काली मिर्च” भारत के मसाला व्यापार में भी जान फूंक देती है। चलिए जानते हैं कैसे? काली मिर्च ‘पाइपर नाइग्रम’ (Piper Nigrum) नामक पौधे में उगने वाला सूखा कच्चा फल होती है। अपनी तेज़ गंध, स्वाद और औषधीय गुणों के कारण काली मिर्च, दुनियाभर के सबसे लोकप्रिय मसालों में से एक मानी जाती है। भारत दुनिया में काली मिर्च के सबसे प्रमुख उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक देशों में से एक है। भारत में काली मिर्च की खेती मुख्य रूप से केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु तथा सीमित मात्रा में महाराष्ट्र, उत्तर पूर्वी राज्यों और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में की जाती है। देश में काली मिर्च का सर्वाधिक उत्पादन केरल और कर्नाटक राज्य में होता है। काली मिर्च 10 मीटर ऊंचाई तक फूलों वाली लताओं (Vine) पर उगती है। यह लताएँ सिल्वर ओक (Silver Oak) जैसे ऊंचे पेड़ों के सहारे बढ़ती हैं। लतायें पहली बार चौथे या पाँचवें वर्ष के बाद फल देना शुरू करती हैं और उसके बाद सात वर्षों तक फल देती रहती हैं। 7वीं शताब्दी से पहले, काली मिर्च की लतायें केवल जंगलों में उगती थीं। काली मिर्च नम उष्णकटिबंधीय पौधा है, जिसके लिए उच्च वर्षा और आर्द्रता की आवश्यकता होती है। भारत में पश्चिमी घाट के उपपर्वतीय इलाकों की गर्म और आर्द्र जलवायु, काली मिर्च की खेती लिए आदर्श मानी जाती है। यह फसल 20° उत्तर और दक्षिण अक्षांश के बीच तथा समुद्र तल से 1500 मीटर की ऊंचाई तक सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। यह फसल 10° से 40°C के बीच का तापमान सह सकती है। लेकिन बेहतर उत्पादन के लिए आदर्श तापमान 28°C के औसत के साथ 23 -32°C के बीच माना जाता है। जड़ की वृद्धि के लिए मिट्टी का इष्टतम तापमान 26° से 28°C होना चाहिए। काली मिर्च की बेहतर पैदावार के लिए तकरीबन 125-200 से.मी (cm) की अच्छी तरह से वितरित वार्षिक वर्षा को आदर्श माना जाता है। काली मिर्च को 5.5 से 6.5 हाइड्रोजन क्षमता (Potential of Hydrogen(P.H) value) के साथ विविध प्रकार की मिट्टी में उगाया जाता है, हालांकि, प्राकृतिक तौर पर यह लाल लैटेराइट मिट्टी में अच्छी तरह से उगती है। भारत में काली मिर्च की 75 से अधिक किस्मों की खेती की जाती है। केरल में उगाई जाने वाली ‘करीमुंडा’ (Karimunda) काली मिर्च की सबसे लोकप्रिय किस्म है। काली मिर्च की अन्य महत्वपूर्ण किस्मों में ‘कोट्टनादन’ (Kottanadan) (दक्षिण केरल), ‘नारायणकोडी’ (Narayankodi) (मध्य केरल), ‘एम्पिरियन’ (Empirian) (वायनाड), ‘नीलामुंडी’ (Neelamundi) (इडुक्की), ‘कुथिरावली’ (Kuthiravalli) (कोझिकोड और इडुक्की), ‘कल्लुवली’ (Kalluvalli) (उत्तरी केरल), ‘मल्लिगेसरा’ और ‘उद्दगरे’ (Malligesara and Uddagare) (कर्नाटक) शामिल हैं।
क्या आप जानते है कि काली मिर्च दुनिया के उन सबसे शुरुआती मसालों में से एक थी, जिनका व्यापार किया गया था। व्यापारिक दुनिया में काली मिर्च कई ऐतिहासिक घटनाओं की गवाह भी रही है। माना जाता है कि काली मिर्च के व्यापार के परिणामस्वरूप ही प्रसिद्ध मसाला मार्गों (Spice Routes) की खोज हुई थी। साथ ही मसाला मार्गों की बदौलत ही वैश्वीकरण की शुरुआत हुई थी। 30 ईसा पूर्व में प्रारंभिक रोमन साम्राज्य (Roman Empire) ने मिस्र पर विजय प्राप्त करने के बाद भारत में मालाबार तट से विदेशी मसालों की श्रृंखला तक सीधी पहुंच हासिल की थी। उस समय काली मिर्च की कीमत का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उस दौरान हूणों (Huns) द्वारा घिरे रोम को मुक्त करने के लिए फिरौती के रूप में सोने, चांदी और रेशमी अंगरखे के साथ-साथ 3,000 पाउंड काली मिर्च की मांग की गई थी। काली मिर्च, को आज भी काला सोना कहा जाता है। मध्य युग में इसका प्रयोग मुद्रा के रूप में भी किया जाता था। इसके अलावा किसी भी महंगी चीज के लिए “काली मिर्च के बराबर प्रिय” शब्द का प्रयोग किया जाता था। मध्य युग के दौरान काली मिर्च की कीमतें बहुत अधिक थीं। इस दौरान काली मिर्च का व्यापार पूरी तरह से रोमनों के अधीन था। 15वीं शताब्दी के मध्य में, पुर्तगाल पूरे यूरोप (Europe) में अग्रणी समुद्री राष्ट्र था। इसी समयान्तराल में नाविक प्रिंस हेनरी (Prince Henry) के नेतृत्व में, रोमनों के एकाधिकार को तोड़ने तथा पूर्व से विदेशी मसालों पर पकड़ बनाने के लिए भारत तक एक समुद्री मार्ग खोजने के प्रयास भी चल रहे थे। इसके परिणाम स्वरूप पुर्तगाली खोजकर्ता ‘वास्को डी गामा’ (Vasco Da Gama) को भारत आने के लिए नियुक्त किया गया। वह मध्य पूर्व और मध्य एशिया के माध्यम से ‘रेशम मार्ग’ (Silk Road) से बचते हुए, अफ्रीका के चारों ओर घुमावदार मार्ग लेते हुए यूरोप से भारत जाने वाले पहले व्यक्ति बने। वास्को डी गामा की सफल यात्रा, भारत पर पुर्तगाली उपनिवेशवाद के 450 वर्षों की शुरुआत मानी जाती है। दरसल, इस दौरान मसाले औषधीय रूप से महत्वपूर्ण माने जाते थे। किंतु वे केवल पूर्व के उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ही उगते थे, जिससे पश्चिम में उनकी बहुत मांग थी। इन मसालों का खाद्य-सुगंधित स्वादों के साथ-साथ औषधि, जहर के लिए मारक, मलहम और कुछ का तो अगरबत्ती के रूप में भी उपयोग किया जाता था। लगभग एक सदी तक मसालों के व्यापार पर पुर्तगालियों का वर्चस्व रहा। हालांकि, इस वर्चस्व को डचों (Dutch) द्वारा समाप्त कर दिया गया और 1635 की शुरुआत में अंग्रेजों ने काली मिर्च के बागान स्थापित किए।
वर्तमान में, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु भारत के शीर्ष तीन काली मिर्च उत्पादक राज्य हैं। 2008 से 2012 के बीच कर्नाटक में इसका उत्पादन दोगुने से अधिक हो गया है। लेकिन इसी अवधि के दौरान केरल में यह उत्पादन आधे से भी कम हो गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि धीरे-धीरे किसान बहु-फसल और इलायची जैसी जल्दी उगने और महंगी बिकने वाली फसलों की ओर बढ़ रहे हैं। काली मिर्च के वैश्विक व्यापार में भारत, वियतनाम (Vietnam) और ब्राजील (Brazil) का दबदबा है। भारत काली मिर्च के दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक एवं निर्यातक देशों में से एक है, जो दुनिया की 34% काली मिर्च का उत्पादन करता है। सूखी और पकी हुई काली मिर्च का उपयोग प्राचीन काल से ही स्वाद और पारंपरिक औषधि दोनों के लिए किया जाता रहा है। काली मिर्च दुनिया में सबसे अधिक कारोबार किया जाने वाला मसाला है।
काली मिर्च के वैश्विक बाजार को एशिया-प्रशांत (Asia-Pacific), यूरोप, उत्तरी अमेरिका (North America), दक्षिण अमेरिका (South America) और मध्य पूर्व और अफ्रीका (Africa) में विभाजित किया गया है। उत्पादन और निर्यात के मामले में एशिया-प्रशांत वैश्विक काली मिर्च बाजार पर हावी माना जाता है। वियतनाम (Vietnam) दुनिया भर में काली मिर्च का सबसे बड़ा निर्यातक है, क्योंकि काली मिर्च के पौधे उगाने के लिए वहां की जलवायु और परिस्थितियां अनुकूल मानी जाती हैं। ‘वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय’ के मसाला बोर्ड (Spices Board) द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में कोविड-19 (COVID-19) महामारी की संकटग्रस्त स्थिति के बावजूद भी भारत से काली मिर्च के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। काली मिर्च जैसे भारतीय मसाले दुनिया के सबसे लोकप्रिय मसालों में से एक हैं। जब काली मिर्च की मांग बढ़ने की बात आती है तो भारत स्वयं भी हमेशा से ही अग्रणी राष्ट्र रहा है। हमारा देश इस लोकप्रिय मसाले का एक प्रमुख निर्यातक भी रहा है। आंकड़ों के अनुसार 2020-2021 के दौरान भारत से काली मिर्च का निर्यात काफी बढ़ा है। संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) काली मिर्च का दुनिया में सबसे बड़ा आयातक (कुल आयात का 16.2% हिस्सा) है।
अमेरिका के बाद नीदरलैंड (Netherlands), जर्मनी (Germany), यूके (UK) और जापान (Japan) हैं। यह देश दुनिया भर में आयात की जाने वाली कुल काली मिर्च का 50% से अधिक हिस्सा आयात करते हैं। वियतनाम अभी भी दुनिया का सबसे बड़ा काली मिर्च उत्पादक और निर्यातक देश है। 2022 में, वियतनाम का निर्यात 220,000 टन होने का अनुमान था, जो दुनिया भर में कुल काली मिर्च उत्पादन का 55% है। काली मिर्च को एक बुनियादी खाद्य मसाला माना जाता है, और संभवतः खाने की मेज पर नमक के साथ रखा जाने वाला एक मसाला है। किसने सोचा होगा कि खाने की मेज पर छोटी सी शीशी में रखी जाने वाली काली मिर्ची का दुनिया के व्यापार इतिहास पर इतना प्रभाव रहा होगा?
