विलुप्ति के कगार पर खड़ी शहरों की जीवनदायीनी झीलें

लखनऊ

 03-05-2021 07:48 AM
पर्वत, चोटी व पठारनदियाँजलवायु व ऋतु

रामपुर मोती और गौर जैसी महत्वपूर्ण झीलों का घर है, संसाधन के रूप में इनका अंधाधुन दोहन इनकी स्थिति पर विपरीत प्रभाव डाल रहा है। प्राचीन काल में गांवों और कस्बों को जलीय निकायों के निकट बनाया गया था, जो आगे चलकर महानगरों में परिवर्तित हो गए।शहरी नियोजन और पानी के बीच बहुआयामी संबंधों ने पूरे इतिहास में महानगरीय क्षेत्रों, शहरों, कस्बों और यहां तक कि पड़ोसी देशों के विकास को भी प्रभावित किया और जो आज भी जारी है।समय के साथ, जल निकायों और झीलों के पास मानव बस्तियों ने प्राकृतिक वातावरण को आधुनिक शहरों में बदल दिया। शहरी झीलें, शहर के पारिस्थितिक तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं क्योंकि वे पर्यावरण, सामाजिक और आर्थिक सेवाएं प्रदान करने में प्रमुख भूमिका निभाती हैं।उपयुक्त झील का कार्य बाढ़ और सूखे के प्रभाव को कम करना और पानी का भंडारण करना है। झीलें भूजल स्तर को फिर से भरने में भी मददगार सिद्ध होती हैं क्योंकि वे भूजल पुनर्भरण के लिए आवश्यक प्रापक होती हैं, और ये आसपास के क्षेत्र की जैव विविधता और आवास को संरक्षित करती हैं।शहरी क्षेत्रों में झीलें हमें मनोरंजन, पर्यटन और घरेलू उद्देश्यों के लिए प्रमुख अवसर प्रदान करती हैं। वे ऐतिहासिक और पारंपरिक मूल्य रखती हैं और कई स्थानों पर नगरपालिका के लिए जलापूर्ति का एक प्रमुख स्रोत होती हैं।


यद्यपि यह मानव और पर्यावरण के लिए मौलिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं, किंतु मानव गतिविधियों के कारण आज इनका अस्तित्वण खतरे में पड़ गया है। इस तरह से बढ़ते शहरीकरण के लिए झीलों को बहुत बड़ी लागत चुकानी पड़ रही है,क्योंकि अनुपचारित स्थानीय सीवेज के निपटान से प्रदूषण के कारण या अतिक्रमण के कारण इन्हें भारी क्षति पहुंची है, जिसके परिणामस्वरूप यह सिकुड़ गई हैं।झीलों में अपशिष्टा पदार्थों के भराव के कारण इन झीलों के आसपास आने वाले प्रावासी पक्षियों की संख्याा भी घट गयी हैं, इसके साथ ही जलीय जीवन भी प्रभावित हुआ है।वर्तमान में, भारत में, झीलें और आर्द्रभूमि बेहद खराब स्थिति में हैं और पर्यावरणीय क्षरण के विभिन्न स्तरों पर खड़े हैं। उनके पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक महत्व को जानने के बावजूद, शहर के योजनाकारों ने इन जल निकायों की जानबूझकर उपेक्षा की और विलुप्ति के कगार पर खड़ा कर दिया।
आज ये जलस्रोत अतिक्रमित हो रहे हैं, सीवेज और कचरे से भरे हुए हैं। अनियोजित शहरीकरण के कारण, झीलों के आस-पास के अधिकांश परिदृश्य को अभेद्य सतहों द्वारा कवर कर लिया गया है। परिणामस्वरूप, यह बारिश के पानी की बजाय सीवेज और अपशिष्ट से भरी हुयी हैं। एक बार शहरी क्षेत्र के अवशोषकों के बाद, आज शहरी झीलें खतरे में आ गई हैं, जो कम बारिश के साथ भी सिकुड़ती जा रही हैं और उच्च वर्षा के दौरान अवरुद्ध नहरों में बह जाती हैं, जिससे शहर में बाढ़ आती है। शहर के इन अवशोषकों का गायब होना ,बाढ़ की स्थिति को बढ़ा रहा है, जिससे सूखे की समस्याह बढ़ गई है। भारतीय शहरों के वर्तमान अंधकारमय परिदृश्य को देखते हुए, आज हमें अपनी शहरी झीलों और आद्रजलभूमि की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।
हालाँकि, शहरी झीलों और आद्रभूमि के संरक्षण और मरम्मशत के लिए नीतियों और कार्यों का ढेर लगा पड़ा है, किंतु क्रियांवयनकर्ताओं की कमी है। इनकी संख्या तेजी से घट रही है। उदाहरण के लिए 1960 की शुरुआत में बैंगलोर में 262 झीलें थीं, अब केवल 10 में पानी है। दिल्ली में 2010-11 में किए गए एक अध्य्यन से पता चला कि शहरीकरण के कारण पिछले 10 वर्षों में 44 में से 21 झीलें सूख गईं हैं, भारत में ऐसे सैकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं। शहरी भूमि उपयोग में तेजी से वृद्धि ने ताजे पानी की झीलों के आसपास के क्षेत्र को कृषि क्षेत्रमें बदल दिया है। जो दक्षिण भारतीय शहर बेंगलुरु के शहरी पारिस्थितिक लोक का हिस्सा हैं। चिह्नित भूमि क्षरण ने स्थानीय नागरिकों और पारंपरिक उपयोगकर्ताओं की आजीविका के लिए पानी की उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। प्रबंधन के लिए संस्थानों में बदलाव और तेजी से शहरीकरण का अनुसरण करने वाली एक रूपांतरित सामाजिक जनसांख्यिकी ने सामूहिक कार्रवाई को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।


दिल्ली की भलस्वा झील को भी इसी तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा है। स्थानीय लोगों का दावा है कि झील के एक तरफ कचरा फेंके जाने के कारण असहनीय बदबू आती है। दिल्ली के जल कार्यकर्ता मनोज मिश्रा बताते हैं कि जलग्रहण क्षेत्रों के समतलीकरण के कारण झीलों में समस्याएँ पैदा हो रही हैं। "झीलों को सुशोभित करने के लिए जलग्रहण सिमट गए हैं, लेकिन इससे उनमें वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह को रोका गया है। ये झीलें कभी यमुना का एक हिस्सा थीं, लेकिन अब कंक्रीट की संरचनाओं के कारण वे इससे अलग हो गयी हैं।"समय रहते इन शहरी जल निकायों के लिए आवश्य क कदम नहीं उठाए गए तो ये जल्द ही बड़े-बड़े शहर के लोगों को पानी की किल्लत की वजह से पलायन के लिए विवश कर देंगे।
संदर्भ:-
https://bit.ly/3u0FuC6
https://bit.ly/2R2zmLh
https://bit.ly/32UQYeM
https://bit.ly/3xoAfhT

चित्र सन्दर्भ:-
1.झील का एक चित्रण (Wikimedia)
2.झील का एक चित्रण(Wikimedia)
3.झीलों का तुलनात्मक चित्रण(Youtube)


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