पेले कैसे बने तीन विश्व कप जीतने वाले दुनिया के एकमात्र खिलाड़ी
पेले (Pelé) फुटबॉल इतिहास के सबसे महान खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। उनका पूरा नाम एडसन अरांटिस दो नसिमेंटो (Edson Arantes do Nascimento) था, लेकिन दुनिया उन्हें प्यार से पेले के नाम से जानती है। अपनी असाधारण प्रतिभा, गोल करने की क्षमता और खेल के प्रति समर्पण के कारण वे फुटबॉल के वैश्विक प्रतीक बन गए।https://sceh.net पेले ने मात्र 15 वर्ष की आयु में सैंटोस क्लब के लिए और 16 वर्ष की आयु में ब्राज़ील की राष्ट्रीय टीम के लिए खेलना शुरू कर दिया था। वर्ष 1958 में केवल 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने ब्राज़ील को विश्व कप जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और विश्व कप जीतने वाले सबसे युवा खिलाड़ी बने। इसके बाद उन्होंने 1962 और 1970 में भी ब्राज़ील को विश्व कप खिताब दिलाने में योगदान दिया। आज भी वे तीन फीफा विश्व कप जीतने वाले एकमात्र खिलाड़ी हैं।अपने करियर में पेले ने 1,000 से अधिक गोल किए और अपनी शानदार तकनीक, गति तथा गोल करने की अद्भुत क्षमता से दुनिया भर के प्रशंसकों का दिल जीता। उन्हें "ओ रेई" अर्थात "फुटबॉल का राजा" भी कहा जाता है।पेले की विरासत केवल उनके रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है। उन्होंने फुटबॉल को दुनिया के हर कोने तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आज भी उन्हें खेल इतिहास के सबसे प्रभावशाली खिलाड़ियों में से एक माना जाता है।संदर्भ - https://tinyurl.com/2tme84zf
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
हमारे देश में क्रिकेट की ख्याति के कारण, मेरठ शहर कैसे बना खेल सामग्री उत्पादन का केंद्र?
आज के हमारे लेख में हम क्रिकेट के इतिहास को समझेंगे, और जानेंगे कि इसकी शुरुआत कहां एवं कैसे हुई। फिर हम यह पता लगाएंगे कि, भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान क्रिकेट की शुरुआत कैसे हुई। आगे, हम देखेंगे कि हमारा शहर मेरठ, क्रिकेट उपकरण निर्माण का एक महत्वपूर्ण केंद्र कैसे बना। हम क्रिकेट में उपयोग किए जाने वाले उपकरणों और इस खेल के नियमों पर भी गौर करेंगे। अंततः, हम सैयद मुश्ताक अली जैसे उल्लेखनीय खिलाड़ियों एवं अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत की उपलब्धियों की जांच करेंगे।माना जाता है कि, क्रिकेट का आविष्कार सैक्सन (Saxon) या नॉर्मन काल (Norman times) के दौरान दक्षिण-पूर्व इंग्लैंड के वेल्ड (Weald) क्षेत्र में रहने वाले बच्चों द्वारा किया गया था। क्रिकेट को वयस्क खेल के रूप में खेले जाने का पहला संदर्भ, 1611 में था। उसी वर्ष, एक शब्दकोश में क्रिकेट को ‘लड़कों के एक खेल’ के रूप में परिभाषित किया गया। यह भी विचार प्रचलित है कि, क्रिकेट की उत्पत्ति कटोरों से हुई होगी, जिनसे बल्लेबाज द्वारा मारे गए गेंद को उसके लक्ष्य तक पहुंचने से रोकने की कोशिश की जाती थी।सत्रहवीं सदी के मध्य तक ग्रामीण क्रिकेट विकसित हो चुका था। इसी सदी के उत्तरार्ध में, पहले अंग्रेजी प्रादेशिक संघ बनाए गए। बाद में, अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में लंदन (London) और इंग्लैंड (England) के दक्षिण-पूर्वी प्रदेशों में, एक प्रमुख खेल के रूप में क्रिकेट स्थापित हुआ। हालांकि, यात्रा बाधाओं के कारण इसका प्रसार सीमित था, यह धीरे-धीरे इंग्लैंड के अन्य हिस्सों में लोकप्रियता हासिल कर रहा था। फिर, 1745 से महिला क्रिकेट की भी शुरुआत हुई।1744 में, क्रिकेट के पहले नियम लिखे गए, और बाद में 1774 में इन्हें संशोधित किया गया। ‘स्टार एंड गार्टर क्लब (Star and Garter Club)’ द्वारा इसके कोड तैयार किए गए थे, जिनके सदस्यों ने 1787 में लॉर्ड्स (Lord’s) में प्रसिद्ध ‘मैरीलेबोन क्रिकेट क्लब (Marylebone Cricket Club)’ की स्थापना की थी। यह क्लब बाद में क्रिकेट के नियमों का संरक्षक व संशोधक बन गया।सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत में, अंग्रेजी उपनिवेशों के माध्यम से क्रिकेट उत्तरी अमेरिका में लोकप्रिय हुआ, और अठारहवीं शताब्दी में यह दुनिया के अन्य हिस्सों में पहुंचा। वेस्ट इंडीज (West Indies) में इसे उपनिवेशवादियों द्वारा और भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नाविकों द्वारा लाया गया था। 1788 में उपनिवेशीकरण शुरू होते ही, यह ऑस्ट्रेलिया (Australia) पहुंचा। जबकि, उन्नीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में क्रिकेट न्यूजीलैंड (New Zealand) और दक्षिण अफ्रीका (South Africa) में प्रमुख बनने लगा।https://sceh.net क्रिकेट के खेल को सत्रहवीं एवं अठारहवीं शताब्दी में इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नाविकों और व्यापारियों द्वारा, भारतीय उपमहाद्वीप में परिचित करवाया गया था। भारत में क्रिकेट का सबसे पहला ज्ञात रिकॉर्ड, 1721 का है। इसके अलावा, देश में पहला क्रिकेट क्लब 1792 में स्थापित किया गया था। 1886 और 1888 के ग्रीष्म ऋतु में, भारतीय पारसी क्रिकेट संघ ने इंग्लैंड का दौरा किया। 1889-90 की सर्दियों में, अंग्रेजी खिलाड़ियों का एक संघ, भारत का दौरा करने वाला पहला संघ था। 1912-13 तक, बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) प्रतियोगिताओं में हिंदू क्रिकेट संघ और मुस्लिम क्रिकेट संघ भी शामिल हुए। इसके तुरंत बाद, कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) और मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में इसी तरह की स्पर्धाएं शुरू हुई। इस प्रकार, 1918 के अंत तक भारत में प्रथम श्रेणी क्रिकेट की स्थापना हो गयी।चलिए, अब जानते हैं कि, हमारे शहर मेरठ से क्रिकेट का क्या संबंध है। हमारा मेरठ शहर, लंबे समय से क्रिकेट खेल के सामान के निर्माण में अग्रणी रहा है। मेरठ को अक्सर ही, "भारत का खेल शहर" कहा जाता है, क्योंकि यह देशज और अंतर्राष्ट्रीय खेल सामान बाजारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हमारे शहर के खेल उद्योग की विशेषता, विनिर्माण इकाइयों का समूह है, जिसमें बड़े उद्यमों से लेकर कई छोटे और सूक्ष्म स्तर के व्यवसाय शामिल हैं।मेरठ के खेल उद्योग की उत्पत्ति का पता उन्नीसवीं शताब्दी से लगाया जा सकता है, जब स्थानीय कारीगरों ने शुरुआत में भारत में तैनात ब्रिटिश सैनिकों के लिए खेल सामान तैयार किए थे। इसमें मुख्य रूप से स्वदेशी लकड़ी और चमड़े का उपयोग किया गया था। हालांकि, इस उद्योग के आधुनिक विकास का सच्चा उत्प्रेरक 1947 में हुआ भारत का विभाजन था। सियालकोट (वर्तमान पाकिस्तान में) से कई उच्च कुशल हिंदू खेल उपकरण कारीगर भारत चले आए। ऐसे कई कारीगर जालंधर (पंजाब) और मेरठ जैसे शहरों में बस गए। इस आमद ने आधुनिक भारतीय खेल सामान उद्योग की नींव रखी, जिसकी औपचारिक औद्योगिक स्थापना 1948 के आसपास मेरठ में शुरू हुई।तब से, जालंधर के साथ-साथ हमारा शहर मेरठ, एक प्रमुख खेल उद्योग शक्ति के रूप में उभरा है। गौरतलब है कि, मेरठ भारत के कुल खेल सामान उत्पादन में अनुमानित तौर पर 75%-80% योगदान देता है। यहां, आज यह उद्योग 1,500 से अधिक छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों तथा हजारों सूक्ष्म और घरेलू इकाइयों के विशाल नेटवर्क में विकसित हुआ है। यह उल्लेखनीय वृद्धि कारीगरों की पीढ़ियों के साथ गहराई से जुड़ी हुई है, जिन्होंने पारंपरिक ज्ञान और सटीकता को निरंतर सुनिश्चित किया है।हमारे मेरठ व अन्य जगहों पर बनने वाली क्रिकेट की गेंद, कॉर्क से बनी, लाल, सफेद या गुलाबी रंग की होती है, जिसे चमड़े में लिपटा जाता है। सामान्य, गेंद की परिधि 9.1 इंच (23 सेंटीमीटर) होनी चाहिए। दूसरी तरफ, खेल में लकड़ी के बल्ले का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए प्रयुक्त लकड़ी कश्मीर या इंग्लिश विलो पेड़ की होती है। यह 38 इंच (96.5 सेमी) से अधिक लंबा और 4.25 इंच (10.8 सेमी) चौड़ा नहीं हो सकता। बल्ले का हैंडल लंबा होता है, और एक तरफ की सतह सपाट होती है। इस खेल में, तीन सीधे लकड़ी के स्टंप (Stump) का प्रयोग होता है, जिनपर लकड़ी से बने दो क्रॉसपीस (Crosspieces) अर्थात बेल्स (Bails) रखे जाते हैं। गेंद के स्टंप को छूने पर, ये बेल्स गिरते हैं, और तब विकेट लिया जाता है।इसके अलावा, कोई खिलाड़ी गेंद से अपना बचाव करने हेतु कई तरह के पैड (Pad) और गार्ड (Guard) पहनते हैं। इसमें हेलमेट, पैरों के लिए पैड, छाती एवं हाथों के गार्ड, तथा दस्ताने आदि शामिल हैं।हम जानते ही हैं कि, क्रिकेट भारत का सिर्फ लोकप्रिय खेल ही नहीं बल्कि, एक सफल खेल भी है। भारतीय राष्ट्रीय क्रिकेट संघ ने 1932 में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया, और तब से 2005 से 2008 तक प्रत्येक बार (आईसीसी रैंकिंग) में शीर्ष चार टेस्ट संघों में शामिल रहा। संघ ने 1983 और 2011 में वन डे क्रिकेट विश्व कप जीता था। देश के संघ की अन्य प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय जीतों में, 2007, 2024 और 2026 में तीन बार टी20 विश्व कप तथा 2002, 2013 और 2025 में आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी शामिल हैं।भारत ने अपना पहला विश्व कप 1983 में कपिल देव की कप्तानी में जीता था। फिर, 80 और 90 के दशक में सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, वी. लक्ष्मण और अनिल कुंबले का भी पदार्पण हुआ, जिन्हें महानतम भारतीय खिलाड़ियों में से एक माना जाता है।गांगुली की कप्तानी को भारतीय क्रिकेट का निर्णायक मोड़ माना जाता है, क्योंकि उस समय में संघ को बड़ी सफलता मिली। इसके बाद महेंद्रसिंह धोनी ने भी शानदार कप्तानी की। इसके अलावा, आज विराट कोहली, रोहित शर्मा एवं सूर्यकुमार यादव की कप्तानी काफी महत्वपूर्ण है।क्रिकेट में कुछ खिलाड़ी, अपने दृष्टिकोण से इस खेल को फिर से परिभाषित करने में कामयाब रहे हैं। ऐसे ही एक खिलाड़ी, सैयद मुश्ताक अली है। अपनी आक्रामक बल्लेबाजी और तेजतर्रारता के कारण, उनको काफी प्रशंसा मिली है। सैयद मुश्ताक अली ने विदेश में टेस्ट शतक बनाने वाले पहले भारतीय के रूप में इतिहास रचा था। यह उपलब्धि उन्होंने 1936 में ओल्ड ट्रैफर्ड (Old Trafford) में इंग्लैंड के खिलाफ हासिल की थी। उनका अंतरराष्ट्रीय पेशा 1934 से 1952 के बीच सिर्फ 11 टेस्ट मैचों तक सीमित था। परंतु, इस दौरान उन्होंने 612 रन बनाए, जिसमें दो शतक और तीन अर्द्धशतक शामिल थे।फ़िरोज़ पालिया और मुश्ताक अलीदाएं हाथ से बल्लेबाजी करने वाले मुश्ताक अली ने अपने अभूतपूर्व प्रथम श्रेणी पेशे में, 226 मैच खेले, 13,213 रन बनाए और 30 शतक एवं 63 अर्द्धशतक लगाए। उन्होंने अपनी बाएं हाथ की स्पिन से 162 विकेट भी लिए। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने अपने शीर्ष घरेलू टी20 क्रिकेट स्पर्धाओं में से एक प्रतियोगिता का नाम उनके नाम पर रखकर, उनकी विरासत का सम्मान किया है। यह प्रतियोगिता सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/mry2r9hf 2. https://tinyurl.com/39zajyhr 3. https://tinyurl.com/yx5vtv7z 4. https://tinyurl.com/4w7kjn35 5. https://tinyurl.com/y32ermpe 6. https://tinyurl.com/bder7x85 7. https://tinyurl.com/bdjjfjtj 8. https://tinyurl.com/yp8jyk78
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
ज्ञान व प्रेरणा से कैसे संबंधित हैं, प्राचीन ग्रीस की म्यूज़ेस व पारसी धर्म में स्पेंटा?
मेरठ, आज के लेख में हम समझेंगे कि, ग्रीक परंपरा में म्यूज़ेस (Muses) कौन थीं और वे ज्ञान, कला और प्रेरणा से कैसे जुड़ी हैं। फिर, हम नौ म्यूज़ेस और उनके प्रतीकात्मक क्षेत्रों का पता लगाएंगे। आगे, हम देखेंगे कि माउसियन (Mouseion) शब्द, किसी ‘सीखने के स्थान’ को कैसे संदर्भित करता है। तब, हम पारसी विचारधारा में स्पेंटा (Spenta) की अवधारणा को भी समझेंगे। अंततः हम यह पता लगाएंगे कि, इन अवधारणाओं की तुलना कैसे की जा सकती है, और ज्ञान को मानव प्रगति के लिए शक्तिशाली रूप में क्यों देखा गया है।प्राचीन यूनानी धर्म और पौराणिक कथाओं में ‘म्यूज़ेस’, साहित्य, विज्ञान और कला की प्रेरणादायक देवियां थीं। उन्हें कविता, गीतों, नृत्य और मिथकों में ‘ज्ञान के स्त्रोत’ के रूप में उल्लेखित किया जाता था। हालांकि, आधुनिक आलंकारिक उपयोग में म्यूज़ वह व्यक्ति है, जो किसी की कलात्मक प्रेरणा के स्रोत के रूप में कार्य करता है। म्यूज़ेस की संख्या और नाम, उनके प्रतीकात्मक क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग थे। लेकिन शास्त्रीय काल से, उनकी संख्या को नौ तक मानकीकृत किया गया था। ये नौ म्यूज़ेस निम्नलिखित हैं –https://sceh.net 1. कैलीओप (Calliope)कैलीओप, म्यूज़ेस की सबसे बड़ी और सबसे सम्मानित देवी थी। वे महाकाव्य की अध्यक्षता करती है, जिनमें देवताओं, नायकों और मानव स्थिति की भव्य कथाएं शामिल हैं। कहा जाता है कि, उनकी आवाज़ सबसे प्रभावशाली थी, और उनकी उपस्थिति राजसी है। कला में, कैलीओप को अक्सर ही चित्रित किया जाता है।2. क्लियो (Clio)क्लियो इतिहास की म्यूज़ है, जो मानव कर्मों की इतिहासलेखक थी। क्लियो को सामान्यतः एक स्क्रॉल या किताब के साथ चित्रित किया जाता है। क्लियो की भूमिका उस संस्कृति में महत्वपूर्ण थी, जो मौखिक परंपरा को महत्व देती थी, और यह सुनिश्चित करती थी कि, मानवता की जीत और विफलताओं को भुलाया नहीं जाए।3. एराटो (Erato)प्रेम कविता की म्यूज़ - एराटो, जुनून और इच्छा को संरक्षित करती है। हाथ में वीणा और बालों में गुलाब के फूल सजाकर, वह प्रेम के आनंद और पीड़ा को व्यक्त करने वाले छंदों को प्रेरित करती है।4. यूटरपे (Euterpe)यूटरपे, संगीत की म्यूज़ है, जो माधुर्य और सद्भाव की प्रेरक है। उसे अक्सर ही, एक वाद्ययंत्र बजाते हुए चित्रित किया जाता है, जिसकी ध्वनि के माध्यम से खुशी और सांत्वना आती है। प्राचीन ग्रीस में, संगीत कविता और नृत्य से यूटरपे अविभाज्य थी, और उनका प्रभाव संगीत अभिव्यक्ति के सभी रूपों तक फैला हुआ था।यूटरपे की प्रतिमा5. मेलपोमीन (Melpomene)मेलपोमीन, त्रासदी की म्यूज़ एवं अस्तित्व के गहरे पहलुओं की दर्पण है। एक हाथ में अपना दुखद मुखौटा और दूसरे हाथ में एक तलवार के साथ, वह उन नाटकों की अध्यक्षता करती है, जो पीड़ा, भाग्य और मुक्ति का पता लगाते हैं। प्राचीन ग्रीस में, कुछ त्रासदियों को त्योहारों के दौरान प्रदर्शित किया जाता था, जो साझा दुःख के माध्यम से दर्शकों को राहत प्रदान करते थे।6. पॉलीहिमनिया (Polyhymnia)पॉलीहिमनिया, पवित्र कविता और भजनों की म्यूज़ है, जो मानवता और ब्रह्मांड के बीच दिव्य संबंध का प्रतीक है। उसे सामान्यतः, रहस्य और चिंतन का संकेत देते हुए घूंघट में चित्रित किया जाता है। उनके क्षेत्र में धार्मिक भजन, वक्तृत्व और नाटक शामिल है, जो गंभीर व आध्यात्मिक अभिव्यक्ति में उनकी भूमिका को दर्शाते हैं।7. टेरप्सीचोर (Terpsichore)टेरप्सीचोर, नृत्य और आनंद की प्रेरणा है, जिसकी गतिविधियां जीवन की लय का उत्सव हैं। उसे अक्सर ही वीणा पकड़े हुए चित्रित किया गया है। प्राचीन ग्रीस में, नृत्य एक सामुदायिक कार्य था, जो लोगों को साझा गति से एकजुट करता था।8. थालिया (Thalia)थालिया, सुखांत नाटक की प्रतीक व हंसी का उपहार है। वह उन नाटकों की अध्यक्षता करती है, जो मानवीय मूर्खता का मजाक उड़ाते हैं, और जीवन की बेतुकी बातों का जश्न मनाते हैं। प्राचीन ग्रीस में, कुछ सुखांत नाटकों में राजनेताओं और देवताओं का मज़ाक उड़ाया जाता था, तथा इनसे राहत और व्यंग्य पेश किए जाते थे।थालिया की प्रतिमा9. यूरेनिया (Urania)यूरेनिया, खगोल विज्ञान की म्यूज़ है। उसे सितारों व ब्रह्मांड को देखते हुए, तथा एक हाथ में पृथ्वी के साथ चित्रित किया जाता है। प्राचीन ग्रीस में खगोल विज्ञान, ब्रह्मांड में मानवता के स्थान को समझने का एक तरीका था।म्यूज़ेस से संबंधित एक अन्य शब्द ‘माउसियन (Mouseion)’ है। इस शब्द की व्युत्पत्ति से 'म्यूज़ियम (Muzeum)’ अर्थात संग्रहालय शब्द प्रचलित हुआ। माउसियन शब्द का शाब्दिक अर्थ “म्यूज़ का स्थल या मंदिर” है। दरअसल, पहला संग्रहालय अलेक्जेंड्रिया संग्रहालय (Alexandria Museum) था, जिसे 300 ईसा पूर्व में टॉलेमी (Ptolemy) द्वारा एक मंदिर, पुस्तकालय, खगोलीय वेधशाला, रंगमंडल, वनस्पति उद्यान और अनुसंधान स्थल के रूप में स्थापित किया गया था। संग्रहालयों की शुरुआत, बाद में निजी संग्रहों में पाई जा सकती है, जो अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक जारी रही। इसके अतिरिक्त, ज्ञानोदय और फ्रांसीसी क्रांति के साथ, संग्रहालयों को मिथकों, रूढ़ि और अंधविश्वासों से लड़ने के लिए एक जगह के रूप में देखा जाने लगा। इस प्रकार ऐसे संग्रहों को धीरे-धीरे सार्वजनिक संग्रहालयों द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया।म्यूज़ियम ऑफ फाइन आर्ट्स, बुडापेस्टइस प्रकार हम कह सकते हैं कि, "संग्रहालय" शब्द की उत्पत्ति, इसकी शुरुआत का संकेत देती है। पहले इसे "म्यूज़ का स्थल या मंदिर" माना जाता था। हालांकि, समय के साथ इस शब्द का अर्थ, सीखने और अध्ययन का स्थान बन गया।चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान, यूनानी दार्शनिक - एरिस्टोटल (Aristotle) ने, एथेंस (Athens) में लिसेयुम (Lyceum) नामक एक स्कूल की स्थापना की। इस प्रतिष्ठान से जुड़े माउसियन में अनुसंधान उद्देश्यों के लिए एरिस्टोटल के प्राकृतिक इतिहास के नमूनों का संग्रह रखा गया था। यह इस प्रकार के संग्रह के सबसे पहले ज्ञात उदाहरणों में से एक है।जब एक शताब्दी के बाद, अलेक्जेंड्रिया में एक ऐसी ही अकादमी स्थापित की गई, तो सीखने के पूरे स्थान को ही माउसियन के नाम से जाना जाने लगा। फिर, रोमनों ने ग्रीक शब्द - माउसियन के लैटिन संस्करण ‘म्यूज़ियम’ का उपयोग करना शुरू किया। तब तक, इस शब्द का उपयोग सामान्यतः दार्शनिक चर्चा के लिए समर्पित एक जगह का वर्णन करने के लिए किया जाता था।पश्चिमी यूरोप में, अध्ययन और प्रदर्शन के लिए प्राकृतिक इतिहास के नमूनों या दिलचस्प जिज्ञासाओं का संग्रह बनाने की अवधारणा, पहली बार पुनर्जागरण काल के दौरान व्यापक रूप से प्रचलित गई। चौदहवीं सदी के अंत में इटली में शुरु हुआ यह समय, सांस्कृतिक क्रांति का था। इसने अन्वेषण के एक नए युग की भी शुरुआत की, जिसके परिणामस्वरूप, दिलचस्प और असामान्य संग्रह बनाने के लिए उपलब्ध वस्तुओं की सीमा काफी बढ़ गई। समय के साथ, यह शब्द डेनिश और अंग्रेजी संस्कृतियों एवं संग्रहों में भी प्रसिद्ध हुआ।पारसी धर्म में, म्यूज़ की तरह ही, अमेसा स्पेंटा (Amesa Spenta) की अवधारणा प्रख्यात है। वे छह (या सात) महादूत हैं, जो अहुरा मज़्दा (Ahura Mazda) अर्थात सर्वोच्च भगवान की आकृति को घेरे हुए होते हैं। वे उस भगवान के धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अधीनस्थ हैं। अमेसा स्पेंटा ऐसे कार्य करते हैं, जो स्वर्गदूतों के अनुरूप होते हैं। वे अहुरा मज़्दा के पारगमन को अंतर्निहित बनाते हैं, और समझदार लोगों में उनकी लाभकारी उपस्थिति की तरह होते हैं। वे मनुष्य को बुराई और अंधेरे की शक्तियों के खिलाफ लड़ाई में मदद करते हैं। इसका अर्थ है कि, कोई मनुष्य अमेसा स्पेंटा द्वारा दर्शाए गए गुणों को ग्रहण कर सकता है। फिर, इनका युगांतशास्त्रीय कार्य (व्यक्तिगत और सामूहिक) भी प्रशंसनीय है, जो पारसी धर्म के लिए महत्वपूर्ण विषय है।अहुरा मज़्दापारसी विचार में स्पेंटा की अवधारणा, और ग्रीक म्यूज़ेस की संबंधित संस्कृतियों में ज्ञान, रचनात्मकता और दिव्य प्रेरणा के प्रतीकों के रूप में तुलना की जा सकती है। पारसी धर्म में, अमेसा स्पेंटा सत्य, धार्मिकता, भक्ति और प्रबुद्ध चेतना के पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो ब्रह्मांडीय सिद्धांतों और मार्गदर्शक शक्तियों के रूप में कार्य करते हैं। ये मानव जीवन में नैतिक और बौद्धिक स्पष्टता को प्रेरित करते हैं। इसी तरह, प्राचीन ग्रीक परंपरा में म्यूज़ेस, कला, साहित्य और ज्ञान की अध्यक्षता करते हैं। म्यूज़ेस कवियों, विचारकों और कलाकारों को सृजन और समझने के लिए प्रेरित भी करते हैं। जबकि स्पेंटा नैतिक और आध्यात्मिक व्यवस्था से अधिक निकटता से जुड़े हुए हैं, म्यूज़ेस कलात्मक और बौद्धिक अभिव्यक्ति पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इस अंतर के बावजूद, दोनों इस विचार को मूर्त रूप देते हैं कि, ज्ञान और रचनात्मकता पूरी तरह से मानवीय गुण नहीं हैं, बल्कि उच्च, पारलौकिक शक्तियों के साथ संबंध के माध्यम से उन्नत होते हैं। ये अवधारणाएं मानव ज्ञान के लिए आवश्यक दैवीय प्रेरणा में, प्रत्येक संस्कृति के विश्वास को दर्शाते हैं।ज्ञान, असल में सशक्तिकरण है। जब आपके पास किसी विशेष विषय के बारे में जानकारी और समझ होती है, तो आप सोच-समझकर निर्णय लेने का आत्मविश्वास हासिल करते हैं। चाहे वह ज्ञान आपके पेशे, स्वास्थ्य, वित्त, या व्यक्तिगत संबंधों के बारे में हो, वह आपको जीवन की चुनौतियों से अधिक सक्षमता के साथ निपटने में सक्षम बनाता है। ज्ञान नवाचार के पीछे प्रेरक शक्ति भी है। पूरे इतिहास में, मानव प्रगति ज्ञान के संचय और अनुप्रयोग से प्रेरित हुई है। पहिये के आविष्कार से लेकर आधुनिक प्रौद्योगिकियों के विकास तक, ज्ञान हर महत्वपूर्ण प्रगति के मूल में रहा है।जो समाज ज्ञान और शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं, वे अधिक प्रगति और समृद्धि का अनुभव करते हैं। ज्ञान आलोचनात्मक सोच, समस्या-समाधान और रचनात्मकता को बढ़ावा देता है, जो गरीबी, असमानता और जलवायु परिवर्तन जैसे जटिल सामाजिक मुद्दों के समाधान के लिए आवश्यक हैं। इसके अलावा, जब ज्ञान और नवप्रवर्तन को बढ़ावा दिया जाता है, तो अर्थव्यवस्थाएं फलती-फूलती हैं। ज्ञान पर आधारित अनुसंधान और विकास, तकनीकी प्रगति और एक सुशिक्षित कार्यबल आर्थिक विकास के आवश्यक घटक हैं। साथ ही, सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और आगे बढ़ाने के लिए भी, ज्ञान आवश्यक है। भाषा, परंपराओं और इतिहास के प्रसारण के माध्यम से, समाज अपनी विशिष्ट पहचान और परंपराओं को बनाए रख सकते हैं।संदर्भ1. https://tinyurl.com/bhvz5x57 2. https://tinyurl.com/4k94h4vs 3. https://tinyurl.com/2wenauwh 4. https://tinyurl.com/3mad89vv 5. https://tinyurl.com/48xasxkj 6. https://tinyurl.com/bdhht623
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
हिटलर और दूसरे विश्व युद्ध को क्यों नहीं रोक पाया 'लीग ऑफ नेशंस'?
