Writer:
Stephen Markel, Tushara Bindu Gude, Muzaffar Alam, Los Angeles County Museum of ArtPublisher:
Los Angeles County Museum of ArtTags:Art Objects - Art/Beauty
2.
WAILING BEAUTY : The Perishing Art of Nawabi Lucknow
Writer:
Sir William Henry Sleeman, Peter Denis REEVESPublisher:
Saiyed Anwer AbbasTags:Art Objects - Art/Beauty
भारत छोड़कर विदेशों में क्यों पढ़ रहे हैं देश के 18 लाख छात्र?
शिक्षा किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत और व्यावसायिक विकास की सबसे मज़बूत नींव होती है। आज के समय में दुनिया भर के छात्र बेहतरीन अकादमिक प्रशिक्षण प्राप्त करने की आकांक्षा रखते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बजाय विदेशों में पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई है। राजधानी लखनऊ सहित देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों से युवा अब अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार अपने सपनों की उड़ान भर रहे हैं। यह एक ऐसा चलन है जो बेहतर अकादमिक अवसरों, वैश्विक एक्सपोज़र, उन्नत शोध सुविधाओं और शानदार करियर संभावनाओं के कारण लगातार गति पकड़ रहा है।क्या कह रहे हैं विदेश जाने वाले छात्रों के ताज़ा आँकड़े?भारतीय छात्रों का विदेश जाने का यह चलन केवल एक मामूली बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक बूम है। भारत सरकार के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या महज़ 2,60,000 थी। वर्ष 2022 में यह संख्या बढ़कर 7,52,000 हो गई और 2023 में यह लगभग 8,95,000 तक पहुँच गई। 2025 की शुरुआत तक कुल 18 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यह आँकड़ा भारतीय छात्रों और उनके परिवारों की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं और बदलती प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। सबसे अधिक छात्र विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग, गणित और बिज़नेस प्रबंधन की पढ़ाई के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे देशों का चुनाव कर रहे हैं।भारतीय छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों को क्यों चुन रहे हैं?विदेशी विश्वविद्यालयों को चुनने का सबसे बड़ा कारण वहाँ की शिक्षा की उच्च गुणवत्ता है। अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों के शीर्ष विश्वविद्यालय विश्वस्तरीय फैकल्टी, उन्नत पाठ्यक्रम और शानदार शोध सुविधाएँ प्रदान करते हैं। इसके विपरीत, भारत में प्रतिष्ठित संस्थान होने के बावजूद, कई विश्वविद्यालय आज भी पुराने पाठ्यक्रम, नवाचार की कमी और ऐसी परीक्षा प्रणाली से जूझ रहे हैं जो व्यावहारिक ज्ञान के बजाय रटने पर ज़ोर देती है।शोध और विकास के क्षेत्र में भी विदेशी देश काफी आगे हैं। अमेरिका और जर्मनी जैसे देश शोध पर अपनी जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं, जबकि भारत का शोध बजट इसके मुक़ाबले काफी कम है। भारतीय विश्वविद्यालयों में अक्सर लालफीताशाही, सीमित फंडिंग और बुनियादी ढाँचे की कमी के कारण शोध कार्य प्रभावित होते हैं। इसके अलावा, विदेशी विश्वविद्यालयों में छात्रों को अपनी रुचि के अनुसार विषय चुनने की पूरी आज़ादी होती है। वहां का पाठ्यक्रम लचीला होता है, जो छात्रों की रचनात्मकता को बढ़ावा देता है। भारत में शिक्षा प्रणाली अक्सर कठोर होती है, जहाँ छात्रों को अपने मुख्य क्षेत्र से हटकर अन्य विषय पढ़ने की ज़्यादा छूट नहीं मिलती।क्या भारत के शीर्ष संस्थानों में सीटों की कमी एक बड़ा कारण है?भारत में आईआईटी, आईआईएम और एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थान मौजूद हैं, लेकिन इनमें प्रवेश पाना किसी लोहे के चने चबाने से कम नहीं है। सीटों की भारी कमी और बढ़ती प्रतिस्पर्धा छात्रों के लिए एक बड़ा तनाव बन चुकी है। वर्ष 2024 के आँकड़ों पर नज़र डालें तो लगभग एक लाख अस्सी हज़ार छात्रों ने परीक्षा दी, जिनमें से अड़तालीस हज़ार से अधिक छात्रों ने जेईई एडवांस पास किया। लेकिन पूरे देश के तेईस आईआईटी में केवल सत्रह हज़ार सात सौ चालीस सीटें ही उपलब्ध थीं। इसका मतलब है कि हर एक सीट के लिए कई योग्य उम्मीदवार कतार में थे।यही हाल आईआईएम का भी है। कैट परीक्षा में बैठने वाले दो लाख से अधिक छात्रों के लिए सभी आईआईएम को मिलाकर केवल पचपन सौ सीटें ही मौजूद होती हैं। कई शीर्ष संस्थानों में तो स्वीकृति दर एक प्रतिशत से भी कम है। इस भयंकर प्रतिस्पर्धा के कारण योग्य छात्र भी प्रवेश पाने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में विदेशों में शिक्षा प्राप्त करना एक पारदर्शी और सुलभ विकल्प बन जाता है। विदेशी संस्थानों में न केवल पर्याप्त सीटें होती हैं, बल्कि उनकी प्रवेश प्रक्रिया भी केवल अंकों पर निर्भर न होकर छात्र के संपूर्ण व्यक्तित्व, साक्षात्कार और अतिरिक्त गतिविधियों पर आधारित होती है।विदेशी शिक्षा प्रणाली भारतीय प्रणाली से कैसे अलग है?विदेशी शिक्षा, विशेष रूप से अमेरिकी और यूरोपीय शिक्षा मॉडल, भारतीय रट्टा-मार प्रणाली से बिल्कुल अलग है। वहाँ थ्योरी से ज़्यादा प्रायोगिक शिक्षा पर ज़ोर दिया जाता है। अमेरिकी शिक्षा मॉडल में छात्रों को किसी एक विषय में विशेषज्ञता हासिल करने से पहले कई अलग-अलग विषयों को एक्सप्लोर करने का मौका दिया जाता है।कक्षाओं में केवल निष्क्रिय रूप से बैठकर लेक्चर सुनने के बजाय केस स्टडी, इंटर्नशिप, लाइव प्रोजेक्ट और सामुदायिक असाइनमेंट पर काम करवाया जाता है। छात्र का मूल्यांकन किसी एक अंतिम परीक्षा के आधार पर नहीं होता, बल्कि पूरे सेमेस्टर के दौरान उसकी भागीदारी, प्रेजेंटेशन और प्रोजेक्ट्स के आधार पर होता है। इसके अलावा, एक अंतरराष्ट्रीय कक्षा में पढ़ाई करने से छात्रों को विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के साथ संवाद करने का मौका मिलता है। इससे उनका वैश्विक नज़रिया विकसित होता है और वे वास्तविक दुनिया की समस्याओं को सुलझाने के लिए बेहतर तरीके से तैयार होते हैं।क्या विदेशों में पढ़ाई करने के बाद बेहतर करियर विकल्प मिलते हैं?यह एक स्थापित तथ्य है कि एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय से डिग्री हासिल करने वाले छात्र की नौकरी पाने की संभावना काफी बढ़ जाती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता देती हैं जिनके पास अंतरराष्ट्रीय अनुभव और विविध कौशल होते हैं। ग्लोबल मोबिलिटी डेटा के अनुसार, विदेशी विश्वविद्यालयों से स्नातक करने वाले भारतीय छात्रों का शुरुआती वेतन भारतीय संस्थानों से पढ़े छात्रों की तुलना में काफी अधिक होता है।उदाहरण के लिए, अमेरिका में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर का शुरुआती वेतन औसतन तिरासी लाख से लेकर सवा करोड़ रुपये सालाना तक हो सकता है। इसके अलावा, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे देश पढ़ाई के बाद एक से तीन साल तक का वर्क वीज़ा देते हैं। ब्रिटेन के ग्रेजुएट रूट और कनाडा के एक्सप्रेस एंट्री जैसे विकल्पों के ज़रिए भारतीय छात्र विदेश में काम करने का अनुभव हासिल करते हैं और धीरे-धीरे स्थायी निवास तक का सफर तय कर लेते हैं।विदेश में पढ़ाई के दौरान छात्रों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?विदेश में पढ़ाई करना एक शानदार अवसर है, लेकिन यह चुनौतियों से खाली नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय होती है। अमेरिका या ब्रिटेन में ट्यूशन फीस और रहने का खर्च मिलाकर सालाना पंद्रह से चालीस लाख रुपये तक लग सकते हैं। हालांकि जर्मनी जैसे देशों में पब्लिक विश्वविद्यालयों में ट्यूशन फीस न के बराबर है, फिर भी वीज़ा, यात्रा और स्वास्थ्य बीमा जैसे खर्च बजट को बढ़ा देते हैं।पैसे के अलावा, छात्रों को भारी भावनात्मक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। परिवार से दूर रहने के कारण होमसिकनेस यानी घर की याद आना एक आम समस्या है। एक बिल्कुल नई संस्कृति, अलग खान-पान, नया मौसम और नए लोगों के बीच तालमेल बिठाना शुरुआत में काफी मुश्किल होता है। वीज़ा नियमों में अचानक होने वाले बदलाव और पार्ट-टाइम नौकरी खोजने का संघर्ष भी छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालता है।सरकारी स्कॉलरशिप और लोन योजनाएं छात्रों की कैसे मदद कर रही हैं?विदेश में पढ़ाई का खर्च उठाना हर परिवार के बस की बात नहीं है, लेकिन भारत सरकार की कई स्कॉलरशिप और लोन योजनाओं ने इस राह को आसान बना दिया है। इन योजनाओं के कारण अब होनहार छात्रों को पैसों की कमी के चलते अपने सपने नहीं छोड़ने पड़ते।भारत सरकार की नेशनल ओवरसीज स्कॉलरशिप एक ऐसी ही प्रमुख योजना है, जो अनुसूचित जाति, घुमंतू जनजातियों और भूमिहीन खेतिहर मज़दूरों के बच्चों को विदेशों में मास्टर डिग्री या पीएचडी करने के लिए दी जाती है। इसमें ट्यूशन फीस से लेकर रहने का खर्च, हवाई किराया और बीमा तक सब कुछ कवर किया जाता है। इसी तरह डॉक्टर अंबेडकर ब्याज सब्सिडी योजना अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के छात्रों के लिए है। इस योजना के तहत सरकार छात्र द्वारा लिए गए एजुकेशन लोन पर पढ़ाई की अवधि के दौरान लगने वाले ब्याज का भुगतान करती है।अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों के लिए पढ़ो परदेस योजना चलाई जाती है, जो एजुकेशन लोन पर ब्याज सब्सिडी प्रदान करती है। इसके अलावा जेएन टाटा एंडोमेंट लोन और फुलब्राइट-नेहरू फेलोशिप जैसी योजनाएं भी मेधावी छात्रों को आर्थिक सहायता प्रदान करती हैं। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद भी कई तरह के सांस्कृतिक और शैक्षिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों के तहत छात्रों की मदद करती है।इन स्कॉलरशिप को पाने के लिए छात्रों को बहुत पहले से तैयारी करनी होती है। सही विश्वविद्यालय का चुनाव, एक मज़बूत स्टेटमेंट ऑफ पर्पस लिखना और समय सीमा के भीतर आवेदन करना बहुत ज़रूरी होता है। आज कई संस्थान और कंसल्टेंसी भी छात्रों को इन स्कॉलरशिप को हासिल करने में पूरी मदद कर रहे हैं।निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि भारतीय छात्रों का विदेश जाने का यह रुझान तब तक जारी रहेगा जब तक भारतीय शिक्षा प्रणाली में बुनियादी और ढाँचागत सुधार नहीं किए जाते। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस भारत में खोलने और शिक्षा बजट बढ़ाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। यदि ये सुधार ज़मीनी स्तर पर सफल होते हैं, तो भविष्य में भारत भी शिक्षा के एक बड़े वैश्विक केंद्र के रूप में उभर सकता है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2y4swa8w 2. https://tinyurl.com/2ywacp3x 3. https://tinyurl.com/yre7y42q 4. https://tinyurl.com/26epvdwq 5. https://tinyurl.com/23hpxs46 6. https://tinyurl.com/2cfn55up
वन
क्या जापानी मियावाकी तकनीक कंक्रीट के शहरों को ठंडे जंगलों में बदल सकती है?
जैसे-जैसे शहरीकरण खुले हरे स्थानों की जगह कंक्रीट के जंगलों में बदल रहा है, लखनऊ जैसे शहर बढ़ते तापमान और गिरती वायु गुणवत्ता का सामना कर रहे हैं। इन आधुनिक शहरी चुनौतियों के बीच केवल सजावटी पेड़ लगाना पर्याप्त नहीं रह गया है; अब हमें ऐसे जीवित पारिस्थितिक तंत्र की आवश्यकता है जो हवा को शुद्ध कर सकें और प्रकृति के साथ हमारे संबंध को फिर से जोड़ सकें। शहरी वानिकी (urban forestry) इसका एक बेहतरीन प्राकृतिक समाधान प्रदान करती है। उच्च-घनत्व (high-density) वृक्षारोपण की मियावाकी (Miyawaki) तकनीक का उपयोग करके, शहर के छोटे हिस्सों में भी घने देशी माइक्रो-फॉरेस्ट (micro-forest) लगाए जा सकते हैं।1970 के दशक में जापानी वनस्पतिशास्त्री और पादप पारिस्थितिकी विशेषज्ञ डॉ. अकिरा मियावाकी (Akira Miyawaki) द्वारा विकसित यह वनीकरण (afforestation) विधि प्रकृति के पारिस्थितिक तंत्र से प्रेरणा लेती है। पारंपरिक वृक्षारोपण की तुलना में ये घने पॉकेट वन (pocket forests) 10 गुना तेजी से बढ़ते हैं, 30 गुना अधिक घने होते हैं और 100 गुना अधिक जैव विविधता (biodiversity) का समर्थन करते हैं। जहां पारंपरिक जंगलों को प्राकृतिक रूप से पुनर्जीवित होने में 200 साल लग जाते हैं, वहीं यह नवीन विधि केवल 20 से 30 वर्षों में एक परिपक्व जंगल तैयार कर सकती है।शहरी स्थानों के लिए मियावाकी पद्धति क्या है और यह कैसे काम करती है?मियावाकी पद्धति एक अल्ट्रा-डेंस (ultra-dense) और तीव्र वनीकरण तकनीक है। यह तकनीक इस बात की नकल करती है कि यदि मानव हस्तक्षेप न हो तो कोई जंगल खुद को कैसे पुनर्जीवित करेगा। इस पद्धति का मूल सिद्धांत केवल उन देशी प्रजातियों (native species) का उपयोग करना है जो उस विशिष्ट जलवायु और क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से पनपती हैं। इन स्वदेशी पौधों ने हजारों वर्षों में अपने स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल होना सीख लिया है, इसलिए उन्हें लगाने से न केवल जैव विविधता बहाल होती है, बल्कि एक ऐसा वातावरण तैयार होता है जो जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीला है।इस पद्धति में प्रति वर्ग मीटर 3 से 5 छोटे पौधे (saplings) लगाए जाते हैं। इन पौधों को एक यादृच्छिक (random) व्यवस्था में लगाया जाता है ताकि घनेपन को अधिकतम किया जा सके और प्राकृतिक वनों की तरह एक सुंदर अव्यवस्था बनाई जा सके। जब पौधे बहुत पास-पास लगाए जाते हैं, तो उनके लिए अगल-बगल फैलने की कोई जगह नहीं बचती। इसके परिणामस्वरूप, पौधों के बीच सूरज की रोशनी के लिए प्रतिस्पर्धा होती है और वे सीधे ऊपर की ओर बहुत तेजी से बढ़ते हैं। यह कृत्रिम रूप से पैदा की गई प्रतिस्पर्धा ही इस पद्धति की अभूतपूर्व विकास दर का मुख्य रहस्य है।एक आत्मनिर्भर माइक्रो-फॉरेस्ट को उगाने के प्रमुख वैज्ञानिक चरण क्या हैं?मियावाकी जंगल लगाने के लिए पारिस्थितिकी और मृदा जीव विज्ञान पर आधारित कुछ विशिष्ट चरणों का पालन किया जाता है:सबसे पहला चरण संभावित प्राकृतिक वनस्पति (Potential Natural Vegetation) की पहचान करना है। स्थानीय पर्यावरण के लिए सबसे उपयुक्त देशी वनस्पतियों का चयन करने के लिए गहन शोध किया जाता है। एक मियावाकी जंगल बहु-स्तरीय (multi-layered) होता है। संतुलन बनाने और घनत्व बढ़ाने के लिए वनस्पति की चार परतों—कैनोपी (canopy), उप-कैनोपी, झाड़ियाँ और ग्राउंड कवर (ground cover)—में लगभग 40 विभिन्न देशी प्रजातियों का चयन किया जाता है।दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण मिट्टी की कीमिया (soil alchemy) है। चूंकि शहरी मिट्टी अक्सर संकुचित, दूषित और खराब हो चुकी होती है, इसलिए पौधों की जड़ों को तेजी से स्थापित करने के लिए मिट्टी को नरम, उपजाऊ और फफूंदी-प्रधान (fungi-dominant) बनाया जाता है। इस प्रक्रिया में गहरी खुदाई करके जैविक खाद और नमी बनाए रखने वाली सामग्री मिलाकर मिट्टी की गुणवत्ता को सुधारा जाता है। इसका लक्ष्य सदियों पुराने जंगल के फर्श जैसी सरंध्रता और पोषक तत्वों की उपलब्धता पैदा करना है।तीसरे चरण में पौधे लगाना शामिल है। तैयार मिट्टी में छोटे पौधों को बहुत पास-पास लगाया जाता है। ये छोटे पौधे मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक कवकों (mycorrhizal fungi) के साथ तेजी से सहजीवी संबंध बनाते हैं।अंत में, जंगल की मल्चिंग (mulching) की जाती है। पुआल जैसी सामग्री से भारी मल्चिंग करने से मिट्टी सुरक्षित रहती है, नमी बनी रहती है और पाले से बचाव होता है। इससे बार-बार पानी देने की आवश्यकता कम हो जाती है। यह मल्चिंग मिट्टी के सूक्ष्मजीवों, बीटल्स और केंचुओं को आकर्षित करती है जो इसे खाकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं।यह उच्च-घनत्व वाला जंगल शहरों के तापमान और हीट आइलैंड को कैसे कम करता है?शहरी जंगल सिर्फ हरे दिखने के अलावा शहर के पर्यावरण को सक्रिय रूप से बदलते हैं। मियावाकी माइक्रो-फॉरेस्ट अर्बन हीट आइलैंड (urban heat island) प्रभाव को कम करने में एक शक्तिशाली भूमिका निभाते हैं। यह शीतलन प्रभाव वाष्पोत्सर्जन (evapotranspiration) पर निर्भर करता है, जहां पेड़ों द्वारा छोड़ी गई नमी से हवा ठंडी होती है।लगातार नमी छोड़ने की इस प्रक्रिया से पेड़ अपने आसपास की हवा के तापमान को 15 डिग्री सेल्सियस (Celsius) तक कम कर सकते हैं। इसके अलावा, घने पेड़ सूरज की सीधी धूप को जमीन तक पहुंचने से रोकते हैं, जिससे पारंपरिक बिखरे हुए पार्कों की तरह जमीन गर्म और सूखी नहीं होती। अध्ययनों से पता चलता है कि परिपक्व मियावाकी वनों के आसपास के क्षेत्रों में 2 से 4 डिग्री सेल्सियस तक सतह के तापमान में गिरावट देखी जा सकती है। यह प्राकृतिक वातानुकूलन (air conditioning) तकनीक बढ़ती गर्मी में लोगों को भौतिक राहत प्रदान करती है।पर्यावरण और हवा को शुद्ध करने में इन मिनी-जंगलों की क्या भूमिका है?ये घने पॉकेट वन प्राकृतिक एयर फिल्टर (air filters) के रूप में कार्य करते हैं। 30 गुना अधिक सघन होने के कारण, ये हवा से बहुत अधिक मात्रा में पार्टिकुलेट मैटर (particulate matter) और कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) सोखते हैं। शहरी क्षेत्र वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का 70 प्रतिशत से अधिक उत्पन्न करते हैं, और ये वन एक सघन कार्बन सिंक (carbon sink) के रूप में काम करते हैं जो कार्बन को अपने बायोमास (biomass) और मिट्टी में जमा कर लेते हैं।इसके अतिरिक्त, पेड़ों की यह बहु-स्तरीय सघन दीवार एक बेहतरीन ध्वनि अवरोधक (sound barrier) का काम करती है। यह यातायात और औद्योगिक गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले शोर को प्रभावी ढंग से कम करती है। मिट्टी की अच्छी जल धारण क्षमता के कारण, ये जंगल भारी बारिश के दौरान अतिरिक्त पानी को सोख लेते हैं, जिससे अचानक आने वाली बाढ़ (flash floods) और मिट्टी के कटाव को रोकने में मदद मिलती है।क्या ये छोटे जंगल वास्तव में शहरी जैव विविधता को वापस ला सकते हैं?बिल्कुल। एक मियावाकी वन में पारंपरिक वनों की तुलना में कई गुना अधिक जैव विविधता होती है। विभिन्न प्रकार के देशी पेड़ों को एक साथ लगाने से परागणकों (pollinators) के लिए प्रचुर मात्रा में भोजन और पक्षियों के लिए एक सुरक्षित आश्रय मिलता है। पौधे लगाने के कुछ ही महीनों के भीतर कीड़े पनपने लगते हैं, और उनके बाद पक्षी, तितलियां, मधुमक्खियां और छोटे स्तनधारी जीव वापस लौटने लगते हैं।कई शहरी मियावाकी साइटों में वृक्षारोपण के दो वर्षों के भीतर ही 50 से अधिक प्रकार की वनस्पतियों और जीवों को दर्ज किया गया है। एक जंगल के भीतर, जैव विविधता का अर्थ संतुलन है; पक्षी कीटों को नियंत्रित करते हैं, कीड़े पौधों को परागित करते हैं, और कवक पेड़ों को स्वस्थ रखते हैं। केवल दो से तीन वर्षों के रखरखाव के बाद यह जंगल पूरी तरह से आत्मनिर्भर (self-sustaining) हो जाता है।शहर के छोटे स्थानों में इन जंगलों को लगाना क्यों आसान और फायदेमंद है?मियावाकी पद्धति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके लिए विशाल भूमि की आवश्यकता नहीं होती है। इन्हें केवल 3 वर्ग मीटर (square meters) या दो पार्किंग स्पॉट (parking spots) जैसी छोटी जगहों पर भी आसानी से लगाया जा सकता है। जगह की कमी का सामना कर रहे शहरों के लिए यह तकनीक एक वरदान है। इन्हें स्कूलों के खेल के मैदानों, शहर के पार्कों, कारखानों के पीछे की संकरी पट्टियों या हाईवे (highways) के बीच की खाली जमीन में आसानी से उगाया जा सकता है।ग्रे बुनियादी ढांचे की जगह इस हरे बुनियादी ढांचे का निर्माण करके हम एक हरित गलियारा (green corridor) बना सकते हैं, जो वन्यजीवों को शहर के बीच भी एक सुरक्षित आवास प्रदान करता है। यह पद्धति हमारे समुदायों के लिए एक शांत नखलिस्तान बनाती है जो लोगों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए पर्यावरण जितनी ही लाभदायक है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/29ya84ee 2. https://tinyurl.com/2a9qflga 3. https://tinyurl.com/2afrvo8w
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
गांधीजी की तीसरे दर्जे की रेल यात्राएँ व् लखनऊ चारबाग़ स्टेशन से कैसे बदला भारतीय इतिहास
जुलाई 1914 में जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ़्रीका से भारत लौटे, तो उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें एक बड़ी पते की सलाह दी थी ,पूरे एक साल तक अपने कान खुले रखना और मुँह बंद रखना। बापू ने इस सीख को गाँठ बाँध लिया। वे अच्छी तरह समझते थे कि जब तक देश के आम आदमी के दुख-दर्द, संघर्ष और उसकी उम्मीदों को अपनी आँखों से न देख लिया जाए, तब तक किसी भी बड़े जनांदोलन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसी सोच के साथ गांधीजी ने पूरे देश का दौरा करने की ठानी और सफ़र का ज़रिया चुना भारतीय रेल का थर्ड क्लास (third class)। रेलगाड़ी के इन साधारण डिब्बों में बैठकर बापू ने सिर्फ़ यात्रा नहीं की, बल्कि ग़ुलाम भारत के उस दर्द को महसूस किया जिसे अंग्रेज़ी हुकूमत और रईस तबक़ा पूरी तरह भुलाए बैठा था। आज का यह आलेख आपको गांधीजी की उसी ऐतिहासिक यात्रा पर ले जाएगा, जहाँ लखनऊ जैसे शहर ने उनके विचारों को राष्ट्रीय पहचान दी और नोआखली के दूर-दराज़ गाँवों ने उनकी अहिंसा की सबसे कड़ी परीक्षा ली।गांधीजी ने भारत की आत्मा को समझने के लिए थर्ड क्लास का सफ़र क्यों चुना? गांधीजी का पक्का मानना था कि अपने लोगों को समझे बिना देश की सच्ची सेवा हो ही नहीं सकती। 25 सितंबर 1917 को रांची में लिखी अपनी किताब 'थर्ड क्लास इन इंडियन रेलवेज (Third Class in Indian Railways)' में उन्होंने इन कड़वे अनुभवों को बेबाकी से दर्ज किया। दो साल से ज़्यादा समय तक लाहौर से त्रांकेबार, वर्तमान नाम तरंगमबाड़ी (Tharangambadi) और कराची से कलकत्ता तक सफ़र करते हुए उन्होंने तीसरे दर्जे के हालात को बहुत बारीकी से परखा। गांधीजी ने लिखा कि 12 तारीख़ को उन्होंने बॉम्बे से मद्रास जाने वाली मेल ट्रेन का टिकट 13 रुपये 9 आने में ख़रीदा था। जिस डिब्बे पर साफ़ लिखा था कि यहाँ सिर्फ़ 22 मुसाफ़िर बैठ सकते हैं, उसमें पहले से ही खचाखच भीड़ भरी थी। मद्रास पहुँचने में दो रातें लगनी थीं। पूना पहुँचने तक अगर 22 से ज़्यादा लोग अंदर नहीं घुस पाए, तो इसकी वजह वे हिम्मतवाले मुसाफ़िर थे जिन्होंने दूसरों को दरवाज़े पर ही रोक दिया था। दो-तीन लोगों को छोड़ दें तो बाक़ी सबको पूरी रात बैठे-बैठे ही काटनी पड़ी। रायचूर पहुँचते-पहुँचते तो हालत बिल्कुल बेकाबू हो गई। भीड़ सँभालने के बजाय रेलवे गार्ड और कर्मचारी और लोगों को अंदर धकेल रहे थे। पाँच दिनों से सफ़र कर रहे एक मेमन व्यापारी ने जब इस बदइंतज़ामी का विरोध किया, तो कर्मचारियों ने उसकी बात सुनने के बजाय उसे ज़लील किया और कहा कि आख़िरी स्टेशन पर जाकर शिकायत कर लेना। 22 लोगों की जगह 35 लोग ठूँसे हुए थे—कुछ ज़मीन पर पड़े थे, तो कुछ रात भर खड़े रहने को मजबूर थे। कुछ बुज़ुर्ग मुसाफ़िरों ने बीच-बचाव न किया होता, तो यात्रियों के बीच मार-पीट तय थी।रेल यात्रा और स्टेशनों पर आम जनता किन अमानवीय परिस्थितियों से जूझ रही थी? बापू ने अपनी डायरी में दर्ज किया कि पूरे सफ़र के दौरान डिब्बे में साफ़-सफ़ाई का नाम तक नहीं था। मुसाफ़िर भारी गंदगी के बीच बैठने को लाचार थे। डिब्बे के शौचालय में सफ़ाई तो दूर, पानी की टंकी में एक बूँद पानी तक नहीं था। स्टेशनों पर मिलने वाली चाय महज़ टैनिन वाला पानी थी, जिसमें घटिया चीनी और दूध के नाम पर कोई सफ़ेद घोल मिला दिया जाता था, जिससे वह कीचड़ जैसी लगती थी। स्टेशनों पर खाने-पीने की चीज़ें इतनी गंदी थीं कि देखकर घिन आ जाए। उन्हें मैले हाथों से परोसा जाता, गंदे बर्तनों में रखा जाता, मक्खियाँ भिनकती रहतीं और गंदे तराज़ू पर तौला जाता था। यात्रियों को यह घटिया खाना बिल्कुल पसंद नहीं था, लेकिन पेट की भूख के आगे वे मजबूर थे। वापसी का सफ़र भी कुछ कम तकलीफ़देह नहीं रहा। 9 लोगों के बैठने वाले डिब्बे में 12 लोग ठूँसे रहे। एक स्टेशन पर तो रेलकर्मी ने ज़बरदस्ती मुसाफ़िरों को अंदर ठूँसकर बाहर से दरवाज़ा बंद कर दिया और टोकने वाले यात्री को गालियाँ देकर धमकाया। डिब्बे का शौचालय इस्तेमाल के लायक़ ही नहीं था—पाइप था पर पानी ग़ायब, और लकड़ी के ढाँचे पर गंदगी की मोटी परत जमी हुई थी। स्टेशनों के हालात और भी ख़राब थे। रायचूर, धोंड, सोनपुर, चक्रधरपुर, पुरुलिया और आसनसोल जैसे स्टेशनों पर वेटिंग रूम शोर-शराबे और गंदगी से अटे पड़े थे। फ़र्श पर लोग जहाँ-तहाँ बैठते, थूकते और बीड़ी-सिगरेट पीते थे, जबकि वहाँ धूम्रपान पूरी तरह मना था। कीटाणुनाशक (डिसइन्फेक्टेंट) का तो किसी को अता-पता ही नहीं था। गांधीजी ने तो यहाँ तक कहा कि देश की राजधानी में तीसरे दर्जे का बुकिंग काउंटर किसी ब्लैक-होल जैसा था जिसे तुरंत ढहा देना चाहिए, क्योंकि यह गंदगी प्लेग जैसी जानलेवा बीमारियों को दावत दे रही थी।फ़र्स्ट क्लास और थर्ड क्लास के भारी अंतर ने क्या सवाल खड़े किए? गांधीजी ने तुलना करते हुए बताया कि बॉम्बे से मद्रास के लिए फ़र्स्ट क्लास का किराया तीसरे दर्जे से पाँच गुना से भी ज़्यादा था। लेकिन सुविधा के नाम पर तीसरे दर्जे के यात्री को फ़र्स्ट क्लास का दसवाँ हिस्सा भी नहीं मिलता था। उन्होंने लिखा कि तीसरे दर्जे के मुसाफ़िरों की इस अनदेखी ने भारतीयों में सफ़ाई, अनुशासन और सलीके से साथ रहने की आदतें विकसित करने का बहुत बड़ा मौक़ा गँवा दिया। उलटे, इन बदहाल हालातों ने लोगों की शालीनता और सफ़ाई की सोच को ही मार दिया। इसके लिए गांधीजी ने बड़ा सीधा और व्यावहारिक उपाय सुझाया। उनका कहना था कि जब तक बड़े-बड़े अफ़सर और रसूखदार लोग बिना किसी को बताए सामान्य मुसाफ़िरों की तरह तीसरे दर्जे में सफ़र नहीं करेंगे, तब तक रेलों की यह दुर्दशा नहीं सुधरेगी। जब वे ख़ुद आम आदमी का दर्द झेलेंगे, तभी इन बेज़ुबान लाखों यात्रियों को उनके किराए के बदले बुनियादी मानवीय सुविधाएँ मिल पाएँगी।1916 का लखनऊ अधिवेशन बापू के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ कैसे साबित हुआ? रेल के तीसरे दर्जे से शुरू हुआ यह जन-संवाद 1916 में लखनऊ की ऐतिहासिक धरती पर पहुँचा। जब महात्मा गांधी 31वें कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लेने लखनऊ पहुँचे, तब वे आज की तरह देश के सर्वमान्य नेता नहीं बने थे। इसी लखनऊ दौरे में बिहार के चंपारण से आए सीधे-सादे किसान राजकुमार शुक्ल बापू से मिले। शुक्ल जी ने चंपारण के नील की खेती करने वाले किसानों पर हो रहे अंग्रेज़ी ज़ुल्म को दिखाने के लिए गांधीजी से वहाँ चलने की ज़िद पकड़ ली। वे बापू के पीछे-पीछे तब तक लगे रहे, जब तक उन्होंने चंपारण आने की हामी नहीं भर दी। इसी मुलाक़ात से शुरू हुआ ऐतिहासिक चंपारण सत्याग्रह, जिसने अंग्रेज़ों को चंपारण कृषि क़ानून बनाने पर मजबूर कर दिया और गांधीजी को पूरे देश का सबसे बड़ा जननायक बना दिया। लखनऊ के चारबाग़ रेलवे स्टेशन की यादें भी बापू से बहुत गहराई से जुड़ी हैं। दिसंबर 1916 में इसी स्टेशन पर गांधीजी की पहली मुलाक़ात युवा जवाहरलाल नेहरू से हुई थी। इसके बाद 1920 और 1921 में जब असहयोग और ख़िलाफ़त आंदोलन छिड़ा, तो लखनऊ बापू का मुख्य ठिकाना बन गया। अपनी लखनऊ यात्राओं में वे पुराने शहर में मौलाना अब्दुल बारी फ़रंगी महली के फ़्रेंच शैली वाले घर में ठहरते थे, जहाँ उनका कमरा आज भी वैसे ही सहेजा हुआ है। फ़रवरी 1920 में चारबाग़ स्टेशन पर उतरते ही उन्होंने छात्रों से सरकारी स्कूल छोड़ने और चरखे से गाढ़ा सूत कातने की अपील की। फ़रवरी 1921 में गोमती किनारे उन्होंने लोगों को उर्दू में संबोधित करते हुए अंग्रेज़ी अदालतों का बहिष्कार कर अपनी पंचायतें बैठाने की सलाह दी। अगस्त 1921 में अमीनाबाद पार्क में झमाझम बारिश के बीच उन्होंने 24 घंटे का मौन व्रत रखकर स्वदेशी और अहिंसा का पाठ पढ़ाया। बाद में, सितंबर 1929 में लखनऊ यूनिवर्सिटी छात्र संघ का उद्घाटन भी बापू के हाथों हुआ, जहाँ उन्होंने नौजवानों को खादी अपनाने की सीख दी। 1936 में गोखले मार्ग पर उन्होंने एक पौधा भी लगाया था, जिसकी पट्टिका आज भी वहाँ देखी जा सकती है।नोआखली के दंगों में गांधीजी की अहिंसा की सबसे कठिन परीक्षा कैसे हुई? आज़ादी की दहलीज़ पर जब पूरा मुल्क दंगों की आग में झुलस रहा था, तब 77 साल के बुज़ुर्ग गांधीजी ने पूर्वी बंगाल के नोआखली का रुख़ किया। 7 नवंबर 1946 को बापू नोआखली पहुँचे। कलकत्ता के दंगों की लपटें अब शांत गाँवों तक पहुँच चुकी थीं। बापू चाहते तो हिंदू-बहुल बिहार जा सकते थे, लेकिन उन्होंने जानबूझकर मुस्लिम-बहुल नोआखली चुना ताकि वे अपनी अहिंसा की असली परीक्षा ले सकें। बापू ने बाढ़ से घिरे 47 गाँवों की पैदल यात्रा की। चाँदपुर जाते वक़्त नाव में उनकी तबीयत भी बिगड़ी, पर वे रुके नहीं। उन्होंने बदले की आग को सिरे से ख़ारिज करते हुए कहा कि यह कोई बहादुरी नहीं, बल्कि गुंडों की कायरता है। उन्होंने बिहार के हिंदुओं को मुसलमानों पर हमले के लिए फटकारा, तो नोआखली के मुसलमानों को समझाया कि अल्पसंख्यकों को सताना बहादुरी नहीं है। नोआखली में गांधीजी ने दिल छू लेने वाली बात कही: "मैं यहाँ आप में से ही एक बनकर रहने आया हूँ। जिस तरह मैं एक गुजराती हूँ, ठीक उसी तरह मैं एक भारतीय और एक बंगाली भी हूँ।" वे मुस्लिम परिवारों के घरों में ठहरे और क़ुरान की आयतों का हवाला देकर समझाया कि किसी पर ज़बरदस्ती धर्म थोपना ग़लत है। चौमुहानी गवर्नमेंट कॉलेज के मुस्लिम प्रिंसिपल तफ़ज़्ज़ुल हुसैन ने अपनी आत्मकथा 'स्मृतिकणा' में लिखा कि बापू नोआखली और बिहार, दोनों जगह की हिंसा से बराबर आहत थे। पंचगाँव के तोफ़ाएल अहमद ने बताया कि कैसे गांधीजी बिना किसी ठाठ-बाट के ज़मीन पर चटाई बिछाकर बैठते थे और उनकी शांति सभाओं ने लोगों के दिलों में जमी नफ़रत को धो डाला।अहिंसक संवाद और संवेदना से आज क्या सीखा जा सकता है? गांधीजी की पूरी ज़िंदगी हमें यही सिखाती है कि समाज में पक्की शांति केवल आपसी बातचीत और संवाद से ही आ सकती है। 18 मई 2021 को गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति और लखनऊ के ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय ने मिलकर "अहिंसक संवाद" पर एक वेबिनार रखा था। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर अनिल कुमार शुक्ला ने 'मनसा, वाचा, कर्मणा' की बात करते हुए कहा कि पत्रकारिता के छात्रों को 'सहानुभूति' (sympathy) और 'समानुभूति' (empathy) के फ़र्क़ को ज़रूर समझना चाहिए। वहीं गांधी स्मृति के डॉ. वेदअभ्यास कुंडू ने बापू के बताए अहिंसा के पाँच बुनियादी उसूलों—सम्मान, आपसी समझ, स्वीकार्यता, सराहना और करुणा—की बात की। उन्होंने कहा कि हमें बातचीत का एक ऐसा माहौल बनाना चाहिए जहाँ नकारात्मकता न हो, और मन के ग़ुस्से व कड़वाहट को दूर करने के लिए आभार-दैनिकी (ग्रैटिट्यूड जर्नल) लिखने की आदत डालनी चाहिए।इस ऐतिहासिक यात्रा का सबसे बड़ा निष्कर्ष क्या है? महात्मा गांधी की तीसरे दर्जे की रेल यात्राएँ सिर्फ़ एक जगह से दूसरी जगह जाना भर नहीं थीं, बल्कि वे भारतीय समाज की नब्ज़ पकड़ने की एक गहरी साधना थीं। रेल की भीड़-भाड़, गंदगी और उपेक्षा के बीच बैठकर उन्होंने जो कुछ देखा और महसूस किया, उसी ने उन्हें चंपारण के किसानों का दर्द समझने की ताक़त दी, लखनऊ में राष्ट्रीय एकता का मंच तैयार किया और नोआखली के दंगों में शांति का सच्चा मसीहा बनाया। बापू ने साबित कर दिखाया कि सच्चा नेतृत्व महलों में बैठकर नहीं, बल्कि आम जनता के कड़वे अनुभवों को उनके साथ जीकर ही पैदा होता है।संदर्भ: 1. https://tinyurl.com/2yqw3mup 2. https://tinyurl.com/24h4mljk 3. https://tinyurl.com/235zd5p6 4. https://tinyurl.com/28xtcbuh
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी उपकरण
एबेकस से लेकर एआई तक, जानिए कैसे बदल गई पूरी कंप्यूटर की दुनिया?