मेरठ के प्रसिद्ध व्यंजन: हलवा-पराठा और शहर की स्वादिष्ट खान-पान परंपरा
हम जानते हैं कि हमारे मेरठ शहर को खेल नगरी कहा जाता है। हालांकि मेरठ कैंची, खेल के सामान और गजक पट्टी के लिए भी विशेष रूप से प्रसिद्ध है। लेकिन इन सभी चीजों के अलावा एक अन्य ऐसी चीज है, जो इसे स्वर्ग बनाती है और वह है यहां का स्वादिष्ट व्यंजन। हमारा शहर अपने खान-पान के लिए भी बहुत मशहूर है। समृद्ध व्यंजनों के प्रति मेरठ के लोगों का प्रेम किसी से छिपा नहीं है। यहां का अनोखा स्थानीय भोजन पूरे देश में लोकप्रिय है। यहां के हलवा-पराठे की रेसिपी और इसका स्वाद सौ साल पुराना है। हलवा पराठा का नाम सुनते ही नौचंदी मेले की याद ताजा हो जाती है। तो आइए आज हम यहां के कुछ मशहूर स्थानीय व्यंजनों को देखते हैं और उनका मजा लेते हैं।
ब्लैक सोल्जर फ्लाई से पशुधन चारे के संकट का उभरता समाधान
एक या अधिक पशुओं के समूह को, जिन्हें कृषि सम्बन्धी परिवेश में भोजन, रेशे तथा श्रम आदि सामग्रियां प्राप्त करने के लिए पालतू बनाया जाता है, पशुधन के नाम से जाने जाते हैं। आपको बता दें कि उत्तर भारतीय राज्यों के किसानों को गेहूं उत्पादन के अभाव के कारण सूखे चारे की कमी का सामना करना पड़ रहा है। गेहूं की उपज में कमी के कारण कई उत्तरी राज्यों में पशुओं के चारे को लेकर संकट पैदा हो गया है, जो एक चिंतनीय विषय है। इस संकट से हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड जैसे कई उत्तरी राज्य ग्रसित है । परिणाम स्वरूप इन राज्यों ने अन्य राज्यों में पुआल (गेहूं या धान आदि के सूखे डंठल जिन में से दाने निकाल लिए गए हो) भेजने पर पूर्ण रूप से या अनिश्चितकालीन प्रतिबंध लगा दिया है। दुनिया की कुल कृषि में पशुधन का 70 से 80% हिस्सा है और फिर भी पशुधन द्वारा मनुष्यों द्वारा खपत की जाने वाली कैलोरी और प्रोटीन का क्रमशः केवल 18% और 25% ही उत्पन्न किया जाता है । पशुओं के लिए भोजन उगाने के लिए दुनिया की 33% फसल भूमि का उपयोग किया जाता है, फिर भी पशुओं के लिए चारे का संकट सदैव बना रहता है। इस समस्या के समाधान के लिए, पशुओं के चारे के रूप में, कीटों को चारे के मौजूदा स्रोतों, जिनमें ज्यादातर मछली और सोयाबीन शामिल हैं, का पूरक बनाया जा सकता है । पशुधन चारे के रूप में कीटों का उपयोग भोजन की स्थिरता में सुधार कर सकता है क्योंकि कीट कम मूल्य वाले जैविक कचरे (जैसे, फल, सब्जियां और यहां तक कि खाद) को उच्च गुणवत्ता वाले चारे में बदल सकते हैं। मवेशियों की आबादी को बनाए रखने में कीटों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ब्लैक सोल्जर फ्लाई लार्वा (Black Soldier Fly larvae ), जिसे हर्मेशिया इल्यूसेंस (Hermetia illucens) भी कहा जाता है , एक ऐसा सबसे आम कीट है, जिसका उपयोग पशु आहार के लिए कीट आहार के रूप में किया जाता है। ब्लैक सोल्जर फ्लाई लार्वा (BSFL) के सूखे वजन में 50% तक क्रूड प्रोटीन (Crude Protein (CP) तक, 35% तक लिपिड (Lipids) होते हैं और इसमें एक अमीनो एसिड (Amino Acid) होता है जो मछली के भोजन के समान होता है। इन कीटों को पोल्ट्री (Poultry), सूअर, मछली और झींगा की कई प्रजातियों के लिए प्रोटीन के वैकल्पिक स्रोतों के रूप में पहचाना और उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त इन कीटों द्वारा कृत्रिम वातावरण में भी कचरे को मूल्यवान प्रोटीन में कुशलता से परिवर्तित किया जा सकता है । जानवरों के चारे के रूप में इन कीटों का उपयोग करने से न केवल पोषण के मामले में बल्कि पशु स्वास्थ्य के मामले में भी अतिरिक्त लाभ होते हैं। कीटों की खेती, हालांकि अभी कम ज्ञात और कम चर्चित है, परंतु भारत और दुनिया भर में निरंतर एक फलता-फूलता उद्योग बन रहा है, जिसमें खपत और अन्य उपयोग-मामलों के लिए विभिन्न प्रकार के कीटों का प्रजनन, पालन और कटाई शामिल है।
कीटों की खेती का चलन युगों पहले से चला आ रहा है। प्राचीन यूनानियों और रोमियों द्वारा उस समय के अभिजात वर्ग के लिएएक स्वादिष्ट भोजन बनाने के लिए आटे और शराब से बनने वाले आहार पर बीटल लार्वा का इस्तेमाल किया गया था। तब से लेकर अब तक, सभ्यताओं और संस्कृतियों के पार, कीट खेती बहुत विकसित हुई है। वर्षों से हमारे द्वारा प्रचुर मात्रा में खेती किए जाने वाले कुछ कीटों में, रेशम के कीड़े, मधुमक्खियाँ, टिड्डे, घर की मक्खियाँ, ततैया, टिड्डियाँ, खाने के कीड़े, केंचुए, इत्यादि शामिल हैं । आज, संभवतः खेती द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले कीटों का सबसे प्रमुख उपयोग पशुओं के लिए भोजन और चारा पैदा करने के लिए किया जाता है । जबकि कीट पालन के एक अन्य प्रमुख अनुप्रयोग में मानव उपभोग के लिए खाद्य कीटों जैसे झींगुर आदि का पालन शामिल है । हालांकि, पोषण के दृष्टिकोण से कीट, प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्वों का एक बड़ा स्रोत हैं, फिर भी आज की तारीख में, शायद ही कभी मानव उपभोग के लिए इनका उपयोग किया जाता है । मोटे तौर पर, हमारे देश में समग्र जनमत कीटों को खाने की अवधारणा के खिलाफ है। हालांकि, भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र में, कीटाहारिता (Entomophagy), जो कीड़ों को खाने की प्रथा को संदर्भित करता है, क्षेत्र के स्थानीय-आदिवासी समुदायों द्वारा बड़े पैमाने पर कई वर्षों से अभ्यास किया गया है और साथ ही यह उनकी आजीविका में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। जबकि भारत के कई अन्य राज्यों में, अंत-उपभोक्ताओं की अस्वीकृति खाद्य कीटों से बने आहार को अपनाने की दिशा में एक प्रमुख बाधा के रूप में बनी हुई है, अक्सर यह घृणा की भावना के साथ-साथ कई बार अनिश्चित, आदिम जीवन शैली से जुड़ा हुआ माना जाता है।
भारत में कीट पालन से जुड़े अन्य प्रमुख मुद्दों में पशुओं को कीट खिलाने से जुड़ी अन्य चिंताएं भी शामिल हैं, जैसे कि पशुओं में संभावित एलर्जी प्रतिक्रियाएं और संक्रामक रोगों के प्रति भेद्यता। इसी समय, भारत में कीट पालन से जुड़े नियामक कानून पूरी तरह से पूर्ण और अच्छी तरह से परिभाषित नहीं हैं, इसको बढ़ावा देने के विपरीत यह कीट कृषि क्षेत्र में कई स्टार्टअप/कंपनियों को उत्पादन (कीट-आधारित उत्पादों के) को औद्योगिक स्तर तक बढ़ाने और साथ ही वैश्विक बाजारों तक पहुंच स्थापित करने से रोक रहे है।
पैनटोन सिस्टम: कैसे तय होता है दुनिया भर में रंगों का एक समान मानक
क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब हम चित्रकारी के लिए रंगों का चयन करते है, तब मानक रंगों की एक सूची के आधार पर हम किसी रंग का चयन करते हैं। वैसे ही, जब हम दुनिया में कहीं भी किसी वस्त्र या कपड़े के रंग का चयन करते हैं, तो हमें उस विशिष्ट रंग के चयन के लिए एक “कलर स्पेस” (Colour space) सिस्टम या ‘कलर शेड कार्ड’ (Colour Shade Card) दिखाया जाता है। यह प्रणाली “पैनटोन” (Pantone) नामक एक अमेरिकी कंपनी का एकाधिकार है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया भर में छोटी या बड़ी सभी कपड़ा बिक्री कंपनियां तथा दुकानें भी मानक रंगों की इस सूची को ही उनके कपड़ों का रंग चुनने हेतु उपयोग में लाती हैं? पैनटोन कंपनी रंग संचार और प्रेरणा सेवाओं की प्रदाता कंपनी है। पैनटोन कंपनी का मुख्यालय अमेरिकी राज्य न्यू जर्सी (New Jersey) के कार्लस्टेड (Carlstadt) शहर में स्थित है। यह कंपनी अपने ‘पैनटोन मैचिंग सिस्टम’ (पीएमएस) [Pantone Matching System, PMS] के लिए जानी जाती है। पीएमएस का उपयोग विभिन्न प्रकार के उद्योगों में, विशेष रूप से ग्राफिक डिजाइन (Graphic design), फैशन डिजाइन (Fashion design), उत्पाद डिजाइन (Product design), छपाई और निर्माण आदि में किया जाता है। पीएमएस द्वारा बनाया गया कलर स्पेस कार्ड, डिजाइन से लेकर उत्पादन तक किसी भी रंग के प्रबंधन का समर्थन करने के लिए, भौतिक या फिर डिजिटल (Digital) स्वरूपों में इस्तेमाल किया जाता है। एक कलर स्पेस या कलर शेड कार्ड में रंगों की एक विशिष्ट