मेरठ के जागरूक पाठकों के लिए इतिहास के पन्नों से एक ऐसी घटना का विश्लेषण प्रस्तुत है, जिसने आधुनिक दुनिया की कूटनीति की नींव रखी। प्रथम विश्व युद्ध के अभूतपूर्व विनाश के बाद दुनिया भर के देशों ने महसूस किया कि भविष्य में ऐसे भयानक युद्धों को रोकने के लिए एक वैश्विक मंच की आवश्यकता है। जिनेवा में स्थापित 'लीग ऑफ नेशंस' दुनिया का पहला ऐसा अंतर-सरकारी संगठन था जिसे अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने और सामूहिक सुरक्षा के ज़रिए शांति बनाए रखने के लिए बनाया गया था। लेकिन विडंबना यह रही कि जिस संगठन का मुख्य उद्देश्य युद्ध रोकना था, वह महज़ दो दशक बाद ही दूसरे विश्व युद्ध को भड़कने से रोकने में पूरी तरह विफल साबित हुआ।क्या था लीग ऑफ नेशंस और विश्व युद्ध के बाद इसे क्यों बनाया गया?प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुए भारी जान-माल के नुक़सान के बाद पूरे यूरोप और अमेरिका के राजनयिकों तथा बुद्धिजीवियों के बीच एक ऐसे संगठन की मांग उठने लगी थी जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा दे सके। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने आठ जनवरी उन्नीस सौ अठारह को अमेरिकी संसद के समक्ष अपनी प्रसिद्ध 'चौदह सूत्रीय योजना' पेश की थी। इस योजना के अंतिम बिंदु में एक ऐसे राष्ट्र संघ के निर्माण का आह्वान किया गया था जो छोटे और बड़े सभी राज्यों को राजनीतिक स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता की समान गारंटी दे सके। चार साल के संपूर्ण युद्ध से थके हुए यूरोप और इस नए संगठन से उम्मीद लगाए बैठे अमेरिकी नागरिकों के बीच विल्सन का यह विचार बेहद लोकप्रिय हुआ। इसका मूल उद्देश्य निरस्त्रीकरण, बातचीत और सामूहिक सुरक्षा के माध्यम से युद्धों को रोकना था। इसके अलावा यह संगठन हथियारों के व्यापार, नशीले पदार्थों की तस्करी और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे अहम मुद्दों पर भी काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया था।वर्साय की संधि से इसका निर्माण कैसे हुआ और इसकी संरचना कैसी थी?लीग ऑफ नेशंस का निर्माण पेरिस शांति सम्मेलन के दौरान हुआ। राष्ट्रपति विल्सन ने जनवरी उन्नीस सौ उन्नीस में पेरिस की यात्रा की और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए इस संगठन के चार्टर को वर्साय की संधि के साथ जोड़ दिया। उनका मानना था कि एक प्रभावी संगठन शांति की शर्तों में होने वाली किसी भी असमानता को कम कर सकेगा। विल्सन और ब्रिटेन के डेविड लॉयड जॉर्ज तथा फ्रांस के जॉर्जेस क्लेमेंस्यू ने मिलकर इसके नियम तय किए। इस संगठन के मुख्य अंगों में सभी सदस्य देशों की एक असेंबली, पाँच स्थायी और चार अस्थायी सदस्यों वाली एक परिषद और एक अंतरराष्ट्रीय न्यायालय शामिल था। इसका लक्ष्य सदस्य देशों की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना और शांति भंग होने की स्थिति में आर्थिक व सैन्य प्रतिबंध लगाने का तंत्र विकसित करना था। हालांकि, वर्साय की संधि के साथ इसे जोड़ना विल्सन की एक बड़ी कूटनीतिक भूल साबित हुई क्योंकि बाद में इसी संधि को बहुत ही सख़्त और अव्यवहारिक मानकर ख़ारिज किया जाने लगा। https://sceh.net क्या भारत इसका हिस्सा था और एक ब्रिटिश उपनिवेश के रूप में इसकी क्या भूमिका थी?लीग ऑफ नेशंस के गठन के समय भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र नहीं था, इसके बावजूद वह इसका एक संस्थापक सदस्य बना। प्रथम विश्व युद्ध में पुरुषों और युद्ध सामग्री के अभूतपूर्व योगदान के कारण भारत को उन्नीस सौ उन्नीस के वर्साय शांति सम्मेलन में जगह मिली थी। इस संगठन में भारत की स्थिति एक अंतरराष्ट्रीय विसंगति की तरह थी क्योंकि यह लीग का एकमात्र ऐसा सदस्य था जिसके पास अपना स्वतंत्र शासन नहीं था। इस अंतरराष्ट्रीय दर्जे ने भारत की बाहरी साम्राज्यवादी स्थिति और आंतरिक औपनिवेशिक वास्तविकताओं दोनों को उजागर किया। जिनेवा में भारत के प्रतिनिधित्व और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति ने ब्रिटिश भारत और रियासतों वाले भारत के बीच के राजनीतिक भूगोल पर सवाल खड़े किए। जब महिलाओं और बच्चों की तस्करी रोकने जैसे अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की बात आई, तो भारत सरकार ने ब्रिटिश और रियासती भारत के बीच अंतरराष्ट्रीय क़ानून को लागू करने से जुड़े कई पेचीदा मुद्दों का सामना किया। कौन से देश इसके सदस्य थे और समय के साथ सदस्यता में क्या बदलाव आए?उन्नीस सौ बीस से लेकर उन्नीस सौ छियालीस के बीच कुल तिरसठ देश लीग ऑफ नेशंस के सदस्य बने। शुरुआत में बयालीस देशों ने इसकी सदस्यता ली थी और बाद में इक्कीस अन्य देश इससे जुड़े। इसका सबसे बड़ा आकार अट्ठाईस सितंबर उन्नीस सौ चौंतीस से फरवरी उन्नीस सौ पैंतीस के बीच था जब इसके सदस्यों की संख्या अट्ठावन पहुँच गई थी। सदस्य देशों के इस मंच से जुड़ने और बाहर निकलने का सिलसिला लगातार चलता रहा। एडोल्फ़ हिटलर के सत्ता में आने के बाद जर्मनी ने अक्तूबर उन्नीस सौ तैंतीस में इसकी सदस्यता छोड़ दी। इसी तरह जापान ने भी एक कठपुतली राज्य को मान्यता न मिलने पर लीग से इस्तीफ़ा दे दिया। इटली ने इथियोपिया पर हमले के बाद लगे प्रतिबंधों के कारण इसे छोड़ दिया। वहीं, सोवियत संघ को फिनलैंड पर अकारण हमला करने के चलते चौदह दिसंबर उन्नीस सौ उनतालीस को लीग से निष्कासित कर दिया गया था। कई अन्य देश भी समय-समय पर इसके फैसलों से असहमत होकर बाहर निकलते रहे।लीग ऑफ नेशंस के लाइब्रेरियनलीग ऑफ नेशंस को फंड कहाँ से मिलता था और इसका वित्तीय प्रबंधन कैसे होता था?इस वैश्विक संगठन को चलाने के लिए मुख्य रूप से सदस्य देशों से मिलने वाले आर्थिक योगदान पर निर्भर रहना पड़ता था। प्रत्येक देश की आर्थिक क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति के आधार पर उसका योगदान तय होता था। हालाँकि, सभी देश समय पर और पूरा पैसा नहीं चुकाते थे। सदस्य देशों के इस योगदान के अलावा, लीग ऑफ नेशंस अपने प्रकाशनों की बिक्री से भी कुछ मामूली आय प्राप्त करता था। सबसे अहम बात यह थी कि सदस्य देशों, ग़ैर-सदस्य देशों और निजी संगठनों द्वारा विशेष परियोजनाओं को भी वित्तीय मदद दी जाती थी। उदाहरण के लिए, अमेरिका आधिकारिक तौर पर लीग का सदस्य नहीं था, लेकिन रॉकफेलर फाउंडेशन जैसे अमेरिकी निजी संगठनों ने स्वास्थ्य और पुस्तकालय निर्माण के क्षेत्र में भारी वित्तीय मदद की। इसके अलावा, फ्रांस की सरकार ने पेरिस में अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक सहयोग संस्थान के संचालन का ज़्यादातर ख़र्च उठाया था। शांति बनाए रखने और दूसरे विश्व युद्ध को रोकने में यह क्यों विफल रहा?लीग ऑफ नेशंस की विफलता के पीछे कई ढांचागत कमज़ोरियां और राजनीतिक परिस्थितियां ज़िम्मेदार थीं। सबसे बड़ी कमज़ोरी यह थी कि जिस अमेरिका के राष्ट्रपति ने इसके निर्माण की परिकल्पना की थी, वही अमेरिका इसका सदस्य नहीं बन सका। अमेरिकी संसद में रिपब्लिकन नेता हेनरी कैबोट लॉज के कड़े विरोध के कारण सीनेट ने वर्साय की संधि को उनचास के मुक़ाबले पैंतीस वोटों से ख़ारिज कर दिया था। इतिहासकारों का मानना है कि यदि अमेरिका इसमें शामिल होता, तो संघर्षों को रोकने में अधिक बल मिलता। दूसरी बड़ी विफलता यह थी कि लीग के पास अपनी कोई सशस्त्र सेना नहीं थी। यह पूरी तरह से सदस्य देशों की सैन्य ताक़त पर निर्भर था, लेकिन कोई भी देश युद्ध के बाद दोबारा अपनी सेना भेजने को तैयार नहीं था। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे इसके सबसे बड़े सदस्यों के भीतर शांतिवाद इतना हावी था कि वे सैन्य कार्रवाई या कड़े प्रतिबंध लगाने से कतराते थे। संगठन ने निरस्त्रीकरण की पुरज़ोर वकालत की थी, जिसके कारण शांति बनाए रखने के लिए ज़रूरी सैन्य शक्ति ही ख़त्म हो गई। जब आक्रामक देशों ने अपना विस्तार करने के लिए दूसरे छोटे देशों पर हमले शुरू किए, तो यह संगठन उन्हें रोकने में पूरी तरह बेबस साबित हुआ। हालांकि इसने भविष्य के संयुक्त राष्ट्र के लिए एक रूपरेखा ज़रूर तैयार की कि कूटनीतिक संगठनों में क्या काम करता है और क्या नहीं। संदर्भ 1. https://tinyurl.com/2fa4g4yc2. https://tinyurl.com/mes9ve63. https://tinyurl.com/2ajroam34. https://tinyurl.com/2q9ujonv5. https://tinyurl.com/2az44uc56. https://tinyurl.com/yax4c9zc
निवास : 2000 ई.पू. से 600 ई.पू.
कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद कैसे द्वारका नहीं अपितु इंद्रप्रस्थ बना यदुवंशियों का आखिरी सहारा
क्या आप जानते हैं कि वर्तमान दिल्ली, जिसे इन्द्रप्रस्थ कहा जाता था, महाभारत काल में कुरुओं की दूसरी राजधानी बना? यहां के महल को असुर मयासुर ने 14 महीनों की कड़ी मेहनत के बाद तैयार किया था। यह कोई साधारण महल नहीं था, बल्कि स्फटिक और रत्नों से जड़ा एक ऐसा मायावी महल था जिसमें पानी की जगह ज़मीन और ज़मीन की जगह पानी होने का भ्रम पैदा होता था। महाभारत की शुरुआत से लेकर उसके अंत तक इन्द्रप्रस्थ की भूमिका सबसे अहम रही है। एक तरफ इस नगर ने हस्तिनापुर के वैभव को भी पीछे छोड़ दिया था, तो दूसरी तरफ इसी महल के भ्रम और चौसर के खेल ने उस महायुद्ध की नींव रखी जिसमें पूरा भारतवर्ष दो हिस्सों में बँट गया। आइए, महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित इस महाकाव्य के ज़रिए समझते हैं कि कैसे एक बंजर जंगल दुनिया की सबसे भव्य राजधानी बना और कैसे अंततः यह यदुवंशियों की आखिरी शरणस्थली बनकर रह गया।महर्षि वेदव्यास कौन थे और उन्होंने महाभारत महाकाव्य की रचना कैसे की?महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास को व्यास या कृष्ण द्वैपायन के नाम से भी जाना जाता है। कई कथाओं में उन्हें भगवान विष्णु के अवतार का अंश माना जाता है और वे 18 पुराणों तथा ब्रह्म सूत्रों के रचयिता भी हैं। महर्षि वेदव्यास के जन्म की कथा बहुत ही रोचक है जो महाभारत की एक अहम पात्र सत्यवती से जुड़ी है। सत्यवती, जिन्हें मत्स्यगंधा भी कहा जाता था, एक मछुआरन थीं जो यमुना नदी में नाव चलाती थीं। एक बार ऋषि पराशर उनकी सुंदरता पर मुग्ध हो गए और उनसे एक पुत्र की कामना की। अपनी पवित्र छवि को लेकर चिंतित सत्यवती के लिए पराशर ने नदी के बीचों-बीच घने कोहरे से ढका एक गुप्त द्वीप बनाया जहाँ कोई उन्हें देख न सके। वहीं सत्यवती ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका रंग साँवला था और द्वीप पर जन्म लेने के कारण पराशर ने उनका नाम कृष्ण द्वैपायन रखा। यही बालक आगे चलकर महर्षि वेदव्यास बना, जिसने अपनी माता को वचन दिया था कि ज़रूरत पड़ने पर वह हमेशा उनकी मदद करेगा।बाद में जब सत्यवती और राजा शांतनु के पुत्रों का बिना किसी उत्तराधिकारी के निधन हो गया, तो वेदव्यास के आशीर्वाद से ही धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर का जन्म हुआ था। जब वेदव्यास ने महाभारत लिखने का निश्चय किया, तो उन्होंने भगवान गणेश से इसे लिखने का अनुरोध किया। गणेश जी की शर्त थी कि वेदव्यास कहानी सुनाते समय रुकेंगे नहीं, जिसके जवाब में व्यास जी ने निर्देश दिया कि गणेश जी भी श्लोकों को बिना समझे नहीं लिखेंगे। इसी अद्भुत तालमेल से महाभारत की रचना हुई। खांडवप्रस्थ का बंजर जंगल इन्द्रप्रस्थ जैसी अद्भुत और भव्य राजधानी कैसे बना?जब धृतराष्ट्र ने राज्य का बँटवारा किया, तो पाण्डवों के हिस्से में खांडवप्रस्थ नाम का एक बंजर और वीरान जंगल आया जो यमुना नदी के तट पर स्थित था। खांडव वन को जलाकर साफ़ करने के बाद, असुर मयासुर ने वहाँ इन्द्रप्रस्थ नाम की एक बेहद भव्य राजधानी का निर्माण किया। चौड़ी सड़कों, विशाल दीवारों और गहरी खाइयों वाले इस नगर ने जल्द ही गंगा किनारे बसे हस्तिनापुर के गौरव को भी पीछे छोड़ दिया। इसी नगर में युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया और खुद को एक महान सम्राट के रूप में स्थापित किया। नारद मुनि ने इस महल की तुलना देवराज इन्द्र की देवसभा पुष्कर मालिनी से की थी जो वास्तुकला और संप्रभुता का एक आदर्श प्रतिमान था।इन्द्रप्रस्थ की भव्यता और मयासुर की कारीगरी का वर्णन महाभारत के सभा पर्व (अध्याय 2, खंड 3, श्लोक 28) में इस प्रकार किया गया है:ततः स विप्रकर्षेण कृत्वा तन्मयमासुरः।दशसाहस्रविस्तारं सर्वतः समधारयत्।।न दैवी न च मानुषी तादृशी दृश्यते सभा।वैदूर्यमयसोपानां मणिकुट्टिमराजिताम्।।इस श्लोक का अर्थ यह है कि उस असुर मयासुर ने घोर परिश्रम करके उस सभा भवन का निर्माण किया। वह दस हज़ार हाथ विस्तृत था और सभी तरफ से टिका हुआ था। देवताओं और मनुष्यों के बीच वैसी सभा पहले कभी नहीं देखी गई थी। उसमें वैदूर्य मणि की सीढ़ियाँ थीं और उसके फर्श बहुमूल्य रत्नों से सजे हुए थे।चौसर के खेल ने पाण्डवों से उनका राज्य कैसे छीना और युद्ध की नौबत कैसे आई?इन्द्रप्रस्थ के वैभव और राज्य के बँटवारे से दुर्योधन के मन में पाण्डवों के प्रति गहरी ईर्ष्या और नफ़रत भर गई थी। अपने मामा शकुनि के प्रभाव में आकर उसने पाण्डवों को चौसर के खेल के लिए आमंत्रित किया। इस खेल में शकुनि ने अपने जादुई पासों का इस्तेमाल किया और युधिष्ठिर को हर दाँव में हरा दिया। युधिष्ठिर ने अपनी गायें, सोना, गाँव और अंततः अपना राज्य इन्द्रप्रस्थ तक दाँव पर लगाकर गँवा दिया। जब उनके पास कुछ नहीं बचा, तो उन्होंने अपने भाइयों, खुद को और अपनी पत्नी द्रौपदी को भी हार दिया। इसके बाद भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हुआ, जो महाभारत का सबसे बड़ा अधर्म बना और इसी दिन भीम ने दुर्योधन की जांघें तोड़ने और दुशासन का रक्त पीने की कसम खाई थी।उद्योग पर्व, महाभारत, बोरी प्रकाशित (BORI), 1940खेल हारने के बाद पाण्डवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास मिला। अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में पाण्डवों ने विराट के राज्य में छिपकर जीवन बिताया। वनवास पूरा होने के बाद जब पाण्डवों ने अपना राज्य इन्द्रप्रस्थ वापस माँगा, तो दुर्योधन ने साफ़ इनकार कर दिया। पाण्डवों ने शांति बनाए रखने के लिए केवल पाँच गाँव माँगे, लेकिन दुर्योधन ने वह भी देने से मना कर दिया। इसी इनकार ने कुरुक्षेत्र के उस अठारह दिन चलने वाले महायुद्ध की शुरुआत कर दी। कुरुक्षेत्र के इस विनाशकारी महायुद्ध में किस राज्य ने किसका साथ दिया?कुरुक्षेत्र के मैदान में जब युद्ध शुरू हुआ, तो भारतवर्ष के अलग-अलग हिस्सों के राजाओं और जातियों ने पाण्डवों और कौरवों के पक्ष में हिस्सा लिया। पाण्डवों की सेना में मध्यदेश से पांचाल, मत्स्य, चेदि, करूष, दशार्ण, काशी, पूर्वी कोसल और पश्चिमी मगध के लोग शामिल थे, जिनके साथ विंध्य पर्वत और अरावली की पहाड़ियों के आसपास रहने वाली वनवासी जातियां व राक्षस थे। पश्चिम से गुजरात और उसके पूर्वी क्षेत्रों के सभी यादव पाण्डवों के साथ थे। उत्तर-पश्चिम से कुछ कैकेय और अभिसार उनके पक्ष में लड़े, जबकि दक्षिण से पाण्ड्य राज्य और कर्नाटिक क्षेत्र की द्रविड़ जातियों ने पाण्डवों की सेना को मज़बूती दी।वहीं दूसरी ओर, कौरवों की सेना बहुत विशाल थी। पूर्व दिशा से पूर्वी मगध, विदेह, प्राग्ज्योतिष, अंग, वंग, पुण्ड्र, उत्कल, मेकल, कलिंग और आन्ध्र के योद्धा अपनी सीमावर्ती जातियों के साथ दुर्योधन के पक्ष में खड़े थे। मध्यदेश से शूरसेन, वत्स और कोसल के लोग शामिल थे। उत्तर-पश्चिम से सिंधु, सौवीर, मद्र, बाह्लीक, कैकेय, गांधार, कम्बोज, त्रिगर्त, अम्बष्ठ और शिवि जातियों ने कौरवों का साथ दिया। उत्तर की तरफ से हिमालय के साथ-साथ रहने वाली पहाड़ी जातियां कौरवों के साथ थीं। पश्चिम से शाल्व और मालव, तथा मध्य भारत से बड़ौदा के दक्षिण और दक्षिण-पूर्व के यादव, अवंति, माहिष्मक, विदर्भ, निषाद और कुंतल राज्यों ने कौरवों की ओर से युद्ध किया।युद्ध की समाप्ति के बाद इन्द्रप्रस्थ किस तरह यदुवंशियों की शरणस्थली बना?अठारह दिनों के भयानक युद्ध और यदुवंश के आपसी विनाश के बाद, इन्द्रप्रस्थ का महत्व एक बार फिर सामने आया। महाभारत के मौसल पर्व (अध्याय 8, श्लोक 72-73) में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है कि कैसे यह नगर यदुवंश के बचे हुए लोगों के लिए एक सुरक्षित पनाहगार बन गया।इन्द्रप्रस्थं समासाद्य वज्रं तत्र न्यवेशयत्।अनुगृह्य यथार्हं च स्त्रीवृद्धं बालकं तथा।। ७२।।शक्रप्रस्थे तु वज्रस्य राज्यं दत्तं किरीटिना।अनिरुद्धस्य पुत्रस्य हतशेष जनं तथा।। ७३।।इस श्लोक का अर्थ यह है कि इन्द्रप्रस्थ पहुँचकर अर्जुन ने वहाँ वज्र को स्थापित किया और महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों के लिए उचित व्यवस्था की। मुकुट धारण करने वाले अर्जुन ने शक्रप्रस्थ यानी इन्द्रप्रस्थ का राज्य अनिरुद्ध के पुत्र वज्र को तथा कत्लेआम से बचे हुए शेष लोगों को सौंप दिया।इस प्रकार इन्द्रप्रस्थ नगर वृष्णि और अंधक जनजातियों के लिए एक सुरक्षित शरणस्थली बन गया और यहीं से भगवान कृष्ण के वंश को संरक्षित किया गया। जो नगर कभी बंजर जंगल से दुनिया की सबसे सुंदर राजधानी बना था, वही नगर महाभारत के अंत में विनाश से बचे हुए लोगों के लिए जीवन और सुरक्षा का अंतिम आधार बन गया।संदर्भ 1. https://tinyurl.com/235lj3gg2. https://tinyurl.com/28c4cdke3. https://tinyurl.com/273w8oct4. https://tinyurl.com/2yq6wuh3
तितलियाँ और कीट
तितलियों की अनोखी दुनिया और अपने पैरों से स्वाद पहचानने का रहस्य
तितलियाँ केवल अपने रंगीन पंखों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अनोखी आदतों के लिए भी जानी जाती हैं। इंसानों की तरह उनके पास जीभ पर स्वाद कलिकाएँ नहीं होतीं। वे अपने भोजन का स्वाद अपने पैरों से पहचानती हैं। उनके पैरों में छोटे संवेदनशील अंग होते हैं, जो किसी पत्ते या फूल पर बैठते ही यह समझ लेते हैं कि वहाँ रस है या नहीं।तितलियों का मुख एक लंबी नली जैसा होता है, जिसे सूंड कहा जाता है। इसकी मदद से वे फूलों का रस पीती हैं। जब वे फूलों पर बैठती हैं, तो अनजाने में परागकण एक फूल से दूसरे फूल तक पहुँच जाते हैं, जिससे परागण की प्रक्रिया में मदद मिलती है।कई तितलियाँ मिट्टी, पानी के छोटे गड्ढों या पसीने की ओर भी आकर्षित होती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें वहाँ से नमक और खनिज मिलते हैं, जो उनके शरीर के लिए जरूरी होते हैं। विशेष रूप से नर तितलियाँ इन खनिजों को संभालकर रखती हैं और प्रजनन के दौरान मादा तितलियों को भी प्रदान करती हैं।इस तरह तितलियाँ केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं बढ़ातीं, बल्कि परागण और पर्यावरण के संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। संदर्भ:https://tinyurl.com/heu2bk4uhttps://tinyurl.com/5axjx5st https://tinyurl.com/2e48embnhttps://tinyurl.com/53ar9a8z
भूमि और मिट्टी के प्रकार : कृषि योग्य, बंजर, मैदान
जरूर जानें, रिगली कंपनी की मदद से उत्तर प्रदेश में हुई अनुबंध खेती से हमें क्या लाभ हुए?
