Writer:
Stephen Markel, Tushara Bindu Gude, Muzaffar Alam, Los Angeles County Museum of ArtPublisher:
Los Angeles County Museum of ArtTags:Art Objects - Art/Beauty
2.
WAILING BEAUTY : The Perishing Art of Nawabi Lucknow
Writer:
Sir William Henry Sleeman, Peter Denis REEVESPublisher:
Saiyed Anwer AbbasTags:Art Objects - Art/Beauty
कैसे पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर, लखनऊ के घरों को संस्कृति, सौंदर्य और पहचान देता है
लखनऊवासियों के लिए घर केवल चार दीवारों का ढाँचा नहीं, बल्कि तहज़ीब, सलीक़े और सांस्कृतिक विरासत का विस्तार होता है। यहाँ की जीवनशैली में कला, नफ़ासत और संतुलन की झलक हर चीज़ में दिखाई देती है - चाहे वह पहनावा हो, खानपान या फिर घर की सजावट। ऐसे में फ़र्नीचर केवल उपयोग की वस्तु नहीं रहता, बल्कि वह घर के व्यक्तित्व और सोच को भी दर्शाता है। आज लखनऊ के बाज़ारों में पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर और आधुनिक डिज़ाइनों का ऐसा सुंदर संगम देखने को मिलता है, जो अतीत की कारीगरी और वर्तमान की ज़रूरतों - दोनों को साथ लेकर चलता है। भारतीय फ़र्नीचर की यह यात्रा सदियों पुराने सामाजिक बदलावों, विदेशी प्रभावों और स्थानीय शिल्प परंपराओं से होकर आज के स्वरूप तक पहुँची है।आज इस लेख में हम भारतीय फ़र्नीचर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके विकास को समझेंगे। इसके बाद मध्यकालीन भारत में शाही संरक्षण और फ़र्नीचर निर्माण की भूमिका पर चर्चा करेंगे। फिर मुगल काल और यूरोपीय प्रभावों से बनी विविध फ़र्नीचर शैलियों को जानेंगे। आगे भारतीय फ़र्नीचर में प्रयुक्त नक्काशी, जड़ाई और सामग्रियों के महत्व पर बात करेंगे। अंत में, उन पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर वस्तुओं को समझेंगे, जो आज लखनऊ सहित देशभर में फिर से लोकप्रिय हो रही हैं।भारतीय फ़र्नीचर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विकास यात्राप्राचीन भारत में फ़र्नीचर आज की तरह रोज़मर्रा के जीवन का अनिवार्य हिस्सा नहीं था। लोग अधिकतर फ़र्श पर बैठकर जीवन व्यतीत करते थे और साधारण जीवनशैली को महत्व दिया जाता था। फिर भी, वेदिक ग्रंथों और प्राचीन साहित्य में पीढ़ा, खाटा, मुंडा और चौकी जैसी कुछ फ़र्नीचर वस्तुओं का उल्लेख मिलता है। ये वस्तुएँ विशेष अवसरों, धार्मिक कार्यों या विशिष्ट वर्ग तक ही सीमित थीं। धीरे-धीरे समाज की संरचना बदली, निजी स्थानों की अवधारणा विकसित हुई और आराम व सुविधा को अधिक महत्व मिलने लगा। इसी क्रम में फ़र्नीचर की उपयोगिता बढ़ी और वह धीरे-धीरे भारतीय घरों का हिस्सा बनने लगा। यह विकास एकदम अचानक नहीं हुआ, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव और ज़रूरतों के साथ आकार लेता गया।मध्यकालीन भारत में फ़र्नीचर निर्माण और शाही संरक्षणमध्यकालीन भारत में फ़र्नीचर निर्माण को विशेष रूप से शाही संरक्षण प्राप्त हुआ। दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य के दौरान यह कला अपने चरम पर पहुँची। इस समय लकड़ी के कारीगरों को राजपरिवार का संरक्षण और सम्मान प्राप्त था, जिससे उनकी कला में निखार आया। उस दौर का फ़र्नीचर मुख्यतः राजसी उपयोग के लिए बनाया जाता था - जैसे सिंहासन, दरबारी आसन, महलों के दरवाज़े, खंभे और सजावटी संरचनाएँ। इन वस्तुओं में भव्यता, मजबूती और बारीक कारीगरी का अनोखा मेल दिखाई देता है। आम लोगों के घरों में फ़र्नीचर का प्रचलन अभी भी सीमित था, लेकिन यह काल भारतीय फ़र्नीचर कला की तकनीकी और सौंदर्यात्मक नींव को मज़बूत करने वाला साबित हुआ।मुगल काल में भारतीय फ़र्नीचर पर कलात्मक प्रभाव16वीं शताब्दी में मुगलों के आगमन के साथ उत्तर भारत में फ़र्नीचर की शैली में एक नया अध्याय शुरू हुआ। मुगल स्थापत्य और कला की तरह ही फ़र्नीचर में भी भव्यता, संतुलन और अलंकरण पर विशेष ध्यान दिया गया। गहरे रंग की दृढ़ लकड़ियाँ, हड्डी और हाथी दाँत की जड़ाई, शीशों का प्रयोग और जटिल नक्काशी इस दौर की प्रमुख विशेषताएँ रहीं। लेखन मेज़, टेबल, दीवान और आरामदायक आसनों का प्रचलन बढ़ा। लखनऊ जैसे शहर, जहाँ मुगल और बाद में नवाबी संस्कृति का गहरा प्रभाव रहा, वहाँ यह शैली फ़र्नीचर के डिज़ाइनों में आज भी दिखाई देती है। यही कारण है कि लखनऊ के पारंपरिक फ़र्नीचर में शाही ठाठ और नज़ाकत का अहसास बना रहता है।यूरोपीय प्रभाव और इंडो-यूरोपीय फ़र्नीचर शैलियों का विकास1500 के बाद भारत में पुर्तगाली, डच, फ़्रांसीसी और अंततः अंग्रेज़ों का आगमन हुआ। जब ये यूरोपीय समुदाय भारत में बसे, तो उन्हें अपने रहन-सहन के अनुसार फ़र्नीचर की आवश्यकता पड़ी। उन्होंने भारतीय कारीगरों से वही डिज़ाइन तैयार करने को कहा, जिनका उपयोग वे यूरोप में करते थे, लेकिन स्थानीय लकड़ी और कारीगरी के साथ। इससे भारतीय और यूरोपीय शैलियों का अद्भुत संगम देखने को मिला। गोवानीज़ (Goanese), इंडो-डच (Indo-Dutch) और एंग्लो-इंडियन (Anglo-Indian) जैसी फ़र्नीचर शैलियाँ इसी प्रक्रिया से विकसित हुईं। इन शैलियों में यूरोपीय ढाँचा, लेकिन भारतीय नक्काशी और सजावटी तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। यह दौर भारतीय फ़र्नीचर को वैश्विक प्रभावों से जोड़ने वाला साबित हुआ।