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गंगा-जमुनी तहजीब के हमारे लखनऊ में, दशहरा मनाने का अंदाज ही कुछ अलग है

लखनऊ

 24-10-2023 10:16 AM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

दशहरा पूरे भारत में मनाये जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक है। दशहरा जिसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है, नवरात्रि के आखिरी दिन मनाया है। लखनऊ में गंगा-जमुनी तहज़ीब के कारण दशहरा मनाने का सार बहुत अलग है। यह पर्व पूरे शहर में और हर धर्म के लोगों द्वारा मनाया जाता है। यह शहर धर्मों की सीमाओं को पार करने की एक अनोखी मिसाल पेश करता है, जहां सभी धर्मों के लोग एक साथ रहते हैं। लखनऊ में मुख्य रूप से दशहरा उत्सव नवाब सादात अली खान के शासनकाल में शुरू हुआ था, साथ ही राजा मुहम्मद अली शाह के स्वयं दशहरे में भाग लेने के कई उदाहरण दर्ज किए गए है। वहीं वाजिद अली शाह भी दशहरे के पर्व में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। ऐसा कहा जाता है कि महंत राम लाल सरन को अवध के राजाओं द्वारा बहुत सम्मान दिया जाता था, और उन्होंने लखनऊ के ऐशबाग में दशहरा के दौरान राम लीला उत्सव का जश्न शुरू किया था। लखनऊ में 134 साल पहले से चली आ रही सबसे पुरानी राम लीलाओं में से एक मौसमगंज में मुंशी शेखावत अली और भुवन चौधरी द्वारा आयोजित की जाती है। दशहरे के दिन राम लीला मैदान ऐशबाग में रावण और उसके भाई कुंभकरण और उनके पुत्र मेघनाथ के पुतले भी जलाए जाते हैं, उस स्थान के चारों ओर भव्य आतिशबाजी होती है। यह एक शानदार दृश्य है जिसका अनुभव हर किसी को करना चाहिए।यह राम लीला समिति द्वारा आयोजित सबसे अच्छे समारोहों में से है। लखनऊ में दशहरा से पहले राम लीला का एक भव्य आयोजन होता है जो मूल रूप से नाटकीय ढंग से भगवान श्री राम की कहानी का चित्रण है। लखनऊ के विभिन्न हिस्सों में राम लीला का मंचन दस दिनों तक किया जाता है, जिसके अंत में श्री राम और रावण के बीच युद्ध होता है और अंततः रावण की मृत्यु हो जाती है, जैसा कि रामायण में बताया गया है। राम लीला के अंतिम दिन रावण दहन किया जाता है जो भगवान श्री राम की जीत और अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक है।
यह निस्संदेह सत्य है कि लखनऊ विविधताओं का शहर है, शहर के कई अन्य हिस्सों में, दशहरा और राम लीला की अवधि को दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। ऐशबाग में दशहरा उत्सव पर रामलीला का आयोजन देखने में बेहद शानदार होता है और भगवान श्री राम की कहानी आपको मंत्रमुग्ध कर देती है। यहाँ, रावण का पुतला 121 फीट ऊँचा बनाया जाता है, और यह देखने में बहुत अद्भुत है। इसके अलावा शहर के अन्य क्ष्रेत्रों में भी आपको रावण दहन देखने को मिल जाता है।दशहरा में सदर बाज़ार की हमेशा भीड़-भाड़ वाली गलियाँ और भी रंगीन और आनंदमय हो जाती हैं। यहाँ, एक विशाल रावण का पुतला जलाया जाता है और उत्सव को देखने के लिए आसपास के सभी क्षेत्रों से लोग आते हैं। पीएनटी पार्क राजाजीपुरम (PNT Park Rajajipuram) में, उत्सव की भावना हमेशा मौजूद रहती है लेकिन दशहरे के दौरान, उत्सव का आनंद आपको एक अलग स्तर पर ले जाया जाता है। यहाँ का 40 फुट के रावण का दहन बुराई पर अच्छाई की जीत से कहीं अधिक का प्रतीक है। इसके अलावा झूलेलाल घाट पर, जलते हुए रावण के दृश्य मंत्रमुग्ध कर देने वाला होता है।