आज, हम समझेंगे कि ‘अनुबंध खेती’ क्या है, और यह कंपनियों के साथ किसानों के संपर्क कैसे स्थापित करती है। फिर हम देखेंगे कि, रिगली (Wrigley) जैसी कंपनियों के प्रयासों से उत्तर प्रदेश में पुदीने की खेती कैसे विकसित हुई। इसके बाद, हम नकदी फसलों और मुख्य फसलों की तुलना करेंगे, और उनके महत्व को समझेंगे। हम यह भी पढ़ेंगे कि, जब किसान खाद्य फसलों की तुलना में अधिक नकदी फसलें उगाते हैं, तब क्या होता है। लेख के अंत में, हम न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नजर डालेंगे, और जानेंगे कि सरकार फसलों की कीमतें कैसे तय करती है।अनुबंध खेती (Contract farming), भविष्यवादी समझौतों के तहत पूर्व निर्धारित कीमतों पर, कृषि उत्पादों के उत्पादन और आपूर्ति के लिए किसानों और प्रसंस्करण और/या विपणन कंपनियों के बीच एक समझौता होता है। किसानों और खरीदारों के बीच मौजूद यह समझौता, कृषि वस्तुओं के उत्पादन, बाजार नियमों और प्रबंधन शर्तों को बताता है। हमारे देश भारत में, अनुबंध खेती का उद्देश्य लघु किसानों के लिए स्थिर आय सुनिश्चित करना, बाजार-केंद्रित फसल चयन को बढ़ावा देना, कृषि में निजी निवेश को बढ़ावा देना, खाद्य प्रसंस्करण का समर्थन करना, उद्योगों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करना, सरकारी मूल्य हस्तक्षेप को कम करना, और फसल विविधीकरण और कृषि व्यवसाय जागरूकता को प्रोत्साहित करना, आदि है। इसके अलावा, अनुबंध खेती के निम्नलिखित फायदे भी हैं -1. अनुबंध खेती, भारत को प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों के आयातक से, एक महत्वपूर्ण निर्यातक बनने में सक्षम बनाती है, जिससे हमारे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और वैश्विक व्यापार को बढ़ावा मिलता है। इस प्रकार, अनुबंध खेती के माध्यम से देशज उत्पादन बढ़ाने से आयात पर निर्भरता कम होती है, विदेशी मुद्रा की बचत होती है, और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है।2. किसानों को सुनिश्चित खरीद और मूल्य स्थिरता से लाभ होता है, जिससे कृषि विपणन में अनिश्चितताएं कम होती हैं।3. अनुबंध खेती पर्यावरण अनुकूल प्रथाओं को प्रोत्साहित करती है, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार करती है, और रासायनिक निर्भरता को कम करती है।4. ऐसी खेती किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले बीज, उर्वरक और तकनीकी सहायता प्रदान करती है, जिससे पैदावार में सुधार होता है, और बेहतर गुणवत्ता वाली उपज होती है।5. अनुबंध खेती, किसानों को उन क्षेत्रों में फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित करती है, जहां पारंपरिक रूप से उनकी खेती नहीं की जाती है। इससे कुल उत्पादन में वृद्धि होती है।क्या आप जानते हैं कि, 2017 में मार्स रिगली (Mars Wrigley) नामक एक विदेशी कंपनी ने हमारे राज्य उत्तर प्रदेश में अनुबंध खेती की एक परियोजना प्रस्तुत की थी। उन्होंने यहां पांच साल की स्थिरता परियोजना - ‘एडवांस मिंट’ शुरू की थी, जिसे हम ‘शुभ मिंट’ के नाम से जानते हैं। इसका लक्ष्य, हमारे राज्य में पुदीना किसानों की पैदावार और आय को बढ़ावा देना था। कॉर्न मिंट मेंथॉल (Corn Mint Menthol), मेंथा तेल की बहुत अधिक उपज देने वाला पौधा है। यह हमारे देश और राज्य में, मुख्य रूप से एक एकड़ से कम कृषि क्षेत्रों में उगाया जाता है। इसकी उपज 37 किलो प्रति एकड़ होती है।उत्तर प्रदेश के लघु किसान, साल में तीन महीने पुदीना उगाते हैं। वे फरवरी या मार्च में इसका रोपण शुरू करते हैं, और मानसून से पहले जून में इसकी कटाई करते हैं। यह किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण फसल है, क्योंकि यह नकदी फसल है। रिगली अनुबंध के अनुसार, तीन क्षेत्रों में लघु किसानों की पैदावार और आय में वृद्धि हुई है। पौधे (जड़ माल तक पहुंच), खेती (अच्छी कृषि अभ्यास प्रशिक्षण), और समुदाय (शिक्षा और प्रशिक्षण) इस परियोजना के मुख्य पहलू थे।चलिए, अब नकदी और मुख्य फसलों की तुलना करते हैं। खाद्य फसलें, स्थानीय या देशज पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए उगाई जाती हैं। नकदी फसलें, मुख्य रूप से आय उत्पन्न करने और बिक्री के लिए उगाई जाती हैं। ये फसलें अक्सर स्थानीय, राष्ट्रीय या निर्यात बाजारों के लिए उगाई जाती हैं।खाद्य फसलें, खाद्य सुरक्षा और निर्वाह को प्राथमिकता देती हैं, जबकि, नकदी फसलें आय-उन्मुख, उत्पादक बाजार की कीमतों, वस्तु श्रृंखलाओं और अंतरराष्ट्रीय मांग पर निर्भर करती हैं। लोगों और मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए, अक्सर छोटे भूखंडों या मिश्रित खेतों पर खाद्य फसलों की खेती की जाती है। दूसरी ओर, नकदी फसलें छोटे किसानों, बागानों या बड़े कृषि व्यवसायों द्वारा उगाई जा सकती हैं। उपज को अधिकतम करने और कटाई और प्रसंस्करण को सरल बनाने के लिए, इसमें अक्सर एकल फसल ली जाती है।पिछले दशकों के दौरान, दुनिया भर में नकदी फसलों का तेजी से विस्तार हुआ है। इसलिए, नकदी फसलों की खेती के सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक परिणामों की जांच करना महत्वपूर्ण है। नकदी फसल खेती के आर्थिक लाभ स्पष्ट हैं, जिनमें घरेलू आय बढ़ाना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना, राजकोषीय राजस्व में वृद्धि, और विदेशी निवेश को आकर्षित करना शामिल था। साथ ही, नकदी फसल की खेती से आम तौर पर सकारात्मक सामाजिक प्रभाव (कल्याण संवर्धन, बुनियादी ढांचे में सुधार और रोजगार सृजन) देखे जाते हैं, लेकिन फसल के प्रकार के साथ प्रभाव भी भिन्न होते हैं। नकदी फसल खेती, भू-दृश्य विखंडन, पृथक्करण और अनियमितता को बढ़ाने के साथ, वन और कृषि भूमि के तंत्रों को बिगाड़ती भी है। जंगल, विशेष रूप से चाय और फलों के पेड़ों के विस्तार के प्रति, जबकि खेत शहतूत और नर्सरी पेड़ों के विस्तार के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। नतीजतन, नकदी फसल खेती से पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं ख़राब हो सकती हैं। इस कारण, केवल खाद्य या नकदी फसलों को बढ़ावा देने के बजाय, इनमें एक संतुलित मिश्रण बनाना, जोखिमों को कम करेगा और छोटे कृषि भूमि धारकों के लचीलेपन को मजबूत करेगा। समर्थन के लिए केवल फसल के प्रकार पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, हमें व्यापक संदर्भ और पारिस्थितिकी तंत्र पर विचार करना चाहिए। परंतु, वास्तव में कुछ नकदी फसलें कुछ शर्तों के तहत, खाद्य सुरक्षा में योगदान कर सकती हैं। क्योंकि, वे अपने मूल्य श्रृंखला एकीकरण और बाजार पहुंच में सुधार करके किसानों की आय को बढ़ाती हैं। हालांकि, अधिक कमाई का मतलब हमेशा बेहतर खाद्य सुरक्षा नहीं होता है। अंततः हमें लगातार आकलन करना होगा कि नकदी फसल की खेती प्राकृतिक, सामाजिक और आर्थिक वातावरण के साथ कैसे मेल खाती है। हमारे देश की सरकार का ‘कृषि और किसान कल्याण विभाग’ सभी राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों (जम्मू और कश्मीर और लद्दाख) में क्षेत्र विस्तार और उत्पादकता वृद्धि के माध्यम से, खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन’ लागू कर रहा है। इसके तहत, लघु, सीमांत, और अन्य किसानों को राज्य सरकारों के माध्यम से कृषि प्रथाओं के बेहतर प्रदर्शन, फसल प्रणाली प्रदर्शन, उच्च उपज वाली किस्मों की बीजों के वितरण, जैसी सहायता प्रदान की जाती है। इसके अलावा, इस परियोजना में खेती के लिए आवश्यक सभी पहलुओं में सहायता करना शामिल है। और तो और, सरकार ने देश में फसलों के उत्पादन के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने के लिए कई नीतियों, सुधारों, विकासात्मक कार्यक्रमों को अपनाया और कार्यान्वित किया है। सरकार उच्च निवेश और उत्पादन को प्रोत्साहित करने, तथा उचित मूल्य पर आपूर्ति उपलब्ध कराकर उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने की दृष्टि से, किसानों को उनकी उपज के लिए लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करती है। इस दिशा में, सरकार इन फसलों के लिए उच्च न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम एस पी) की पेशकश करके, वाणिज्यिक या नकदी फसलों सहित, बाईस (22) अनिवार्य फसलों के लिए निर्धारित मूल्य की घोषणा करती है। 2018-19 के केंद्रीय बजट में, एमएसपी को उत्पादन लागत के डेढ़ (1.5) गुना स्तर पर रखने के सिद्धांत की घोषणा की गई थी। हर साल, सरकार संबंधित राज्य सरकारों और केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों के विचारों को मद्देनजर रखते हुए, ‘कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी)’ की सिफारिशों के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है। एमएसपी की सिफारिश करते समय, उत्पादन की लागत, देशज और विश्व बाजारों में विभिन्न फसलों की मांग-आपूर्ति की स्थिति, देशज और अंतर्राष्ट्रीय कीमतें, अंतर-फसल मूल्य समानता, कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र के बीच व्यापार की शर्तें, शेष अर्थव्यवस्था पर मूल्य नीति का प्रभाव, आदि कारकों पर मंथन किया जाता है। एमएसपी की गणना के लिए उपयोग किया जाने वाला लागत फॉर्मूला, सभी 22 अनिवार्य फसलों और राज्यों के लिए एक समान है। विशेष रूप से, इस गणना में पारिवारिक श्रम जैसे विचार भी शामिल हैं।इस प्रकार, न्यूनतम समर्थन मूल्य के निम्नलिखित लाभ हैं -1. एमएसपी, किसानों को एक सुरक्षा प्रदान करती है। यदि बाजार में फसल की कीमतें गिर भी जाएं, तो एमएसपी किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाती है।2. यह योजना किसानों को उन फसलों (जैसे कि, गेहूं और चावल) को उगाने के लिए प्रोत्साहित करती है, जो देश की खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं। इससे देश में अनाज का पर्याप्त भंडार बना रहता है।3. कृषि बाजार में कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव होता है। तब एमएसपी, किसानों को बाजार की अनिश्चितता और बिचौलियों के शोषण से बचाता है।4. जब किसानों को एक निश्चित आय का भरोसा होता है, तो वे बेहतर बीज, उर्वरक और नई तकनीक में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं, जिससे कृषि उत्पादकता बढ़ती है।हालांकि, न्यूनतम समर्थन मूल्य के कुछ नुकसान भी हैं। सरकार द्वारा भारी मात्रा में अनाज खरीदने और उसका भंडारण करने में बहुत अधिक खर्च आता है, जिससे राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ता है। और, जब सरकार फसल खरीद लेती है, तब पर्याप्त भंडारण और गोदामों की कमी के कारण भारी मात्रा में अनाज खराब हो जाता है। एमएसपी का लाभ, मुख्य रूप से चावल और गेहूं जैसी फसलों तक सीमित है। इस कारण किसान अन्य महत्वपूर्ण फसलें (जैसे कि, दलहन और तिलहन) उगाने के बजाय, केवल इन्हीं फसलों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता कम होती है। इसके अलावा, एमएसपी का लाभ मुख्य रूप से बड़े किसानों और कुछ चुनिंदा राज्यों (जैसे कि, पंजाब और हरियाणा) के किसानों को ही मिल पाता है। देश के लघु और सीमांत किसान, अक्सर इससे वंचित रह जाते हैं। साथ ही, एमएसपी बाजार की प्राकृतिक मांग और आपूर्ति के नियम को प्रभावित करता है। कभी-कभी बाजार मूल्य एमएसपी से कम होने पर भी, सरकार को महंगे दाम पर खरीदारी करनी पड़ती है।संदर्भ 1. https://tinyurl.com/2vajr8ty 2. https://tinyurl.com/37n9wha8 3. https://tinyurl.com/4xkmczep 5. https://tinyurl.com/3pk7s7fb 6. https://tinyurl.com/2tnuuwxj 7. https://tinyurl.com/3mzmxwu5 8. https://tinyurl.com/mt98f2d7
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
दुनिया की सबसे महंगी क्रिकेट लीग का मेरठ के 'मोदीनगर' से क्या जोड़ है?
मेरठ से महज़ कुछ किलोमीटर की दूरी पर राष्ट्रीय राजमार्ग 58 (NH 58) पर एक बेमिसाल शहर बसा है, जिसका नाम है ‘मोदीनगर'। उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद ज़िले में आने वाला यह शहर सिर्फ एक औद्योगिक केंद्र नहीं है, बल्कि दुनिया की सबसे महंगी और चकाचौंध से भरी क्रिकेट लीग 'इंडियन प्रीमियर लीग' (Indian Premier League) की नींव के तार भी इसी शहर के इतिहास से जुड़े हैं। साल 1933 में राय बहादुर गूजरमल मोदी (Rai Bahadur Gujarmal Modi) ने बेगमाबाद नामक गाँव की जगह पर एक चीनी मिल की स्थापना की थी। बाद में इसी जगह का नाम उनके सम्मान में मोदीनगर रखा गया। गूजरमल मोदी ने यहाँ कई बड़े उद्योग स्थापित किए और इस पूरे इलाके को एक नई पहचान दी। इन्हीं गूजरमल मोदी के परिवार से ताल्लुक रखने वाले उनके पोते का नाम ललित मोदी (Lalit Modi) है, जिन्हें आज पूरी दुनिया में क्रिकेट के सबसे बड़े और सबसे अमीर टूर्नामेंट के जन्मदाता के रूप में जाना जाता है। मोदी मंदिरललित मोदी कौन हैं और उन्होंने भारतीय क्रिकेट की तस्वीर कैसे बदली?ललित कुमार मोदी एक भारतीय क्रिकेट प्रशासक और व्यवसायी हैं। भारतीय क्रिकेट के इतिहास में ललित मोदी का नाम एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दर्ज है जिसने खेल और व्यापार को एक साथ मिलाकर एक नया साम्राज्य खड़ा कर दिया। वे साल 2005 से 2010 तक भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (Board of Control for Cricket in India) के उपाध्यक्ष रहे। इसके अलावा वे राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (Rajasthan Cricket Association) के अध्यक्ष पद पर भी काबिज रहे। लेकिन क्रिकेट की दुनिया में उनका सबसे बड़ा और ऐतिहासिक योगदान इंडियन प्रीमियर लीग की स्थापना करना था। वे इस लीग के पहले अध्यक्ष और कमिश्नर थे। उन्होंने साल 2008 से लेकर 2010 तक शुरुआती तीन सालों के लिए इस टूर्नामेंट का सफलतापूर्वक संचालन किया और इसे ज़मीन से उठाकर एक वैश्विक ब्रांड बना दिया। उनकी इसी व्यावसायिक सोच ने क्रिकेटरों को रातों-रात करोड़पति बना दिया और खेल को देखने का नज़रिया पूरी तरह से बदल दिया। इंडियन प्रीमियर लीग की शुरुआत किन परिस्थितियों में हुई और इसमें कौन सी टीमें शामिल थीं?भारत में इस नई और अनोखी क्रिकेट लीग के शुरू होने के पीछे की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। साल 2007 में जब ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (Zee Entertainment Enterprises) ने अपनी खुद की 'इंडियन क्रिकेट लीग' (Indian Cricket League) शुरू करने का ऐलान किया, तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने इसे आधिकारिक मान्यता देने से साफ़ इनकार कर दिया। इसके जवाब में और अपने क्रिकेटरों को इस नई बागी लीग में जाने से रोकने के लिए, बोर्ड ने एक नई फ्रेंचाइज़ी आधारित ट्वेंटी-ट्वेंटी प्रतियोगिता शुरू करने का फैसला किया। 13 सितंबर 2007 को बोर्ड ने आधिकारिक तौर पर इंडियन प्रीमियर लीग की घोषणा कर दी। ललित मोदी, जिन्हें इस पूरे प्रोजेक्ट का मुख्य रणनीतिकार माना जाता है, ने इस टूर्नामेंट के हर छोटे-बड़े पहलू को डिज़ाईन किया। साल 2008 में इसका पहला सीज़न खेला गया। इस पहले ऐतिहासिक सीज़न में कुल आठ टीमों ने हिस्सा लिया था। इन शुरुआती आठ टीमों के नाम चेन्नई सुपर किंग्स (Chennai Super Kings), दिल्ली डेयरडेविल्स (Delhi Daredevils), किंग्स इलेवन पंजाब (Kings XI Punjab), कोलकाता नाइट राइडर्स (Kolkata Knight Riders), मुंबई इंडियंस (Mumbai Indians), राजस्थान रॉयल्स (Rajasthan Royals), रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर (Royal Challengers Bangalore) और डेक्कन चार्जर्स (Deccan Chargers) थे। आईपीएल को बुलंदियों पर ले जाने वाले ललित मोदी विवादों में कैसे घिरे?ललित मोदी ने अपने असीम आत्मविश्वास और ऊंचे संपर्कों के ज़रिए आईपीएल को एक बहुत बड़ा ब्रांड बना दिया था। उन्होंने अपनी चतुराई के बल पर बड़े-बड़े क्रिकेट प्रशासकों, दिग्गज उद्योगपतियों और बॉलीवुड के नामचीन सितारों को एक ही मंच पर ला खड़ा किया था। लेकिन यह कामयाबी ज़्यादा समय तक बेदाग नहीं रह सकी। आईपीएल के तीसरे सीज़न के ठीक बाद, साल 2010 में ललित मोदी पर वित्तीय अनियमितताओं, अनुशासनहीनता और कदाचार के बेहद गंभीर आरोप लगे। आरोपों की गंभीरता को देखते हुए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने उन्हें तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिया। जब उनके खिलाफ कर चोरी और मनी लॉन्ड्रिंग (Money Laundering) को लेकर प्रवर्तन निदेशालय की जांच शुरू हुई, तो गिरफ्तारी से बचने के लिए वे साल 2010 में ही भारत छोड़कर लंदन भाग गए। इस पूरे मामले की गहराई से जांच करने के लिए बोर्ड ने एक विशेष अनुशासन समिति का गठन किया था। लंबी जांच के बाद इस समिति ने ललित मोदी को कई आरोपों में दोषी पाया। इसके परिणामस्वरूप, साल 2013 में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने उन पर भारत में क्रिकेट से जुड़े किसी भी पद को धारण करने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया। यह टूर्नामेंट अरबों रुपये कैसे कमाता है और इसका बिज़नेस मॉडल क्या है?ललित मोदी के जाने और तमाम विवादों के बावजूद, आज यह टूर्नामेंट प्रति मैच मूल्य के हिसाब से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी खेल लीग बन चुकी है। इसका बिज़नेस मॉडल (Business Model) बहुत ही सुगठित और बहुआयामी है, जिसे मुख्य रूप से दो बड़े हिस्सों में समझा जा सकता है। पहला हिस्सा 'सेंट्रल पूल' (Central Pool) कहलाता है, जिसे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड संचालित करता है। लीग की कमाई का सबसे बड़ा ज़रिया मीडिया अधिकार (Media rights) हैं, जो इसी सेंट्रल पूल का हिस्सा हैं। बड़े प्रसारणकर्ता इस टूर्नामेंट को टीवी और डिजिटल प्लैटफॉर्म (digital platform) पर दिखाने के लिए बोर्ड को अरबों डॉलर का भारी-भरकम भुगतान करते हैं। इसके अलावा लीग के मुख्य प्रायोजक और अन्य आधिकारिक साझेदार भी इसी पूल में पैसा डालते हैं। इस कुल भारी कमाई का एक बड़ा और तय हिस्सा बाद में सभी फ्रेंचाइज़ी टीमों के बीच बराबर बांट दिया जाता है, जिससे टीमों को एक पक्की आमदनी होती है। फ्रेंचाइज़ी टीमें अपने स्तर पर पैसा कैसे जुटाती हैं?सेंट्रल पूल से मिलने वाले पैसे के अलावा, हर फ्रेंचाइज़ी टीम अपने स्तर पर भी पैसा कमाने के कई तरीके अपनाती है। स्टेडियम में होने वाले मैचों के टिकटों की बिक्री से होने वाली आमदनी का एक बड़ा हिस्सा सीधे उस टीम को जाता है जिसके घरेलू मैदान पर मैच हो रहा होता है। इसके साथ ही टीम की जर्सी, टोपी और अन्य सामानों की बिक्री से भी उन्हें सीधी आमदनी होती है। इसके अलावा, हर टीम अपनी जर्सी, हेलमेट और पैड पर कई तरह के स्थानीय और राष्ट्रीय ब्रांड्स के विज्ञापन लगाती है। इस प्रायोजन के ज़रिए भी टीमें करोड़ों रुपये जुटाती हैं। खिलाड़ियों की नीलामी से लेकर स्टेडियम में दर्शकों के मनोरंजन तक, इस पूरे व्यापार को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि हर साल बोर्ड और फ्रेंचाइज़ी, दोनों ही भारी मुनाफा कमाते रहें और यह क्रिकेट लीग दुनिया में अपना दबदबा बनाए रखे। संदर्भ https://tinyurl.com/2abusthmhttps://tinyurl.com/2yfudd29https://tinyurl.com/27addcswhttps://tinyurl.com/22ehol4yhttps://tinyurl.com/y9awmzkz
हथियार और खिलौने
साइबर युद्ध की दुनिया: खतरे, हमले और सुरक्षा के नए रास्ते
मेरठ वासियों आज हम समझेंगे कि, साइबर युद्ध क्या है, और आज की डिजिटल दुनिया में यह लड़ाई का नया तरीका कैसे बन रहा है। फिर हम, वॉनाक्राई (WannaCry) और स्टक्सनेट (Stuxnet) जैसे प्रमुख साइबर हमलों को देखेंगे, जिन्होंने कुछ देशों और प्रणालियों को प्रभावित किया है। आगे हम यह पता लगाएंगे कि, लोग और सरकारें साइबर हमलों के लिए कैसे तैयार और सुरक्षित रह सकते हैं। अंततः हम जानेंगे कि, कैसे एंथ्रोपिक (Anthropic) द्वारा विकसित एआई उपकरण संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) जैसे देशों द्वारा सैन्य अभियानों और साइबर रणनीति में प्रयुक्त किए जा रहे हैं।साइबर युद्ध (Cyberwarfare) का अर्थ, दुश्मनों के खिलाफ साइबर हमलों का उपयोग करना है। यह वास्तविक युद्ध के समान ही नुकसान पहुंचाता है, और/या महत्वपूर्ण कंप्यूटर सिस्टम (computer system) को बाधित करता है। इसके कुछ इच्छित परिणाम जासूसी, तोड़फोड़, प्रचार, हेरफेर या आर्थिक युद्ध हो सकते हैं। हालांकि, साइबरयुद्ध की परिभाषा के संबंध में विशेषज्ञों के बीच महत्वपूर्ण बहस चल रही है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि, ऐसी कोई चीज़ मौजूद नहीं है, क्योंकि आज तक किसी भी साइबर हमले को युद्ध के रूप में वर्णित नहीं किया जा सका है। दरअसल, यह उन साइबर हमलों के लिए एक उपयुक्त नाम है, जो लोगों और वस्तुओं को वास्तविक क्षति पहुंचाते हैं। साइबर हमले के जवाब में इस्तेमाल की गई गतिज सैन्य कार्रवाई का पहला उदाहरण, 5 मई 2019 को देखा गया था, जब इज़राइल (Israel) रक्षा बलों ने साइबर हमले से जुड़ी एक इमारत को नष्ट किया था।वॉनाक्राई रैंसमवेयर हमला (WannaCry ransomware attack) मई 2017 में वॉनाक्राई रैंसमवेयर क्रिप्टोवॉर्म (Cryptoworm) द्वारा किया गया एक विश्वव्यापी साइबर हमला था। इसने डेटा एन्क्रिप्ट (Encrypt) करके और बिटकॉइन क्रिप्टोकरेंसी (Bitcoin cryptocurrency) के रूप में फिरौती भुगतान की मांग करके, माइक्रोसॉफ्ट विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम (Microsoft Windows Operating System) वाले कंप्यूटरों को लक्षित किया था। इसे माइक्रोसॉफ्ट विंडोज सिस्टम के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी द्वारा विकसित इटरनल ब्लू (Eternal Blue) नामक सॉफ्टवेयर का उपयोग करके प्रचारित किया गया था। इस हमले से एक महीने पहले, द शैडो ब्रोकर्स (The Shadow Brokers) नामक समूह द्वारा इटरनलब्लू को चुराया गया था। वॉनाक्राई का अधिकांश प्रसार, उन संगठनों से हुआ था जिन्होंने इटरनलब्लू विरोधी उपायों को लागू नहीं किया था, या जो पुराने विंडोज सिस्टम का उपयोग कर रहे थे।यह हमला 12 मई 2017 को सुबह शुरू हुआ और कुछ घंटों बाद दोपहर में एक किल स्विच (Kill switch) के पंजीकरण द्वारा रोक दिया गया। किल स्विच ने पहले से संक्रमित कंप्यूटरों को एन्क्रिप्ट होने या वॉनाक्राई को आगे फैलने से रोक दिया। अनुमान है कि, इस हमले से 150 देशों में तीन लाख से अधिक कंप्यूटर प्रभावित हुए थे। इसमें कुल क्षति करोड़ों से लेकर अरबों डॉलर तक थी। उस समय, सुरक्षा विशेषज्ञों ने माना था कि, यह हमला उत्तर कोरिया (North Korea) या इस देश के लिए काम करने वाली एजेंसियों से हुआ था। दिसंबर 2017 में, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) ने औपचारिक रूप से दावा किया कि, हमले के पीछे उत्तर कोरिया ही था। हालांकि, उत्तर कोरिया ने इस हमले से इनकार किया है।दूसरी तरफ, स्टक्सनेट एक हानिकारक कंप्यूटर वर्म है, जिसे पहली बार 17 जून 2010 को उजागर किया गया था। माना जाता है कि, यह 2005 से विकास में है। स्टक्सनेट पर्यवेक्षी नियंत्रण और डेटा अधिग्रहण (supervisory control and data acquisition) प्रणालियों को लक्षित करता है। 2009 में नतान्ज़ परमाणु सुविधा (Natanz Nuclear Facility) में एक कंप्यूटर पर पहली बार स्थापित होने के बाद, यह ईरान परमाणु कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार है। हालाँकि न तो संयुक्त राज्य अमेरिका और न ही इज़राइल (Israel) ने खुले तौर पर इसकी जिम्मेदारी स्वीकार की है। कई स्वतंत्र समाचार संगठनों का दावा है कि, स्टक्सनेट एक साइबर हथियार है। इसे ऑपरेशन ओलंपिक गेम्स (Operation Olympic Games) के नाम से प्रख्यात सहयोगात्मक प्रयास में दोनों देशों द्वारा संयुक्त रूप से बनाया गया है।स्टक्सनेट विशेष रूप से प्रोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर्स (Programmable Logic Controllers) को लक्षित करता है, जो इलेक्ट्रोमैकेनिकल प्रक्रियाओं (electromechanical processes) के स्वचालन की अनुमति देता है। उदाहरण के तौर पर, परमाणु सामग्री को अलग करने के लिए गैस सेंट्रीफ्यूज (Gas centrifuges) सहित मशीनरी (machinery) और औद्योगिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने के लिए इसका उपयोग होता है। औद्योगिक नियंत्रण प्रणालियों को लक्षित करते हुए, इस कृमि ने दो लाख से अधिक कंप्यूटरों को संक्रमित किया है, और 1,000 मशीनों को भौतिक रूप से ख़राब कर दिया है।वैश्विक साइबर हमलों के इस युग में साइबर सुरक्षा के लिए तैयारी करना महत्वपूर्ण हो गया है। जैसे-जैसे साइबर या रैंसमवेयर हमले अधिक विविध और लगातार होते जा रहे हैं, इन हमलों से इलेक्ट्रिक ग्रिड (electric grid) और अन्य जीवनावश्यक बुनियादी ढांचे की रक्षा करना महत्वपूर्ण है। इस प्रयास में, आज हमारे पास पहले से ही कुछ रणनीतियां हालांकि उपलब्ध हैं। उन रणनीतियों में से एक फैराडे केज (Faraday Cage) है, जिसमें बुनियादी ढांचे को घेरने वाला एक महीन धातु जाल शामिल होता है। ये केज अर्थात तकनीकी पिंजरा, आने वाले विद्युत चुम्बकीय विकिरण को उनकी बाहरी सतह पर वितरित करके, खोखले कंडक्टर (Conductor) के रूप में कार्य करते हैं। इस प्रकार, वे किसी भी विकिरण या प्रवाह तारा को भी अपने भीतर घुसने से रोकते हैं, और उपकरणों को अक्षम या नष्ट होने से बचाते हैं। फैराडे केजवास्तव में, समान चार्ज (Charge) के इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रतिकर्षण (Electrostatic repulsion) के कारण किसी कंडक्टर के बाहर, चार्ज का पुनर्वितरण होता है। परिणामस्वरूप, शून्य के कंडक्टर के भीतर एक शुद्ध इलेक्ट्रोस्टैटिक क्षेत्र बनता है। यहां ‘कंडक्टर के भीतर’ से तात्पर्य निरंतर प्रवाहकीय परत से घिरा कोई भी स्थान है। इस घटना के कारण, फैराडे पिंजरे के बाहर मौजूद इलेक्ट्रॉनिक घटक के साथ कोई भी और सभी तरंगें उस स्थान के भीतर पूरी तरह से रद्द हो जाती हैं। साथ ही, पिंजरे के अंदर पैदा होने वाली तरंगों को भी बाहरी दुनिया में जाने से रोका जाता है।फिर भी, बुनियादी ढांचे के महत्वपूर्ण हिस्सों को बचाने के लिए फैराडे पिंजरों का उपयोग केवल छोटे पैमाने पर ही प्रभावी है। इसलिए, बहुत से अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान और विकास कार्यक्रम, वैश्विक विद्युत चुंबकीय हमलों के लिए सुरक्षा उपाय खोजने में कार्यरत हैं।एक तरफ, अमेरिकी सेना ने एंथ्रोपिक (Anthropic) द्वारा विकसित एआई मॉडल क्लॉड (Claude) का इस्तेमाल, वेनेजुएला (Venezuela) से एक व्यक्ति के अपहरण ऑपरेशन के दौरान किया था। यह एक उदाहरण है कि, कैसे अमेरिकी रक्षा विभाग अपने ऑपरेशन में एआई का उपयोग कर रहा है। वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले में, देश की राजधानी में बमबारी हुई और 83 लोग मारे गए। जबकि, एंथ्रोपिक के उपयोग की शर्तें, हिंसक उद्देश्यों, हथियारों के विकास या निगरानी के संचालन के लिए क्लाड के उपयोग पर रोक लगाती हैं। अमेरिका और अन्य सेनाएं अपने शस्त्रागार के रूप में, एआई को तेजी से इस्तेमाल कर रही हैं। इज़राइल की सेना ने भी गाज़ा (Gaza) में स्वायत्त क्षमताओं वाले ड्रोन (Drone) एवं एआई का उपयोग किया है।इस कारण, आलोचकों ने हथियार प्रौद्योगिकियों में एआई के उपयोग और स्वायत्त हथियार प्रणालियों की तैनाती के खिलाफ चेतावनी दी है। ये तकनीकें कंप्यूटर द्वारा बनाई गई गलतियों को लक्षित करने की ओर इशारा करते हुए, यह नियंत्रित करते हैं कि, किसे मारा जाना चाहिए और किसे नहीं। एआई कंपनियां भी इस बात से जूझ रही हैं कि, उनकी प्रौद्योगिकियों को रक्षा क्षेत्र के साथ कैसे जोड़ा जाना चाहिए। इसी कारण, कंपनियां स्वायत्त घातक संचालन और निगरानी में एआई के उपयोग पर भी चिंता व्यक्त कर रही हैं।संदर्भ1. https://tinyurl.com/nusa6n7w2. https://tinyurl.com/2e3wcxnf3. https://tinyurl.com/bde8w3cv4. https://tinyurl.com/2tm7w6u25. https://tinyurl.com/anv47a796. https://tinyurl.com/39h8xu577. https://tinyurl.com/4kuer33h
शहरीकरण - नगर/ऊर्जा
क्या होगा अगर आज देश में अचानक बाहर से रसोई गैस आनी बंद हो जाए?
