समाज का आईना: ताड़ पत्र पांडुलिपि

लखनऊ

 02-09-2020 04:18 AM
वास्तुकला 2 कार्यालय व कार्यप्रणाली

ताड़ पत्र पर लिखी पांडुलिपि का इतिहास बहुत पुराना है और इन पर लिखी सामग्री से इन के समय समाज और सभ्यता का पता चलता है। रामपुर की विश्व प्रसिद्ध रजा लाइब्रेरी में अनेक ताड़ पत्र की पांडुलिपि सुरक्षित हैं। ये बहुत मूल्यवान हैं तथा तेलुगु, सिंघली और तमिल भाषाओं में हैं। इनमें से ज्यादातर धार्मिक प्रकार की है। एक तमिल आलेख में चित्र आकृति और पूजा विधि के नियमों का उल्लेख है। एक पांडुलिपि में कुछ वनस्पतियों के औषधीय गुणों की चर्चा है। संस्कृत भाषा में भी इस तरह की एक पांडुलिपि है। ग्रंथ लिपि में लिखा महत्वपूर्ण महाकाव्य रामायण रजा लाइब्रेरी के संग्रह में है। कन्नड पांडुलिपि में संगीत पर एक निबंध है, दूसरी पांडुलिपि में वैष्णव के पवित्र भजन लिखे हुए हैं। ताड़ पत्र पर लिखी पांडुलिपि का प्रचार प्रसार पूरे विश्व में है।


ताड़ पत्र पांडुलिपि: एक परिचय

सूखे ताड़ पत्र पर लिखने से तैयार होती है ताड़ पत्र पांडुलिपि। 5वीं शताब्दी BC से ताड़ पत्र का लेखन सामग्री के रूप में प्रयोग दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया में शुरू हुआ था। सुखाई और धुए से उपचारित पत्तियों पर यह लेखन होता था। सबसे पुरानी ताड़ पत्र पांडुलिपि में से एक संपूर्ण आलेख शैवमत के बारे में संस्कृत में है, जो नेपाल में मिला था और कैंब्रिज विश्वविद्यालय लाइब्रेरी (Cambridge University Library) में संरक्षित है। स्पित्जर पाण्डुलिपि (Spitzer Manuscript) छोटे-छोटे ताड़ पत्रों का संग्रह है, जो चीन की किज़िल गुफाओं (Kizil Caves) से प्राप्त हुई थी। पाण्डुलिपि को आयताकार कटे हुए ताड़ पत्र पर चाकू से बनी कलम से खोदकर लिखा जाता था, इसके बाद उस पर रंग उड़ेला और हटाया जाता था। रंग उन छेदों में भर जाता था। हर पत्ते में एक छेद होता था, जिसमें डोरी डाल कर सारी पत्तियों को एक साथ बांधकर किताब की शक्ल दे दी जाती थी। यह ताड़ पत्र पांडुलिपि कुछ दशकों तक सुरक्षित रहती हैं। इन्हें नमी, कीड़ों, एक आकार में ढालने की कोशिश और टूटने से बचाना पड़ता है। अन्यथा उनकी नए तार पत्रों पर प्रतिलिपि तैयार की जाती है।


ताड़ पत्र पांडुलिपि: इतिहास

पुरानी भारतीय ताड़ पत्र पांडुलिपि ठंडी और सूखी जलवायु में पाई गई, जैसे नेपाल तिब्बत और मध्य एशिया। यह क्षेत्र पहली शताब्दी की पांडुलिपि के मुख्य स्रोत रहे। प्रसिद्ध पांचवी शताब्दी की पांडुलिपि जिसे बोवेर पांडुलिपि कहते हैं, जो चीन तथा तुर्किस्तान में मिली थी और भोजपत्र के ऊपर लिखी थी, जिनका आकार एकदम ताड़ पत्र की तरह था। हिंदू मंदिरों में अक्सर इन पांडुलिपि का पठन-पाठन में प्रयोग होता था और नष्ट होने से पहले इनकी प्रतिलिपि बना ली जाती थी। दक्षिण भारत के मंदिरों और मठों में हिंदू दर्शन, काव्य व्याकरण और दूसरे विषय पर तमाम पांडुलिपि को संरक्षित किया गया है। पुरातात्विक और उत्कीर्णन प्रमाण इशारा करते हैं कि उस दौर में ‘सरस्वती भंडार’ नाम से पुस्तकालय भी होते थे। यह 12वीं शताब्दी के आरंभ के संदर्भ हैं। ताड़ पत्र पांडुलिपि जैन मंदिर और बौद्ध मठ में भी संरक्षित की जाती थी।
रामपुर रजा लाइब्रेरी का संग्रह