कंप्यूटर के आविष्कार से पहले, लोग संख्याओं का हिसाब रखने और बुनियादी गणना करने के लिए लाठी, पत्थर और हड्डियों जैसे सरल उपकरणों पर निर्भर थे। जैसे-जैसे तकनीक आगे बढ़ी और इंसानी समझ का विकास हुआ, एबेकस (Abacus) और नेपियर्स बोन्स (Napier's Bones) जैसे अधिक उन्नत उपकरण विकसित किए गए। हालांकि ये शुरुआती उपकरण बुनियादी कम्प्यूटेशनल उपकरणों के रूप में काम करते थे, लेकिन जटिल गणनाओं को संभालने में इनकी क्षमता बेहद सीमित थी। समय के साथ तकनीक ने करवट ली और आज हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) के युग में प्रवेश कर चुके हैं।शुरुआती दौर में गणना के लिए किन उपकरणों का इस्तेमाल होता था?कंप्यूटर का इतिहास हजारों साल पुराना है। चीन द्वारा बनाया गया एबेकस 4000 ईसा पूर्व के आसपास अस्तित्व में आया और इसे अक्सर पहला कंप्यूटिंग उपकरण माना जाता है। इसमें छड़ों पर मोतियां पिरोई गई थीं और इसका उपयोग जोड़ और घटाव जैसी सरल अंकगणितीय संक्रियाओं के लिए किया जाता था। समय के साथ एबेकस के विभिन्न संस्करण पूरे एशिया में फैल गए। इसके बाद 1617 में जॉन नेपियर (John Napier) द्वारा नेपियर्स बोन्स का आविष्कार किया गया। यह संख्याओं के साथ उकेरी गई हाथीदांत की छड़ों का एक सेट था, जिसे गुणा और भाग में सहायता के लिए डिज़ाइन किया गया था। इसी आविष्कार ने दशमलव बिंदु की अवधारणा भी पेश की।मैकेनिकल कैलकुलेटर और इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटिंग की शुरुआत कैसे हुई?फ्रांसीसी गणितज्ञ ब्लेज़ पास्कल (Blaise Pascal) ने 1642 और 1644 के बीच पास्कलाइन (Pascaline) विकसित किया, जिसे अरिथमेटिक मशीन (Arithmetic Machine) या एडिंग मशीन (Adding Machine) भी कहा जाता है। यह जोड़ और घटाव करने में सक्षम पहला मैकेनिकल कैलकुलेटर था। बाद में जर्मन दार्शनिक गॉटफ्रीड विल्हेम लाइबनिज़ (Gottfried Wilhelm Leibniz) ने 1673 में पास्कल के डिजाइन में सुधार करते हुए स्टेप्ड रेकनर (Stepped Reckoner) विकसित किया।1820 के दशक में, "आधुनिक कंप्यूटर के पिता" कहे जाने वाले चार्ल्स बैबेज (Charles Babbage) ने डिफरेंस इंजन (Difference Engine) को डिज़ाइन किया। 1830 के दशक में उन्होंने एनालिटिकल इंजन (Analytical Engine) भी विकसित किया, जो मेमोरी और पंच कार्ड का उपयोग करने वाला पहला सामान्य-उद्देश्य वाला मैकेनिकल कंप्यूटर था। 1890 में अमेरिकी सांख्यिकीविद् हरमन होलेरिथ (Herman Hollerith) ने टेबुलेटिंग मशीन (Tabulating Machine) का आविष्कार किया। उनकी कंपनी 1924 में इंटरनेशनल बिजनेस मशीन यानी आईबीएम (IBM) बन गई। 1930 के दशक में वन्नेवर बुश (Vannevar Bush) ने डिफरेंशियल एनालाइज़र (Differential Analyzer) का आविष्कार किया। इसके बाद 1944 में आईबीएम और हार्वर्ड की साझेदारी में मार्क 1 (Mark I) कंप्यूटर बनाया गया, जिसे हावर्ड ऐकेन (Howard Aiken) ने डिज़ाइन किया था।दुनिया का पहला इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर एनिएक कैसे बना?एनिएक (ENIAC) यानी इलेक्ट्रॉनिक न्यूमेरिकल इंटीग्रेटर एंड कंप्यूटर, संख्यात्मक समस्याओं को हल करने जैसे सामान्य उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाने वाला पहला इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर था। इसे पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय में जॉन प्रेस्पर एकर्ट (John Presper Eckert) और जॉन मौचली (John Mauchly) द्वारा अमेरिकी सेना की बैलिस्टिक रिसर्च लेबोरेटरी के लिए डिज़ाइन और आविष्कार किया गया था। इसका निर्माण 1943 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मन सेना के खिलाफ युद्ध के प्रयासों में मदद करने के लिए शुरू हुआ और 1946 में पूरा हुआ।युद्ध के दौरान पुरुष इंजीनियरों की कमी थी, इसलिए छह महिला प्रोग्रामरों की एक टीम ने इसकी प्रोग्रामिंग की: बेट्टी जीन जेनिंग्स (Betty Jean Jennings), मर्लिन वेसकॉफ (Marilyn Wescoff), रूथ लिचरमैन (Ruth Lichterman), एलिज़ाबेथ स्नाइडर (Elizabeth Snyder), फ्रांसिस बिलास (Frances Bilas) और कैथलीन मैकनल्टी (Kathleen McNulty)। एनिएक लगभग 1,800 वर्ग फुट में फैला था। इसमें 20,000 वैक्यूम ट्यूब, 1,500 रिले, 10,000 कैपेसिटर और 70,000 रेसिस्टर्स लगे थे। यह 30 टन से अधिक भारी था और इसे चलाने में 200 किलोवाट बिजली लगती थी। यह एक सेकंड में 5,000 जोड़ चक्र पूरे कर सकता था, जो 50,000 लोगों के बराबर का काम था। 15 फरवरी को एनिएक डे (ENIAC Day) के रूप में मनाया जाता है। बाद में एकर्ट और मौचली ने 1951 में पहला व्यावसायिक रूप से सफल कंप्यूटर यूनिवैक 1 (UNIVAC I) भी विकसित किया।कंप्यूटर की विभिन्न पीढ़ियों ने तकनीक को कैसे बदला?पहली पीढ़ी (1940-1956) के कंप्यूटरों में मेमोरी और सीपीयू के लिए वैक्यूम ट्यूब का उपयोग किया जाता था। ये बड़े, धीमे और महंगे थे। एनिएक और यूनिवैक 1 इसी पीढ़ी के उदाहरण हैं। दूसरी पीढ़ी (1957-1963) में ट्रांजिस्टर का उपयोग शुरू हुआ, जो सस्ते और आकार में छोटे थे। इस पीढ़ी में असेंबली और प्रोग्रामिंग भाषाओं के रूप में कोबोल (COBOL) और फोरट्रान (FORTRAN) का उपयोग किया गया।तीसरी पीढ़ी में ट्रांजिस्टर की जगह इंटीग्रेटेड सर्किट यानी आईसी (ICs) का इस्तेमाल हुआ। पास्कल और पीएल/1 (PASCAL and PL/1) जैसी उच्च-स्तरीय भाषाओं का उपयोग शुरू हुआ। चौथी पीढ़ी (1971-1980) में वीएलएसआई (VLSI) सर्किट का उपयोग किया गया, जिसमें लाखों ट्रांजिस्टर एक चिप पर होते थे। इसी दौर में सी (C) और सी++ (C++) जैसी प्रोग्रामिंग भाषाओं का विकास हुआ। 1980 से लेकर आज तक की पांचवीं पीढ़ी में यूएलएसआई (ULSI) तकनीक का उपयोग किया जा रहा है, जिसमें डेस्कटॉप, लैपटॉप और एआई सॉफ्टवेयर शामिल हैं।दुनिया का पहला व्यावसायिक लैपटॉप ओसबोर्न 1 कैसा था?व्यावसायिक रूप से उपलब्ध होने वाला पहला लैपटॉप ओसबोर्न 1 (Osborne 1) था, जिसे अप्रैल 1981 में जारी किया गया था। इसका आविष्कार एडम ओसबोर्न (Adam Osborne) ने किया था। इसका वजन 11.1 किलोग्राम था और इसमें 12.7 सेंटीमीटर का मोनोक्रोम डिस्प्ले था। इसकी कीमत 1,795 डॉलर थी। यह माइक्रोप्रोसेसर (Intel 8088) का उपयोग करने वाले पहले कंप्यूटरों में से एक था। इसमें रिचार्जेबल बैटरी, सीआरटी डिस्प्ले (CRT display), बिल्ट-इन कीबोर्ड और दो 5.25-इंच फ्लॉपी डिस्क ड्राइव शामिल थे। यह Z80A सीपीयू पर चलता था, जिसमें 64K रैम मौजूद थी। हालांकि ओसबोर्न 1 बेहद सफल रहा, लेकिन एडम ओसबोर्न ने इसके अपग्रेड संस्करण ओसबोर्न एक्जीक्यूटिव की घोषणा बहुत जल्दी कर दी, जिससे पहले मॉडल के ऑर्डर रद्द हो गए और 1983 में कंपनी दिवालिया हो गई।आधुनिक युग में तकनीकी विकास की दिशा क्या है?1970 और 1980 के दशक में पर्सनल कंप्यूटर क्रांति आई। 1977 में स्टीव जॉब्स (Steve Jobs) और स्टीव वोज्नियाक (Steve Wozniak) ने एप्पल 2 (Apple II) विकसित किया। 1981 में आईबीएम पीसी और 1984 में मैकिन्टोश (Macintosh) आया, जिसने ग्राफिकल यूजर इंटरफेस पेश किया। 1990 के दशक में टिम बर्नर्स-ली (Tim Berners-Lee) द्वारा वर्ल्ड वाइड वेब (World Wide Web) का आविष्कार किया गया। आज क्लाउड कंप्यूटिंग, एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग (Quantum Computing) और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) तकनीक की दुनिया को पूरी तरह बदल रहे हैं।आईईटी लखनऊ ने भारत में तकनीकी शिक्षा की नींव कैसे रखी?तकनीकी क्रांति के इसी सफर में भारत भी पीछे नहीं रहा। इंस्टिट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, लखनऊ (Institute of Engineering and Technology, Lucknow) उत्तर प्रदेश में एक राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित तकनीकी संस्थान है। इसकी स्थापना 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग संकाय के रूप में की गई थी, और बाद में इसे एक स्वतंत्र संस्थान के रूप में पुनर्गठित किया गया। साल 2000 से यह डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय से संबद्ध है।आईईटी लखनऊ 19 नवंबर 1984 को शुरू हुआ था। शुरुआत में, इसने तीन शाखाओं - कंप्यूटर साइंस, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स में बी.टेक की डिग्री की पेशकश की। एक साल के भीतर सिविल और मैकेनिकल शाखाएं भी शुरू की गईं। बाद में इसमें इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और केमिकल ब्रांच के साथ-साथ एमबीए, एम.टेक और एमसीए कोर्स भी शामिल किए गए। संस्थान का 100 एकड़ का परिसर उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम लिमिटेड द्वारा बनाया गया था। संस्थापक निदेशक प्रो. सुरेश चंद्र 26 जून 1984 को शामिल हुए और 11 अक्टूबर 1984 से शिक्षकों ने कार्यभार संभाला।इस संस्थान में लगभग 2500 छात्रों के रहने के लिए आठ लड़कों के और चार लड़कियों के हॉस्टल हैं, जिनमें विश्वेश्वरैया भवन-ए, विश्वेश्वरैया भवन-बी, रमन भवन-ए, रमन भवन-बी, भाभा हॉस्टल, आर्यभट्ट हॉस्टल, रामानुजम हॉस्टल, राम मनोहर लोहिया हॉस्टल, गार्गी भवन, अपाला हॉस्टल और सरोजनी भवन शामिल हैं। लड़कियों के लिए एक नवनिर्मित मैत्रेयी हॉस्टल भी तैयार है। संस्थान का अपना प्लेसमेंट सेल है, जिसका नेतृत्व मैकेनिकल विभाग के प्रोफेसर डॉ. अरुण कुमार तिवारी कर रहे हैं। आईईटी लखनऊ का यह सफर इस बात का प्रमाण है कि शुरुआती गणना मशीनों से लेकर आधुनिक कंप्यूटर साइंस तक, शिक्षा के बुनियादी ढांचे ने हर पीढ़ी को तकनीक से जोड़ने का अहम कार्य किया है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/23ncd8d32. https://tinyurl.com/2cg27lpo3. https://tinyurl.com/29jya2u44. https://tinyurl.com/25jxyynq
जलवायु और मौसम
लखनऊ, आज पढ़िए चंद्रमा व सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से बनने वाले समुद्री ज्वार-भाटे के बारे में
महासागर, पृथ्वी की सतह के 70% से अधिक हिस्से को व्यापते हैं और ग्रह के प्राथमिक जलवायु नियंत्रक के रूप में कार्य करते हैं। महासागरीय ज्वार-भाटे (Tides) का उठना और गिरना, चंद्रमा और सूर्य के उस गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से संचालित होता है, जो पृथ्वी के जल पर बल डालता है। दिलचस्प बात यह है कि यह परस्पर क्रिया एकतरफा नहीं है। बदलते महासागरीय ज्वार द्वारा उत्पन्न घर्षण, पृथ्वी के घूर्णन पर एक धीमे गुरुत्वाकर्षण रोधक के रूप में कार्य करता है, जो धीरे-धीरे इस ऊर्जा को वापस चंद्रमा की ओर स्थानांतरित करता है। इस प्रकार, यह बल चंद्रमा को हर साल पृथ्वी से लगभग 3.8 सेंटीमीटर दूर धकेल रहा है।बढ़ते ग्रीनहाउस गैस (Greenhouse gas) उत्सर्जन के कारण पृथ्वी की ऊष्मीय ऊर्जा असंतुलित हो गई है और महासागरों में भारी मात्रा में ऊष्मा जमा हो रही है। पर्यावरण और मानवता के लिए इसके दूरगामी परिणाम हैं। अतः यह जानना कि पृथ्वी की प्रणालियों में ऊष्मा कितनी और कहाँ संग्रहीत है, ग्रह के ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) की स्थिति और भविष्य के अनुमानों को समझने के लिए आवश्यक है। महासागरीय ऊष्मा अवशोषण (Ocean Heat Uptake) पृथ्वी ऊर्जा असंतुलन (Earth Energy Imbalance) की गणना के लिए उपयोग किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण संकेतक है, जो वैश्विक वार्मिंग को मापने के लिए एक मूलभूत मीट्रिक है।क्या आप जानते हैं कि महासागरों ने, मानव-संचालित तापन का लगभग 90% हिस्सा अवशोषित कर लिया है। इस प्रकार, यह एक प्रतिरोधी के रूप में कार्य करता है और हमारे ग्रह की सतह के गर्म होने को धीमा करता है। पृथ्वी की ताप विनियमन प्रणाली को समझने के लिए, महासागरीय ऊष्मा अवशोषण में होने वाले परिवर्तनों की निगरानी करना आवश्यक है।महासागर, अपनी सतह पर वायुमंडल से गर्मी को अवशोषित करते हैं, जिसे बाद में धाराओं, मिश्रण प्रक्रियाओं और एल नीनो (El Nino) तथा ला नीना (La Nina) जैसे प्राकृतिक जलवायु पैटर्न द्वारा संचालित अन्य महासागरीय प्रक्रियाओं के माध्यम से गहरे महासागर और दुनिया भर में पुनर्वितरित किया जाता है। यहाँ, यह ऊष्मा सदियों या सहस्राब्दियों तक फंसी रहती है। समय के साथ, यह गर्मी 2,000 मीटर से अधिक गहरी परतों में फैल जाती है। अपनी विशाल ताप क्षमता और जबरदस्त आयतन के कारण, महासागर सैकड़ों या हजारों वर्षों तक गर्मी को अवशोषित और संचित करना जारी रखेंगे, फिर भले ही ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम कर दिया जाए।पिछले कुछ दशकों (1960-2020) में, सैटेलाइट (Satellite) मापन की शुरुआत के बाद से 2,000 मीटर गहराई तक महासागर की वार्मिंग दर लगभग दोगुनी हो गई है। महासागरीय ऊष्मा अवशोषण में दुनिया के सभी क्षेत्रों में वृद्धि हुई है, हालांकि प्रत्येक क्षेत्र में इसकी तीव्रता अलग-अलग है। अन्य क्षेत्रों की तुलना मे, दक्षिणी महासागर (जिसे अंटार्कटिक महासागर भी कहा जाता है) और अटलांटिक महासागर में अधिक स्पष्ट वार्मिंग का अनुभव हुआ है। दूसरी ओर, प्रशांत और हिंद महासागरों ने अपेक्षाकृत कम वार्मिंग दिखाई दी है।महासागरीय गर्मी, वर्षा के वितरण में बदलाव लाती है, जिसके परिणामस्वरूप दो विपरीत प्रभाव होते हैं। पहला, कुछ क्षेत्रों को अधिक तीव्र वर्षा और बाढ़ का सामना करना पड़ सकता है, और दूसरा, अन्य क्षेत्रों में विकट सूखे की स्थिति और जंगल की आग का उच्च जोखिम हो सकता है। गर्म महासागर, तूफानों की तीव्रता को भी प्रभावित कर सकते हैं, जिससे वे अधिक शक्तिशाली और संभावित रूप से अधिक विनाशकारी हो सकते हैं। महासागर की सतह की परतों में ऊष्मा ऊर्जा, तूफानों के लिए ईंधन के रूप में कार्य करती है, जहाँ गर्म महासागरीय पानी से ऊर्जा खींची जाती है। यह हरिकेन (Hurricane) और चक्रवातों के मामले में होता है।पृथ्वी, महासागरीय पानी की एक ऐसी बूंद के भीतर स्थित है, जिसका आकार कुछ-कुछ रग्बी बॉल जैसा है। ग्रह के दोनों (प्रत्येक) तरफ महासागर के पानी में एक उभार है। एक उभार, ग्रह के उस आधे हिस्से पर है, जो चंद्रमा की ओर है, जबकि दूसरा इसके विपरीत छोर पर स्थित है। ये दोनों उभार, मुख्य रूप से पृथ्वी पर चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण बनते हैं।इस बल के दो अलग-अलग घटक हो सकते हैं। यह पदार्थ को ‘लंबवत’ (Vertically) – पृथ्वी की सतह के लंबवत दिशा में खींच सकता है या ‘क्षैतिज रूप से’ (Horizontally) – हमारे ग्रह के अग्र-भाग के समानांतर भी खींच सकता है। अब, पृथ्वी पर वह स्थान, जो किसी भी समय सीधे चंद्रमा के ठीक नीचे होता है, उप-चंद्र बिंदु (Sublunar point) कहलाता है। इस बीच, ग्रह के दूसरी तरफ स्थित वह स्थान जो सीधे उप-चंद्र बिंदु के विपरीत है, प्रतिमुख बिंदु (Antipodal point) के रूप में जाना जाता है।यह कोई संयोग नहीं है कि महासागर के उभार उन दोनों स्थानों पर सबसे अधिक हैं। उप-चंद्र बिंदु और प्रतिमुख बिंदु पर, चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव में एक क्षैतिज घटक का अभाव होता है। यह अभाव, दुनिया के उन दो कोनों में भी है, जो इन स्थानों से 90 डिग्री की दूरी पर स्थित हैं। ये चार क्षेत्र, इस संबंध में अद्वितीय हैं कि पृथ्वी पर हर दूसरा स्थान एक क्षैतिज बल का अनुभव करता है, जो महासागर में पानी के अणुओं को या तो उप-चंद्र बिंदु या प्रतिमुख बिंदु की ओर धकेलता है। यही कारण है कि महासागर उन दोनों क्षेत्रों के ऊपर उभर जाता है। इस प्रकार, उप-चंद्र बिंदु पर चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल अपने सबसे मजबूत स्तर पर है, जबकि प्रतिमुख बिंदु पर चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव सबसे कमजोर है।हर 24 घंटे में एक बार, पृथ्वी अपने अक्ष के चारों ओर एक चक्कर पूरा करती है। जैसे-जैसे पृथ्वी घूमती है, ग्रह की सतह पर कोई भी स्थान उन दोनों महासागरीय उभारों से होकर गुजरता है। तो अधिकांश क्षेत्रों में, जब आपका घर सीधे किसी उभार के नीचे होता है, तो स्थानीय ज्वार उच्च होना चाहिए। लेकिन जैसे ही यह उभारों के बीच के क्षेत्र में प्रवेश करता है, तब ज्वार कम होना चाहिए। हालांकि, यह हमेशा ऐसा नहीं होता है। वास्तव में, सूर्य भी महासागरों पर गुरुत्वाकर्षण खिंचाव डालता है। लेकिन चूंकि सूर्य बहुत दूर है, इसलिए ज्वार-भाटे पर इसका प्रभाव चंद्रमा की तुलना में कम स्पष्ट होता है। फिर भी, यह नियमित रूप से ज्वारीय उभारों को काफी हद तक बढ़ाता है।ज्वार तब सबसे बड़े होते हैं, जब सूर्य और चंद्रमा एक सीधी रेखा में आते हैं। यह दो अलग-अलग चंद्र चरणों के दौरान होता है: पूर्णिमा और अमावस्या, जिसके परिणामस्वरूप ‘वसंत ज्वार (Spring tides)’ नामक बड़े आकार के ज्वार आते हैं। ध्यान दें कि इस नाम का वसंत के मौसम से कोई लेना-देना नहीं है, और वास्तव में, वसंत ज्वार पूरे वर्ष आते हैं। वसंत ज्वार के दौरान, उच्च और निम्न ज्वार अधिक चरम होते हैं। ‘उच्च ज्वार’ वास्तव में बहुत ऊंचे होते हैं और ‘निम्न ज्वार’ असाधारण रूप से कम होते हैं। जब सूर्य और चंद्रमा (पृथ्वी के सापेक्ष) एक-दूसरे के समकोण पर होते हैं, तो कम चरम ज्वार आते हैं। ऐसी स्थिति से ‘नीप टाइड्स (Neap tides)’ कहे जाने वाले ज्वार उत्पन्न होते हैं। नीप टाइड एक ऐसी अवधि है, जिसमें उच्च और निम्न ज्वार के बीच का अंतर न्यूनतम होता है। संदर्भ1. https://tinyurl.com/55asr7u82. https://tinyurl.com/36wswbwy3. https://tinyurl.com/33ky5f2b
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
उत्तर भारत में क्यों नहीं मनाते महाराष्ट्र जैसी गणेश चतुर्थी ? जानिए असली वजह
भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना में विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश का स्थान सर्वोपरि है। किसी भी नए कार्य, यात्रा अथवा मांगलिक अनुष्ठान के आरंभ में प्रथम पूज्य के रूप में उनका आह्वान किया जाता है। गणेश चतुर्थी, जिसे गणेशोत्सव और विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है, मूल रूप से भगवान गणेश के जन्मोत्सव, उनकी अगाध बुद्धि, शुभ शुरुआत और बाधाओं के निवारण का पावन पर्व है। यह 10 दिवसीय महापर्व घरों में मिट्टी की छोटी प्रतिमाओं की स्थापना से आरंभ होकर सार्वजनिक पंडालों की भव्यता और अंत में श्रद्धा-भरे विसर्जन जुलूस तक विस्तृत होता है। यह उत्सव केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मूर्तिकारों, संगीतकारों, फूल-विक्रेताओं, रसोइयों और सज्जाकारों के हुनर को एक साझा मंच प्रदान करता है, जहाँ व्यक्तिगत साधना सामुदायिक उल्लास में परिवर्तित हो जाती है।क्या है गणेश चतुर्थी की पौराणिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि?धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं में भगवान गणेश के प्राकट्य को लेकर कई आख्यान मिलते हैं। इनमें सबसे प्रचलित कथा माता पार्वती और भगवान शिव से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने अपनी सुरक्षा और एकांत की रक्षा के लिए अपने उबटन से एक बालक की रचना की और उसे द्वारपाल नियुक्त किया। जब भगवान शिव वहाँ पहुँचे, तो बालक ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। इस टकराव के परिणामस्वरूप बालक का मस्तक कट गया। माता पार्वती के गहन विलाप को देखकर भगवान शिव ने उन्हें एक हाथी का शीश लगाकर पुनर्जीवित किया और अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया। यह कथा केवल एक घटना नहीं है, बल्कि यह जीवन के कई गहरे व्यावहारिक संदेश देती है। यह सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य का निर्वहन पूरी निष्ठा से करना चाहिए, क्रोध विवेक के अभाव में विनाश लाता है, और संघर्ष के बाद भी प्रेम, स्वीकृति और पुनर्स्थापना संभव है।भगवान गणेश के शारीरिक स्वरूप में भी जीवन प्रबंधन के गूढ़ रहस्य समाहित हैं। उनका विशाल मस्तक व्यापक सोच और सुदृढ़ निर्णय क्षमता का प्रतीक माना गया है। उनके बड़े-बड़े कान धैर्यपूर्वक सुनने की महत्ता को दर्शाते हैं, जबकि उनकी सूक्ष्म आँखें गहन एकाग्रता और सूक्ष्म दृष्टि का बोध कराती हैं। उनकी सूंड शक्ति और परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलनशीलता (फ्लेक्सिबिलिटी) को रेखांकित करती है। उनका वाहन मूषक चंचल इच्छाओं और वासनाओं पर नियंत्रण का संकेत देता है, और उनके हाथ में स्थित मोदक सच्चे परिश्रम के उपरांत मिलने वाले मधुर परिणाम का द्योतक है। इस प्रकार, गणेश जी की आराधना केवल एक पारंपरिक क्रिया नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आचरण और सामाजिक व्यवहार में इन सद्गुणों को अपनाने का आह्वान है।क्या है गणपति पूजन से जुड़ा प्राचीन गण और टोटम का सामाजिक सिद्धांत?गणेश पूजा की ऐतिहासिक जड़ों को लेकर समाजशास्त्रियों और शोधकर्ताओं ने कई महत्वपूर्ण अवधारणाएँ प्रस्तुत की हैं। दक्कन क्षेत्र के प्राचीन इतिहास पर प्रस्तुत एक समाजशास्त्रीय शोध के अनुसार, प्राचीन काल में दक्कन में गण नामक गणतांत्रिक कबीले रहा करते थे। इन कबीलों के प्रमुख को 'गणपति' कहा जाता था। उस दौर में प्रत्येक कबीले का अपना एक विशिष्ट प्रतीक चिह्न होता था, जिसे टोटम (totem) कहा जाता था, और यह प्रायः किसी पशु के शीश के रूप में होता था।ऐतिहासिक विश्लेषण के अनुसार, जिस कबीले का टोटम गज-मुख (हाथी का सिर) था, उसने दक्कन के एक विस्तृत भूभाग पर अपना आधिपत्य और प्रभाव स्थापित किया। उस कबीले के प्रमुख अत्यंत लोकप्रिय हुए और जनमानस में उनके प्रति गहरा आदर भाव विकसित हो गया। कालांतर में, लोगों ने श्रद्धावश उनकी स्मृति और उपस्थिति को पूजना प्रारंभ किया। चूँकि उनके कबीले का प्रतीक हाथी का शीश था, इसलिए उनकी प्रतिमा का निर्माण भी गज-शीश के साथ किया जाने लगा। धीरे-धीरे समय बीतने के साथ यह कबीलाई परंपरा भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश के पौराणिक पूजन के साथ एकाकार हो गई और इसने एक सार्वभौमिक धार्मिक स्वरूप ग्रहण कर लिया।बाल गंगाधर तिलक ने 1892 में इस पर्व को सार्वजनिक आंदोलन क्यों बनाया?यद्यपि गणेश चतुर्थी का पर्व घरों के भीतर सदियों से मनाया जाता रहा था, परंतु इसे सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने का श्रेय राष्ट्रवादी नेता बाल गंगाधर तिलक को जाता है। वर्ष 1892 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने हिंदुओं के सार्वजनिक रूप से एकत्रित होने पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे थे। इन दमनकारी नियमों का रचनात्मक उत्तर देने के लिए बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव को सार्वजनिक पंडालों के रूप में आयोजित करने की प्रेरणा दी।सार्वजनिक पंडाल केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं रहे, बल्कि वे राष्ट्रीय विमर्श, बौद्धिक भाषणों, नाटकों, संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के प्रमुख केंद्र बन गए। इस मंच ने समाज के विभिन्न वर्गों, जातियों और स्तरों के लोगों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। यहाँ से जो सामाजिक एकता और नागरिक एकजुटता की नींव पड़ी, वह आज भी जीवित है। आज भी अनेक गणेश मंडल न केवल धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, बल्कि रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य सेवाएँ और सामाजिक कल्याणकारी कार्य आयोजित करके उसी लोक-कल्याणकारी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।उत्तर भारत और महाराष्ट्र के उत्सवों की प्रकृति में क्या भिन्नता है?सांस्कृतिक दृष्टि से यह प्रश्न प्रायः उठता है कि उत्तर भारत में गणेश चतुर्थी उस पैमाने पर क्यों नहीं मनाई जाती, जिस प्रकार महाराष्ट्र और कर्नाटक में देखी जाती है। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में रामनवमी, जन्माष्टमी, और विशेषकर होली तथा दिवाली को कहीं अधिक व्यापक स्तर पर मनाया जाता रहा है। दिवाली और होली केवल धार्मिक तिथियाँ नहीं हैं, बल्कि वे प्रत्यक्ष रूप से कृषि और फसलों के चक्र से जुड़ी हुई हैं, जिसके कारण ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उनका जुड़ाव अत्यंत गहरा है।दूसरी ओर, ऐतिहासिक रूप से महाराष्ट्र में उस दौर में होली और दिवाली का स्वरूप उत्तरी मैदानों जितना विशाल नहीं था। 1892 में तिलक द्वारा की गई पहल के बाद महाराष्ट्र और गोवा के अंचल में गणेश चतुर्थी को सामूहिक पंडाल संस्कृति के रूप में जो विस्तार मिला, वह उत्तर भारत के पारंपरिक घरेलू उत्सवों से भिन्न था। उत्तर भारत में भगवान गणेश की पूजा अनिवार्य रूप से प्रत्येक शुभ कार्य और दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ की जाती है, किंतु 10 दिनों तक बप्पा की प्रतिमा घर लाकर बिठाने और सार्वजनिक पंडाल सजाने का चलन ऐतिहासिक रूप से मुख्य रूप से दक्कन और पश्चिमी भारत तक ही केंद्रित रहा।महाराष्ट्र, गोवा और दिल्ली में किस तरह सजते हैं बप्पा के दरबार?महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की भव्यता देखते ही बनती है। मुंबई में 'गणपति बप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया' के गगनभेदी जयकारों के बीच पूरा शहर जीवंत हो उठता है। यहाँ के प्रसिद्ध पंडालों में लालबागचा राजा, खेतवाड़ी गणराज, गणेश गल्ली मुंबईचा राजा और अंधेरीचा राजा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जहाँ दर्शन के लिए मीलों लंबी कतारें लगती हैं। सांस्कृतिक राजधानी पुणे में यह पर्व अत्यंत प्रामाणिक और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। पुणे के पंडालों में शास्त्रीय कला, लोकनृत्य और मोदक व लड्डुओं का विशेष भोग लगाया जाता है।पड़ोसी राज्य गोवा में भी इस पर्व की अनुपम छटा देखने को मिलती है। यहाँ लोग अपने घरों की गहन सफ़ाई करते हैं और सगे-संबंधियों के यहाँ मिलने जाते हैं। गोवा के मार्सेल और मपुसा ऐसे प्रमुख स्थल हैं, जहाँ प्राचीन मंदिरों की उपस्थिति के कारण गणेश चतुर्थी का आयोजन अत्यंत वैभवशाली होता है।देश की राजधानी दिल्ली का स्वरूप अपनी विविधता के लिए जाना जाता है। दिल्ली के पंडालों में एक ओर जहाँ विभिन्न राज्यों की परंपराओं का संगम दिखाई देता है और भगवान गणेश की विशालकाय प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं, वहीं दूसरी ओर मंदिरों में आचार्यों और पुरोहितों द्वारा वेद और उपनिषदों की ऋचाओं का सस्वर पाठ वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।दक्षिण भारत और हैदराबाद में कैसे मनाया जाता है यह पावन पर्व?दक्षिण भारत के राज्यों में गणेश चतुर्थी का उल्लास एक विशिष्ट धार्मिक क्रम के साथ प्रकट होता है। तमिलनाडु और कर्नाटक में गणेश चतुर्थी से ठीक एक दिन पहले गौरी हब्बा (या गोवरी हब्बा) मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता है कि पुत्र के आगमन से पूर्व माता का स्वागत किया जाता है; अतः पहले दिन भगवान गणेश की माता, देवी गौरी की विधिवत प्रतिष्ठा और आराधना होती है, और उसके अगले दिन भगवान गणेश का स्वागत किया जाता है। कर्नाटक में इस अवसर पर गोज्जू, मोदकम और पायसम जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाकर अर्पित किए जाते हैं।तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में गणेशोत्सव का उत्साह अत्यंत भव्य रूप में सामने आता है। यहाँ 10 दिनों तक निरंतर चलने वाले आयोजनों में श्रद्धालु भारी संख्या में एकत्र होते हैं। पूजन के दौरान भगवान को उंद्राल्लू, कुडुमुलु और चावल की खीर (राइस पॉरिज) का विशेष नैवेद्य चढ़ाया जाता है। हैदराबाद का खैराताबाद मंडल अपनी विशाल प्रतिमाओं के लिए देशभर में विख्यात है। यहाँ 60 फीट तक ऊँची गणेश प्रतिमा स्थापित की जाती है और भगवान के बाएँ हाथ में लगभग 5,600 किलोग्राम वजनी महालड्डू का भोग रखा जाता है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुँचते हैं।सात समंदर पार पेरिस की सड़कों पर कैसे गूंजते हैं गणपति के जयकारे?भगवान गणेश की आराधना की गूँज भारत की भौगोलिक सीमाओं को पार कर यूरोप तक जा पहुँची है। फ़्रांस की राजधानी पेरिस (Paris) के 18वें एरोन्डिसमेंट (18th arrondissement) में प्रतिवर्ष गणेश महोत्सव का भव्य आयोजन किया जाता है। यह पूरा आयोजन ला चैपल (La Chapelle) क्षेत्र में स्थित श्री मणिका विनायकरालयम (Sri Manicka Vinayakar Alayam) मंदिर द्वारा संपन्न कराया जाता है।रविवार, 30 अगस्त को आयोजित होने वाले इस वार्षिक उत्सव में हिंदू समुदाय के हज़ारों श्रद्धालु और स्थानीय नागरिक सम्मिलित होते हैं। मंदिर में पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों और अभिषेक के उपरांत भगवान गणेश की भव्य प्रतिमा को एक सुसज्जित रथ पर विराजमान किया जाता है। इस रथ को श्रद्धालु रस्सियों के सहारे खींचते हुए पेरिस की प्रमुख सड़कों से निकालते हैं। इस शोभायात्रा में गायक और वादक भजन-कीर्तन प्रस्तुत करते हुए चलते हैं, जो एक कार्निवल (carnival) जैसा उल्लासमय दृश्य प्रस्तुत करता है। यात्रा के मार्ग में उपस्थित जनसमूह के बीच प्रसाद, पारंपरिक मिठाइयाँ और शीतल पेय वितरित किए जाते हैं, जो भारतीय संस्कृति के वैश्विक विस्तार और सौहार्द का जीवंत प्रमाण है।विसर्जन का आध्यात्मिक और पर्यावरणीय संदेश क्या है?गणेश चतुर्थी के 10वें दिन अनंत चतुर्दशी पर प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। मुंबई में अरब सागर के तटों पर और अन्य शहरों में विभिन्न जलाशयों में जब बप्पा को विदाई दी जाती है, तो वह दृश्य अत्यंत भावुक होता है। विसर्जन का वास्तविक दार्शनिक अर्थ यह है कि भौतिक आकार नश्वर और अस्थायी हैं। जिस प्रकार मिट्टी से बनी प्रतिमा जल में विलीन होकर पुनः प्रकृति का अंग बन जाती है, उसी प्रकार समस्त सांसारिक रूप अंततः विराट ईश्वरीय सत्ता में समाहित हो जाते हैं।वर्तमान समय में जलस्रोतों के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक चिकनी मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बनी मूर्तियों के उपयोग पर विशेष बल दिया जा रहा है। विसर्जन की यह रस्म हमें सिखाती है कि जीवन में परिवर्तन को सहजता से स्वीकार करना चाहिए और विदाई के क्षणों में भी आगामी वर्ष में बप्पा के पुनः आगमन की मंगलकामना और कृतज्ञता का भाव बनाए रखना चाहिए।संदर्भ1. https://tinyurl.com/2635jfn42. https://tinyurl.com/2ayg93jh3. https://tinyurl.com/28yfl2ws4. https://tinyurl.com/2a4257ye
बैक्टीरिया, प्रोटोज़ोआ, क्रोमिस्टा और शैवाल
क्रूज शिप पर फैला रहस्यमयी हंता वायरस क्या भारत के लिए भी है खतरा?