क्या आप जानते हैं कि भारत में हर रोज़ लगभग 90 हज़ार टन एलपीजी (LPG) की खपत होती है, लेकिन देश की मौजूदा भंडारण क्षमता केवल 1.34 मिलियन टन है? इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आज गैस का आयात रोक दिया जाए, तो हमारे पास पूरे देश के लिए बमुश्किल दो हफ़्ते का ही स्टॉक मौजूद है। यही कारण है कि जब भी वैश्विक शिपिंग मार्गों, विशेषकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास तनाव बढ़ता है, तो भारत में एलपीजी की आपूर्ति तुरंत दबाव में आ जाती है। मेरठ और इसके आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर पेट्रोल और डीज़ल की आपूर्ति सामान्य रहने के बावजूद एलपीजी की कमी क्यों हो जाती है, एलपीजी कैसे बनती है, और क्यों लकड़ी के चूल्हे के बजाय हमें साफ़ और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज़ी से बढ़ना होगा। भारत में पेट्रोल और डीज़ल की तुलना में एलपीजी की आपूर्ति अधिक कमज़ोर क्यों है?पेट्रोल, डीज़ल और एलपीजी, ये सभी कच्चे तेल से ही निकलते हैं, लेकिन भारत के ऊर्जा सिस्टम में इनका व्यवहार बिल्कुल अलग है। पेट्रोल और डीज़ल की आपूर्ति इसलिए स्थिर रहती है क्योंकि भारत का रिफाइनिंग बुनियादी ढांचा (Refining infrastructure) बहुत मज़बूत है। देश में 23 कच्चे तेल की रिफाइनरियां काम करती हैं, जो हर साल 220 मिलियन टन से अधिक आयातित कच्चे तेल को देश के भीतर ही पेट्रोल और डीज़ल में बदल देती हैं। इसके अलावा, भारत किसी एक सप्लायर पर निर्भर रहने के बजाय कई अलग-अलग क्षेत्रों से कच्चा तेल आयात करता है, जिससे जोखिम कम हो जाता है। लेकिन एलपीजी के मामले में स्थिति बिल्कुल उलट है। भारत अपनी एलपीजी ज़रूरत का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है, और इसका ज़्यादातर हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। चिंता की बात यह है कि एलपीजी के लगभग 90 प्रतिशत शिपमेंट होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुज़रते हैं। ऐसे में जब भी इस क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव होता है, तो भारत आने वाले एलपीजी शिपमेंट सीधे तौर पर बाधित हो जाते हैं। एलपीजी गैस कैसे बनती है और इसका उपयोग कहाँ किया जाता है? तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (liquefied petroleum gas) या एलपीजी मुख्य रूप से कच्चे तेल को रिफाइन करने या प्राकृतिक गैस को प्रोसेस करने के दौरान प्राप्त होती है। इस प्रक्रिया में निकलने वाली गैसें मुख्य रूप से प्रोपेन (propane) और ब्यूटेन (butane) होती हैं, जिन्हें अकेले या मिलाकर एलपीजी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। परिवहन और भंडारण को आसान बनाने के लिए इन गैसों को वायुमंडलीय दबाव से लगभग 20 गुना अधिक दबाव डालकर तरल रूप में बदल दिया जाता है। चूँकि एलपीजी में आमतौर पर कोई गंध नहीं होती है, इसलिए गैस लीक होने पर ख़तरे को भांपने के लिए इसमें थोड़ी मात्रा में एथेनथियोल (ethanethiol) मिलाया जाता है, जो एक तीखी गंध वाला रसायन है। एलपीजी का ऊष्मीय मान बहुत अधिक होता है, यानी यह बहुत अच्छी गर्मी पैदा करती है। इस्तेमाल की जाने वाली कुल एलपीजी का लगभग आधा हिस्सा खाना पकाने और घरों को गर्म करने में ख़र्च होता है। बाकी का 50 प्रतिशत हिस्सा कारों में ईंधन के रूप में और औद्योगिक कार्यों में इस्तेमाल किया जाता है। चूंकि इसमें सल्फर (sulphur) की मात्रा लगभग न के बराबर होती है, इसलिए पेट्रोल की तुलना में यह एक साफ़ सुथरा विकल्प माना जाता है और कई देशों में वाहनों में धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है। लकड़ी और उपले जैसे पारंपरिक ईंधन सेहत के लिए कितने ख़तरनाक हैं? दुनिया भर में आज भी लगभग 2.1 बिलियन लोग (वैश्विक आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा) खुले में आग जलाकर या लकड़ी, जानवरों के गोबर और फसल के कचरे (बायोमास - biomass) जैसे ठोस ईंधन का उपयोग करके खाना पकाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2021 में घरेलू वायु प्रदूषण के कारण प्रति वर्ष अनुमानित 2.9 मिलियन मौतें हुईं, जिनमें 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की 309,000 से अधिक मौतें शामिल हैं। लकड़ी और कोयले जैसे प्रदूषणकारी ईंधन के इस्तेमाल से घरों के अंदर जो धुआं भरता है, उसमें महीन कणों का स्तर स्वीकार्य सीमा से 100 गुना अधिक तक हो सकता है। ये छोटे कण फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश कर जाते हैं और रक्तप्रवाह में मिल जाते हैं। इस तरह के घरेलू वायु प्रदूषण के लगातार संपर्क में आने से स्ट्रोक (stroke), इस्केमिक हृदय रोग (Ischemic heart disease), क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़ (Chronic Obstructive Pulmonary Disease) और फेफड़ों के कैंसर (lung cancer) जैसी गंभीर बीमारियां होती हैं। चूंकि महिलाएं और बच्चे आमतौर पर खाना पकाने और जलावन इकट्ठा करने जैसे घरेलू काम करते हैं, इसलिए वे इस ज़हरीले धुएं के सबसे ज़्यादा शिकार होते हैं। स्वास्थ्य की रक्षा के लिए एलपीजी, सौर ऊर्जा, बिजली और बायोगैस जैसे स्वच्छ ईंधन का उपयोग बढ़ाना बेहद ज़रूरी है। हमें जीवाश्म ईंधन छोड़कर नवीकरणीय ऊर्जा की ओर क्यों बढ़ना चाहिए? आज जलवायु परिवर्तन दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, और ऊर्जा इसका एक मुख्य कारण और समाधान दोनों है। पृथ्वी के वायुमंडल में गर्मी को फंसाने वाली ज़्यादातर ग्रीनहाउस गैसें बिजली और गर्मी पैदा करने के लिए जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) जलाने से आती हैं। साल 2023 में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत बिजली क्षेत्र ही था। यदि हमें जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों से बचना है, तो 2030 तक उत्सर्जन को लगभग आधा करना होगा और 2050 तक नेट-ज़ीरो के लक्ष्य तक पहुँचना होगा। इसके लिए हमें जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता ख़त्म करनी होगी और नवीकरणीय ऊर्जा (जैसे धूप, हवा, पानी, पृथ्वी की गर्मी) में निवेश करना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत प्रकृति द्वारा लगातार भरे जाते हैं और ये बहुत कम या शून्य प्रदूषण फैलाते हैं। आज दुनिया भर में 90 प्रतिशत से अधिक नई नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं जीवाश्म ईंधन के विकल्पों की तुलना में सस्ती हैं। साथ ही, निवेश किए गए हर एक डॉलर के लिए, नवीकरणीय ऊर्जा जीवाश्म ईंधन उद्योग की तुलना में तीन गुना अधिक रोज़गार पैदा करती है। यह न केवल हमारे पर्यावरण को साफ़ रखेगा, बल्कि वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों को रोककर सालाना 4.2 ट्रिलियन डॉलर तक की बचत भी कर सकता है।संदर्भ https://tinyurl.com/2fkzcnqs https://tinyurl.com/25nw8te4 https://tinyurl.com/y5ounq23 https://tinyurl.com/29gv3tcf https://tinyurl.com/2b6m7g5g
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
आशा भोसले और बॉय जॉर्ज का 'बो डाउन मिस्टर' में वैश्विक संगम
आशा भोसले (Asha Bhosle) भारतीय सिनेमा की सबसे बहुमुखी और प्रभावशाली गायिकाओं में से एक मानी जाती हैं। अपने लंबे करियर (career) में उन्होंने हज़ारों गीत गाए और हर शैली में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी आवाज़ में एक ऐसी सहजता और विविधता है, जिसने उन्हें सिर्फ फिल्मी संगीत तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें वैश्विक स्तर पर भी एक विशेष स्थान दिलाया।सन 1991 में उन्होंने अंग्रेज़ी संगीत कलाकार बॉय जॉर्ज (Boy George) के साथ बो डाउन मिस्टर (Bow Down Mister) गीत में अपनी आवाज़ दी। यह सहयोग उस समय के लिए बेहद खास था, क्योंकि इसमें भारतीय और पश्चिमी संगीत का अनोखा मेल देखने को मिला। यह गीत हरे कृष्ण आंदोलन से प्रेरित था और इसमें हरे कृष्ण मंत्र के उच्चारण भी शामिल हैं, जो भारतीय आध्यात्मिकता को वैश्विक संगीत के साथ जोड़ते हैं।इस गीत की खास बात यह भी है कि इसमें आशा भोसले की आवाज़ प्रमुख रूप से सुनाई देती है, हालांकि उन्हें आधिकारिक रूप से श्रेय नहीं दिया गया था। फिर भी, उनकी गायकी ने इस गीत को एक अलग पहचान दी और इसे और अधिक भावपूर्ण बनाया।यह सहयोग दिखाता है कि आशा भोसले की आवाज़ सीमाओं से परे जाकर विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ने की क्षमता रखती है। इस प्रकार, यह गीत केवल एक संगीत प्रयोग नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक संवाद है, जो आज भी संगीत प्रेमियों को प्रेरित करता है। संदर्भ:https://tinyurl.com/3rxsxk8h https://tinyurl.com/2fr5ky83 https://tinyurl.com/ab223k5s
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
ऋग्वेद व् ज़ेंद अवेस्ता ग्रन्थ की समानताएं व् मेरठ के 'अब्दुल्लापुर सादात' में झलकता ईरान
क्या आप जानते हैं कि इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन भारतीय आर्यों और प्राचीन ईरानियों के पूर्वज एक ही थे, और वेदों तथा पारसी धर्मग्रंथ ज़ेंद अवेस्ता (Zend Avesta) में देवताओं, अनुष्ठानों और भाषा की इतनी गहरी समानता है जो आज भी इतिहासकारों को हैरान कर देती है? यह तथ्य ऐतिहासिक और भाषाई रूप से साबित हो चुका है कि अवेस्तन और आर्य सभ्यताएं एक ही भाषाई और सांस्कृतिक विरासत का बेहतरीन उदाहरण हैं, जो समय के साथ धीरे-धीरे अलग होकर दो विशिष्ट सभ्यताओं में बदल गईं। दोनों सभ्यताओं की भाषा, धर्म और संस्कृति में बहुत मजबूत समानताएं देखने को मिलती हैं, क्योंकि इन दोनों की जड़ें समान प्रोटो-इंडो-ईरानी (Proto-indo-iranian) भाषा और परंपराओं से जुड़ी हुई हैं। यह एक ऐसा ऐतिहासिक सच है जो हमें प्राचीन मध्य एशिया से लेकर भारत के आधुनिक शहरों तक की एक लंबी और आकर्षक यात्रा पर ले जाता है। ऋग्वेद और अथर्ववेद हमारे प्राचीन ज्ञान और विचारों को कैसे दर्शाते हैं?प्राचीन भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक नींव वेदों पर टिकी है। इनमें ऋग्वेद का स्थान सबसे अहम है। ऋग्वेद एक ऐसा ग्रंथ है जो शुरुआत में असुरों (अहुरों) का सम्मान करता है, लेकिन इसके छठे मंडल के बाद से यह शक्तिशाली असुरों को एक ऐसे खतरे के रूप में देखने लगता है जिन पर विजय पाना आवश्यक है। यह ग्रंथ उस समाज की व्यवस्था को भी स्पष्ट करता है जिसमें पुजारियों, योद्धाओं और किसानों का वर्गीकरण था। ऋग्वेद में मुख्य रूप से ब्राह्मणों पर ज़ोर दिया गया है, जो पुजारी का कार्य करते थे। ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी का ज़िक्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऋग्वेद समय के साथ आर्य समाज के विचारों में और भी विकास हुआ। ऋग्वेद के बाद, अथर्ववेद में समाज की संरचना को और भी स्पष्ट किया गया। अथर्ववेद ने योद्धाओं की पहचान राजन्य के रूप में की और वैश्यों को व्यापार तथा कृषि से जोड़ा। हालांकि, यह स्पष्ट है कि यह केवल काम का बंटवारा था, कोई जन्म आधारित कठोर जाति व्यवस्था नहीं थी। इन ग्रंथों से यह भी पता चलता है कि शुरुआती दौर में इन सभ्यताओं के पास कोई लिखित साहित्य नहीं था। वे अपने साहित्य और मंत्रों को केवल याद रखते थे, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप से ही पहुंचाए जाते थे। ज़ेंद अवेस्ता क्या है और प्राचीन ईरानी धर्म में इसका क्या महत्व है?ज़ेंद अवेस्ता पारसियों (मज़दयी धर्म को मानने वालों) का पवित्र ग्रंथ है। अवेस्ता दरअसल उन ग्रंथों का संग्रह है जो अवेस्तन भाषा में लिखे गए हैं, और ज़ेंद उनका अनुवाद तथा पहलवी भाषा में की गई उनकी व्याख्या है। इस ग्रंथ का महत्व दोतरफा है; एक तरफ यह हमें शुरुआती मज़दयी विचारों के बारे में बताता है, और दूसरी तरफ यह अवेस्तन भाषा का एकमात्र प्रमाण है। यह एक ऐसी प्राचीन ईरानी भाषा है जो पुरानी फ़ारसी के साथ मिलकर इंडो-यूरोपियन (Indo-european) परिवार की इंडो-ईरानी (Indo-irani) शाखा का हिस्सा बनती है। अवेस्ता इक्कीस किताबों (नस्क) का समूह था, जिसे अहुरा मज़्दा (Ahura Mazda) ने बनाया और ज़रथुस्त्र (Zarathustra) ने राजा विष्टास्प तक पहुंचाया। ऐसा माना जाता है कि सिकंदर के आक्रमण के समय यूनानियों ने इस ग्रंथ को नष्ट कर दिया था या बिखेर दिया था। बाद में अर्ससिड (Arssid) शासन के दौरान राजा वलख्स (Valkhs) ने इन बिखरे हुए हिस्सों को, जो मौखिक या लिखित रूप में बचे थे, फिर से इकट्ठा करने का काम शुरू किया। इसके बाद ससानियन राजाओं के काल में इस ग्रंथ को पूरी तरह से सहेजा गया। राजा अर्दशीर ने मुख्य पुजारी तन्सर को अर्ससिड काल के काम को पूरा करने का आदेश दिया। फिर शाहपुर प्रथम ने यूनानियों और भारतीयों द्वारा बिखेरे गए वैज्ञानिक दस्तावेज़ों की खोज करवाई और उन्हें अवेस्ता में शामिल किया। अंततः शाहपुर द्वितीय के समय में आदुर्बाद ई महरास्पंदान (Adurbad e Mahraspandan) ने इसके विहित रूप (कैनन) का सामान्य संशोधन किया। आज जो अवेस्ता मौजूद है उसमें यस्न, विस्पराद, खोरदा अवेस्ता, सीरोज़ा, यश्त और विदेव्दाद जैसे महत्वपूर्ण हिस्से शामिल हैं। विदेव्दाद के उन्नीसवें अध्याय में ज़रथुस्त्र की परीक्षा का वर्णन है, जहां अंगरा मैन्यु उन्हें अच्छे धर्म को छोड़ने के लिए उकसाता है, लेकिन ज़रथुस्त्र अहुरा मज़्दा की ओर मुड़ते हैं। वेदों और ज़ेंद अवेस्ता के बीच कैसी अद्भुत समानताएं मौजूद हैं?आर्यों के वेदों और ईरानियों के ज़ेंद अवेस्ता के बीच की समानताएं इतनी गहरी हैं कि उन्हें देखकर स्पष्ट हो जाता है कि ये दोनों एक ही स्रोत से निकले हैं। दोनों सभ्यताओं की भाषाएं एक ही प्रोटो-इंडो-ईरानी जड़ से उत्पन्न हुई हैं। दोनों ग्रंथों में कई देवी-देवता एक समान हैं, जैसे मित्र, वरुण, इंद्र, वायु, सोम (हाओमा), अर्यमन और अपाम नपात। दोनों ही सभ्यताओं में घोड़े की भूमिका अनुष्ठानों और बलियों में बहुत केंद्रीय थी। यहां तक कि कई भौगोलिक नाम और घटनाओं के स्थान भी दोनों परंपराओं में एक जैसे हैं। ऋग्वेद की 'सरस्वती' नदी को ज़ेंद अवेस्ता में 'हरक्ष्वती' कहा गया है। इन दोनों संस्कृतियों में 'असुर' और 'दैव' की अवधारणाएं मौजूद थीं, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि समय के साथ इनकी भूमिकाएं पूरी तरह से उलट गईं। अवेस्ता में जहां असुर (अहुर) को पूजनीय माना जाता है, वहीं वैदिक परंपरा में दैव (देवताओं) की पूजा की जाती है। धार्मिक जीवन में अग्नि का महत्व दोनों जगह सबसे ऊपर था। संस्कृत में जिसे 'यज्ञ' कहा जाता था, अवेस्तन में उसे 'यग्य' (यस्न) कहा गया। पीने के पदार्थों में आर्यों का पसंदीदा 'सोम' था, जो अवेस्तनों के लिए 'हाओमा' बन गया, क्योंकि पुरानी फ़ारसी में 'स' का उच्चारण 'ह' की तरह किया जाता था। जनेऊ जैसी पवित्र धागे की रस्म, जो आधुनिक हिंदुओं में आम है, अवेस्तनों में भी पाई जाती है। ज़ेंद अवेस्ता में आर्यों और उनके पवित्र भूभाग (आर्यानेम वेजाह) का बहुत सम्मान किया गया है। इन प्राचीन ग्रंथों से भारत और ईरान की साझा विरासत कैसे झलकती है?इंडो-ईरानी भाषा समूह इंडो-यूरोपियन भाषाओं की सबसे पूर्वी मुख्य शाखा है। विद्वानों की आम सहमति है कि इंडो-ईरानी समूह का मूल स्थान संभवतः आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान के उत्तर में, कैस्पियन सागर (Caspian sea) के पूर्व में था, जो आज तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान का इलाका है। यहीं से कुछ ईरानी दक्षिण और पश्चिम की ओर गए, जबकि इंडो-आर्य दक्षिण और पूर्व की ओर भारत के उपमहाद्वीप में आए। ऋग्वेद के भौगोलिक विवरणों से यह स्पष्ट होता है कि इंडो-आर्यों की सबसे पहली बस्ती भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में थी। यह पलायन एक ही बार में नहीं हुआ, बल्कि यह कई चरणों में हुआ था। भाषाई दृष्टिकोण से इंडो-आर्य और ईरानी समूहों के बीच घनिष्ठ संबंध पर कभी संदेह नहीं किया गया। दोनों में कई व्याकरणिक विशेषताएं एक समान हैं। उदाहरण के लिए, वेदों में प्रयुक्त शब्द 'यज्ञ' (पूजा का अनुष्ठान) और अवेस्तन का शब्द 'यस्न' बिल्कुल एक हैं। इसी तरह वैदिक 'होतृ' (अनुष्ठान करने वाला पुजारी) और अवेस्तन 'ज़ओतार' एक ही हैं। इसके अलावा दोनों भाषाओं के बोलने वाले खुद को एक विशिष्ट समुदाय के रूप में पुकारने के लिए एक जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते थे: संस्कृत में 'आर्य', अवेस्तन में 'ऐरिइया' और पुरानी फ़ारसी में 'अरिया'। व्याकरण के नियमों में भी समानताएं और कुछ अंतर दिखाई देते हैं, जैसे संस्कृत के शब्द 'सप्त' और 'सर्व' ईरानी भाषा में 'हप्त' और 'हउरुव' बन जाते हैं। यह सब एक गहरी और अटूट सांस्कृतिक साझेदारी का प्रमाण है। प्राचीन ईरान और भारत का यह ऐतिहासिक जुड़ाव आज मेरठ शहर से कैसे जुड़ता है?हजारों सालों की इन प्राचीन सभ्यताओं के स्थानांतरण और सांस्कृतिक मिलाप का प्रभाव भारत के आधुनिक भूगोल और समाज पर भी पड़ा है। इसका एक जीता-जागता उदाहरण उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित 'अब्दुल्लापुर सादात' नामक एक ऐतिहासिक मुस्लिम बस्ती है। यह जगह मेरठ के पूर्वी बाहरी इलाके में, गंगा नगर के ठीक दक्षिण में स्थित है। अब्दुल्लापुर सादात से मेरठ सिटी जंक्शन की दूरी राष्ट्रीय राजमार्ग 334(एनएच 334) के रास्ते मात्र बारह किलोमीटर है। इस महत्वपूर्ण बस्ती की स्थापना सैयद मीर अब्दुल्ला नक़वी अल बुखारी ने की थी। बुखारी वंशावली सीधे तौर पर मध्य एशिया और महान ईरानी सांस्कृतिक क्षेत्र के ऐतिहासिक जुड़ाव को दर्शाती है। अब्दुल्लापुर सादात में मुख्य रूप से सैयदों की एक बड़ी आबादी निवास करती है, इसी कारण इसे अब्दुल्लापुर सादात कहकर पुकारा जाता है। यह क्षेत्र नक़वी समुदाय की कन्नौजी बुखारी और जलाल बुखारी शाखाओं का मुख्य केंद्र है। ये दोनों ही शाखाएं जलालुद्दीन सुर्ख़-पोश बुखारी की वंशज हैं, जो सैयद अली नक़वी और सैयद सदरुद्दीन शाह कबीर नक़वी अल बुखारी के माध्यम से आगे बढ़ीं। सदरुद्दीन शाह सिकंदर लोदी के मुख्य सलाहकार भी थे। अब्दुल्लापुर का 'कोट किला' सोलहवीं सदी की शुरुआत में बनवाया गया था, जो मीर अब्दुल्ला का मुख्य निवास स्थान था। यहां के सैयद लोग 'मीरसाहिब' के नाम से मशहूर हैं और एक समय में उनके पास बावन गांवों की एक विशाल जागीर हुआ करती थी। आज भी अब्दुल्लापुर सादात में इतिहास और संस्कृति की कई इमारतें और रिवायतें जीवित हैं। यहां बड़ा दरवाज़ा (कोट किले का मुख्य प्रवेश द्वार), शाकिर महल, 52 दरी, कोट मस्जिद, अज़मत मंज़िल, सैयद का मकबरा और सैयद बरकत अली नक़वी की तीन सौ साल पुरानी पक्की बैठक जैसी महत्वपूर्ण जगहें मौजूद हैं। शिया मुसलमानों के बीच इस कस्बे का ९वीं मुहर्रम का आयोजन काफी प्रसिद्ध है। यहीं के निवासी सैयद कुदरत नक़वी एक जाने-माने पाकिस्तानी लेखक, भाषाविद् और आलोचक थे, जिन्होंने 'ग़ालिब कौन है', 'असास-ए-उर्दू' और 'हिंदी-उर्दू लुग़त' जैसी मशहूर किताबें लिखीं। भारत के विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए थे। इस प्रकार, आर्यों और अवेस्तनों की प्राचीन साझा जड़ों से लेकर मेरठ के अब्दुल्लापुर सादात तक, भाषा, संस्कृति और इंसानी इतिहास का यह सफ़र हमें बताता है कि सरहदें भले ही बदल जाएं, लेकिन सभ्यताओं का आपसी जुड़ाव हमेशा कायम रहता है। संदर्भ 1. https://tinyurl.com/232p2cl3 2. https://tinyurl.com/2bglc2rq 3. https://tinyurl.com/22wduweo 4. https://tinyurl.com/27copcw3 5. https://tinyurl.com/27ny9qpo 6. https://tinyurl.com/28fp3s9r 7. https://tinyurl.com/24bywry7
गतिशीलता और व्यायाम/जिम
21-06-2026 09:25 AM • Meerut-Hindi
पेले कैसे बने तीन विश्व कप जीतने वाले दुनिया के एकमात्र खिलाड़ी
पेले (Pelé) फुटबॉल इतिहास के सबसे महान खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। उनका पूरा नाम एडसन अरांटिस दो नसिमेंटो (Edson Arantes do Nascimento) था, लेकिन दुनिया उन्हें प्यार से पेले के नाम से जानती है। अपनी असाधारण प्रतिभा, गोल करने की क्षमता और खेल के प्रति समर्पण के कारण वे फुटबॉल के वैश्विक प्रतीक बन गए।
पेले ने मात्र 15 वर्ष की आयु में सैंटोस क्लब के लिए और 16 वर्ष की आयु में ब्राज़ील की राष्ट्रीय टीम के लिए खेलना शुरू कर दिया था। वर्ष 1958 में केवल 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने ब्राज़ील को विश्व कप जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और विश्व कप जीतने वाले सबसे युवा खिलाड़ी बने। इसके बाद उन्होंने 1962 और 1970 में भी ब्राज़ील को विश्व कप खिताब दिलाने में योगदान दिया। आज भी वे तीन फीफा विश्व कप जीतने वाले एकमात्र खिलाड़ी हैं।
अपने करियर में पेले ने 1,000 से अधिक गोल किए और अपनी शानदार तकनीक, गति तथा गोल करने की अद्भुत क्षमता से दुनिया भर के प्रशंसकों का दिल जीता। उन्हें "ओ रेई" अर्थात "फुटबॉल का राजा" भी कहा जाता है।
पेले की विरासत केवल उनके रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है। उन्होंने फुटबॉल को दुनिया के हर कोने तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आज भी उन्हें खेल इतिहास के सबसे प्रभावशाली खिलाड़ियों में से एक माना जाता है।
हमारे देश में क्रिकेट की ख्याति के कारण, मेरठ शहर कैसे बना खेल सामग्री उत्पादन का केंद्र?