भारतीय फ़र्नीचर में नक्काशी, जड़ाई और सामग्री का महत्वभारतीय फ़र्नीचर की सबसे बड़ी पहचान उसकी उत्कृष्ट नक्काशी और जड़ाई है। सागौन और आबनूस जैसी मज़बूत लकड़ियों का उपयोग इसे टिकाऊ बनाता है, जबकि हाथी दाँत, हड्डी और धातु की जड़ाई इसे विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करती है। पुष्प आकृतियाँ, ज्यामितीय पैटर्न और धार्मिक प्रतीक फ़र्नीचर को केवल उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि कला का रूप देते हैं। लखनऊ के कई पुराने घरों और हवेलियों में आज भी ऐसी कारीगरी के उदाहरण मिलते हैं, जो बीते समय की शिल्प परंपरा की गवाही देते हैं। यही कारीगरी भारतीय फ़र्नीचर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाती है।पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर जो आज फिर से लोकप्रिय हो रहे हैंआधुनिक जीवनशैली के बावजूद, पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर आज फिर से लोगों की पसंद बन रहा है। बाजोट पूजा और सजावट दोनों के लिए उपयोगी है और छोटे घरों में बहुउद्देशीय फ़र्नीचर की तरह काम करता है। प्राचीन सागौन की अलमारियाँ अब केवल भंडारण नहीं, बल्कि घर की शोभा बढ़ाने वाला तत्व बन गई हैं। रंग-बिरंगे कपड़ों से सजे भारतीय ओटोमन छोटे कमरों में अतिरिक्त बैठने की जगह प्रदान करते हैं। दीवान आज भी भारतीय घरों में आराम, संवाद और परंपरा का प्रतीक बना हुआ है, जबकि लकड़ी की जालियाँ आधुनिक घरों में भी निजता और सौंदर्य का संतुलन बनाए रखती हैं। इस प्रकार, पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर लखनऊ के घरों में न केवल अतीत की यादें संजोता है, बल्कि आधुनिक जीवन को सांस्कृतिक गहराई और विशिष्ट पहचान भी प्रदान करता है।संदर्भ https://tinyurl.com/5xbrztaf https://tinyurl.com/yhyj6bykhttps://tinyurl.com/5cvy7pxu
वास्तुकला I - बाहरी इमारतें
क्यों लखनऊ के किले, इमामबाड़ा और सिकंदर बाग आज भी हमारे इतिहास की धड़कन हैं?
लखनऊवासियों, आपका शहर अपनी नज़ाकत भरी तहज़ीब, शायरी और स्वाद के साथ-साथ अपने भव्य किलों और ऐतिहासिक इमारतों के लिए भी जाना जाता है। नवाबी दौर की यह धरती आज भी उन दीवारों, बुर्जों और गलियारों के ज़रिये अपने अतीत की कहानियाँ सुनाती है, जहाँ कभी सत्ता के फैसले लिए गए, युद्ध लड़े गए और कला व संस्कृति ने नया रूप पाया। लखनऊ की स्थापत्य विरासत केवल देखने की चीज़ नहीं है, बल्कि यह शहर की पहचान, आत्मसम्मान और ऐतिहासिक चेतना का हिस्सा है। इन्हीं इमारतों के माध्यम से हम समझ पाते हैं कि लखनऊ कैसे एक साधारण शहर से इतिहास, वीरता और शिल्पकला का जीवंत प्रतीक बना।आज के इस लेख में हम लखनऊ के इतिहास के पाँच दिलचस्प पहलुओं को छोटी-सी, आसान भाषा में समझेंगे। पहले जानेंगे कि लखनऊ के किले क्यों इतने ख़ास हैं और नवाबी-मुगल दौर में उनकी क्या भूमिका थी। फिर देखेंगे कि एक किले की दीवारें, गढ़, बुर्ज और खाइयाँ कैसे उसकी रक्षा की रीढ़ बनती थीं। इसके बाद बड़ा इमामबाड़ा की अनोखी बिना-सहारे वाली वास्तुकला और उसकी रहस्यमयी भूलभुलैया की कहानी पर नज़र डालेंगे। फिर सिकंदर बाग की उस वीरता भरी दास्तान को महसूस करेंगे, जहाँ 1857 के नायकों ने लड़कर इतिहास लिखा। और अंत में समझेंगे कि ये ऐतिहासिक इमारतें आज भी लखनऊ की पहचान, संस्कृति और गर्व को कैसे संभाले हुए हैं।लखनऊ के किलों और ऐतिहासिक स्थापत्य की महत्तालखनऊ के किले और ऐतिहासिक इमारतें सिर्फ ईंट-पत्थरों के ढांचे नहीं हैं - ये शहर की धड़कन, पहचान और स्मृतियाँ हैं। इन किलों में वह अतीत बसता है जिसने लखनऊ की तहज़ीब, राजनीति और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को आकार दिया। नवाबी और मुगल शासनकाल के दौरान इन स्थापनाओं का निर्माण सिर्फ सुरक्षा के उद्देश्य से नहीं हुआ था, बल्कि वे शक्ति, समृद्धि, कलात्मक रुचि और शासन की प्रतिष्ठा के प्रतीक भी थे। बड़ा इमामबाड़ा, सिकंदर बाग, रेज़िडेंसी (residency) और कई अन्य इमारतें आज भी उस दौर की वास्तुकला की कुशलता और सौंदर्यबोध का प्रमाण हैं। हर दीवार, हर मेहराब, हर गलियारा उस समय के युद्धों, सियासी फैसलों, सांस्कृतिक आयोजनों और शिल्पकारों की अद्भुत कला का दर्पण है। इन्हें देखकर आज भी लखनऊवासी अपने इतिहास से गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं।किले की संरचना: रक्षा, रणनीति और वास्तुकला की मूल विशेषताएँमध्यकालीन किले एक गहरी रणनीतिक सूझबूझ और सटीक इंजीनियरिंग के साथ बनाए जाते थे। इनकी ऊँची और मजबूत दीवारें दुश्मनों का सबसे पहला अवरोध होती थीं, जबकि प्राचीर सैनिकों को सुरक्षित चलते हुए युद्ध संचालन करने का रास्ता प्रदान करती थीं। इसी के साथ गढ़, यानी दीवार के बाहर निकला हुआ सुदृढ़ ढांचा, सैनिकों को विभिन्न दिशाओं से हमला करने की शक्ति देता था। किलों के चारों ओर बनी खाइयाँ अक्सर गहरी और चौड़ी होती थीं, ताकि आक्रांताओं के लिए किले की दीवार तक पहुँचना लगभग असंभव हो जाए - कुछ जगहों पर इन्हें और भी भयावह बनाने के लिए मगरमच्छ या अन्य खतरनाक जीव भी छोड़े जाते थे। किलों के भव्य गेट सिर्फ प्रवेश-द्वार नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का माध्यम भी थे। इनके ऊपर अक्सर नक्काशी, धातु की कारीगरी और मज़बूत लकड़ी - लोहा लगा होता था। ऊँचेवॉच टावर दूर तक निगरानी रखने के लिए बनाए जाते थे, जबकि प्राचीर के किनारे बनी पैरापेट (Parapets), मेरलॉन (merlons) और क्रेनेल (crenels) सैनिकों को सुरक्षित खड़े होकर हमला करने की सुविधा देती थीं। बुर्ज किले की दीवारों से बाहर निकले ऊँचे टॉवर थे, जहाँ से तोप और बंदूकें चलाई जाती थीं। इन सभी संरचनाओं का संयोजन एक किले को अभेद्य, शक्तिशाली और कलात्मक बनाता था - और यही विशेषताएँ लखनऊ के ऐतिहासिक स्थलों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।