भारतीय आदिवासी गहनों में हैं, संस्कृति और परंपरा का सम्मोहन

लखनऊ

 29-06-2020 10:50 AM
म्रिदभाण्ड से काँच व आभूषण

भारत वैविध्य पूर्ण आदिवासी संस्कृति से संपन्न देश रहा है जिसने आधुनिकीकरण के दबाव के बावजूद अपनी परंपराएं और मूल्य आज भी सुरक्षित रखे हैं। आदिवासी गहनों में मिट्टी का सौंदर्य कायम है दूसरी तरफ, पारंपरिक आभूषणों के मुकाबले अलग ढंग से निर्मित और अपनी अलग पहचान वाले यह गहने बहुतों द्वारा सराहे जाते हैं। आदिवासी गहनों में सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं की संक्षिप्त झलक इनकी बड़ी खूबी है। पुराने समय में शरीर के अनेक हिस्सों को सजाने के लिए अलग-अलग आभूषण होते थे। यह प्रमाणित है कि मोहनजोदड़ो और सिंधु घाटी सभ्यता के स्थानों की खुदाई में हाथ से बने खूबसूरत गहने भी प्राप्त हुए थे। वहीं महाभारत और रामायण में भी इन गहनों के विस्तृत विवरण और उनकी रहस्यमई शक्तियों का जिक्र मिलता है। प्राचीन भारत के राजपरिवार देशज कारीगरों को अपने लिए खास आभूषणों को बनाने के लिए काम पर रखते थे। यह बहुमूल्य गहने पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते थे।

आदिवासी आभूषण मुख्य रूप से विशेष अवसरों पर पहने जाते थे, खूबसूरत होने के साथ-साथ प्राचीन काल से ही गहनों को धर्म के सूत्र के रूप में भी जाना जाता रहा है। आदिवासी लोग भारतीय भूमि के लिए एक धरोहर की तरह हैं प्रत्येक जनजाति ने अपने विशिष्ट आभूषणों के अंदाज को अभी तक सुरक्षित रखा है। आदिवासियों द्वारा हड्डी, लकड़ी, मिट्टी, सीप और कच्ची धातु से आभूषण बनाए जाते थे, यह ना केवल डिज़ाइन में विशिष्ट होते थे बल्कि उनमें एक अलग तरह का ग्रामीण और जमीन से जुड़ा आकर्षण होता था। आदिवासी आभूषणों का स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री से निर्माण होता है। जबकि सारे देश पर वैश्वीकरण की भावना हावी थी और भारतीयों का ध्यान विदेशी ज्वेलरी के फैशन ट्रेंड का पीछा करने में लग गया था, ऐसे समय में यह भारत के आदिवासी ही थे जिन्होंने भारत की प्राचीन कला और शिल्प को संरक्षित रखा।

आदिवासियों द्वारा पहने जाने वाले आभूषण भारतीय संजाती कला (Indian Ethnic Art) का एक प्रारूप है। अपने जमीन से जुड़ी पहचान के कारण भीड़ में भी यह आभूषण अलग से दिखते हैं। जंगलों के नजदीक रहने वाले आदिवासी ज्यादातर जंगली जैविक जीवन (Wild Biological Life) जीते हैं। वे पौधों के विभिन्न हिस्सों जैसे जड़, छाल, पत्तियों, फल इत्यादि का प्रयोग करते हैं। कभी-कभी वे जानवरों के बालों का भी प्रयोग करते हैं, वे इन बालों को रंग कर भी प्रयोग करते हैं। कुछ जातियां ढेर सारी घास, मनको, बेंत आदि का प्रयोग करते हैं।

तीसरी शताब्दी ईसापूर्व में भारत रत्नों और मणियों का प्रमुख निर्यातक था, खासतौर से हीरों का। सोना ज्यादातर आयात होता था। यह प्रथा मुगल काल तक जारी रही। आभूषणों का पहली बार प्रयोग कब हुआ, यह तो नहीं पता लेकिन दक्षिण अफ्रीका की ब्लोमबोस (Blombos) गुफाओं से मिले घोंघों से बने आभूषणों के अवशेष इसके प्रमाण हैं कि आभूषणों का अस्तित्व 100 हजार वर्षों से भी पहले मौजूद था। प्राचीन आभूषण जानवरों के दातों, हड्डियों, सीप, हाथी दांत, नक्काशी दार पत्थर और लकड़ी से बने थे। धातु से बने जेवर 5000 ईसापूर्व पहले भी मौजूद थे। आधुनिक परिधान, फैशन और नकली ज़ेवरों का प्रचलन 17 वीं शताब्दी में शुरू हुआ।