आज के हमारे लेख में हम क्रिकेट के इतिहास को समझेंगे, और जानेंगे कि इसकी शुरुआत कहां एवं कैसे हुई। फिर हम यह पता लगाएंगे कि, भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान क्रिकेट की शुरुआत कैसे हुई। आगे, हम देखेंगे कि हमारा शहर मेरठ, क्रिकेट उपकरण निर्माण का एक महत्वपूर्ण केंद्र कैसे बना। हम क्रिकेट में उपयोग किए जाने वाले उपकरणों और इस खेल के नियमों पर भी गौर करेंगे। अंततः, हम सैयद मुश्ताक अली जैसे उल्लेखनीय खिलाड़ियों एवं अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत की उपलब्धियों की जांच करेंगे।
माना जाता है कि, क्रिकेट का आविष्कार सैक्सन (Saxon) या नॉर्मन काल (Norman times) के दौरान दक्षिण-पूर्व इंग्लैंड के वेल्ड (Weald) क्षेत्र में रहने वाले बच्चों द्वारा किया गया था। क्रिकेट को वयस्क खेल के रूप में खेले जाने का पहला संदर्भ, 1611 में था। उसी वर्ष, एक शब्दकोश में क्रिकेट को ‘लड़कों के एक खेल’ के रूप में परिभाषित किया गया। यह भी विचार प्रचलित है कि, क्रिकेट की उत्पत्ति कटोरों से हुई होगी, जिनसे बल्लेबाज द्वारा मारे गए गेंद को उसके लक्ष्य तक पहुंचने से रोकने की कोशिश की जाती थी।
सत्रहवीं सदी के मध्य तक ग्रामीण क्रिकेट विकसित हो चुका था। इसी सदी के उत्तरार्ध में, पहले अंग्रेजी प्रादेशिक संघ बनाए गए। बाद में, अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में लंदन (London) और इंग्लैंड (England) के दक्षिण-पूर्वी प्रदेशों में, एक प्रमुख खेल के रूप में क्रिकेट स्थापित हुआ। हालांकि, यात्रा बाधाओं के कारण इसका प्रसार सीमित था, यह धीरे-धीरे इंग्लैंड के अन्य हिस्सों में लोकप्रियता हासिल कर रहा था। फिर, 1745 से महिला क्रिकेट की भी शुरुआत हुई।
1744 में, क्रिकेट के पहले नियम लिखे गए, और बाद में 1774 में इन्हें संशोधित किया गया। ‘स्टार एंड गार्टर क्लब (Star and Garter Club)’ द्वारा इसके कोड तैयार किए गए थे, जिनके सदस्यों ने 1787 में लॉर्ड्स (Lord’s) में प्रसिद्ध ‘मैरीलेबोन क्रिकेट क्लब (Marylebone Cricket Club)’ की स्थापना की थी। यह क्लब बाद में क्रिकेट के नियमों का संरक्षक व संशोधक बन गया।
सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत में, अंग्रेजी उपनिवेशों के माध्यम से क्रिकेट उत्तरी अमेरिका में लोकप्रिय हुआ, और अठारहवीं शताब्दी में यह दुनिया के अन्य हिस्सों में पहुंचा। वेस्ट इंडीज (West Indies) में इसे उपनिवेशवादियों द्वारा और भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नाविकों द्वारा लाया गया था। 1788 में उपनिवेशीकरण शुरू होते ही, यह ऑस्ट्रेलिया (Australia) पहुंचा। जबकि, उन्नीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में क्रिकेट न्यूजीलैंड (New Zealand) और दक्षिण अफ्रीका (South Africa) में प्रमुख बनने लगा।
क्रिकेट के खेल को सत्रहवीं एवं अठारहवीं शताब्दी में इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नाविकों और व्यापारियों द्वारा, भारतीय उपमहाद्वीप में परिचित करवाया गया था। भारत में क्रिकेट का सबसे पहला ज्ञात रिकॉर्ड, 1721 का है। इसके अलावा, देश में पहला क्रिकेट क्लब 1792 में स्थापित किया गया था। 1886 और 1888 के ग्रीष्म ऋतु में, भारतीय पारसी क्रिकेट संघ ने इंग्लैंड का दौरा किया। 1889-90 की सर्दियों में, अंग्रेजी खिलाड़ियों का एक संघ, भारत का दौरा करने वाला पहला संघ था। 1912-13 तक, बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) प्रतियोगिताओं में हिंदू क्रिकेट संघ और मुस्लिम क्रिकेट संघ भी शामिल हुए। इसके तुरंत बाद, कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) और मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में इसी तरह की स्पर्धाएं शुरू हुई। इस प्रकार, 1918 के अंत तक भारत में प्रथम श्रेणी क्रिकेट की स्थापना हो गयी।
चलिए, अब जानते हैं कि, हमारे शहर मेरठ से क्रिकेट का क्या संबंध है। हमारा मेरठ शहर, लंबे समय से क्रिकेट खेल के सामान के निर्माण में अग्रणी रहा है। मेरठ को अक्सर ही, "भारत का खेल शहर" कहा जाता है, क्योंकि यह देशज और अंतर्राष्ट्रीय खेल सामान बाजारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हमारे शहर के खेल उद्योग की विशेषता, विनिर्माण इकाइयों का समूह है, जिसमें बड़े उद्यमों से लेकर कई छोटे और सूक्ष्म स्तर के व्यवसाय शामिल हैं।
मेरठ के खेल उद्योग की उत्पत्ति का पता उन्नीसवीं शताब्दी से लगाया जा सकता है, जब स्थानीय कारीगरों ने शुरुआत में भारत में तैनात ब्रिटिश सैनिकों के लिए खेल सामान तैयार किए थे। इसमें मुख्य रूप से स्वदेशी लकड़ी और चमड़े का उपयोग किया गया था। हालांकि, इस उद्योग के आधुनिक विकास का सच्चा उत्प्रेरक 1947 में हुआ भारत का विभाजन था। सियालकोट (वर्तमान पाकिस्तान में) से कई उच्च कुशल हिंदू खेल उपकरण कारीगर भारत चले आए। ऐसे कई कारीगर जालंधर (पंजाब) और मेरठ जैसे शहरों में बस गए। इस आमद ने आधुनिक भारतीय खेल सामान उद्योग की नींव रखी, जिसकी औपचारिक औद्योगिक स्थापना 1948 के आसपास मेरठ में शुरू हुई।
तब से, जालंधर के साथ-साथ हमारा शहर मेरठ, एक प्रमुख खेल उद्योग शक्ति के रूप में उभरा है। गौरतलब है कि, मेरठ भारत के कुल खेल सामान उत्पादन में अनुमानित तौर पर 75%-80% योगदान देता है। यहां, आज यह उद्योग 1,500 से अधिक छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों तथा हजारों सूक्ष्म और घरेलू इकाइयों के विशाल नेटवर्क में विकसित हुआ है। यह उल्लेखनीय वृद्धि कारीगरों की पीढ़ियों के साथ गहराई से जुड़ी हुई है, जिन्होंने पारंपरिक ज्ञान और सटीकता को निरंतर सुनिश्चित किया है।
हमारे मेरठ व अन्य जगहों पर बनने वाली क्रिकेट की गेंद, कॉर्क से बनी, लाल, सफेद या गुलाबी रंग की होती है, जिसे चमड़े में लिपटा जाता है। सामान्य, गेंद की परिधि 9.1 इंच (23 सेंटीमीटर) होनी चाहिए। दूसरी तरफ, खेल में लकड़ी के बल्ले का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए प्रयुक्त लकड़ी कश्मीर या इंग्लिश विलो पेड़ की होती है। यह 38 इंच (96.5 सेमी) से अधिक लंबा और 4.25 इंच (10.8 सेमी) चौड़ा नहीं हो सकता। बल्ले का हैंडल लंबा होता है, और एक तरफ की सतह सपाट होती है। इस खेल में, तीन सीधे लकड़ी के स्टंप (Stump) का प्रयोग होता है, जिनपर लकड़ी से बने दो क्रॉसपीस (Crosspieces) अर्थात बेल्स (Bails) रखे जाते हैं। गेंद के स्टंप को छूने पर, ये बेल्स गिरते हैं, और तब विकेट लिया जाता है।
इसके अलावा, कोई खिलाड़ी गेंद से अपना बचाव करने हेतु कई तरह के पैड (Pad) और गार्ड (Guard) पहनते हैं। इसमें हेलमेट, पैरों के लिए पैड, छाती एवं हाथों के गार्ड, तथा दस्ताने आदि शामिल हैं।
हम जानते ही हैं कि, क्रिकेट भारत का सिर्फ लोकप्रिय खेल ही नहीं बल्कि, एक सफल खेल भी है। भारतीय राष्ट्रीय क्रिकेट संघ ने 1932 में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया, और तब से 2005 से 2008 तक प्रत्येक बार (आईसीसी रैंकिंग) में शीर्ष चार टेस्ट संघों में शामिल रहा। संघ ने 1983 और 2011 में वन डे क्रिकेट विश्व कप जीता था। देश के संघ की अन्य प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय जीतों में, 2007, 2024 और 2026 में तीन बार टी20 विश्व कप तथा 2002, 2013 और 2025 में आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी शामिल हैं।
भारत ने अपना पहला विश्व कप 1983 में कपिल देव की कप्तानी में जीता था। फिर, 80 और 90 के दशक में सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, वी. लक्ष्मण और अनिल कुंबले का भी पदार्पण हुआ, जिन्हें महानतम भारतीय खिलाड़ियों में से एक माना जाता है।
गांगुली की कप्तानी को भारतीय क्रिकेट का निर्णायक मोड़ माना जाता है, क्योंकि उस समय में संघ को बड़ी सफलता मिली। इसके बाद महेंद्रसिंह धोनी ने भी शानदार कप्तानी की। इसके अलावा, आज विराट कोहली, रोहित शर्मा एवं सूर्यकुमार यादव की कप्तानी काफी महत्वपूर्ण है।
क्रिकेट में कुछ खिलाड़ी, अपने दृष्टिकोण से इस खेल को फिर से परिभाषित करने में कामयाब रहे हैं। ऐसे ही एक खिलाड़ी, सैयद मुश्ताक अली है। अपनी आक्रामक बल्लेबाजी और तेजतर्रारता के कारण, उनको काफी प्रशंसा मिली है। सैयद मुश्ताक अली ने विदेश में टेस्ट शतक बनाने वाले पहले भारतीय के रूप में इतिहास रचा था। यह उपलब्धि उन्होंने 1936 में ओल्ड ट्रैफर्ड (Old Trafford) में इंग्लैंड के खिलाफ हासिल की थी। उनका अंतरराष्ट्रीय पेशा 1934 से 1952 के बीच सिर्फ 11 टेस्ट मैचों तक सीमित था। परंतु, इस दौरान उन्होंने 612 रन बनाए, जिसमें दो शतक और तीन अर्द्धशतक शामिल थे।
फ़िरोज़ पालिया और मुश्ताक अली
दाएं हाथ से बल्लेबाजी करने वाले मुश्ताक अली ने अपने अभूतपूर्व प्रथम श्रेणी पेशे में, 226 मैच खेले, 13,213 रन बनाए और 30 शतक एवं 63 अर्द्धशतक लगाए। उन्होंने अपनी बाएं हाथ की स्पिन से 162 विकेट भी लिए। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने अपने शीर्ष घरेलू टी20 क्रिकेट स्पर्धाओं में से एक प्रतियोगिता का नाम उनके नाम पर रखकर, उनकी विरासत का सम्मान किया है। यह प्रतियोगिता सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी है।
ज्ञान व प्रेरणा से कैसे संबंधित हैं, प्राचीन ग्रीस की म्यूज़ेस व पारसी धर्म में स्पेंटा?
मेरठ, आज के लेख में हम समझेंगे कि, ग्रीक परंपरा में म्यूज़ेस (Muses) कौन थीं और वे ज्ञान, कला और प्रेरणा से कैसे जुड़ी हैं। फिर, हम नौ म्यूज़ेस और उनके प्रतीकात्मक क्षेत्रों का पता लगाएंगे। आगे, हम देखेंगे कि माउसियन (Mouseion) शब्द, किसी ‘सीखने के स्थान’ को कैसे संदर्भित करता है। तब, हम पारसी विचारधारा में स्पेंटा (Spenta) की अवधारणा को भी समझेंगे। अंततः हम यह पता लगाएंगे कि, इन अवधारणाओं की तुलना कैसे की जा सकती है, और ज्ञान को मानव प्रगति के लिए शक्तिशाली रूप में क्यों देखा गया है।
प्राचीन यूनानी धर्म और पौराणिक कथाओं में ‘म्यूज़ेस’, साहित्य, विज्ञान और कला की प्रेरणादायक देवियां थीं। उन्हें कविता, गीतों, नृत्य और मिथकों में ‘ज्ञान के स्त्रोत’ के रूप में उल्लेखित किया जाता था। हालांकि, आधुनिक आलंकारिक उपयोग में म्यूज़ वह व्यक्ति है, जो किसी की कलात्मक प्रेरणा के स्रोत के रूप में कार्य करता है। म्यूज़ेस की संख्या और नाम, उनके प्रतीकात्मक क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग थे। लेकिन शास्त्रीय काल से, उनकी संख्या को नौ तक मानकीकृत किया गया था। ये नौ म्यूज़ेस निम्नलिखित हैं –
कैलीओप, म्यूज़ेस की सबसे बड़ी और सबसे सम्मानित देवी थी। वे महाकाव्य की अध्यक्षता करती है, जिनमें देवताओं, नायकों और मानव स्थिति की भव्य कथाएं शामिल हैं। कहा जाता है कि, उनकी आवाज़ सबसे प्रभावशाली थी, और उनकी उपस्थिति राजसी है। कला में, कैलीओप को अक्सर ही चित्रित किया जाता है।
2. क्लियो (Clio)
क्लियो इतिहास की म्यूज़ है, जो मानव कर्मों की इतिहासलेखक थी। क्लियो को सामान्यतः एक स्क्रॉल या किताब के साथ चित्रित किया जाता है। क्लियो की भूमिका उस संस्कृति में महत्वपूर्ण थी, जो मौखिक परंपरा को महत्व देती थी, और यह सुनिश्चित करती थी कि, मानवता की जीत और विफलताओं को भुलाया नहीं जाए।
3. एराटो (Erato)
प्रेम कविता की म्यूज़ - एराटो, जुनून और इच्छा को संरक्षित करती है। हाथ में वीणा और बालों में गुलाब के फूल सजाकर, वह प्रेम के आनंद और पीड़ा को व्यक्त करने वाले छंदों को प्रेरित करती है।
4. यूटरपे (Euterpe)
यूटरपे, संगीत की म्यूज़ है, जो माधुर्य और सद्भाव की प्रेरक है। उसे अक्सर ही, एक वाद्ययंत्र बजाते हुए चित्रित किया जाता है, जिसकी ध्वनि के माध्यम से खुशी और सांत्वना आती है। प्राचीन ग्रीस में, संगीत कविता और नृत्य से यूटरपे अविभाज्य थी, और उनका प्रभाव संगीत अभिव्यक्ति के सभी रूपों तक फैला हुआ था।
यूटरपे की प्रतिमा
5. मेलपोमीन (Melpomene)
मेलपोमीन, त्रासदी की म्यूज़ एवं अस्तित्व के गहरे पहलुओं की दर्पण है। एक हाथ में अपना दुखद मुखौटा और दूसरे हाथ में एक तलवार के साथ, वह उन नाटकों की अध्यक्षता करती है, जो पीड़ा, भाग्य और मुक्ति का पता लगाते हैं। प्राचीन ग्रीस में, कुछ त्रासदियों को त्योहारों के दौरान प्रदर्शित किया जाता था, जो साझा दुःख के माध्यम से दर्शकों को राहत प्रदान करते थे।
6. पॉलीहिमनिया (Polyhymnia)
पॉलीहिमनिया, पवित्र कविता और भजनों की म्यूज़ है, जो मानवता और ब्रह्मांड के बीच दिव्य संबंध का प्रतीक है। उसे सामान्यतः, रहस्य और चिंतन का संकेत देते हुए घूंघट में चित्रित किया जाता है। उनके क्षेत्र में धार्मिक भजन, वक्तृत्व और नाटक शामिल है, जो गंभीर व आध्यात्मिक अभिव्यक्ति में उनकी भूमिका को दर्शाते हैं।
7. टेरप्सीचोर (Terpsichore)
टेरप्सीचोर, नृत्य और आनंद की प्रेरणा है, जिसकी गतिविधियां जीवन की लय का उत्सव हैं। उसे अक्सर ही वीणा पकड़े हुए चित्रित किया गया है। प्राचीन ग्रीस में, नृत्य एक सामुदायिक कार्य था, जो लोगों को साझा गति से एकजुट करता था।
8. थालिया (Thalia)
थालिया, सुखांत नाटक की प्रतीक व हंसी का उपहार है। वह उन नाटकों की अध्यक्षता करती है, जो मानवीय मूर्खता का मजाक उड़ाते हैं, और जीवन की बेतुकी बातों का जश्न मनाते हैं। प्राचीन ग्रीस में, कुछ सुखांत नाटकों में राजनेताओं और देवताओं का मज़ाक उड़ाया जाता था, तथा इनसे राहत और व्यंग्य पेश किए जाते थे।
थालिया की प्रतिमा
9. यूरेनिया (Urania)
यूरेनिया, खगोल विज्ञान की म्यूज़ है। उसे सितारों व ब्रह्मांड को देखते हुए, तथा एक हाथ में पृथ्वी के साथ चित्रित किया जाता है। प्राचीन ग्रीस में खगोल विज्ञान, ब्रह्मांड में मानवता के स्थान को समझने का एक तरीका था।
म्यूज़ेस से संबंधित एक अन्य शब्द ‘माउसियन (Mouseion)’ है। इस शब्द की व्युत्पत्ति से 'म्यूज़ियम (Muzeum)’ अर्थात संग्रहालय शब्द प्रचलित हुआ। माउसियन शब्द का शाब्दिक अर्थ “म्यूज़ का स्थल या मंदिर” है। दरअसल, पहला संग्रहालय अलेक्जेंड्रिया संग्रहालय (Alexandria Museum) था, जिसे 300 ईसा पूर्व में टॉलेमी (Ptolemy) द्वारा एक मंदिर, पुस्तकालय, खगोलीय वेधशाला, रंगमंडल, वनस्पति उद्यान और अनुसंधान स्थल के रूप में स्थापित किया गया था। संग्रहालयों की शुरुआत, बाद में निजी संग्रहों में पाई जा सकती है, जो अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक जारी रही। इसके अतिरिक्त, ज्ञानोदय और फ्रांसीसी क्रांति के साथ, संग्रहालयों को मिथकों, रूढ़ि और अंधविश्वासों से लड़ने के लिए एक जगह के रूप में देखा जाने लगा। इस प्रकार ऐसे संग्रहों को धीरे-धीरे सार्वजनिक संग्रहालयों द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया।
म्यूज़ियम ऑफ फाइन आर्ट्स, बुडापेस्ट
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि, "संग्रहालय" शब्द की उत्पत्ति, इसकी शुरुआत का संकेत देती है। पहले इसे "म्यूज़ का स्थल या मंदिर" माना जाता था। हालांकि, समय के साथ इस शब्द का अर्थ, सीखने और अध्ययन का स्थान बन गया।
चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान, यूनानी दार्शनिक - एरिस्टोटल (Aristotle) ने, एथेंस (Athens) में लिसेयुम (Lyceum) नामक एक स्कूल की स्थापना की। इस प्रतिष्ठान से जुड़े माउसियन में अनुसंधान उद्देश्यों के लिए एरिस्टोटल के प्राकृतिक इतिहास के नमूनों का संग्रह रखा गया था। यह इस प्रकार के संग्रह के सबसे पहले ज्ञात उदाहरणों में से एक है।
जब एक शताब्दी के बाद, अलेक्जेंड्रिया में एक ऐसी ही अकादमी स्थापित की गई, तो सीखने के पूरे स्थान को ही माउसियन के नाम से जाना जाने लगा। फिर, रोमनों ने ग्रीक शब्द - माउसियन के लैटिन संस्करण ‘म्यूज़ियम’ का उपयोग करना शुरू किया। तब तक, इस शब्द का उपयोग सामान्यतः दार्शनिक चर्चा के लिए समर्पित एक जगह का वर्णन करने के लिए किया जाता था।
पश्चिमी यूरोप में, अध्ययन और प्रदर्शन के लिए प्राकृतिक इतिहास के नमूनों या दिलचस्प जिज्ञासाओं का संग्रह बनाने की अवधारणा, पहली बार पुनर्जागरण काल के दौरान व्यापक रूप से प्रचलित गई। चौदहवीं सदी के अंत में इटली में शुरु हुआ यह समय, सांस्कृतिक क्रांति का था। इसने अन्वेषण के एक नए युग की भी शुरुआत की, जिसके परिणामस्वरूप, दिलचस्प और असामान्य संग्रह बनाने के लिए उपलब्ध वस्तुओं की सीमा काफी बढ़ गई। समय के साथ, यह शब्द डेनिश और अंग्रेजी संस्कृतियों एवं संग्रहों में भी प्रसिद्ध हुआ।
पारसी धर्म में, म्यूज़ की तरह ही, अमेसा स्पेंटा (Amesa Spenta) की अवधारणा प्रख्यात है। वे छह (या सात) महादूत हैं, जो अहुरा मज़्दा (Ahura Mazda) अर्थात सर्वोच्च भगवान की आकृति को घेरे हुए होते हैं। वे उस भगवान के धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अधीनस्थ हैं। अमेसा स्पेंटा ऐसे कार्य करते हैं, जो स्वर्गदूतों के अनुरूप होते हैं। वे अहुरा मज़्दा के पारगमन को अंतर्निहित बनाते हैं, और समझदार लोगों में उनकी लाभकारी उपस्थिति की तरह होते हैं। वे मनुष्य को बुराई और अंधेरे की शक्तियों के खिलाफ लड़ाई में मदद करते हैं। इसका अर्थ है कि, कोई मनुष्य अमेसा स्पेंटा द्वारा दर्शाए गए गुणों को ग्रहण कर सकता है। फिर, इनका युगांतशास्त्रीय कार्य (व्यक्तिगत और सामूहिक) भी प्रशंसनीय है, जो पारसी धर्म के लिए महत्वपूर्ण विषय है।
अहुरा मज़्दा
पारसी विचार में स्पेंटा की अवधारणा, और ग्रीक म्यूज़ेस की संबंधित संस्कृतियों में ज्ञान, रचनात्मकता और दिव्य प्रेरणा के प्रतीकों के रूप में तुलना की जा सकती है। पारसी धर्म में, अमेसा स्पेंटा सत्य, धार्मिकता, भक्ति और प्रबुद्ध चेतना के पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो ब्रह्मांडीय सिद्धांतों और मार्गदर्शक शक्तियों के रूप में कार्य करते हैं। ये मानव जीवन में नैतिक और बौद्धिक स्पष्टता को प्रेरित करते हैं। इसी तरह, प्राचीन ग्रीक परंपरा में म्यूज़ेस, कला, साहित्य और ज्ञान की अध्यक्षता करते हैं। म्यूज़ेस कवियों, विचारकों और कलाकारों को सृजन और समझने के लिए प्रेरित भी करते हैं। जबकि स्पेंटा नैतिक और आध्यात्मिक व्यवस्था से अधिक निकटता से जुड़े हुए हैं, म्यूज़ेस कलात्मक और बौद्धिक अभिव्यक्ति पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इस अंतर के बावजूद, दोनों इस विचार को मूर्त रूप देते हैं कि, ज्ञान और रचनात्मकता पूरी तरह से मानवीय गुण नहीं हैं, बल्कि उच्च, पारलौकिक शक्तियों के साथ संबंध के माध्यम से उन्नत होते हैं। ये अवधारणाएं मानव ज्ञान के लिए आवश्यक दैवीय प्रेरणा में, प्रत्येक संस्कृति के विश्वास को दर्शाते हैं।
ज्ञान, असल में सशक्तिकरण है। जब आपके पास किसी विशेष विषय के बारे में जानकारी और समझ होती है, तो आप सोच-समझकर निर्णय लेने का आत्मविश्वास हासिल करते हैं। चाहे वह ज्ञान आपके पेशे, स्वास्थ्य, वित्त, या व्यक्तिगत संबंधों के बारे में हो, वह आपको जीवन की चुनौतियों से अधिक सक्षमता के साथ निपटने में सक्षम बनाता है। ज्ञान नवाचार के पीछे प्रेरक शक्ति भी है। पूरे इतिहास में, मानव प्रगति ज्ञान के संचय और अनुप्रयोग से प्रेरित हुई है। पहिये के आविष्कार से लेकर आधुनिक प्रौद्योगिकियों के विकास तक, ज्ञान हर महत्वपूर्ण प्रगति के मूल में रहा है।
जो समाज ज्ञान और शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं, वे अधिक प्रगति और समृद्धि का अनुभव करते हैं। ज्ञान आलोचनात्मक सोच, समस्या-समाधान और रचनात्मकता को बढ़ावा देता है, जो गरीबी, असमानता और जलवायु परिवर्तन जैसे जटिल सामाजिक मुद्दों के समाधान के लिए आवश्यक हैं। इसके अलावा, जब ज्ञान और नवप्रवर्तन को बढ़ावा दिया जाता है, तो अर्थव्यवस्थाएं फलती-फूलती हैं। ज्ञान पर आधारित अनुसंधान और विकास, तकनीकी प्रगति और एक सुशिक्षित कार्यबल आर्थिक विकास के आवश्यक घटक हैं। साथ ही, सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और आगे बढ़ाने के लिए भी, ज्ञान आवश्यक है। भाषा, परंपराओं और इतिहास के प्रसारण के माध्यम से, समाज अपनी विशिष्ट पहचान और परंपराओं को बनाए रख सकते हैं।
हिटलर और दूसरे विश्व युद्ध को क्यों नहीं रोक पाया 'लीग ऑफ नेशंस'?