मानक व्यवस्था होती है। इस कलर स्पेस से संदर्भ लेकर हम किसी भी रंग को पहचान सकते है। पैनटोन मैचिंग सिस्टम या पीएमएस, जो कि एक मानकीकृत रंग प्रतिकृति प्रणाली है, पूरे विश्व में प्रयुक्त रंगों के लिए एक मानक रंग व्यवस्था के रूप में कार्य करती है, इस प्रणाली का उपयोग विश्व भर में कोई भी किसी विशिष्ट रंग की पहचान करने के लिए कर सकता है। कलर स्पेस, रंगों की एक ऐसी विशिष्ट व्यवस्था है, जो विभिन्न भौतिक उपकरणों द्वारा बनाए जाने वाले रंगों के संयोजन में, रंग के पुनरुत्पादित प्रतिनिधित्व का समर्थन करता है। इस तरह के प्रतिनिधित्व में सादृश्य या डिजिटल प्रतिनिधित्व भी शामिल हो सकता है। किसी विशेष उपकरण या डिजिटल फ़ाइल की रंग क्षमताओं को समझने के लिए “कलर स्पेस” एक उपयोगी वैचारिक उपकरण है। अतः एक कलर स्पेस की मदद से हम किसी भी रंग की सही पहचान कर सकते हैं और बता सकते हैं कि, हमारे कपड़े का मानक रंग कौन सा है। पीएमएस का उपयोग डिजाइनरों को, जब कोई डिजाइन उत्पादन चरण में प्रवेश करता है, तब विशिष्ट रंगों के लिए “रंग मिलान” की अनुमति देना है। फिर चाहे रंग का उत्पादन करने के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले उपकरण कैसे भी हो। इस प्रणाली को ग्राफिक डिजाइनरों एवं पुनरुत्पादन और मुद्रण गृहों द्वारा व्यापक रूप से अपनाया जाता है। हालांकि पीएमएस कलर गाइड्स (Colour Guides) को सालाना खरीदा एवं बदला जाता है, क्योंकि समय के साथ उनकी स्याही थोड़ी फीकी पड़ जाती है।
पैनटोन कलर मैचिंग सिस्टम, काफी हद तक एक मानकीकृत रंग प्रतिकृति प्रणाली है। वर्ष 2019 तक इसमें कुल 2161 रंग थे। रंगों को मानकीकृत करके, विश्व के अलग-अलग स्थानों में विभिन्न निर्माता पैनटोन प्रणाली का उपयोग कर यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि रंग एक दूसरे के साथ सीधे संपर्क के बिना मेल खाएं । ऐसा ही एक प्रयोग सीएमवाईके (CMYK) प्रक्रिया में रंगों का मानकीकरण करना है। सीएमवाईके प्रक्रिया स्याही के चार रंगों, सियान (Cyan), मैजेंटा ( Magenta), पीले (Yellow) और काले (Black) रंग का उपयोग करके प्रिंट करने की एक विधि है। दुनिया की अधिकांश मुद्रित सामग्री इसी प्रक्रिया का उपयोग करके निर्मित की जाती है। सीएमवाईके का उपयोग करके पैनटोन रंगों के एक विशेष उपसमूह को पुन: प्रस्तुत किया जा सकता है। वर्ष 2000 से, पैनटोन कलर संस्था द्वारा एक विशेष रंग को “कलर ऑफ द ईयर (Colour of the year)” भी घोषित किया जाता है। ‘कलर ऑफ द ईयर’ का मतलब एक पूरे वर्ष के लिए किसी विशिष्ट रंग को चुनना है। यह कंपनी एक वर्ष में दो बार विभिन्न देशों के रंग मानक समूहों के प्रतिनिधियों की एक गुप्त बैठक आयोजित करती है। दो दिनों की प्रस्तुतियों और बहस के बाद, इन प्रतिनिधियों द्वारा अगले वर्ष के लिए एक रंग को चुना जाता है ; उदाहरण के लिए, इस साल 2023 की गर्मियों के लिए 2022 में न्यूयॉर्क (New York) में विशेष रंग वीवा मैजेंटा (Viva Magenta) चुना गया था। पैनटोन के साथ–साथ इसकी कुछ प्रतिस्पर्धी कंपनियां भी विश्व में है, जिनका कार्य पैनटोन से थोड़ा बहुत मिलता जुलता है। परंतु आज भी, रंगों के मानकीकरण के लिए दुनिया में पैनटोन का ही बोलबाला है। पैनटोन की प्रतिस्पर्धी कंपनियां निम्न उल्लेखित हैं- डाटाकलर (Datacolor)-अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से रंग मापन, प्रबंधन, संचार और अंशशोधन के लिए समाधान प्रदान करता है। साइनआर्ट (Signart)- वाणिज्यिक, विद्युत, वास्तुकला, वित्तीय, स्वास्थ्य देखभाल, आतिथ्य क्षेत्रों आदि के लिए चिह्नों का निर्माता है। बिनयान स्टूडियोज (Binyan Studios)- एक वास्तुकला से संबंधित और डिज़ाइन कंपनी है। जैम फिल्ड (Jam Filled)- एक डिजिटल एनिमेशन (Animation) स्टूडियो है। इस तरह से हम पैनटोन मैचिंग सिस्टम या कलर स्पेस के आधार पर रंग चुनते हैं। इन प्रणालियों की मदद से हम अपने कपड़ों का रंग भी निर्धारित कर सकते हैं। चूंकि दुनिया के हर एक हिस्से में विभिन्न रंगों के नाम अलग-अलग होते हैं, इसलिए एक विशिष्ट रंग तय करने के लिए इस मानकीकृत प्रणाली को देखा जाना चाहिए।
दांडी मार्च: नमक सत्याग्रह जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी
महात्मा गांधी, जिन्हें राष्ट्रपिता और बापू के नाम से भी जाना जाता है, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे महान नेताओं में से एक थे। उनका व्यक्तित्व और उनके विचार आज भी हर बच्चे, युवा और वृद्ध के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उन्होंने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए न केवल भारत को स्वतंत्रता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि पूरी दुनिया को शांतिपूर्ण संघर्ष की शक्ति का संदेश भी दिया। उनके नेतृत्व में चलाए गए कई आंदोलनों ने भारतीयों को एकजुट किया और उन्हें अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस दिया।
स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए महात्मा गांधी ने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया और देश को आज़ाद कराने के लिए अनेक महत्वपूर्ण आंदोलन चलाए। इन्हीं आंदोलनों में से एक था नमक आंदोलन, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला कर रख दिया। इस आंदोलन को नमक सत्याग्रह या दांडी आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है। इस सत्याग्रह का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों द्वारा नमक पर लगाए गए करों और कठोर नियमों का विरोध करना था, ताकि भारतीय स्वयं नमक बना सकें और उन्हें यह आवश्यक वस्तु उचित मूल्य पर उपलब्ध हो सके। नमक के महत्व को समझते हुए महात्मा गांधी ने इस अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ आवाज उठाई और 12 मार्च 1930 को नमक सत्याग्रह की शुरुआत की, जो 6 अप्रैल 1930 तक चला।
इस ऐतिहासिक सत्याग्रह की शुरुआत महात्मा गांधी ने अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से की, जिसका गंतव्य स्थान गुजरात का तटीय गांव दांडी था। दांडी अरब सागर के किनारे स्थित एक ऐसा स्थान था, जहां नमक आसानी से बनाया जा सकता था। इस यात्रा में गांधी जी के साथ 80 सत्याग्रहियों का एक समूह शामिल था, और दांडी पहुंचने में उन्हें 24 दिन का समय लगा। यह सत्याग्रह इतना प्रभावशाली था कि रास्ते में हर आयु वर्ग के लोग इस आंदोलन से जुड़ते चले गए। इस समूह में सबसे कम उम्र के सत्याग्रही 16 वर्षीय विट्ठल लीलाधर ठक्कर थे। गांधी जी ने इस मार्च की जानकारी पहले ही ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड इरविन को एक पत्र के माध्यम से दे दी थी और उनसे अन्यायपूर्ण नमक कानून पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था, लेकिन जब उनकी बात नहीं मानी गई, तब उन्होंने इस सत्याग्रह को शुरू करने का निर्णय लिया।
इस सत्याग्रह में भारतीय दुग्ध विभाग के डिप्लोमा धारक और गौ सेवा संघ के एक कार्यकर्ता, 25 वर्षीय थेवरथुंडियिल टाइटस भी शामिल थे। सत्याग्रहियों ने अपनी यात्रा के दौरान अधिकांश समय गांवों में बिताया और अत्यंत साधारण भोजन ग्रहण किया, जिससे यह आंदोलन सादगी और आत्मसंयम का प्रतीक बन गया। इस दौरान कलकत्ता की लिली बिस्किट कंपनी ने सत्याग्रहियों को बिस्कुट देने की पेशकश की, लेकिन महात्मा गांधी ने इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वे इस आंदोलन को पूरी तरह सादगी और आत्मनिर्भरता के सिद्धांतों पर आधारित रखना चाहते थे।इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। गृहिणियों के एक समूह का नेतृत्व कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने किया, जिन्होंने पुलिस के लाठीचार्ज के बावजूद अपना विरोध जारी रखा और पीछे हटने से इनकार कर दिया। जब नमक बनाना शुरू हुआ, तो कमलादेवी द्वारा तैयार किया गया पहला नमक का पैकेट 501 रुपये में नीलाम हुआ, जो इस आंदोलन के प्रति लोगों के समर्थन और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक था।