प्राचीन भारत में आए यात्रियों को यहां के रत्नों को देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। डोमिंगो पेस (Domingos Paes), एक पुर्तगाली यात्री था जिसने अपने काल क्रम अभिलेखन में भारत में विजय नगर नाम के साम्राज्य के बारे में लिखा - "वहां की एक सभा में भारतीय लोगों द्वारा पहने हुए गहने देखकर वहां आए मेहमान बिल्कुल हैरत में पड़ गए।" आदिवासी आभूषण पूरी तरह हाथ से बने होते हैं, और अधिकतर नमूने उस क्षेत्र के फूलों और पशुओं या किसी देवता से संबंधित प्रतीक को दर्शाते हैं। आदिवासी एकदम तन्हा, सुदूर और पिछड़े साधन हीन क्षेत्रों में रहते हैं जैसे कि पहाड़ या जंगल। वहां शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति बहुत पिछड़ी हुई है। दूसरी संस्कृतियों से इनका संपर्क नाम मात्र को ही होता है। वह बेतरतीब ढंग से पूरे देश में बिखरे हुए हैं और उनमें आपस में बड़ी भिन्नता है। अफ्रीका के बाद भारत ऐसा देश है जहां आदिवासी समुदाय की इतनी घनी आबादी है। 75 आदिवासी समुदाय भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चिन्हित किए गए हैं।

भारतीय आदिवासी और संजाति आभूषण

चयनशील, जमीन से जुड़े और फैशन को नया रुख देने वाले - यह कुछ विशेषण है जोकि आदिवासी आभूषणों के लिए प्रयुक्त हो सकते हैं। कलात्मक, शुद्ध और सदाबहार संजातीय आभूषणों की खूबियां होती हैं। यहां तक कि पुराने समय में कबिले बड़े ही कल्पनाशील गहने बनाते थे- हार, चूड़ियां, झुमके और कुछ अनोखी चीजें जैसे कुंडल, नाक और होठों के लिए बालियां और अंगूठे के लिए अंगूठियां। ज्यादातर स्वदेशी आदिवासी गरीब थे और औपनिवेशिक ताकतों द्वारा बराबर लुटे जाते थे, इसलिए आभूषणों के लिए कच्ची सामग्री का उनका चयन बहुत सीमित था मसलन शंख, पंजे, जानवरों के जबड़े, हाथी दांत, लकड़ी, पत्तियां, पंख, चमड़ा, फूल इत्यादि। इसके बावजूद आदिवासी कारीगर शानदार गहने बनाते थे। ऐसा देखा गया है कि कुछ कबीलों के लोगों के पास पहनने के पूरे कपड़े नहीं होते थे लेकिन उनके शरीर पर भरपूर आभूषण होते थे।

विभिन्न भारतीय राज्यों के आदिवासी आभूषणों की खासियत
मध्य प्रदेश- बस्तर के आदिवासी (Tribes of bastar) :

घास, मोती और बेंत से बने गहने इस क्षेत्र के की खूबी है। इसके अलावा तांबे, कांच, चांदी, लकड़ी, मोर पंख और जंगली फूलों से बने गहने यहां के आदिवासी पहनते हैं। यहां की आदिवासी स्त्रियां एक रुपए के सिक्के से बने हार पहनती हैं जोकि कलात्मकता का बेहतरीन उदाहरण है।

राजस्थान- बंजारा आदिवासी (Banjara Tribes) :
यह घुमंतू (खानाबदोश) समूह रंग-बिरंगे, भारी गहनों से अपना श्रृंगार करता है जिन पर सिक्के, सीप, शंख, मोती और धातु का जाल लगा होता है। इन गहनों से पहली नजर में ही यह जनजाति पहचानी जा सकती हैं। बंजारा कबीले के लोग अपनी कमर पर खूबसूरत पेटी लगाते हैं जो उनकी जीवंत पोशाक को पूर्णता प्रदान करती है। राजस्थान के चांदी और मोती के आभूषण दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

मेघालय- गारो, खासी, जयंतिया पहाड़ के आदिवासी (Tribes of Garo, Khasi, Jaintia Hills) :
खासी और जैनटिया के लाल मूंगा मोती और गारो के पतले कांच की कारीगरी किए तने पूरी दुनिया में लोकप्रिय हैं मोती और तने के साथ में पिरो कर खूबसूरत हार, ब्रेसलेट, हल्के जेवर, कान के झुमके, कमर पट्टी, और दूसरे आभूषण बनाए जाते हैं।