मेरठ के जागरूक पाठकों के लिए इतिहास के पन्नों से एक ऐसी घटना का विश्लेषण प्रस्तुत है, जिसने आधुनिक दुनिया की कूटनीति की नींव रखी। प्रथम विश्व युद्ध के अभूतपूर्व विनाश के बाद दुनिया भर के देशों ने महसूस किया कि भविष्य में ऐसे भयानक युद्धों को रोकने के लिए एक वैश्विक मंच की आवश्यकता है। जिनेवा में स्थापित 'लीग ऑफ नेशंस' दुनिया का पहला ऐसा अंतर-सरकारी संगठन था जिसे अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने और सामूहिक सुरक्षा के ज़रिए शांति बनाए रखने के लिए बनाया गया था। लेकिन विडंबना यह रही कि जिस संगठन का मुख्य उद्देश्य युद्ध रोकना था, वह महज़ दो दशक बाद ही दूसरे विश्व युद्ध को भड़कने से रोकने में पूरी तरह विफल साबित हुआ।
क्या था लीग ऑफ नेशंस और विश्व युद्ध के बाद इसे क्यों बनाया गया? प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुए भारी जान-माल के नुक़सान के बाद पूरे यूरोप और अमेरिका के राजनयिकों तथा बुद्धिजीवियों के बीच एक ऐसे संगठन की मांग उठने लगी थी जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा दे सके। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने आठ जनवरी उन्नीस सौ अठारह को अमेरिकी संसद के समक्ष अपनी प्रसिद्ध 'चौदह सूत्रीय योजना' पेश की थी। इस योजना के अंतिम बिंदु में एक ऐसे राष्ट्र संघ के निर्माण का आह्वान किया गया था जो छोटे और बड़े सभी राज्यों को राजनीतिक स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता की समान गारंटी दे सके। चार साल के संपूर्ण युद्ध से थके हुए यूरोप और इस नए संगठन से उम्मीद लगाए बैठे अमेरिकी नागरिकों के बीच विल्सन का यह विचार बेहद लोकप्रिय हुआ। इसका मूल उद्देश्य निरस्त्रीकरण, बातचीत और सामूहिक सुरक्षा के माध्यम से युद्धों को रोकना था। इसके अलावा यह संगठन हथियारों के व्यापार, नशीले पदार्थों की तस्करी और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे अहम मुद्दों पर भी काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया था।
वर्साय की संधि से इसका निर्माण कैसे हुआ और इसकी संरचना कैसी थी? लीग ऑफ नेशंस का निर्माण पेरिस शांति सम्मेलन के दौरान हुआ। राष्ट्रपति विल्सन ने जनवरी उन्नीस सौ उन्नीस में पेरिस की यात्रा की और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए इस संगठन के चार्टर को वर्साय की संधि के साथ जोड़ दिया। उनका मानना था कि एक प्रभावी संगठन शांति की शर्तों में होने वाली किसी भी असमानता को कम कर सकेगा। विल्सन और ब्रिटेन के डेविड लॉयड जॉर्ज तथा फ्रांस के जॉर्जेस क्लेमेंस्यू ने मिलकर इसके नियम तय किए। इस संगठन के मुख्य अंगों में सभी सदस्य देशों की एक असेंबली, पाँच स्थायी और चार अस्थायी सदस्यों वाली एक परिषद और एक अंतरराष्ट्रीय न्यायालय शामिल था। इसका लक्ष्य सदस्य देशों की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना और शांति भंग होने की स्थिति में आर्थिक व सैन्य प्रतिबंध लगाने का तंत्र विकसित करना था। हालांकि, वर्साय की संधि के साथ इसे जोड़ना विल्सन की एक बड़ी कूटनीतिक भूल साबित हुई क्योंकि बाद में इसी संधि को बहुत ही सख़्त और अव्यवहारिक मानकर ख़ारिज किया जाने लगा।
क्या भारत इसका हिस्सा था और एक ब्रिटिश उपनिवेश के रूप में इसकी क्या भूमिका थी? लीग ऑफ नेशंस के गठन के समय भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र नहीं था, इसके बावजूद वह इसका एक संस्थापक सदस्य बना। प्रथम विश्व युद्ध में पुरुषों और युद्ध सामग्री के अभूतपूर्व योगदान के कारण भारत को उन्नीस सौ उन्नीस के वर्साय शांति सम्मेलन में जगह मिली थी। इस संगठन में भारत की स्थिति एक अंतरराष्ट्रीय विसंगति की तरह थी क्योंकि यह लीग का एकमात्र ऐसा सदस्य था जिसके पास अपना स्वतंत्र शासन नहीं था। इस अंतरराष्ट्रीय दर्जे ने भारत की बाहरी साम्राज्यवादी स्थिति और आंतरिक औपनिवेशिक वास्तविकताओं दोनों को उजागर किया। जिनेवा में भारत के प्रतिनिधित्व और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति ने ब्रिटिश भारत और रियासतों वाले भारत के बीच के राजनीतिक भूगोल पर सवाल खड़े किए। जब महिलाओं और बच्चों की तस्करी रोकने जैसे अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की बात आई, तो भारत सरकार ने ब्रिटिश और रियासती भारत के बीच अंतरराष्ट्रीय क़ानून को लागू करने से जुड़े कई पेचीदा मुद्दों का सामना किया।
कौन से देश इसके सदस्य थे और समय के साथ सदस्यता में क्या बदलाव आए? उन्नीस सौ बीस से लेकर उन्नीस सौ छियालीस के बीच कुल तिरसठ देश लीग ऑफ नेशंस के सदस्य बने। शुरुआत में बयालीस देशों ने इसकी सदस्यता ली थी और बाद में इक्कीस अन्य देश इससे जुड़े। इसका सबसे बड़ा आकार अट्ठाईस सितंबर उन्नीस सौ चौंतीस से फरवरी उन्नीस सौ पैंतीस के बीच था जब इसके सदस्यों की संख्या अट्ठावन पहुँच गई थी। सदस्य देशों के इस मंच से जुड़ने और बाहर निकलने का सिलसिला लगातार चलता रहा। एडोल्फ़ हिटलर के सत्ता में आने के बाद जर्मनी ने अक्तूबर उन्नीस सौ तैंतीस में इसकी सदस्यता छोड़ दी। इसी तरह जापान ने भी एक कठपुतली राज्य को मान्यता न मिलने पर लीग से इस्तीफ़ा दे दिया। इटली ने इथियोपिया पर हमले के बाद लगे प्रतिबंधों के कारण इसे छोड़ दिया। वहीं, सोवियत संघ को फिनलैंड पर अकारण हमला करने के चलते चौदह दिसंबर उन्नीस सौ उनतालीस को लीग से निष्कासित कर दिया गया था। कई अन्य देश भी समय-समय पर इसके फैसलों से असहमत होकर बाहर निकलते रहे।
लीग ऑफ नेशंस के लाइब्रेरियन
लीग ऑफ नेशंस को फंड कहाँ से मिलता था और इसका वित्तीय प्रबंधन कैसे होता था? इस वैश्विक संगठन को चलाने के लिए मुख्य रूप से सदस्य देशों से मिलने वाले आर्थिक योगदान पर निर्भर रहना पड़ता था। प्रत्येक देश की आर्थिक क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति के आधार पर उसका योगदान तय होता था। हालाँकि, सभी देश समय पर और पूरा पैसा नहीं चुकाते थे। सदस्य देशों के इस योगदान के अलावा, लीग ऑफ नेशंस अपने प्रकाशनों की बिक्री से भी कुछ मामूली आय प्राप्त करता था। सबसे अहम बात यह थी कि सदस्य देशों, ग़ैर-सदस्य देशों और निजी संगठनों द्वारा विशेष परियोजनाओं को भी वित्तीय मदद दी जाती थी। उदाहरण के लिए, अमेरिका आधिकारिक तौर पर लीग का सदस्य नहीं था, लेकिन रॉकफेलर फाउंडेशन जैसे अमेरिकी निजी संगठनों ने स्वास्थ्य और पुस्तकालय निर्माण के क्षेत्र में भारी वित्तीय मदद की। इसके अलावा, फ्रांस की सरकार ने पेरिस में अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक सहयोग संस्थान के संचालन का ज़्यादातर ख़र्च उठाया था।
शांति बनाए रखने और दूसरे विश्व युद्ध को रोकने में यह क्यों विफल रहा? लीग ऑफ नेशंस की विफलता के पीछे कई ढांचागत कमज़ोरियां और राजनीतिक परिस्थितियां ज़िम्मेदार थीं। सबसे बड़ी कमज़ोरी यह थी कि जिस अमेरिका के राष्ट्रपति ने इसके निर्माण की परिकल्पना की थी, वही अमेरिका इसका सदस्य नहीं बन सका। अमेरिकी संसद में रिपब्लिकन नेता हेनरी कैबोट लॉज के कड़े विरोध के कारण सीनेट ने वर्साय की संधि को उनचास के मुक़ाबले पैंतीस वोटों से ख़ारिज कर दिया था। इतिहासकारों का मानना है कि यदि अमेरिका इसमें शामिल होता, तो संघर्षों को रोकने में अधिक बल मिलता। दूसरी बड़ी विफलता यह थी कि लीग के पास अपनी कोई सशस्त्र सेना नहीं थी। यह पूरी तरह से सदस्य देशों की सैन्य ताक़त पर निर्भर था, लेकिन कोई भी देश युद्ध के बाद दोबारा अपनी सेना भेजने को तैयार नहीं था। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे इसके सबसे बड़े सदस्यों के भीतर शांतिवाद इतना हावी था कि वे सैन्य कार्रवाई या कड़े प्रतिबंध लगाने से कतराते थे। संगठन ने निरस्त्रीकरण की पुरज़ोर वकालत की थी, जिसके कारण शांति बनाए रखने के लिए ज़रूरी सैन्य शक्ति ही ख़त्म हो गई। जब आक्रामक देशों ने अपना विस्तार करने के लिए दूसरे छोटे देशों पर हमले शुरू किए, तो यह संगठन उन्हें रोकने में पूरी तरह बेबस साबित हुआ। हालांकि इसने भविष्य के संयुक्त राष्ट्र के लिए एक रूपरेखा ज़रूर तैयार की कि कूटनीतिक संगठनों में क्या काम करता है और क्या नहीं।
कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद कैसे द्वारका नहीं अपितु इंद्रप्रस्थ बना यदुवंशियों का आखिरी सहारा
क्या आप जानते हैं कि वर्तमान दिल्ली, जिसे इन्द्रप्रस्थ कहा जाता था, महाभारत काल में कुरुओं की दूसरी राजधानी बना? यहां के महल को असुर मयासुर ने 14 महीनों की कड़ी मेहनत के बाद तैयार किया था। यह कोई साधारण महल नहीं था, बल्कि स्फटिक और रत्नों से जड़ा एक ऐसा मायावी महल था जिसमें पानी की जगह ज़मीन और ज़मीन की जगह पानी होने का भ्रम पैदा होता था। महाभारत की शुरुआत से लेकर उसके अंत तक इन्द्रप्रस्थ की भूमिका सबसे अहम रही है। एक तरफ इस नगर ने हस्तिनापुर के वैभव को भी पीछे छोड़ दिया था, तो दूसरी तरफ इसी महल के भ्रम और चौसर के खेल ने उस महायुद्ध की नींव रखी जिसमें पूरा भारतवर्ष दो हिस्सों में बँट गया। आइए, महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित इस महाकाव्य के ज़रिए समझते हैं कि कैसे एक बंजर जंगल दुनिया की सबसे भव्य राजधानी बना और कैसे अंततः यह यदुवंशियों की आखिरी शरणस्थली बनकर रह गया।
महर्षि वेदव्यास कौन थे और उन्होंने महाभारत महाकाव्य की रचना कैसे की? महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास को व्यास या कृष्ण द्वैपायन के नाम से भी जाना जाता है। कई कथाओं में उन्हें भगवान विष्णु के अवतार का अंश माना जाता है और वे 18 पुराणों तथा ब्रह्म सूत्रों के रचयिता भी हैं। महर्षि वेदव्यास के जन्म की कथा बहुत ही रोचक है जो महाभारत की एक अहम पात्र सत्यवती से जुड़ी है। सत्यवती, जिन्हें मत्स्यगंधा भी कहा जाता था, एक मछुआरन थीं जो यमुना नदी में नाव चलाती थीं। एक बार ऋषि पराशर उनकी सुंदरता पर मुग्ध हो गए और उनसे एक पुत्र की कामना की। अपनी पवित्र छवि को लेकर चिंतित सत्यवती के लिए पराशर ने नदी के बीचों-बीच घने कोहरे से ढका एक गुप्त द्वीप बनाया जहाँ कोई उन्हें देख न सके। वहीं सत्यवती ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका रंग साँवला था और द्वीप पर जन्म लेने के कारण पराशर ने उनका नाम कृष्ण द्वैपायन रखा। यही बालक आगे चलकर महर्षि वेदव्यास बना, जिसने अपनी माता को वचन दिया था कि ज़रूरत पड़ने पर वह हमेशा उनकी मदद करेगा।
बाद में जब सत्यवती और राजा शांतनु के पुत्रों का बिना किसी उत्तराधिकारी के निधन हो गया, तो वेदव्यास के आशीर्वाद से ही धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर का जन्म हुआ था। जब वेदव्यास ने महाभारत लिखने का निश्चय किया, तो उन्होंने भगवान गणेश से इसे लिखने का अनुरोध किया। गणेश जी की शर्त थी कि वेदव्यास कहानी सुनाते समय रुकेंगे नहीं, जिसके जवाब में व्यास जी ने निर्देश दिया कि गणेश जी भी श्लोकों को बिना समझे नहीं लिखेंगे। इसी अद्भुत तालमेल से महाभारत की रचना हुई।
खांडवप्रस्थ का बंजर जंगल इन्द्रप्रस्थ जैसी अद्भुत और भव्य राजधानी कैसे बना? जब धृतराष्ट्र ने राज्य का बँटवारा किया, तो पाण्डवों के हिस्से में खांडवप्रस्थ नाम का एक बंजर और वीरान जंगल आया जो यमुना नदी के तट पर स्थित था। खांडव वन को जलाकर साफ़ करने के बाद, असुर मयासुर ने वहाँ इन्द्रप्रस्थ नाम की एक बेहद भव्य राजधानी का निर्माण किया। चौड़ी सड़कों, विशाल दीवारों और गहरी खाइयों वाले इस नगर ने जल्द ही गंगा किनारे बसे हस्तिनापुर के गौरव को भी पीछे छोड़ दिया। इसी नगर में युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया और खुद को एक महान सम्राट के रूप में स्थापित किया। नारद मुनि ने इस महल की तुलना देवराज इन्द्र की देवसभा पुष्कर मालिनी से की थी जो वास्तुकला और संप्रभुता का एक आदर्श प्रतिमान था।
इन्द्रप्रस्थ की भव्यता और मयासुर की कारीगरी का वर्णन महाभारत के सभा पर्व (अध्याय 2, खंड 3, श्लोक 28) में इस प्रकार किया गया है:
ततः स विप्रकर्षेण कृत्वा तन्मयमासुरः।
दशसाहस्रविस्तारं सर्वतः समधारयत्।।
न दैवी न च मानुषी तादृशी दृश्यते सभा।
वैदूर्यमयसोपानां मणिकुट्टिमराजिताम्।।
इस श्लोक का अर्थ यह है कि उस असुर मयासुर ने घोर परिश्रम करके उस सभा भवन का निर्माण किया। वह दस हज़ार हाथ विस्तृत था और सभी तरफ से टिका हुआ था। देवताओं और मनुष्यों के बीच वैसी सभा पहले कभी नहीं देखी गई थी। उसमें वैदूर्य मणि की सीढ़ियाँ थीं और उसके फर्श बहुमूल्य रत्नों से सजे हुए थे।
चौसर के खेल ने पाण्डवों से उनका राज्य कैसे छीना और युद्ध की नौबत कैसे आई? इन्द्रप्रस्थ के वैभव और राज्य के बँटवारे से दुर्योधन के मन में पाण्डवों के प्रति गहरी ईर्ष्या और नफ़रत भर गई थी। अपने मामा शकुनि के प्रभाव में आकर उसने पाण्डवों को चौसर के खेल के लिए आमंत्रित किया। इस खेल में शकुनि ने अपने जादुई पासों का इस्तेमाल किया और युधिष्ठिर को हर दाँव में हरा दिया। युधिष्ठिर ने अपनी गायें, सोना, गाँव और अंततः अपना राज्य इन्द्रप्रस्थ तक दाँव पर लगाकर गँवा दिया। जब उनके पास कुछ नहीं बचा, तो उन्होंने अपने भाइयों, खुद को और अपनी पत्नी द्रौपदी को भी हार दिया। इसके बाद भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हुआ, जो महाभारत का सबसे बड़ा अधर्म बना और इसी दिन भीम ने दुर्योधन की जांघें तोड़ने और दुशासन का रक्त पीने की कसम खाई थी।
उद्योग पर्व, महाभारत, बोरी प्रकाशित (BORI), 1940
खेल हारने के बाद पाण्डवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास मिला। अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में पाण्डवों ने विराट के राज्य में छिपकर जीवन बिताया। वनवास पूरा होने के बाद जब पाण्डवों ने अपना राज्य इन्द्रप्रस्थ वापस माँगा, तो दुर्योधन ने साफ़ इनकार कर दिया। पाण्डवों ने शांति बनाए रखने के लिए केवल पाँच गाँव माँगे, लेकिन दुर्योधन ने वह भी देने से मना कर दिया। इसी इनकार ने कुरुक्षेत्र के उस अठारह दिन चलने वाले महायुद्ध की शुरुआत कर दी।
कुरुक्षेत्र के इस विनाशकारी महायुद्ध में किस राज्य ने किसका साथ दिया?
कुरुक्षेत्र के मैदान में जब युद्ध शुरू हुआ, तो भारतवर्ष के अलग-अलग हिस्सों के राजाओं और जातियों ने पाण्डवों और कौरवों के पक्ष में हिस्सा लिया। पाण्डवों की सेना में मध्यदेश से पांचाल, मत्स्य, चेदि, करूष, दशार्ण, काशी, पूर्वी कोसल और पश्चिमी मगध के लोग शामिल थे, जिनके साथ विंध्य पर्वत और अरावली की पहाड़ियों के आसपास रहने वाली वनवासी जातियां व राक्षस थे। पश्चिम से गुजरात और उसके पूर्वी क्षेत्रों के सभी यादव पाण्डवों के साथ थे। उत्तर-पश्चिम से कुछ कैकेय और अभिसार उनके पक्ष में लड़े, जबकि दक्षिण से पाण्ड्य राज्य और कर्नाटिक क्षेत्र की द्रविड़ जातियों ने पाण्डवों की सेना को मज़बूती दी।
वहीं दूसरी ओर, कौरवों की सेना बहुत विशाल थी। पूर्व दिशा से पूर्वी मगध, विदेह, प्राग्ज्योतिष, अंग, वंग, पुण्ड्र, उत्कल, मेकल, कलिंग और आन्ध्र के योद्धा अपनी सीमावर्ती जातियों के साथ दुर्योधन के पक्ष में खड़े थे। मध्यदेश से शूरसेन, वत्स और कोसल के लोग शामिल थे। उत्तर-पश्चिम से सिंधु, सौवीर, मद्र, बाह्लीक, कैकेय, गांधार, कम्बोज, त्रिगर्त, अम्बष्ठ और शिवि जातियों ने कौरवों का साथ दिया। उत्तर की तरफ से हिमालय के साथ-साथ रहने वाली पहाड़ी जातियां कौरवों के साथ थीं। पश्चिम से शाल्व और मालव, तथा मध्य भारत से बड़ौदा के दक्षिण और दक्षिण-पूर्व के यादव, अवंति, माहिष्मक, विदर्भ, निषाद और कुंतल राज्यों ने कौरवों की ओर से युद्ध किया।
युद्ध की समाप्ति के बाद इन्द्रप्रस्थ किस तरह यदुवंशियों की शरणस्थली बना?
अठारह दिनों के भयानक युद्ध और यदुवंश के आपसी विनाश के बाद, इन्द्रप्रस्थ का महत्व एक बार फिर सामने आया। महाभारत के मौसल पर्व (अध्याय 8, श्लोक 72-73) में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है कि कैसे यह नगर यदुवंश के बचे हुए लोगों के लिए एक सुरक्षित पनाहगार बन गया।
इन्द्रप्रस्थं समासाद्य वज्रं तत्र न्यवेशयत्।
अनुगृह्य यथार्हं च स्त्रीवृद्धं बालकं तथा।। ७२।।
शक्रप्रस्थे तु वज्रस्य राज्यं दत्तं किरीटिना।
अनिरुद्धस्य पुत्रस्य हतशेष जनं तथा।। ७३।।
इस श्लोक का अर्थ यह है कि इन्द्रप्रस्थ पहुँचकर अर्जुन ने वहाँ वज्र को स्थापित किया और महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों के लिए उचित व्यवस्था की। मुकुट धारण करने वाले अर्जुन ने शक्रप्रस्थ यानी इन्द्रप्रस्थ का राज्य अनिरुद्ध के पुत्र वज्र को तथा कत्लेआम से बचे हुए शेष लोगों को सौंप दिया।
इस प्रकार इन्द्रप्रस्थ नगर वृष्णि और अंधक जनजातियों के लिए एक सुरक्षित शरणस्थली बन गया और यहीं से भगवान कृष्ण के वंश को संरक्षित किया गया। जो नगर कभी बंजर जंगल से दुनिया की सबसे सुंदर राजधानी बना था, वही नगर महाभारत के अंत में विनाश से बचे हुए लोगों के लिए जीवन और सुरक्षा का अंतिम आधार बन गया।
तितलियों की अनोखी दुनिया और अपने पैरों से स्वाद पहचानने का रहस्य
तितलियाँ केवल अपने रंगीन पंखों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अनोखी आदतों के लिए भी जानी जाती हैं। इंसानों की तरह उनके पास जीभ पर स्वाद कलिकाएँ नहीं होतीं। वे अपने भोजन का स्वाद अपने पैरों से पहचानती हैं। उनके पैरों में छोटे संवेदनशील अंग होते हैं, जो किसी पत्ते या फूल पर बैठते ही यह समझ लेते हैं कि वहाँ रस है या नहीं।
तितलियों का मुख एक लंबी नली जैसा होता है, जिसे सूंड कहा जाता है। इसकी मदद से वे फूलों का रस पीती हैं। जब वे फूलों पर बैठती हैं, तो अनजाने में परागकण एक फूल से दूसरे फूल तक पहुँच जाते हैं, जिससे परागण की प्रक्रिया में मदद मिलती है।
कई तितलियाँ मिट्टी, पानी के छोटे गड्ढों या पसीने की ओर भी आकर्षित होती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें वहाँ से नमक और खनिज मिलते हैं, जो उनके शरीर के लिए जरूरी होते हैं। विशेष रूप से नर तितलियाँ इन खनिजों को संभालकर रखती हैं और प्रजनन के दौरान मादा तितलियों को भी प्रदान करती हैं।
इस तरह तितलियाँ केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं बढ़ातीं, बल्कि परागण और पर्यावरण के संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
भूमि और मिट्टी के प्रकार : कृषि योग्य, बंजर, मैदान
19-05-2026 10:16 AM • Meerut-Hindi
जरूर जानें, रिगली कंपनी की मदद से उत्तर प्रदेश में हुई अनुबंध खेती से हमें क्या लाभ हुए?