सत्याग्रह की एक महत्वपूर्ण शाम को महात्मा गांधी ने एक विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि यह संभवतः उनका अंतिम भाषण हो सकता है। उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि यदि उन्हें और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया जाए, तब भी आंदोलन को जारी रखा जाना चाहिए। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए इस संघर्ष को आगे बढ़ाएं और स्वतंत्रता की इस लड़ाई में अपने संकल्प को मजबूत बनाए रखें।
अपने संबोधन में महात्मा गांधी ने स्पष्ट किया कि आंदोलन की आगामी योजनाओं को उसी प्रकार जारी रखा जाना चाहिए, जैसा पहले निर्धारित किया गया था। उन्होंने स्वयंसेवकों से अनुशासन बनाए रखने और आंदोलन की मर्यादा का पालन करने का आग्रह किया। उनका विश्वास था कि नमक कानून के विरुद्ध शुरू हुआ यह सत्याग्रह जल्द ही पूरे देश में नागरिक प्रतिरोध की एक अखंड धारा बन जाएगा।उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि यह संघर्ष पूरी तरह शांतिपूर्ण और अहिंसक होना चाहिए। उन्होंने लोगों को अपने क्रोध पर नियंत्रण रखने और सत्य तथा अहिंसा के सिद्धांतों को अपनाते हुए आगे बढ़ने की सलाह दी, ताकि आंदोलन की नैतिक शक्ति बनी रहे।अपने भाषण में उन्होंने यह आशा भी व्यक्त की कि यदि उन्हें और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया जाए या वे स्वयं इस संघर्ष को आगे न बढ़ा सकें, तब भी यह आंदोलन रुकना नहीं चाहिए। उन्होंने स्वयंसेवकों और देशवासियों से आह्वान किया कि वे साहस, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प के साथ सविनय अवज्ञा को जारी रखें और स्वराज की प्राप्ति के लिए इस संघर्ष को आगे बढ़ाएं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किए गए अपने अथक प्रयासों के दौरान महात्मा गांधी ने कई महत्वपूर्ण आंदोलन चलाए, जिनमें से नमक आंदोलन एक ऐतिहासिक आंदोलन था। ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला देने वाले इस आंदोलन को नमक सत्याग्रह या दांडी आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है। इस सत्याग्रह का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों द्वारा नमक पर लगाए गए करों और प्रतिबंधों को समाप्त करना था, ताकि भारतीय स्वयं नमक बना सकें और इसे सस्ती कीमत पर प्राप्त कर सकें। नमक की उपयोगिता और आवश्यकता को देखते हुए गांधी जी ने इस अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ आवाज उठाई और 12 मार्च 1930 को नमक सत्याग्रह की शुरुआत की, जो 6 अप्रैल 1930 तक चला।
इस सत्याग्रह की शुरुआत महात्मा गांधी ने अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से की, जिसका गंतव्य दांडी था। दांडी, गुजरात का एक छोटा तटीय गांव है, जहां नमक बनाना संभव था। इस ऐतिहासिक यात्रा में उनके साथ 80 सत्याग्रही शामिल थे और दांडी पहुंचने में उन्हें 24 दिन लगे। यह आंदोलन इतना प्रभावशाली था कि जैसे-जैसे यह आगे बढ़ा, विभिन्न आयु वर्ग के लोग इसमें शामिल होते गए। इस समूह में सबसे कम उम्र के सत्याग्रही 16 वर्षीय विट्ठल लीलाधर ठक्कर थे। गांधी जी ने इस मार्च से पहले ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड इरविन को एक पत्र लिखकर औपनिवेशिक नीतियों पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था, लेकिन जब कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो उन्होंने सत्याग्रह शुरू कर दिया।
ब्राह्मी से देवनागरी तक: एक लिपि की ऐतिहासिक यात्रा
देवनागरी, उत्तरी भारत में उपयोग की जाने वाली सर्वाधिक लोकप्रिय लेखन प्रणाली या लिपि है। इसे भारत और नेपाल की आधिकारिक लिपियों में से एक माना जाता है। इसका उपयोग 120 से अधिक भाषाओं को लिखने में किया जाता है। लैटिन वर्णमाला, चीनी लिपि और अरबी लिपि के बाद यह दुनिया में चौथी सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली लेखन प्रणाली बन चुकी है। भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत को लिखने के लिए भी देवनागरी का ही उपयोग किया जाता है। देवनागरी लिपि का विकास 7वीं शताब्दी ई. में शुरू हुआ। यह गुप्त लिपि से बाद के वर्षों में विकसित हुई। 13वीं शताब्दी ई. के आसपास यह लिपि पूर्णतः विकसित हो चुकी थी।
देवनागरी में 14 स्वर और 34 व्यंजन सहित कुल 48 मुख्य अक्षर होते हैं। देवनागरी बाएं से दाएं लिखी जाती है और इसमें अक्षरों के शीर्ष पर एक क्षैतिज रेखा होती है। इस रेखा को “शिरोरेखा” कहा जाता है। इसमें विशेषक यानी विशेष चिह्न भी होते हैं, जो अक्षरों की ध्वनि बदलने के लिए उनसे जुड़े रहते हैं। 'देवनागरी' शब्द दो शब्दों 'देव+नागरी' से मिलकर बना है। जहां देव का अर्थ "स्वर्गीय" या "दिव्य", और 'नागरी' का अर्थ "नगर" या "शहर" होता है। इस प्रकार 'देवनागरी' का अनुवाद "देवताओं के शहर" के रूप में किया जा सकता है। प्राचीन समय में इस लिपि का उपयोग मुख्य रूप से धार्मिक ग्रंथों और शिलालेखों में संस्कृत लिखने के लिए किया जाता था, लेकिन साथ ही इसका उपयोग उत्तरी और पश्चिमी भारत में स्थानीय भाषाओं को लिखने के लिए भी किया जाता था। दक्षिण भारत में इसे नंदिनागरी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ "नंदी की लेखनी" होता है।
देवनागरी एक बहुत ही बहुमुखी लेखन प्रणाली है, जिस कारण यह सीखने के परिपेक्ष्य में भी बहुत आसान लिपि हो जाती है। अच्छी बात यह है कि “यह लिपि जैसी दिखाई देती है, वैसा ही इसका उच्चारण भी होता है।” पहली नज़र में, देवनागरी अन्य भारतीय लिपियों जैसे बंगाली-असमिया या गुरुमुखी से भिन्न नजर आ सकती है। लेकिन अगर आप करीब से देखेंगे, तो पाएंगे कि कुछ कोणों और जोर को छोड़कर इन सभी में काफी समानताएं हैं। देवनागरी का सबसे पुराना उदाहरण समनगढ़ नामक स्थान में खोजे गए एक अभिलेख में देखने को मिलता है। यह दंतिदुर्ग नामक राजा के समय में लिखा गया था, जो राष्ट्रकूट नामक एक बड़े क्षेत्र पर शासन करता था। इसे वर्ष 754 ई. में लिखा गया था। राष्ट्रकूट साम्राज्य के अन्य राजाओं और पश्चिमी चालुक्यों, यादवों और विजयनगर जैसे अन्य स्थानों / साम्राज्य में भी देवनागरी के प्रारंभिक प्रयोग के उदाहरण देखने को मिलते हैं। देवनागरी की उत्पत्ति “ब्राह्मी” नामक एक अन्य प्राचीन लिपि से हुई है, जिसका उपयोग पूरे भारत में किया जाता था। ब्राह्मी लिपि को वाणी और साहित्य के देवता “ब्रह्मा” द्वारा प्रदत्त माना जाता है। सम्राट अशोक के काल के बाद ब्राह्मी के विकास में तेज गति देखी गई। अशोक ने विभिन्न चट्टानों और स्तंभों पर अपने संदेश ब्राह्मी लिपि में ही लिखे थे।
अशोक के बाद ब्राह्मी के विभिन्न प्रकार (सुंगन ब्राह्मी, कुषाण ब्राह्मी और गुप्त लिपि इत्यादि) विकसित हुए।। गुप्त लिपि का प्रयोग उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य के शासनकाल में किया जाता था। गुप्त लिपि, दक्कन और दक्षिण भारत जैसे अन्य स्थानों पर भी देखी गई है, जहाँ यह थोड़ी अलग दिखती है। छठी और सातवीं शताब्दी में गुप्त लिपि से एक अन्य प्रकार की लिपि प्रचलित हुई। इसे “सिद्धमातृका या सिद्धम लिपि” कहा जाता था। इसका उपयोग भारत और मध्य एशिया तथा जापान जैसे अन्य देशों में धार्मिक ग्रंथ लिखने के लिए किया जाता था। सिद्धम लिपि का सबसे पुराना उदाहरण जापान के एक मंदिर में एक पत्ते पर लिखे हुए लेख को माना जाता है। माना जाता है कि देवनागरी सिद्धम लिपि से प्रेरित एक नई तरह की लिपि का नाम है। हालांकि देवनागरी में कुछ ऐसी भी विशेषताएं (जैसे प्रतीकों के शीर्ष पर रेखाएं, तिरछे स्ट्रोक, छोटे कोण या नाखून की तरह दिखने वाले बिंदु आदि।) हैं, जो इसे सिद्धम लिपि से अलग बनाती हैं। ये विशेषताएं नागरी लिपि में भी देखी जाती हैं।
