रामपुर रजा पुस्तकालय में संकलित लघु चित्र

लखनऊ

 23-03-2020 02:00 PM
द्रिश्य 3 कला व सौन्दर्य

रामपुर उत्तर प्रदेश का एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण जिला है जो की सांस्कृतिक धरोहरों का केंद्र है। यहीं पर भारत की सबसे खूबसूरत और बड़ी पुस्तकालय मौजूद है। यह पुस्तकालय अपने वास्तु के साथ ही साथ पुस्तकों के लिए भी जाना जाता है। रामपुर रजा पुस्तकालय इस्लामिक अध्ययन करने वालों के लिए जन्नत जैसी है। यहाँ पर अनेकों शोध विद्यार्थी पुस्तकों का अध्ययन करने देश विदेश से आते रहते हैं। इस पुस्तकालय में एक संग्रहालय भी बना है जो की पुरासम्पदाओं के साथ साथ नवाबों की वस्तुओं को भी प्रदर्शित करता है। इस पुस्तकालय में अनेकों दुर्लभ लघु चित्र भी उपलब्ध हैं जैसे की मंगोलियाई, फ़ारसी, राजपूत, पहाड़ी, अवध और ब्रितानी प्रकार के चित्रकारी आदि उपलब्ध हैं। ये सभी सचित्र पांडुलिपियाँ एक अत्यंत ही बहुमूल्य धरोहर हैं जो की रजा पुस्तकालय में सहेज कर रखी गयी हैं। इस लेख में हम लघु चित्रों के विषय में पढेंगे और साथ ही साथ रजा पुस्तकालय के लघु चित्रों के कार्यों की भी चर्चा करेंगे।

यदि लघु चित्रों के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे तो इनके अवशेष करीब 1000 इसा पूर्व तक जाता है। भारतीय लघु चित्रों में हिन्दू, जैन, बौद्ध आदि के प्राचीन धर्म ग्रंथों में हमें लघु चित्र दिखाई देते हैं कालान्तर में हमें इस्लाम के भी लघु चित्र देखने को मिल जाते हैं। शुरूआती दौर के बाद जब कागज़ का विकास हुआ तब मुग़ल कला का विकास शुरू हुआ था ऐसे समय में लघु चित्रों को कागज़ पर बनाने की प्रक्रिया का सूत्रपात हुआ था। यह 16 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एक अत्यंत ही तेजी के साथ विकसित होने वाली परंपरा बन गयी। इस दौर में मुग़ल सम्राटों द्वारा फारस से कलाकारों को बुलाया गया जिन्होंने इस कला का प्रसार किया। इस समय की चित्रों में प्राकृत के साथ साथ भौतिक दुनिया के वस्तुओं का भी समावेश किया गया था। भारत के दक्खन के इलाके में जो कला फैली उसे दक्खनी कला का नाम मिला और हिमाचल आदि के क्षेत्रों की कला को पहाड़ी और राजस्थान के सम्मेप्वर्ती इलाकों में फैली कला को राजपूत कला का नाम मिला। ये प्रत्येक कला के नमूनों का अपना एक अलग ही महत्व था तथा इनकी शैली भी पूर्ण रूप से एक दूसरे से भिन्न थीं। मुग़ल काल के दौरान लघुचित्रों में सुलेख परम्परा का भी समावेशन हमें देखने को मिलता है।

ब्रितानी (British) शासन के आगमन के बाद जो कला भारत के लघु चित्र कला के अन्दर समावेशित हुयी उसे भी हम 17-18 वीं शताब्दी के बाद से देखना शुरू करते हैं। इन लघु चित्रों में वाटर रंग, और प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता था। रामपुर रजा पुस्तकालय में करीब लघु चित्रों के 35 एल्बम हैं जो की करीब 5 हजार चित्रों का समावेश किये हुए हैं। यहाँ पर अकबर के काल का एक अत्यंत ही अनूठा एल्बम है जिसका नाम तिलिश्म है जिसमे कुल 157 लघुचित्र अंकित हैं। जैसा की नाम से ही विदित होता है इसमें जादू, ज्योतिष आदि का वर्णन किया गया है। यहाँ पर सूफी संतों की भी एलबम्स रखी गयी हैं जिनमे कई महान संतों का अंकन किया गया है। रागमाला नामक एक अत्यंत मूल्यवान एल्बम यहाँ के संग्राह में है जो की 35 राग रागनियों का वर्णन करता है। यह 17 वीं शताब्दी में चित्रित किया गया था तथा इसकी शैली मुग़ल है। इस के साथ ही साथ यहाँ पर अन्य देश जैसे मंगोलिया आदि के भी चित्रों का संग्रहण हमें देखने को मिलता है।

सन्दर्भ :
1.
http://razalibrary.gov.in/MiniaturePaintings.html
2. https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_art#Miniature_painting
3. https://www.britannica.com/art/miniature-painting



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