आज़ादी के पहले का साहित्य

लखनऊ

 11-01-2018 12:40 PM
ध्वनि 2- भाषायें

भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में सेनानियों के अलाँवा साहित्यकारों का भी एक बहुत बड़ा योगदान था। मुँशी प्रेमचन्द से लेकर दिनकर व यशपाल तक अपनी लेखनी से समाज में एक बड़ा बदलाव लाये। साहित्य का योगदान भारत की स्वतंत्रता की लडाई में अभूतपूर्व रहा है। प्रेमचन्द ने अपनी लेखनी से जिस प्रकार से समाज की कुरीतियों से अवगत कराया वह अत्यन्त रोचक व महत्वपूर्ण है, नमक का दरोगा जैसी कहानियों ने वास्तविकता में लोगों को सोचने व समझने पर विवश कर दिया। लखनऊ में रहते हुये यशपाल ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ अपनी कलम की धार को तीव्रता दी। पंजाब केशरी से लेकर अन्य कई अखबारों ने स्वतंत्रता की लड़ाई को कलम के जरिये प्रस्तुत की। लेखनी ही एक वह साधन है जो बड़े से बड़े साम्राज्य को ढहाने का कार्य कर देती है। यह कार्य कई जगहों पर सिद्ध होते दिखा, अंग्रेजों नें इन लेखकों को कई बार लेखन कार्य से विमुख होने को कहा, जेल तक में भेजा पर कलम की धार को कभी कम ना किया जा सका। मैथिली शरण गुप्त की रचना भारत भारती ने भारत के अंदर की एकता व अखण्डता को और मज़बूती प्रदान की। लखनऊ में सन् 1936 में अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की गयी। इस संघ की स्थापना में ब्रितानी शासकों के प्रति एक रोष था। सभी ने स्वक्षन्द लेखन के लिये सबने अपनी आवाज़े बुलन्द की। विभिन्न लेखकों के अलावां स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह व अन्य कई वीर सपूतों ने भी साहित्य को अपनी आक्रोश से भरी कविताओं व लेखों से नवाज़ा। बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से, लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फांसी से। लबे-दम भी न खोली ज़ालिमों ने हथकड़ी मेरी, तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी से। खुली है मुझको लेने के लिए आग़ोशे आज़ादी, ख़ुशी है, हो गया महबूब का दीदार फांसी से। कभी ओ बेख़बर तहरीके़-आज़ादी भी रुकती है? बढ़ा करती है उसकी तेज़ी-ए-रफ़्तार फांसी से। यहां तक सरफ़रोशाने-वतन बढ़ जाएंगे क़ातिल, कि लटकाने पड़ेंगे नित मुझे दो-चार फांसी से। राम प्रसाद बिस्मिल



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