8वीं शताब्दी से देवनागरी का उपयोग राजाओं के नाम और उनके हस्ताक्षर लिखने के लिए किया जाता था। उदाहरण के लिए, गुजरात में जय भट्ट नाम के एक राजा ने देवनागरी लिपि का उपयोग कर संस्कृत भाषा में अपना नाम "स्व हस्तो मम जयभट्टस्य" लिखा था, जिसका अनुवाद व् अर्थ है: "यह मेरे हस्ताक्षर हैं, जय भट्ट" । कई भाषाओं में देवनागरी का उपयोग मुख्य या माध्यमिक लिपि के रूप में किया जाता है। इन भाषाओं में मराठी, पाली, संस्कृत, हिंदी, बोरो, नेपाली, शेरपा, प्राकृत, अपभ्रंश, अवधी, भोजपुरी, ब्रज भाषा, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, मगही, नागपुरी, राजस्थानी, खानदेशी, भीली, डोगरी, कश्मीरी, मैथिली, कोंकणी, सिंधी, मुंडारी, अंगिका, बज्जिका और संथाली शामिल हैं।
भारत में पुराने समय में लोग अलग-अलग लिपियों का उपयोग, अलग-अलग उद्देश्यों के लिए करते थे। उदाहरण के लिए, मोदी लिपि, (जिसे तेजी से लिखना आसान होता है), का उपयोग मराठी में रोजमर्रा के लेखन के लिए किया जाता था, जबकि देवनागरी का उपयोग औपचारिक मराठी शिलालेखों के लिए किया जाता था। मुद्रण के आविष्कार से पहले, देवनागरी का उपयोग ज्यादातर पेशेवर लेखकों द्वारा लिखे गए औपचारिक ग्रंथों के लिए किया जाता था। ये ग्रंथ आमतौर पर पांडुलिपियों पर लिखे गए थे। ब्राह्मी से गुप्त और देवनागरी तक के विकास को निम्नलिखित तालिका में दर्शाया गया है।
देवनागरी लिपि के अंक निम्नवत दर्शाए गए हैं:
आज, देवनागरी का उपयोग तीन प्रमुख भाषाओं (हिंदी (520 मिलियन से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली), मराठी (83 मिलियन से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली), और नेपाली (14 मिलियन से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली) को लिखने के लिए किया जाता है। इस प्रकार यह आधुनिक दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली लिपि है, जिस प्रकार प्राचीन काल में भूतपूर्व ब्राह्मी लिपि थी । साथ ही हिंदी, भारत सरकार की आधिकारिक भाषाओं में से एक है (अंग्रेजी के साथ), जबकि नेपाली, नेपाल की आधिकारिक भाषा है। मराठी, महाराष्ट्र की आधिकारिक भाषा है और इसे गोवा में भी आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। हिंदी का उपयोग पूरे भारत में केंद्र सरकार के संस्थानों द्वारा भी किया जाता है और हिंदी भाषी राज्यों के बाहर दूसरी भाषा के रूप में इसे व्यापक रूप से पढ़ाया और बोला जाता है। देवनागरी का उपयोग भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त कई अन्य भाषाओं (बोडो, मैथिली, कश्मीरी, सिंधी, डोगरी और कोंकणी) को लिखने के लिए भी किया जाता है।
प्राचीन भारत में लेखन एक जटिल प्रक्रिया हुआ करती थी। लेखक, श्रोता, संदर्भ और उद्देश्य के आधार पर लोग, एक ही भाषा लिखने के लिए विभिन्न लिपियों का उपयोग करते थे। इसके अलावा विभिन्न सामाजिक वर्गों और धार्मिक समूहों के लोग अलग-अलग लिपियों का उपयोग करते थे। उदाहरण के लिए, ब्राह्मण (पुजारी) अक्सर देवनागरी लिपि का इस्तेमाल करते थे, जबकि मुसलमान अक्सर फारसी-अरबी लिपि का इस्तेमाल करते थे। हालांकि, 19वीं शताब्दी में मुद्रण की शुरुआत ने सब कुछ बदल दिया। मुद्रण तकनीक के आगमन के बाद बड़ी मात्रा में पुस्तकें और अन्य पाठ्य सामग्री तैयार करना संभव हो गया। इससे हस्तलिखित पांडुलिपियों के उपयोग में गिरावट आई और मुद्रित ग्रंथों के उपयोग में वृद्धि हुई। मुद्रित ग्रंथ प्रायः देवनागरी लिपि में लिखे जाते थे। यही कारण है कि देवनागरी अब भारत में सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली लिपि बन गई है।
देवनागरी का प्रयोग भारत के बाहर भी किया जाता रहा है। उदाहरण के लिए, सिद्ध मातृका लिपि, जिसका देवनागरी से गहरा संबंध है, पूर्वी एशिया में बौद्धों द्वारा उपयोग की जाती थी। आज भारत में देवनागरी एक अत्यंत महत्वपूर्ण लिपि बन चुकी है और इसका प्रयोग प्रतिदिन लाखों लोग करते हैं।
ग्रेफाइट की अनोखी दुनिया और हमारे जीवन में उसका बढ़ता महत्व
हम सभी का बचपन से लेकर वयस्क होने तक पेंसिल के साथ एक मजबूत भावनात्मक संबंध रहा है! पेंसिल एक बच्चे की पहली कलम होती है। लेकिन क्या आप जानते थे की पेंसिल को बनाने में प्रयुक्त तत्व "ग्रेफाइट" को बहुपयोगी तत्व के रूप में जाना जाता है, जिसका प्रमुख कारण है यह है की इसका उपयोग पेंसिल के अलावा भी अन्य कई बेहद आवश्यक उत्पादों के निर्माण में किया जाता है! ग्रेफाइट (graphite) कार्बन तत्व का एक क्रिस्टलीय रूप होता है, और मानक परिस्थितियों में कार्बन का सबसे स्थिर रूप भी है। पेंसिल, स्नेहक और इलेक्ट्रोड में उपयोग के लिए बड़े पैमाने पर सिंथेटिक और प्राकृतिक ग्रेफाइट की खपत की जाती है। उच्च दबाव और तापमान में यह हीरे में परिवर्तित हो जाता है। ग्रेफाइट प्राकृतिक रूप से रॉक फ्रैक्चर (rock fracture) के भीतर या अनाकार गांठ के रूप में फ्लेक्स (Flex) और नसों के रूप में होता है। ग्रेफाइट की मूल क्रिस्टलीय संरचना हेक्सागोनल कोशिकाओं (hexagonal cells) में दृढ़ता से बंधे कार्बन परमाणुओं की एक सपाट शीट होती है।
चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में, दक्षिण-पूर्वी यूरोप में नवपाषाण युग के दौरान, मारिआ संस्कृति (Maria Culture) ने मिट्टी के बर्तनों को सजाने के लिए पहली बार सिरेमिक पेंट (ceramic paint) में ग्रेफाइट का इस्तेमाल किया गया। 1565 से कुछ समय पहले ग्रे नॉट्स के पास ग्रेफाइट के एक विशाल ढेर की खोज की गई थी, जिसे स्थानीय लोगों ने भेड़ों को चिह्नित करने के लिए उपयोगी पाया था। एलिजाबेथ प्रथम (1558-1603) के शासनकाल के दौरान, बोरोडेल ग्रेफाइट (Borodell Graphite) को तोप के गोले हेतु लाइन मोल्ड्स (line moulds) के लिए एक दुर्दम्य सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया गया था। 19 वीं शताब्दी के दौरान, स्टोव पॉलिश, स्नेहक, पेंट, क्रूसिबल, फाउंड्री फेसिंग (Stove Polish, Lubricant, Paint, Crucible, Foundry Facing) और पेंसिल के निर्माण में ग्रेफाइट के उपयोग करने से इसका बहुत विस्तार हुआ, जो जनता के लिए शिक्षा के पहले महान उदय के दौरान शैक्षिक उपकरणों के विस्तार में एक प्रमुख कारक बना।
ग्रेफाइट के कुछ वर्तमान उपयोग निम्नवत दिए गए हैं: 1. लेखन सामग्री: ग्रेफाइट शब्द ग्रीक भाषा से आया है जिसका अनुवाद 'लिखने के लिए' के रूप में किया जाता है। इस प्रकार ग्रेफाइट का सबसे आम उपयोग पेंसिल में उसका सिरा (Lead) बनाने में होता है। "लेड (Lead)" पेंसिल कोर मिट्टी और ग्रेफाइट के मिश्रण से बने होते हैं, जो एक अनाकार रूप में होते हैं। ग्रेफाइट का उपयोग एक मार्कर के रूप में उत्तरी इंग्लैंड में 16वीं शताब्दी से होता रहा है, जहां स्थानीय किंवदंती कहती है कि चरवाहों ने भेड़ को चिह्नित करने के लिए एक नए खोजे गए ग्रेफाइट का उपयोग किया था। 2. स्नेहक/विकर्षक: ग्रेफाइट, स्नेहक जैसे ग्रीस आदि में मुख्य अवयवों में से एक होता है। ग्रेफाइट किसी भी आसन्न सतहों के बीच के घर्षण को कम करता है। यह तेल में एक निलंबन बनाता है और कार के ब्रेक और क्लच जैसे दो चलती भागों के बीच घर्षण को भी कम करता है। ग्रेफाइट 787 डिग्री सेल्सियस (1,450 डिग्री फारेनहाइट) के तापमान तक स्नेहक के रूप में और 1,315 डिग्री सेल्सियस (2,399 डिग्री फारेनहाइट) तक एक एंटी-सीज़ सामग्री (anti-seize material) के रूप में काम करता है। यह शक्तिशाली खनिज एक अच्छे विकर्षक के रूप में कार्य करता है; इसलिए कई निर्माण कंपनियां विकर्षक समाधानों में एक घटक के रूप में ग्रेफाइट का उपयोग करती हैं। 3. पेंट: यदि आपको कभी ऐसे पेंट मिले हैं जो दीवारों की सुरक्षा की गारंटी देते हैं, तो आमतौर पर उनमें भी ग्रेफाइट का प्रयोग होता है। फैक्ट्रियां दीवारों हेतु प्रामाणिक सुरक्षा बनाने के लिए पाउडर ग्रेफाइट को पेंट में मिलाती हैं। 4. रिफ्रैक्ट्री: ग्रेफाइट एक सामान्य दुर्दम्य सामग्री है क्योंकि यह रासायनिक रूप से बदले बिना उच्च तापमान और सहनशीलता का सामना कर सकता है। इसका उपयोग स्टील और कांच बनाने से लेकर लोहे के प्रसंस्करण तक की निर्माण प्रक्रियाओं में किया जाता है। यह ऑटोमोबाइल ब्रेक लाइनिंग में एक एस्बेस्टस (an asbestos in automobile brake linings) विकल्प भी है। 5. परमाणु रिएक्टर: ग्रेफाइट की तेज गति वाले न्यूट्रॉन को अवशोषित करने की क्षमता बहुत अधिक होती है, इसलिए अधिकांश समय, यह खनिज न्यूट्रॉन की प्रतिक्रियाओं को स्थिर या बेअसर करने के लिए बहुत अधिक उपयोग होता है। 6. विद्युत उद्योग: क्रिस्टलीय परत ग्रेफाइट का उपयोग कार्बन इलेक्ट्रोड, ब्रश, शुष्क सेल बैटरी और विद्युत उद्योग में आवश्यक प्लेटों के निर्माण में किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि प्राकृतिक ग्रेफाइट को सिंथेटिक ग्रेफाइट में भी संसाधित किया जाता है। इस प्रकार का ग्रेफाइट लिथियम आयन बैटरी (lithium ion batteries) में उपयोगी होता है। 7. ग्रेफाइट का उपयोग पेंसिल और स्नेहक में किया जाता है। यह गर्मी और बिजली का अच्छा संवाहक है। इसकी उच्च चालकता इसे इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों जैसे इलेक्ट्रोड, बैटरी और सौर पैनलों में उपयोगी बनाती है।