बड़ा इमामबाड़ा: वास्तुकला का चमत्कार और लखनऊ का गौरवबड़ा इमामबाड़ा, जिसे असफ़ी इमामबाड़ा भी कहा जाता है, लखनऊ की ऐतिहासिक और वास्तु विरासत का सबसे शानदार प्रमाण है। 18वीं शताब्दी में नवाब आसफ़-उद-दौला द्वारा बनवाई गई इस इमारत का सबसे अद्भुत पहलू इसका मुख्य हॉल है - जिसमें एक भी पिलर या बीम नहीं है, फिर भी यह दुनिया की सबसे विशाल मेहराबदार संरचनाओं में शुमार है। यह इंजीनियरिंग का ऐसा चमत्कार है जिसकी मिसाल दुनिया में बहुत कम मिलती है। इस इमारत का सबसे रोचक हिस्सा भूलभुलैया है, जिसमें 489 एक जैसे दरवाज़े हैं। तंग गलियारे और मोड़-घुमाव इस तरह बनाए गए हैं कि कोई भी आसानी से दिशा भ्रमित हो सकता है। बताया जाता है कि यह भूलभुलैया सुरक्षा व्यवस्था, प्राकृतिक ठंडक और घुसपैठियों को भ्रमित करने के उद्देश्य से बनाई गई थी। बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण सिर्फ वास्तुकला की दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवता की भावना से भी महान है - 1784 के अकाल के समय इस परियोजना ने हज़ारों लोगों को रोज़गार देकर उनकी आजीविका बचाई थी। इस परिसर का रूमी दरवाज़ा, अपनी तुर्की शैली की नक्काशी और विशाल मेहराब के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध है। धार्मिक दृष्टि से भी यह स्थल अत्यंत महत्व रखता है, जहाँ विशेषकर मुहर्रम के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं। इस प्रकार, बड़ा इमामबाड़ा इतिहास, कला और अध्यात्म का एक अद्वितीय संगम है।सिकंदर बाग: कला, संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीकसिकंदर बाग लखनऊ के इतिहास में एक ऐसी जगह है जहाँ सौंदर्य और बलिदान दोनों एक साथ दर्ज हैं। नवाब वाजिद अली शाह ने इसे अपनी प्रिय पत्नी सिकंदर बेगम के लिए एक सुंदर उद्यान और विश्रामस्थल के रूप में बनवाया था। इसकी वास्तुकला, मस्जिदें और हरियाली उस समय की नवाबी शान को दर्शाती हैं। लेकिन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह शांत उद्यान अचानक एक भीषण युद्धस्थल में बदल गया। ब्रिटिश सेना ने यहाँ हमला किया और लगभग 2,000 भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने अद्भुत साहस दिखाते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया। इस युद्ध में उदा देवी, एक वीर दलित महिला योद्धा, ने अकेले कई अंग्रेज़ सैनिकों को मार गिराया था। उनकी बहादुरी आज भी प्रेरणा देती है। आज का सिकंदर बाग उस संघर्ष, बलिदान और देशभक्ति का जीवंत स्मारक है। इसकी दीवारें सिर्फ ईंटें नहीं, बल्कि उन शहीदों की यादें संभाले हुए हैं जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए।लखनऊ की ऐतिहासिक संरचनाएँ: अतीत की कहानियाँ और सांस्कृतिक पहचानलखनऊ की असंख्य ऐतिहासिक इमारतें - किले, महल, मस्जिदें, उद्यान और तोपखाने - शहर के समृद्ध अतीत की जीवंत गाथाएँ हैं। इनमें युद्धों की रणनीति, नवाबों की जीवनशैली, सांस्कृतिक उत्सवों और शिल्पकला की परंपराएँ छिपी हुई हैं। आज ये इमारतें केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक संरक्षण का माध्यम बन चुकी हैं। वे लखनऊ की पहचान को मजबूत करती हैं और हमें यह याद दिलाती हैं कि यह शहर सिर्फ वर्तमान में नहीं, बल्कि एक ऐसे गौरवशाली इतिहास में भी सांस लेता है जिसे दुनिया सलाम करती है।संदर्भ https://tinyurl.com/25qxtzm8 https://tinyurl.com/2ye6j4dj https://tinyurl.com/57kvwfa4
शहरीकरण - नगर/ऊर्जा
लखनऊ की बदलती ज़िंदगी और बढ़ता ई-वेस्ट:तकनीक की सुविधा और पर्यावरण की चुनौती
लखनऊवासियों, तेज़ी से बदलती तकनीक और बढ़ते डिजिटल उपयोग ने हमारे जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है, लेकिन इसके साथ एक गंभीर समस्या भी सामने आई है - इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट, यानी ई-वेस्ट (e-waste)। पुराने मोबाइल, लैपटॉप, टीवी, बैटरियाँ और घरेलू उपकरण आज हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं और इनके बेकार हो जाने के बाद उनका सही तरीके से निपटान न होना एक बड़ी चिंता बनता जा रहा है। भारत के अन्य शहरों की तरह लखनऊ भी इस बढ़ते ई-वेस्ट संकट से अछूता नहीं है, जिससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम लगातार बढ़ते जा रहे हैं।आज इस लेख में हम भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट की बढ़ती समस्या को समझेंगे। इसके बाद जानेंगे कि ई-वेस्ट के साथ कितनी कीमती धातुएँ नष्ट हो रही हैं। फिर हम उन शहरों पर नज़र डालेंगे जहाँ सबसे ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है। आगे, इसके पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की चर्चा करेंगे। इसके साथ ही, ई-वेस्ट के विभिन्न प्रकारों को समझेंगे और अंत में भारत में इसके पुनर्चक्रण की प्रक्रिया पर विस्तार से बात करेंगे।भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट की बढ़ती समस्याभारत आज दुनिया के सबसे बड़े इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट उत्पादकों में गिना जाने लगा है और हर साल लाखों टन ई-वेस्ट उत्पन्न कर रहा है। बीते कुछ वर्षों में इस कचरे की मात्रा में तेज़ी से वृद्धि दर्ज की गई है, जिसका मुख्य कारण उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का बढ़ता उपयोग और उनके जीवनकाल का लगातार कम होते जाना है। मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप, टीवी और घरेलू उपकरण अब जल्दी पुराने हो जाते हैं, जिससे कचरे की समस्या और गंभीर होती जा रही है। तेज़ी से शहरीकरण कर रहे शहरों में भी यह स्थिति साफ़ दिखाई देती है। यहाँ बढ़ती आबादी, डिजिटल निर्भरता और आधुनिक जीवनशैली के कारण इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खपत लगातार बढ़ रही है, जिससे ई-वेस्ट की मात्रा में भी निरंतर इज़ाफ़ा हो रहा है। अब यह समस्या केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मध्यम आकार के शहरों में भी ई-वेस्ट का प्रभावी प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन चुका है।इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के साथ नष्ट हो रही कीमती धातुएँइलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का सही ढंग से पुनर्चक्रण न होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसके साथ कई बहुमूल्य धातुएँ भी बेकार चली जाती हैं। पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में सोना, चांदी, तांबा, एल्युमिनियम (aluminum) और प्लास्टिक जैसी कीमती सामग्रियाँ मौजूद होती हैं, जिनका दोबारा उपयोग किया जा सकता है। भारत में हर साल ई-वेस्ट के ज़रिये अरबों रुपये मूल्य की ये धातुएँ नष्ट हो जाती हैं, जो सीधे-सीधे आर्थिक क्षति का कारण बनती हैं। इसके अलावा, जब ये धातुएँ पुनः प्राप्त नहीं की जातीं, तो नई धातुओं की आपूर्ति के लिए खनन गतिविधियाँ बढ़ानी पड़ती हैं, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचता है।भारत में सबसे अधिक इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न करने वाले शहरभारत में इलेक्ट्रॉनिक कचरे का सबसे अधिक उत्पादन बड़े शहरी केंद्रों में देखा जाता है। विभिन्न उद्योग संगठनों की रिपोर्टों के अनुसार, मुंबई, दिल्ली और बैंगलोर जैसे शहर ई-वेस्ट उत्पादन में सबसे आगे हैं। इन शहरों में आईटी उद्योग, कॉर्पोरेट कार्यालयों की अधिक संख्या और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स का व्यापक उपयोग इसकी प्रमुख वजह है। हालाँकि, यह समस्या केवल इन महानगरों तक सीमित नहीं रही है। शहरों में भी जैसे-जैसे तकनीक का उपयोग बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ई-वेस्ट की मात्रा भी बढ़ती जा रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि आने वाले समय में छोटे और मध्यम शहरों को भी इस चुनौती के लिए तैयार रहना होगा।इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभावइलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का अनुचित निपटान पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इसमें मौजूद भारी धातुएँ - जैसे सीसा, पारा और कैडमियम (Cadmium) - मिट्टी और जल स्रोतों में मिलकर उन्हें प्रदूषित कर सकती हैं। इससे कृषि भूमि की उर्वरता घटती है और पीने के पानी की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। यदि ई-वेस्ट को जलाया जाए या अनधिकृत तरीकों से नष्ट किया जाए, तो डाइऑक्सिन (Dioxin) और फ्यूरान (Furan) जैसी विषैली गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण को बढ़ाती हैं। इन रसायनों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से तंत्रिका तंत्र, गुर्दे, लीवर और यहाँ तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का ख़तरा भी बढ़ सकता है।इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के विभिन्न प्रकार और उनके स्रोतइलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट केवल मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा कहीं अधिक व्यापक है। इसमें बड़े घरेलू उपकरण - जैसे फ्रिज, वॉशिंग मशीन और ओवन (oven) - के साथ-साथ स्पीकर्स, साउंड सिस्टम (sound system), मेडिकल उपकरण, एलईडी लाइटें (LED lights), बैटरियाँ, वायरिंग, सौर ऊर्जा प्रणालियाँ और यहाँ तक कि बच्चों के इलेक्ट्रॉनिक खिलौने भी शामिल हैं। इन सभी उपकरणों में कई उपयोगी लेकिन खतरनाक सामग्रियाँ मौजूद होती हैं, जिन्हें यदि सामान्य कचरे के साथ फेंक दिया जाए, तो वे पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं। इसलिए इनका अलग से संग्रह और निपटान बेहद आवश्यक है।भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पुनर्चक्रण की प्रक्रियाभारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पुनर्चक्रण की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले, ई-वेस्ट का संग्रह और परिवहन किया जाता है, जिसके तहत इलेक्ट्रॉनिक कचरे को विशेष केंद्रों तक पहुँचाया जाता है। इसके बाद श्रेडिंग (shredding), छंटाई और पृथक्करण की प्रक्रिया से प्लास्टिक, धातु और कांच जैसी सामग्रियों को अलग-अलग किया जाता है। इन सभी चरणों के पूरा होने के बाद प्राप्त कच्चा माल दोबारा उपयोग के लिए तैयार किया जाता है और उसे नई इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं या अन्य उत्पादों के निर्माण में लगाया जा सकता है। इस तरह का संगठित और वैज्ञानिक पुनर्चक्रण न केवल पर्यावरण की रक्षा करता है, बल्कि आर्थिक रूप से भी लाभकारी साबित होता है और संसाधनों के संरक्षण में मदद करता है।संदर्भ https://tinyurl.com/22zk6j4e https://tinyurl.com/2xn3hr8w https://tinyurl.com/3u29w34s https://tinyurl.com/ykkjz2cz