आज, हम समझेंगे कि ‘अनुबंध खेती’ क्या है, और यह कंपनियों के साथ किसानों के संपर्क कैसे स्थापित करती है। फिर हम देखेंगे कि, रिगली (Wrigley) जैसी कंपनियों के प्रयासों से उत्तर प्रदेश में पुदीने की खेती कैसे विकसित हुई। इसके बाद, हम नकदी फसलों और मुख्य फसलों की तुलना करेंगे, और उनके महत्व को समझेंगे। हम यह भी पढ़ेंगे कि, जब किसान खाद्य फसलों की तुलना में अधिक नकदी फसलें उगाते हैं, तब क्या होता है। लेख के अंत में, हम न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नजर डालेंगे, और जानेंगे कि सरकार फसलों की कीमतें कैसे तय करती है।
अनुबंध खेती (Contract farming), भविष्यवादी समझौतों के तहत पूर्व निर्धारित कीमतों पर, कृषि उत्पादों के उत्पादन और आपूर्ति के लिए किसानों और प्रसंस्करण और/या विपणन कंपनियों के बीच एक समझौता होता है। किसानों और खरीदारों के बीच मौजूद यह समझौता, कृषि वस्तुओं के उत्पादन, बाजार नियमों और प्रबंधन शर्तों को बताता है। हमारे देश भारत में, अनुबंध खेती का उद्देश्य लघु किसानों के लिए स्थिर आय सुनिश्चित करना, बाजार-केंद्रित फसल चयन को बढ़ावा देना, कृषि में निजी निवेश को बढ़ावा देना, खाद्य प्रसंस्करण का समर्थन करना, उद्योगों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करना, सरकारी मूल्य हस्तक्षेप को कम करना, और फसल विविधीकरण और कृषि व्यवसाय जागरूकता को प्रोत्साहित करना, आदि है। इसके अलावा, अनुबंध खेती के निम्नलिखित फायदे भी हैं -
1. अनुबंध खेती, भारत को प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों के आयातक से, एक महत्वपूर्ण निर्यातक बनने में सक्षम बनाती है, जिससे हमारे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और वैश्विक व्यापार को बढ़ावा मिलता है। इस प्रकार, अनुबंध खेती के माध्यम से देशज उत्पादन बढ़ाने से आयात पर निर्भरता कम होती है, विदेशी मुद्रा की बचत होती है, और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
2. किसानों को सुनिश्चित खरीद और मूल्य स्थिरता से लाभ होता है, जिससे कृषि विपणन में अनिश्चितताएं कम होती हैं।
3. अनुबंध खेती पर्यावरण अनुकूल प्रथाओं को प्रोत्साहित करती है, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार करती है, और रासायनिक निर्भरता को कम करती है।
4. ऐसी खेती किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले बीज, उर्वरक और तकनीकी सहायता प्रदान करती है, जिससे पैदावार में सुधार होता है, और बेहतर गुणवत्ता वाली उपज होती है।
5. अनुबंध खेती, किसानों को उन क्षेत्रों में फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित करती है, जहां पारंपरिक रूप से उनकी खेती नहीं की जाती है। इससे कुल उत्पादन में वृद्धि होती है।
क्या आप जानते हैं कि, 2017 में मार्स रिगली (Mars Wrigley) नामक एक विदेशी कंपनी ने हमारे राज्य उत्तर प्रदेश में अनुबंध खेती की एक परियोजना प्रस्तुत की थी। उन्होंने यहां पांच साल की स्थिरता परियोजना - ‘एडवांस मिंट’ शुरू की थी, जिसे हम ‘शुभ मिंट’ के नाम से जानते हैं। इसका लक्ष्य, हमारे राज्य में पुदीना किसानों की पैदावार और आय को बढ़ावा देना था। कॉर्न मिंट मेंथॉल (Corn Mint Menthol), मेंथा तेल की बहुत अधिक उपज देने वाला पौधा है। यह हमारे देश और राज्य में, मुख्य रूप से एक एकड़ से कम कृषि क्षेत्रों में उगाया जाता है। इसकी उपज 37 किलो प्रति एकड़ होती है।
उत्तर प्रदेश के लघु किसान, साल में तीन महीने पुदीना उगाते हैं। वे फरवरी या मार्च में इसका रोपण शुरू करते हैं, और मानसून से पहले जून में इसकी कटाई करते हैं। यह किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण फसल है, क्योंकि यह नकदी फसल है। रिगली अनुबंध के अनुसार, तीन क्षेत्रों में लघु किसानों की पैदावार और आय में वृद्धि हुई है। पौधे (जड़ माल तक पहुंच), खेती (अच्छी कृषि अभ्यास प्रशिक्षण), और समुदाय (शिक्षा और प्रशिक्षण) इस परियोजना के मुख्य पहलू थे। चलिए, अब नकदी और मुख्य फसलों की तुलना करते हैं। खाद्य फसलें, स्थानीय या देशज पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए उगाई जाती हैं। नकदी फसलें, मुख्य रूप से आय उत्पन्न करने और बिक्री के लिए उगाई जाती हैं। ये फसलें अक्सर स्थानीय, राष्ट्रीय या निर्यात बाजारों के लिए उगाई जाती हैं।
खाद्य फसलें, खाद्य सुरक्षा और निर्वाह को प्राथमिकता देती हैं, जबकि, नकदी फसलें आय-उन्मुख, उत्पादक बाजार की कीमतों, वस्तु श्रृंखलाओं और अंतरराष्ट्रीय मांग पर निर्भर करती हैं। लोगों और मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए, अक्सर छोटे भूखंडों या मिश्रित खेतों पर खाद्य फसलों की खेती की जाती है। दूसरी ओर, नकदी फसलें छोटे किसानों, बागानों या बड़े कृषि व्यवसायों द्वारा उगाई जा सकती हैं। उपज को अधिकतम करने और कटाई और प्रसंस्करण को सरल बनाने के लिए, इसमें अक्सर एकल फसल ली जाती है।
पिछले दशकों के दौरान, दुनिया भर में नकदी फसलों का तेजी से विस्तार हुआ है। इसलिए, नकदी फसलों की खेती के सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक परिणामों की जांच करना महत्वपूर्ण है। नकदी फसल खेती के आर्थिक लाभ स्पष्ट हैं, जिनमें घरेलू आय बढ़ाना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना, राजकोषीय राजस्व में वृद्धि, और विदेशी निवेश को आकर्षित करना शामिल था। साथ ही, नकदी फसल की खेती से आम तौर पर सकारात्मक सामाजिक प्रभाव (कल्याण संवर्धन, बुनियादी ढांचे में सुधार और रोजगार सृजन) देखे जाते हैं, लेकिन फसल के प्रकार के साथ प्रभाव भी भिन्न होते हैं। नकदी फसल खेती, भू-दृश्य विखंडन, पृथक्करण और अनियमितता को बढ़ाने के साथ, वन और कृषि भूमि के तंत्रों को बिगाड़ती भी है। जंगल, विशेष रूप से चाय और फलों के पेड़ों के विस्तार के प्रति, जबकि खेत शहतूत और नर्सरी पेड़ों के विस्तार के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। नतीजतन, नकदी फसल खेती से पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं ख़राब हो सकती हैं।
इस कारण, केवल खाद्य या नकदी फसलों को बढ़ावा देने के बजाय, इनमें एक संतुलित मिश्रण बनाना, जोखिमों को कम करेगा और छोटे कृषि भूमि धारकों के लचीलेपन को मजबूत करेगा। समर्थन के लिए केवल फसल के प्रकार पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, हमें व्यापक संदर्भ और पारिस्थितिकी तंत्र पर विचार करना चाहिए।
परंतु, वास्तव में कुछ नकदी फसलें कुछ शर्तों के तहत, खाद्य सुरक्षा में योगदान कर सकती हैं। क्योंकि, वे अपने मूल्य श्रृंखला एकीकरण और बाजार पहुंच में सुधार करके किसानों की आय को बढ़ाती हैं। हालांकि, अधिक कमाई का मतलब हमेशा बेहतर खाद्य सुरक्षा नहीं होता है। अंततः हमें लगातार आकलन करना होगा कि नकदी फसल की खेती प्राकृतिक, सामाजिक और आर्थिक वातावरण के साथ कैसे मेल खाती है।
हमारे देश की सरकार का ‘कृषि और किसान कल्याण विभाग’ सभी राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों (जम्मू और कश्मीर और लद्दाख) में क्षेत्र विस्तार और उत्पादकता वृद्धि के माध्यम से, खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन’ लागू कर रहा है। इसके तहत, लघु, सीमांत, और अन्य किसानों को राज्य सरकारों के माध्यम से कृषि प्रथाओं के बेहतर प्रदर्शन, फसल प्रणाली प्रदर्शन, उच्च उपज वाली किस्मों की बीजों के वितरण, जैसी सहायता प्रदान की जाती है। इसके अलावा, इस परियोजना में खेती के लिए आवश्यक सभी पहलुओं में सहायता करना शामिल है। और तो और, सरकार ने देश में फसलों के उत्पादन के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने के लिए कई नीतियों, सुधारों, विकासात्मक कार्यक्रमों को अपनाया और कार्यान्वित किया है।
सरकार उच्च निवेश और उत्पादन को प्रोत्साहित करने, तथा उचित मूल्य पर आपूर्ति उपलब्ध कराकर उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने की दृष्टि से, किसानों को उनकी उपज के लिए लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करती है। इस दिशा में, सरकार इन फसलों के लिए उच्च न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम एस पी) की पेशकश करके, वाणिज्यिक या नकदी फसलों सहित, बाईस (22) अनिवार्य फसलों के लिए निर्धारित मूल्य की घोषणा करती है। 2018-19 के केंद्रीय बजट में, एमएसपी को उत्पादन लागत के डेढ़ (1.5) गुना स्तर पर रखने के सिद्धांत की घोषणा की गई थी।
हर साल, सरकार संबंधित राज्य सरकारों और केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों के विचारों को मद्देनजर रखते हुए, ‘कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी)’ की सिफारिशों के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है। एमएसपी की सिफारिश करते समय, उत्पादन की लागत, देशज और विश्व बाजारों में विभिन्न फसलों की मांग-आपूर्ति की स्थिति, देशज और अंतर्राष्ट्रीय कीमतें, अंतर-फसल मूल्य समानता, कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र के बीच व्यापार की शर्तें, शेष अर्थव्यवस्था पर मूल्य नीति का प्रभाव, आदि कारकों पर मंथन किया जाता है। एमएसपी की गणना के लिए उपयोग किया जाने वाला लागत फॉर्मूला, सभी 22 अनिवार्य फसलों और राज्यों के लिए एक समान है। विशेष रूप से, इस गणना में पारिवारिक श्रम जैसे विचार भी शामिल हैं।
इस प्रकार, न्यूनतम समर्थन मूल्य के निम्नलिखित लाभ हैं -
1. एमएसपी, किसानों को एक सुरक्षा प्रदान करती है। यदि बाजार में फसल की कीमतें गिर भी जाएं, तो एमएसपी किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाती है।
2. यह योजना किसानों को उन फसलों (जैसे कि, गेहूं और चावल) को उगाने के लिए प्रोत्साहित करती है, जो देश की खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं। इससे देश में अनाज का पर्याप्त भंडार बना रहता है।
3. कृषि बाजार में कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव होता है। तब एमएसपी, किसानों को बाजार की अनिश्चितता और बिचौलियों के शोषण से बचाता है।
4. जब किसानों को एक निश्चित आय का भरोसा होता है, तो वे बेहतर बीज, उर्वरक और नई तकनीक में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं, जिससे कृषि उत्पादकता बढ़ती है।
हालांकि, न्यूनतम समर्थन मूल्य के कुछ नुकसान भी हैं। सरकार द्वारा भारी मात्रा में अनाज खरीदने और उसका भंडारण करने में बहुत अधिक खर्च आता है, जिससे राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ता है। और, जब सरकार फसल खरीद लेती है, तब पर्याप्त भंडारण और गोदामों की कमी के कारण भारी मात्रा में अनाज खराब हो जाता है।
एमएसपी का लाभ, मुख्य रूप से चावल और गेहूं जैसी फसलों तक सीमित है। इस कारण किसान अन्य महत्वपूर्ण फसलें (जैसे कि, दलहन और तिलहन) उगाने के बजाय, केवल इन्हीं फसलों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता कम होती है। इसके अलावा, एमएसपी का लाभ मुख्य रूप से बड़े किसानों और कुछ चुनिंदा राज्यों (जैसे कि, पंजाब और हरियाणा) के किसानों को ही मिल पाता है। देश के लघु और सीमांत किसान, अक्सर इससे वंचित रह जाते हैं। साथ ही, एमएसपी बाजार की प्राकृतिक मांग और आपूर्ति के नियम को प्रभावित करता है। कभी-कभी बाजार मूल्य एमएसपी से कम होने पर भी, सरकार को महंगे दाम पर खरीदारी करनी पड़ती है।
दुनिया की सबसे महंगी क्रिकेट लीग का मेरठ के 'मोदीनगर' से क्या जोड़ है?
मेरठ से महज़ कुछ किलोमीटर की दूरी पर राष्ट्रीय राजमार्ग 58 (NH 58) पर एक बेमिसाल शहर बसा है, जिसका नाम है ‘मोदीनगर'। उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद ज़िले में आने वाला यह शहर सिर्फ एक औद्योगिक केंद्र नहीं है, बल्कि दुनिया की सबसे महंगी और चकाचौंध से भरी क्रिकेट लीग 'इंडियन प्रीमियर लीग' (Indian Premier League) की नींव के तार भी इसी शहर के इतिहास से जुड़े हैं। साल 1933 में राय बहादुर गूजरमल मोदी (Rai Bahadur Gujarmal Modi) ने बेगमाबाद नामक गाँव की जगह पर एक चीनी मिल की स्थापना की थी। बाद में इसी जगह का नाम उनके सम्मान में मोदीनगर रखा गया। गूजरमल मोदी ने यहाँ कई बड़े उद्योग स्थापित किए और इस पूरे इलाके को एक नई पहचान दी। इन्हीं गूजरमल मोदी के परिवार से ताल्लुक रखने वाले उनके पोते का नाम ललित मोदी (Lalit Modi) है, जिन्हें आज पूरी दुनिया में क्रिकेट के सबसे बड़े और सबसे अमीर टूर्नामेंट के जन्मदाता के रूप में जाना जाता है।
मोदी मंदिर
ललित मोदी कौन हैं और उन्होंने भारतीय क्रिकेट की तस्वीर कैसे बदली? ललित कुमार मोदी एक भारतीय क्रिकेट प्रशासक और व्यवसायी हैं। भारतीय क्रिकेट के इतिहास में ललित मोदी का नाम एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दर्ज है जिसने खेल और व्यापार को एक साथ मिलाकर एक नया साम्राज्य खड़ा कर दिया। वे साल 2005 से 2010 तक भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (Board of Control for Cricket in India) के उपाध्यक्ष रहे। इसके अलावा वे राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (Rajasthan Cricket Association) के अध्यक्ष पद पर भी काबिज रहे। लेकिन क्रिकेट की दुनिया में उनका सबसे बड़ा और ऐतिहासिक योगदान इंडियन प्रीमियर लीग की स्थापना करना था। वे इस लीग के पहले अध्यक्ष और कमिश्नर थे। उन्होंने साल 2008 से लेकर 2010 तक शुरुआती तीन सालों के लिए इस टूर्नामेंट का सफलतापूर्वक संचालन किया और इसे ज़मीन से उठाकर एक वैश्विक ब्रांड बना दिया। उनकी इसी व्यावसायिक सोच ने क्रिकेटरों को रातों-रात करोड़पति बना दिया और खेल को देखने का नज़रिया पूरी तरह से बदल दिया।
इंडियन प्रीमियर लीग की शुरुआत किन परिस्थितियों में हुई और इसमें कौन सी टीमें शामिल थीं? भारत में इस नई और अनोखी क्रिकेट लीग के शुरू होने के पीछे की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। साल 2007 में जब ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (Zee Entertainment Enterprises) ने अपनी खुद की 'इंडियन क्रिकेट लीग' (Indian Cricket League) शुरू करने का ऐलान किया, तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने इसे आधिकारिक मान्यता देने से साफ़ इनकार कर दिया। इसके जवाब में और अपने क्रिकेटरों को इस नई बागी लीग में जाने से रोकने के लिए, बोर्ड ने एक नई फ्रेंचाइज़ी आधारित ट्वेंटी-ट्वेंटी प्रतियोगिता शुरू करने का फैसला किया। 13 सितंबर 2007 को बोर्ड ने आधिकारिक तौर पर इंडियन प्रीमियर लीग की घोषणा कर दी। ललित मोदी, जिन्हें इस पूरे प्रोजेक्ट का मुख्य रणनीतिकार माना जाता है, ने इस टूर्नामेंट के हर छोटे-बड़े पहलू को डिज़ाईन किया। साल 2008 में इसका पहला सीज़न खेला गया। इस पहले ऐतिहासिक सीज़न में कुल आठ टीमों ने हिस्सा लिया था। इन शुरुआती आठ टीमों के नाम चेन्नई सुपर किंग्स (Chennai Super Kings), दिल्ली डेयरडेविल्स (Delhi Daredevils), किंग्स इलेवन पंजाब (Kings XI Punjab), कोलकाता नाइट राइडर्स (Kolkata Knight Riders), मुंबई इंडियंस (Mumbai Indians), राजस्थान रॉयल्स (Rajasthan Royals), रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर (Royal Challengers Bangalore) और डेक्कन चार्जर्स (Deccan Chargers) थे।
आईपीएल को बुलंदियों पर ले जाने वाले ललित मोदी विवादों में कैसे घिरे? ललित मोदी ने अपने असीम आत्मविश्वास और ऊंचे संपर्कों के ज़रिए आईपीएल को एक बहुत बड़ा ब्रांड बना दिया था। उन्होंने अपनी चतुराई के बल पर बड़े-बड़े क्रिकेट प्रशासकों, दिग्गज उद्योगपतियों और बॉलीवुड के नामचीन सितारों को एक ही मंच पर ला खड़ा किया था। लेकिन यह कामयाबी ज़्यादा समय तक बेदाग नहीं रह सकी। आईपीएल के तीसरे सीज़न के ठीक बाद, साल 2010 में ललित मोदी पर वित्तीय अनियमितताओं, अनुशासनहीनता और कदाचार के बेहद गंभीर आरोप लगे। आरोपों की गंभीरता को देखते हुए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने उन्हें तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिया। जब उनके खिलाफ कर चोरी और मनी लॉन्ड्रिंग (Money Laundering) को लेकर प्रवर्तन निदेशालय की जांच शुरू हुई, तो गिरफ्तारी से बचने के लिए वे साल 2010 में ही भारत छोड़कर लंदन भाग गए। इस पूरे मामले की गहराई से जांच करने के लिए बोर्ड ने एक विशेष अनुशासन समिति का गठन किया था। लंबी जांच के बाद इस समिति ने ललित मोदी को कई आरोपों में दोषी पाया। इसके परिणामस्वरूप, साल 2013 में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने उन पर भारत में क्रिकेट से जुड़े किसी भी पद को धारण करने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया।
यह टूर्नामेंट अरबों रुपये कैसे कमाता है और इसका बिज़नेस मॉडल क्या है? ललित मोदी के जाने और तमाम विवादों के बावजूद, आज यह टूर्नामेंट प्रति मैच मूल्य के हिसाब से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी खेल लीग बन चुकी है। इसका बिज़नेस मॉडल (Business Model) बहुत ही सुगठित और बहुआयामी है, जिसे मुख्य रूप से दो बड़े हिस्सों में समझा जा सकता है। पहला हिस्सा 'सेंट्रल पूल' (Central Pool) कहलाता है, जिसे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड संचालित करता है। लीग की कमाई का सबसे बड़ा ज़रिया मीडिया अधिकार (Media rights) हैं, जो इसी सेंट्रल पूल का हिस्सा हैं। बड़े प्रसारणकर्ता इस टूर्नामेंट को टीवी और डिजिटल प्लैटफॉर्म (digital platform) पर दिखाने के लिए बोर्ड को अरबों डॉलर का भारी-भरकम भुगतान करते हैं। इसके अलावा लीग के मुख्य प्रायोजक और अन्य आधिकारिक साझेदार भी इसी पूल में पैसा डालते हैं। इस कुल भारी कमाई का एक बड़ा और तय हिस्सा बाद में सभी फ्रेंचाइज़ी टीमों के बीच बराबर बांट दिया जाता है, जिससे टीमों को एक पक्की आमदनी होती है।
फ्रेंचाइज़ी टीमें अपने स्तर पर पैसा कैसे जुटाती हैं? सेंट्रल पूल से मिलने वाले पैसे के अलावा, हर फ्रेंचाइज़ी टीम अपने स्तर पर भी पैसा कमाने के कई तरीके अपनाती है। स्टेडियम में होने वाले मैचों के टिकटों की बिक्री से होने वाली आमदनी का एक बड़ा हिस्सा सीधे उस टीम को जाता है जिसके घरेलू मैदान पर मैच हो रहा होता है। इसके साथ ही टीम की जर्सी, टोपी और अन्य सामानों की बिक्री से भी उन्हें सीधी आमदनी होती है। इसके अलावा, हर टीम अपनी जर्सी, हेलमेट और पैड पर कई तरह के स्थानीय और राष्ट्रीय ब्रांड्स के विज्ञापन लगाती है। इस प्रायोजन के ज़रिए भी टीमें करोड़ों रुपये जुटाती हैं। खिलाड़ियों की नीलामी से लेकर स्टेडियम में दर्शकों के मनोरंजन तक, इस पूरे व्यापार को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि हर साल बोर्ड और फ्रेंचाइज़ी, दोनों ही भारी मुनाफा कमाते रहें और यह क्रिकेट लीग दुनिया में अपना दबदबा बनाए रखे।
साइबर युद्ध की दुनिया: खतरे, हमले और सुरक्षा के नए रास्ते
मेरठ वासियों आज हम समझेंगे कि, साइबर युद्ध क्या है, और आज की डिजिटल दुनिया में यह लड़ाई का नया तरीका कैसे बन रहा है। फिर हम, वॉनाक्राई (WannaCry) और स्टक्सनेट (Stuxnet) जैसे प्रमुख साइबर हमलों को देखेंगे, जिन्होंने कुछ देशों और प्रणालियों को प्रभावित किया है। आगे हम यह पता लगाएंगे कि, लोग और सरकारें साइबर हमलों के लिए कैसे तैयार और सुरक्षित रह सकते हैं। अंततः हम जानेंगे कि, कैसे एंथ्रोपिक (Anthropic) द्वारा विकसित एआई उपकरण संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) जैसे देशों द्वारा सैन्य अभियानों और साइबर रणनीति में प्रयुक्त किए जा रहे हैं।
साइबर युद्ध (Cyberwarfare) का अर्थ, दुश्मनों के खिलाफ साइबर हमलों का उपयोग करना है। यह वास्तविक युद्ध के समान ही नुकसान पहुंचाता है, और/या महत्वपूर्ण कंप्यूटर सिस्टम (computer system) को बाधित करता है। इसके कुछ इच्छित परिणाम जासूसी, तोड़फोड़, प्रचार, हेरफेर या आर्थिक युद्ध हो सकते हैं। हालांकि, साइबरयुद्ध की परिभाषा के संबंध में विशेषज्ञों के बीच महत्वपूर्ण बहस चल रही है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि, ऐसी कोई चीज़ मौजूद नहीं है, क्योंकि आज तक किसी भी साइबर हमले को युद्ध के रूप में वर्णित नहीं किया जा सका है। दरअसल, यह उन साइबर हमलों के लिए एक उपयुक्त नाम है, जो लोगों और वस्तुओं को वास्तविक क्षति पहुंचाते हैं। साइबर हमले के जवाब में इस्तेमाल की गई गतिज सैन्य कार्रवाई का पहला उदाहरण, 5 मई 2019 को देखा गया था, जब इज़राइल (Israel) रक्षा बलों ने साइबर हमले से जुड़ी एक इमारत को नष्ट किया था।
वॉनाक्राई रैंसमवेयर हमला (WannaCry ransomware attack) मई 2017 में वॉनाक्राई रैंसमवेयर क्रिप्टोवॉर्म (Cryptoworm) द्वारा किया गया एक विश्वव्यापी साइबर हमला था। इसने डेटा एन्क्रिप्ट (Encrypt) करके और बिटकॉइन क्रिप्टोकरेंसी (Bitcoin cryptocurrency) के रूप में फिरौती भुगतान की मांग करके, माइक्रोसॉफ्ट विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम (Microsoft Windows Operating System) वाले कंप्यूटरों को लक्षित किया था। इसे माइक्रोसॉफ्ट विंडोज सिस्टम के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी द्वारा विकसित इटरनल ब्लू (Eternal Blue) नामक सॉफ्टवेयर का उपयोग करके प्रचारित किया गया था। इस हमले से एक महीने पहले, द शैडो ब्रोकर्स (The Shadow Brokers) नामक समूह द्वारा इटरनलब्लू को चुराया गया था। वॉनाक्राई का अधिकांश प्रसार, उन संगठनों से हुआ था जिन्होंने इटरनलब्लू विरोधी उपायों को लागू नहीं किया था, या जो पुराने विंडोज सिस्टम का उपयोग कर रहे थे।
यह हमला 12 मई 2017 को सुबह शुरू हुआ और कुछ घंटों बाद दोपहर में एक किल स्विच (Kill switch) के पंजीकरण द्वारा रोक दिया गया। किल स्विच ने पहले से संक्रमित कंप्यूटरों को एन्क्रिप्ट होने या वॉनाक्राई को आगे फैलने से रोक दिया। अनुमान है कि, इस हमले से 150 देशों में तीन लाख से अधिक कंप्यूटर प्रभावित हुए थे। इसमें कुल क्षति करोड़ों से लेकर अरबों डॉलर तक थी। उस समय, सुरक्षा विशेषज्ञों ने माना था कि, यह हमला उत्तर कोरिया (North Korea) या इस देश के लिए काम करने वाली एजेंसियों से हुआ था। दिसंबर 2017 में, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) ने औपचारिक रूप से दावा किया कि, हमले के पीछे उत्तर कोरिया ही था। हालांकि, उत्तर कोरिया ने इस हमले से इनकार किया है।
दूसरी तरफ, स्टक्सनेट एक हानिकारक कंप्यूटर वर्म है, जिसे पहली बार 17 जून 2010 को उजागर किया गया था। माना जाता है कि, यह 2005 से विकास में है। स्टक्सनेट पर्यवेक्षी नियंत्रण और डेटा अधिग्रहण (supervisory control and data acquisition) प्रणालियों को लक्षित करता है। 2009 में नतान्ज़ परमाणु सुविधा (Natanz Nuclear Facility) में एक कंप्यूटर पर पहली बार स्थापित होने के बाद, यह ईरान परमाणु कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार है। हालाँकि न तो संयुक्त राज्य अमेरिका और न ही इज़राइल (Israel) ने खुले तौर पर इसकी जिम्मेदारी स्वीकार की है। कई स्वतंत्र समाचार संगठनों का दावा है कि, स्टक्सनेट एक साइबर हथियार है। इसे ऑपरेशन ओलंपिक गेम्स (Operation Olympic Games) के नाम से प्रख्यात सहयोगात्मक प्रयास में दोनों देशों द्वारा संयुक्त रूप से बनाया गया है।
स्टक्सनेट विशेष रूप से प्रोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर्स (Programmable Logic Controllers) को लक्षित करता है, जो इलेक्ट्रोमैकेनिकल प्रक्रियाओं (electromechanical processes) के स्वचालन की अनुमति देता है। उदाहरण के तौर पर, परमाणु सामग्री को अलग करने के लिए गैस सेंट्रीफ्यूज (Gas centrifuges) सहित मशीनरी (machinery) और औद्योगिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने के लिए इसका उपयोग होता है। औद्योगिक नियंत्रण प्रणालियों को लक्षित करते हुए, इस कृमि ने दो लाख से अधिक कंप्यूटरों को संक्रमित किया है, और 1,000 मशीनों को भौतिक रूप से ख़राब कर दिया है।
वैश्विक साइबर हमलों के इस युग में साइबर सुरक्षा के लिए तैयारी करना महत्वपूर्ण हो गया है। जैसे-जैसे साइबर या रैंसमवेयर हमले अधिक विविध और लगातार होते जा रहे हैं, इन हमलों से इलेक्ट्रिक ग्रिड (electric grid) और अन्य जीवनावश्यक बुनियादी ढांचे की रक्षा करना महत्वपूर्ण है। इस प्रयास में, आज हमारे पास पहले से ही कुछ रणनीतियां हालांकि उपलब्ध हैं। उन रणनीतियों में से एक फैराडे केज (Faraday Cage) है, जिसमें बुनियादी ढांचे को घेरने वाला एक महीन धातु जाल शामिल होता है। ये केज अर्थात तकनीकी पिंजरा, आने वाले विद्युत चुम्बकीय विकिरण को उनकी बाहरी सतह पर वितरित करके, खोखले कंडक्टर (Conductor) के रूप में कार्य करते हैं। इस प्रकार, वे किसी भी विकिरण या प्रवाह तारा को भी अपने भीतर घुसने से रोकते हैं, और उपकरणों को अक्षम या नष्ट होने से बचाते हैं।
फैराडे केज
वास्तव में, समान चार्ज (Charge) के इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रतिकर्षण (Electrostatic repulsion) के कारण किसी कंडक्टर के बाहर, चार्ज का पुनर्वितरण होता है। परिणामस्वरूप, शून्य के कंडक्टर के भीतर एक शुद्ध इलेक्ट्रोस्टैटिक क्षेत्र बनता है। यहां ‘कंडक्टर के भीतर’ से तात्पर्य निरंतर प्रवाहकीय परत से घिरा कोई भी स्थान है। इस घटना के कारण, फैराडे पिंजरे के बाहर मौजूद इलेक्ट्रॉनिक घटक के साथ कोई भी और सभी तरंगें उस स्थान के भीतर पूरी तरह से रद्द हो जाती हैं। साथ ही, पिंजरे के अंदर पैदा होने वाली तरंगों को भी बाहरी दुनिया में जाने से रोका जाता है।
फिर भी, बुनियादी ढांचे के महत्वपूर्ण हिस्सों को बचाने के लिए फैराडे पिंजरों का उपयोग केवल छोटे पैमाने पर ही प्रभावी है। इसलिए, बहुत से अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान और विकास कार्यक्रम, वैश्विक विद्युत चुंबकीय हमलों के लिए सुरक्षा उपाय खोजने में कार्यरत हैं।
एक तरफ, अमेरिकी सेना ने एंथ्रोपिक (Anthropic) द्वारा विकसित एआई मॉडल क्लॉड (Claude) का इस्तेमाल, वेनेजुएला (Venezuela) से एक व्यक्ति के अपहरण ऑपरेशन के दौरान किया था। यह एक उदाहरण है कि, कैसे अमेरिकी रक्षा विभाग अपने ऑपरेशन में एआई का उपयोग कर रहा है। वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले में, देश की राजधानी में बमबारी हुई और 83 लोग मारे गए। जबकि, एंथ्रोपिक के उपयोग की शर्तें, हिंसक उद्देश्यों, हथियारों के विकास या निगरानी के संचालन के लिए क्लाड के उपयोग पर रोक लगाती हैं। अमेरिका और अन्य सेनाएं अपने शस्त्रागार के रूप में, एआई को तेजी से इस्तेमाल कर रही हैं। इज़राइल की सेना ने भी गाज़ा (Gaza) में स्वायत्त क्षमताओं वाले ड्रोन (Drone) एवं एआई का उपयोग किया है।
इस कारण, आलोचकों ने हथियार प्रौद्योगिकियों में एआई के उपयोग और स्वायत्त हथियार प्रणालियों की तैनाती के खिलाफ चेतावनी दी है। ये तकनीकें कंप्यूटर द्वारा बनाई गई गलतियों को लक्षित करने की ओर इशारा करते हुए, यह नियंत्रित करते हैं कि, किसे मारा जाना चाहिए और किसे नहीं। एआई कंपनियां भी इस बात से जूझ रही हैं कि, उनकी प्रौद्योगिकियों को रक्षा क्षेत्र के साथ कैसे जोड़ा जाना चाहिए। इसी कारण, कंपनियां स्वायत्त घातक संचालन और निगरानी में एआई के उपयोग पर भी चिंता व्यक्त कर रही हैं।
क्या होगा अगर आज देश में अचानक बाहर से रसोई गैस आनी बंद हो जाए?