लेकिन ग्रेफाइट के कई औद्योगिक अनुप्रयोग भी है: 1. रासायनिक उद्योग में: रासायनिक क्षेत्र में, ग्रेफाइट कई उच्च तापमान अनुप्रयोगों जैसे चाप भट्टियों में फास्फोरस और कैल्शियम कार्बाइड के उत्पादन में कार्यरत होता है। ग्रेफाइट का उपयोग विशिष्ट जलीय इलेक्ट्रोलाइटिक प्रक्रियाओं जैसे हैलोजन (क्लोरीन और फ्लोरीन) के उत्पादन में एनोड के रूप में किया जाता है। 2. विद्युत अनुप्रयोग: ग्रेफाइट का उपयोग मुख्य रूप से इलेक्ट्रिक मोटर में कार्बन ब्रश के निर्माण में विद्युत सामग्री के रूप में किया जाता है। 3. यांत्रिक अनुप्रयोग: ग्रेफाइट व्यापक रूप से विभिन्न प्रकार के अनुप्रयोगों जैसे पिस्टन रिंग, थ्रस्ट बियरिंग्स, जर्नल बेयरिंग और वैन (Piston Rings, Thrust Bearings, Journal Bearings and Vanes) में इंजीनियरिंग सामग्री के रूप में उपयोग किया जाता है। कार्बन आधारित सील का उपयोग कई विमान जेट इंजनों के ईंधन पंप और शाफ्ट में किया जाता है। माना जा रहा है की मानव निर्मित 'सुपर मिनरल' ग्रेफीन ('Super Mineral' Graphene) बैटरी के लिए बहुत बड़ी क्षमता रखता है। ग्रेफाइट और ग्रेफाइट से व्युत्पन्न ग्रेफीन, दोनों वस्तुओं में आने वाले वर्षों में भारी वृद्धि देखने की उम्मीद की जा रही है। ग्रेफीन ग्रेफाइट की एक 2डी परमाणु परत होती है, जिसे आम तौर पर मैनचेस्टर विश्वविद्यालय (Manchester University) द्वारा विकसित यांत्रिक तकनीक के माध्यम से बनाया गया है।
माना जा रहा है कि 2040 तक, दुनिया भर में 530 मिलियन इलेक्ट्रिक वाहन होंगे। इस प्रकार पहले से ही कंपनियां बैटरी तकनीक के अपने उत्पादन को बढ़ा रही हैं, जिसमें टेस्ला और इसकी गीगाफैक्ट्री जैसी कंपनियां (Companies like Tesla and its Gigafactory) सबसे आगे हैं। लिथियम आयन बैटरी में लिथियम की तुलना में 40 गुना अधिक ग्रेफाइट होता है। यह खनिज की बढ़ती मांग के लिए प्रमुख चालकों में से एक है, जो 2020 तक 200% तक बढ़ने के लिए तैयार है। इस मांग ने दिसंबर 2016 और दिसंबर 2017 के बीच ग्रेफाइट की कीमत में 25% की वृद्धि को भी प्रेरित किया। हाल ही में विकसित 'सुपर-मिनरल' भी बैटरी प्रौद्योगिकियों में नाटकीय रूप से सुधार कर सकता है। इस साल की शुरुआत में, सैमसंग ने अपने फोन की बैटरी में ग्राफीन आयन (graphene ion) को शामिल करने की योजना की घोषणा की, जिससे इसे तेजी से चार्ज करने और लंबे समय तक होल्डर चार्ज करने में मदद मिली। विशेषज्ञों के अनुसार "ग्राफीन एक क्रांतिकारी उत्पाद है जो इंटरनेट कनेक्शन को तेज़ बना सकता है, नमक के पानी को फ़िल्टर कर सकता है और फोन स्क्रीन को अटूट बना सकता है! साथ ही यह स्पष्ट रूप से वैश्विक स्तर पर विनिर्माण के परिदृश्य को बदलने के लिए ब्रिटिश कंपनियों की अभिनव क्षमता का एक प्रमुख उदाहरण है।" ग्रेफीन अब तक खोजा गया सबसे मजबूत खनिज है!
ग्रेफाइट शुद्ध कार्बन का नरम रूप है, और आमतौर पर प्राकृतिक वातावरण में या तो गुच्छे या द्रव्यमान में पाया जाता है। इसका निर्माण कृत्रिम रूप से किया जा सकता है, लेकिन इस प्रक्रिया की उच्च लागत के कारण, इसे आमतौर पर खनन से ही प्राप्त किया जाता है। ब्राजील, भारत और मेडागास्कर सहित दुनिया भर में ग्रेफाइट का खनन किया जाता है। चीन ग्रेफाइट का सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन प्रदूषण को कम करने और पर्यावरण की रक्षा के लिए देश के प्रयासों के कारण हालिया कमी इसे बदल सकती है। वर्तमान में, ग्रेफाइट का सबसे बड़ा उपयोग स्टील के निर्माण में होता है; 2015 में बैटरियों में केवल 5% ग्रेफाइट का उपयोग किया गया था। हालांकि, यह बदलने के लिए तैयार है, क्यों की ग्रेफीन की भावी उपयोगिता को नजर में रखते हुए स्टील की दिग्गज कंपनी टाटा स्टील भी ग्रेफीन पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है, जिसे प्लास्टिक के साथ मिश्रित किया जा सकता है और अन्य विशेषताओं के साथ नए उत्पादों की तरह पुनर्नवीनीकरण किया जा सकता है।
प्रौद्योगिकी और नई सामग्री व्यवसाय के उपाध्यक्ष देबाशीष भट्टाचार्जी के अनुसार “कंपनी का ग्राफीन व्यवसाय लगभग 500 करोड़ रुपये का है, लेकिन विस्तार की योजनाएं अभी भी चल रही हैं, जिसमें ग्राफीन से समृद्ध उत्पादों का निर्यात भी शामिल है। "हमने एमडीपीई और एचडीपीई पाइपों (MDPE and HDPE Pipes) में एक योज्य के रूप में ग्राफीन का व्यवसायीकरण किया है। हम कन्वेयर बेल्ट (conveyor belt) में ग्राफीन का उपयोग कर रहे हैं। ग्राफीन जंग प्रतिरोधी पेंट में भी इस्तेमाल होता है।' टाटा स्टील ने डिजिटल यूनिवर्सिटी केरल (digital university kerala) के साथ समझौता किया है, जो देश का पहला ऑन-कैंपस डिजिटल यूनिवर्सिटी और सेंटर फॉर मैटेरियल्स फॉर इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजीज (सी-मेट) (On-Campus Digital University and Center for Materials for Electronics Technologies (C-MET) है। देश के पहले ग्राफीन अनुसंधान और नवाचार केंद्र के लिए एक वास्तविकता बनने के लिए, इंडिया इनोवेशन सेंटर ग्राफीन और 2 डी सामग्री पारिस्थितिकी के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास, उत्पाद नवाचार और क्षमता निर्माण गतिविधियों का कार्य करेगा।
एक स्वर, एक सदी: लता मंगेशकर और भारत की भावनात्मक स्मृति
लता मंगेशकर (1929–2022) केवल एक महान पार्श्वगायिका नहीं थीं, बल्कि 20वीं शताब्दी के भारत की सांस्कृतिक आत्मा की आवाज़ थीं। इंदौर में जन्मी लता जी ने बहुत कम आयु में अपने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर के सान्निध्य में संगीत की शिक्षा प्राप्त की और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण किशोरावस्था में ही पेशेवर गायन शुरू कर दिया। 1940 के दशक के उत्तरार्ध में हिंदी सिनेमा में उनकी पहचान बनी और शीघ्र ही उनकी पतली, स्वच्छ और भावपूर्ण आवाज़ ने पार्श्वगायन की परिभाषा बदल दी। उन्होंने सात दशकों से अधिक लंबे करियर में 30 से अधिक भाषाओं में हज़ारों गीत गाए और भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम युग से लेकर आधुनिक दौर तक अपनी उपस्थिति बनाए रखी। भारत रत्न, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और अनेक राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों से सम्मानित लता जी अनुशासन, साधना और पेशेवर गरिमा की मिसाल मानी जाती हैं।
उनकी गायकी ने केवल लोकप्रियता ही नहीं अर्जित की, बल्कि भारत की सामूहिक भावनात्मक स्मृति को आकार दिया। प्रेम, विरह, भक्ति, आशा और देशभक्ति—हर भावना को उन्होंने ऐसी सादगी और सच्चाई से स्वर दिया कि श्रोता अपने जीवन के अनुभव उन गीतों में खोजने लगे। उल्लेखित वीडियो प्रस्तुतियों में भी उनकी वही आत्मीयता और भावनात्मक गहराई स्पष्ट दिखाई देती है, जिसने उनके गीतों को व्यक्तिगत यादों और राष्ट्रीय स्मृतियों का हिस्सा बना दिया। लता मंगेशकर की आवाज़ समय के साथ पुरानी नहीं हुई; वह पीढ़ियों को जोड़ने वाली ध्वनि बनकर भारत की भावनात्मक पहचान में स्थायी रूप से बस गई।
