क्या है इस्लाम में तकवा का महत्त्व?

लखनऊ

 17-01-2020 10:00 AM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

इस्लाम वर्तमान में दुनिया का एक प्रमुख धर्म है जो कि कुरान के अनुसार आगे बढ़ने की प्रेरणा पर आधारित है। कुरान में विभिन्न विषयों पर लिखा गया है, इन्हीं विषयों में से एक है ‘तकवा’। इस लेख में हम तकवा के विषय में पढ़ेंगे और यह भी जानने की कोशिश करेंगे कि इसका महत्व इस्लाम में क्या है। कुरान में लगभग 250 बार से अधिक तकवा के बारे में लिखा गया है। अबू अल-अला मवदूदी ने तकवा को परिभाषित करते हुए बताया है कि तकवा ईश्वर चेतना के प्रति मूल इस्लामी सिद्धांत है, जो कि भाई-चारे, समानता, निष्पक्षता, और न्याय पर आधारित है, जिस पर इस्लामिक समाज स्थापित है। सैय्यद क़ुतुब ने कुरान पर अपनी राय में तकवा को थोड़ा और विस्तार देते हुए इसमें राजनीतिक सक्रियता पर भी ज़ोर दिया है। फज़लुर रहमान ने इसे कुरान की सबसे महतवपूर्ण एकल अवधारणा के रूप में पहचाना है जो कि एक आंतरिक दृष्टि है जो मनुष्यों को उनकी कमज़ोरियों को दूर करने में मदद करती है।

कुरान में तकवा को लेकर विस्तृत रूप में चर्चा की गयी है और यह समझाने का प्रयास किया गया है कि तकवा का अर्थ पवित्रता तक सीमित नहीं है, यह तो इससे बहुत परे हैं। यह जीवन के हर पहलू में शामिल है, यह हमारी मान्यताओं, आत्म जागरूकता, और द्रष्टिकोण का संयोजन है। इसी में आगे लिखा है कि धार्मिक होने का तात्पर्य सिर्फ भगवान की आज्ञा का पालन करने तक सीमित नहीं है बल्कि जीवन के हर पहलू में नैतिक होना ज़रुरी है जिसको कि कुरान की निम्नलिखित आयत के माध्यम से समझ सकते हैं: “हे, तुम सभी जो मानते हो! जब आप गुप्त परामर्श देते हैं, तो यह पाप और गलत करने के लिए, और रसूल (मोहम्मद स.अ.व.) के प्रति अवज्ञा करने के लिए नहीं करना चाहिए, लेकिन इसे अल-बिर (धार्मिकता) और तकवा (गुण और पवित्रता) के लिए करना चाहिए, और अल्लाह से डरो, जिसमें आप सभी अंत में समा जाएंगे।” (कुरान, 58:9) इस आयत से यह पता चलता है कि तकवा ईमानदारी, शालीनता और सही और गलत के बीच के अंतर को जानने के रास्ते प्रशस्त करता है, इसमें न केवल अल्लाह का डर शामिल है परन्तु उनके द्वारा दिए गये सभी आदेशों में अल्लाह की चेतना, उनका सभी दिशाओं में अभिनव शामिल है।

अगर थोड़ा और विस्तृत रूप में देखा जाये तो तकवा मुसलमान और अल्लाह की नाराज़गी के बीच एक बाधा के रूप में कार्य करता है। हदीस में पैगम्बर ने कहा है कि “अल्लाह से डरना चाहिए क्योंकि यह सभी अच्छाइयों का संग्राह है”। हदीस में वर्णित इस वाक्य का मतलब इस तरह निकाल सकते हैं कि अगर हम सफल होना चाहते हैं, अगर हम अल्लाह का आशीर्वाद पाना चाहते हैं तो हमको अल्लाह से डरते रहना चाहिए और उन नेक कामों को करते रहना चाहिए जो अल्लाह को खुश करने के स्रोत हों। इसी तरह का विवरण हमें सुन्नत में भी मिलता है जिसमें कहा गया है कि अल्लाह सर्वशक्तिमान हैं, जो कुछ इस धरती पर है वो सब अल्लाह का है, वे सभी प्रंशसा के योग्य हैं, उनके आदेशों का पालन करके ही खुद को नर्क से बचाया जा सकता है।

संदर्भ:
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Taqwa
2. http://www.oxfordislamicstudies.com/article/opr/t125/e2340
3. http://www.quranreading.com/blog/importance-of-taqwa-in-islam-and-its-benefits-from-quran/



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