अत्यधिक महत्वपूर्ण है रमजान की लयलात-अल-कदर की रात

लखनऊ

 23-04-2020 06:30 AM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

इस्लाम धर्म किसी निश्चित समय और स्थानों को विशेष रूप से पवित्र बना देता है। ईश्वर पर विश्वास करने वाला कोई भी व्यक्ति ईश्वर को याद करने या उनकी महिमा करने के लिए किसी भी समय प्रार्थना कर सकता है, लेकिन कुछ समय अद्वितीय होते हैं तथा उनसे जुड़ा महत्व भी अनोखा होता है। लयलात अल-कदर (Laylat al Qadr) भी एक ऐसा ही पवित्र समय है, जिसे निर्णय की रात, शक्ति की रात, मूल्य की रात, भाग्य की रात आदि के रूप में जाना जाता है। यह रात इस्लाम के दृष्टिकोण को देखने के लिए किसी भी अन्य दृष्टिकोण के साथ तुलनीय नहीं है। कुरान के अनुसार इस एक रात में की गई उपासना के कृत्यों का प्रतिफल लगभग 83 वर्ष (1000 महीने) तक की गयी उपासना के प्रतिफलों से भी अधिक है। इस्लामी मान्यता के अनुसार यह वो रात है, जब कुरान को पहली बार स्वर्ग से दुनिया में भेजा गया और उसके पहले छंद या आयतें पैगंबर मोहम्मद को बताई गई। जैसा कि हम आज डिजिटल (digital) और भौतिकवादी विषमता के युग में रहते हैं, अक्सर उपासना का कार्य हमारी दिनचर्या में संक्षिप्त या बहुत कम हो जाता है, जिस कारण एक पूर्ण परिवर्तनकारी आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त नहीं हो पाता। गंभीर उपासना के लिए न केवल प्रार्थना करने हेतु एक संक्षिप्त क्षण की आवश्यकता होती है, बल्कि हमारी प्रार्थना को जीवन में हमारी दिशा को परिभाषित करने की अनुमति भी प्रदान होती है। इस प्रकार, इस्लाम गहन आध्यात्मिक अनुभवों के लिए अवसर प्रदान करता है। वे अनुभव जिसमें मनुष्य दुनिया (सांसारिक जीवन) और उसकी व्याकुलता से अलग हो जाता है। ऐसे अवसरों में से रमजान की रातें सबसे धन्य रातें हैं।

पैगंबर मोहम्मद ने कहा है, जो कोई भी विश्वास के साथ और प्रार्थना के फल की उम्मीद में रमजान की रातें बिताता है, उसके पिछले सभी पापों को माफ कर दिया जाता है। रमजान की आखिरी दस रातें इन्हीं सबसे महत्वपूर्ण अवसरों में से एक हैं। पैगंबर मोहम्मद रमज़ान के अंतिम दस दिनों की संपूर्णता के लिए इतिकाफ ( i`tikaf - मस्जिद में एकांतवास) का अभ्यास करते थे। अब तक ऐसा कोई दिन या रात नहीं है जिसकी तुलना लयलात अल- कदर जिसे निर्णय की रात कहा जाता है, से की जाए। कुरान का 97 वां अध्याय पूरी तरह से इस रात को समर्पित है। लयलात अल-कदर के लिए सटीक रात का उल्लेख नहीं किया गया है। पैगंबर मोहम्मद, ने भी कहा है कि 'रमज़ान की आखिरी दस रातों की विषम रातों में लयलात अल-कदर की खोज करें।' इस रात की सही तिथि को छुपाया गया ताकि मानव इसका लाभ प्राप्त करने की उम्मीद में पूरे महीने अल्लाह की उपासना और ध्यान करने का प्रयास कर सके और उनके इस अभ्यास को मजबूती मिले। इसलिए एक व्यक्ति के जीवनकाल और निर्णय के दिन के घंटे को भी छिपाया है, ताकि मानवता उनके प्रति सदभाव के साथ निरंतर अच्छे कार्यों में प्रयासरत रहे। इस्लामिक विद्वान लयलात अल-कदर के भिन्न-भिन्न अर्थ बताते हैं क्योंकि शब्द कदर कई प्रकार के अर्थ इंगित करता है जिसके अपने-अपने धार्मिक महत्व हैं। कुछ विद्वानों ने इस पवित्र रात के संदर्भ में कदर को नियति या फरमान के रूप में परिभाषित किया है, जिसका मतलब है कि यह वह रात है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की नियति तय की जाती है। आने वाले वर्ष के लिए व्यक्ति के जीवन काल और अन्य महत्वपूर्ण मामलों को निर्धारित कर दिया जाता है। इस रात को आने वाले वर्ष की तीर्थयात्रा को भी नीयत कर दिया जाता है।

