लखनऊ में पीढ़ी दर पीढ़ी कला का हस्‍तांतरण

लखनऊ

 15-04-2019 02:47 PM
द्रिश्य 2- अभिनय कला

भारत समृद्ध संस्कृति तथा विरासत से सम्पन्न देश है। हमारी सभ्यता के आरंभ से ही संगीत, नृत्य, नाटक हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग रहे हैं और प्रारंभिक दौर में यह कला के अंग धर्म और समाज सुधार आंदोलनों को प्रसारित करने का माध्यम थे। इन कलाओं का उद्देश्य अपने दर्शकों तक संदेश और भावनाओं को पहुँचाना है। रंगमंच की दुनिया भी इन्हीं कलाओं में से एक है। प्रतिवर्ष 27 मार्च को विश्व रंगमंच ‘थिएटर’(Theatre) दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 1961 में अंतर्राष्ट्रीय थिएटर/रगमंच संस्थान (ITI) जो एक यूनेस्को से संबंधित गैर सरकारी संगठन है, द्वारा की गई थी। इस दिन कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

प्रत्येक वर्ष, ITI द्वारा नाट्यशास्त्र के क्षेत्र में अपने विचारों को रंगमंच पर साझा करने के लिए एक प्रतिष्ठित व्यक्ति को भी आमंत्रित किया जाता है जो लोगों को रंगमंच के विषय और संस्कृति के बारे में बोलता और प्रेरित करता है और पूरी दुनिया में संदेश प्रसारित करता है। यह कहना कठिन है कि रंगमंच या नाटक कब शुरू हुआ और पहली बार कब इसका प्रदर्शन हुआ, किंतु यह माना जा सकता हैं कि इनका उल्लेख सबसे पुराने ग्रंथों में मिलता है, तो ये कहा जा सकता है कि थिएटर/रंगमंच शताब्दियों से हमारे समाज का हिस्सा रहे है। माना जाता है कि भरत मुनि का नाट्य शास्त्र (लगभग 225 ईसा पूर्व) दुनिया में नाटकों के अवतरण का पहला चरण है। नाटकों का उल्लेख हमें अरस्तू(Aristotle) के काव्यशास्त्र पोयटिक्स' (Poetics) में भी मिलता है।

भारत में रंगमंच का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। ऐसा समझा जाता है कि नाट्यकला का विकास सर्वप्रथम भारत में ही हुआ। भारत में नाटक की रचना और नाट्यकला के विकास का श्रेय भरत मुनि के नाट्य शास्त्र को दिया जाता है। इसके अलावा कालीदास के संस्कृत नाटक तो नाट्य कला के स्वर्ण स्तम्भ माने जाते है। वत्स राज 12वीं शताब्दी के प्रसिद्ध नाटककार थे, उन्होनें “समुद्र मंथन” और “रूक्मिणी हरण” नाटकों के माध्यम से इस क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

इन नाट्य कलाओं पर स्थानिय बोली और संस्कृति का बहुत प्रभाव पड़ा जिसके परिणाम स्वरूप भिन्न-भिन्न राज्यों में अनेक प्रकार की नाट्य कलाएं विकसित हुई जैसे:
नौटंकी (कानपुर, लखनऊ‌): परंपरागत रूप से यह एक पुरुष पेशा रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में महिलाओं ने भी एक महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया है।
तमाशा (महाराष्ट्र): इस नाटक में आंदोलनों का मुख्य प्रतिपादक पुरुष अभिनेताओं की बजाय अभिनेत्री द्वारा किया जाता है।
माच (मध्य प्रदेश): इस कला में ऊँचे और खुले मंच पर अभिनीत की जाने वाली नाट्य प्रस्तुतियाँ दिखाई जाती हैं।
कूडियात्तम (केरल): कूडियात्तम केरल में रंगमंच की दुनिया में सबसे पहले जन्मी कला मानी जाती हैं। इसमें विदुषक पुरूष पात्र और नानगिर महिला पात्रों की भूमिका निभाते हैं।

इनके अलावा दशावतार (गोवा), भवई (गुजरात), भांड पाथेर (कश्मीर), स्वांग (रोहतक और हाथरस) आदि भी लोकप्रिय नाट्य कलाएं हैं।