हाल ही में एमवी होंडियस (MV Hondius) नामक एक क्रूज शिप (cruise ship) पर एक जानलेवा संक्रमण फैलने से पूरी दुनिया के स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ गई हैं। यह क्रूज शिप अर्जेंटीना से केप वर्डे की यात्रा पर था, जहां कई यात्रियों में गंभीर श्वसन संबंधी बीमारियां देखी गईं। जांच में यह बात सामने आई कि यह संक्रमण हंता वायरस के एंडीज स्ट्रेन (Andes strain) के कारण फैला है। इस वायरस की चपेट में आने से एक डच महिला की मृत्यु हो गई, जबकि ब्रिटिश और स्विस यात्री गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हुए। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2025 में ऑस्कर विजेता अभिनेता जीन हैकमैन (Gene Hackman) की पत्नी बेट्सी अराकावा (Betsy Arakawa) का निधन भी इसी वायरस से जुड़ी सांस की बीमारी के कारण हुआ था, जिसके बाद उनके घर के आस-पास चूहों के घोंसले पाए गए थे। इस खतरनाक वायरस ने वैश्विक स्तर पर यह बहस छेड़ दी है कि क्या चूहों से फैलने वाली यह बीमारी एक नई महामारी का रूप ले सकती है।हंता वायरस क्या है और यह कैसे फैलता है?हंता वायरस कोई एक अकेला वायरस नहीं है, बल्कि यह वायरसों का एक पूरा समूह है जो मुख्य रूप से चूहों और कृंतकों द्वारा फैलता है। इस वायरस का नाम दक्षिण कोरिया की एक नदी के नाम पर रखा गया है। यह वायरस बुन्याविरालेस ऑर्डर (Order Bunyavirales) के हंताविरिडे फेमिली (Family Hantaviridae) से संबंधित है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जो चूहे इस वायरस को अपने शरीर में लेकर घूमते हैं, वे खुद कभी बीमार नहीं पड़ते। यह वायरस चूहों के मल, मूत्र और लार में मौजूद होता है।जब चूहे किसी बंद जगह पर मल-मूत्र करते हैं और वह सूख जाता है, तो सफाई करते समय या हवा के झोंके से उसके कण हवा में मिल जाते हैं। जब इंसान इस दूषित हवा में सांस लेता है, तो यह वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसे एरोसोलाइज्ड ट्रांसमिशन (aerosolized transmission) कहा जाता है। इसके अलावा, चूहों द्वारा खाए गए या जूठे किए गए भोजन का सेवन करने, वायरस से दूषित सतहों को छूने के बाद उन्हीं हाथों से अपनी आंख, नाक या मुंह को छूने, या संक्रमित चूहे के काटने और खरोंचने से भी यह संक्रमण इंसानों में फैल सकता है।क्रूज शिप पर यह आउटब्रेक कैसे हुआ और एंडीज स्ट्रेन क्यों है खतरनाक?एमवी होंडियस क्रूज शिप का मामला चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यह शिप एक अप्रैल 2026 को अर्जेंटीना के उशुआइया से निकला था और पहला मामला छह अप्रैल को सामने आया। चूंकि इस वायरस का इन्क्यूबेशन पीरियड (incubation period) आमतौर पर लंबा होता है, इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि पहले यात्री को यह संक्रमण क्रूज पर चढ़ने से पहले ही अर्जेंटीना में बर्ड-वाचिंग (पक्षियों को देखने) की किसी गतिविधि के दौरान चूहों के संपर्क में आने से हुआ होगा।चिंता का असली कारण एंडीज स्ट्रेन है। आमतौर पर हंता वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में नहीं फैलता है। लेकिन दक्षिण अमेरिका (विशेषकर अर्जेंटीना और चिली) में पाया जाने वाला एंडीज स्ट्रेन इसका एकमात्र अपवाद है। जब कोई व्यक्ति इस स्ट्रेन से संक्रमित होता है, तो बहुत करीबी और लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले परिवार के सदस्यों या देखभाल करने वालों में यह वायरस फैल सकता है। क्रूज शिप पर दूसरा मामला पहले मरीज के बेहद करीबी संपर्क वाले व्यक्ति का ही था, जो इस बात का प्रबल संकेत देता है कि यह वायरस इंसान से इंसान में फैला है। इससे पहले 2018 में भी अर्जेंटीना में एक पार्टी के दौरान एक ही संक्रमित व्यक्ति से 34 लोग संक्रमित हुए थे, जिनमें से 11 की मौत हो गई थी।हंता वायरस से संक्रमित होने पर शरीर में क्या लक्षण दिखाई देते हैं?वायरस के संपर्क में आने और बीमारी के लक्षण दिखने के बीच का समय (इन्क्यूबेशन पीरियड) एक से आठ सप्ताह तक का हो सकता है। यह वायरस दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दो तरह की गंभीर बीमारियां पैदा करता है। उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में यह हंता वायरस पल्मोनरी सिंड्रोम (Hantavirus Pulmonary Syndrome - एचपीएस) का कारण बनता है। शुरुआती दौर में मरीज को तेज बुखार, सिरदर्द, थकान, ठंड लगना और शरीर की बड़ी मांसपेशियों (जैसे जांघ, कूल्हे और पीठ) में तेज दर्द होता है। कुछ लोगों को पेट दर्द, मतली, उल्टी और डायरिया की शिकायत भी होती है।चार से दस दिन बीत जाने के बाद, यह बीमारी अपने दूसरे और अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश करती है। वायरस फेफड़ों की छोटी रक्त वाहिकाओं (केपिलरीज - capillaries) पर हमला करता है, जिससे उनमें रिसाव होने लगता है और फेफड़ों में पानी भर जाता है। इसके कारण मरीज को भयानक खांसी आती है, सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई होती है और शरीर में ऑक्सीजन की कमी से उसकी जान जा सकती है। एचपीएस बेहद घातक है और इसमें मृत्यु दर 30 से 50 प्रतिशत तक होती है।वहीं दूसरी ओर, यूरोप और एशिया में यह वायरस हेमोरेजिक फीवर विद रीनल सिंड्रोम (hemorrhagic fever with renal syndrome - एचएफआरएस) का कारण बनता है। इसमें बुखार, धुंधली दिखाई देना और पीठ दर्द के साथ-साथ गंभीर मामलों में लो ब्लड प्रेशर, आंतरिक रक्तस्राव और एक्यूट किडनी फेलियर (acute kidney failure) की समस्या उत्पन्न हो जाती है। एचएफआरएस में मृत्यु दर आमतौर पर 1 से 15 प्रतिशत के बीच होती है।जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय बदलाव कैसे बढ़ा रहे हैं इसका खतरा?शोधकर्ताओं का मानना है कि हंता वायरस जैसे जूनोटिक रोगों (जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियां) के बढ़ने के पीछे जलवायु परिवर्तन और बेतरतीब शहरीकरण एक बहुत बड़ा कारण है। जैसे-जैसे जंगलों की कटाई हो रही है और इंसान कृषि और रिहायशी मकसदों के लिए वन्यजीवों के आवास में अतिक्रमण कर रहा है, इंसानों और चूहों के बीच का संपर्क तेजी से बढ़ रहा है।तापमान में वृद्धि और अनियमित बारिश के कारण चूहों के खाने की उपलब्धता में बदलाव आता है। जब भोजन प्रचुर मात्रा में होता है, तो चूहों की आबादी में विस्फोट होता है। आबादी बढ़ने पर ये चूहे भोजन और आश्रय की तलाश में इंसानों के घरों, खलिहानों और भंडारण स्थलों में घुस जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे महाद्वीप में जहां अब तक हंता वायरस का कोई मानव मामला दर्ज नहीं किया गया है, वहां भी कुछ चूहों में इसके एंटीबॉडी पाए गए हैं। यह इस बात का संकेत है कि वायरस पर्यावरण में खामोशी से मौजूद है और परिस्थितियां अनुकूल होने पर कभी भी प्रकोप फैला सकता है।क्या भारत को भी हंता वायरस से सतर्क रहने की आवश्यकता है?यद्यपि वर्तमान में हंता वायरस का केंद्र दक्षिण अमेरिका और यूरोप रहा है, लेकिन भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए यह एक मूक खतरा बन सकता है। भारत में मानसून के दौरान बाढ़, जलभराव और सीवेज ओवरफ्लो के कारण चूहों का आतंक बढ़ जाता है। मुंबई, दिल्ली और कोलकाता जैसे महानगरों में पुरानी इमारतों, रेलवे नेटवर्क और घनी बस्तियों के कारण इंसानों और चूहों का संपर्क बहुत अधिक है।भारत में हंता वायरस को लेकर सबसे बड़ी चुनौती इसके लक्षणों का अन्य बीमारियों से मेल खाना है। इसके शुरुआती लक्षण बिल्कुल डेंगू, मलेरिया, लेप्टोस्पायरोसिस (leptospirosis), इन्फ्लूएंजा (influenza) और वायरल बुखार जैसे होते हैं। इस कारण अधिकांश डॉक्टर प्रारंभिक जांच में हंता वायरस पर संदेह ही नहीं करते। अतीत में दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में हंता वायरस के एंटीबॉडी और संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (Indian Council of Medical Research - आईसीएमआर) ने कोविड-19 के बाद अपनी निगरानी प्रणाली को मजबूत किया है, लेकिन ग्रामीण और छोटे शहरों के अस्पतालों में अभी भी इस दुर्लभ बीमारी की सटीक जांच (आरटी-पीसीआर (RT-PCR)और आईजीएम एंटीबॉडी टेस्ट (IgM Antibody Test)) के लिए बुनियादी ढांचे का अभाव है। यदि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में मौजूद चूहों में इस वायरस का प्रसार होता है, तो खराब स्वच्छता और घनी आबादी के कारण यह तेजी से फैल सकता है।इस जानलेवा वायरस से बचाव और रोकथाम के क्या उपाय हैं?चूंकि हंता वायरस मुख्य रूप से चूहों से फैलता है, इसलिए उनसे बचाव ही इस बीमारी की सबसे अच्छी रोकथाम है। स्वास्थ्य एजेंसियों द्वारा कुछ सख्त दिशानिर्देश जारी किए गए हैं।अगर घर, गैराज या गोदाम में चूहों का मल-मूत्र दिखाई दे, तो उसे कभी भी सूखी झाड़ू या वैक्यूम क्लीनर से साफ न करें। ऐसा करने से वायरस हवा में उड़ने लगता है। सफाई से पहले चूहों के मल पर ब्लीच और पानी का घोल (या कोई मजबूत कीटाणुनाशक) छिड़कें और उसे पांच मिनट तक भीगने दें। इसके बाद पेपर टॉवल से पोंछकर उसे कचरे में फेंक दें। सफाई करते समय हमेशा रेस्पिरेटर मास्क और रबर या प्लास्टिक के दस्ताने पहनें। सफाई के बाद हाथों को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोना अनिवार्य है।घरों में चूहों के प्रवेश को रोकने के लिए दीवारों और दरवाजों के सभी छेदों (एक चौथाई इंच तक के) को स्टील वूल, जाली या सीमेंट से बंद करें। घर के बर्तन तुरंत धोएं और खाने-पीने की चीजों व पालतू जानवरों के भोजन को एयर-टाइट डिब्बों में बंद करके रखें। जिन केबिनों, स्टोरेज शेड या कमरों का लंबे समय से उपयोग नहीं हुआ है, वहां जाने से पहले दरवाजे और खिड़कियां खोलकर आधे घंटे तक ताजी हवा आने दें।इसके अलावा, गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों (5 वर्ष से कम) और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को पालतू चूहों (पेट रैट्स) से दूर रहना चाहिए। चूहों को पालने वालों को लगातार पिंजरे की सफाई और जानवरों के परीक्षण का ध्यान रखना चाहिए। क्या हंता वायरस का कोई सटीक इलाज या वैक्सीन उपलब्ध है?वर्तमान में हंता वायरस संक्रमण के लिए पूरी दुनिया में कोई भी प्रमाणित विशिष्ट एंटीवायरल उपचार या व्यापक रूप से उपलब्ध वैक्सीन नहीं है। इस बीमारी का इलाज मुख्य रूप से लक्षणों के आधार पर (सपोर्टिव केयर) किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति को चूहे वाले वातावरण में रहने के बाद तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ होती है, तो उसे तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए।अस्पताल में मरीजों को ऑक्सीजन थेरेपी दी जाती है। गंभीर एचपीएस मामलों में मरीजों को इंट्यूबेशन (intubation) या वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ सकती है। वहीं, एचएफआरएस के मरीजों में किडनी फेल होने की स्थिति में डायलिसिस का सहारा लिया जाता है, ताकि शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकाला जा सके और तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखा जा सके। सही समय पर आईसीयू (सघन चिकित्सा कक्ष) में भर्ती होने से मरीज की जान बचने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/25vrvc27 2. https://tinyurl.com/22hl9j78 3. https://tinyurl.com/24fymyog 4. https://tinyurl.com/2486aeho 5. https://tinyurl.com/23tpwyja 6. https://tinyurl.com/2dj9ckvb 7. https://tinyurl.com/29ls2gdq 8. https://tinyurl.com/2yp6n7lx
धर्म का युग : 600 ई.पू. से 300 ई.
रोमन साम्राज्य में एनीड व भारतवर्ष में रामायण महाकाव्य में युवा पीढ़ी के लिएं प्रेरणा
लखनऊ, आज हम विश्व प्रसिद्ध काव्य ‘एनीड (Aeneid)’ एवं हमारी भारतभूमि पर रचित ‘रामायण’ काव्य के बारे में जानेंगे। शीर्ष लैटिन (Latin) कवियों में से एक माने जाने वाले वर्जिल (Virgil) ने, अपने जीवन के अंतिम दस वर्षों (29 ईसा पूर्व-19 ईसा पूर्व) में ‘एनीड’ की रचना की थी। यह उनकी सर्वोत्कृष्ट कृति थी। हालाँकि दुर्भाग्यवश, इस काव्य के संपादन के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई। अपनी कृति अधूरी रह जाने से, वे इतने व्यथित थे कि उन्होंने अपनी मृत्यु के बाद इस काव्य को जला देने की इच्छा व्यक्त की थी। किंतु एनीड की अधूरी स्थिति में भी इसके एक ऐसे प्रशंसक थे, जिन्होंने इसके प्रारूपों को पहले ही देख रखा था। अतः उन्होंने अपने मित्र की अंतिम इच्छा को दरकिनार करते हुए, कुछ मामूली संशोधनों के साथ इसे प्रकाशित करवाया।एनीड, युवाओं के लिए अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि इसमें ट्रोजन राजवंश (Trojan royal family) के एक राजकुमार ऐनियस (Aeneas) की इटली-यात्रा का वर्णन है, जहाँ उसके लिए एक नए वंश व राज्य की भविष्यवाणी की गई है। ‘इलियाड (Iliad)’ काव्य के अनुसार, ट्रॉय (Troy) राज्य के विनाश के बाद सुरक्षित बचे कुछ सैनिकों व नागरिकों के साथ बच निकलता है। वहाँ, वह एक ऐसे स्वाभिमानी और साहसी वंश की नींव रखेगा, जिसकी कीर्ति संपूर्ण विश्व में फैलेगी। यह प्रसंग स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि ऐनियस एक युवा था, जो भविष्य में रोमन साम्राज्य (Roman Empire) की नींव रखने वाली भावी पीढ़ी का सही मार्गदर्शन और पालन-पोषण करेगा।युवाओं के लिए इसकी प्रासंगिकता का दूसरा कारण यह है कि इस महाकाव्य के अधिकांश पात्र युवा हैं। उदाहरण के लिए, जब ऐनियस की मां - देवी वीनस (Venus) उसे शहर के इतिहास से परिचित कराती हैं, तो वह उसे देवी जूनो (Juno) की कृपा प्राप्त करने हेतु उनके मंदिर जाने के लिए प्रेरित करती हैं। ऐनियस की समुद्री जहाज़ी यात्रा के दौरान, अफ्रीका के तट पर यह प्रसंग हुआ था। तत्पश्चात्, ऐनियस नगर में प्रवेश करता है और जूनो के मंदिर में कार्थेज की रानी (Queen of Carthage) - डिडो (Dido) की कृपादृष्टि प्राप्त करता है। यह घटना बताती है कि एक युवा होने के नाते, ऐनियस को अपनी यात्रा के दौरान पग-पग पर अपनी मां के मार्गदर्शन पर निर्भर रहना पड़ा, क्योंकि वह उस स्थान से पूर्णतः अनभिज्ञ था।ऐनियस के वंशज भविष्य में इस नगर पर पुनः विजय प्राप्त न कर सकें, इस आशंका से चिंतित होकर, वीनस अपने पुत्र की सुरक्षा हेतु एक योजना बनाती हैं। वह ऐनियस के सौतेले भाई - क्यूपिड (Cupid) को असकैनियस (Ascanius) का छद्म रूप देकर भेजती हैं। क्यूपिड, डिडो को उपहार भेंट करता है। तब, डिडो के मन में वात्सल्य-भाव जागृत होता है और वह ऐनियस के प्रेम में बंध जाती है। अपने दिवंगत पति के प्रति वफादार होने के बावजूद, वह ऐनियस के प्रति अत्यंत आसक्त हो जाती है। इस संदर्भ में, यह रचना ऐनियस और उसकी पीढ़ी के भविष्य तथा उसकी सफलता को लेकर चिंतित मां के प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करती है। वीनस द्वारा रचा गया यह संपूर्ण ताना-बाना, यह दर्शाता है कि भविष्य युवा पीढ़ी पर ही निर्भर करता है और उनका मार्गदर्शन करना अत्यंत आवश्यक है।इसके विपरीत, हमारे भारतवर्ष की पौराणिक कहानी - रामायण, उस कालखंड के समाज का चित्रण करती है, जहाँ विशाल साम्राज्य हैं; एक भावी राजा के रूप में राजकुमार का प्रशिक्षण किया जा रहा है; माता और सौतेली माताओं के मध्य द्वंद्व है; भाइयों में पारस्परिक प्रेम व निष्ठा है; और राजकुमारी के स्वयंवर की प्रतियोगिताएं हैं। रामायण, मुख्य रूप से वयस्क पीढ़ी के उत्तरदायित्वों पर केंद्रित है, क्योंकि इसमें नेतृत्व, पारिवारिक अंतर्द्वंद्व और प्रेम के गंभीर पक्षों का विवेचन है। ये गुण युवाओं की तुलना में प्रौढ़ एवं वयस्क व्यक्तियों में अधिक दृष्टिगोचर होते हैं।इसके अतिरिक्त, रामायण, एक नैतिक पुरुष और जननायक के आदर्श आचरण का निरूपण करता है, फिर चाहे वह संयमपूर्वक परिस्थितियों का सामना करना हो, दायित्वों को निष्ठा से निभाना हो, व्यक्तिगत दुःखों और सीमाओं से परे रहकर स्वशासित रहना हो, या समाज में प्रेम और सम्मान का भाव जगाना हो। दूसरी तरफ, माता सीता यह अनुभव करती हैं कि धरती पर उनका समय समाप्त हो चुका है, एवं वे धरती माता की गोद में समा जाती हैं। तत्पश्चात्, भगवान राम-सीता के दोनों पुत्र - लव और कुश, अपने पिता के साथ तब तक अयोध्या में रहते हैं, जब तक कि वे राज्य के उत्तराधिकारी नहीं बन जाते। यह हमें सीख देता है कि एक शासक को अपने जीवनकाल के बाद पुत्रों को योग्य बनाकर राज्य सौंपना चाहिए। पुत्रों ने भी अपने पिता से नेतृत्व कला के समस्त गुण सीखे, ताकि वे उस दायित्व को सफलतापूर्वक संभाल सकें।एक अलग विषय में, पैगंबर मुहम्मद की जीवनी, जिसे ‘सीरा’ के नाम से जाना जाता है, सर्वप्रथम आठवीं शताब्दी के विद्वान इब्न इसहाक द्वारा संकलित की गई थी। बाद में, इब्न हिशाम द्वारा इसे पुनः संपादित व परिमार्जित किया गया। वास्तव में, यह ग्रंथ पैगंबर साहब के जीवन की घटनाओं को कालक्रमानुसार प्रस्तुत करने के लिए मौखिक परंपराओं, वृत्तांतों और संदर्भ-योग्य कविताओं का एक चुनिंदा संकलन है। मौखिक विवरणों का यह संक्षिप्त रूप, पैगंबर साहब के जीवन और उपदेशों पर केंद्रित कई अन्य रचनाओं का मूल आधार भी बनता है। इनमें से कुछ ‘हदीस’ के नाम से प्रख्यात भविष्यवाणी परंपराओं के संग्रह हैं, जो इस्लामी कानून के स्रोतों में से एक हैं। इब्न इसहाक की यह कृति, उस व्यापक विद्वतापूर्ण एवं ऐतिहासिक साहित्य का अभिन्न अंग है, जो कुरान के साथ मिलकर इस्लामी आस्था (अकीदा) की नींव रखता है। यह आज भी संपूर्ण मुस्लिम जगत के लिए अत्यंत महत्त्व रखता है।हाल ही में, एक अरब इतिहासकार तारिफ अल-खालिदी ने रेखांकित किया है कि ‘अपने इसी मौलिक स्वरूप के कारण, 'सीरा' और 'हदीस' के विद्वानों द्वारा प्रस्तुत इतिहास का यह दृष्टिकोण, मिखाइल बख्तिन की शब्दावली में एक 'महाकाव्यात्मक चरित्र' धारण करता है’। यद्यपि खालिदी ने इस विचार को आगे विस्तृत नहीं किया, किंतु सीरा उन लक्षणों को दर्शाती है, जिन्हें अन्य विश्व-परंपराओं में महाकाव्य का दर्जा प्राप्त है।तुलनात्मक रूप में, 'एनीड' महाकाव्य, संभवतः पहली बार दो परस्पर विरोधी आदर्शों - मानवतावाद और साम्राज्यवाद को एक साथ अभिव्यक्ति देता है। इन्हें लंबे समय से यूरोपीय चेतना का आधार माना जाता रहा है। मानवतावाद, वर्जिल के मित्र और शत्रु दोनों के प्रति गहरी मानवीय संवेदना तथा दया व नम्रता के भाव में दिखाई देता है। इसी कारण, उन्हें ईसाई धर्म का पूर्वगामी भी माना गया। इसके विपरीत, साम्राज्यवाद 'एनीड' में वर्णित रोम की न्यायप्रिय सत्ता की अवधारणा में झलकता है, जिसे बाद के यूरोपीय और अमेरिकी साम्राज्यवादी विचारों का वैचारिक आधार माना जा सकता है।दूसरी तरफ, सीरा के साथ तुलना के लिए महर्षि वाल्मीकि रचित संस्कृत ‘रामायण’ चुना गया है। इसके केंद्र में धर्म एवं धार्मिकता की एक भिन्न अवधारणा है। रामायण की “प्रकृति और मनुष्य के बीच पूर्ण सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व” को पुनर्स्थापित करने वाले एकीकरण बल की अवधारणा ने भारतीय संस्कृति पर अमिट छाप छोड़ी है। इसकी यह शाश्वत प्रासंगिकता 'एनीड' और 'सीरा' के समतुल्य है। यह बात तब और भी स्पष्ट हो जाती है, जब हम रामायण से प्रेरित होकर लिखे गए उत्तरवर्ती पुनर्कथनों को देखते हैं। इसका उदाहरण, मध्यकालीन हिंदी में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' है, जिसे महात्मा गांधी संपूर्ण भक्ति-साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचना मानते थे। यहां ध्यान देने योग्य एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि ऋषि कंबन द्वारा रचित तमिल रामायण का उपयोग, 17वीं शताब्दी के कवि उमारू पुलावर ने "पैगंबर मुहम्मद की तमिल जीवनी" के लिए एक साहित्यिक मॉडल के रूप में किया था। यह इन दोनों आख्यानों के आपसी संबंध का एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है।दूसरी तरफ, 'एनीड' की कथा, महाभारत की तुलना में भी काफी सरल और सीधी है। ऐनियस की कथा में, उसके लिए इटली में एक नई मातृभूमि और रोमनों के पूर्वज के रूप में स्थापित होने के बारे में है। पांडवों की भांति, ऐनियस भी एक दैवीय संतान है। उसकी मां प्रेम की देवी वीनस हैं, और ओलम्पियन देवी-देवता इस महाकाव्य की घटनाओं में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इनमें से अधिकांश परिस्थितियां प्रतिशोधी देवी जूनो द्वारा उत्पन्न की जाती हैं, जो ट्रोजन शरणार्थियों से घृणा करती है। वर्जिल, इस वृत्तांत का उपयोग रोम की स्थापना की पौराणिक कथा को विस्तार देने और ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वियों की शत्रुता का पौराणिक कारण स्पष्ट करने के लिए करते हैं। साथ ही, सीज़र वंश (Caesar dynasty) की राजनीतिक सत्ता को वैधता और पौराणिक आधार प्रदान करने के लिए भी वे इसका उपयोग करते हैं।इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि रामायण व एनीड दोनों काव्यों में ऐसी महिलाएं हैं, जो नायक को उसके महान लक्ष्य से भटकाती हैं; इनमें देवताओं की कृपा और कोप की लीलाएं हैं; और अन्य साम्राज्यों की रहस्यमयी यात्राएं हैं। ये कुछ ऐसे तत्त्व हैं, जो इन महाकाव्यों की समानता को सिद्ध करते हैं। संदर्भ1. https://tinyurl.com/b2efyb52 2. https://tinyurl.com/4n394955 3. https://tinyurl.com/4wsu9x43
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
हमारे लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब: यहाँ धर्म की सीमाओं से परे कैसे बँधती है प्यार भरी राखी?
