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धर्म और आस्था का पर्याय है गंगा नदी, कहां तक पहुंचे हैं इसके कायाकल्प के प्रयास?

लखनऊ

 12-04-2022 09:52 AM
नदियाँ

भारत में सबसे लंबी "गंगा नदी" को इसके पौराणिक और स्वास्थप्रद गुणों के आधार पर सदियों से पूजा जाता है! करोड़ों हिंदुओं के लिए यह नदी धर्म और आस्था का पर्याय बन चुकी है। किंतु नदी के प्रति यह आस्था, जाने अनजाने प्रदूषण के रूप में, न केवल स्वयं गंगा नदी को बल्कि उसमे पलने-बढ़ने वाले लाखों जीव जंतुओं के लिए अभिशाप बन चुकी है।
भारत की सबसे लंबी नदी, गंगा का प्रदूषण मानव स्वास्थ्य और व्यापक पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण खतरा बन चुका है। गंगा नदी मानव अपशिष्ट और औद्योगिक दूषित पदार्थों के कारण गंभीर रूप से प्रदूषित हो रही है। यह अकेली नदी 11 राज्यों में भारत की लगभग 40% आबादी को पानी की आपूर्ति करती है, जो दुनिया में किसी भी अन्य नदी की तुलना में कई गुना अधिक है। आज विश्व में गंगा को दुनिया की पांचवीं सबसे प्रदूषित नदी माना जाता है। यह भी सोचने योग्य है की, भारत में किसी ने भी 1970 के दशक के अंत तक गंगा के प्रदूषित होने की बात भी नहीं कही थी। गंगा नदी 100,000 से अधिक आबादी वाले 100 शहरों से होकर बहती है। इनमे से 97 शहरों की आबादी 50,000 और लगभग 48 शहरों की आबादी 100,000 के बीच है। गंगा के तट पर कानपुर , इलाहाबाद , वाराणसी और पटना जैसे, बड़े पैमाने पर औद्योगिक शहरों की स्थापना हो चुकी है, जहां से अपशिष्ट पदार्थों को गंगा नदी में निस्तारित कर दिया जाता है। गंगा तक पहुँचने वाले कुल प्रवाह का लगभग 12% औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ होता है। त्योहारों के मौसम में, 70 मिलियन से अधिक लोग अपने पिछलेपापों से मुक्ति पाने के लिए लिए गंगा में स्नान करते हैं। वे लोग भोजन, अपशिष्ट या पत्ते आदि गंगा नदी में प्रवाहित कर देते हैं, जो इसके प्रदूषण के लिए भी जिम्मेदार हैं।
पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इसके तट पर अंतिम संस्कार करने और गंगा में तैरने से मरने वालों के पाप धुल जाते हैं, तथा उन्हें सीधे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। यही कारण है अकेले वाराणसी में, अनुमानित रूप से हर साल चालीस हजार शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है। चूंकि कई परिवार पर्याप्त मात्रा में श्मशान की लकड़ी की उच्च लागत का वहन नहीं कर सकते, इसलिए कई अधजले शवों को भी गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। हालांकि गंगा नदी को साफ करने के लिए कई बार पहल भी की गई, लेकिन अधिकांश प्रयास,महत्वपूर्ण परिणाम देने में असफल रहे। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निर्वाचित होने के बाद, गंगा नदी की सफाई और प्रदूषण को नियंत्रित करने पर काम करने की घोषणा की। इसके बाद, जून 2014 के बजट में सरकार द्वारा नमामि गंगा परियोजना की घोषणा की गई। जिसके बाद जुलाई 2016 तक, नदी को साफ करने के विभिन्न प्रयासों में अनुमानित रूप से 3,000 करोड़ रुपये (460 मिलियन अमेरिकी डॉलर) खर्च किए गए हैं। 10 जुलाई 2014 को संसद में पेश किए गए बजट में, केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 'नमामि गंगे' (जिसका अर्थ है 'गंगा नदी का सम्मान') नामक एक एकीकृत गंगा विकास परियोजना की घोषणा की और इसके लिए ₹ 2,037 करोड़ आवंटित किए। इसका उद्देश्य गंगा के प्रदूषण, संरक्षण और कायाकल्प करना था। इस परियोजना के तहत 8 राज्य शामिल हैं। पेयजल आपूर्ति और स्वच्छता मंत्रालय ने 1,700 करोड़ रुपये (केंद्रीय हिस्से) की लागत से 2022 तक 1,674 ग्राम पंचायतों को खुले में शौच से मुक्त करने का प्रस्ताव रखा है। कार्यक्रम के एक भाग के रूप में, भारत सरकार ने गंगा के आसपास की 48 औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का आदेश भी दिया।