रामपुर की रजा लाइब्रेरी में अनेक भाषा की दुर्लभ पांडुलिपियों का संग्रह है।
अरबी भाषा: अरबी हस्तलिपि की कुछ प्राचीनतम पांडुलिपि यहां उपलब्ध हैं, जिनमें सातवीं शताब्दी AD की कुरान शामिल है। यह चर्म पत्र पर लिखी है। इस लाइब्रेरी का अरबी में 'राज़ी का शरहल काफिया' भी एक विलक्षण संग्रह है।

फारसी भाषा:
'ज़खीराई ख़्वारिज़्म' शाही प्राचीन आलेख है, जो दवाओं से संबंधित है। मंगोल जनजाति के इतिहास पर प्राचीनतम चित्रात्मक फारसी शोध जमीउल तवारीख़, यहां की दुर्लभ पांडुलिपि है जिसे राशिद उद्दीन फजलुल्लाह ने लिखा था। इसमें बहुत सारे अद्भुत चित्र हैं, जो मंगोल के तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक पक्ष को दिखाते हैं। यहां पर प्राचीन चीनी और मध्य एशिया की ऐसी पेंटिंग हैं, जो पर्शिया (Persia) की हैं और रात्रि स्कूल से प्रभावित हैं।

रामपुर रजा लाइब्रेरी में हिंदी, संस्कृत, उर्दू, तुर्किश, ताड़ पत्र, पश्तो की दुर्लभ पांडुलिपि का दुर्लभ संग्रह है और सारी जानकारी बहुत व्यवस्थित रूप से शोध के लिए उपलब्ध है।

सन्दर्भ:
https://en.wikipedia.org/wiki/Palm-leaf_manuscript
http://www.waccglobal.org/articles/preserving-india-s-palm-leaf-manuscripts-for-the-future
http://razalibrary.gov.in/manuscripts.html
चित्र सन्दर्भ :
मुख्य चित्र में 16वीं शताब्दी में ताड़ पत्री पर लिखी गयी हिन्दू भागवत पुराण का चित्र है। (Wikimedia)
दूसरे चित्र में नन्दिनागरी लिपि में लिखी गयी एक ताड़पत्र पांडुलिपि को दिखाया गया है। (Prarang)
तीसरे चित्र में पार्श्व में हमारी रज़ा पुस्तकालय और अग्र में एक ताड़पत्र पांडुलिपि को दिखाया गया है, जो पुस्तकालय के संग्रह का सांकेतिक चित्रण है। (Prarang)
अंतिम चित्र में एक जैन ताड़पत्र पांडुलिपि को दिखाया गया है। (Wikipedia)



RECENT POST

  • क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जनित कला है अब ललित कला का भविष्य?
    द्रिश्य 3 कला व सौन्दर्य

     27-09-2022 10:06 AM


  • प्राचीन भारत में गणित की सहायता से निर्मित किये गए वास्तुशिल्प के चमत्कार
    विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

     26-09-2022 10:23 AM


  • लखनऊ शहर से जुड़ा है दास्तानगोई परंपरा का पुनरुद्धार
    द्रिश्य 2- अभिनय कला

     25-09-2022 11:22 AM


  • हड़प्पा संस्कृति से प्राप्‍त मुहरें, यह हमें उस समय के व्यापार के बारे में क्या बता सकती हैं?
    सभ्यताः 10000 ईसापूर्व से 2000 ईसापूर्व

     24-09-2022 10:22 AM


  • देश ने देखा आई.टी हब बेंगलुरु को जलमग्न, प्राकृतिक आपदाओं में जलवायु परिवर्तन का योगदान
    जलवायु व ऋतु

     23-09-2022 10:16 AM


  • वनस्पतियों व जीवों की बड़ी आबादी को आश्रय देते, मैंग्रोव वन या समुद्र तट के जलमग्न क्षेत्र
    निवास स्थान

     22-09-2022 10:16 AM


  • लखनऊ के लेवाना सूइट के उदाहरण से समझें, बिना उचित योजना के भवन, शहरों के लिए हुए जोखिम भरे
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     21-09-2022 10:39 AM


  • भारत के प्राचीनतम हिंदू मंदिरों के दर्शन
    धर्म का उदयः 600 ईसापूर्व से 300 ईस्वी तक

     20-09-2022 10:22 AM


  • भारत ने ओजोन क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन व खपत को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     19-09-2022 10:19 AM


  • बड़ी बिल्लियों में सबसे कमजोर मानी जाती है शेर की बाइट
    व्यवहारिक

     18-09-2022 12:35 PM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.

    login_user_id