संस्कृति, इतिहास और भौगोलिक विविधता के प्रचारक हैं कपड़े

लखनऊ

 25-05-2020 09:00 AM
सिद्धान्त 2 व्यक्ति की पहचान

मानव जीवन में कपड़ों की विशिष्ट भूमिका है। इन्हें हमारी पैतृक विरासत माना जा सकता है जो हमारी सभ्यता की कई विशेषताओं को दर्शाता है। कपड़े एकमात्र पहनने की वस्तु ही नहीं है अपितु यह हमारी संस्कृति, इतिहास और भौगोलिक विविधता के प्रचारक भी हैं। रामपुर को भी अपने फूल पत्ती की कढ़ाई और जरदोजी के काम के लिए विशेष रूप से जाना जाता है तथा पूरे विश्व में ऐसी कई संस्कृतियां हैं जिन्हें अपने विभिन्न परिधान कार्यों के लिए जाना जाता है। यह निर्धारित करना बहुत कठिन है कि, इंसानों ने कपड़े पहनना कब शुरू किया। यह एक चुनौती की भांति है, क्योंकि शुरूआती दौर में बड़े पैमाने पर कपड़े जंतुओं की खाल से बने होते थे जो जल्दी खराब हो जाते थे। इसलिए, ऐसे बहुत कम पुरातात्विक साक्ष्य हैं जिनका उपयोग यह निर्धारित करने के लिए किया जा सकता है कि आखिर कपड़े पहने जाने की निश्चित तारीख या समय कौन सा है। पुरातत्वविदों ने इस सन्दर्भ में जो कुछ भी प्राप्त किया, उसके आधार पर कई अलग-अलग सिद्धांत मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, आनुवंशिक त्वचा-रंग (Genetic skin-coloration) अनुसंधान के आधार पर, मनुष्यों ने लगभग 10 लाख साल पहले शरीर के बालों को खोया और यह कपड़े पहनना शुरू करने का एक आदर्श समय था ताकि गर्मी से बचा जा सके। लगभग 40,000 साल पहले सुइयां मौजूद थी, लेकिन ये सुइयां अधिक जटिल कपड़ों की ओर इशारा कर रही थी जिन्हें इनसे सिला जाता था। इसका अर्थ है कि कपड़े शायद इस समय से पहले से ही मौजूद थे। फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के एक हालिया अध्ययन ने निष्कर्ष निकाला है कि मनुष्यों ने लगभग 170,000 साल पहले कपड़े पहनना शुरू किया था।

उन्होंने इस समय का पता जूँ के विकास का अध्ययन करके लगाया। वैज्ञानिकों ने देखा कि कपड़ों के जूँ, कपड़ों के लिए बहुत अच्छी तरह से अनुकूलित हैं। उन्होंने परिकल्पना की कि, शरीर के जूँ कपड़ों में रहने के लिए विकसित हुए होंगे, जिसका मतलब था कि वे इंसानों के कपड़े पहनने से पहले मौजूद नहीं थे। इस अध्ययन में जूँ के डीएनए (DNA) अनुक्रम का उपयोग किया गया जिससे यह पता चला की कपड़े का जूँ, आनुवंशिक रूप से सिर के जूँ से कैसे अलग हुआ। अध्ययन के निष्कर्ष महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे बताते हैं कि कपड़े लगभग 70,000 साल पहले दिखाई दिए थे, जब इंसान ने अफ्रीका से उत्तर की ओर ठंडी जलवायु में पलायन करना शुरू किया। उस समय कपड़ों का आविष्कार शायद एक ऐसा कारक था जो प्रवास को संभव बनाता था। इसका मतलब है कि आधुनिक मनुष्यों ने संभवतः खुद को गर्म रखने के लिए नियमित रूप से कपड़े पहनना शुरू किया। कुछ ऐसे साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जो यह बताते हैं कि लगभग 27,000 साल पहले, मनुष्यों ने बुनाई शुरू की। लगभग 25,000 साल पहले, पहली वीनस (Venus) मूर्तियां (महिलाओं की छोटी प्रतिमाएं) विभिन्न प्रकार के कपड़े पहने हुए दिखाई दीं, जो यह इंगित करती हैं कि इस समय तक बुनाई की तकनीक विकसित हो चुकी थी। प्राचीन मिस्र के लोगों ने लगभग 5500 ईसा पूर्व लिनन (Linen) का उत्पादन किया, जबकि चीन के लोगों ने संभावित रूप से 4000 ईसा पूर्व के आसपास रेशम का उत्पादन शुरू किया।