भीड़भाड़ से समाधान तक: मेरठ, RRTS और मेट्रो की ऊर्जा दक्ष दुनिया
मेरठ वासियों के लिए हाल ही में एक ऐतिहासिक क्षण आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा क्षेत्रीय तीव्र परिवहन प्रणाली (RRTS) का उद्घाटन किया गया। यह आधुनिक रैपिड ट्रांज़िट प्रणाली, मेट्रो रेल की तरह ही उन्नत तकनीक और ऊर्जा दक्षता पर आधारित है। मेट्रों के प्रति यहां के लोगों की जिज्ञासा किसी से छिपी नहीं है। यह जिज्ञासा जायज़ भी है, क्योंकि मेट्रो रेल प्रणाली शहरों को अनगिनत लाभ प्रदान करती है। मेट्रो से होने वाले अनगिनत लाभों में वाहनों की भीड़भाड़, वायु प्रदूषण और निजी वाहनों पर निर्भरता में कमी आदि शामिल हैं। कई बार एक निजी वाहन के बजाय, मेट्रो से सफ़र करना अधिक सुविधाजनक और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प साबित होता है। आज के इस लेख में, हम यही जानने का प्रयास करेंगे कि बड़े-बड़े शहरों के अनगिनत लोगों को उर्जावान रखने वाली मेट्रो रेल प्रणाली, ख़ुद कैसे उर्जावान रहती है? इसके अलावा, आज हम उन प्रमुख भारतीय कंपनियों के बारे में भी जानने की कोशिश करेंगे, जो मेट्रो ट्रेनों के साथ-साथ संबंधित तकनीक और उपकरणों का डिज़ाइन, निर्माण और आपूर्ति करती हैं।
परियोजना संख्या 1351, दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) द्वारा पंजीकृत पहली स्वच्छ विकास तंत्र (CDM) परियोजना है। DMRC, बिजली से चलने वाली मास रैपिड प्रणाली संचालित करती है। यह प्रणाली विभिन्न सेवा लाइनों पर 4-कार या 6-कार रोलिंग स्टॉक का उपयोग करती है। ये सभी ट्रेनें, तीन-चरण एसी ट्रैक्शन मोटर्स (Three-Phase AC Traction Motors) से सुसज्जित हैं। एक पुनर्योजी ब्रेकिंग सिस्टम (Regenerative Braking System) भी है। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस तकनीक की बदौलत, ट्रेनों के ब्रेक लगाने पर बिजली उत्पन्न होती है। इसकी वजह से औसतन, ट्रेनें अपने द्वारा उपयोग की जाने वाली बिजली का लगभग 35% हिस्सा स्वयं ही बना लेती हैं। ये ट्रेनें प्रति किलोमीटर लगभग 5.26 kWh बिजली उत्पन्न करती हैं।
ब्रेक लगाने के दौरान उत्पन्न बिजली को सिस्टम में वापस भेज दिया जाता है। इस बिजली का उपयोग उसी ट्रैक पर चल रही अन्य ट्रेनें कर सकती हैं। यह प्रक्रिया राष्ट्रीय ग्रिड (National Grid) पर पड़ने वाले भारी लोड को कम करती है। यदि पुनर्योजी ब्रेकिंग सिस्टम न हो तो, DMRC को राष्ट्रीय ग्रिड से अधिक बिजली खींचने की आवश्यकता पड़ सकती है। इसके अलावा, बिजली संयंत्रों में अक्सर कोयले का इस्तेमाल होता है, जिससे बड़ी मात्रा में CO2 निकलती है। इसलिए, पुनर्योजी ब्रेकिंग का उपयोग करके, DMRC इन उत्सर्जनों को काबू करने में बहुत बड़ी भूमिका निभा रही है। यही उन्नत तकनीक आज देश की आधुनिक मेट्रो और RRTS जैसी प्रणालियों को भी अधिक ऊर्जा दक्ष और पर्यावरण के अनुकूल बनाती है।
चलिए, अब भारत की उन प्रमुख कंपनियों के बारे में जानते हैं, जो मेट्रो, रेलगाड़ियों और संबंधित प्रौद्योगिकी और उपकरणों का विनिर्माण कर रही हैं।
रेल विकास निगम लिमिटेड (Rail Vikas Nigam Limited): रेल विकास निगम लिमिटेड (Rail Vikas Nigam Limited) की स्थापना 2003 में भारत सरकार द्वारा की गई थी। यह कंपनी रेल मंत्रालय द्वारा सौंपी गई विभिन्न रेल अवसंरचना परियोजनाओं को लागू करने पर ध्यान केंद्रित करती है। RVNL पूरे रेल कोच का निर्माण नहीं करती है। इसके बजाय, यह इन कोचों के संचालन के लिए आवश्यक अवसंरचना को विकसित करती है। रेल परियोजनाओं के अलावा, RVNL प्रमुख शहरों और उपनगरीय क्षेत्रों में मेट्रो लाइनें स्थापित करने का काम भी करती है। अभी तक यह कंपनी 120 परियोजनाएँ पूरी कर चुकी है। साथ ही वर्तमान में 72 परियोजनाएँ कार्यान्वयन में हैं।
टीटागढ़ रेल सिस्टम (Titagarh Rail Systems): टीटागढ़ रेल सिस्टम मालवाहक वैगन (Freight Wagons), यात्री कोच (Passenger Coaches), मेट्रो ट्रेन (Metro Trains) तथा जहाज़ों के निर्माण एवं इन्हें बेचने में माहिर है। यह कंपनी भारत के सबसे बड़े वैगन निर्माताओं में से एक है। इसकी उत्पादन क्षमता प्रति वर्ष 8,400 वैगन है। टीटागढ़ के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा भारतीय रेलवे से आता है। जून 2023 में, टीटागढ़ रेल सिस्टम और बीएचईएल (BHEL) के नेतृत्व वाले एक संघ को एक बड़ा ऑर्डर मिला। यह आर्डर 240 बिलियन रुपये का है, जिसके तहत 2029 तक 80 पूरी तरह से असेंबल की गई वंदे भारत स्लीपर ट्रेन सेट (Vande Bharat Sleeper Train Sets) का निर्माण किया जाना है। इसके अलावा, यह संघ इन ट्रेनों का 35 साल तक रखरखाव भी करेगा।
टेक्समैको रेल एंड इंजीनियरिंग (Texmaco Rail & Engineering): टेक्समैको रेल (Texmaco Rail), ऐडवेंट्ज़ ग्रुप (Adventz Group) का हिस्सा है। इसे भारतीय रेलवे को वैगनों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता माना जाता है। यह कंपनी मालवाहक कारें (Freight Cars), ऑटो कार वैगन (Auto Car Wagons), लोकोमोटिव बोगियां (Locomotive Bogies), कोच बोगियां (Coach Bogies), हाइड्रो-मैकेनिकल उपकरण (Hydro-Mechanical Equipment) और स्टील कास्टिंग (Steel Castings) बनाती है। टेक्समैको मेनलाइन रेलवे और मेट्रो ट्रैक की डिज़ाइनिंग, आपूर्ति, स्थापना और कमीशनिंग में भी शामिल है। भारतीय रेलवे की मेगा खर्च योजना के बाद रेल वैगनों की मांग काफ़ी हद तक बढ़ सकती है। वैगन निर्माण में अपनी मज़बूत स्थिति को देखते हुए यह मांग टेक्समैको रेल के लिए फ़ायदेमंद हो सकती है।
बिटसोर्स सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड (Bitsource Solutions Private Limited): बिटसोर्स सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड उच्च गुणवत्ता वाले रेलवे घटकों के उत्पादन के लिए जानी जाती है। इन घटकों में ब्रेक ब्लॉक (Brake Blocks) और घर्षण सामग्री (Friction Materials) शामिल हैं। यह कंपनी सुरक्षा और विश्वसनीयता के प्रति प्रतिबद्ध नज़र आती है। इस प्रतिबद्धता ने बिटसोर्स को कई रेलवे ऑपरेटरों के लिए एक पसंदीदा आपूर्तिकर्ता बना दिया है।
भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (Bharat Earth Movers Limited): भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (Bharat Earth Movers Limited) एक सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी है। यह कंपनी रेल और मेट्रो विनिर्माण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बीईएमएल (BEML) रेल और मेट्रो से जुड़े उत्पादों की एक विविध श्रेणी का उत्पादन करती है। इन उत्पादों में रेल कोच (Rail Coaches), मेट्रो कार (Metro Cars) और अर्थमूविंग उपकरण (Earthmoving Equipment) शामिल हैं। स्वदेशी विनिर्माण में BEML का योगदान वाक़ई में उल्लेखनीय है।
उक्त सभी के अलावा, कुछ विदेशी कंपनियां भी हैं, जिन्हें मेट्रो और संबंधित प्रौद्योगिकी के उत्पादन हेतु अनुबंधित किया गया है। जिस प्रकार देश में आधुनिक मेट्रो नेटवर्क का विस्तार हो रहा है और मेरठ में हाल ही में उद्घाटित RRTS जैसी अत्याधुनिक प्रणालियाँ विकसित की जा रही हैं, उसी प्रकार इन वैश्विक कंपनियों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। इन कंपनियों में शामिल हैं:
एल्सटॉम (Alstom): एल्सटॉम को स्मार्ट और संधारणीय गतिशीलता (Sustainable Mobility) के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी माना जाता है। कंपनी ने दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (Delhi Metro Rail Corporation) के लिए अत्याधुनिक मेट्रोपोलिस ट्रेनसेट (Metropolis Trainsets) का उत्पादन शुरू भी कर दिया है। यह उत्पादन चरण IV परियोजना के हिस्से के रूप में फरवरी 2024 में शुरू हुआ था। नवंबर 2022 में दिए गए ऑर्डर में 52 ट्रेनसेट (Trainsets) की डिलीवरी शामिल है। प्रत्येक ट्रेनसेट में छह कारें होती हैं। यह परियोजना DMRC की तीन अलग-अलग लाइनों का समर्थन करेगी। इनमें से दो लाइनों को मौजूदा लाइन 7 और लाइन 8 का विस्तार करके बनाया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, एक नई गोल्ड लाइन (Gold Line) (लाइन 10) होगी जो एरोसिटी (Aerocity) को तुगलकाबाद से जोड़ेगी। यह नई लाइन कुल 64.67 किमी की दूरी तय करेगी।