'नमामि गंगे', प्रयास जैव-उपचार, नवीन तकनीकों के उपयोग, सीवेज उपचार संयंत्रों (एसटीपी), प्रवाह उपचार संयंत्र के माध्यम से खुले नालों के माध्यम से बहने वाले अपशिष्ट जल के अवरोधन जैसे प्रदूषण उपशमन हस्तक्षेपों पर ध्यान केंद्रित करेगा। 2020 में किये गए एक अध्ययन से पता चला है कि, गंगा नदी की स्वच्छता में सुधार देखा गया है। भारत सरकार ने हाल ही में 193 बिलियन रुपये की वृक्षारोपण गतिविधियों के माध्यम से नदी कायाकल्प कार्यक्रम (river rejuvenation program) जारी किया है। इस योजना में 13 प्रमुख नदियाँ शामिल हैं, जो हिमालय क्षेत्र के साथ-साथ प्रायद्वीपीय भारत से संबंधित हैं और वे सामूहिक रूप से लगभग 1.89 मिलियन वर्ग किलोमीटर के कुल बेसिन क्षेत्र तथा भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 57 प्रतिशत क्षेत्र को कवर करती हैं। भारत सरकार के पर्यावरण मंत्री द्वारा इन 13 प्रमुख नदियों- झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास, सतलुज, यमुना, ब्रह्मपुत्र, लूनी, नर्मदा, गोदावरी, महानदी, कृष्णा और कावेरी के कायाकल्प पर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) हाल ही में जारी की गई थी।
सरकार का कहना है कि, ताजे पानी के संसाधनों की कमी के कारण बढ़ता जल संकट, विशेष रूप से नदी पारिस्थितिक तंत्र के सिकुड़ने और क्षरण के कारण पर्यावरण, संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास से संबंधित राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में एक बड़ी बाधा है।
इसी क्रम में उत्तर प्रदेश सरकार, गंगा को स्वच्छ, प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए 'नदी की खेती' का उपयोग करने की योजना बना रही है। जिसके अंतर्गत मत्स्य पालन विभाग द्वारा राज्य के 12 जिलों में विभिन्न प्रजातियों की करीब 15 लाख मछलियों को नदी में छोड़ा जाएगा। नदी पालन से स्थायी मत्स्य पालन प्राप्त करने, आवास क्षरण को कम करने और गंगा की जैव विविधता के संरक्षण में मदद मिलेगी। वाराणसी नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखते हुए गंगा को प्रदूषण मुक्त और स्वच्छ बनाने के अपने प्रयासों को जारी रखते हुए, उत्तर प्रदेश सरकार ने नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत 'नदी की खेती' को शामिल करने का यह निर्णय लिया है। योजना के तहत राज्य के 12 जिलों में गाजीपुर, वाराणसी, मिर्जापुर, प्रयागराज, कौशाम्बी, प्रतापगढ़, कानपुर, हरदोई, बहराइच, बुलंदशहर, अमरोहा और बिजनौर शामिल हैं। वाराणसी और गाजीपुर जिलों में गंगा में लगभग 1.5 लाख मछलियां छोड़ी जाएंगी। सरकार के इस कदम से स्थायी मत्स्य पालन प्राप्त करने, आवास क्षरण को कम करने, जैव विविधता के संरक्षण, सामाजिक- आर्थिक लाभ को अधिकतम करने और प्रदूषण पैदा करने वाले कारकों को भी दूर करने में मदद मिलेगी। “इस गतिविधि में, विभिन्न प्रजातियों की मछलियों को नदी में छोड़ा जाता है, जो नाइट्रोजन (Nitrogen) के स्तर को बढ़ाने वाले कारकों को नष्ट कर देती हैं। ये मछलियां नदी की सफाई को बनाए रखने में भी मदद करेंगी, क्योंकि वे जैविक अवशेषों का भोजन करती हैं। गंगा में अत्यधिक मछली पकड़ने और प्रदूषण के कारण ये मछलियां भी पिछले 20 वर्षों से कम हो रही हैं।

संदर्भ
https://bit.ly/3ra56gn
https://bit.ly/3rc2Ll6
https://bit.ly/3up5BFD
https://bit.ly/3xcWUQz

चित्र संदर्भ
1. ऋषिकेश में गंगा नदी को दर्शाता एक चित्रण (PixaHive)
2. गंगा के साथ भारत का स्थान मानचित्र पर प्रकाश डाला गया है जिसको दर्शाता एक अन्य चित्रण (wikimedia)
3. पानी में मिलते दूषित आद्योगिक जल को दर्शाता एक अन्य चित्रण (flickr)
4. नदी तल की सफाई के लिए सूख गई गंगा को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
5. वाराणसी में गंगा नदी को दर्शाता एक चित्रण ( Max Pixel)



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