सिक्किम- भूटिया आदिवासी (Bhutia Community) :

पारंपरिक रूप से भूटिया आदिवासी सोना इस्तेमाल करके कई तरह के आभूषण बनाते थे, लेकिन आजकल महंगी कीमतों के कारण वे अब अधिकतर चांदी का प्रयोग करने लगे हैं जोकि अपेक्षाकृत सस्ती पड़ती है। फिरोजा पत्थर, डज़ी पत्थर (Dzi Stone) और मूंगे के समावेश से वे आभूषण के अंदाज़ को बिल्कुल अनोखा बना देते हैं।

अरुणाचल प्रदेश - वांचो नागा (Wancho Naga) :
यह आदिवासी समुदाय प्राकृतिक रूप से उपलब्ध सामग्री को अपने गहने बनाने में प्रयोग करता है। जैसे कि बीज, भंवरे, पंख, बांस और बेंत।

अरुणाचल प्रदेश - गैलोंग आदिवासी (Gallong Tribes) :
इस समुदाय की महिलाएं बड़ी कुशलता से लोहे की अंगूठियों के गुच्छे से कान के कुंडल तैयार करती हैं जो धातु जनित उनकी चमड़े की कमर पेटी के पूरक होते हैं। उनके श्रृंगार में सजावट के लिए मोतियों का बहुत प्रयोग होता है।

नागालैंड - अंगामी नागा (Angami Nagas) -
इस समुदाय के पुरुष अपने कानों में फूलों से बने कुंडल पहनते हैं और लाल फूल उनके बीच बहुत लोकप्रिय हैं। पुरुष अपने सिर की चोटियों में हरे फर्न पत्ते (Fern Leaves, सुंदर बारीक पत्तियों वाला एक पौधा) लगाते हैं। यह उन्हें बहुत प्राकृतिक रूप देता है और प्रकृति से उनके निकटता को भी दिखलाता है।

हिमाचल प्रदेश - चंबा, कांगड़ा, मंडी और कुल्लू के आदिवासी (Tribes of Chamba, Kangra, Mandi and Kullu) :
हिमाचल की अंडाकार पायल, लोहे केसर वाली चूड़ियां और सजावटी खंजर पूरे विश्व में अपनी खास विशेषता के लिए मशहूर हैं। इसके अलावा, पारंपरिक कॉलर की तरह दिखने वाली चांदी की हँसुली, तंग मफलर जिन्हें कछ कहते हैं, चपड़ा (shellac) भरी हुई चांदी की चूड़ियां सामान्य तौर पर पहाड़ी महिलाएं पहनती हैं। उनके सौंदर्यशास्त्र से हटकर, हिमाचली लोगों का विश्वास है कि चांदी के जेवर बुरी आत्माओं के साए से उनकी रक्षा करते हैं।

छत्तीसगढ़ – हिल मारिया आदिवासी (Hill Maria Tribal) :
पारंपरिक रूप से छत्तीसगढ़ के आदिवासी सुनार बारीक तांबे के तारों, पीतल और लोहे( आजकल सोने और चांदी), प्राकृतिक बीज, हड्डी या लकड़ी के अलंकरण से एक प्रकार का बालों के जूड़े में बांधने वाला फीता, कॉलर, लेस, चौकोर पायल, हल्के गहने, अंगूठी और बहुत सी चीजें बनाते हैं। शंक्वाकार जुड़वा सिर वाले कुंडल और नाक की कीले हिल मारिया समुदाय की अपनी खासियत है।

पश्चिम बंगाल - मोखाली के आदिवासी (Tribes of Maukhali) :
बंगाली बिंदी, कान के पारंपरिक झुमके, चिक (गोल्ड चोकर ), हसुली, मन्तशा और डोकरा अपने खास शिल्प के लिए जाने जाते हैं। इस जनजाति के गहने सोने, चांदी, मूल्यवान पत्थरों तथा काठ के मानको से बनते हैं और अपने अंदाज में उत्कृष्ट होते हैं।

बिहार- संथाल आदिवासी (Santhal Tribes) :
संथाल जनजाति की चांदी द्वारा बनाई गयीं महीन कान की बालियां, करधनी (कमर पर पहनी जाती है) और छुधा चूड़ियां यहां की खास पहचान है। साथ ही यहां की चमकीली, आकर्षक और निरंतर खनकती झुमकी पूरी दुनिया में बहुत लोकप्रिय हैं।