कपड़ों और टेक्स्टाइल्स (Textiles) के इतिहास का अध्ययन मानव इतिहास में इनके विकास, उपयोग और उपलब्धता का पता लगाता है। कपड़े और टेक्स्टाइल्स अलग-अलग समय में विभिन्न सभ्यताओं में उपलब्ध सामग्रियों और प्रौद्योगिकियों को दर्शाते हैं। एक समाज के भीतर इनका वितरण और विविधता सामाजिक रीति-रिवाजों और संस्कृति को प्रकट करते हैं। कपड़े पहनना विशेष रूप से एक मानवीय विशेषता है और अधिकांश मानव समाजों की एक विशेषता है। अंतिम हिम युग के बाद आदमी और औरत ने कपड़े पहनना शुरू किया। मानवविज्ञानी मानते हैं कि शुरूआती दौर में जानवरों की खाल और वनस्पतियों को ठंड, गर्मी और बारिश से सुरक्षा के रूप में उपयोग किया गया विशेषकर तब जब मानव ऐसे नए स्थानों में गए जहां मौसम प्रतिकूल था तथा खुद को इस मौसम से अनुकूलित करने के लिए उन्होंने जानवरों की खाल और वनस्पतियों का उपयोग किया। भारतीय उपमहाद्वीप में कपड़ों के इतिहास का पता सिंधु घाटी सभ्यता या उससे पहले के समय से लगाया जा सकता है। भारतीयों ने मुख्य रूप से स्थानीय रूप से विकसित कपास से बने कपड़े पहने हैं। भारत उन पहले स्थानों में से एक था जहाँ कपास की खेती की जाती थी और हड़प्पा काल के दौरान 2500 ईसा पूर्व तक भी इसका इस्तेमाल किया जाता था। प्राचीन भारतीय कपड़ों के अवशेष सिंधु घाटी सभ्यता के निकट के स्थलों से खोजी गयी मूर्तियों के साथ-साथ रॉक-कट (Rock-cut) मूर्तियों, गुफा चित्र, और मंदिरों और स्मारकों में मानव कला के रूप में पाया जा सकता हैं।

अधिकांश संस्कृतियों में, कपड़ों का लिंग भेद उचित माना जाता है। इन संस्कृतियों के कपडों में अंतर शैलियों, रंगों, फैब्रिक (Fabric) और उनके प्रकारों में भी हैं। पश्चिमी समाजों में, स्कर्ट, परिधान या ड्रेसेस (Dresses) और ऊँची एड़ी के जूते आमतौर पर महिलाओं के कपड़ों के रूप में देखे जाते हैं। वहीं नेकटाई (Neckties) को आमतौर पर पुरुषों के कपड़ों के रूप में देखा जाता है। ट्राउजर (Trousers) को कभी विशेष रूप से पुरुषों के कपड़ों के रूप में देखा जाता था, लेकिन आजकल महिलाओं द्वारा भी पहना जा सकता है। पुरुषों के कपड़े अक्सर अधिक व्यावहारिक होते हैं (अर्थात, वे विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में अच्छी तरह से काम कर सकते हैं), लेकिन महिलाओं के लिए कपड़ों की शैलियों की एक विस्तृत श्रृंखला उपलब्ध है। कुछ संस्कृतियों में, ऐसे कानून हैं जो यह निर्धारित करते हैं कि पुरुषों और महिलाओं को क्या पहनना आवश्यक है। इस्लाम में महिलाओं को विशिष्ट पोशाक अधिक सामान्य रूप पहनने की आवश्यकता होती है, आमतौर पर हिजाब (सिर ढकने के लिए)। महिलाओं को आमतौर पर पुरुषों की तुलना में अपने शरीर को अधिक ढंकना पड़ता है।