लखनऊ, चलिए आज रक्षाबंधन के अवसर पर इस त्योहार के बारे में जानते हैं। संस्कृत शब्द ‘रक्षा बंधन’ का अर्थ, ‘सुरक्षा का एक पावन बंधन’ है। यह आधुनिक त्योहार हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन, आमतौर पर अगस्त के महीने में मनाया जाता है। कई अन्य भारतीय त्योहारों की तरह, रक्षाबंधन की जड़ें भी प्राचीन पौराणिक कथाओं में मिलती हैं, और प्रत्येक कथा इसके अर्थ में एक नई परत जोड़ती है।रक्षाबंधन को लेकर, श्रीकृष्ण एवं द्रौपदी की कहानी शायद महाभारत की सबसे प्यारी और लोकप्रिय कहानी है। जब युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण की उंगली कट गई, तो द्रौपदी ने बिना एक पल गँवाए अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर, उनकी उंगली पर बाँध दिया। इस भाव से द्रवित होकर कृष्ण ने हमेशा के लिए उनकी रक्षा करने का संकल्प लिया। देखभाल और पारस्परिकता का यह सरल कार्य, आगे चलकर रक्षाबंधन का एक दिव्य रूप बन गया, जिसका जैविक भाई-बहन के रिश्ते से परे प्रेम, निश्छलता और सम्मान से गहरा नाता है।एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, मृत्यु के देवता यम एक वर्ष से अधिक समय से अपनी बहन यमुना से मिलने नहीं जा पाए थे। जब वे अंततः उनसे मिलने गए, तो यमुना ने उनकी कलाई पर राखी बाँधी और स्वादिष्ट मिठाइयों से उनका स्वागत किया। इस आत्मीयता से प्रसन्न होकर, यम ने उन्हें अमरता का वरदान दिया और हर वर्ष मिलने आने का संकल्प लिया। इससे रक्षाबंधन पर बहनों से मिलने और इस दिन को केवल राखी बाँधने तक सीमित न रखकर स्नेह का उत्सव बनाने की परंपरा को बढ़ावा मिला।दूसरी ओर, भविष्य पुराण के अनुसार, देवताओं के राजा इंद्र की पत्नी शची ने युद्ध में जाने से पहले उनकी विजय और सुरक्षा के लिए उनकी कलाई पर एक पवित्र धागा बाँधा था। उस समय इसे ‘राखी’ नहीं कहा जाता था, लेकिन इसके पीछे की भावना अपने प्रिय व्यक्ति को अपनी शुभकामनाओं की ताकत और सुरक्षा का आशीर्वाद देना थी।रक्षाबंधन केवल पौराणिक कथाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने भारतीय इतिहास में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 16वीं शताब्दी में, जब चित्तौड़गढ़ पर गंभीर खतरा मंडरा रहा था, तब मेवाड़ की साहसी रानी कर्णवती ने अपनी रक्षा की गुहार लगाते हुए मुगल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजी थी। उनके इस निश्छलता भरे भाव से प्रभावित होकर हुमायूँ अपनी सेना के साथ मदद के लिए दौड़ पड़े, भले ही इसके परिणामस्वरूप उन्हें अपने राजनीतिक सहयोगियों के खिलाफ ही क्यों न जाना पड़ा। यह इस बात का एक शक्तिशाली प्रमाण है कि राखी, कैसे धर्म, क्षेत्र और यहाँ तक कि राजनीतिक सीमाओं को भी पार कर सकती है।यद्यपि रक्षाबंधन से जुड़ी कई लोककथाएँ और दंतकथाएँ प्रचलित हैं, किंतु भविष्य पुराण में उल्लिखित कथा सबसे अधिक प्रामाणिक मानी जाती है। भविष्य पुराण की इस कथा का उल्लेख ‘व्रतराज’ में भी मिलता है। युगों पहले, देवताओं और राक्षसों के बीच एक भीषण युद्ध हुआ था, जो पूरे बारह वर्षों तक चला। अंततः देवता युद्ध हार गए और राक्षसों ने इंद्र के स्वर्गलोक के साथ-साथ तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। तब देवराज इंद्र ने, देवताओं के गुरु बृहस्पति से परामर्श किया। गुरु बृहस्पति ने उन्हें रक्षा विधान का सुझाव दिया और इसके विशेष मंत्र बताए। श्रावण पूर्णिमा के दिन गुरु बृहस्पति ने रक्षा विधान का अनुष्ठान संपन्न किया। इस अनुष्ठान के दौरान रक्षा पोटली को पवित्र मंत्रों से अभिमंत्रित किया गया था। पूजा के पश्चात इंद्र की पत्नी शची ने इंद्र के दाहिने हाथ पर वह रक्षा पोटली बाँध दी। उस रक्षा पोटली की असीम शक्ति के कारण ही इंद्र राक्षसों को पराजित करने और अपना खोया हुआ राज्य वापस पाने में सक्षम हुए। तभी से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन का अनुष्ठान करने की परंपरा चली आ रही है।आज, हालांकि इस त्योहार ने आधुनिक रूप लिया है। क्या आप जानते हैं कि हमारे शहर लखनऊ की प्रसिद्ध ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करते हुए, शहर के निवासियों ने रक्षाबंधन के पावन पर्व पर सभी सांस्कृतिक और धार्मिक बाधाओं को पार कर आपसी प्रेम का संदेश दिया है। 32 वर्षीय सुमुल सानिया पिछले दो दशकों से अपने पड़ोसी विनय प्रकाश मौर्य को राखी बाँधती आ रही हैं। उनकी माताएँ घनिष्ठ दोस्त थीं और वे इस बात पर विशेष जोर देती थीं कि उनके बच्चों के मन में हमेशा प्रेम और भाईचारे की भावना बनी रहे।इसी प्रकार, शहर के एक अन्य निवासी अब्दुल सबूर की पत्नी को अपनी एक सहकर्मी में, एक ऐसी बहन मिल गई है, जो पिछले छह वर्षों से लगातार उन्हें राखी बाँधती आ रही है। इसके अलावा, 24 वर्षीय आशीष सिंह की मुलाकात एक संवाद कार्यक्रम के दौरान इरम नाज से हुई थी। वे तब से नाज को अपनी बहन मानते हैं। नाज ने भी इस त्योहार से जुड़ी सभी परंपराओं की पूरी जानकारी हासिल की है ताकि वे इसे पूरी पारंपरिक निष्ठा के साथ मना सकें।दूसरी ओर, 47 वर्षीय सनोबर, अपनी शादी के बाद से ही अपने पति के दोस्त गौरव सरीन को राखी बांधती आ रही हैं। उनका कोई सगा भाई नहीं है, लेकिन जब भी उन्हें मदद की ज़रूरत होती है, सरीन हमेशा उनके साथ खड़े रहते हैं। जबकि उनके पति मोहम्मद हैदर ने, लखीमपुर खीरी के बौधिया कलां गांव के निवासियों के साथ वर्चुअल (ऑनलाइन) राखी मनाई है। हैदर ने कुछ दशक पहले इस गांव को गोद लिया था और इस गांव के कुछ लोगों के साथ उनके प्यारे संबंध हैं।रक्षाबंधन के त्योहार की शुरुआत होने से एक महीने पहले ही, बाज़ार रंग-बिरंगी राखियों से गुलज़ार हो जाते हैं। लोग अपने भाइयों और बहनों के लिए फैंसी राखियाँ, प्यार भरे संदेश वाले कार्ड और सार्थक उपहार चुनते हैं। जैसे ही उस दिन सुबह के अनुष्ठान शुरू होते हैं, बहनें आरती करने और अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाने में आगे रहती हैं। इसके बाद, वे अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, जो उसकी समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और समग्र कल्याण के लिए की गई प्रार्थनाओं का एक प्रतीक है। इसके बदले में, भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं और हर परिस्थिति में उनके रक्षक बने रहने का वादा करते हैं। यह दिन हँसी, खुशी और स्नेह के एक सामंजस्यपूर्ण माहौल के साथ आगे बढ़ता है।भारत में कोई भी उत्सव विशेष व्यंजनों का आनंद लिए बिना पूरा नहीं होता है और रक्षाबंधन इसका कोई अपवाद नहीं है! पारंपरिक मिठाइयां इस आनंदमय अवसर का मुख्य आकर्षण हैं। नारियल और मोतीचूर के स्वादिष्ट लड्डुओं से लेकर खीर, पायसम, घेवर और हलवे की तिकड़ी जैसे प्रत्येक व्यंजन, न केवल हमारी जिव्हा को तृप्त करते हैं, बल्कि भाइयों और बहनों के बीच साझा प्रिय बंधन की अंतर्निहित मिठास का भी प्रतीक है। संदर्भ1. https://tinyurl.com/4tk9776e 2. https://tinyurl.com/y3s6vjnh 3. https://tinyurl.com/4zd4pvwp 4. https://tinyurl.com/4p9kuwd5
ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
लखनऊ की संगीत परंपरा में पियानो है शास्त्रीय, फिल्म और समकालीन संगीत की विधाओं में प्रयोग
लखनऊ भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहाँ स्थित भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय ने भारतीय संगीत के साथ-साथ पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के अध्ययन को भी प्रोत्साहन दिया है, जिससे दोनों संगीत परंपराओं के बीच संवाद को नई दिशा मिली। पश्चिमी संगीत के सबसे प्रभावशाली वाद्यों में पियानो का विशेष स्थान है। अपनी मधुर ध्वनि, विस्तृत स्वर-सीमा और एक साथ धुन तथा संगति प्रस्तुत करने की क्षमता के कारण यह शास्त्रीय, जैज़, फिल्म और समकालीन संगीत की अनेक विधाओं में व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है।पियानो में प्रत्येक कुंजी (key) एक छोटे हथौड़े को सक्रिय करती है, जो भीतर लगी तार पर प्रहार करके ध्वनि उत्पन्न करता है। कलाकार अपनी उँगलियों के स्पर्श, गति और लय के माध्यम से कोमल, गंभीर या ऊर्जावान भावों को सहजता से व्यक्त कर सकता है। यही कारण है कि पियानो को दुनिया के सबसे बहुआयामी वाद्यों में गिना जाता है और यह एकल प्रस्तुति से लेकर ऑर्केस्ट्रा तथा आधुनिक संगीत तक हर शैली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।पियानो की विविध अभिव्यक्तियों को समझने के लिए कुछ उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ देखी जा सकती हैं। विश्वविख्यात पियानोवादक लैंग लैंग (Lang Lang) की प्रस्तुति इस वाद्य की तकनीकी दक्षता और भावपूर्ण अभिव्यक्ति का सुंदर उदाहरण है। वहीं प्रसिद्ध जैज़ पियानोवादक हरबी हैनकॉक (Herbie Hancock) यह दिखाते हैं कि पियानो किस प्रकार तात्कालिक रचनात्मकता और लय के साथ नए संगीत का सृजन कर सकता है। भारतीय संदर्भ में ए. आर. रहमान ने पियानो और पश्चिमी संगीत संरचनाओं को भारतीय धुनों के साथ जोड़कर ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत की हैं, जिन्हें विश्वभर में सराहा गया है।आज पियानो केवल पश्चिमी शास्त्रीय संगीत का वाद्य नहीं रह गया है, बल्कि यह दुनिया भर के संगीतकारों की रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बन चुका है। भारत में भी अनेक कलाकारों और संगीतकारों ने इसे अपनी शैली के अनुरूप अपनाया है। यदि आप पियानो की मधुरता, तकनीकी क्षमता और भावनात्मक गहराई का अनुभव करना चाहते हैं, तो ये प्रस्तुतियाँ इस वाद्य की वैश्विक लोकप्रियता और इसकी संगीत यात्रा का उत्कृष्ट परिचय देती हैं।संदर्भ:https://tinyurl.com/hhhbs3ar https://tinyurl.com/yu33h3rj https://tinyurl.com/zyn6cb3j https://tinyurl.com/34wc9nm2 https://tinyurl.com/2xb2axfc
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
क्या आप हिंदू गणित को बचाने में लखनऊ विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक योगदान को जानते हैं?
महान भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि शुद्ध गणित अपने आप में तार्किक विचारों की कविता है। गणित केवल संख्याओं और गणनाओं का विषय नहीं है, बल्कि यह वह भाषा है जिससे ब्रह्मांड को समझा जा सकता है। इसका इतिहास उन प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ा है, जिन्होंने व्यापार, खगोल विज्ञान और दैनिक जीवन की समस्याओं को सुलझाने के लिए सबसे पहले संख्याओं का प्रयोग किया था। समय के साथ, इस विषय ने दर्शन, तर्कशास्त्र और विज्ञान की नींव रखी।प्राचीन सभ्यताओं में गणित की शुरुआत कैसे हुई?गणित का इतिहास हज़ारों साल पुराना है। आधुनिक युग से बहुत पहले, लगभग 3000 ईसा पूर्व में, सुमेर, अक्कद, असीरिया और प्राचीन मिस्र जैसी मेसोपोटामियाई (Mesopotamian) सभ्यताओं ने कराधान, वाणिज्य, व्यापार और खगोलीय रिकॉर्ड रखने के लिए अंकगणित, बीजगणित और ज्यामिति का उपयोग करना शुरू कर दिया था। मेसोपोटामिया और मिस्र से प्राप्त सबसे पुराने ज्ञात गणितीय ग्रंथों में बेबीलोनियन 'प्लिम्पटन 322' (Babylonian ‘Plimpton 322’), मिस्र का 'राइंड मैथमेटिकल पेपिरस' (The Rhind Mathematical Papyrus) और 'मास्को मैथमेटिकल पेपिरस' (The Moscow Mathematical Papyrus) शामिल हैं। इन ग्रंथों में पाइथागोरस ट्रिपल्स (Pythagorean Triples) का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि बुनियादी अंकगणित के बाद पाइथागोरस प्रमेय गणित के सबसे पुराने विकासों में से एक था।छठी शताब्दी ईसा पूर्व में, प्राचीन यूनानियों ने गणित को एक दार्शनिक और प्रदर्शनकारी अनुशासन के रूप में खड़ा किया। पाइथागोरस ने ज्यामिति की नींव रखी। लगभग 300 ईसा पूर्व में यूक्लिड ने 'एलिमेंट्स' नामक ग्रंथ का संकलन किया, जो दो हज़ार से अधिक वर्षों तक गणित का मानक पाठ्यपुस्तक बना रहा। यूक्लिड को ज्यामिति का पिता भी कहा जाता है। इसी तरह आर्किमिडीज़ (Archimedes) ने भौतिकी और इंटीग्रल कैलकुलस (Integral Calculus) में महान योगदान दिया।वेदों और प्राचीन भारत में गणित का विकास कैसे हुआ?भारत में गणित की जड़ें 1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व तक फैले वैदिक काल और उससे भी पहले सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2600 ईसा पूर्व) तक जाती हैं। सिंधु घाटी के लोग व्यापार और निर्माण के लिए बुनियादी संख्याओं और आकारों का उपयोग करते थे। भारत के प्राचीन ज्ञान के स्रोत वेदों में गणितीय सिद्धांतों की गहरी समझ मिलती है। ऋग्वेद में खरबों तक की बड़ी संख्याओं की अवधारणा मौजूद है। यजुर्वेद में ज्यामितीय आकारों, वृत्त की परिधि, वर्ग के विकर्ण और यहां तक कि पाई के मान का भी संदर्भ मिलता है। अथर्ववेद में जोड़, घटाव, गुणा और भाग जैसी गणितीय संक्रियाओं के तरीके शामिल हैं, जिनका उपयोग वैदिक अनुष्ठानों में किया जाता था। शुल्ब सूत्र, जो वेदों के परिशिष्ट हैं, अनुष्ठानों के लिए वेदियों के निर्माण हेतु सटीक ज्यामितीय माप प्रदान करते हैं।भारतीय गणितज्ञों ने दुनिया को क्या सिखाया?आधुनिक गणितीय प्रणाली, जिसका हम आज उपयोग करते हैं, उसकी उत्पत्ति प्राचीन भारत में हुई थी। 5वीं शताब्दी में महान भारतीय गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने 'शून्य' की क्रांतिकारी अवधारणा पेश की। अपनी प्रसिद्ध कृति 'आर्यभटीय' में उन्होंने शून्य के लिए एक प्रतीक पेश किया जिसे उन्होंने 'शून्य' कहा जिसका अर्थ था 'खाली'। शून्य के बिना बड़ी संख्याओं को लिखना और समझना असंभव था। आर्यभट्ट ने खगोल विज्ञान और त्रिकोणमिति में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।7वीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त ने गणित में बड़ा बदलाव किया। उन्होंने अपने ग्रंथ 'ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त' में शून्य और ऋणात्मक संख्याओं सहित अंकगणितीय संक्रियाओं के नियम दिए और द्विघात समीकरणों को हल करना सिखाया। मध्ययुगीन काल में, 14वीं से 16वीं शताब्दी के बीच, केरल स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी ने त्रिकोणमिति, बीजगणित और कैलकुलस में उल्लेखनीय प्रगति की। उन्होंने अनंत श्रृंखलाओं के लिए अग्रणी योगदान दिया जिसने आधुनिक कैलकुलस के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।आधुनिक युग में, श्रीनिवास रामानुजन जैसे गणितज्ञों ने दुनिया को हैरान कर दिया। रामानुजन ने संख्या सिद्धांत और अनंत श्रृंखलाओं में ऐसे सूत्र दिए जो आज भी दुनिया भर के गणितज्ञों के लिए शोध का विषय हैं। शकुंतला देवी, जिन्हें 'ह्यूमन कंप्यूटर' के नाम से जाना जाता है, ने अपनी अद्भुत मानसिक गणना क्षमताओं से अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की।वैश्विक स्तर पर आधुनिक गणित ने कैसे आकार लिया?8वीं से 14वीं शताब्दी के इस्लामी स्वर्ण युग के दौरान, अल-ख्वाज़िमी और इब्न अल-हयथम जैसे गणितज्ञों ने उत्कृष्ट योगदान दिया। अल-ख्वाज़िमी को बीजगणित का पिता माना जाता है। यूरोप में पुनर्जागरण काल के दौरान लियोनार्डो पिसानो (Leonardo Pisano), जिन्हें फाइबोनैचि (Fibonacci) के नाम से जाना जाता है, ने यूरोप में हिंदू-अरबी अंक प्रणाली की शुरुआत की, जिसने गणनाओं में क्रांति ला दी। इसी दौर में जोहान्स केप्लर (Johannes Kepler) ने ग्रहीय गति के नियम दिए। कला के लिए मशहूर लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci) ने भी ज्यामिति और अनुपात पर काम किया।17वीं शताब्दी में आइजैक न्यूटन और गॉटफ्रीड विल्हेम लाइबनिज़ (Gottfried Wilhelm Leibniz) ने स्वतंत्र रूप से कैलकुलस का विकास किया। न्यूटन के गति और सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण के नियमों ने शास्त्रीय यांत्रिकी को नया रूप दिया। 18वीं और 19वीं शताब्दी में लियोनहार्ड यूलर (Leonhard Euler) और कार्ल फ्रेडरिक गॉस (Carl Friedrich Gauss) जैसे दूरदर्शी गणितज्ञ सामने आए। गॉस ने संख्या सिद्धांत और सांख्यिकी में बड़ा योगदान दिया। 19वीं और 20वीं सदी में जॉर्ज कैंटर (Georg Cantor) ने सेट थ्योरी पेश की, अल्बर्ट आइंस्टीन ने सापेक्षता का सिद्धांत दिया, मैरी कार्टराइट (Mary Cartwright) ने नॉन-लीनियर डिफरेंशियल समीकरणों पर काम किया और एंड्रयू विल्स (Andrew Wiles) ने फर्मा की अंतिम प्रमेय को सिद्ध किया।'प्रिंसिपिया मैथेमेटिका' ने गणितीय तर्कशास्त्र को कैसे बदला?गणित और तर्कशास्त्र के दर्शन में 'प्रिंसिपिया मैथेमेटिका' (Principia Mathematica) एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्मारकीय ग्रंथ है। इसे ब्रिटिश दार्शनिकों बर्ट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) और अल्फ्रेड नॉर्थ व्हाइटहेड (Alfred North Whitehead) द्वारा लिखा गया था और 1910 से 1913 के बीच तीन खंडों में प्रकाशित किया गया। इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य गणित की तार्किक नींव को उजागर करना था। इसे 'लॉजिज़्म' (Logism) कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि गणित को पूरी तरह से शुद्ध तर्क के आधार पर सिद्ध किया जा सकता है।रसेल ने अपनी पिछली पुस्तक 'द प्रिंसिपल्स ऑफ मैथमेटिक्स' (The Principles of Mathematics) में तर्क दिया था कि संपूर्ण गणित को कुछ सरल स्वयंसिद्धों से प्राप्त किया जा सकता है, जो संख्या जैसी गणितीय धारणाओं के बजाय विशुद्ध रूप से तार्किक धारणाओं तक सीमित हों। बाद में रसेल को पता चला कि जर्मन गणितज्ञ गॉटलोब फ्रेगे (Gottlob Frege) ने अपनी पुस्तक 'द फाउंडेशंस ऑफ अरिथमेटिक' (The Foundations of Arithmetic) में उनसे पहले ही ऐसी कई खोजें कर ली थीं।वर्ष 1901 में रसेल ने तर्क प्रणाली के केंद्र में एक विरोधाभास की खोज की, जिसे अब ‘रसेल्स पैराडॉक्स’ (Russell's Paradox) के रूप में जाना जाता है। यह विरोधाभास तब उत्पन्न होता है जब हम उन सभी वर्गों का एक वर्ग बनाते हैं जो स्वयं के सदस्य नहीं हैं। यदि हम पूछें कि क्या यह वर्ग स्वयं का सदस्य है, तो एक विरोधाभास पैदा होता है। यदि यह है, तो यह नहीं है, और यदि यह नहीं है, तो यह है। यह वैसा ही है जैसे किसी गांव के नाई को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जाए जो उन सभी की दाढ़ी बनाता है जो खुद अपनी दाढ़ी नहीं बनाते। अब सवाल यह है कि क्या नाई खुद अपनी दाढ़ी बनाता है?इस विरोधाभास को दूर करने के लिए, रसेल ने 'थ्योरी ऑफ टाइप्स' (Theory of Types) की अवधारणा पेश की। इसमें रसेल और व्हाइटहेड ने 'एक्सिओम ऑफ रिड्यूसिबिलिटी' (Axiom of Reducibility) और 'एक्सिओम ऑफ इन्फिनिटी' (Axiom of Infinity) जैसे विशेष स्वयंसिद्धों को शामिल किया। यद्यपि यह सिद्धांत बहुत जटिल था, लेकिन इसने गणितीय तर्कशास्त्र और गणित के दर्शन के विकास पर अत्यधिक प्रभाव डाला। दर्शनशास्त्र में इस पुस्तक का सबसे बड़ा प्रभाव रसेल की 'थ्योरी ऑफ डिस्क्रिप्शंस' (Theory of Descriptions) के माध्यम से पड़ा, जिसने सामान्य भाषा की व्याकरणिक संरचनाओं और तार्किक रूपों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। ऑस्ट्रियाई गणितज्ञ कर्ट गोडेल (Kurt Gödel) का अपूर्णता प्रमेय भी इसी ग्रंथ के अध्ययन का परिणाम था।हिंदू गणित के संरक्षण में लखनऊ विश्वविद्यालय की क्या भूमिका है?गणित के क्षेत्र में विशेष रूप से 'हिंदू गणित' के संवर्धन में लखनऊ विश्वविद्यालय के गणित और खगोल विज्ञान विभाग का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। यह विभाग 1921 में तब अस्तित्व में आया जब तत्कालीन कैनिंग कॉलेज (Canning College) को नवगठित लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा अपने अधिकार में लिया गया था। शुरुआती दौर में प्रोफ़ेसर जे.ए. स्ट्रैंग (J. A. Strang) के नेतृत्व में विभाग ने अपने पाठ्यक्रमों को मजबूत किया।लगभग एक दशक बाद, विभाग के अगले प्रमुख प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह ने अपने गहन पाण्डित्य और योजना के साथ 1939 में 'हिंदू गणित' पर शोध के लिए एक विशेष अनुभाग शुरू किया। यह उत्तरी भारत में अपनी तरह का एकमात्र केंद्र था, जिसे बाद में 1950 में 'भारत गणित परिषद' का नाम दिया गया। प्रोफ़ेसर सिंह का मानना था कि प्राचीन हिंदू गणितज्ञों की उपलब्धियों को दुनिया के सामने लाने के लिए अज्ञात पांडुलिपियों पर व्यापक शोध आवश्यक है। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर बी.बी. दत्ता के साथ मिलकर 1935 में 'हिस्ट्री ऑफ हिंदू मैथमेटिक्स' नामक दो खंडों वाली पुस्तक लिखी, जिसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली और आज भी इसे एक प्रामाणिक स्रोत पुस्तक माना जाता है।लखनऊ विश्वविद्यालयवर्ष 1939 में, उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंदू गणित और खगोल विज्ञान से संबंधित पुराने ग्रंथों को एकत्र करने, संपादित करने, अनुवाद करने और उनकी व्याख्या करने के उद्देश्य से प्रोफ़ेसर सिंह के अधीन एक शोध योजना को मंजूरी दी। भारत भर से, राजस्थान, बंगाल, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, नेपाल और यहां तक कि लंदन के इंडिया ऑफिस से दुर्लभ पांडुलिपियां खोजी गईं। प्रोफ़ेसर सिंह ने स्वयं 58 पांडुलिपियों की प्रतियां प्राप्त कीं। 1947 में उन्होंने लघु भास्करीय और पाटीगणित के अंग्रेजी अनुवाद के साथ व्याख्यात्मक संस्करण प्रकाशित किए।विभाग ने बुनियादी ढांचे में भी ऐतिहासिक विकास किया। 1949 में खगोल विज्ञान के शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए भारत के पहले प्लैनेटेरियम (Planetarium) का निर्माण इसी विभाग में पूरा किया गया था। 1950 में प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह ने विज्ञान संकाय के डीन के रूप में विभाग के वर्तमान भवन का निर्माण कराया। 1954 में प्रोफ़ेसर राम वल्लभ ने विभागाध्यक्ष का पदभार संभाला और 1956 में सांख्यिकी अनुभाग के लिए एक नया ब्लॉक बनवाया। आज विभाग की कंप्यूटर लैब का नाम प्रोफ़ेसर राम वल्लभ के नाम पर और विशाल पुस्तकालय का नाम प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह के नाम पर है।प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह के निधन के बाद, उनके सच्चे उत्तराधिकारी प्रोफ़ेसर के.एस. शुक्ला ने उनके अधूरे काम को आगे बढ़ाया और मार्कंडेय मिश्रा जैसे विद्वानों की मदद से सूर्य सिद्धांत, महा भास्करीय और कर्ण-रत्न जैसी पांडुलिपियों को अंग्रेजी अनुवाद और टिप्पणियों के साथ प्रकाशित किया। विभाग ने प्रोफ़ेसर आर.पी. अग्रवाल, प्रोफ़ेसर एम.डी. उपाध्याय और कई अन्य महान शिक्षाविदों के नेतृत्व में निरंतर प्रगति की है। आज भी यह विभाग प्राचीन भारतीय गणितीय विरासत को सहेजने और आधुनिक गणित के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित करने का कार्य पूरी निष्ठा के साथ कर रहा है।संदर्भ1. https://tinyurl.com/26pyujld 2. https://tinyurl.com/2h98vg34 3. https://tinyurl.com/2ymxa34b 4. https://tinyurl.com/25dfl3qw 5. https://tinyurl.com/y7kgo7aj 6. https://tinyurl.com/24vybg3h
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
कैसे बेगम हज़रत महल ने हिंदू-मुस्लिम एकता से 1857 में अंग्रेजों को दी थी मात?
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास कई शूरवीरों और वीरांगनाओं के अदम्य साहस से भरा पड़ा है। जब भी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का ज़िक्र होता है, तो उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और अवध की शान, बेगम हज़रत महल का नाम बड़े ही गर्व और सम्मान के साथ लिया जाता है। जिस समय ब्रिटिश हुकूमत पूरे भारत को अपने अधीन करने का क्रूर खेल खेल रही थी, उस समय लखनऊ की इस वीरांगना ने न केवल अंग्रेजों की सत्ता को खुली चुनौती दी, बल्कि महीनों तक उन्हें लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर दिया।बेगम हज़रत महल का प्रारंभिक जीवन और अवध के दरबार तक का सफर कैसा था?बेगम हज़रत महल का जन्म वर्ष 1820 के आसपास अवध राज्य की तत्कालीन राजधानी फैज़ाबाद में हुआ था। बचपन में उनका नाम मोहम्मदी खानम था। जीवन के शुरुआती दिन बेहद संघर्षपूर्ण रहे, जब उन्हें उनके माता-पिता द्वारा बेच दिया गया और उन्होंने एक तवायफ के रूप में अपना जीवन शुरू किया। शाही प्रतिनिधियों (agents) द्वारा खरीदे जाने के बाद, उन्होंने शाही हरम में एक 'ख्वासीन' (Khawasin) के रूप में प्रवेश किया और बाद में उन्हें ‘परी’ का दर्जा मिला।अपनी बुद्धिमत्ता, सौंदर्य और कला के दम पर उन्होंने अवध के अंतिम ताजदार, नवाब वाजिद अली शाह (Wajid Ali Shah) का दिल जीत लिया। नवाब ने उन्हें अपनी शाही उपपत्नी के रूप में स्वीकार किया और वह उनकी छोटी बेगम बन गईं। जब उन्होंने नवाब के बेटे बिरजिस क़द्र (Birjis Qadr) को जन्म दिया, तब उन्हें आधिकारिक तौर पर 'हज़रत महल' की उपाधि से नवाज़ा गया।अंग्रेजों द्वारा अवध का अधिग्रहण और बेगम का नेतृत्व कैसे शुरू हुआ?ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) की विस्तारवादी नीतियों के चलते, वर्ष 1856 में अंग्रेजों ने कुशासन का झूठा आरोप लगाकर अवध का अधिग्रहण कर लिया। उन्होंने नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता (Calcutta) निर्वासित कर दिया। अंग्रेजों को लगा था कि नवाब के जाने के बाद अवध आसानी से उनके कब्ज़े में आ जाएगा, लेकिन वे बेगम हज़रत महल के साहस से अनजान थे।बेगम ने कलकत्ता जाने से इनकार कर दिया और अपने बेटे के साथ लखनऊ में ही डटी रहीं। जैसे ही 1857 में मेरठ से बगावत की चिंगारी उठी और स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ, बेगम हज़रत महल ने राजा जयलाल सिंह और राजा हनुमंत सिंह जैसे स्थानीय नेताओं और विद्रोहियों के साथ मिलकर लखनऊ पर नियंत्रण कर लिया। 5 जुलाई 1857 को उन्होंने अपने नाबालिग बेटे, राजकुमार बिरजिस क़द्र को अवध का शासक (वली) घोषित कर दिया और खुद राजमाता (Regent) के रूप में सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली।अंग्रेजों की धार्मिक नीतियों के खिलाफ बेगम का घोषणापत्र क्या था?बेगम हज़रत महल केवल एक सैन्य नेता नहीं थीं, बल्कि वे एक गहरी राजनीतिक समझ रखने वाली शासिका भी थीं। उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सड़कें बनाने के बहाने अंधाधुंध हिंदू मंदिरों और मुस्लिम मस्जिदों को तोड़ा था। विद्रोह के अंतिम दिनों में जारी किए गए एक ऐतिहासिक घोषणापत्र में, बेगम ने अंग्रेजों द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता देने के दावों का कड़ा मज़ाक उड़ाया था।उन्होंने लिखा था: "सूअर का मांस खाना और शराब पीना, चर्बी वाले कारतूसों को काटना और मिठाइयों में सूअर की चर्बी मिलाना, सड़कें बनाने के बहाने हिंदू और मुसलमानों के मंदिरों और मस्जिदों को नष्ट करना, चर्च बनाना, ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए पादरियों को सड़कों पर भेजना... इन सबके बावजूद लोग कैसे विश्वास कर सकते हैं कि उनके धर्म में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा?" इस वैचारिक स्पष्टता ने हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के सैनिकों और आम जनता को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट कर दिया।लखनऊ रेजीडेंसी की घेराबंदी (Siege of Lucknow Residency) के खूनी संघर्ष में क्या हुआ?1857 के मध्य में, लखनऊ में स्थित ब्रिटिश मुख्यालय, जिसे रेजीडेंसी कहा जाता था, संघर्ष का मुख्य केंद्र बन गया। 30 जून 1857 को बेगम की विद्रोही सेना, जिसकी संख्या 10,000 से अधिक थी, ने सर हेनरी लॉरेंस (Sir Henry Lawrence) के नेतृत्व वाली एक छोटी ब्रिटिश सेना को रेजीडेंसी के भीतर घेर लिया। 4 जुलाई को लॉरेंस एक गोलाबारी में मारा गया।रेजीडेंसी के भीतर लगभग 3,000 लोग (अंग्रेज अधिकारी, महिलाएं, बच्चे और कुछ वफादार भारतीय सैनिक) फंसे हुए थे। मृत्यु, बीमारी और भूख ने ब्रिटिश खेमे का मनोबल तोड़ दिया था। बेगम हज़रत महल के निर्देश पर विद्रोही सेना लगातार हमले कर रही थी। सितंबर में सर हेनरी हैवलॉक (Sir Henry Havelock) के नेतृत्व में एक ब्रिटिश राहत दल वहां पहुंचा, लेकिन वह भी भारी विद्रोही हमलों के कारण रेजीडेंसी के भीतर ही फंस गया।महीनों की कड़ी घेराबंदी के बाद, अंततः नवंबर 1857 में सर कॉलिन कैंपबेल (Sir Colin Campbell) के नेतृत्व में एक विशाल ब्रिटिश सेना ने रेजीडेंसी पर हमला किया और घेराबंदी को तोड़ने में सफलता प्राप्त की। भारी रक्तपात और हजारों भारतीय योद्धाओं के बलिदान के बाद अंग्रेजों ने फिर से लखनऊ पर अपना कब्ज़ा जमा लिया।बेगम का निर्वासन और आज के भारत में उनकी विरासत क्या है?जब अंग्रेजों ने लखनऊ और अवध के अधिकांश हिस्सों पर फिर से कब्ज़ा कर लिया, तो बेगम हज़रत महल को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। नाना साहब और फैज़ाबाद के मौलवी के साथ मिलकर उन्होंने शाहजहांपुर में भी हमले किए, लेकिन अंततः ब्रिटिश सैन्य ताकत के सामने उन्हें भारत छोड़ना पड़ा।उन्होंने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण करने से साफ इनकार कर दिया और नेपाल में शरण मांगी। शुरुआत में नेपाल के प्रधानमंत्री जंग बहादुर ने उन्हें शरण देने से मना कर दिया, लेकिन बाद में उन्हें वहां रहने की अनुमति मिल गई। 7 अप्रैल 1879 को काठमांडू में उनका निधन हो गया और उन्हें वहीं जामा मस्जिद के पास सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।आज भी भारत बेगम हज़रत महल के इस बलिदान को नहीं भूला है। 15 अगस्त 1962 को लखनऊ के हज़रतगंज में ओल्ड विक्टोरिया पार्क (Old Victoria Park) का नाम बदलकर उनके सम्मान में 'बेगम हज़रत महल पार्क' रखा गया। 10 मई 1984 को भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। आज बेगम हज़रत महल का नाम केवल अवध के इतिहास में नहीं, बल्कि भारत की आज़ादी की उस अमर गाथा में दर्ज है, जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा देशभक्ति की प्रेरणा देती रहेगी।संदर्भ1. https://tinyurl.com/hzq7tb9 2. https://tinyurl.com/2b6yl35s 3. https://tinyurl.com/2altp25f
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
15-10-2026 09:31 PM • Lucknow-Hindi
भारत छोड़कर विदेशों में क्यों पढ़ रहे हैं देश के 18 लाख छात्र?