क्या आप जानते हैं कि भारत में हर रोज़ लगभग 90 हज़ार टन एलपीजी (LPG) की खपत होती है, लेकिन देश की मौजूदा भंडारण क्षमता केवल 1.34 मिलियन टन है? इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आज गैस का आयात रोक दिया जाए, तो हमारे पास पूरे देश के लिए बमुश्किल दो हफ़्ते का ही स्टॉक मौजूद है। यही कारण है कि जब भी वैश्विक शिपिंग मार्गों, विशेषकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास तनाव बढ़ता है, तो भारत में एलपीजी की आपूर्ति तुरंत दबाव में आ जाती है। मेरठ और इसके आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि आख़िर पेट्रोल और डीज़ल की आपूर्ति सामान्य रहने के बावजूद एलपीजी की कमी क्यों हो जाती है, एलपीजी कैसे बनती है, और क्यों लकड़ी के चूल्हे के बजाय हमें साफ़ और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज़ी से बढ़ना होगा।
भारत में पेट्रोल और डीज़ल की तुलना में एलपीजी की आपूर्ति अधिक कमज़ोर क्यों है? पेट्रोल, डीज़ल और एलपीजी, ये सभी कच्चे तेल से ही निकलते हैं, लेकिन भारत के ऊर्जा सिस्टम में इनका व्यवहार बिल्कुल अलग है। पेट्रोल और डीज़ल की आपूर्ति इसलिए स्थिर रहती है क्योंकि भारत का रिफाइनिंग बुनियादी ढांचा (Refining infrastructure) बहुत मज़बूत है। देश में 23 कच्चे तेल की रिफाइनरियां काम करती हैं, जो हर साल 220 मिलियन टन से अधिक आयातित कच्चे तेल को देश के भीतर ही पेट्रोल और डीज़ल में बदल देती हैं। इसके अलावा, भारत किसी एक सप्लायर पर निर्भर रहने के बजाय कई अलग-अलग क्षेत्रों से कच्चा तेल आयात करता है, जिससे जोखिम कम हो जाता है। लेकिन एलपीजी के मामले में स्थिति बिल्कुल उलट है। भारत अपनी एलपीजी ज़रूरत का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है, और इसका ज़्यादातर हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। चिंता की बात यह है कि एलपीजी के लगभग 90 प्रतिशत शिपमेंट होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुज़रते हैं। ऐसे में जब भी इस क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव होता है, तो भारत आने वाले एलपीजी शिपमेंट सीधे तौर पर बाधित हो जाते हैं।
एलपीजी गैस कैसे बनती है और इसका उपयोग कहाँ किया जाता है? तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (liquefied petroleum gas) या एलपीजी मुख्य रूप से कच्चे तेल को रिफाइन करने या प्राकृतिक गैस को प्रोसेस करने के दौरान प्राप्त होती है। इस प्रक्रिया में निकलने वाली गैसें मुख्य रूप से प्रोपेन (propane) और ब्यूटेन (butane) होती हैं, जिन्हें अकेले या मिलाकर एलपीजी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। परिवहन और भंडारण को आसान बनाने के लिए इन गैसों को वायुमंडलीय दबाव से लगभग 20 गुना अधिक दबाव डालकर तरल रूप में बदल दिया जाता है। चूँकि एलपीजी में आमतौर पर कोई गंध नहीं होती है, इसलिए गैस लीक होने पर ख़तरे को भांपने के लिए इसमें थोड़ी मात्रा में एथेनथियोल (ethanethiol) मिलाया जाता है, जो एक तीखी गंध वाला रसायन है। एलपीजी का ऊष्मीय मान बहुत अधिक होता है, यानी यह बहुत अच्छी गर्मी पैदा करती है। इस्तेमाल की जाने वाली कुल एलपीजी का लगभग आधा हिस्सा खाना पकाने और घरों को गर्म करने में ख़र्च होता है। बाकी का 50 प्रतिशत हिस्सा कारों में ईंधन के रूप में और औद्योगिक कार्यों में इस्तेमाल किया जाता है। चूंकि इसमें सल्फर (sulphur) की मात्रा लगभग न के बराबर होती है, इसलिए पेट्रोल की तुलना में यह एक साफ़ सुथरा विकल्प माना जाता है और कई देशों में वाहनों में धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है। लकड़ी और उपले जैसे पारंपरिक ईंधन सेहत के लिए कितने ख़तरनाक हैं? दुनिया भर में आज भी लगभग 2.1 बिलियन लोग (वैश्विक आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा) खुले में आग जलाकर या लकड़ी, जानवरों के गोबर और फसल के कचरे (बायोमास - biomass) जैसे ठोस ईंधन का उपयोग करके खाना पकाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2021 में घरेलू वायु प्रदूषण के कारण प्रति वर्ष अनुमानित 2.9 मिलियन मौतें हुईं, जिनमें 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की 309,000 से अधिक मौतें शामिल हैं। लकड़ी और कोयले जैसे प्रदूषणकारी ईंधन के इस्तेमाल से घरों के अंदर जो धुआं भरता है, उसमें महीन कणों का स्तर स्वीकार्य सीमा से 100 गुना अधिक तक हो सकता है। ये छोटे कण फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश कर जाते हैं और रक्तप्रवाह में मिल जाते हैं। इस तरह के घरेलू वायु प्रदूषण के लगातार संपर्क में आने से स्ट्रोक (stroke), इस्केमिक हृदय रोग (Ischemic heart disease), क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़ (Chronic Obstructive Pulmonary Disease) और फेफड़ों के कैंसर (lung cancer) जैसी गंभीर बीमारियां होती हैं। चूंकि महिलाएं और बच्चे आमतौर पर खाना पकाने और जलावन इकट्ठा करने जैसे घरेलू काम करते हैं, इसलिए वे इस ज़हरीले धुएं के सबसे ज़्यादा शिकार होते हैं। स्वास्थ्य की रक्षा के लिए एलपीजी, सौर ऊर्जा, बिजली और बायोगैस जैसे स्वच्छ ईंधन का उपयोग बढ़ाना बेहद ज़रूरी है।
हमें जीवाश्म ईंधन छोड़कर नवीकरणीय ऊर्जा की ओर क्यों बढ़ना चाहिए? आज जलवायु परिवर्तन दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, और ऊर्जा इसका एक मुख्य कारण और समाधान दोनों है। पृथ्वी के वायुमंडल में गर्मी को फंसाने वाली ज़्यादातर ग्रीनहाउस गैसें बिजली और गर्मी पैदा करने के लिए जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) जलाने से आती हैं। साल 2023 में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत बिजली क्षेत्र ही था। यदि हमें जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों से बचना है, तो 2030 तक उत्सर्जन को लगभग आधा करना होगा और 2050 तक नेट-ज़ीरो के लक्ष्य तक पहुँचना होगा। इसके लिए हमें जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता ख़त्म करनी होगी और नवीकरणीय ऊर्जा (जैसे धूप, हवा, पानी, पृथ्वी की गर्मी) में निवेश करना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत प्रकृति द्वारा लगातार भरे जाते हैं और ये बहुत कम या शून्य प्रदूषण फैलाते हैं। आज दुनिया भर में 90 प्रतिशत से अधिक नई नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं जीवाश्म ईंधन के विकल्पों की तुलना में सस्ती हैं। साथ ही, निवेश किए गए हर एक डॉलर के लिए, नवीकरणीय ऊर्जा जीवाश्म ईंधन उद्योग की तुलना में तीन गुना अधिक रोज़गार पैदा करती है। यह न केवल हमारे पर्यावरण को साफ़ रखेगा, बल्कि वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों को रोककर सालाना 4.2 ट्रिलियन डॉलर तक की बचत भी कर सकता है।
आशा भोसले और बॉय जॉर्ज का 'बो डाउन मिस्टर' में वैश्विक संगम
आशा भोसले (Asha Bhosle) भारतीय सिनेमा की सबसे बहुमुखी और प्रभावशाली गायिकाओं में से एक मानी जाती हैं। अपने लंबे करियर (career) में उन्होंने हज़ारों गीत गाए और हर शैली में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी आवाज़ में एक ऐसी सहजता और विविधता है, जिसने उन्हें सिर्फ फिल्मी संगीत तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें वैश्विक स्तर पर भी एक विशेष स्थान दिलाया।
सन 1991 में उन्होंने अंग्रेज़ी संगीत कलाकार बॉय जॉर्ज (Boy George) के साथ बो डाउन मिस्टर (Bow Down Mister) गीत में अपनी आवाज़ दी। यह सहयोग उस समय के लिए बेहद खास था, क्योंकि इसमें भारतीय और पश्चिमी संगीत का अनोखा मेल देखने को मिला। यह गीत हरे कृष्ण आंदोलन से प्रेरित था और इसमें हरे कृष्ण मंत्र के उच्चारण भी शामिल हैं, जो भारतीय आध्यात्मिकता को वैश्विक संगीत के साथ जोड़ते हैं।
इस गीत की खास बात यह भी है कि इसमें आशा भोसले की आवाज़ प्रमुख रूप से सुनाई देती है, हालांकि उन्हें आधिकारिक रूप से श्रेय नहीं दिया गया था। फिर भी, उनकी गायकी ने इस गीत को एक अलग पहचान दी और इसे और अधिक भावपूर्ण बनाया।
यह सहयोग दिखाता है कि आशा भोसले की आवाज़ सीमाओं से परे जाकर विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ने की क्षमता रखती है। इस प्रकार, यह गीत केवल एक संगीत प्रयोग नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक संवाद है, जो आज भी संगीत प्रेमियों को प्रेरित करता है।
ऋग्वेद व् ज़ेंद अवेस्ता ग्रन्थ की समानताएं व् मेरठ के 'अब्दुल्लापुर सादात' में झलकता ईरान
क्या आप जानते हैं कि इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन भारतीय आर्यों और प्राचीन ईरानियों के पूर्वज एक ही थे, और वेदों तथा पारसी धर्मग्रंथ ज़ेंद अवेस्ता (Zend Avesta) में देवताओं, अनुष्ठानों और भाषा की इतनी गहरी समानता है जो आज भी इतिहासकारों को हैरान कर देती है? यह तथ्य ऐतिहासिक और भाषाई रूप से साबित हो चुका है कि अवेस्तन और आर्य सभ्यताएं एक ही भाषाई और सांस्कृतिक विरासत का बेहतरीन उदाहरण हैं, जो समय के साथ धीरे-धीरे अलग होकर दो विशिष्ट सभ्यताओं में बदल गईं। दोनों सभ्यताओं की भाषा, धर्म और संस्कृति में बहुत मजबूत समानताएं देखने को मिलती हैं, क्योंकि इन दोनों की जड़ें समान प्रोटो-इंडो-ईरानी (Proto-indo-iranian) भाषा और परंपराओं से जुड़ी हुई हैं। यह एक ऐसा ऐतिहासिक सच है जो हमें प्राचीन मध्य एशिया से लेकर भारत के आधुनिक शहरों तक की एक लंबी और आकर्षक यात्रा पर ले जाता है।
ऋग्वेद और अथर्ववेद हमारे प्राचीन ज्ञान और विचारों को कैसे दर्शाते हैं? प्राचीन भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक नींव वेदों पर टिकी है। इनमें ऋग्वेद का स्थान सबसे अहम है। ऋग्वेद एक ऐसा ग्रंथ है जो शुरुआत में असुरों (अहुरों) का सम्मान करता है, लेकिन इसके छठे मंडल के बाद से यह शक्तिशाली असुरों को एक ऐसे खतरे के रूप में देखने लगता है जिन पर विजय पाना आवश्यक है। यह ग्रंथ उस समाज की व्यवस्था को भी स्पष्ट करता है जिसमें पुजारियों, योद्धाओं और किसानों का वर्गीकरण था। ऋग्वेद में मुख्य रूप से ब्राह्मणों पर ज़ोर दिया गया है, जो पुजारी का कार्य करते थे। ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी का ज़िक्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
ऋग्वेद
समय के साथ आर्य समाज के विचारों में और भी विकास हुआ। ऋग्वेद के बाद, अथर्ववेद में समाज की संरचना को और भी स्पष्ट किया गया। अथर्ववेद ने योद्धाओं की पहचान राजन्य के रूप में की और वैश्यों को व्यापार तथा कृषि से जोड़ा। हालांकि, यह स्पष्ट है कि यह केवल काम का बंटवारा था, कोई जन्म आधारित कठोर जाति व्यवस्था नहीं थी। इन ग्रंथों से यह भी पता चलता है कि शुरुआती दौर में इन सभ्यताओं के पास कोई लिखित साहित्य नहीं था। वे अपने साहित्य और मंत्रों को केवल याद रखते थे, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप से ही पहुंचाए जाते थे।
ज़ेंद अवेस्ता क्या है और प्राचीन ईरानी धर्म में इसका क्या महत्व है? ज़ेंद अवेस्ता पारसियों (मज़दयी धर्म को मानने वालों) का पवित्र ग्रंथ है। अवेस्ता दरअसल उन ग्रंथों का संग्रह है जो अवेस्तन भाषा में लिखे गए हैं, और ज़ेंद उनका अनुवाद तथा पहलवी भाषा में की गई उनकी व्याख्या है। इस ग्रंथ का महत्व दोतरफा है; एक तरफ यह हमें शुरुआती मज़दयी विचारों के बारे में बताता है, और दूसरी तरफ यह अवेस्तन भाषा का एकमात्र प्रमाण है। यह एक ऐसी प्राचीन ईरानी भाषा है जो पुरानी फ़ारसी के साथ मिलकर इंडो-यूरोपियन (Indo-european) परिवार की इंडो-ईरानी (Indo-irani) शाखा का हिस्सा बनती है। अवेस्ता इक्कीस किताबों (नस्क) का समूह था, जिसे अहुरा मज़्दा (Ahura Mazda) ने बनाया और ज़रथुस्त्र (Zarathustra) ने राजा विष्टास्प तक पहुंचाया। ऐसा माना जाता है कि सिकंदर के आक्रमण के समय यूनानियों ने इस ग्रंथ को नष्ट कर दिया था या बिखेर दिया था।
बाद में अर्ससिड (Arssid) शासन के दौरान राजा वलख्स (Valkhs) ने इन बिखरे हुए हिस्सों को, जो मौखिक या लिखित रूप में बचे थे, फिर से इकट्ठा करने का काम शुरू किया। इसके बाद ससानियन राजाओं के काल में इस ग्रंथ को पूरी तरह से सहेजा गया। राजा अर्दशीर ने मुख्य पुजारी तन्सर को अर्ससिड काल के काम को पूरा करने का आदेश दिया। फिर शाहपुर प्रथम ने यूनानियों और भारतीयों द्वारा बिखेरे गए वैज्ञानिक दस्तावेज़ों की खोज करवाई और उन्हें अवेस्ता में शामिल किया। अंततः शाहपुर द्वितीय के समय में आदुर्बाद ई महरास्पंदान (Adurbad e Mahraspandan) ने इसके विहित रूप (कैनन) का सामान्य संशोधन किया। आज जो अवेस्ता मौजूद है उसमें यस्न, विस्पराद, खोरदा अवेस्ता, सीरोज़ा, यश्त और विदेव्दाद जैसे महत्वपूर्ण हिस्से शामिल हैं। विदेव्दाद के उन्नीसवें अध्याय में ज़रथुस्त्र की परीक्षा का वर्णन है, जहां अंगरा मैन्यु उन्हें अच्छे धर्म को छोड़ने के लिए उकसाता है, लेकिन ज़रथुस्त्र अहुरा मज़्दा की ओर मुड़ते हैं।
वेदों और ज़ेंद अवेस्ता के बीच कैसी अद्भुत समानताएं मौजूद हैं? आर्यों के वेदों और ईरानियों के ज़ेंद अवेस्ता के बीच की समानताएं इतनी गहरी हैं कि उन्हें देखकर स्पष्ट हो जाता है कि ये दोनों एक ही स्रोत से निकले हैं। दोनों सभ्यताओं की भाषाएं एक ही प्रोटो-इंडो-ईरानी जड़ से उत्पन्न हुई हैं। दोनों ग्रंथों में कई देवी-देवता एक समान हैं, जैसे मित्र, वरुण, इंद्र, वायु, सोम (हाओमा), अर्यमन और अपाम नपात। दोनों ही सभ्यताओं में घोड़े की भूमिका अनुष्ठानों और बलियों में बहुत केंद्रीय थी। यहां तक कि कई भौगोलिक नाम और घटनाओं के स्थान भी दोनों परंपराओं में एक जैसे हैं। ऋग्वेद की 'सरस्वती' नदी को ज़ेंद अवेस्ता में 'हरक्ष्वती' कहा गया है।
इन दोनों संस्कृतियों में 'असुर' और 'दैव' की अवधारणाएं मौजूद थीं, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि समय के साथ इनकी भूमिकाएं पूरी तरह से उलट गईं। अवेस्ता में जहां असुर (अहुर) को पूजनीय माना जाता है, वहीं वैदिक परंपरा में दैव (देवताओं) की पूजा की जाती है। धार्मिक जीवन में अग्नि का महत्व दोनों जगह सबसे ऊपर था। संस्कृत में जिसे 'यज्ञ' कहा जाता था, अवेस्तन में उसे 'यग्य' (यस्न) कहा गया। पीने के पदार्थों में आर्यों का पसंदीदा 'सोम' था, जो अवेस्तनों के लिए 'हाओमा' बन गया, क्योंकि पुरानी फ़ारसी में 'स' का उच्चारण 'ह' की तरह किया जाता था। जनेऊ जैसी पवित्र धागे की रस्म, जो आधुनिक हिंदुओं में आम है, अवेस्तनों में भी पाई जाती है। ज़ेंद अवेस्ता में आर्यों और उनके पवित्र भूभाग (आर्यानेम वेजाह) का बहुत सम्मान किया गया है।
इन प्राचीन ग्रंथों से भारत और ईरान की साझा विरासत कैसे झलकती है? इंडो-ईरानी भाषा समूह इंडो-यूरोपियन भाषाओं की सबसे पूर्वी मुख्य शाखा है। विद्वानों की आम सहमति है कि इंडो-ईरानी समूह का मूल स्थान संभवतः आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान के उत्तर में, कैस्पियन सागर (Caspian sea) के पूर्व में था, जो आज तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान का इलाका है। यहीं से कुछ ईरानी दक्षिण और पश्चिम की ओर गए, जबकि इंडो-आर्य दक्षिण और पूर्व की ओर भारत के उपमहाद्वीप में आए। ऋग्वेद के भौगोलिक विवरणों से यह स्पष्ट होता है कि इंडो-आर्यों की सबसे पहली बस्ती भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में थी। यह पलायन एक ही बार में नहीं हुआ, बल्कि यह कई चरणों में हुआ था।
भाषाई दृष्टिकोण से इंडो-आर्य और ईरानी समूहों के बीच घनिष्ठ संबंध पर कभी संदेह नहीं किया गया। दोनों में कई व्याकरणिक विशेषताएं एक समान हैं। उदाहरण के लिए, वेदों में प्रयुक्त शब्द 'यज्ञ' (पूजा का अनुष्ठान) और अवेस्तन का शब्द 'यस्न' बिल्कुल एक हैं। इसी तरह वैदिक 'होतृ' (अनुष्ठान करने वाला पुजारी) और अवेस्तन 'ज़ओतार' एक ही हैं। इसके अलावा दोनों भाषाओं के बोलने वाले खुद को एक विशिष्ट समुदाय के रूप में पुकारने के लिए एक जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते थे: संस्कृत में 'आर्य', अवेस्तन में 'ऐरिइया' और पुरानी फ़ारसी में 'अरिया'। व्याकरण के नियमों में भी समानताएं और कुछ अंतर दिखाई देते हैं, जैसे संस्कृत के शब्द 'सप्त' और 'सर्व' ईरानी भाषा में 'हप्त' और 'हउरुव' बन जाते हैं। यह सब एक गहरी और अटूट सांस्कृतिक साझेदारी का प्रमाण है।
प्राचीन ईरान और भारत का यह ऐतिहासिक जुड़ाव आज मेरठ शहर से कैसे जुड़ता है? हजारों सालों की इन प्राचीन सभ्यताओं के स्थानांतरण और सांस्कृतिक मिलाप का प्रभाव भारत के आधुनिक भूगोल और समाज पर भी पड़ा है। इसका एक जीता-जागता उदाहरण उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित 'अब्दुल्लापुर सादात' नामक एक ऐतिहासिक मुस्लिम बस्ती है। यह जगह मेरठ के पूर्वी बाहरी इलाके में, गंगा नगर के ठीक दक्षिण में स्थित है। अब्दुल्लापुर सादात से मेरठ सिटी जंक्शन की दूरी राष्ट्रीय राजमार्ग 334(एनएच 334) के रास्ते मात्र बारह किलोमीटर है। इस महत्वपूर्ण बस्ती की स्थापना सैयद मीर अब्दुल्ला नक़वी अल बुखारी ने की थी। बुखारी वंशावली सीधे तौर पर मध्य एशिया और महान ईरानी सांस्कृतिक क्षेत्र के ऐतिहासिक जुड़ाव को दर्शाती है।
अब्दुल्लापुर सादात में मुख्य रूप से सैयदों की एक बड़ी आबादी निवास करती है, इसी कारण इसे अब्दुल्लापुर सादात कहकर पुकारा जाता है। यह क्षेत्र नक़वी समुदाय की कन्नौजी बुखारी और जलाल बुखारी शाखाओं का मुख्य केंद्र है। ये दोनों ही शाखाएं जलालुद्दीन सुर्ख़-पोश बुखारी की वंशज हैं, जो सैयद अली नक़वी और सैयद सदरुद्दीन शाह कबीर नक़वी अल बुखारी के माध्यम से आगे बढ़ीं। सदरुद्दीन शाह सिकंदर लोदी के मुख्य सलाहकार भी थे। अब्दुल्लापुर का 'कोट किला' सोलहवीं सदी की शुरुआत में बनवाया गया था, जो मीर अब्दुल्ला का मुख्य निवास स्थान था। यहां के सैयद लोग 'मीरसाहिब' के नाम से मशहूर हैं और एक समय में उनके पास बावन गांवों की एक विशाल जागीर हुआ करती थी।
आज भी अब्दुल्लापुर सादात में इतिहास और संस्कृति की कई इमारतें और रिवायतें जीवित हैं। यहां बड़ा दरवाज़ा (कोट किले का मुख्य प्रवेश द्वार), शाकिर महल, 52 दरी, कोट मस्जिद, अज़मत मंज़िल, सैयद का मकबरा और सैयद बरकत अली नक़वी की तीन सौ साल पुरानी पक्की बैठक जैसी महत्वपूर्ण जगहें मौजूद हैं। शिया मुसलमानों के बीच इस कस्बे का ९वीं मुहर्रम का आयोजन काफी प्रसिद्ध है। यहीं के निवासी सैयद कुदरत नक़वी एक जाने-माने पाकिस्तानी लेखक, भाषाविद् और आलोचक थे, जिन्होंने 'ग़ालिब कौन है', 'असास-ए-उर्दू' और 'हिंदी-उर्दू लुग़त' जैसी मशहूर किताबें लिखीं। भारत के विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए थे। इस प्रकार, आर्यों और अवेस्तनों की प्राचीन साझा जड़ों से लेकर मेरठ के अब्दुल्लापुर सादात तक, भाषा, संस्कृति और इंसानी इतिहास का यह सफ़र हमें बताता है कि सरहदें भले ही बदल जाएं, लेकिन सभ्यताओं का आपसी जुड़ाव हमेशा कायम रहता है।