हिंद महासागर व्यापार मार्गों का इतिहास

लखनऊ

 02-01-2021 11:12 AM
समुद्र

हिंद महासागर के समुद्री मार्ग को दुनिया में सबसे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, जहां हिंद महासागर और उसके महत्वपूर्ण चोक पोइन्ट (Chokepoint) के माध्यम से दुनिया के 80 प्रतिशत से अधिक तेल के समुद्री व्यापार का पारगमन होता है, वहीं 40 प्रतिशत होरमुज़ की जलसंयोगी (Strait of Hormuz) से, 35 प्रतिशत मलाक्का की जलसंयोगी (Strait of Malacca) से और 8 प्रतिशत बाब अल-मंडब की जलसंयोगी (Bab el-Mandeb Strait) से होकर गुजरता है। हिंद महासागर दुनिया के महासागरीय विभाजनों में तीसरा सबसे बड़ा है, जो पृथ्वी की सतह पर 70,560,000 वर्ग किमी (27,240,000 वर्ग मील) या 19.8% पानी को आवृत करता है। यह उत्तर में एशिया, पश्चिम में अफ्रीका और पूर्व में ऑस्ट्रेलिया से घिरा है। दक्षिण में यह दक्षिणी महासागर या अंटार्कटिक (Antarctic) से घिरा है। इसके मूल के साथ, हिंद महासागर में कुछ बड़े सीमांत या क्षेत्रीय समुद्र हैं जैसे कि अरब सागर (Arabian Sea), लैकसिडिव सागर (Laccadive Sea), सोमाली सागर (Somali Sea), बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) और अंडमान सागर (Andaman Sea)।
हिंद महासागर मध्य पूर्व अफ्रीका (Middle East Africa) और यूरोप (Europe) और अमेरिका (America) के साथ पूर्वी एशिया (East Asia) को जोड़ने वाले प्रमुख समुद्री मार्ग प्रदान करता है। यह फारस की खाड़ी (Persian Gulf) और इंडोनेशिया (Indonesia) के तेल क्षेत्रों से पेट्रोलियम (Petroleum) और पेट्रोलियम उत्पादों का विशेष रूप से भारी यातायात करता है। सऊदी अरब (Saudi Arabia), ईरान (Iran), भारत और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया (Western Australia) के अपतटीय क्षेत्रों में हाइड्रोकार्बन (Hydrocarbon) के बड़े भंडार का उपयोग किया जा रहा है। विश्व के अपतटीय तेल उत्पादन का अनुमानित 40% हिंद महासागर से आता है। भारी खनिजों से समृद्ध समुद्र तट रेत, और अपतटीय क्षेत्र भंडार का सीमावर्ती देशों, विशेष रूप से भारत, पाकिस्तान (Pakistan), दक्षिण अफ्रीका (South Africa), इंडोनेशिया (Indonesia), श्रीलंका (Sri Lanka) और थाईलैंड (Thailand) द्वारा सक्रिय रूप से उपयोग किया जाता है।
पूरे इतिहास में पूर्व-पश्चिम आदान-प्रदान में हिंद महासागर व्यापार एक महत्वपूर्ण कारक रहा है। धो (Dhow) और प्रो (Proa) में लंबी दूरी के व्यापार ने इसे पूर्व में जावा (Java) से लेकर पश्चिम में ज़ांज़ीबार (Zanzibar) और मोम्बासा (Mombasa) के शहर राज्यों तक लोगों, संस्कृतियों और सभ्यताओं के बीच परस्पर क्रिया का एक गतिशील क्षेत्र बना दिया। साथ ही हिंद महासागर के किनारे पर शहरों और राज्यों ने समुद्र और जमीन दोनों पर ध्यान केंद्रित कर दिया। हड़प्पा और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं के बीच मध्य हड़प्पा चरण (2600-1900 ईसा पूर्व) में एक व्यापक समुद्री व्यापार तंत्र फैला हुआ था, जिसमें बहुत से वाणिज्य "दिलमुन (फारस की खाड़ी में स्थित आधुनिक बहरीन (Bahrain) और फेलकाका (Failaka)) के बिचौलिए व्यापारियों" द्वारा संभाला जाता था। इस तरह की लंबी दूरी की समुद्री व्यापार तख़्त-निर्मित जहाज के विकास के साथ संभव हो गया, जो एक एकल मस्तूल से सुसज्जित है, जो बुने हुए रस्सियों या कपड़े की पाल का समर्थन करता है।