शिक्षा किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत और व्यावसायिक विकास की सबसे मज़बूत नींव होती है। आज के समय में दुनिया भर के छात्र बेहतरीन अकादमिक प्रशिक्षण प्राप्त करने की आकांक्षा रखते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बजाय विदेशों में पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई है। राजधानी लखनऊ सहित देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों से युवा अब अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार अपने सपनों की उड़ान भर रहे हैं। यह एक ऐसा चलन है जो बेहतर अकादमिक अवसरों, वैश्विक एक्सपोज़र, उन्नत शोध सुविधाओं और शानदार करियर संभावनाओं के कारण लगातार गति पकड़ रहा है।
क्या कह रहे हैं विदेश जाने वाले छात्रों के ताज़ा आँकड़े? भारतीय छात्रों का विदेश जाने का यह चलन केवल एक मामूली बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक बूम है। भारत सरकार के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या महज़ 2,60,000 थी। वर्ष 2022 में यह संख्या बढ़कर 7,52,000 हो गई और 2023 में यह लगभग 8,95,000 तक पहुँच गई। 2025 की शुरुआत तक कुल 18 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यह आँकड़ा भारतीय छात्रों और उनके परिवारों की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं और बदलती प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। सबसे अधिक छात्र विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग, गणित और बिज़नेस प्रबंधन की पढ़ाई के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे देशों का चुनाव कर रहे हैं।
भारतीय छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों को क्यों चुन रहे हैं? विदेशी विश्वविद्यालयों को चुनने का सबसे बड़ा कारण वहाँ की शिक्षा की उच्च गुणवत्ता है। अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों के शीर्ष विश्वविद्यालय विश्वस्तरीय फैकल्टी, उन्नत पाठ्यक्रम और शानदार शोध सुविधाएँ प्रदान करते हैं। इसके विपरीत, भारत में प्रतिष्ठित संस्थान होने के बावजूद, कई विश्वविद्यालय आज भी पुराने पाठ्यक्रम, नवाचार की कमी और ऐसी परीक्षा प्रणाली से जूझ रहे हैं जो व्यावहारिक ज्ञान के बजाय रटने पर ज़ोर देती है।
शोध और विकास के क्षेत्र में भी विदेशी देश काफी आगे हैं। अमेरिका और जर्मनी जैसे देश शोध पर अपनी जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं, जबकि भारत का शोध बजट इसके मुक़ाबले काफी कम है। भारतीय विश्वविद्यालयों में अक्सर लालफीताशाही, सीमित फंडिंग और बुनियादी ढाँचे की कमी के कारण शोध कार्य प्रभावित होते हैं। इसके अलावा, विदेशी विश्वविद्यालयों में छात्रों को अपनी रुचि के अनुसार विषय चुनने की पूरी आज़ादी होती है। वहां का पाठ्यक्रम लचीला होता है, जो छात्रों की रचनात्मकता को बढ़ावा देता है। भारत में शिक्षा प्रणाली अक्सर कठोर होती है, जहाँ छात्रों को अपने मुख्य क्षेत्र से हटकर अन्य विषय पढ़ने की ज़्यादा छूट नहीं मिलती।
क्या भारत के शीर्ष संस्थानों में सीटों की कमी एक बड़ा कारण है? भारत में आईआईटी, आईआईएम और एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थान मौजूद हैं, लेकिन इनमें प्रवेश पाना किसी लोहे के चने चबाने से कम नहीं है। सीटों की भारी कमी और बढ़ती प्रतिस्पर्धा छात्रों के लिए एक बड़ा तनाव बन चुकी है। वर्ष 2024 के आँकड़ों पर नज़र डालें तो लगभग एक लाख अस्सी हज़ार छात्रों ने परीक्षा दी, जिनमें से अड़तालीस हज़ार से अधिक छात्रों ने जेईई एडवांस पास किया। लेकिन पूरे देश के तेईस आईआईटी में केवल सत्रह हज़ार सात सौ चालीस सीटें ही उपलब्ध थीं। इसका मतलब है कि हर एक सीट के लिए कई योग्य उम्मीदवार कतार में थे।
यही हाल आईआईएम का भी है। कैट परीक्षा में बैठने वाले दो लाख से अधिक छात्रों के लिए सभी आईआईएम को मिलाकर केवल पचपन सौ सीटें ही मौजूद होती हैं। कई शीर्ष संस्थानों में तो स्वीकृति दर एक प्रतिशत से भी कम है। इस भयंकर प्रतिस्पर्धा के कारण योग्य छात्र भी प्रवेश पाने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में विदेशों में शिक्षा प्राप्त करना एक पारदर्शी और सुलभ विकल्प बन जाता है। विदेशी संस्थानों में न केवल पर्याप्त सीटें होती हैं, बल्कि उनकी प्रवेश प्रक्रिया भी केवल अंकों पर निर्भर न होकर छात्र के संपूर्ण व्यक्तित्व, साक्षात्कार और अतिरिक्त गतिविधियों पर आधारित होती है।
विदेशी शिक्षा प्रणाली भारतीय प्रणाली से कैसे अलग है? विदेशी शिक्षा, विशेष रूप से अमेरिकी और यूरोपीय शिक्षा मॉडल, भारतीय रट्टा-मार प्रणाली से बिल्कुल अलग है। वहाँ थ्योरी से ज़्यादा प्रायोगिक शिक्षा पर ज़ोर दिया जाता है। अमेरिकी शिक्षा मॉडल में छात्रों को किसी एक विषय में विशेषज्ञता हासिल करने से पहले कई अलग-अलग विषयों को एक्सप्लोर करने का मौका दिया जाता है।
कक्षाओं में केवल निष्क्रिय रूप से बैठकर लेक्चर सुनने के बजाय केस स्टडी, इंटर्नशिप, लाइव प्रोजेक्ट और सामुदायिक असाइनमेंट पर काम करवाया जाता है। छात्र का मूल्यांकन किसी एक अंतिम परीक्षा के आधार पर नहीं होता, बल्कि पूरे सेमेस्टर के दौरान उसकी भागीदारी, प्रेजेंटेशन और प्रोजेक्ट्स के आधार पर होता है। इसके अलावा, एक अंतरराष्ट्रीय कक्षा में पढ़ाई करने से छात्रों को विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के साथ संवाद करने का मौका मिलता है। इससे उनका वैश्विक नज़रिया विकसित होता है और वे वास्तविक दुनिया की समस्याओं को सुलझाने के लिए बेहतर तरीके से तैयार होते हैं।
क्या विदेशों में पढ़ाई करने के बाद बेहतर करियर विकल्प मिलते हैं? यह एक स्थापित तथ्य है कि एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय से डिग्री हासिल करने वाले छात्र की नौकरी पाने की संभावना काफी बढ़ जाती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता देती हैं जिनके पास अंतरराष्ट्रीय अनुभव और विविध कौशल होते हैं। ग्लोबल मोबिलिटी डेटा के अनुसार, विदेशी विश्वविद्यालयों से स्नातक करने वाले भारतीय छात्रों का शुरुआती वेतन भारतीय संस्थानों से पढ़े छात्रों की तुलना में काफी अधिक होता है।
उदाहरण के लिए, अमेरिका में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर का शुरुआती वेतन औसतन तिरासी लाख से लेकर सवा करोड़ रुपये सालाना तक हो सकता है। इसके अलावा, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे देश पढ़ाई के बाद एक से तीन साल तक का वर्क वीज़ा देते हैं। ब्रिटेन के ग्रेजुएट रूट और कनाडा के एक्सप्रेस एंट्री जैसे विकल्पों के ज़रिए भारतीय छात्र विदेश में काम करने का अनुभव हासिल करते हैं और धीरे-धीरे स्थायी निवास तक का सफर तय कर लेते हैं।
विदेश में पढ़ाई के दौरान छात्रों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? विदेश में पढ़ाई करना एक शानदार अवसर है, लेकिन यह चुनौतियों से खाली नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय होती है। अमेरिका या ब्रिटेन में ट्यूशन फीस और रहने का खर्च मिलाकर सालाना पंद्रह से चालीस लाख रुपये तक लग सकते हैं। हालांकि जर्मनी जैसे देशों में पब्लिक विश्वविद्यालयों में ट्यूशन फीस न के बराबर है, फिर भी वीज़ा, यात्रा और स्वास्थ्य बीमा जैसे खर्च बजट को बढ़ा देते हैं।
पैसे के अलावा, छात्रों को भारी भावनात्मक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। परिवार से दूर रहने के कारण होमसिकनेस यानी घर की याद आना एक आम समस्या है। एक बिल्कुल नई संस्कृति, अलग खान-पान, नया मौसम और नए लोगों के बीच तालमेल बिठाना शुरुआत में काफी मुश्किल होता है। वीज़ा नियमों में अचानक होने वाले बदलाव और पार्ट-टाइम नौकरी खोजने का संघर्ष भी छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालता है।
सरकारी स्कॉलरशिप और लोन योजनाएं छात्रों की कैसे मदद कर रही हैं? विदेश में पढ़ाई का खर्च उठाना हर परिवार के बस की बात नहीं है, लेकिन भारत सरकार की कई स्कॉलरशिप और लोन योजनाओं ने इस राह को आसान बना दिया है। इन योजनाओं के कारण अब होनहार छात्रों को पैसों की कमी के चलते अपने सपने नहीं छोड़ने पड़ते।
भारत सरकार की नेशनल ओवरसीज स्कॉलरशिप एक ऐसी ही प्रमुख योजना है, जो अनुसूचित जाति, घुमंतू जनजातियों और भूमिहीन खेतिहर मज़दूरों के बच्चों को विदेशों में मास्टर डिग्री या पीएचडी करने के लिए दी जाती है। इसमें ट्यूशन फीस से लेकर रहने का खर्च, हवाई किराया और बीमा तक सब कुछ कवर किया जाता है। इसी तरह डॉक्टर अंबेडकर ब्याज सब्सिडी योजना अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के छात्रों के लिए है। इस योजना के तहत सरकार छात्र द्वारा लिए गए एजुकेशन लोन पर पढ़ाई की अवधि के दौरान लगने वाले ब्याज का भुगतान करती है।
अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों के लिए पढ़ो परदेस योजना चलाई जाती है, जो एजुकेशन लोन पर ब्याज सब्सिडी प्रदान करती है। इसके अलावा जेएन टाटा एंडोमेंट लोन और फुलब्राइट-नेहरू फेलोशिप जैसी योजनाएं भी मेधावी छात्रों को आर्थिक सहायता प्रदान करती हैं। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद भी कई तरह के सांस्कृतिक और शैक्षिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों के तहत छात्रों की मदद करती है।
इन स्कॉलरशिप को पाने के लिए छात्रों को बहुत पहले से तैयारी करनी होती है। सही विश्वविद्यालय का चुनाव, एक मज़बूत स्टेटमेंट ऑफ पर्पस लिखना और समय सीमा के भीतर आवेदन करना बहुत ज़रूरी होता है। आज कई संस्थान और कंसल्टेंसी भी छात्रों को इन स्कॉलरशिप को हासिल करने में पूरी मदद कर रहे हैं।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि भारतीय छात्रों का विदेश जाने का यह रुझान तब तक जारी रहेगा जब तक भारतीय शिक्षा प्रणाली में बुनियादी और ढाँचागत सुधार नहीं किए जाते। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस भारत में खोलने और शिक्षा बजट बढ़ाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। यदि ये सुधार ज़मीनी स्तर पर सफल होते हैं, तो भविष्य में भारत भी शिक्षा के एक बड़े वैश्विक केंद्र के रूप में उभर सकता है।
क्या जापानी मियावाकी तकनीक कंक्रीट के शहरों को ठंडे जंगलों में बदल सकती है?
जैसे-जैसे शहरीकरण खुले हरे स्थानों की जगह कंक्रीट के जंगलों में बदल रहा है, लखनऊ जैसे शहर बढ़ते तापमान और गिरती वायु गुणवत्ता का सामना कर रहे हैं। इन आधुनिक शहरी चुनौतियों के बीच केवल सजावटी पेड़ लगाना पर्याप्त नहीं रह गया है; अब हमें ऐसे जीवित पारिस्थितिक तंत्र की आवश्यकता है जो हवा को शुद्ध कर सकें और प्रकृति के साथ हमारे संबंध को फिर से जोड़ सकें। शहरी वानिकी (urban forestry) इसका एक बेहतरीन प्राकृतिक समाधान प्रदान करती है। उच्च-घनत्व (high-density) वृक्षारोपण की मियावाकी (Miyawaki) तकनीक का उपयोग करके, शहर के छोटे हिस्सों में भी घने देशी माइक्रो-फॉरेस्ट (micro-forest) लगाए जा सकते हैं।
1970 के दशक में जापानी वनस्पतिशास्त्री और पादप पारिस्थितिकी विशेषज्ञ डॉ. अकिरा मियावाकी (Akira Miyawaki) द्वारा विकसित यह वनीकरण (afforestation) विधि प्रकृति के पारिस्थितिक तंत्र से प्रेरणा लेती है। पारंपरिक वृक्षारोपण की तुलना में ये घने पॉकेट वन (pocket forests) 10 गुना तेजी से बढ़ते हैं, 30 गुना अधिक घने होते हैं और 100 गुना अधिक जैव विविधता (biodiversity) का समर्थन करते हैं। जहां पारंपरिक जंगलों को प्राकृतिक रूप से पुनर्जीवित होने में 200 साल लग जाते हैं, वहीं यह नवीन विधि केवल 20 से 30 वर्षों में एक परिपक्व जंगल तैयार कर सकती है।
शहरी स्थानों के लिए मियावाकी पद्धति क्या है और यह कैसे काम करती है?
मियावाकी पद्धति एक अल्ट्रा-डेंस (ultra-dense) और तीव्र वनीकरण तकनीक है। यह तकनीक इस बात की नकल करती है कि यदि मानव हस्तक्षेप न हो तो कोई जंगल खुद को कैसे पुनर्जीवित करेगा। इस पद्धति का मूल सिद्धांत केवल उन देशी प्रजातियों (native species) का उपयोग करना है जो उस विशिष्ट जलवायु और क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से पनपती हैं। इन स्वदेशी पौधों ने हजारों वर्षों में अपने स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल होना सीख लिया है, इसलिए उन्हें लगाने से न केवल जैव विविधता बहाल होती है, बल्कि एक ऐसा वातावरण तैयार होता है जो जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीला है।
इस पद्धति में प्रति वर्ग मीटर 3 से 5 छोटे पौधे (saplings) लगाए जाते हैं। इन पौधों को एक यादृच्छिक (random) व्यवस्था में लगाया जाता है ताकि घनेपन को अधिकतम किया जा सके और प्राकृतिक वनों की तरह एक सुंदर अव्यवस्था बनाई जा सके। जब पौधे बहुत पास-पास लगाए जाते हैं, तो उनके लिए अगल-बगल फैलने की कोई जगह नहीं बचती। इसके परिणामस्वरूप, पौधों के बीच सूरज की रोशनी के लिए प्रतिस्पर्धा होती है और वे सीधे ऊपर की ओर बहुत तेजी से बढ़ते हैं। यह कृत्रिम रूप से पैदा की गई प्रतिस्पर्धा ही इस पद्धति की अभूतपूर्व विकास दर का मुख्य रहस्य है।
एक आत्मनिर्भर माइक्रो-फॉरेस्ट को उगाने के प्रमुख वैज्ञानिक चरण क्या हैं?
मियावाकी जंगल लगाने के लिए पारिस्थितिकी और मृदा जीव विज्ञान पर आधारित कुछ विशिष्ट चरणों का पालन किया जाता है: सबसे पहला चरण संभावित प्राकृतिक वनस्पति (Potential Natural Vegetation) की पहचान करना है। स्थानीय पर्यावरण के लिए सबसे उपयुक्त देशी वनस्पतियों का चयन करने के लिए गहन शोध किया जाता है। एक मियावाकी जंगल बहु-स्तरीय (multi-layered) होता है। संतुलन बनाने और घनत्व बढ़ाने के लिए वनस्पति की चार परतों—कैनोपी (canopy), उप-कैनोपी, झाड़ियाँ और ग्राउंड कवर (ground cover)—में लगभग 40 विभिन्न देशी प्रजातियों का चयन किया जाता है।
दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण मिट्टी की कीमिया (soil alchemy) है। चूंकि शहरी मिट्टी अक्सर संकुचित, दूषित और खराब हो चुकी होती है, इसलिए पौधों की जड़ों को तेजी से स्थापित करने के लिए मिट्टी को नरम, उपजाऊ और फफूंदी-प्रधान (fungi-dominant) बनाया जाता है। इस प्रक्रिया में गहरी खुदाई करके जैविक खाद और नमी बनाए रखने वाली सामग्री मिलाकर मिट्टी की गुणवत्ता को सुधारा जाता है। इसका लक्ष्य सदियों पुराने जंगल के फर्श जैसी सरंध्रता और पोषक तत्वों की उपलब्धता पैदा करना है।
तीसरे चरण में पौधे लगाना शामिल है। तैयार मिट्टी में छोटे पौधों को बहुत पास-पास लगाया जाता है। ये छोटे पौधे मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक कवकों (mycorrhizal fungi) के साथ तेजी से सहजीवी संबंध बनाते हैं।
अंत में, जंगल की मल्चिंग (mulching) की जाती है। पुआल जैसी सामग्री से भारी मल्चिंग करने से मिट्टी सुरक्षित रहती है, नमी बनी रहती है और पाले से बचाव होता है। इससे बार-बार पानी देने की आवश्यकता कम हो जाती है। यह मल्चिंग मिट्टी के सूक्ष्मजीवों, बीटल्स और केंचुओं को आकर्षित करती है जो इसे खाकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं।
यह उच्च-घनत्व वाला जंगल शहरों के तापमान और हीट आइलैंड को कैसे कम करता है? शहरी जंगल सिर्फ हरे दिखने के अलावा शहर के पर्यावरण को सक्रिय रूप से बदलते हैं। मियावाकी माइक्रो-फॉरेस्ट अर्बन हीट आइलैंड (urban heat island) प्रभाव को कम करने में एक शक्तिशाली भूमिका निभाते हैं। यह शीतलन प्रभाव वाष्पोत्सर्जन (evapotranspiration) पर निर्भर करता है, जहां पेड़ों द्वारा छोड़ी गई नमी से हवा ठंडी होती है।
लगातार नमी छोड़ने की इस प्रक्रिया से पेड़ अपने आसपास की हवा के तापमान को 15 डिग्री सेल्सियस (Celsius) तक कम कर सकते हैं। इसके अलावा, घने पेड़ सूरज की सीधी धूप को जमीन तक पहुंचने से रोकते हैं, जिससे पारंपरिक बिखरे हुए पार्कों की तरह जमीन गर्म और सूखी नहीं होती। अध्ययनों से पता चलता है कि परिपक्व मियावाकी वनों के आसपास के क्षेत्रों में 2 से 4 डिग्री सेल्सियस तक सतह के तापमान में गिरावट देखी जा सकती है। यह प्राकृतिक वातानुकूलन (air conditioning) तकनीक बढ़ती गर्मी में लोगों को भौतिक राहत प्रदान करती है।
पर्यावरण और हवा को शुद्ध करने में इन मिनी-जंगलों की क्या भूमिका है? ये घने पॉकेट वन प्राकृतिक एयर फिल्टर (air filters) के रूप में कार्य करते हैं। 30 गुना अधिक सघन होने के कारण, ये हवा से बहुत अधिक मात्रा में पार्टिकुलेट मैटर (particulate matter) और कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) सोखते हैं। शहरी क्षेत्र वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का 70 प्रतिशत से अधिक उत्पन्न करते हैं, और ये वन एक सघन कार्बन सिंक (carbon sink) के रूप में काम करते हैं जो कार्बन को अपने बायोमास (biomass) और मिट्टी में जमा कर लेते हैं।
इसके अतिरिक्त, पेड़ों की यह बहु-स्तरीय सघन दीवार एक बेहतरीन ध्वनि अवरोधक (sound barrier) का काम करती है। यह यातायात और औद्योगिक गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले शोर को प्रभावी ढंग से कम करती है। मिट्टी की अच्छी जल धारण क्षमता के कारण, ये जंगल भारी बारिश के दौरान अतिरिक्त पानी को सोख लेते हैं, जिससे अचानक आने वाली बाढ़ (flash floods) और मिट्टी के कटाव को रोकने में मदद मिलती है।
क्या ये छोटे जंगल वास्तव में शहरी जैव विविधता को वापस ला सकते हैं? बिल्कुल। एक मियावाकी वन में पारंपरिक वनों की तुलना में कई गुना अधिक जैव विविधता होती है। विभिन्न प्रकार के देशी पेड़ों को एक साथ लगाने से परागणकों (pollinators) के लिए प्रचुर मात्रा में भोजन और पक्षियों के लिए एक सुरक्षित आश्रय मिलता है। पौधे लगाने के कुछ ही महीनों के भीतर कीड़े पनपने लगते हैं, और उनके बाद पक्षी, तितलियां, मधुमक्खियां और छोटे स्तनधारी जीव वापस लौटने लगते हैं।
कई शहरी मियावाकी साइटों में वृक्षारोपण के दो वर्षों के भीतर ही 50 से अधिक प्रकार की वनस्पतियों और जीवों को दर्ज किया गया है। एक जंगल के भीतर, जैव विविधता का अर्थ संतुलन है; पक्षी कीटों को नियंत्रित करते हैं, कीड़े पौधों को परागित करते हैं, और कवक पेड़ों को स्वस्थ रखते हैं। केवल दो से तीन वर्षों के रखरखाव के बाद यह जंगल पूरी तरह से आत्मनिर्भर (self-sustaining) हो जाता है।
शहर के छोटे स्थानों में इन जंगलों को लगाना क्यों आसान और फायदेमंद है? मियावाकी पद्धति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके लिए विशाल भूमि की आवश्यकता नहीं होती है। इन्हें केवल 3 वर्ग मीटर (square meters) या दो पार्किंग स्पॉट (parking spots) जैसी छोटी जगहों पर भी आसानी से लगाया जा सकता है। जगह की कमी का सामना कर रहे शहरों के लिए यह तकनीक एक वरदान है। इन्हें स्कूलों के खेल के मैदानों, शहर के पार्कों, कारखानों के पीछे की संकरी पट्टियों या हाईवे (highways) के बीच की खाली जमीन में आसानी से उगाया जा सकता है।
ग्रे बुनियादी ढांचे की जगह इस हरे बुनियादी ढांचे का निर्माण करके हम एक हरित गलियारा (green corridor) बना सकते हैं, जो वन्यजीवों को शहर के बीच भी एक सुरक्षित आवास प्रदान करता है। यह पद्धति हमारे समुदायों के लिए एक शांत नखलिस्तान बनाती है जो लोगों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए पर्यावरण जितनी ही लाभदायक है।
गांधीजी की तीसरे दर्जे की रेल यात्राएँ व् लखनऊ चारबाग़ स्टेशन से कैसे बदला भारतीय इतिहास
जुलाई 1914 में जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ़्रीका से भारत लौटे, तो उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें एक बड़ी पते की सलाह दी थी ,पूरे एक साल तक अपने कान खुले रखना और मुँह बंद रखना। बापू ने इस सीख को गाँठ बाँध लिया। वे अच्छी तरह समझते थे कि जब तक देश के आम आदमी के दुख-दर्द, संघर्ष और उसकी उम्मीदों को अपनी आँखों से न देख लिया जाए, तब तक किसी भी बड़े जनांदोलन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसी सोच के साथ गांधीजी ने पूरे देश का दौरा करने की ठानी और सफ़र का ज़रिया चुना भारतीय रेल का थर्ड क्लास (third class)। रेलगाड़ी के इन साधारण डिब्बों में बैठकर बापू ने सिर्फ़ यात्रा नहीं की, बल्कि ग़ुलाम भारत के उस दर्द को महसूस किया जिसे अंग्रेज़ी हुकूमत और रईस तबक़ा पूरी तरह भुलाए बैठा था। आज का यह आलेख आपको गांधीजी की उसी ऐतिहासिक यात्रा पर ले जाएगा, जहाँ लखनऊ जैसे शहर ने उनके विचारों को राष्ट्रीय पहचान दी और नोआखली के दूर-दराज़ गाँवों ने उनकी अहिंसा की सबसे कड़ी परीक्षा ली।
गांधीजी ने भारत की आत्मा को समझने के लिए थर्ड क्लास का सफ़र क्यों चुना? गांधीजी का पक्का मानना था कि अपने लोगों को समझे बिना देश की सच्ची सेवा हो ही नहीं सकती। 25 सितंबर 1917 को रांची में लिखी अपनी किताब 'थर्ड क्लास इन इंडियन रेलवेज (Third Class in Indian Railways)' में उन्होंने इन कड़वे अनुभवों को बेबाकी से दर्ज किया। दो साल से ज़्यादा समय तक लाहौर से त्रांकेबार, वर्तमान नाम तरंगमबाड़ी (Tharangambadi) और कराची से कलकत्ता तक सफ़र करते हुए उन्होंने तीसरे दर्जे के हालात को बहुत बारीकी से परखा। गांधीजी ने लिखा कि 12 तारीख़ को उन्होंने बॉम्बे से मद्रास जाने वाली मेल ट्रेन का टिकट 13 रुपये 9 आने में ख़रीदा था। जिस डिब्बे पर साफ़ लिखा था कि यहाँ सिर्फ़ 22 मुसाफ़िर बैठ सकते हैं, उसमें पहले से ही खचाखच भीड़ भरी थी। मद्रास पहुँचने में दो रातें लगनी थीं। पूना पहुँचने तक अगर 22 से ज़्यादा लोग अंदर नहीं घुस पाए, तो इसकी वजह वे हिम्मतवाले मुसाफ़िर थे जिन्होंने दूसरों को दरवाज़े पर ही रोक दिया था। दो-तीन लोगों को छोड़ दें तो बाक़ी सबको पूरी रात बैठे-बैठे ही काटनी पड़ी। रायचूर पहुँचते-पहुँचते तो हालत बिल्कुल बेकाबू हो गई। भीड़ सँभालने के बजाय रेलवे गार्ड और कर्मचारी और लोगों को अंदर धकेल रहे थे। पाँच दिनों से सफ़र कर रहे एक मेमन व्यापारी ने जब इस बदइंतज़ामी का विरोध किया, तो कर्मचारियों ने उसकी बात सुनने के बजाय उसे ज़लील किया और कहा कि आख़िरी स्टेशन पर जाकर शिकायत कर लेना। 22 लोगों की जगह 35 लोग ठूँसे हुए थे—कुछ ज़मीन पर पड़े थे, तो कुछ रात भर खड़े रहने को मजबूर थे। कुछ बुज़ुर्ग मुसाफ़िरों ने बीच-बचाव न किया होता, तो यात्रियों के बीच मार-पीट तय थी।
रेल यात्रा और स्टेशनों पर आम जनता किन अमानवीय परिस्थितियों से जूझ रही थी? बापू ने अपनी डायरी में दर्ज किया कि पूरे सफ़र के दौरान डिब्बे में साफ़-सफ़ाई का नाम तक नहीं था। मुसाफ़िर भारी गंदगी के बीच बैठने को लाचार थे। डिब्बे के शौचालय में सफ़ाई तो दूर, पानी की टंकी में एक बूँद पानी तक नहीं था। स्टेशनों पर मिलने वाली चाय महज़ टैनिन वाला पानी थी, जिसमें घटिया चीनी और दूध के नाम पर कोई सफ़ेद घोल मिला दिया जाता था, जिससे वह कीचड़ जैसी लगती थी। स्टेशनों पर खाने-पीने की चीज़ें इतनी गंदी थीं कि देखकर घिन आ जाए। उन्हें मैले हाथों से परोसा जाता, गंदे बर्तनों में रखा जाता, मक्खियाँ भिनकती रहतीं और गंदे तराज़ू पर तौला जाता था। यात्रियों को यह घटिया खाना बिल्कुल पसंद नहीं था, लेकिन पेट की भूख के आगे वे मजबूर थे। वापसी का सफ़र भी कुछ कम तकलीफ़देह नहीं रहा। 9 लोगों के बैठने वाले डिब्बे में 12 लोग ठूँसे रहे। एक स्टेशन पर तो रेलकर्मी ने ज़बरदस्ती मुसाफ़िरों को अंदर ठूँसकर बाहर से दरवाज़ा बंद कर दिया और टोकने वाले यात्री को गालियाँ देकर धमकाया। डिब्बे का शौचालय इस्तेमाल के लायक़ ही नहीं था—पाइप था पर पानी ग़ायब, और लकड़ी के ढाँचे पर गंदगी की मोटी परत जमी हुई थी। स्टेशनों के हालात और भी ख़राब थे। रायचूर, धोंड, सोनपुर, चक्रधरपुर, पुरुलिया और आसनसोल जैसे स्टेशनों पर वेटिंग रूम शोर-शराबे और गंदगी से अटे पड़े थे। फ़र्श पर लोग जहाँ-तहाँ बैठते, थूकते और बीड़ी-सिगरेट पीते थे, जबकि वहाँ धूम्रपान पूरी तरह मना था। कीटाणुनाशक (डिसइन्फेक्टेंट) का तो किसी को अता-पता ही नहीं था। गांधीजी ने तो यहाँ तक कहा कि देश की राजधानी में तीसरे दर्जे का बुकिंग काउंटर किसी ब्लैक-होल जैसा था जिसे तुरंत ढहा देना चाहिए, क्योंकि यह गंदगी प्लेग जैसी जानलेवा बीमारियों को दावत दे रही थी।
फ़र्स्ट क्लास और थर्ड क्लास के भारी अंतर ने क्या सवाल खड़े किए? गांधीजी ने तुलना करते हुए बताया कि बॉम्बे से मद्रास के लिए फ़र्स्ट क्लास का किराया तीसरे दर्जे से पाँच गुना से भी ज़्यादा था। लेकिन सुविधा के नाम पर तीसरे दर्जे के यात्री को फ़र्स्ट क्लास का दसवाँ हिस्सा भी नहीं मिलता था। उन्होंने लिखा कि तीसरे दर्जे के मुसाफ़िरों की इस अनदेखी ने भारतीयों में सफ़ाई, अनुशासन और सलीके से साथ रहने की आदतें विकसित करने का बहुत बड़ा मौक़ा गँवा दिया। उलटे, इन बदहाल हालातों ने लोगों की शालीनता और सफ़ाई की सोच को ही मार दिया। इसके लिए गांधीजी ने बड़ा सीधा और व्यावहारिक उपाय सुझाया। उनका कहना था कि जब तक बड़े-बड़े अफ़सर और रसूखदार लोग बिना किसी को बताए सामान्य मुसाफ़िरों की तरह तीसरे दर्जे में सफ़र नहीं करेंगे, तब तक रेलों की यह दुर्दशा नहीं सुधरेगी। जब वे ख़ुद आम आदमी का दर्द झेलेंगे, तभी इन बेज़ुबान लाखों यात्रियों को उनके किराए के बदले बुनियादी मानवीय सुविधाएँ मिल पाएँगी।
1916 का लखनऊ अधिवेशन बापू के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ कैसे साबित हुआ? रेल के तीसरे दर्जे से शुरू हुआ यह जन-संवाद 1916 में लखनऊ की ऐतिहासिक धरती पर पहुँचा। जब महात्मा गांधी 31वें कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लेने लखनऊ पहुँचे, तब वे आज की तरह देश के सर्वमान्य नेता नहीं बने थे। इसी लखनऊ दौरे में बिहार के चंपारण से आए सीधे-सादे किसान राजकुमार शुक्ल बापू से मिले। शुक्ल जी ने चंपारण के नील की खेती करने वाले किसानों पर हो रहे अंग्रेज़ी ज़ुल्म को दिखाने के लिए गांधीजी से वहाँ चलने की ज़िद पकड़ ली। वे बापू के पीछे-पीछे तब तक लगे रहे, जब तक उन्होंने चंपारण आने की हामी नहीं भर दी। इसी मुलाक़ात से शुरू हुआ ऐतिहासिक चंपारण सत्याग्रह, जिसने अंग्रेज़ों को चंपारण कृषि क़ानून बनाने पर मजबूर कर दिया और गांधीजी को पूरे देश का सबसे बड़ा जननायक बना दिया। लखनऊ के चारबाग़ रेलवे स्टेशन की यादें भी बापू से बहुत गहराई से जुड़ी हैं। दिसंबर 1916 में इसी स्टेशन पर गांधीजी की पहली मुलाक़ात युवा जवाहरलाल नेहरू से हुई थी। इसके बाद 1920 और 1921 में जब असहयोग और ख़िलाफ़त आंदोलन छिड़ा, तो लखनऊ बापू का मुख्य ठिकाना बन गया। अपनी लखनऊ यात्राओं में वे पुराने शहर में मौलाना अब्दुल बारी फ़रंगी महली के फ़्रेंच शैली वाले घर में ठहरते थे, जहाँ उनका कमरा आज भी वैसे ही सहेजा हुआ है। फ़रवरी 1920 में चारबाग़ स्टेशन पर उतरते ही उन्होंने छात्रों से सरकारी स्कूल छोड़ने और चरखे से गाढ़ा सूत कातने की अपील की। फ़रवरी 1921 में गोमती किनारे उन्होंने लोगों को उर्दू में संबोधित करते हुए अंग्रेज़ी अदालतों का बहिष्कार कर अपनी पंचायतें बैठाने की सलाह दी। अगस्त 1921 में अमीनाबाद पार्क में झमाझम बारिश के बीच उन्होंने 24 घंटे का मौन व्रत रखकर स्वदेशी और अहिंसा का पाठ पढ़ाया। बाद में, सितंबर 1929 में लखनऊ यूनिवर्सिटी छात्र संघ का उद्घाटन भी बापू के हाथों हुआ, जहाँ उन्होंने नौजवानों को खादी अपनाने की सीख दी। 1936 में गोखले मार्ग पर उन्होंने एक पौधा भी लगाया था, जिसकी पट्टिका आज भी वहाँ देखी जा सकती है।
नोआखली के दंगों में गांधीजी की अहिंसा की सबसे कठिन परीक्षा कैसे हुई? आज़ादी की दहलीज़ पर जब पूरा मुल्क दंगों की आग में झुलस रहा था, तब 77 साल के बुज़ुर्ग गांधीजी ने पूर्वी बंगाल के नोआखली का रुख़ किया। 7 नवंबर 1946 को बापू नोआखली पहुँचे। कलकत्ता के दंगों की लपटें अब शांत गाँवों तक पहुँच चुकी थीं। बापू चाहते तो हिंदू-बहुल बिहार जा सकते थे, लेकिन उन्होंने जानबूझकर मुस्लिम-बहुल नोआखली चुना ताकि वे अपनी अहिंसा की असली परीक्षा ले सकें। बापू ने बाढ़ से घिरे 47 गाँवों की पैदल यात्रा की। चाँदपुर जाते वक़्त नाव में उनकी तबीयत भी बिगड़ी, पर वे रुके नहीं। उन्होंने बदले की आग को सिरे से ख़ारिज करते हुए कहा कि यह कोई बहादुरी नहीं, बल्कि गुंडों की कायरता है। उन्होंने बिहार के हिंदुओं को मुसलमानों पर हमले के लिए फटकारा, तो नोआखली के मुसलमानों को समझाया कि अल्पसंख्यकों को सताना बहादुरी नहीं है। नोआखली में गांधीजी ने दिल छू लेने वाली बात कही: "मैं यहाँ आप में से ही एक बनकर रहने आया हूँ। जिस तरह मैं एक गुजराती हूँ, ठीक उसी तरह मैं एक भारतीय और एक बंगाली भी हूँ।" वे मुस्लिम परिवारों के घरों में ठहरे और क़ुरान की आयतों का हवाला देकर समझाया कि किसी पर ज़बरदस्ती धर्म थोपना ग़लत है। चौमुहानी गवर्नमेंट कॉलेज के मुस्लिम प्रिंसिपल तफ़ज़्ज़ुल हुसैन ने अपनी आत्मकथा 'स्मृतिकणा' में लिखा कि बापू नोआखली और बिहार, दोनों जगह की हिंसा से बराबर आहत थे। पंचगाँव के तोफ़ाएल अहमद ने बताया कि कैसे गांधीजी बिना किसी ठाठ-बाट के ज़मीन पर चटाई बिछाकर बैठते थे और उनकी शांति सभाओं ने लोगों के दिलों में जमी नफ़रत को धो डाला।
अहिंसक संवाद और संवेदना से आज क्या सीखा जा सकता है? गांधीजी की पूरी ज़िंदगी हमें यही सिखाती है कि समाज में पक्की शांति केवल आपसी बातचीत और संवाद से ही आ सकती है। 18 मई 2021 को गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति और लखनऊ के ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय ने मिलकर "अहिंसक संवाद" पर एक वेबिनार रखा था। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर अनिल कुमार शुक्ला ने 'मनसा, वाचा, कर्मणा' की बात करते हुए कहा कि पत्रकारिता के छात्रों को 'सहानुभूति' (sympathy) और 'समानुभूति' (empathy) के फ़र्क़ को ज़रूर समझना चाहिए। वहीं गांधी स्मृति के डॉ. वेदअभ्यास कुंडू ने बापू के बताए अहिंसा के पाँच बुनियादी उसूलों—सम्मान, आपसी समझ, स्वीकार्यता, सराहना और करुणा—की बात की। उन्होंने कहा कि हमें बातचीत का एक ऐसा माहौल बनाना चाहिए जहाँ नकारात्मकता न हो, और मन के ग़ुस्से व कड़वाहट को दूर करने के लिए आभार-दैनिकी (ग्रैटिट्यूड जर्नल) लिखने की आदत डालनी चाहिए।
इस ऐतिहासिक यात्रा का सबसे बड़ा निष्कर्ष क्या है? महात्मा गांधी की तीसरे दर्जे की रेल यात्राएँ सिर्फ़ एक जगह से दूसरी जगह जाना भर नहीं थीं, बल्कि वे भारतीय समाज की नब्ज़ पकड़ने की एक गहरी साधना थीं। रेल की भीड़-भाड़, गंदगी और उपेक्षा के बीच बैठकर उन्होंने जो कुछ देखा और महसूस किया, उसी ने उन्हें चंपारण के किसानों का दर्द समझने की ताक़त दी, लखनऊ में राष्ट्रीय एकता का मंच तैयार किया और नोआखली के दंगों में शांति का सच्चा मसीहा बनाया। बापू ने साबित कर दिखाया कि सच्चा नेतृत्व महलों में बैठकर नहीं, बल्कि आम जनता के कड़वे अनुभवों को उनके साथ जीकर ही पैदा होता है।
एबेकस से लेकर एआई तक, जानिए कैसे बदल गई पूरी कंप्यूटर की दुनिया?