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
आइए याद करें, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का साहसिक नेतृत्व और योगदान
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ!भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक आंदोलनों और पुरुष नेताओं की गाथा नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य महिलाओं के साहस, त्याग और अदम्य संकल्प की कहानी भी है, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए हर प्रकार के सामाजिक और व्यक्तिगत बंधनों को तोड़ा। ऐसे समय में, जब महिलाओं की भूमिका प्रायः घरेलू दायरे तक सीमित मानी जाती थी, उन्होंने आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर नेतृत्व किया, जेल यात्राएँ कीं, अत्याचार सहे और कई बार अपने प्राणों की आहुति तक दे दी। उनका योगदान स्वतंत्र भारत की नींव का वह मजबूत आधार है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। इस व्यापक संघर्ष में 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ, जिसमें अवध और उसकी राजधानी लखनऊ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में महिला नेतृत्व और जनसहभागिता ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।इस लेख में हम सबसे पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं के समग्र योगदान को समझेंगे और यह जानेंगे कि उन्होंने किन-किन रूपों में आंदोलन को मजबूत किया। इसके बाद, हम 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में लखनऊ और अवध की निर्णायक भूमिका पर चर्चा करेंगे, जहाँ संगठित जनप्रतिरोध ने अंग्रेज़ी सत्ता को हिला दिया। आगे, हम बेगम हज़रत महल के नेतृत्व, उनके सैन्य और प्रशासनिक प्रयासों तथा ब्रिटिश सत्ता को दी गई खुली चुनौती को विस्तार से जानेंगे। अंत में, हम रानी लक्ष्मीबाई, सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी और अन्य प्रमुख महिला स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान के माध्यम से यह समझेंगे कि भारतीय लोकतंत्र और गणतंत्र की नींव महिलाओं के संघर्ष और बलिदान से कैसे मजबूत हुई।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का समग्र योगदानभारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल राजनीतिक आंदोलनों, क्रांतियों और पुरुष नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत महिलाओं की कहानी भी है, जिन्होंने सामाजिक बंधनों, पारिवारिक जिम्मेदारियों और औपनिवेशिक दमन के बीच खड़े होकर आज़ादी की मशाल को जलाए रखा। जब देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब महिलाओं ने केवल समर्थनकर्ता की भूमिका नहीं निभाई, बल्कि वे आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़ी रहीं। उन्होंने जेल यात्राएँ कीं, लाठियाँ खाईं, अपने परिवारों को त्यागा और कई बार अपने प्राणों की आहुति भी दी। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के भारत में, जब महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रखने की सामाजिक प्रवृत्ति प्रबल थी, तब उनका स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल होना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी केंद्रों तक, महिलाओं ने सभाओं, जुलूसों, सत्याग्रहों और सशस्त्र आंदोलनों में भाग लिया। उन्होंने धन संग्रह, गुप्त संदेशों के आदान-प्रदान, शरण देने और घायल क्रांतिकारियों की देखभाल जैसे अनेक कार्यों के माध्यम से आंदोलन को मजबूत आधार प्रदान किया।1857 के विद्रोह में लखनऊ और अवध की निर्णायक भूमिका1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास का वह मोड़ था, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव को हिला दिया। इस विद्रोह में अवध और विशेष रूप से लखनऊ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। अवध न केवल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र था, बल्कि राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से भी अंग्रेजों के लिए अत्यंत आकर्षक था। जब अंग्रेजों ने कूटनीतिक चालों के माध्यम से नवाब वाजिद अली शाह को पदच्युत कर अवध पर कब्ज़ा किया, तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि स्थानीय जनता की अस्मिता और स्वाभिमान पर सीधा आघात था। लखनऊ उस समय प्रतिरोध का प्रमुख केंद्र बन गया। यहां सैनिक, ज़मींदार, धार्मिक नेता और आम नागरिक—सब ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला। छावनियों में विद्रोह भड़का, सरकारी प्रतिष्ठानों पर कब्ज़ा किया गया और अंग्रेजी सत्ता को लगभग समाप्त कर दिया गया। यह विद्रोह केवल सैन्य नहीं था, बल्कि यह एक जनांदोलन का रूप ले चुका था, जिसमें महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही।बेगम हज़रत महलबेगम हज़रत महल: 1857 के संग्राम की अग्रणी महिला नेताबेगम हज़रत महल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उन दुर्लभ महिला नेताओं में से थीं, जिन्होंने न केवल विद्रोह में भाग लिया, बल्कि उसका नेतृत्व भी किया। वाजिद अली शाह के निष्कासन के बाद उन्होंने परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का मार्ग चुना। उन्होंने लखनऊ में विद्रोह को संगठित किया और अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी।बेगम हज़रत महल का नेतृत्व केवल भावनात्मक नहीं था, बल्कि अत्यंत व्यावहारिक और रणनीतिक भी था। उन्होंने सैनिकों को संगठित किया, हथियारों और संसाधनों की व्यवस्था की और जनता में देशभक्ति की भावना को प्रबल किया। उनके नेतृत्व में लखनऊ कुछ समय के लिए पूरी तरह अंग्रेजों के नियंत्रण से मुक्त हो गया। यह एक असाधारण उपलब्धि थी, विशेषकर उस समय की सामाजिक परिस्थितियों में, जब महिला नेतृत्व की कल्पना भी दुर्लभ थी।रानी लक्ष्मीबाईब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध और शासन व्यवस्थाबेगम हज़रत महल ने केवल युद्ध ही नहीं लड़ा, बल्कि एक वैकल्पिक स्वदेशी शासन की भी स्थापना की। बेगम हज़रत महल ने 7 जुलाई, 1857 को अपने पुत्र बिरजिस क़द्र को अवध का नवाब घोषित किया और उनके नाम पर शासन चलाया। एक उच्च स्तरीय प्रशासनिक समिति का गठन किया गया, जिसमें विभिन्न वर्गों और समुदायों के प्रतिनिधि शामिल थे। यह शासन व्यवस्था न्याय, स्थानीय सहभागिता और स्वदेशी मूल्यों पर आधारित थी। उन्होंने अंग्रेजों की नीतियों को वैचारिक स्तर पर भी चुनौती दी। महारानी विक्टोरिया की घोषणाओं को अस्वीकार करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि विदेशी शासन किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। हालांकि अंततः अंग्रेजों की आधुनिक सैन्य शक्ति के सामने उन्हें पीछे हटना पड़ा और नेपाल जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। उनके लिए स्वतंत्रता विलासिता से कहीं अधिक मूल्यवान थी।कस्तूरबा गांधीराष्ट्रीय आंदोलन में अन्य प्रमुख महिला स्वतंत्रता सेनानियाँभारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बेगम हज़रत महल अकेली नहीं थीं। देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक महिलाओं ने अपने-अपने स्तर पर संघर्ष किया। रानी लक्ष्मीबाई ने युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त कर साहस की अमर गाथा लिखी। सरोजिनी नायडू ने महिलाओं को राजनीतिक मंच प्रदान किया और राष्ट्रीय आंदोलनों का नेतृत्व किया। कस्तूरबा गांधी ने सत्याग्रह और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई, जबकि कमला नेहरू ने सविनय अवज्ञा और ‘नो टैक्स’ आंदोलनों को दिशा दी। अरुणा आसफ अली ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय ध्वज फहराकर युवाओं को प्रेरित किया। उषा मेहता ने गुप्त रेडियो के माध्यम से आंदोलन की आवाज़ को जन-जन तक पहुँचाया। सावित्रीबाई फुले और कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने शिक्षा और समाज सुधार के जरिए स्वतंत्रता की चेतना को गहराई दी।सरोजिनी नायडूस्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और महिलाओं का ऐतिहासिक महत्वभारतीय स्वतंत्रता संग्राम की विरासत केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना की भी कहानी है। इस विरासत में महिलाओं का योगदान केंद्रीय स्थान रखता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि साहस, नेतृत्व और बलिदान किसी एक लिंग तक सीमित नहीं होते। आज का भारतीय लोकतंत्र, संविधान और गणतंत्र इन्हीं संघर्षों की देन हैं। जब हम स्वतंत्र भारत में अधिकारों और समानता की बात करते हैं, तो उसके मूल में उन महिलाओं का संघर्ष निहित है, जिन्होंने आज़ादी के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया। वास्तव में, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास महिलाओं के बिना अधूरा है और उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।संदर्भ https://rb.gy/0p3r1rhttps://tinyurl.com/5zpfpda3
तितलियाँ और कीट
कॉमन मॉर्मन तितली: भारतीय बाग़ों में उड़ती सुंदरता और प्रकृति की चतुर कारीगरी