चेन्नई मेट्रो रेल अनुबंध (Chennai Metro Rail Contract): 2023 में, चेन्नई मेट्रो रेल लिमिटेड (Chennai Metro Rail Limited) ने जापान की मित्सुई एंड कंपनी लिमिटेड (Mitsui & Co. Ltd.) को ₹163.31 करोड़ का अनुबंध प्रदान किया था। यह अनुबंध 60 किलोग्राम हेड-हार्डेन्ड (Head-Hardened) के 1080 ग्रेड रेल (Grade Rail) की आपूर्ति हेतु किया गया था। इन रेलों का उपयोग मेट्रो परियोजना के दूसरे चरण के 52 किलोमीटर के हिस्से पर चालक रहित ट्रेनों के लिए किया जाएगा। सीएमआरएल (CMRL) के अनुसार, मित्सुई कंपनी कुल 13,885 मेट्रिक टन ग्रेड रेल की आपूर्ति करेगी। इन रेलों का उत्पादन और परीक्षण अप्रैल 2023 में शुरू हुआ। रेल की आपूर्ति तीन लॉट में होगी। ये डिलीवरी सितंबर 2023 और फरवरी 2025 के बीच निर्धारित की गई है। पूरा चरण-2 प्रोजेक्ट (Phase-2 Project) 118.9 किलोमीटर तक फैला है और इसमें तीन कॉरिडोर (Corridors) शामिल हैं। इस परियोजना के 2026 तक पूरा होने की उम्मीद है।
होली की अनोखी परंपराएं और रंगों से जुड़ी रोचक सांस्कृतिक विरासत
अपने चटख रंगों, पानी और तमाम तरह की मस्तियों के कारण होली को मजाक-मस्ती करने वाले लोगों द्वारा अत्यधिक पसंद किया जाता है। यह त्यौहार अपने साथ बहुत उत्साह और उमंग लेकर आता है, जिसमें अत्यंत उत्साह-पूर्ण मजाक लोगों द्वारा किये जाते हैं। कपड़ों से लेकर खाद्य पदार्थों तक, सभी चीजें इस मस्ती भरे उत्सव के लिए विशेष रूप से चुनी जाती हैं। इस त्यौहार को लेकर कई मजेदार परंपराएं भी हमारे समाज में मौजूद हैं। होलिका दहन के अलावा, होली को सही मायने में मनाने के कई अन्य पारंपरिक तरीके हैं। चूंकि, हमारे देश में अलग-अलग सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोग रहते हैं, इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है, कि यहां होली के त्यौहार के संबंध में बहुत सारी अलग-अलग परंपराएं मौजूद हैं। ये परंपराएं इस त्यौहार को और भी अधिक मजेदार बनाती हैं, हालांकि, कुछ रस्में अजीब भी प्रतीत होती हैं। इन विचित्र परंपराओं में उत्तर प्रदेश की लठमार होली, हुरंग होली, बिच्छू की होली, राजस्थान की हाथी होली, पंजाब में होला मोहल्ला आदि शामिल हैं। तो चलिए सबसे पहले बात करते हैं, लठमार होली की, जिसमें महिलाओं द्वारा पुरूषों पर लाठी मारकर होली मनायी जाती है। उत्तर प्रदेश में मथुरा जिले के सभी हिस्सों से हजारों पुरुष बरसाना नामक गाँव के राधा रानी मंदिर में आते हैं। एक छोटे से अनुष्ठान समारोह के बाद, हर कोई मंदिर परिसर और उसके सामने बनी प्रसिद्ध 'रंग रंगीली गली' में एकत्रित होता है। सबसे पहले महिलाओं द्वारा पुरुषों पर रंग लगाया जाता है। ग्रामीणों द्वारा लोक गीत गाए जाते हैं, तथा महिलाओं द्वारा नृत्य किया जाता है। मिठाई की दुकानों पर भांग से बनी ठंडाई को सबको परोसा जाता है। अगले दिन, पुरुष फिर से बरसाना पहुंचते हैं, और इस बार वे गाँव की महिलाओं पर रंग डालने की कोशिश करते हैं। फिर, महिलाएं लाठियां लेती हैं और पुरुषों को पीटने की कोशिश करती हैं तथा पुरूष खुद को ढाल से बचाने की कोशिश करते हैं। यह सब मजाक में किया जाता है और हर कोई इकट्ठा होकर इस मजाक में भाग लेता है। इस परंपरा को निभाने का कारण भगवान कृष्ण और राधा से जुड़ा हुआ है। किवदंती के अनुसार भगवान कृष्ण नंदगांव से राधा की नगरी बरसाना में आया करते तथा राधा और उनकी सहेलियों को छेड़ा करते। परिणामस्वरूप उन्हें बरसाना से निकाल दिया जाता। इस प्रकार हर साल जब भी नंदगांव से पुरूष बरसाना जाते, तब उन पर महिलाओं द्वारा लाठियों से प्रहार किया जाता। पुरुष खुद को बचाने की कोशिश करते, लेकिन जो बचने में असफल हो जाते, उन्हें महिलाओं द्वारा पकड़ लिया जाता तथा महिला का परिधान पहनाकर सार्वजनिक रूप से नृत्य करवाया जाता। तब से इस परंपरा को मथुरा जिले में निभाया जा रहा है। जबकि, होली के कुछ दिन पहले मनायी जाने वाली लठमार होली से लगभग सभी लोग परिचित हैं, वहीं मथुरा के निकट दाऊजी मंदिर में हुरंगा उत्सव की जानकारी कम ही लोगों को है। होली के एक दिन बाद मनाया जाने वाला हुरंगा उत्सव एक विचित्र अनुष्ठान है। दाऊजी मंदिर में सुबह के दर्शन के तुरंत बाद, बलदेव और पड़ोसी गांवों के लगभग 10,000 भक्त मंदिर प्रांगण में इकट्ठा होते हैं। इसके दो घंटे बाद मंदिर परिसर लड़ाई का मैदान बन जाता है। पुरुष महिलाओं पर केसरी रंग का पानी डालते हैं, तथा बदले में महिलाएं पुरुषों की कमीज फाड़कर उन्हें उससे पीटती हैं। सामान्य रूप से यह खेल देवर और भाभी के बीच खेला जाता है। होली की एक अन्य विचित्र परंपरा इटावा जिले की ताखा तहसील के सौंथाना गाँव में भी देखने को मिलती है, जहां लोग होली के अवसर पर बिच्छुओं के साथ खेलते हैं तथा उनकी पूजा करते हैं। अनुष्ठान के दौरान, लोग भाईसन (Bhaisan) देवी टीला में इकट्ठा होते हैं, तथा ढोल बजाकर 'फाग' (लोकगीत) गाते हैं। वे भाईसन देवी टीला की चट्टानों से बिच्छू पकड़ते हैं तथा उन्हें अपने शरीर के विभिन्न हिस्सों पर डालते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है, कि बिच्छू उन्हें काटते नहीं हैं। माना जाता है कि, होली के दिन 'फाग' सुनने पर, बिच्छू अपने आप झाड़ियों से निकलकर टीले में आ जाते हैं। फाग गाने के बाद, बिच्छुओं को वापस उसी स्थान पर छोड़ दिया जाता है। राजस्थान में इस मस्ती भरी होली को हाथियों के साथ मनाया जाता है। जयपुर शहर में, हाथियों के लिए एक सौंदर्य प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। यहां हाथियों की शोभायात्रा निकाली जाती है, तथा उनके बीच रस्साकशी का खेल भी आयोजित किया जाता है। पंजाब में सिख इस त्यौहार को एक योद्धा शैली में मनाते हैं। वे आनंदपुर साहिब में होला मोहल्ला नामक एक प्रदर्शनी आयोजित करते हैं, जिसमें मार्शल आर्ट (Martial arts), कुश्ती, तलवार-बाजी आदि का प्रदर्शन किया जाता है। वाराणसी में, होली के मौके पर श्मशान घाट की राख को रंगों के साथ मिलाया जाता है तथा उससे होली खेली जाती है। वे ऐसा इसलिए करते हैं, क्यों कि, उनका मानना है, कि मृत्यु मोक्ष का मार्ग है और हमें मृत्यु से नहीं डरना चाहिए। इसी प्रकार की विचित्र परंपराओं का अनुसरण देश के विभिन्न हिस्सों में किया जा रहा है।
जनसंख्या (2025)Source:
Census 2011; population projections based on 2011 city growth rates.
1,605,532
इंटरनेट उपयोगकर्ता
इंटरनेट उपयोगकर्ताSource:
The number of Internet connections was determined by multiplying the number of urban Internet subscribers with the percentage of the District Headquarters (DHQ) population in relation to the total urban population. The value was allocated to DHQs based on population ratio. Urban population is distributed in a 1.5:1 ratio between DHQ and non-DHQ cities. (TRAI September 2025 Report / Number)
2,040,803
फेसबुक उपयोगकर्ता
फेसबुक उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Facebook Users. (As per Facebook Ad Module, 31 December 2025)
609,950
लिंक्डइन उपयोगकर्ता
लिंक्डइन उपयोगकर्ताSource:
The number of unique member accounts that could be potentially reached in the city. (LinkedIn Ad Module, December 2025)
800,000
ट्विटर उपयोगकर्ता
ट्विटर उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Twitter Users (X Ad Module,December 2025)
421,500
इंस्टाग्राम उपयोगकर्ता
इंस्टाग्राम उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Instagram Users (Instagram Ad Module,December 2025)