लुप्तप्राय भारतीय पक्षी प्रजातियाँ एवं उत्तर प्रदेश में इनके लिए किये गए प्रबंध

लखनऊ

 15-05-2019 11:00 AM
पंछीयाँ

प्राचीन काल से ही भारत विविधताओं का देश रहा है चाहे वह विविधता मनुष्यों में हो या जीव जंतुओं में। किन्तु वर्तमान में कुछ भौतिक और रासायनिक कारणों के फलस्वरूप इन विविधताओं में कमी आती नज़र आ रही है। आपने अपने बुजुर्गों से जीव जंतुओं की ऐसी प्रजातियों के बारे में तो सुना ही होगा जो पहले तो आसानी से पाई जाती थीं किन्तु आजकल कहीं नजर नहीं आ रही हैं। ऐसी प्रजातियां जो आज विलुप्त होने की कगार पर हैं या जिनके विलुप्त होने की संभावना बनी हुई है, लुप्तप्राय प्रजाति के नाम से जानी जाती हैं। प्रकृति के सौंदर्य को बढ़ाने वाले कुछ भारतीय रंगीन पक्षी भी विलुप्त होने की कगार पर खड़े हैं। दिन पर दिन कम हो रही इनकी संख्या और इनकी दुर्लभता इनके विलुप्त होने का उदाहरण है। ऊपर दिए गये चित्र में येलो वीवर और मैंग्रोव पिट्टा को द्रश्यान्वित किया गया है। ऊपर दिए गये चित्र में भारतीय डाक टिकट को दिखाया गया है जिसके ऊपर भारतीय मैंग्रोव पिट्टा (नवरंग) चित्रित है।

भारत के कुछ दुर्लभ और लुप्तप्राय पक्षियों की सूची निम्न प्रकार से है:
उपरोक्त चित्र गौल्ड और रिक्टर द्वारा सन 1850-1854 के मध्य बनाये गये चित्रों में से एक है जिसमे मैन्ग्रोव पिट्टा चित्रित किया गया है।
1. मैंग्रोव पिट्टा (Mangrove Pitta): विशिष्ट नारंगी-पीले स्तन, हरे-नीले पंखों और लाल पूंछ के कारण यह रंगीन छोटा पक्षी आसानी से दूर से ही पहचान लिया जाता है। किन्तु निवास स्थान उपलब्ध न होने के कारण अब यह पक्षी दुर्लभ होता जा रहा है।
2. रेड जंगल फाउल (Red Jungle Fowl): यह पक्षी भारतीय जंगलों विशेषकर पश्चिमी घाट पर पाए जाते हैं। इस पक्षी के लम्बे, सुनहरे-नारंगी से लेकर गहरे लाल रंग के पंख हो सकते हैं।
3. येलो वीवर (Yellow Weaver): उत्तर-पूर्व भारत के छोटे इलाकों में पाये जाने वाले इस चमकीले रंग के पक्षी की आबादी बहुत कम होती जा रही है, क्योंकि दलदली घास के मैदानों में पाए जाने वाले इस पक्षी का निवास स्थान कृषि भूमि में परिवर्तित हो गया है।
ऊपर दिया गया चित्र अलेक्जेंड्रीन पैराकीट को दर्शाता है।
4. अलेक्जेंड्रीन पैराकीट (Alexandrine Parakeet): हरे, लाल और गुलाबी रंग का यह पक्षी मूल रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया का है, लेकिन विदेशी पालतू व्यापार के कारण यह कई यूरोपीय शहरों में भी देखने को मिल जाता है। यह अधिक दुर्लभ नहीं है किन्तु इनको पालतू जानवरों के रूप में बेचा जा रहा है।
ऊपर दिए गये चित्र में नीलगिरि फ्लाईकैचर को दिखाया गया है।
5. नीलगिरि फ्लाईकैचर (Nilgiri Flycatcher): सुन्दर नीले रंग का यह पक्षी भारत के पश्चिमी घाटों के सीमित क्षेत्रों में पाया जाता है और अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए यह पूरी तरह पश्चिमी घाट पर निर्भर है।
6. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (Great Indian Bustard): यह प्रतिष्ठित प्रजाति अब केवल भारत में ही पाई जाती है और यदि इसके संरक्षण के उपाय नहीं किये गए तो संभवतः इस पीढ़ी में विलुप्त होने वाली यह पहली प्रजाति होगी।
7. ऑस्टन ब्राउन हॉर्नबिल (Austen’s Brown Hornbill): यह एक अत्यंत दुर्लभ प्रजाति है, जो केवल पूर्वोत्तर क्षेत्रों की ब्रह्मपुत्र घाटी की सीमा वाले पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है। निवास स्थान के नुकसान के कारण इनकी संख्या में तेज़ी से कमी आ रही है।