कॉमन मॉर्मन बटरफ्लाई (Common Mormon Butterfly), जिसे वैज्ञानिक रूप से पैपिलियो पॉलीटेस (Papilio polytes) कहा जाता है, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाई जाने वाली एक बड़ी और आकर्षक तितली प्रजाति है। भारत में यह तितली आमतौर पर बगीचों, पार्कों और फूलों से भरे खुले क्षेत्रों में आसानी से देखी जा सकती है। यह लैंटाना (Lantana), इक्सोरा (Ixora) और गुड़हल जैसे विभिन्न फूलों के रस पर निर्भर रहती है, जिससे इसका पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसके काले पंखों पर बने सफेद धब्बे इसे बेहद सुंदर और पहचानने योग्य बनाते हैं।कॉमन मॉर्मन तितली के नर और मादा के स्वरूप में स्पष्ट अंतर देखा जाता है। नर तितली के पंख काले होते हैं जिन पर सफेद धब्बे और लंबी पूंछ जैसी संरचना होती है, जबकि मादा तितली के पंख भी काले और सफेद धब्बों वाले होते हैं, लेकिन उसके पिछले पंखों पर लाल रंग के छोटे-छोटे धब्बे भी पाए जाते हैं। यह तितली एक मजबूत उड़ान भरने वाली प्रजाति है और अक्सर ऊँचाई पर उड़ती हुई दिखाई देती है।इस तितली की एक खास विशेषता इसका अद्भुत बचाव व्यवहार है। इसके कैटरपिलर (caterpillar - कमला) का आकार और रंग पक्षियों की बीट जैसा दिखता है, जिससे शिकारी इसे पहचान नहीं पाते और यह सुरक्षित रहता है। यह प्राकृतिक नकल (मिमिक्री - mimicry) इसे शिकारियों से बचाने में मदद करती है। अपनी सुंदरता, अनोखे व्यवहार और व्यापक उपस्थिति के कारण कॉमन मॉर्मन तितली भारतीय जैव विविधता की एक महत्वपूर्ण और रोचक कड़ी मानी जाती है।संदर्भ -https://tinyurl.com/y3644zzt https://tinyurl.com/mrw8n2ac https://tinyurl.com/4z8e6md3 https://tinyurl.com/3x4pexwr
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
लखनऊवासियों, पराक्रम दिवस पर आइए नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन को जानें
लखनऊवासियों, हमारा शहर अपनी तहज़ीब, गहरी सोच और ऐतिहासिक चेतना के लिए जाना जाता है। यहाँ जब भी किसी महान व्यक्तित्व को याद किया जाता है, तो वह केवल औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं होती, बल्कि आत्मचिंतन का एक सजीव अवसर बन जाती है। आज का दिन भी ऐसा ही है। आज हम पराक्रम दिवस मना रहे हैं, जो भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत की स्वतंत्रता केवल विचारों और भाषणों से नहीं मिली, बल्कि साहसिक निर्णयों, अनुशासन और असंख्य बलिदानों से संभव हुई। नेताजी का जीवन इसी पराक्रम का प्रतीक है। उनका संघर्ष, उनकी दृष्टि और उनका नेतृत्व आज भी हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हम अपने कर्तव्यों और देश के प्रति ज़िम्मेदारी को कितनी गंभीरता से निभा रहे हैं।आज हम सबसे पहले यह जानेंगे कि पराक्रम दिवस क्यों मनाया जाता है और इसका वास्तविक महत्व क्या है। इसके बाद हम नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रारंभिक जीवन पर नज़र डालेंगे, जहाँ से उनके विचारों और साहस की नींव पड़ी। फिर हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को समझेंगे और यह जानेंगे कि उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व किस प्रकार किया। अंत में, हम उन मूल्यों और सीखों पर चर्चा करेंगे जो नेताजी ने अपने जीवन से हमें दीं और जो आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।पराक्रम दिवस क्यों मनाया जाता हैपराक्रम दिवस केवल एक महान नेता की जयंती मनाने का दिन नहीं है। यह उस निडर सोच और साहसिक दृष्टिकोण का स्मरण है जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। नेताजी का मानना था कि स्वतंत्रता के लिए केवल प्रतीक्षा करना या याचिकाएँ देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए दृढ़ निश्चय, अनुशासन और संगठित प्रयास आवश्यक हैं। पराक्रम दिवस हमें यह याद दिलाता है कि राष्ट्रहित के लिए व्यक्तिगत सुख, पद और प्रतिष्ठा का त्याग करना ही सच्चा साहस है। यह दिन विशेष रूप से युवाओं को प्रेरित करता है कि वे कठिन परिस्थितियों से घबराएँ नहीं, बल्कि उन्हें बदलने का संकल्प लें।नेताजी सुभाष चंद्र बोस का प्रारंभिक जीवनसुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक में हुआ। बचपन से ही उनमें अनुशासन, आत्मसम्मान और देशप्रेम की भावना स्पष्ट दिखाई देती थी। वे पढ़ाई में अत्यंत मेधावी थे और उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की कठिन परीक्षा भी उत्तीर्ण की। उस समय यह सेवा सम्मान, स्थिरता और शक्ति का प्रतीक मानी जाती थी, लेकिन नेताजी के लिए यह सब देश की आज़ादी से बड़ा नहीं था। ब्रिटिश शासन के अधीन कार्य करना उन्हें स्वीकार नहीं था, इसलिए उन्होंने एक सुरक्षित और उज्ज्वल भविष्य को त्यागकर स्वतंत्रता संग्राम का कठिन मार्ग चुना।यह निर्णय दर्शाता है कि नेताजी केवल विचारों के नेता नहीं थे, बल्कि अपने विचारों को जीवन में उतारने का साहस भी रखते थे। प्रारंभिक जीवन में किए गए त्याग और संघर्ष ने आगे चलकर उनके पूरे नेतृत्व को मज़बूत आधार प्रदान किया।स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी का योगदानभारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी का योगदान विशिष्ट और अलग था। वे मानते थे कि केवल सभाओं, प्रस्तावों और आश्वासनों से आज़ादी प्राप्त नहीं की जा सकती। उनके अनुसार संगठित शक्ति और स्पष्ट रणनीति ही स्वतंत्रता का मार्ग खोल सकती है। इसी सोच ने उन्हें पारंपरिक रास्तों से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।नेताजी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आज़ादी का पक्ष मजबूती से रखा और यह स्पष्ट किया कि भारत की लड़ाई केवल एक उपनिवेश की समस्या नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और न्याय का प्रश्न है। उन्होंने भारतीयों के भीतर यह विश्वास जगाया कि वे स्वयं अपने भविष्य के निर्माता हैं। उनका योगदान केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी था, जिसने देशवासियों को निर्भीक और आत्मविश्वासी बनाया।