कंप्यूटर के आविष्कार से पहले, लोग संख्याओं का हिसाब रखने और बुनियादी गणना करने के लिए लाठी, पत्थर और हड्डियों जैसे सरल उपकरणों पर निर्भर थे। जैसे-जैसे तकनीक आगे बढ़ी और इंसानी समझ का विकास हुआ, एबेकस (Abacus) और नेपियर्स बोन्स (Napier's Bones) जैसे अधिक उन्नत उपकरण विकसित किए गए। हालांकि ये शुरुआती उपकरण बुनियादी कम्प्यूटेशनल उपकरणों के रूप में काम करते थे, लेकिन जटिल गणनाओं को संभालने में इनकी क्षमता बेहद सीमित थी। समय के साथ तकनीक ने करवट ली और आज हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) के युग में प्रवेश कर चुके हैं।
शुरुआती दौर में गणना के लिए किन उपकरणों का इस्तेमाल होता था? कंप्यूटर का इतिहास हजारों साल पुराना है। चीन द्वारा बनाया गया एबेकस 4000 ईसा पूर्व के आसपास अस्तित्व में आया और इसे अक्सर पहला कंप्यूटिंग उपकरण माना जाता है। इसमें छड़ों पर मोतियां पिरोई गई थीं और इसका उपयोग जोड़ और घटाव जैसी सरल अंकगणितीय संक्रियाओं के लिए किया जाता था। समय के साथ एबेकस के विभिन्न संस्करण पूरे एशिया में फैल गए। इसके बाद 1617 में जॉन नेपियर (John Napier) द्वारा नेपियर्स बोन्स का आविष्कार किया गया। यह संख्याओं के साथ उकेरी गई हाथीदांत की छड़ों का एक सेट था, जिसे गुणा और भाग में सहायता के लिए डिज़ाइन किया गया था। इसी आविष्कार ने दशमलव बिंदु की अवधारणा भी पेश की।
मैकेनिकल कैलकुलेटर और इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटिंग की शुरुआत कैसे हुई? फ्रांसीसी गणितज्ञ ब्लेज़ पास्कल (Blaise Pascal) ने 1642 और 1644 के बीच पास्कलाइन (Pascaline) विकसित किया, जिसे अरिथमेटिक मशीन (Arithmetic Machine) या एडिंग मशीन (Adding Machine) भी कहा जाता है। यह जोड़ और घटाव करने में सक्षम पहला मैकेनिकल कैलकुलेटर था। बाद में जर्मन दार्शनिक गॉटफ्रीड विल्हेम लाइबनिज़ (Gottfried Wilhelm Leibniz) ने 1673 में पास्कल के डिजाइन में सुधार करते हुए स्टेप्ड रेकनर (Stepped Reckoner) विकसित किया।
1820 के दशक में, "आधुनिक कंप्यूटर के पिता" कहे जाने वाले चार्ल्स बैबेज (Charles Babbage) ने डिफरेंस इंजन (Difference Engine) को डिज़ाइन किया। 1830 के दशक में उन्होंने एनालिटिकल इंजन (Analytical Engine) भी विकसित किया, जो मेमोरी और पंच कार्ड का उपयोग करने वाला पहला सामान्य-उद्देश्य वाला मैकेनिकल कंप्यूटर था। 1890 में अमेरिकी सांख्यिकीविद् हरमन होलेरिथ (Herman Hollerith) ने टेबुलेटिंग मशीन (Tabulating Machine) का आविष्कार किया। उनकी कंपनी 1924 में इंटरनेशनल बिजनेस मशीन यानी आईबीएम (IBM) बन गई। 1930 के दशक में वन्नेवर बुश (Vannevar Bush) ने डिफरेंशियल एनालाइज़र (Differential Analyzer) का आविष्कार किया। इसके बाद 1944 में आईबीएम और हार्वर्ड की साझेदारी में मार्क 1 (Mark I) कंप्यूटर बनाया गया, जिसे हावर्ड ऐकेन (Howard Aiken) ने डिज़ाइन किया था।
दुनिया का पहला इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर एनिएक कैसे बना? एनिएक (ENIAC) यानी इलेक्ट्रॉनिक न्यूमेरिकल इंटीग्रेटर एंड कंप्यूटर, संख्यात्मक समस्याओं को हल करने जैसे सामान्य उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाने वाला पहला इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर था। इसे पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय में जॉन प्रेस्पर एकर्ट (John Presper Eckert) और जॉन मौचली (John Mauchly) द्वारा अमेरिकी सेना की बैलिस्टिक रिसर्च लेबोरेटरी के लिए डिज़ाइन और आविष्कार किया गया था। इसका निर्माण 1943 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मन सेना के खिलाफ युद्ध के प्रयासों में मदद करने के लिए शुरू हुआ और 1946 में पूरा हुआ।
युद्ध के दौरान पुरुष इंजीनियरों की कमी थी, इसलिए छह महिला प्रोग्रामरों की एक टीम ने इसकी प्रोग्रामिंग की: बेट्टी जीन जेनिंग्स (Betty Jean Jennings), मर्लिन वेसकॉफ (Marilyn Wescoff), रूथ लिचरमैन (Ruth Lichterman), एलिज़ाबेथ स्नाइडर (Elizabeth Snyder), फ्रांसिस बिलास (Frances Bilas) और कैथलीन मैकनल्टी (Kathleen McNulty)। एनिएक लगभग 1,800 वर्ग फुट में फैला था। इसमें 20,000 वैक्यूम ट्यूब, 1,500 रिले, 10,000 कैपेसिटर और 70,000 रेसिस्टर्स लगे थे। यह 30 टन से अधिक भारी था और इसे चलाने में 200 किलोवाट बिजली लगती थी। यह एक सेकंड में 5,000 जोड़ चक्र पूरे कर सकता था, जो 50,000 लोगों के बराबर का काम था। 15 फरवरी को एनिएक डे (ENIAC Day) के रूप में मनाया जाता है। बाद में एकर्ट और मौचली ने 1951 में पहला व्यावसायिक रूप से सफल कंप्यूटर यूनिवैक 1 (UNIVAC I) भी विकसित किया।
कंप्यूटर की विभिन्न पीढ़ियों ने तकनीक को कैसे बदला? पहली पीढ़ी (1940-1956) के कंप्यूटरों में मेमोरी और सीपीयू के लिए वैक्यूम ट्यूब का उपयोग किया जाता था। ये बड़े, धीमे और महंगे थे। एनिएक और यूनिवैक 1 इसी पीढ़ी के उदाहरण हैं। दूसरी पीढ़ी (1957-1963) में ट्रांजिस्टर का उपयोग शुरू हुआ, जो सस्ते और आकार में छोटे थे। इस पीढ़ी में असेंबली और प्रोग्रामिंग भाषाओं के रूप में कोबोल (COBOL) और फोरट्रान (FORTRAN) का उपयोग किया गया।
तीसरी पीढ़ी में ट्रांजिस्टर की जगह इंटीग्रेटेड सर्किट यानी आईसी (ICs) का इस्तेमाल हुआ। पास्कल और पीएल/1 (PASCAL and PL/1) जैसी उच्च-स्तरीय भाषाओं का उपयोग शुरू हुआ। चौथी पीढ़ी (1971-1980) में वीएलएसआई (VLSI) सर्किट का उपयोग किया गया, जिसमें लाखों ट्रांजिस्टर एक चिप पर होते थे। इसी दौर में सी (C) और सी++ (C++) जैसी प्रोग्रामिंग भाषाओं का विकास हुआ। 1980 से लेकर आज तक की पांचवीं पीढ़ी में यूएलएसआई (ULSI) तकनीक का उपयोग किया जा रहा है, जिसमें डेस्कटॉप, लैपटॉप और एआई सॉफ्टवेयर शामिल हैं।
दुनिया का पहला व्यावसायिक लैपटॉप ओसबोर्न 1 कैसा था? व्यावसायिक रूप से उपलब्ध होने वाला पहला लैपटॉप ओसबोर्न 1 (Osborne 1) था, जिसे अप्रैल 1981 में जारी किया गया था। इसका आविष्कार एडम ओसबोर्न (Adam Osborne) ने किया था। इसका वजन 11.1 किलोग्राम था और इसमें 12.7 सेंटीमीटर का मोनोक्रोम डिस्प्ले था। इसकी कीमत 1,795 डॉलर थी। यह माइक्रोप्रोसेसर (Intel 8088) का उपयोग करने वाले पहले कंप्यूटरों में से एक था। इसमें रिचार्जेबल बैटरी, सीआरटी डिस्प्ले (CRT display), बिल्ट-इन कीबोर्ड और दो 5.25-इंच फ्लॉपी डिस्क ड्राइव शामिल थे। यह Z80A सीपीयू पर चलता था, जिसमें 64K रैम मौजूद थी। हालांकि ओसबोर्न 1 बेहद सफल रहा, लेकिन एडम ओसबोर्न ने इसके अपग्रेड संस्करण ओसबोर्न एक्जीक्यूटिव की घोषणा बहुत जल्दी कर दी, जिससे पहले मॉडल के ऑर्डर रद्द हो गए और 1983 में कंपनी दिवालिया हो गई।
आधुनिक युग में तकनीकी विकास की दिशा क्या है? 1970 और 1980 के दशक में पर्सनल कंप्यूटर क्रांति आई। 1977 में स्टीव जॉब्स (Steve Jobs) और स्टीव वोज्नियाक (Steve Wozniak) ने एप्पल 2 (Apple II) विकसित किया। 1981 में आईबीएम पीसी और 1984 में मैकिन्टोश (Macintosh) आया, जिसने ग्राफिकल यूजर इंटरफेस पेश किया। 1990 के दशक में टिम बर्नर्स-ली (Tim Berners-Lee) द्वारा वर्ल्ड वाइड वेब (World Wide Web) का आविष्कार किया गया। आज क्लाउड कंप्यूटिंग, एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग (Quantum Computing) और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) तकनीक की दुनिया को पूरी तरह बदल रहे हैं।
आईईटी लखनऊ ने भारत में तकनीकी शिक्षा की नींव कैसे रखी? तकनीकी क्रांति के इसी सफर में भारत भी पीछे नहीं रहा। इंस्टिट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, लखनऊ (Institute of Engineering and Technology, Lucknow) उत्तर प्रदेश में एक राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित तकनीकी संस्थान है। इसकी स्थापना 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग संकाय के रूप में की गई थी, और बाद में इसे एक स्वतंत्र संस्थान के रूप में पुनर्गठित किया गया। साल 2000 से यह डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय से संबद्ध है।
आईईटी लखनऊ 19 नवंबर 1984 को शुरू हुआ था। शुरुआत में, इसने तीन शाखाओं - कंप्यूटर साइंस, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स में बी.टेक की डिग्री की पेशकश की। एक साल के भीतर सिविल और मैकेनिकल शाखाएं भी शुरू की गईं। बाद में इसमें इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और केमिकल ब्रांच के साथ-साथ एमबीए, एम.टेक और एमसीए कोर्स भी शामिल किए गए। संस्थान का 100 एकड़ का परिसर उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम लिमिटेड द्वारा बनाया गया था। संस्थापक निदेशक प्रो. सुरेश चंद्र 26 जून 1984 को शामिल हुए और 11 अक्टूबर 1984 से शिक्षकों ने कार्यभार संभाला।
इस संस्थान में लगभग 2500 छात्रों के रहने के लिए आठ लड़कों के और चार लड़कियों के हॉस्टल हैं, जिनमें विश्वेश्वरैया भवन-ए, विश्वेश्वरैया भवन-बी, रमन भवन-ए, रमन भवन-बी, भाभा हॉस्टल, आर्यभट्ट हॉस्टल, रामानुजम हॉस्टल, राम मनोहर लोहिया हॉस्टल, गार्गी भवन, अपाला हॉस्टल और सरोजनी भवन शामिल हैं। लड़कियों के लिए एक नवनिर्मित मैत्रेयी हॉस्टल भी तैयार है। संस्थान का अपना प्लेसमेंट सेल है, जिसका नेतृत्व मैकेनिकल विभाग के प्रोफेसर डॉ. अरुण कुमार तिवारी कर रहे हैं। आईईटी लखनऊ का यह सफर इस बात का प्रमाण है कि शुरुआती गणना मशीनों से लेकर आधुनिक कंप्यूटर साइंस तक, शिक्षा के बुनियादी ढांचे ने हर पीढ़ी को तकनीक से जोड़ने का अहम कार्य किया है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/23ncd8d3
2. https://tinyurl.com/2cg27lpo
3. https://tinyurl.com/29jya2u4
4. https://tinyurl.com/25jxyynq
जलवायु और मौसम
21-09-2026 09:30 AM • Lucknow-Hindi
लखनऊ, आज पढ़िए चंद्रमा व सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से बनने वाले समुद्री ज्वार-भाटे के बारे में
महासागर, पृथ्वी की सतह के 70% से अधिक हिस्से को व्यापते हैं और ग्रह के प्राथमिक जलवायु नियंत्रक के रूप में कार्य करते हैं। महासागरीय ज्वार-भाटे (Tides) का उठना और गिरना, चंद्रमा और सूर्य के उस गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से संचालित होता है, जो पृथ्वी के जल पर बल डालता है। दिलचस्प बात यह है कि यह परस्पर क्रिया एकतरफा नहीं है। बदलते महासागरीय ज्वार द्वारा उत्पन्न घर्षण, पृथ्वी के घूर्णन पर एक धीमे गुरुत्वाकर्षण रोधक के रूप में कार्य करता है, जो धीरे-धीरे इस ऊर्जा को वापस चंद्रमा की ओर स्थानांतरित करता है। इस प्रकार, यह बल चंद्रमा को हर साल पृथ्वी से लगभग 3.8 सेंटीमीटर दूर धकेल रहा है।
बढ़ते ग्रीनहाउस गैस (Greenhouse gas) उत्सर्जन के कारण पृथ्वी की ऊष्मीय ऊर्जा असंतुलित हो गई है और महासागरों में भारी मात्रा में ऊष्मा जमा हो रही है। पर्यावरण और मानवता के लिए इसके दूरगामी परिणाम हैं। अतः यह जानना कि पृथ्वी की प्रणालियों में ऊष्मा कितनी और कहाँ संग्रहीत है, ग्रह के ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) की स्थिति और भविष्य के अनुमानों को समझने के लिए आवश्यक है। महासागरीय ऊष्मा अवशोषण (Ocean Heat Uptake) पृथ्वी ऊर्जा असंतुलन (Earth Energy Imbalance) की गणना के लिए उपयोग किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण संकेतक है, जो वैश्विक वार्मिंग को मापने के लिए एक मूलभूत मीट्रिक है।
क्या आप जानते हैं कि महासागरों ने, मानव-संचालित तापन का लगभग 90% हिस्सा अवशोषित कर लिया है। इस प्रकार, यह एक प्रतिरोधी के रूप में कार्य करता है और हमारे ग्रह की सतह के गर्म होने को धीमा करता है। पृथ्वी की ताप विनियमन प्रणाली को समझने के लिए, महासागरीय ऊष्मा अवशोषण में होने वाले परिवर्तनों की निगरानी करना आवश्यक है।
महासागर, अपनी सतह पर वायुमंडल से गर्मी को अवशोषित करते हैं, जिसे बाद में धाराओं, मिश्रण प्रक्रियाओं और एल नीनो (El Nino) तथा ला नीना (La Nina) जैसे प्राकृतिक जलवायु पैटर्न द्वारा संचालित अन्य महासागरीय प्रक्रियाओं के माध्यम से गहरे महासागर और दुनिया भर में पुनर्वितरित किया जाता है। यहाँ, यह ऊष्मा सदियों या सहस्राब्दियों तक फंसी रहती है। समय के साथ, यह गर्मी 2,000 मीटर से अधिक गहरी परतों में फैल जाती है। अपनी विशाल ताप क्षमता और जबरदस्त आयतन के कारण, महासागर सैकड़ों या हजारों वर्षों तक गर्मी को अवशोषित और संचित करना जारी रखेंगे, फिर भले ही ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम कर दिया जाए।
पिछले कुछ दशकों (1960-2020) में, सैटेलाइट (Satellite) मापन की शुरुआत के बाद से 2,000 मीटर गहराई तक महासागर की वार्मिंग दर लगभग दोगुनी हो गई है। महासागरीय ऊष्मा अवशोषण में दुनिया के सभी क्षेत्रों में वृद्धि हुई है, हालांकि प्रत्येक क्षेत्र में इसकी तीव्रता अलग-अलग है। अन्य क्षेत्रों की तुलना मे, दक्षिणी महासागर (जिसे अंटार्कटिक महासागर भी कहा जाता है) और अटलांटिक महासागर में अधिक स्पष्ट वार्मिंग का अनुभव हुआ है। दूसरी ओर, प्रशांत और हिंद महासागरों ने अपेक्षाकृत कम वार्मिंग दिखाई दी है।
महासागरीय गर्मी, वर्षा के वितरण में बदलाव लाती है, जिसके परिणामस्वरूप दो विपरीत प्रभाव होते हैं। पहला, कुछ क्षेत्रों को अधिक तीव्र वर्षा और बाढ़ का सामना करना पड़ सकता है, और दूसरा, अन्य क्षेत्रों में विकट सूखे की स्थिति और जंगल की आग का उच्च जोखिम हो सकता है। गर्म महासागर, तूफानों की तीव्रता को भी प्रभावित कर सकते हैं, जिससे वे अधिक शक्तिशाली और संभावित रूप से अधिक विनाशकारी हो सकते हैं। महासागर की सतह की परतों में ऊष्मा ऊर्जा, तूफानों के लिए ईंधन के रूप में कार्य करती है, जहाँ गर्म महासागरीय पानी से ऊर्जा खींची जाती है। यह हरिकेन (Hurricane) और चक्रवातों के मामले में होता है।
पृथ्वी, महासागरीय पानी की एक ऐसी बूंद के भीतर स्थित है, जिसका आकार कुछ-कुछ रग्बी बॉल जैसा है। ग्रह के दोनों (प्रत्येक) तरफ महासागर के पानी में एक उभार है। एक उभार, ग्रह के उस आधे हिस्से पर है, जो चंद्रमा की ओर है, जबकि दूसरा इसके विपरीत छोर पर स्थित है। ये दोनों उभार, मुख्य रूप से पृथ्वी पर चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण बनते हैं।
इस बल के दो अलग-अलग घटक हो सकते हैं। यह पदार्थ को ‘लंबवत’ (Vertically) – पृथ्वी की सतह के लंबवत दिशा में खींच सकता है या ‘क्षैतिज रूप से’ (Horizontally) – हमारे ग्रह के अग्र-भाग के समानांतर भी खींच सकता है। अब, पृथ्वी पर वह स्थान, जो किसी भी समय सीधे चंद्रमा के ठीक नीचे होता है, उप-चंद्र बिंदु (Sublunar point) कहलाता है। इस बीच, ग्रह के दूसरी तरफ स्थित वह स्थान जो सीधे उप-चंद्र बिंदु के विपरीत है, प्रतिमुख बिंदु (Antipodal point) के रूप में जाना जाता है।
यह कोई संयोग नहीं है कि महासागर के उभार उन दोनों स्थानों पर सबसे अधिक हैं। उप-चंद्र बिंदु और प्रतिमुख बिंदु पर, चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव में एक क्षैतिज घटक का अभाव होता है। यह अभाव, दुनिया के उन दो कोनों में भी है, जो इन स्थानों से 90 डिग्री की दूरी पर स्थित हैं। ये चार क्षेत्र, इस संबंध में अद्वितीय हैं कि पृथ्वी पर हर दूसरा स्थान एक क्षैतिज बल का अनुभव करता है, जो महासागर में पानी के अणुओं को या तो उप-चंद्र बिंदु या प्रतिमुख बिंदु की ओर धकेलता है। यही कारण है कि महासागर उन दोनों क्षेत्रों के ऊपर उभर जाता है। इस प्रकार, उप-चंद्र बिंदु पर चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल अपने सबसे मजबूत स्तर पर है, जबकि प्रतिमुख बिंदु पर चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव सबसे कमजोर है।
हर 24 घंटे में एक बार, पृथ्वी अपने अक्ष के चारों ओर एक चक्कर पूरा करती है। जैसे-जैसे पृथ्वी घूमती है, ग्रह की सतह पर कोई भी स्थान उन दोनों महासागरीय उभारों से होकर गुजरता है। तो अधिकांश क्षेत्रों में, जब आपका घर सीधे किसी उभार के नीचे होता है, तो स्थानीय ज्वार उच्च होना चाहिए। लेकिन जैसे ही यह उभारों के बीच के क्षेत्र में प्रवेश करता है, तब ज्वार कम होना चाहिए। हालांकि, यह हमेशा ऐसा नहीं होता है। वास्तव में, सूर्य भी महासागरों पर गुरुत्वाकर्षण खिंचाव डालता है। लेकिन चूंकि सूर्य बहुत दूर है, इसलिए ज्वार-भाटे पर इसका प्रभाव चंद्रमा की तुलना में कम स्पष्ट होता है। फिर भी, यह नियमित रूप से ज्वारीय उभारों को काफी हद तक बढ़ाता है।
ज्वार तब सबसे बड़े होते हैं, जब सूर्य और चंद्रमा एक सीधी रेखा में आते हैं। यह दो अलग-अलग चंद्र चरणों के दौरान होता है: पूर्णिमा और अमावस्या, जिसके परिणामस्वरूप ‘वसंत ज्वार (Spring tides)’ नामक बड़े आकार के ज्वार आते हैं। ध्यान दें कि इस नाम का वसंत के मौसम से कोई लेना-देना नहीं है, और वास्तव में, वसंत ज्वार पूरे वर्ष आते हैं। वसंत ज्वार के दौरान, उच्च और निम्न ज्वार अधिक चरम होते हैं। ‘उच्च ज्वार’ वास्तव में बहुत ऊंचे होते हैं और ‘निम्न ज्वार’ असाधारण रूप से कम होते हैं। जब सूर्य और चंद्रमा (पृथ्वी के सापेक्ष) एक-दूसरे के समकोण पर होते हैं, तो कम चरम ज्वार आते हैं। ऐसी स्थिति से ‘नीप टाइड्स (Neap tides)’ कहे जाने वाले ज्वार उत्पन्न होते हैं। नीप टाइड एक ऐसी अवधि है, जिसमें उच्च और निम्न ज्वार के बीच का अंतर न्यूनतम होता है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/55asr7u8
2. https://tinyurl.com/36wswbwy
3. https://tinyurl.com/33ky5f2b
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
14-09-2026 09:34 AM • Lucknow-Hindi
उत्तर भारत में क्यों नहीं मनाते महाराष्ट्र जैसी गणेश चतुर्थी ? जानिए असली वजह
भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना में विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश का स्थान सर्वोपरि है। किसी भी नए कार्य, यात्रा अथवा मांगलिक अनुष्ठान के आरंभ में प्रथम पूज्य के रूप में उनका आह्वान किया जाता है। गणेश चतुर्थी, जिसे गणेशोत्सव और विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है, मूल रूप से भगवान गणेश के जन्मोत्सव, उनकी अगाध बुद्धि, शुभ शुरुआत और बाधाओं के निवारण का पावन पर्व है। यह 10 दिवसीय महापर्व घरों में मिट्टी की छोटी प्रतिमाओं की स्थापना से आरंभ होकर सार्वजनिक पंडालों की भव्यता और अंत में श्रद्धा-भरे विसर्जन जुलूस तक विस्तृत होता है। यह उत्सव केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मूर्तिकारों, संगीतकारों, फूल-विक्रेताओं, रसोइयों और सज्जाकारों के हुनर को एक साझा मंच प्रदान करता है, जहाँ व्यक्तिगत साधना सामुदायिक उल्लास में परिवर्तित हो जाती है।
क्या है गणेश चतुर्थी की पौराणिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि? धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं में भगवान गणेश के प्राकट्य को लेकर कई आख्यान मिलते हैं। इनमें सबसे प्रचलित कथा माता पार्वती और भगवान शिव से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने अपनी सुरक्षा और एकांत की रक्षा के लिए अपने उबटन से एक बालक की रचना की और उसे द्वारपाल नियुक्त किया। जब भगवान शिव वहाँ पहुँचे, तो बालक ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। इस टकराव के परिणामस्वरूप बालक का मस्तक कट गया। माता पार्वती के गहन विलाप को देखकर भगवान शिव ने उन्हें एक हाथी का शीश लगाकर पुनर्जीवित किया और अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया। यह कथा केवल एक घटना नहीं है, बल्कि यह जीवन के कई गहरे व्यावहारिक संदेश देती है। यह सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य का निर्वहन पूरी निष्ठा से करना चाहिए, क्रोध विवेक के अभाव में विनाश लाता है, और संघर्ष के बाद भी प्रेम, स्वीकृति और पुनर्स्थापना संभव है।
भगवान गणेश के शारीरिक स्वरूप में भी जीवन प्रबंधन के गूढ़ रहस्य समाहित हैं। उनका विशाल मस्तक व्यापक सोच और सुदृढ़ निर्णय क्षमता का प्रतीक माना गया है। उनके बड़े-बड़े कान धैर्यपूर्वक सुनने की महत्ता को दर्शाते हैं, जबकि उनकी सूक्ष्म आँखें गहन एकाग्रता और सूक्ष्म दृष्टि का बोध कराती हैं। उनकी सूंड शक्ति और परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलनशीलता (फ्लेक्सिबिलिटी) को रेखांकित करती है। उनका वाहन मूषक चंचल इच्छाओं और वासनाओं पर नियंत्रण का संकेत देता है, और उनके हाथ में स्थित मोदक सच्चे परिश्रम के उपरांत मिलने वाले मधुर परिणाम का द्योतक है। इस प्रकार, गणेश जी की आराधना केवल एक पारंपरिक क्रिया नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आचरण और सामाजिक व्यवहार में इन सद्गुणों को अपनाने का आह्वान है।
क्या है गणपति पूजन से जुड़ा प्राचीन गण और टोटम का सामाजिक सिद्धांत? गणेश पूजा की ऐतिहासिक जड़ों को लेकर समाजशास्त्रियों और शोधकर्ताओं ने कई महत्वपूर्ण अवधारणाएँ प्रस्तुत की हैं। दक्कन क्षेत्र के प्राचीन इतिहास पर प्रस्तुत एक समाजशास्त्रीय शोध के अनुसार, प्राचीन काल में दक्कन में गण नामक गणतांत्रिक कबीले रहा करते थे। इन कबीलों के प्रमुख को 'गणपति' कहा जाता था। उस दौर में प्रत्येक कबीले का अपना एक विशिष्ट प्रतीक चिह्न होता था, जिसे टोटम (totem) कहा जाता था, और यह प्रायः किसी पशु के शीश के रूप में होता था।
ऐतिहासिक विश्लेषण के अनुसार, जिस कबीले का टोटम गज-मुख (हाथी का सिर) था, उसने दक्कन के एक विस्तृत भूभाग पर अपना आधिपत्य और प्रभाव स्थापित किया। उस कबीले के प्रमुख अत्यंत लोकप्रिय हुए और जनमानस में उनके प्रति गहरा आदर भाव विकसित हो गया। कालांतर में, लोगों ने श्रद्धावश उनकी स्मृति और उपस्थिति को पूजना प्रारंभ किया। चूँकि उनके कबीले का प्रतीक हाथी का शीश था, इसलिए उनकी प्रतिमा का निर्माण भी गज-शीश के साथ किया जाने लगा। धीरे-धीरे समय बीतने के साथ यह कबीलाई परंपरा भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश के पौराणिक पूजन के साथ एकाकार हो गई और इसने एक सार्वभौमिक धार्मिक स्वरूप ग्रहण कर लिया।
बाल गंगाधर तिलक ने 1892 में इस पर्व को सार्वजनिक आंदोलन क्यों बनाया? यद्यपि गणेश चतुर्थी का पर्व घरों के भीतर सदियों से मनाया जाता रहा था, परंतु इसे सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने का श्रेय राष्ट्रवादी नेता बाल गंगाधर तिलक को जाता है। वर्ष 1892 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने हिंदुओं के सार्वजनिक रूप से एकत्रित होने पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे थे। इन दमनकारी नियमों का रचनात्मक उत्तर देने के लिए बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव को सार्वजनिक पंडालों के रूप में आयोजित करने की प्रेरणा दी।
सार्वजनिक पंडाल केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं रहे, बल्कि वे राष्ट्रीय विमर्श, बौद्धिक भाषणों, नाटकों, संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के प्रमुख केंद्र बन गए। इस मंच ने समाज के विभिन्न वर्गों, जातियों और स्तरों के लोगों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। यहाँ से जो सामाजिक एकता और नागरिक एकजुटता की नींव पड़ी, वह आज भी जीवित है। आज भी अनेक गणेश मंडल न केवल धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, बल्कि रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य सेवाएँ और सामाजिक कल्याणकारी कार्य आयोजित करके उसी लोक-कल्याणकारी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
उत्तर भारत और महाराष्ट्र के उत्सवों की प्रकृति में क्या भिन्नता है? सांस्कृतिक दृष्टि से यह प्रश्न प्रायः उठता है कि उत्तर भारत में गणेश चतुर्थी उस पैमाने पर क्यों नहीं मनाई जाती, जिस प्रकार महाराष्ट्र और कर्नाटक में देखी जाती है। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में रामनवमी, जन्माष्टमी, और विशेषकर होली तथा दिवाली को कहीं अधिक व्यापक स्तर पर मनाया जाता रहा है। दिवाली और होली केवल धार्मिक तिथियाँ नहीं हैं, बल्कि वे प्रत्यक्ष रूप से कृषि और फसलों के चक्र से जुड़ी हुई हैं, जिसके कारण ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उनका जुड़ाव अत्यंत गहरा है।
दूसरी ओर, ऐतिहासिक रूप से महाराष्ट्र में उस दौर में होली और दिवाली का स्वरूप उत्तरी मैदानों जितना विशाल नहीं था। 1892 में तिलक द्वारा की गई पहल के बाद महाराष्ट्र और गोवा के अंचल में गणेश चतुर्थी को सामूहिक पंडाल संस्कृति के रूप में जो विस्तार मिला, वह उत्तर भारत के पारंपरिक घरेलू उत्सवों से भिन्न था। उत्तर भारत में भगवान गणेश की पूजा अनिवार्य रूप से प्रत्येक शुभ कार्य और दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ की जाती है, किंतु 10 दिनों तक बप्पा की प्रतिमा घर लाकर बिठाने और सार्वजनिक पंडाल सजाने का चलन ऐतिहासिक रूप से मुख्य रूप से दक्कन और पश्चिमी भारत तक ही केंद्रित रहा।
महाराष्ट्र, गोवा और दिल्ली में किस तरह सजते हैं बप्पा के दरबार? महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की भव्यता देखते ही बनती है। मुंबई में 'गणपति बप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया' के गगनभेदी जयकारों के बीच पूरा शहर जीवंत हो उठता है। यहाँ के प्रसिद्ध पंडालों में लालबागचा राजा, खेतवाड़ी गणराज, गणेश गल्ली मुंबईचा राजा और अंधेरीचा राजा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जहाँ दर्शन के लिए मीलों लंबी कतारें लगती हैं। सांस्कृतिक राजधानी पुणे में यह पर्व अत्यंत प्रामाणिक और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। पुणे के पंडालों में शास्त्रीय कला, लोकनृत्य और मोदक व लड्डुओं का विशेष भोग लगाया जाता है।
पड़ोसी राज्य गोवा में भी इस पर्व की अनुपम छटा देखने को मिलती है। यहाँ लोग अपने घरों की गहन सफ़ाई करते हैं और सगे-संबंधियों के यहाँ मिलने जाते हैं। गोवा के मार्सेल और मपुसा ऐसे प्रमुख स्थल हैं, जहाँ प्राचीन मंदिरों की उपस्थिति के कारण गणेश चतुर्थी का आयोजन अत्यंत वैभवशाली होता है।
देश की राजधानी दिल्ली का स्वरूप अपनी विविधता के लिए जाना जाता है। दिल्ली के पंडालों में एक ओर जहाँ विभिन्न राज्यों की परंपराओं का संगम दिखाई देता है और भगवान गणेश की विशालकाय प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं, वहीं दूसरी ओर मंदिरों में आचार्यों और पुरोहितों द्वारा वेद और उपनिषदों की ऋचाओं का सस्वर पाठ वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।
दक्षिण भारत और हैदराबाद में कैसे मनाया जाता है यह पावन पर्व? दक्षिण भारत के राज्यों में गणेश चतुर्थी का उल्लास एक विशिष्ट धार्मिक क्रम के साथ प्रकट होता है। तमिलनाडु और कर्नाटक में गणेश चतुर्थी से ठीक एक दिन पहले गौरी हब्बा (या गोवरी हब्बा) मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता है कि पुत्र के आगमन से पूर्व माता का स्वागत किया जाता है; अतः पहले दिन भगवान गणेश की माता, देवी गौरी की विधिवत प्रतिष्ठा और आराधना होती है, और उसके अगले दिन भगवान गणेश का स्वागत किया जाता है। कर्नाटक में इस अवसर पर गोज्जू, मोदकम और पायसम जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाकर अर्पित किए जाते हैं।
तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में गणेशोत्सव का उत्साह अत्यंत भव्य रूप में सामने आता है। यहाँ 10 दिनों तक निरंतर चलने वाले आयोजनों में श्रद्धालु भारी संख्या में एकत्र होते हैं। पूजन के दौरान भगवान को उंद्राल्लू, कुडुमुलु और चावल की खीर (राइस पॉरिज) का विशेष नैवेद्य चढ़ाया जाता है। हैदराबाद का खैराताबाद मंडल अपनी विशाल प्रतिमाओं के लिए देशभर में विख्यात है। यहाँ 60 फीट तक ऊँची गणेश प्रतिमा स्थापित की जाती है और भगवान के बाएँ हाथ में लगभग 5,600 किलोग्राम वजनी महालड्डू का भोग रखा जाता है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुँचते हैं।
सात समंदर पार पेरिस की सड़कों पर कैसे गूंजते हैं गणपति के जयकारे? भगवान गणेश की आराधना की गूँज भारत की भौगोलिक सीमाओं को पार कर यूरोप तक जा पहुँची है। फ़्रांस की राजधानी पेरिस (Paris) के 18वें एरोन्डिसमेंट (18th arrondissement) में प्रतिवर्ष गणेश महोत्सव का भव्य आयोजन किया जाता है। यह पूरा आयोजन ला चैपल (La Chapelle) क्षेत्र में स्थित श्री मणिका विनायकरालयम (Sri Manicka Vinayakar Alayam) मंदिर द्वारा संपन्न कराया जाता है।
रविवार, 30 अगस्त को आयोजित होने वाले इस वार्षिक उत्सव में हिंदू समुदाय के हज़ारों श्रद्धालु और स्थानीय नागरिक सम्मिलित होते हैं। मंदिर में पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों और अभिषेक के उपरांत भगवान गणेश की भव्य प्रतिमा को एक सुसज्जित रथ पर विराजमान किया जाता है। इस रथ को श्रद्धालु रस्सियों के सहारे खींचते हुए पेरिस की प्रमुख सड़कों से निकालते हैं। इस शोभायात्रा में गायक और वादक भजन-कीर्तन प्रस्तुत करते हुए चलते हैं, जो एक कार्निवल (carnival) जैसा उल्लासमय दृश्य प्रस्तुत करता है। यात्रा के मार्ग में उपस्थित जनसमूह के बीच प्रसाद, पारंपरिक मिठाइयाँ और शीतल पेय वितरित किए जाते हैं, जो भारतीय संस्कृति के वैश्विक विस्तार और सौहार्द का जीवंत प्रमाण है।
विसर्जन का आध्यात्मिक और पर्यावरणीय संदेश क्या है? गणेश चतुर्थी के 10वें दिन अनंत चतुर्दशी पर प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। मुंबई में अरब सागर के तटों पर और अन्य शहरों में विभिन्न जलाशयों में जब बप्पा को विदाई दी जाती है, तो वह दृश्य अत्यंत भावुक होता है। विसर्जन का वास्तविक दार्शनिक अर्थ यह है कि भौतिक आकार नश्वर और अस्थायी हैं। जिस प्रकार मिट्टी से बनी प्रतिमा जल में विलीन होकर पुनः प्रकृति का अंग बन जाती है, उसी प्रकार समस्त सांसारिक रूप अंततः विराट ईश्वरीय सत्ता में समाहित हो जाते हैं।
वर्तमान समय में जलस्रोतों के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक चिकनी मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बनी मूर्तियों के उपयोग पर विशेष बल दिया जा रहा है। विसर्जन की यह रस्म हमें सिखाती है कि जीवन में परिवर्तन को सहजता से स्वीकार करना चाहिए और विदाई के क्षणों में भी आगामी वर्ष में बप्पा के पुनः आगमन की मंगलकामना और कृतज्ञता का भाव बनाए रखना चाहिए।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2635jfn4
2. https://tinyurl.com/2ayg93jh
3. https://tinyurl.com/28yfl2ws
4. https://tinyurl.com/2a4257ye
बैक्टीरिया, प्रोटोज़ोआ, क्रोमिस्टा और शैवाल
07-09-2026 09:59 AM • Lucknow-Hindi
क्रूज शिप पर फैला रहस्यमयी हंता वायरस क्या भारत के लिए भी है खतरा?