यदि लखनऊ की बात की जाये तो यहां भी नाट्य कलाओं को काफी सराहा गया है। अवध के बादशाह नसीरूद्दीन हैदर के शासन काल को नाट्य कला के पुर्नजन्म का युग कहा जाता है।यह पूर्णरूप से नाटक नही थे, इन्हे “जलसा” के नाम से भी जाना जाता था, जिसमें जलसेवालियां नाच, गाने, हाव भाव के माध्यम से अभिनय किया करती थी। किंतु यह सार्वजनिक रूप से ना होकर जनता से छिपाकर किये जाते थे। जबकि जनता नाटक स्‍वांग या नटी के तमाशे से ही संतुष्‍ट रहती थी। अवध सल्‍तनत में जाने आलम का समय कला के विकास का समय था, इस दौरान लोगों ने “शाही स्‍टेज” के माध्‍यम से हिन्‍दुस्‍तानी नाट्य शैली को प्रस्‍तुत करना प्रारंभ कर दिया था। इसमें कैसर बाग में खेला जाने वाला ‘राधा कन्‍हैया रहस’ काफी प्रसिद्ध था।

उन्‍नसवीं सदी के मध्‍य में ही मिर्जा अमानत की “इन्‍दर सभा” भी लखनऊ में काफी लोकप्रिय हई। वास्‍तव में यह जनता द्वारा जनता के लिए पेश किया जाता था। इन्‍दर सभा के प्रदर्शनों ने जनता के मध्‍य नाटकों को लोकप्रिय बनाने का कार्य किया और लखनऊ में नाट्य कला चल पड़ी। किंतु इन्‍द्र सभा कोई वास्‍तविक मुकाम हासिल नहीं कर पायी। ब्रिटिश काल के दौरान लखनऊ में भृतहरि, दिलदार नगीना और स्‍वांग सपेरा प्रमुख लोक नाट्य के रूप में उभरे। जो गांधी जी के असहयोग आंदोलन के दौरान कहीं विलुप्‍त हो गये, क्‍योंकि अब जनता का ध्‍यान असहयोग आंदोलन की ओर चला गया था। उन्‍नीसवीं सदी में करीमजी की ओरिजनल थियेट्र‍िकल कंपनी का बोल बाला था, इसमें पारसी कलाकारों का भारी जमघट था। बाद में इस कंपनी के कलाकारों ने कंपनी को दो भागों में विभाजित कर दिया। आगे चलकर लखनऊ में कई नाटककार भी उभरे जिनके नाटक लोगों के मध्‍य काफी लोकप्रिय हुए। जिनमें से एक सैयद मेहदी हसन का ‘चन्‍द्रावली’ नाटक था, जिसने पूरे देश में तहलका मचा दिया। इसी नाटक की नकल पर आगा हश्र कश्मीरी ने 1897 में अपना पहला नाटक लिखा । उनकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं:

    1. अर्ज वो अर्ज कि जिसमें कोई इसरार न हो। 

    बात वो बात कि जिस बात से इनकार न हो।।


      2. गिलासों में जो डूबे, फिर ना उभरे जिंदगानी में।

    हजारों बह गये, इन बोतलों के बंद पानी में।।

    प्रथम विश्‍व युद्ध ने इन नाटकों की दुनिया को नया मोड़ दिया, लोग अब काल्‍पनिक दुनिया से बाहर निकलकर वा‍स्‍तविक जगत अर्थात सामाजिक, राजनीतिक और राष्‍ट्रवादी परिप्रेक्ष्‍य पर बने नाटकों की ओर रूचि लेने लगे। 1922 में थियेटरों ने फिल्‍म जगत की ओर रूख किया, जिसमें मेडेन थियेट्र‍िकल कंपनी ने अहम भूमिका निभाई। लखनऊ के नाटकों के नये स्‍वरूपों और सार शेली के बावजूद परंपरागत नाटकों और नौटंकी को संरक्षण दिया गया है जिसके लिए तमाम नाट्य संस्‍थाएं बराबर प्रयासरत हैं। यहां की कला ने समय के साथ खुद को काफी बदला और हमेशा ही समाज का मनोरंजन करने के साथ ही उसे शिक्षित करने का काम भी किया है।

    संदर्भ:
    1. http://lucknowobserver.com/world-theatre-day/
    2. https://epustakalay.com/book/4144-aap-ka-lucknow-by-yogesh-pravin/
    चित्र सन्दर्भ:-
    1. https://farm1.staticflickr.com/856/40814494094_83a72a35c5_b.jpg



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