रामायण के अनुसार भगवान राम ने रावण का वध कर बुराई पर विजय प्राप्त की। इस दिन को मनाने के लिए लोग विजयादशमी या दशहरा उत्सव मनाते हैं और पूरे देश में दशहरा उत्सव मनाया जाता है। ‘दशहरा’ शब्द दो शब्दों ‘दस’ और ‘हारा’ से मिलकर बना है। यदि इन दोनों शब्दों को जोड़ दिया जाए, तो ‘दशहरा’ उस दिन को दर्शाता है जब भगवान राम ने रावण के 10 सिरों को नष्ट कर दिया था। जब कभी रावण का जिक्र आता है हमारे दिमाग में 10 सिर जरूर आ जाते हैं। लेकिन ऐसे बहुत कम लोग है जो रावण के 10 सिर के पीछे की हकीकत जानते होंगे। रावण के 10 सिर को लेकर 2 तरह की धारणाएं बनी हैं, माना जाता है कि रावण ने जिन छह शास्त्रों और चार वेदों पर महारत हासिल की थी, उनका प्रतिनिधित्व उसके दस सिर करते थे, क्योंकि वह एक ज्ञानी राजा था। रावण 6 दर्शन और 4 वेदों का ज्ञाता था इसलिए उसके 10 सिर थे। इस वजह से रावण को दसकंठी भी कहा जाता है। वहीं एक और मान्यता है कि रावण के 10 सिर बुराई के प्रतीक थे,इन 10 सिर के अलग-अलग मायने भी हैं,इसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, द्वेष, घृणा, ईर्ष्या, अहंकार, भय और असंवेदनशीलता शामिल है। रावण इन सारे अवगुणों के मिश्रित स्वरूप का नाम है। रावण के बारे में कहा जाता है कि वह प्रकाण्ड विद्वान था, भगवान शिव का सबसे बड़ा भक्त था। वो एक विशेषज्ञ योद्धा, राजनीतिज्ञ, राजा, साथ ही ज्योतिषी और आयुर्वेद का चिकित्सक था, उन्होंने अपने राज्य का बहुत ख्याल रखा। किन्तु उसकी यह विद्वत्ता भी उसके स्वयं के अन्दर स्थित अवगुण रूपी रावण का वध नहीं कर पाई। हम मनुष्यों में और रावण में बहुत अधिक समानता है। यह बात स्वीकारने में असहज लगती है, किन्तु है यह पूर्ण सत्य।
भगवद गीता के अनुसार, आध्यात्मिक जीवन में सफलता स्थिर बुद्धि पर निर्भर करती है, जो केवल इंद्रियों के नियंत्रण से ही संभव हो सकती है। जब हम किसी वस्तु पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं, तो लगाव विकसित होता है। लंबे समय तक लगाव तीव्र लालसा या वासना में बदल जाता है और जब वो वस्तु प्राप्त नहीं होती है, तो क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से अंधे होकर, हम भ्रम में पड़ जाते हैं, जिससे बुद्धि की हानि होती है, क्योंकि हम अपनी वास्तविक आध्यात्मिक पहचान को खो देते हैं।इस मन रूपी रावण के काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद,मत्सर,वासना,भ्रष्टाचार,अनैतिकता इत्यादि दस सिर हैं। इसलिए हम सभी को अपनी स्वार्थी इच्छाओं के बजाय, आध्यात्मिक उन्नति की खोज में अनुशासन का अभ्यास करते हुए, अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करके निस्वार्थ भाव से कार्य करने का प्रयास करना चाहिए। जब हम ईश्वर के सम्मुख होंगे तभी हमारे इस मनरूपी रूपी रावण का वध होगा।

संदर्भ:
https://shorturl.at/abitQ
https://shorturl.at/josyJ
https://shorturl.at/jD356
https://shorturl.at/kBGIY
http://surl.li/mkigr

चित्र संदर्भ
1. रावण के विशाल पुतले को संदर्भित करता एक चित्रण (pexels)
2. राजा मुहम्मद अली शाह को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
3. रामलीला के दृश्य को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
4. रावण के विशाल पुतलों को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
5. दस सिरों वाले रावण के पुतले को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
6. रावण वध को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)



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