हाल ही में एमवी होंडियस (MV Hondius) नामक एक क्रूज शिप (cruise ship) पर एक जानलेवा संक्रमण फैलने से पूरी दुनिया के स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ गई हैं। यह क्रूज शिप अर्जेंटीना से केप वर्डे की यात्रा पर था, जहां कई यात्रियों में गंभीर श्वसन संबंधी बीमारियां देखी गईं। जांच में यह बात सामने आई कि यह संक्रमण हंता वायरस के एंडीज स्ट्रेन (Andes strain) के कारण फैला है। इस वायरस की चपेट में आने से एक डच महिला की मृत्यु हो गई, जबकि ब्रिटिश और स्विस यात्री गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हुए। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2025 में ऑस्कर विजेता अभिनेता जीन हैकमैन (Gene Hackman) की पत्नी बेट्सी अराकावा (Betsy Arakawa) का निधन भी इसी वायरस से जुड़ी सांस की बीमारी के कारण हुआ था, जिसके बाद उनके घर के आस-पास चूहों के घोंसले पाए गए थे। इस खतरनाक वायरस ने वैश्विक स्तर पर यह बहस छेड़ दी है कि क्या चूहों से फैलने वाली यह बीमारी एक नई महामारी का रूप ले सकती है।
हंता वायरस क्या है और यह कैसे फैलता है? हंता वायरस कोई एक अकेला वायरस नहीं है, बल्कि यह वायरसों का एक पूरा समूह है जो मुख्य रूप से चूहों और कृंतकों द्वारा फैलता है। इस वायरस का नाम दक्षिण कोरिया की एक नदी के नाम पर रखा गया है। यह वायरस बुन्याविरालेस ऑर्डर (Order Bunyavirales) के हंताविरिडे फेमिली (Family Hantaviridae) से संबंधित है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जो चूहे इस वायरस को अपने शरीर में लेकर घूमते हैं, वे खुद कभी बीमार नहीं पड़ते। यह वायरस चूहों के मल, मूत्र और लार में मौजूद होता है।
जब चूहे किसी बंद जगह पर मल-मूत्र करते हैं और वह सूख जाता है, तो सफाई करते समय या हवा के झोंके से उसके कण हवा में मिल जाते हैं। जब इंसान इस दूषित हवा में सांस लेता है, तो यह वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसे एरोसोलाइज्ड ट्रांसमिशन (aerosolized transmission) कहा जाता है। इसके अलावा, चूहों द्वारा खाए गए या जूठे किए गए भोजन का सेवन करने, वायरस से दूषित सतहों को छूने के बाद उन्हीं हाथों से अपनी आंख, नाक या मुंह को छूने, या संक्रमित चूहे के काटने और खरोंचने से भी यह संक्रमण इंसानों में फैल सकता है।
क्रूज शिप पर यह आउटब्रेक कैसे हुआ और एंडीज स्ट्रेन क्यों है खतरनाक? एमवी होंडियस क्रूज शिप का मामला चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यह शिप एक अप्रैल 2026 को अर्जेंटीना के उशुआइया से निकला था और पहला मामला छह अप्रैल को सामने आया। चूंकि इस वायरस का इन्क्यूबेशन पीरियड (incubation period) आमतौर पर लंबा होता है, इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि पहले यात्री को यह संक्रमण क्रूज पर चढ़ने से पहले ही अर्जेंटीना में बर्ड-वाचिंग (पक्षियों को देखने) की किसी गतिविधि के दौरान चूहों के संपर्क में आने से हुआ होगा।
चिंता का असली कारण एंडीज स्ट्रेन है। आमतौर पर हंता वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में नहीं फैलता है। लेकिन दक्षिण अमेरिका (विशेषकर अर्जेंटीना और चिली) में पाया जाने वाला एंडीज स्ट्रेन इसका एकमात्र अपवाद है। जब कोई व्यक्ति इस स्ट्रेन से संक्रमित होता है, तो बहुत करीबी और लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले परिवार के सदस्यों या देखभाल करने वालों में यह वायरस फैल सकता है। क्रूज शिप पर दूसरा मामला पहले मरीज के बेहद करीबी संपर्क वाले व्यक्ति का ही था, जो इस बात का प्रबल संकेत देता है कि यह वायरस इंसान से इंसान में फैला है। इससे पहले 2018 में भी अर्जेंटीना में एक पार्टी के दौरान एक ही संक्रमित व्यक्ति से 34 लोग संक्रमित हुए थे, जिनमें से 11 की मौत हो गई थी।
हंता वायरस से संक्रमित होने पर शरीर में क्या लक्षण दिखाई देते हैं? वायरस के संपर्क में आने और बीमारी के लक्षण दिखने के बीच का समय (इन्क्यूबेशन पीरियड) एक से आठ सप्ताह तक का हो सकता है। यह वायरस दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दो तरह की गंभीर बीमारियां पैदा करता है।
उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में यह हंता वायरस पल्मोनरी सिंड्रोम (Hantavirus Pulmonary Syndrome - एचपीएस) का कारण बनता है। शुरुआती दौर में मरीज को तेज बुखार, सिरदर्द, थकान, ठंड लगना और शरीर की बड़ी मांसपेशियों (जैसे जांघ, कूल्हे और पीठ) में तेज दर्द होता है। कुछ लोगों को पेट दर्द, मतली, उल्टी और डायरिया की शिकायत भी होती है।
चार से दस दिन बीत जाने के बाद, यह बीमारी अपने दूसरे और अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश करती है। वायरस फेफड़ों की छोटी रक्त वाहिकाओं (केपिलरीज - capillaries) पर हमला करता है, जिससे उनमें रिसाव होने लगता है और फेफड़ों में पानी भर जाता है। इसके कारण मरीज को भयानक खांसी आती है, सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई होती है और शरीर में ऑक्सीजन की कमी से उसकी जान जा सकती है। एचपीएस बेहद घातक है और इसमें मृत्यु दर 30 से 50 प्रतिशत तक होती है।
वहीं दूसरी ओर, यूरोप और एशिया में यह वायरस हेमोरेजिक फीवर विद रीनल सिंड्रोम (hemorrhagic fever with renal syndrome - एचएफआरएस) का कारण बनता है। इसमें बुखार, धुंधली दिखाई देना और पीठ दर्द के साथ-साथ गंभीर मामलों में लो ब्लड प्रेशर, आंतरिक रक्तस्राव और एक्यूट किडनी फेलियर (acute kidney failure) की समस्या उत्पन्न हो जाती है। एचएफआरएस में मृत्यु दर आमतौर पर 1 से 15 प्रतिशत के बीच होती है।
जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय बदलाव कैसे बढ़ा रहे हैं इसका खतरा? शोधकर्ताओं का मानना है कि हंता वायरस जैसे जूनोटिक रोगों (जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियां) के बढ़ने के पीछे जलवायु परिवर्तन और बेतरतीब शहरीकरण एक बहुत बड़ा कारण है। जैसे-जैसे जंगलों की कटाई हो रही है और इंसान कृषि और रिहायशी मकसदों के लिए वन्यजीवों के आवास में अतिक्रमण कर रहा है, इंसानों और चूहों के बीच का संपर्क तेजी से बढ़ रहा है।
तापमान में वृद्धि और अनियमित बारिश के कारण चूहों के खाने की उपलब्धता में बदलाव आता है। जब भोजन प्रचुर मात्रा में होता है, तो चूहों की आबादी में विस्फोट होता है। आबादी बढ़ने पर ये चूहे भोजन और आश्रय की तलाश में इंसानों के घरों, खलिहानों और भंडारण स्थलों में घुस जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे महाद्वीप में जहां अब तक हंता वायरस का कोई मानव मामला दर्ज नहीं किया गया है, वहां भी कुछ चूहों में इसके एंटीबॉडी पाए गए हैं। यह इस बात का संकेत है कि वायरस पर्यावरण में खामोशी से मौजूद है और परिस्थितियां अनुकूल होने पर कभी भी प्रकोप फैला सकता है।
क्या भारत को भी हंता वायरस से सतर्क रहने की आवश्यकता है? यद्यपि वर्तमान में हंता वायरस का केंद्र दक्षिण अमेरिका और यूरोप रहा है, लेकिन भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए यह एक मूक खतरा बन सकता है। भारत में मानसून के दौरान बाढ़, जलभराव और सीवेज ओवरफ्लो के कारण चूहों का आतंक बढ़ जाता है। मुंबई, दिल्ली और कोलकाता जैसे महानगरों में पुरानी इमारतों, रेलवे नेटवर्क और घनी बस्तियों के कारण इंसानों और चूहों का संपर्क बहुत अधिक है।
भारत में हंता वायरस को लेकर सबसे बड़ी चुनौती इसके लक्षणों का अन्य बीमारियों से मेल खाना है। इसके शुरुआती लक्षण बिल्कुल डेंगू, मलेरिया, लेप्टोस्पायरोसिस (leptospirosis), इन्फ्लूएंजा (influenza) और वायरल बुखार जैसे होते हैं। इस कारण अधिकांश डॉक्टर प्रारंभिक जांच में हंता वायरस पर संदेह ही नहीं करते। अतीत में दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में हंता वायरस के एंटीबॉडी और संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (Indian Council of Medical Research - आईसीएमआर) ने कोविड-19 के बाद अपनी निगरानी प्रणाली को मजबूत किया है, लेकिन ग्रामीण और छोटे शहरों के अस्पतालों में अभी भी इस दुर्लभ बीमारी की सटीक जांच (आरटी-पीसीआर (RT-PCR)और आईजीएम एंटीबॉडी टेस्ट (IgM Antibody Test)) के लिए बुनियादी ढांचे का अभाव है। यदि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में मौजूद चूहों में इस वायरस का प्रसार होता है, तो खराब स्वच्छता और घनी आबादी के कारण यह तेजी से फैल सकता है।
इस जानलेवा वायरस से बचाव और रोकथाम के क्या उपाय हैं? चूंकि हंता वायरस मुख्य रूप से चूहों से फैलता है, इसलिए उनसे बचाव ही इस बीमारी की सबसे अच्छी रोकथाम है। स्वास्थ्य एजेंसियों द्वारा कुछ सख्त दिशानिर्देश जारी किए गए हैं।
अगर घर, गैराज या गोदाम में चूहों का मल-मूत्र दिखाई दे, तो उसे कभी भी सूखी झाड़ू या वैक्यूम क्लीनर से साफ न करें। ऐसा करने से वायरस हवा में उड़ने लगता है। सफाई से पहले चूहों के मल पर ब्लीच और पानी का घोल (या कोई मजबूत कीटाणुनाशक) छिड़कें और उसे पांच मिनट तक भीगने दें। इसके बाद पेपर टॉवल से पोंछकर उसे कचरे में फेंक दें। सफाई करते समय हमेशा रेस्पिरेटर मास्क और रबर या प्लास्टिक के दस्ताने पहनें। सफाई के बाद हाथों को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोना अनिवार्य है।
घरों में चूहों के प्रवेश को रोकने के लिए दीवारों और दरवाजों के सभी छेदों (एक चौथाई इंच तक के) को स्टील वूल, जाली या सीमेंट से बंद करें। घर के बर्तन तुरंत धोएं और खाने-पीने की चीजों व पालतू जानवरों के भोजन को एयर-टाइट डिब्बों में बंद करके रखें। जिन केबिनों, स्टोरेज शेड या कमरों का लंबे समय से उपयोग नहीं हुआ है, वहां जाने से पहले दरवाजे और खिड़कियां खोलकर आधे घंटे तक ताजी हवा आने दें।
इसके अलावा, गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों (5 वर्ष से कम) और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को पालतू चूहों (पेट रैट्स) से दूर रहना चाहिए। चूहों को पालने वालों को लगातार पिंजरे की सफाई और जानवरों के परीक्षण का ध्यान रखना चाहिए।
क्या हंता वायरस का कोई सटीक इलाज या वैक्सीन उपलब्ध है? वर्तमान में हंता वायरस संक्रमण के लिए पूरी दुनिया में कोई भी प्रमाणित विशिष्ट एंटीवायरल उपचार या व्यापक रूप से उपलब्ध वैक्सीन नहीं है। इस बीमारी का इलाज मुख्य रूप से लक्षणों के आधार पर (सपोर्टिव केयर) किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति को चूहे वाले वातावरण में रहने के बाद तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ होती है, तो उसे तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए।
अस्पताल में मरीजों को ऑक्सीजन थेरेपी दी जाती है। गंभीर एचपीएस मामलों में मरीजों को इंट्यूबेशन (intubation) या वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ सकती है। वहीं, एचएफआरएस के मरीजों में किडनी फेल होने की स्थिति में डायलिसिस का सहारा लिया जाता है, ताकि शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकाला जा सके और तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखा जा सके। सही समय पर आईसीयू (सघन चिकित्सा कक्ष) में भर्ती होने से मरीज की जान बचने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है।
रोमन साम्राज्य में एनीड व भारतवर्ष में रामायण महाकाव्य में युवा पीढ़ी के लिएं प्रेरणा
लखनऊ, आज हम विश्व प्रसिद्ध काव्य ‘एनीड (Aeneid)’ एवं हमारी भारतभूमि पर रचित ‘रामायण’ काव्य के बारे में जानेंगे। शीर्ष लैटिन (Latin) कवियों में से एक माने जाने वाले वर्जिल (Virgil) ने, अपने जीवन के अंतिम दस वर्षों (29 ईसा पूर्व-19 ईसा पूर्व) में ‘एनीड’ की रचना की थी। यह उनकी सर्वोत्कृष्ट कृति थी। हालाँकि दुर्भाग्यवश, इस काव्य के संपादन के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई। अपनी कृति अधूरी रह जाने से, वे इतने व्यथित थे कि उन्होंने अपनी मृत्यु के बाद इस काव्य को जला देने की इच्छा व्यक्त की थी। किंतु एनीड की अधूरी स्थिति में भी इसके एक ऐसे प्रशंसक थे, जिन्होंने इसके प्रारूपों को पहले ही देख रखा था। अतः उन्होंने अपने मित्र की अंतिम इच्छा को दरकिनार करते हुए, कुछ मामूली संशोधनों के साथ इसे प्रकाशित करवाया।
एनीड, युवाओं के लिए अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि इसमें ट्रोजन राजवंश (Trojan royal family) के एक राजकुमार ऐनियस (Aeneas) की इटली-यात्रा का वर्णन है, जहाँ उसके लिए एक नए वंश व राज्य की भविष्यवाणी की गई है। ‘इलियाड (Iliad)’ काव्य के अनुसार, ट्रॉय (Troy) राज्य के विनाश के बाद सुरक्षित बचे कुछ सैनिकों व नागरिकों के साथ बच निकलता है। वहाँ, वह एक ऐसे स्वाभिमानी और साहसी वंश की नींव रखेगा, जिसकी कीर्ति संपूर्ण विश्व में फैलेगी। यह प्रसंग स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि ऐनियस एक युवा था, जो भविष्य में रोमन साम्राज्य (Roman Empire) की नींव रखने वाली भावी पीढ़ी का सही मार्गदर्शन और पालन-पोषण करेगा।
युवाओं के लिए इसकी प्रासंगिकता का दूसरा कारण यह है कि इस महाकाव्य के अधिकांश पात्र युवा हैं। उदाहरण के लिए, जब ऐनियस की मां - देवी वीनस (Venus) उसे शहर के इतिहास से परिचित कराती हैं, तो वह उसे देवी जूनो (Juno) की कृपा प्राप्त करने हेतु उनके मंदिर जाने के लिए प्रेरित करती हैं। ऐनियस की समुद्री जहाज़ी यात्रा के दौरान, अफ्रीका के तट पर यह प्रसंग हुआ था। तत्पश्चात्, ऐनियस नगर में प्रवेश करता है और जूनो के मंदिर में कार्थेज की रानी (Queen of Carthage) - डिडो (Dido) की कृपादृष्टि प्राप्त करता है। यह घटना बताती है कि एक युवा होने के नाते, ऐनियस को अपनी यात्रा के दौरान पग-पग पर अपनी मां के मार्गदर्शन पर निर्भर रहना पड़ा, क्योंकि वह उस स्थान से पूर्णतः अनभिज्ञ था।
ऐनियस के वंशज भविष्य में इस नगर पर पुनः विजय प्राप्त न कर सकें, इस आशंका से चिंतित होकर, वीनस अपने पुत्र की सुरक्षा हेतु एक योजना बनाती हैं। वह ऐनियस के सौतेले भाई - क्यूपिड (Cupid) को असकैनियस (Ascanius) का छद्म रूप देकर भेजती हैं। क्यूपिड, डिडो को उपहार भेंट करता है। तब, डिडो के मन में वात्सल्य-भाव जागृत होता है और वह ऐनियस के प्रेम में बंध जाती है। अपने दिवंगत पति के प्रति वफादार होने के बावजूद, वह ऐनियस के प्रति अत्यंत आसक्त हो जाती है। इस संदर्भ में, यह रचना ऐनियस और उसकी पीढ़ी के भविष्य तथा उसकी सफलता को लेकर चिंतित मां के प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करती है। वीनस द्वारा रचा गया यह संपूर्ण ताना-बाना, यह दर्शाता है कि भविष्य युवा पीढ़ी पर ही निर्भर करता है और उनका मार्गदर्शन करना अत्यंत आवश्यक है।
इसके विपरीत, हमारे भारतवर्ष की पौराणिक कहानी - रामायण, उस कालखंड के समाज का चित्रण करती है, जहाँ विशाल साम्राज्य हैं; एक भावी राजा के रूप में राजकुमार का प्रशिक्षण किया जा रहा है; माता और सौतेली माताओं के मध्य द्वंद्व है; भाइयों में पारस्परिक प्रेम व निष्ठा है; और राजकुमारी के स्वयंवर की प्रतियोगिताएं हैं। रामायण, मुख्य रूप से वयस्क पीढ़ी के उत्तरदायित्वों पर केंद्रित है, क्योंकि इसमें नेतृत्व, पारिवारिक अंतर्द्वंद्व और प्रेम के गंभीर पक्षों का विवेचन है। ये गुण युवाओं की तुलना में प्रौढ़ एवं वयस्क व्यक्तियों में अधिक दृष्टिगोचर होते हैं।
इसके अतिरिक्त, रामायण, एक नैतिक पुरुष और जननायक के आदर्श आचरण का निरूपण करता है, फिर चाहे वह संयमपूर्वक परिस्थितियों का सामना करना हो, दायित्वों को निष्ठा से निभाना हो, व्यक्तिगत दुःखों और सीमाओं से परे रहकर स्वशासित रहना हो, या समाज में प्रेम और सम्मान का भाव जगाना हो। दूसरी तरफ, माता सीता यह अनुभव करती हैं कि धरती पर उनका समय समाप्त हो चुका है, एवं वे धरती माता की गोद में समा जाती हैं। तत्पश्चात्, भगवान राम-सीता के दोनों पुत्र - लव और कुश, अपने पिता के साथ तब तक अयोध्या में रहते हैं, जब तक कि वे राज्य के उत्तराधिकारी नहीं बन जाते। यह हमें सीख देता है कि एक शासक को अपने जीवनकाल के बाद पुत्रों को योग्य बनाकर राज्य सौंपना चाहिए। पुत्रों ने भी अपने पिता से नेतृत्व कला के समस्त गुण सीखे, ताकि वे उस दायित्व को सफलतापूर्वक संभाल सकें।
एक अलग विषय में, पैगंबर मुहम्मद की जीवनी, जिसे ‘सीरा’ के नाम से जाना जाता है, सर्वप्रथम आठवीं शताब्दी के विद्वान इब्न इसहाक द्वारा संकलित की गई थी। बाद में, इब्न हिशाम द्वारा इसे पुनः संपादित व परिमार्जित किया गया। वास्तव में, यह ग्रंथ पैगंबर साहब के जीवन की घटनाओं को कालक्रमानुसार प्रस्तुत करने के लिए मौखिक परंपराओं, वृत्तांतों और संदर्भ-योग्य कविताओं का एक चुनिंदा संकलन है। मौखिक विवरणों का यह संक्षिप्त रूप, पैगंबर साहब के जीवन और उपदेशों पर केंद्रित कई अन्य रचनाओं का मूल आधार भी बनता है। इनमें से कुछ ‘हदीस’ के नाम से प्रख्यात भविष्यवाणी परंपराओं के संग्रह हैं, जो इस्लामी कानून के स्रोतों में से एक हैं। इब्न इसहाक की यह कृति, उस व्यापक विद्वतापूर्ण एवं ऐतिहासिक साहित्य का अभिन्न अंग है, जो कुरान के साथ मिलकर इस्लामी आस्था (अकीदा) की नींव रखता है। यह आज भी संपूर्ण मुस्लिम जगत के लिए अत्यंत महत्त्व रखता है।
हाल ही में, एक अरब इतिहासकार तारिफ अल-खालिदी ने रेखांकित किया है कि ‘अपने इसी मौलिक स्वरूप के कारण, 'सीरा' और 'हदीस' के विद्वानों द्वारा प्रस्तुत इतिहास का यह दृष्टिकोण, मिखाइल बख्तिन की शब्दावली में एक 'महाकाव्यात्मक चरित्र' धारण करता है’। यद्यपि खालिदी ने इस विचार को आगे विस्तृत नहीं किया, किंतु सीरा उन लक्षणों को दर्शाती है, जिन्हें अन्य विश्व-परंपराओं में महाकाव्य का दर्जा प्राप्त है।
तुलनात्मक रूप में, 'एनीड' महाकाव्य, संभवतः पहली बार दो परस्पर विरोधी आदर्शों - मानवतावाद और साम्राज्यवाद को एक साथ अभिव्यक्ति देता है। इन्हें लंबे समय से यूरोपीय चेतना का आधार माना जाता रहा है। मानवतावाद, वर्जिल के मित्र और शत्रु दोनों के प्रति गहरी मानवीय संवेदना तथा दया व नम्रता के भाव में दिखाई देता है। इसी कारण, उन्हें ईसाई धर्म का पूर्वगामी भी माना गया। इसके विपरीत, साम्राज्यवाद 'एनीड' में वर्णित रोम की न्यायप्रिय सत्ता की अवधारणा में झलकता है, जिसे बाद के यूरोपीय और अमेरिकी साम्राज्यवादी विचारों का वैचारिक आधार माना जा सकता है।
दूसरी तरफ, सीरा के साथ तुलना के लिए महर्षि वाल्मीकि रचित संस्कृत ‘रामायण’ चुना गया है। इसके केंद्र में धर्म एवं धार्मिकता की एक भिन्न अवधारणा है। रामायण की “प्रकृति और मनुष्य के बीच पूर्ण सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व” को पुनर्स्थापित करने वाले एकीकरण बल की अवधारणा ने भारतीय संस्कृति पर अमिट छाप छोड़ी है। इसकी यह शाश्वत प्रासंगिकता 'एनीड' और 'सीरा' के समतुल्य है। यह बात तब और भी स्पष्ट हो जाती है, जब हम रामायण से प्रेरित होकर लिखे गए उत्तरवर्ती पुनर्कथनों को देखते हैं। इसका उदाहरण, मध्यकालीन हिंदी में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' है, जिसे महात्मा गांधी संपूर्ण भक्ति-साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचना मानते थे। यहां ध्यान देने योग्य एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि ऋषि कंबन द्वारा रचित तमिल रामायण का उपयोग, 17वीं शताब्दी के कवि उमारू पुलावर ने "पैगंबर मुहम्मद की तमिल जीवनी" के लिए एक साहित्यिक मॉडल के रूप में किया था। यह इन दोनों आख्यानों के आपसी संबंध का एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है।
दूसरी तरफ, 'एनीड' की कथा, महाभारत की तुलना में भी काफी सरल और सीधी है। ऐनियस की कथा में, उसके लिए इटली में एक नई मातृभूमि और रोमनों के पूर्वज के रूप में स्थापित होने के बारे में है। पांडवों की भांति, ऐनियस भी एक दैवीय संतान है। उसकी मां प्रेम की देवी वीनस हैं, और ओलम्पियन देवी-देवता इस महाकाव्य की घटनाओं में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इनमें से अधिकांश परिस्थितियां प्रतिशोधी देवी जूनो द्वारा उत्पन्न की जाती हैं, जो ट्रोजन शरणार्थियों से घृणा करती है। वर्जिल, इस वृत्तांत का उपयोग रोम की स्थापना की पौराणिक कथा को विस्तार देने और ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वियों की शत्रुता का पौराणिक कारण स्पष्ट करने के लिए करते हैं। साथ ही, सीज़र वंश (Caesar dynasty) की राजनीतिक सत्ता को वैधता और पौराणिक आधार प्रदान करने के लिए भी वे इसका उपयोग करते हैं।
इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि रामायण व एनीड दोनों काव्यों में ऐसी महिलाएं हैं, जो नायक को उसके महान लक्ष्य से भटकाती हैं; इनमें देवताओं की कृपा और कोप की लीलाएं हैं; और अन्य साम्राज्यों की रहस्यमयी यात्राएं हैं। ये कुछ ऐसे तत्त्व हैं, जो इन महाकाव्यों की समानता को सिद्ध करते हैं।
हमारे लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब: यहाँ धर्म की सीमाओं से परे कैसे बँधती है प्यार भरी राखी?