इसी प्रकार गाउल्डस शॉर्टविंग (Gould’s Shortwing), वायनाड़ लाफिंगथ्रश (Wynaad Laughingthrush), बुगुन लियोइक्ला (Bugun Liocichla), ब्रॉड टेल्ड ग्रासबर्ड (Broad-tailed Grassbird), ग्रेटर एडजुटेंट (Greater Adjutant), बंगाल फ्लोरिकन (Bengal Florican) आदि भारत की ऐसी अन्य प्रजातियां हैं जो संभवतः विलुप्त होने की कगार पर हैं।

इन पक्षियों के संरक्षण के लिए देश भर में कई पक्षी अभयारण्य बनाये गए हैं जहां इन जीवों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जाती है तथा किसी भी प्रकार का मानव हस्तक्षेप जो इनकी आबादी को प्रभावित करता हो, प्रतिबंधित कर दिया जाता है। संरक्षण के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश में भी कुछ पक्षी अभ्यारण्यों का निर्माण किया गया है जहां आपको ये लुप्तप्राय प्रजातियां देखने को मिल सकती हैं। इन पक्षी अभ्यारण्यों के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं:
1990 में स्थापित पावर्ती अरगा पक्षी अभयारण्य (गोंडा)।
1990 में स्थापित विजय सागर पक्षी अभयारण्य (महोबा, हमीरपुर)।
1991 में स्थापित सुरहताल पक्षी अभयारण्य (बलिया)।
1991 में स्थापित सुरसरोवर पक्षी अभयारण्य (आगरा)।
2003 में स्थापित भीमराव अम्बेडकर पक्षी अभयारण्य (बाएती, कुंडा, प्रतापगढ़)।
1980 में स्थापित बखिरा पक्षी अभयारण्य (संतकबीर नगर)।
1990 में स्थापित सांडी पक्षी अभयारण्य (हरदोई)।
झील बहोसी (Lake Bahosi) अभयारण्य (कन्नौज) जहां पक्षियों की 49 प्रजातियां निवास कर रही हैं।
उन्नाव जिले में स्थित नवाबगंज अभयारण्य, जिस पर 250 से अधिक प्रवासी प्रजातियां आश्रित हैं।
1991 में स्थापित एटा जिले में स्थित पटना पक्षी अभयारण्य जहां 300 विभिन्न प्रजातियों के लगभग 2,00,000 पक्षी निवास करते हैं।
1990 में स्थापित मैनपुरी जिले में स्थित समन अभयारण्य जो अपनी पक्षी सफारी के लिए जाना जाता है।
1987 में स्थापित समसपुर पक्षी विहार (रायबरेली)।

लुप्तप्राय प्रजाति परियोजना की पहल के तहत सांडी पक्षी अभयारण्य और नवाबगंज अभयारण्य के तालाबों में जल स्तर को 1.75 मीटर से अधिक बढ़ाया गया, जिससे पक्षियों को पीने के लिये पर्याप्त पानी उपलब्ध हो सके। उत्तर प्रदेश के ये अभ्यारण्य पक्षियों के प्राकृतिक आवास और जलीय वनस्पतियों का संरक्षण करने में सहायक हैं।

संदर्भ:
1. http://indiasendangered.com/photos-10-rare-and-colorful-birds-of-india/
2. https://bit.ly/2WLyCIg
3. https://en.wikipedia.org/wiki/Category:Bird_sanctuaries_of_Uttar_Pradesh
4. https://www.uponline.in/about/tourism/bird-sanctuaries-in-uttar-pradesh
5. https://bit.ly/2VBqEVv

चित्र सन्दर्भ:
1.
https://enacademic.com/dic.nsf/enwiki/6850129
2. https://bit.ly/2YsxHgf



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