पूरे शरीर को ढकने के लिए उनके द्वारा बुर्का इस्तेमाल किया जाता है। दोनों लिंगों द्वारा पहने जाने वाले कपडों को यूनिसेक्स (Unisex) कपड़े कहा जाता है जैसे- टी-शर्ट (T-shirt)। कुछ समाजों में, कपड़ों का उपयोग रैंक (Rank) या स्थिति को इंगित करने के लिए किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, पारंपरिक हवाईयन समाज में, केवल उच्च श्रेणी के प्रमुख ही पंख वाले लबादे (Cloaks) और पलाओ (Palaoa), या नक्काशीदार व्हेल के दांत लगा सकते थे। चीन में, गणतंत्र की स्थापना से पहले, केवल सम्राट ही पीले रंग के कपडे पहन सकता था। कुछ धार्मिक कपड़ों को केवल धार्मिक समारोहों के प्रदर्शन के दौरान पहना जाता है। जैन और मुस्लिम पुरुष धार्मिक समारोहों को करते समय बिना सिले हुए कपड़े पहनते हैं। बिना सिला हुआ कपड़ा एकीकृत और पूर्ण भक्ति का प्रतीक है, जिसमें कोई विषयांतर नहीं है। सिख पगड़ी पहनते हैं क्योंकि यह उनके धर्म का एक हिस्सा है।

चित्र सन्दर्भ:
1. मुख्य चित्र में भारतीय पारम्परिक परिधान दिखाये गए हैं। (Prarang)
2. द्वितीय चित्र में चीन में कपडे का निर्माण है। (Wikimedia)
3. तीसरे चित्र में महात्मा बुद्ध के वस्त्रों को दिखाया गया है। (Pexels)
4. चौथे चित्र में राज रवि वर्मा में साड़ी , यक्षी धोती में, और सिंधु सभ्यता नासाग्र योगी चादर में दिख रहे हैं। (Prarang)
5. अंतिम चित्र में अंगाल में भारतीय पारम्परिक सूट पहने हुए एक कन्या दिख रही है। (Wikiwand)

संदर्भ:
1. https://gizmodo.com/when-did-humans-start-wearing-clothes-1299154403
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Clothing
3. https://en.wikipedia.org/wiki/History_of_clothing_in_the_Indian_subcontinent
4. https://en.wikipedia.org/wiki/History_of_clothing_and_textiles



RECENT POST

  • एक समय जब रेल सफर का मतलब था मिट्टी की सुगंध से भरी कुल्हड़ की स्वादिष्ट चाय
    म्रिदभाण्ड से काँच व आभूषण

     18-05-2022 08:47 AM


  • उत्तर प्रदेश में बौद्ध तीर्थ स्थल और उनका महत्व
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     17-05-2022 09:52 AM


  • देववाणी संस्कृत को आज भारत में एक से भी कम प्रतिशत आबादी बोल व् समझ सकती है
    ध्वनि 2- भाषायें

     17-05-2022 02:08 AM


  • बाढ़ नियंत्रण में कितने महत्वपूर्ण हैं, बीवर
    व्यवहारिक

     15-05-2022 03:36 PM


  • प्रारंभिक पारिस्थिति चेतावनी प्रणाली में नाजुक तितलियों का महत्व, लखनऊ में खुला बटरफ्लाई पार्क
    तितलियाँ व कीड़े

     14-05-2022 10:09 AM


  • लखनऊ सहित विश्व में सबसे पुराने और शानदार स्विमिंग पूलों या स्नानागारों का इतिहास
    य़ातायात और व्यायाम व व्यायामशाला

     13-05-2022 09:41 AM


  • भारत में बढ़ती गर्मी की लहरें बन रही है विशेष वैश्विक चिंता का कारण
    जलवायु व ऋतु

     11-05-2022 09:10 PM


  • लखनऊ में रहने वाले, भाड़े के फ़्रांसीसी सैनिक क्लाउड मार्टिन का दिलचस्प इतिहास
    उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

     11-05-2022 12:11 PM


  • तेजी से उत्‍परिवर्तित होते वायरस एक गंभीर समस्‍या हो सकते हैं
    कीटाणु,एक कोशीय जीव,क्रोमिस्टा, व शैवाल

     10-05-2022 09:02 AM


  • 1947 से भारत में मेडिकल कॉलेज की सीटों में केवल 14 गुना वृद्धि, अब कोविड लाया बदलाव
    आधुनिक राज्य: 1947 से अब तक

     09-05-2022 08:55 AM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.

    login_user_id