लखनऊ, चलिए आज रक्षाबंधन के अवसर पर इस त्योहार के बारे में जानते हैं। संस्कृत शब्द ‘रक्षा बंधन’ का अर्थ, ‘सुरक्षा का एक पावन बंधन’ है। यह आधुनिक त्योहार हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन, आमतौर पर अगस्त के महीने में मनाया जाता है। कई अन्य भारतीय त्योहारों की तरह, रक्षाबंधन की जड़ें भी प्राचीन पौराणिक कथाओं में मिलती हैं, और प्रत्येक कथा इसके अर्थ में एक नई परत जोड़ती है।
रक्षाबंधन को लेकर, श्रीकृष्ण एवं द्रौपदी की कहानी शायद महाभारत की सबसे प्यारी और लोकप्रिय कहानी है। जब युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण की उंगली कट गई, तो द्रौपदी ने बिना एक पल गँवाए अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर, उनकी उंगली पर बाँध दिया। इस भाव से द्रवित होकर कृष्ण ने हमेशा के लिए उनकी रक्षा करने का संकल्प लिया। देखभाल और पारस्परिकता का यह सरल कार्य, आगे चलकर रक्षाबंधन का एक दिव्य रूप बन गया, जिसका जैविक भाई-बहन के रिश्ते से परे प्रेम, निश्छलता और सम्मान से गहरा नाता है।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, मृत्यु के देवता यम एक वर्ष से अधिक समय से अपनी बहन यमुना से मिलने नहीं जा पाए थे। जब वे अंततः उनसे मिलने गए, तो यमुना ने उनकी कलाई पर राखी बाँधी और स्वादिष्ट मिठाइयों से उनका स्वागत किया। इस आत्मीयता से प्रसन्न होकर, यम ने उन्हें अमरता का वरदान दिया और हर वर्ष मिलने आने का संकल्प लिया। इससे रक्षाबंधन पर बहनों से मिलने और इस दिन को केवल राखी बाँधने तक सीमित न रखकर स्नेह का उत्सव बनाने की परंपरा को बढ़ावा मिला।
दूसरी ओर, भविष्य पुराण के अनुसार, देवताओं के राजा इंद्र की पत्नी शची ने युद्ध में जाने से पहले उनकी विजय और सुरक्षा के लिए उनकी कलाई पर एक पवित्र धागा बाँधा था। उस समय इसे ‘राखी’ नहीं कहा जाता था, लेकिन इसके पीछे की भावना अपने प्रिय व्यक्ति को अपनी शुभकामनाओं की ताकत और सुरक्षा का आशीर्वाद देना थी।
रक्षाबंधन केवल पौराणिक कथाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने भारतीय इतिहास में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 16वीं शताब्दी में, जब चित्तौड़गढ़ पर गंभीर खतरा मंडरा रहा था, तब मेवाड़ की साहसी रानी कर्णवती ने अपनी रक्षा की गुहार लगाते हुए मुगल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजी थी। उनके इस निश्छलता भरे भाव से प्रभावित होकर हुमायूँ अपनी सेना के साथ मदद के लिए दौड़ पड़े, भले ही इसके परिणामस्वरूप उन्हें अपने राजनीतिक सहयोगियों के खिलाफ ही क्यों न जाना पड़ा। यह इस बात का एक शक्तिशाली प्रमाण है कि राखी, कैसे धर्म, क्षेत्र और यहाँ तक कि राजनीतिक सीमाओं को भी पार कर सकती है।
यद्यपि रक्षाबंधन से जुड़ी कई लोककथाएँ और दंतकथाएँ प्रचलित हैं, किंतु भविष्य पुराण में उल्लिखित कथा सबसे अधिक प्रामाणिक मानी जाती है। भविष्य पुराण की इस कथा का उल्लेख ‘व्रतराज’ में भी मिलता है। युगों पहले, देवताओं और राक्षसों के बीच एक भीषण युद्ध हुआ था, जो पूरे बारह वर्षों तक चला। अंततः देवता युद्ध हार गए और राक्षसों ने इंद्र के स्वर्गलोक के साथ-साथ तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। तब देवराज इंद्र ने, देवताओं के गुरु बृहस्पति से परामर्श किया। गुरु बृहस्पति ने उन्हें रक्षा विधान का सुझाव दिया और इसके विशेष मंत्र बताए। श्रावण पूर्णिमा के दिन गुरु बृहस्पति ने रक्षा विधान का अनुष्ठान संपन्न किया। इस अनुष्ठान के दौरान रक्षा पोटली को पवित्र मंत्रों से अभिमंत्रित किया गया था। पूजा के पश्चात इंद्र की पत्नी शची ने इंद्र के दाहिने हाथ पर वह रक्षा पोटली बाँध दी। उस रक्षा पोटली की असीम शक्ति के कारण ही इंद्र राक्षसों को पराजित करने और अपना खोया हुआ राज्य वापस पाने में सक्षम हुए। तभी से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन का अनुष्ठान करने की परंपरा चली आ रही है।
आज, हालांकि इस त्योहार ने आधुनिक रूप लिया है। क्या आप जानते हैं कि हमारे शहर लखनऊ की प्रसिद्ध ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करते हुए, शहर के निवासियों ने रक्षाबंधन के पावन पर्व पर सभी सांस्कृतिक और धार्मिक बाधाओं को पार कर आपसी प्रेम का संदेश दिया है। 32 वर्षीय सुमुल सानिया पिछले दो दशकों से अपने पड़ोसी विनय प्रकाश मौर्य को राखी बाँधती आ रही हैं। उनकी माताएँ घनिष्ठ दोस्त थीं और वे इस बात पर विशेष जोर देती थीं कि उनके बच्चों के मन में हमेशा प्रेम और भाईचारे की भावना बनी रहे।
इसी प्रकार, शहर के एक अन्य निवासी अब्दुल सबूर की पत्नी को अपनी एक सहकर्मी में, एक ऐसी बहन मिल गई है, जो पिछले छह वर्षों से लगातार उन्हें राखी बाँधती आ रही है। इसके अलावा, 24 वर्षीय आशीष सिंह की मुलाकात एक संवाद कार्यक्रम के दौरान इरम नाज से हुई थी। वे तब से नाज को अपनी बहन मानते हैं। नाज ने भी इस त्योहार से जुड़ी सभी परंपराओं की पूरी जानकारी हासिल की है ताकि वे इसे पूरी पारंपरिक निष्ठा के साथ मना सकें।
दूसरी ओर, 47 वर्षीय सनोबर, अपनी शादी के बाद से ही अपने पति के दोस्त गौरव सरीन को राखी बांधती आ रही हैं। उनका कोई सगा भाई नहीं है, लेकिन जब भी उन्हें मदद की ज़रूरत होती है, सरीन हमेशा उनके साथ खड़े रहते हैं। जबकि उनके पति मोहम्मद हैदर ने, लखीमपुर खीरी के बौधिया कलां गांव के निवासियों के साथ वर्चुअल (ऑनलाइन) राखी मनाई है। हैदर ने कुछ दशक पहले इस गांव को गोद लिया था और इस गांव के कुछ लोगों के साथ उनके प्यारे संबंध हैं।
रक्षाबंधन के त्योहार की शुरुआत होने से एक महीने पहले ही, बाज़ार रंग-बिरंगी राखियों से गुलज़ार हो जाते हैं। लोग अपने भाइयों और बहनों के लिए फैंसी राखियाँ, प्यार भरे संदेश वाले कार्ड और सार्थक उपहार चुनते हैं। जैसे ही उस दिन सुबह के अनुष्ठान शुरू होते हैं, बहनें आरती करने और अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाने में आगे रहती हैं। इसके बाद, वे अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, जो उसकी समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और समग्र कल्याण के लिए की गई प्रार्थनाओं का एक प्रतीक है। इसके बदले में, भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं और हर परिस्थिति में उनके रक्षक बने रहने का वादा करते हैं। यह दिन हँसी, खुशी और स्नेह के एक सामंजस्यपूर्ण माहौल के साथ आगे बढ़ता है।
भारत में कोई भी उत्सव विशेष व्यंजनों का आनंद लिए बिना पूरा नहीं होता है और रक्षाबंधन इसका कोई अपवाद नहीं है! पारंपरिक मिठाइयां इस आनंदमय अवसर का मुख्य आकर्षण हैं। नारियल और मोतीचूर के स्वादिष्ट लड्डुओं से लेकर खीर, पायसम, घेवर और हलवे की तिकड़ी जैसे प्रत्येक व्यंजन, न केवल हमारी जिव्हा को तृप्त करते हैं, बल्कि भाइयों और बहनों के बीच साझा प्रिय बंधन की अंतर्निहित मिठास का भी प्रतीक है।
लखनऊ की संगीत परंपरा में पियानो है शास्त्रीय, फिल्म और समकालीन संगीत की विधाओं में प्रयोग
लखनऊ भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहाँ स्थित भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय ने भारतीय संगीत के साथ-साथ पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के अध्ययन को भी प्रोत्साहन दिया है, जिससे दोनों संगीत परंपराओं के बीच संवाद को नई दिशा मिली। पश्चिमी संगीत के सबसे प्रभावशाली वाद्यों में पियानो का विशेष स्थान है। अपनी मधुर ध्वनि, विस्तृत स्वर-सीमा और एक साथ धुन तथा संगति प्रस्तुत करने की क्षमता के कारण यह शास्त्रीय, जैज़, फिल्म और समकालीन संगीत की अनेक विधाओं में व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है।
पियानो में प्रत्येक कुंजी (key) एक छोटे हथौड़े को सक्रिय करती है, जो भीतर लगी तार पर प्रहार करके ध्वनि उत्पन्न करता है। कलाकार अपनी उँगलियों के स्पर्श, गति और लय के माध्यम से कोमल, गंभीर या ऊर्जावान भावों को सहजता से व्यक्त कर सकता है। यही कारण है कि पियानो को दुनिया के सबसे बहुआयामी वाद्यों में गिना जाता है और यह एकल प्रस्तुति से लेकर ऑर्केस्ट्रा तथा आधुनिक संगीत तक हर शैली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
पियानो की विविध अभिव्यक्तियों को समझने के लिए कुछ उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ देखी जा सकती हैं। विश्वविख्यात पियानोवादक लैंग लैंग (Lang Lang) की प्रस्तुति इस वाद्य की तकनीकी दक्षता और भावपूर्ण अभिव्यक्ति का सुंदर उदाहरण है। वहीं प्रसिद्ध जैज़ पियानोवादक हरबी हैनकॉक (Herbie Hancock) यह दिखाते हैं कि पियानो किस प्रकार तात्कालिक रचनात्मकता और लय के साथ नए संगीत का सृजन कर सकता है। भारतीय संदर्भ में ए. आर. रहमान ने पियानो और पश्चिमी संगीत संरचनाओं को भारतीय धुनों के साथ जोड़कर ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत की हैं, जिन्हें विश्वभर में सराहा गया है।
आज पियानो केवल पश्चिमी शास्त्रीय संगीत का वाद्य नहीं रह गया है, बल्कि यह दुनिया भर के संगीतकारों की रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बन चुका है। भारत में भी अनेक कलाकारों और संगीतकारों ने इसे अपनी शैली के अनुरूप अपनाया है। यदि आप पियानो की मधुरता, तकनीकी क्षमता और भावनात्मक गहराई का अनुभव करना चाहते हैं, तो ये प्रस्तुतियाँ इस वाद्य की वैश्विक लोकप्रियता और इसकी संगीत यात्रा का उत्कृष्ट परिचय देती हैं।
क्या आप हिंदू गणित को बचाने में लखनऊ विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक योगदान को जानते हैं?
महान भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि शुद्ध गणित अपने आप में तार्किक विचारों की कविता है। गणित केवल संख्याओं और गणनाओं का विषय नहीं है, बल्कि यह वह भाषा है जिससे ब्रह्मांड को समझा जा सकता है। इसका इतिहास उन प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ा है, जिन्होंने व्यापार, खगोल विज्ञान और दैनिक जीवन की समस्याओं को सुलझाने के लिए सबसे पहले संख्याओं का प्रयोग किया था। समय के साथ, इस विषय ने दर्शन, तर्कशास्त्र और विज्ञान की नींव रखी।
प्राचीन सभ्यताओं में गणित की शुरुआत कैसे हुई? गणित का इतिहास हज़ारों साल पुराना है। आधुनिक युग से बहुत पहले, लगभग 3000 ईसा पूर्व में, सुमेर, अक्कद, असीरिया और प्राचीन मिस्र जैसी मेसोपोटामियाई (Mesopotamian) सभ्यताओं ने कराधान, वाणिज्य, व्यापार और खगोलीय रिकॉर्ड रखने के लिए अंकगणित, बीजगणित और ज्यामिति का उपयोग करना शुरू कर दिया था। मेसोपोटामिया और मिस्र से प्राप्त सबसे पुराने ज्ञात गणितीय ग्रंथों में बेबीलोनियन 'प्लिम्पटन 322' (Babylonian ‘Plimpton 322’), मिस्र का 'राइंड मैथमेटिकल पेपिरस' (The Rhind Mathematical Papyrus) और 'मास्को मैथमेटिकल पेपिरस' (The Moscow Mathematical Papyrus) शामिल हैं। इन ग्रंथों में पाइथागोरस ट्रिपल्स (Pythagorean Triples) का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि बुनियादी अंकगणित के बाद पाइथागोरस प्रमेय गणित के सबसे पुराने विकासों में से एक था।
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में, प्राचीन यूनानियों ने गणित को एक दार्शनिक और प्रदर्शनकारी अनुशासन के रूप में खड़ा किया। पाइथागोरस ने ज्यामिति की नींव रखी। लगभग 300 ईसा पूर्व में यूक्लिड ने 'एलिमेंट्स' नामक ग्रंथ का संकलन किया, जो दो हज़ार से अधिक वर्षों तक गणित का मानक पाठ्यपुस्तक बना रहा। यूक्लिड को ज्यामिति का पिता भी कहा जाता है। इसी तरह आर्किमिडीज़ (Archimedes) ने भौतिकी और इंटीग्रल कैलकुलस (Integral Calculus) में महान योगदान दिया।
वेदों और प्राचीन भारत में गणित का विकास कैसे हुआ? भारत में गणित की जड़ें 1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व तक फैले वैदिक काल और उससे भी पहले सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2600 ईसा पूर्व) तक जाती हैं। सिंधु घाटी के लोग व्यापार और निर्माण के लिए बुनियादी संख्याओं और आकारों का उपयोग करते थे। भारत के प्राचीन ज्ञान के स्रोत वेदों में गणितीय सिद्धांतों की गहरी समझ मिलती है। ऋग्वेद में खरबों तक की बड़ी संख्याओं की अवधारणा मौजूद है। यजुर्वेद में ज्यामितीय आकारों, वृत्त की परिधि, वर्ग के विकर्ण और यहां तक कि पाई के मान का भी संदर्भ मिलता है। अथर्ववेद में जोड़, घटाव, गुणा और भाग जैसी गणितीय संक्रियाओं के तरीके शामिल हैं, जिनका उपयोग वैदिक अनुष्ठानों में किया जाता था। शुल्ब सूत्र, जो वेदों के परिशिष्ट हैं, अनुष्ठानों के लिए वेदियों के निर्माण हेतु सटीक ज्यामितीय माप प्रदान करते हैं।
भारतीय गणितज्ञों ने दुनिया को क्या सिखाया? आधुनिक गणितीय प्रणाली, जिसका हम आज उपयोग करते हैं, उसकी उत्पत्ति प्राचीन भारत में हुई थी। 5वीं शताब्दी में महान भारतीय गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने 'शून्य' की क्रांतिकारी अवधारणा पेश की। अपनी प्रसिद्ध कृति 'आर्यभटीय' में उन्होंने शून्य के लिए एक प्रतीक पेश किया जिसे उन्होंने 'शून्य' कहा जिसका अर्थ था 'खाली'। शून्य के बिना बड़ी संख्याओं को लिखना और समझना असंभव था। आर्यभट्ट ने खगोल विज्ञान और त्रिकोणमिति में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
7वीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त ने गणित में बड़ा बदलाव किया। उन्होंने अपने ग्रंथ 'ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त' में शून्य और ऋणात्मक संख्याओं सहित अंकगणितीय संक्रियाओं के नियम दिए और द्विघात समीकरणों को हल करना सिखाया। मध्ययुगीन काल में, 14वीं से 16वीं शताब्दी के बीच, केरल स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी ने त्रिकोणमिति, बीजगणित और कैलकुलस में उल्लेखनीय प्रगति की। उन्होंने अनंत श्रृंखलाओं के लिए अग्रणी योगदान दिया जिसने आधुनिक कैलकुलस के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आधुनिक युग में, श्रीनिवास रामानुजन जैसे गणितज्ञों ने दुनिया को हैरान कर दिया। रामानुजन ने संख्या सिद्धांत और अनंत श्रृंखलाओं में ऐसे सूत्र दिए जो आज भी दुनिया भर के गणितज्ञों के लिए शोध का विषय हैं। शकुंतला देवी, जिन्हें 'ह्यूमन कंप्यूटर' के नाम से जाना जाता है, ने अपनी अद्भुत मानसिक गणना क्षमताओं से अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की।
वैश्विक स्तर पर आधुनिक गणित ने कैसे आकार लिया? 8वीं से 14वीं शताब्दी के इस्लामी स्वर्ण युग के दौरान, अल-ख्वाज़िमी और इब्न अल-हयथम जैसे गणितज्ञों ने उत्कृष्ट योगदान दिया। अल-ख्वाज़िमी को बीजगणित का पिता माना जाता है। यूरोप में पुनर्जागरण काल के दौरान लियोनार्डो पिसानो (Leonardo Pisano), जिन्हें फाइबोनैचि (Fibonacci) के नाम से जाना जाता है, ने यूरोप में हिंदू-अरबी अंक प्रणाली की शुरुआत की, जिसने गणनाओं में क्रांति ला दी। इसी दौर में जोहान्स केप्लर (Johannes Kepler) ने ग्रहीय गति के नियम दिए। कला के लिए मशहूर लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci) ने भी ज्यामिति और अनुपात पर काम किया।
17वीं शताब्दी में आइजैक न्यूटन और गॉटफ्रीड विल्हेम लाइबनिज़ (Gottfried Wilhelm Leibniz) ने स्वतंत्र रूप से कैलकुलस का विकास किया। न्यूटन के गति और सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण के नियमों ने शास्त्रीय यांत्रिकी को नया रूप दिया। 18वीं और 19वीं शताब्दी में लियोनहार्ड यूलर (Leonhard Euler) और कार्ल फ्रेडरिक गॉस (Carl Friedrich Gauss) जैसे दूरदर्शी गणितज्ञ सामने आए। गॉस ने संख्या सिद्धांत और सांख्यिकी में बड़ा योगदान दिया। 19वीं और 20वीं सदी में जॉर्ज कैंटर (Georg Cantor) ने सेट थ्योरी पेश की, अल्बर्ट आइंस्टीन ने सापेक्षता का सिद्धांत दिया, मैरी कार्टराइट (Mary Cartwright) ने नॉन-लीनियर डिफरेंशियल समीकरणों पर काम किया और एंड्रयू विल्स (Andrew Wiles) ने फर्मा की अंतिम प्रमेय को सिद्ध किया।
'प्रिंसिपिया मैथेमेटिका' ने गणितीय तर्कशास्त्र को कैसे बदला? गणित और तर्कशास्त्र के दर्शन में 'प्रिंसिपिया मैथेमेटिका' (Principia Mathematica) एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्मारकीय ग्रंथ है। इसे ब्रिटिश दार्शनिकों बर्ट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) और अल्फ्रेड नॉर्थ व्हाइटहेड (Alfred North Whitehead) द्वारा लिखा गया था और 1910 से 1913 के बीच तीन खंडों में प्रकाशित किया गया। इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य गणित की तार्किक नींव को उजागर करना था। इसे 'लॉजिज़्म' (Logism) कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि गणित को पूरी तरह से शुद्ध तर्क के आधार पर सिद्ध किया जा सकता है।
रसेल ने अपनी पिछली पुस्तक 'द प्रिंसिपल्स ऑफ मैथमेटिक्स' (The Principles of Mathematics) में तर्क दिया था कि संपूर्ण गणित को कुछ सरल स्वयंसिद्धों से प्राप्त किया जा सकता है, जो संख्या जैसी गणितीय धारणाओं के बजाय विशुद्ध रूप से तार्किक धारणाओं तक सीमित हों। बाद में रसेल को पता चला कि जर्मन गणितज्ञ गॉटलोब फ्रेगे (Gottlob Frege) ने अपनी पुस्तक 'द फाउंडेशंस ऑफ अरिथमेटिक' (The Foundations of Arithmetic) में उनसे पहले ही ऐसी कई खोजें कर ली थीं।
वर्ष 1901 में रसेल ने तर्क प्रणाली के केंद्र में एक विरोधाभास की खोज की, जिसे अब ‘रसेल्स पैराडॉक्स’ (Russell's Paradox) के रूप में जाना जाता है। यह विरोधाभास तब उत्पन्न होता है जब हम उन सभी वर्गों का एक वर्ग बनाते हैं जो स्वयं के सदस्य नहीं हैं। यदि हम पूछें कि क्या यह वर्ग स्वयं का सदस्य है, तो एक विरोधाभास पैदा होता है। यदि यह है, तो यह नहीं है, और यदि यह नहीं है, तो यह है। यह वैसा ही है जैसे किसी गांव के नाई को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जाए जो उन सभी की दाढ़ी बनाता है जो खुद अपनी दाढ़ी नहीं बनाते। अब सवाल यह है कि क्या नाई खुद अपनी दाढ़ी बनाता है?
इस विरोधाभास को दूर करने के लिए, रसेल ने 'थ्योरी ऑफ टाइप्स' (Theory of Types) की अवधारणा पेश की। इसमें रसेल और व्हाइटहेड ने 'एक्सिओम ऑफ रिड्यूसिबिलिटी' (Axiom of Reducibility) और 'एक्सिओम ऑफ इन्फिनिटी' (Axiom of Infinity) जैसे विशेष स्वयंसिद्धों को शामिल किया। यद्यपि यह सिद्धांत बहुत जटिल था, लेकिन इसने गणितीय तर्कशास्त्र और गणित के दर्शन के विकास पर अत्यधिक प्रभाव डाला। दर्शनशास्त्र में इस पुस्तक का सबसे बड़ा प्रभाव रसेल की 'थ्योरी ऑफ डिस्क्रिप्शंस' (Theory of Descriptions) के माध्यम से पड़ा, जिसने सामान्य भाषा की व्याकरणिक संरचनाओं और तार्किक रूपों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। ऑस्ट्रियाई गणितज्ञ कर्ट गोडेल (Kurt Gödel) का अपूर्णता प्रमेय भी इसी ग्रंथ के अध्ययन का परिणाम था।
हिंदू गणित के संरक्षण में लखनऊ विश्वविद्यालय की क्या भूमिका है? गणित के क्षेत्र में विशेष रूप से 'हिंदू गणित' के संवर्धन में लखनऊ विश्वविद्यालय के गणित और खगोल विज्ञान विभाग का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। यह विभाग 1921 में तब अस्तित्व में आया जब तत्कालीन कैनिंग कॉलेज (Canning College) को नवगठित लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा अपने अधिकार में लिया गया था। शुरुआती दौर में प्रोफ़ेसर जे.ए. स्ट्रैंग (J. A. Strang) के नेतृत्व में विभाग ने अपने पाठ्यक्रमों को मजबूत किया।
लगभग एक दशक बाद, विभाग के अगले प्रमुख प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह ने अपने गहन पाण्डित्य और योजना के साथ 1939 में 'हिंदू गणित' पर शोध के लिए एक विशेष अनुभाग शुरू किया। यह उत्तरी भारत में अपनी तरह का एकमात्र केंद्र था, जिसे बाद में 1950 में 'भारत गणित परिषद' का नाम दिया गया। प्रोफ़ेसर सिंह का मानना था कि प्राचीन हिंदू गणितज्ञों की उपलब्धियों को दुनिया के सामने लाने के लिए अज्ञात पांडुलिपियों पर व्यापक शोध आवश्यक है। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर बी.बी. दत्ता के साथ मिलकर 1935 में 'हिस्ट्री ऑफ हिंदू मैथमेटिक्स' नामक दो खंडों वाली पुस्तक लिखी, जिसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली और आज भी इसे एक प्रामाणिक स्रोत पुस्तक माना जाता है।
लखनऊ विश्वविद्यालय
वर्ष 1939 में, उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंदू गणित और खगोल विज्ञान से संबंधित पुराने ग्रंथों को एकत्र करने, संपादित करने, अनुवाद करने और उनकी व्याख्या करने के उद्देश्य से प्रोफ़ेसर सिंह के अधीन एक शोध योजना को मंजूरी दी। भारत भर से, राजस्थान, बंगाल, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, नेपाल और यहां तक कि लंदन के इंडिया ऑफिस से दुर्लभ पांडुलिपियां खोजी गईं। प्रोफ़ेसर सिंह ने स्वयं 58 पांडुलिपियों की प्रतियां प्राप्त कीं। 1947 में उन्होंने लघु भास्करीय और पाटीगणित के अंग्रेजी अनुवाद के साथ व्याख्यात्मक संस्करण प्रकाशित किए।
विभाग ने बुनियादी ढांचे में भी ऐतिहासिक विकास किया। 1949 में खगोल विज्ञान के शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए भारत के पहले प्लैनेटेरियम (Planetarium) का निर्माण इसी विभाग में पूरा किया गया था। 1950 में प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह ने विज्ञान संकाय के डीन के रूप में विभाग के वर्तमान भवन का निर्माण कराया। 1954 में प्रोफ़ेसर राम वल्लभ ने विभागाध्यक्ष का पदभार संभाला और 1956 में सांख्यिकी अनुभाग के लिए एक नया ब्लॉक बनवाया। आज विभाग की कंप्यूटर लैब का नाम प्रोफ़ेसर राम वल्लभ के नाम पर और विशाल पुस्तकालय का नाम प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह के नाम पर है।
प्रोफ़ेसर ए.एन. सिंह के निधन के बाद, उनके सच्चे उत्तराधिकारी प्रोफ़ेसर के.एस. शुक्ला ने उनके अधूरे काम को आगे बढ़ाया और मार्कंडेय मिश्रा जैसे विद्वानों की मदद से सूर्य सिद्धांत, महा भास्करीय और कर्ण-रत्न जैसी पांडुलिपियों को अंग्रेजी अनुवाद और टिप्पणियों के साथ प्रकाशित किया। विभाग ने प्रोफ़ेसर आर.पी. अग्रवाल, प्रोफ़ेसर एम.डी. उपाध्याय और कई अन्य महान शिक्षाविदों के नेतृत्व में निरंतर प्रगति की है। आज भी यह विभाग प्राचीन भारतीय गणितीय विरासत को सहेजने और आधुनिक गणित के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित करने का कार्य पूरी निष्ठा के साथ कर रहा है।
कैसे बेगम हज़रत महल ने हिंदू-मुस्लिम एकता से 1857 में अंग्रेजों को दी थी मात?
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास कई शूरवीरों और वीरांगनाओं के अदम्य साहस से भरा पड़ा है। जब भी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का ज़िक्र होता है, तो उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और अवध की शान, बेगम हज़रत महल का नाम बड़े ही गर्व और सम्मान के साथ लिया जाता है। जिस समय ब्रिटिश हुकूमत पूरे भारत को अपने अधीन करने का क्रूर खेल खेल रही थी, उस समय लखनऊ की इस वीरांगना ने न केवल अंग्रेजों की सत्ता को खुली चुनौती दी, बल्कि महीनों तक उन्हें लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर दिया।
बेगम हज़रत महल का प्रारंभिक जीवन और अवध के दरबार तक का सफर कैसा था? बेगम हज़रत महल का जन्म वर्ष 1820 के आसपास अवध राज्य की तत्कालीन राजधानी फैज़ाबाद में हुआ था। बचपन में उनका नाम मोहम्मदी खानम था। जीवन के शुरुआती दिन बेहद संघर्षपूर्ण रहे, जब उन्हें उनके माता-पिता द्वारा बेच दिया गया और उन्होंने एक तवायफ के रूप में अपना जीवन शुरू किया। शाही प्रतिनिधियों (agents) द्वारा खरीदे जाने के बाद, उन्होंने शाही हरम में एक 'ख्वासीन' (Khawasin) के रूप में प्रवेश किया और बाद में उन्हें ‘परी’ का दर्जा मिला।
अपनी बुद्धिमत्ता, सौंदर्य और कला के दम पर उन्होंने अवध के अंतिम ताजदार, नवाब वाजिद अली शाह (Wajid Ali Shah) का दिल जीत लिया। नवाब ने उन्हें अपनी शाही उपपत्नी के रूप में स्वीकार किया और वह उनकी छोटी बेगम बन गईं। जब उन्होंने नवाब के बेटे बिरजिस क़द्र (Birjis Qadr) को जन्म दिया, तब उन्हें आधिकारिक तौर पर 'हज़रत महल' की उपाधि से नवाज़ा गया।
अंग्रेजों द्वारा अवध का अधिग्रहण और बेगम का नेतृत्व कैसे शुरू हुआ? ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) की विस्तारवादी नीतियों के चलते, वर्ष 1856 में अंग्रेजों ने कुशासन का झूठा आरोप लगाकर अवध का अधिग्रहण कर लिया। उन्होंने नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता (Calcutta) निर्वासित कर दिया। अंग्रेजों को लगा था कि नवाब के जाने के बाद अवध आसानी से उनके कब्ज़े में आ जाएगा, लेकिन वे बेगम हज़रत महल के साहस से अनजान थे।
बेगम ने कलकत्ता जाने से इनकार कर दिया और अपने बेटे के साथ लखनऊ में ही डटी रहीं। जैसे ही 1857 में मेरठ से बगावत की चिंगारी उठी और स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ, बेगम हज़रत महल ने राजा जयलाल सिंह और राजा हनुमंत सिंह जैसे स्थानीय नेताओं और विद्रोहियों के साथ मिलकर लखनऊ पर नियंत्रण कर लिया। 5 जुलाई 1857 को उन्होंने अपने नाबालिग बेटे, राजकुमार बिरजिस क़द्र को अवध का शासक (वली) घोषित कर दिया और खुद राजमाता (Regent) के रूप में सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली।
अंग्रेजों की धार्मिक नीतियों के खिलाफ बेगम का घोषणापत्र क्या था? बेगम हज़रत महल केवल एक सैन्य नेता नहीं थीं, बल्कि वे एक गहरी राजनीतिक समझ रखने वाली शासिका भी थीं। उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सड़कें बनाने के बहाने अंधाधुंध हिंदू मंदिरों और मुस्लिम मस्जिदों को तोड़ा था। विद्रोह के अंतिम दिनों में जारी किए गए एक ऐतिहासिक घोषणापत्र में, बेगम ने अंग्रेजों द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता देने के दावों का कड़ा मज़ाक उड़ाया था।
उन्होंने लिखा था: "सूअर का मांस खाना और शराब पीना, चर्बी वाले कारतूसों को काटना और मिठाइयों में सूअर की चर्बी मिलाना, सड़कें बनाने के बहाने हिंदू और मुसलमानों के मंदिरों और मस्जिदों को नष्ट करना, चर्च बनाना, ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए पादरियों को सड़कों पर भेजना... इन सबके बावजूद लोग कैसे विश्वास कर सकते हैं कि उनके धर्म में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा?" इस वैचारिक स्पष्टता ने हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के सैनिकों और आम जनता को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट कर दिया।
लखनऊ रेजीडेंसी की घेराबंदी (Siege of Lucknow Residency) के खूनी संघर्ष में क्या हुआ? 1857 के मध्य में, लखनऊ में स्थित ब्रिटिश मुख्यालय, जिसे रेजीडेंसी कहा जाता था, संघर्ष का मुख्य केंद्र बन गया। 30 जून 1857 को बेगम की विद्रोही सेना, जिसकी संख्या 10,000 से अधिक थी, ने सर हेनरी लॉरेंस (Sir Henry Lawrence) के नेतृत्व वाली एक छोटी ब्रिटिश सेना को रेजीडेंसी के भीतर घेर लिया। 4 जुलाई को लॉरेंस एक गोलाबारी में मारा गया।
रेजीडेंसी के भीतर लगभग 3,000 लोग (अंग्रेज अधिकारी, महिलाएं, बच्चे और कुछ वफादार भारतीय सैनिक) फंसे हुए थे। मृत्यु, बीमारी और भूख ने ब्रिटिश खेमे का मनोबल तोड़ दिया था। बेगम हज़रत महल के निर्देश पर विद्रोही सेना लगातार हमले कर रही थी। सितंबर में सर हेनरी हैवलॉक (Sir Henry Havelock) के नेतृत्व में एक ब्रिटिश राहत दल वहां पहुंचा, लेकिन वह भी भारी विद्रोही हमलों के कारण रेजीडेंसी के भीतर ही फंस गया।
महीनों की कड़ी घेराबंदी के बाद, अंततः नवंबर 1857 में सर कॉलिन कैंपबेल (Sir Colin Campbell) के नेतृत्व में एक विशाल ब्रिटिश सेना ने रेजीडेंसी पर हमला किया और घेराबंदी को तोड़ने में सफलता प्राप्त की। भारी रक्तपात और हजारों भारतीय योद्धाओं के बलिदान के बाद अंग्रेजों ने फिर से लखनऊ पर अपना कब्ज़ा जमा लिया।
बेगम का निर्वासन और आज के भारत में उनकी विरासत क्या है? जब अंग्रेजों ने लखनऊ और अवध के अधिकांश हिस्सों पर फिर से कब्ज़ा कर लिया, तो बेगम हज़रत महल को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। नाना साहब और फैज़ाबाद के मौलवी के साथ मिलकर उन्होंने शाहजहांपुर में भी हमले किए, लेकिन अंततः ब्रिटिश सैन्य ताकत के सामने उन्हें भारत छोड़ना पड़ा।
उन्होंने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण करने से साफ इनकार कर दिया और नेपाल में शरण मांगी। शुरुआत में नेपाल के प्रधानमंत्री जंग बहादुर ने उन्हें शरण देने से मना कर दिया, लेकिन बाद में उन्हें वहां रहने की अनुमति मिल गई। 7 अप्रैल 1879 को काठमांडू में उनका निधन हो गया और उन्हें वहीं जामा मस्जिद के पास सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।
आज भी भारत बेगम हज़रत महल के इस बलिदान को नहीं भूला है। 15 अगस्त 1962 को लखनऊ के हज़रतगंज में ओल्ड विक्टोरिया पार्क (Old Victoria Park) का नाम बदलकर उनके सम्मान में 'बेगम हज़रत महल पार्क' रखा गया। 10 मई 1984 को भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। आज बेगम हज़रत महल का नाम केवल अवध के इतिहास में नहीं, बल्कि भारत की आज़ादी की उस अमर गाथा में दर्ज है, जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा देशभक्ति की प्रेरणा देती रहेगी।