हिंद महासागर में पहला वास्तविक समुद्री व्यापार तंत्र दक्षिण-पूर्व एशिया के ऑस्ट्रोनेशियन (Austronesian) लोगों द्वारा किया गया था, जिन्होंने पहले महासागर-जाने वाले जहाजों का निर्माण किया था। उन्होंने 1500 ईसा पूर्व तक दक्षिणी भारत और श्रीलंका के साथ व्यापार मार्गों की स्थापना की, जहां से उन्होंने भौतिक संस्कृति के आदान-प्रदान की शुरुआत की (जैसे कटमरैन (Catamaran), आउटरिगर नावें (Outrigger boats), लैश्ड-लुग (Lashed-lug) और सीवन-प्लैंक बोट (Sewn-plank boats) और पान) और कृषक (जैसे नारियल, चंदन, केले और गन्ना)। इंडोनेशियाई लोग विशेष रूप से पूर्वी अफ्रीका के साथ मसाले (मुख्य रूप से दालचीनी और कीसिया) का व्यापार करते थे, जो कैटामरन और आउटरीगर नावों का उपयोग करते हुए और हिंद महासागर में पच्छमी हवा की मदद से नौकायन करते थे। यह व्यापार तंत्र धीरे-धीरे अफ्रीका और अरब प्रायद्वीप (Arabian Peninsula) तक विस्तारित हुआ, जिसके परिणामस्वरूप पहली सहस्राब्दी ईस्वी की पहली छमाही तक ऑस्ट्रोनेशियन लोगों द्वारा मेडागास्कर (Madagascar) में उपनिवेश बसा लिया। यह व्यापार तंत्र ऐतिहासिक समय तक चलता रहा और बाद में समुद्री रेशम मार्ग के नाम से जाना जाने लगा।
शास्त्रीय युग के दौरान (4 वीं शताब्दी ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी), हिंद महासागर व्यापार में अनेक प्रमुख साम्राज्य जैसे – फारस (Persia) में आचमेनिड (Achaemenid) साम्राज्य, भारत में मौर्य साम्राज्य, चीन (China) में हान राजवंश (Han Dynasty), रोमन साम्राज्य (Roman Empire) आदि शामिल थे। चीन के रेशम की ओर रोमन अभिजात वर्ग काफी आकर्षित हो गए, रोमन खजाने भारतीय खजाने में मिल गए, और फारसी गहने मौर्य समायोजन में फैल गए। शास्त्रीय हिंद महासागर व्यापार मार्गों के साथ एक और प्रमुख निर्यात वस्तु धार्मिक विचार था। बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म और जैन धर्म भारत से दक्षिण पूर्व एशिया में फैल गए, जो कि मिशनरियों द्वारा नहीं बल्कि व्यापारियों द्वारा लाए गए थे। बाद में इस्लाम 700 ईस्वी में इसी तरह फैल गया। मध्ययुगीन युग (400-1450 ईस्वी) के दौरान, व्यापार हिंद महासागर के बेसिन (Basin) में पनपा। अरब प्रायद्वीप पर उमय्यद (Umayyad) और अब्बासिद (Abbasid) ख़लीफ़ाओं के उदय ने व्यापार मार्गों के लिए एक शक्तिशाली पश्चिमी आसंधि (नोड - Node) प्रदान की। इस्लाम ने इन व्यापारियों को अत्यधिक महत्व दिया, यहां तक कि पैगंबर मुहम्मद खुद एक व्यापारी और कारवां नेता थे। अमीर मुस्लिम शहरों ने बहुमूल्य वस्तुओं की भारी मांग को उत्पन्न किया। इस बीच, चीन में तांग (Tang) और सांग (Song) राजवंशों ने भी भूमि आधारित रेशम मार्गों के साथ मजबूत व्यापार संबंध विकसित करके और समुद्री व्यापार को प्रोत्साहित करके व्यापार और उद्योग को बढ़ावा दिया। सोंग शासकों ने मार्ग के पूर्वी छोर पर समुद्री डकैती को नियंत्रित करने के लिए एक शक्तिशाली शाही नौसेना भी बनाई थी। अरबों और चीनियों के बीच, कई प्रमुख साम्राज्य बड़े पैमाने पर समुद्री व्यापार पर आधारित थे। 