महाराष्ट्र - हल्बा आदिवासी (Halba tribes) :
आदिवासियों का यह समुदाय सोने, चांदी, पीतल और एल्युमिनियम का प्रयोग कर खूबसूरत खोसाज (चोटी की एक खूबसूरत लट), खिनवास ( कान छेदने के लिए) और फुली (नाक छेदने के लिए) बनाते हैं। टैटू भी इस समुदाय के लोगों के बीच काफी प्रचलन में है।

कर्नाटक - कोंडा कापुस आदिवासी (Konda Kapus tribes) :
इस समुदाय के लोग चांदी और तांबे के सिक्कों से आश्चर्यजनक गहने बनाते हैं क्योंकि इन दिनों इस जनजाति के गहनों में पुराने भारतीय सिक्कों का प्रयोग होता है, इसलिए पुरानी चीजों के संग्रहकर्ता हमेशा इनकी ढूंढ में रहते हैं। 25 पैसे और 50 पैसे के सिक्कों से निर्मित हार इस समुदाय की महिलाएं आमतौर पर पहनती हैं।

चित्र सन्दर्भ:
1. मुख्य चित्र में बैगा (जनजाति) को दिखाया गया है। (Publicdomainpictures)
2. दूसरे चित्र में भारतीय लोक जनजातीय गहनों को दिखाया गया है। (Flickr)
3. तीसरे चित्र में लकड़ी और तीतर के पंख से बनाये गये गले के जेवरात दिखाये गए हैं। (Prarang)
4. चौथे चित्र में विभिन्न भारतीय जनजातियों को दिखाया गया है। (Prarang)
5. पांचवे चित्र में हड्डियों, लोहे और चांदी से बनाये गए आभूषणों से सुशोभित विभिन्न जनजाति के लोगों को दिखाया गया है। (Prarang)
6. छटे चित्र में जनजातीय आभूषणों की विषेशताओं को दिखाया गया है। (Prarang)
7. सातवे चित्र में बस्तर जनजाति को दिखाया गया है। (Wikipedia)
8. आठवें चित्र में बंजारों को विभिन्न चरण कालों में दिखाया गया है। प्रथम दृश्य में एक अनजान कलाकार द्वारा बनाया गया एक बंजारन का चित्र है। दूसरे दृश्य में राजा रवि वर्मा द्वारा बनाया गया एक चित्र है जिसमें एक बंजारन को चित्रित किया गया है। अंतिम दृश्य में वर्तमान में एक बंजारान महिला का चित्र है। (Prarang)
9. नौवें चित्र में गारो जनजाति के महिला और पुरुष को दिखाया गया है। (Flickr)
10. दसवें चित्र में भुटिया जनजाति को प्रदर्शित किया गया है। (Wikipedia)
11. ग्यारहवें चित्र में वांचो नागा जनजाति को दिखाया गया है जो दिल्ली संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है। (Youtube)
12. बारहवें चित्र में गैलोंग आदिवासी दिखाए गए हैं जो दिल्ली संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है। (Youtube)
13. तेरहवें चित्र में अंगामी नागा नामक जनजाति को दिखाया गया है। (Unsplash)
14. चौदहवें चित्र में हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा, कुल्लू और मंडी के आदिवासियों का चित्रण है। (Prarang)
15. पन्द्रहवें चित्र में हिल मारिया जनजाति के महिला और पुरुष को दिखाया गया है। (Peakpx)
16. सोलहवें चित्र में पश्चिम बंगाल की मोखाली आदिवासियों को दिखाया गया है। (Youtube)
17. सत्रहवें चित्र में सन्थाल जनजाति के सदस्यों को दिखाया गया है। (Prarang)
18. अट्ठारहवें चित्र में महाराष्ट्र की हल्बा जनजाति की एक महिला के हाथ पर मुद्रित टैटू है। (Prarang)
19. अंतिम चित्र में कोंडा कापुस आदिवासी और उनके द्वारा बनाये जाने वाले गहनों को दिखाया गया है। (Prarang)

सन्दर्भ:
1. https://www.culturalindia.net/jewellery/types/tribal-jewelry.html
2. https://www.medicinemangallery.com/native-american-art/indian-jewelry
3. https://www.iosrjournals.org/iosr-jestft/papers/vol10-issue3/Version-2/A1003020116.pdf



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