कदर के अर्थ को 'शक्ति' के रूप में भी परिभाषित किया जाता है क्योंकि यह सम्मान और महानता को दर्शाता है। इस रात के दौरान किए गए धर्म कर्म किसी अन्य रात की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली होते हैं। इसे इनाम की रात भी कहा जाता है क्योंकि पैगंबर ने कहा था कि जो कोई भी इस रात के दौरान, विश्वास और आशा के साथ ईश्वर की उपासना करेगा उसे उपहार दिया जाएगा, उसके पाप माफ़ कर दिए जाएंगे। कदर शब्द 'प्रतिबंध' को भी संदर्भित करता है क्योंकि उपासना के दौरान कुछ नियमों का पालन भी करना होता है। कई मुस्लिम स्रोतों के अनुसार, लयलात अल-कदर इस्लामिक कैलेंडर के नौवें महीने रमजान के आखिरी दस दिनों की विषम संख्या वाली रातों में से एक थी। तब से मुसलमान समुदाय रमजान की आखिरी दस रातों को विशेष रूप से धन्य होने के रूप में मानता है। मुसलमानों का मानना है कि यह रात ईश्वर के आशीर्वाद और दया की प्रचुरता के साथ आती है, जिसमें पापों को क्षमा कर दिया जाता है, प्रार्थनाएं स्वीकार कर ली जाती हैं, और वार्षिक फरमान सुनाया जाता है। मोहम्मद ने कहा कि उनके लिए पहले रहस्योद्घाटन की सही तारीख पारंपरिक शिया तारीख, रविवार से सोमवार, 23 रमजान की रात थी। कुरान में लयलात अल-कदर की किसी विशिष्ट तिथि का उल्लेख नहीं किया गया है। सुन्नी इस्लाम कहता है कि ईश्वर अकेले ही मानव की प्रार्थनाओं का जवाब देता है और अकेले ही उन्हें प्राप्त करता है। वह मानव को क्षमा करता है और उन्हें वह देता है जो वे मांगते हैं। इसलिए इस विशेष रात में मुसलमानों को सक्रिय रूप से ईश्वर से क्षमा मांगनी चाहिए और पूजा के विभिन्न कार्यों में संलग्न होना चाहिए।

दुनिया भर के इस्लामिक देशों और सुन्नी समुदायों में, लयलात अल-कदर रमज़ान की आखिरी दस रातों में होती है, जो ज्यादातर विषम रातों (21 वें, 23 वें, 25 वें, 27 वें या 29 वें) में से एक होती है। कई परंपराएं विशेष रूप से रमजान की 27 वीं रात से पहले की रातों पर जोर देती हैं। शिया मुसलमान भी लयलात अल-कदर की रात को रमज़ान की आखिरी दस रातों में निहित मानते हैं, लेकिन रमज़ान की अधिकतर 19 वीं, 21 वीं या 23 वीं तारीख़ में से 23 वीं को सबसे महत्वपूर्ण रात माना जाता है। शिया विश्वास के अनुसार 19 वीं रात, को मिहराब में अली पर हमला किया गया था जब वे कूफ़ा की महान मस्जिद में इबादत कर रहे थे और 21 वीं रमजान में मृत्यु को प्राप्त हुए। मुसलमानों के मद्देनजर यह रात किसी भी अन्य रात के साथ तुलना करने योग्य नहीं है। इस रात के दौरान जो भी धार्मिक कार्य या प्रार्थना की जाती है वह पूरे जीवन भर की गयी उपासना से भी बहुत अधिक है। इन कार्यों का पुरस्कार लगभग 83 वर्ष (1000 महीने) की गयी उपासना के पुरस्कार से भी अधिक है।

चित्र (सन्दर्भ):
1.
मुख्य चित्र रमजान के महीने, उसकी पवित्रता, उसकी आस्था और प्रार्थना को इंगित कर रहा है।
2. दूसरा चित्र Laylat al Qadr (भाग्य की रात) को प्रदर्शित करने के लिए निर्मित कलात्मक अभिदृस्य है।
संदर्भ:
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Laylat_al-Qadr
2. https://bit.ly/3buKgyL



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