1405 में, हालांकि, चीन के नए मिंग राजवंश (Ming Dynasty) के योंगल सम्राट (Yongle Emperor) ने हिंद महासागर के चारों ओर साम्राज्य के सभी प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के दौरे के लिए सात अभियानों में से सबसे पहला अभियान शुरू किया।
1497–98 के दौरान वास्को डी गामा (Vasco da Gama) के तहत पुर्तगालियों (Portuguese) ने अफ्रीका के दक्षिणी सिरे से हिंद महासागर के लिए एक नौसैनिक मार्ग की खोज की। वहीं पुर्तगालियों ने व्यापारियों के बजाय समुद्री डाकुओं के रूप में हिंद महासागर के व्यापार में प्रवेश किया। ताकत और तोपों के संयोजन का उपयोग करते हुए, उन्होंने भारत के पश्चिमी तट पर कालीकट और दक्षिणी चीन में मकाऊ जैसे बंदरगाह शहरों को जब्त कर लिया। पुर्तगालियों ने स्थानीय उत्पादकों और विदेशी व्यापारी जहाजों को समान रूप से लूटना और बलपूर्वक छीनना शुरू कर दिया। 1602 में, हिंद महासागर में एक और क्रूर यूरोपीय शक्ति दिखाई दी जिसे डच ईस्ट इंडिया कंपनी (Dutch East India Company) के नाम से जाना गया। 1680 में, ब्रिटिश अपनी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (British East India Company) के साथ जुड़ गए, जिसने व्यापार मार्गों पर नियंत्रण के लिए डच ईस्ट इंडिया कंपनी को भारी चुनौती दी। जैसे ही यूरोपीय शक्तियों ने एशिया के महत्वपूर्ण हिस्सों इंडोनेशिया, भारत, मलाया और दक्षिण-पूर्व एशिया पर राजनीतिक नियंत्रण स्थापित कर उन्हें उपनिवेशों में बदला वैसे-वैसे पारस्परिक व्यापार भंग होता गया। जहां माल तेजी से यूरोप में जाने लगा वहीं पूर्व एशियाई व्यापारिक साम्राज्य खराब होता गया। वर्तमान भारत के दक्षिणी सिरे पर बर्बरिकम (Barbaricum (वर्तमान में कराची)), सौनागौरा (Sounagoura (वर्तमान में मध्य बांग्लादेश)), बर्यगजा (Barygaza), केरल में मुज़िरिस (Muziris), कोरकाई (Korkai), कावेरीपट्ट्नम (Kaveripattinam) और अरीकामेदू (Arikamedu) के क्षेत्रीय बंदरगाह एक अंतर्देशीय शहर कोडुमानल (Kodumanal) के साथ हिंद महासागर व्यापार के मुख्य केंद्र हुआ करते थे।

संदर्भ :-
https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_Ocean
https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_Ocean_trade
https://www.thoughtco.com/indian-ocean-trade-routes-195514
चित्र संदर्भ:
मुख्य चित्र एक मालवाहक जहाज को दर्शाता है। (Wikimedia)
दूसरी तस्वीर होरमुज़ की जलसंयोगी को दर्शाती है। (Pixabay)
अंतिम तस्वीर में मलाक्का की जलसंयोगी दिखाई देता है। (Pixabay)


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