आज़ाद हिंद फ़ौज और नेताजी का नेतृत्वनेताजी का सबसे प्रभावशाली और निर्णायक योगदान आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व रहा। यह सेना केवल सशस्त्र संघर्ष का माध्यम नहीं थी, बल्कि भारतीयों के भीतर स्वाधीनता और आत्मसम्मान की चेतना जगाने का एक सशक्त प्रयास थी। नेताजी ने इस सेना में अनुशासन, समानता और राष्ट्रप्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया।उनका प्रसिद्ध आह्वान — “तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” — उस समय की जनभावनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति था। इस आह्वान ने यह स्पष्ट कर दिया कि स्वतंत्रता के लिए त्याग अनिवार्य है। आज़ाद हिंद फ़ौज ने यह सिद्ध किया कि भारतीय स्वयं संगठित होकर अपने देश के लिए बलिदान देने को तैयार हैं, और यही भावना स्वतंत्रता संग्राम को नई शक्ति प्रदान करती है।नेताजी से मिलने वाली सीखनेताजी सुभाष चंद्र बोस का जीवन आज भी हमें कई महत्वपूर्ण सीख देता है। उनकी पहली सीख साहस की है, यानी कठिन परिस्थितियों में भी सही और दृढ़ निर्णय लेने की क्षमता। दूसरी सीख अनुशासन से जुड़ी है, क्योंकि बिना अनुशासन के कोई भी आंदोलन या उद्देश्य सफल नहीं हो सकता। तीसरी सीख नेतृत्व की है, जहाँ नेताजी ने यह दिखाया कि सच्चा नेतृत्व आदेश देने से नहीं, बल्कि स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करने से बनता है।सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि राष्ट्रहित को हमेशा व्यक्तिगत हित से ऊपर रखा जाना चाहिए। उनका जीवन यह भी सिखाता है कि जब लक्ष्य स्पष्ट हो और संकल्प अडिग हो, तो सबसे कठिन परिस्थितियाँ भी बदली जा सकती हैं।आज के समय में पराक्रम दिवस का महत्वआज के समय में पराक्रम दिवस हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। यह दिन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम अपनी स्वतंत्रता, अपने अधिकारों और अपने कर्तव्यों को कितनी गंभीरता से लेते हैं। नेताजी के विचार आज भी हमें साहस, ज़िम्मेदारी और कर्मठता की प्रेरणा देते हैं। यह दिवस केवल अतीत का स्मरण नहीं करता, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शन प्रदान करता है।संदर्भ -https://tinyurl.com/ytd2xdwdhttps://tinyurl.com/y4sxus2nhttps://tinyurl.com/52uaead3https://tinyurl.com/5e4nudrr
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
लखनऊ में बसंत पंचमी: ऋतुओं का उत्सव और पीले रंग की सांस्कृतिक कहानी
लखनऊवासियों, जैसे ही माघ माह की पंचमी आती है, शहर की फ़िज़ाओं में एक अलग ही उल्लास घुल जाता है। ठंड की विदाई और हल्की गर्माहट के साथ बसंत पंचमी का आगमन लखनऊ में सिर्फ़ एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और आस्था का सुंदर संगम बन जाता है। इस दिन सरसों के पीले फूल, खिलती फसलें और सुहावना मौसम यह संकेत देते हैं कि बसंत ऋतु ने दस्तक दे दी है। यही वजह है कि लखनऊ में बसंत पंचमी को पूरे श्रद्धा और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया जाता है।आज इस लेख में हम जानेंगे कि बसंत पंचमी का समय और ऋतु परिवर्तन से क्या संबंध है। इसके बाद सरस्वती पूजा के धार्मिक महत्व को समझेंगे। फिर पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं पर चर्चा करेंगे। आगे, भारत और पड़ोसी देशों में मनाए जाने वाले बसंत पंचमी के विविध रूपों को जानेंगे। साथ ही, पीले रंग के महत्व, पारंपरिक व्यंजनों और इस पर्व से जुड़ी सामाजिक परंपराओं को क्रमबद्ध रूप से समझेंगे।बसंत पंचमी का पर्व: समय, ऋतु परिवर्तन और सांस्कृतिक महत्वबसंत पंचमी हर वर्ष माघ माह की पंचमी तिथि को मनाई जाती है और इसे बसंत ऋतु के औपचारिक आगमन का प्रतीक माना जाता है। इस समय मौसम में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देने लगता है—कड़ाके की ठंड धीरे-धीरे विदा लेने लगती है और वातावरण में हल्की गर्माहट के साथ नई ऊर्जा का संचार होता है। लखनऊ जैसे उत्तर भारतीय शहरों में यह बदलाव प्रकृति के रंगों में साफ़ झलकता है, जहाँ खेतों में फसलें लहलहाने लगती हैं, पेड़-पौधों में नई कोपलें फूटने लगती हैं और चारों ओर जीवन का उत्साह महसूस होता है।सांस्कृतिक दृष्टि से बसंत पंचमी केवल एक ऋतु परिवर्तन का पर्व नहीं है, बल्कि यह जीवन में नई शुरुआत, आशा और सकारात्मकता का प्रतीक भी माना जाता है। यही कारण है कि इस दिन को होली जैसे बड़े पर्व की तैयारियों की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है, जिससे यह त्योहार भारतीय सांस्कृतिक कैलेंडर में विशेष स्थान रखता है।सरस्वती पूजा और बसंत पंचमी का धार्मिक महत्वबसंत पंचमी को सरस्वती पूजा के रूप में मनाने की परंपरा भारत में व्यापक रूप से प्रचलित है। देवी सरस्वती को ज्ञान, संगीत, कला और बुद्धि की देवी माना जाता है, इसलिए यह दिन विशेष रूप से शिक्षा और रचनात्मकता से जुड़ा हुआ है। लखनऊ में इस अवसर पर विद्यालयों, कॉलेजों, पुस्तकालयों और घरों में सरस्वती पूजा का आयोजन किया जाता है, जहाँ विद्यार्थी और शिक्षक देवी से विद्या, विवेक और सफलता का आशीर्वाद माँगते हैं।यह मान्यता गहराई से जुड़ी हुई है कि बसंत पंचमी के दिन की गई पूजा से ज्ञान का प्रकाश जीवन में स्थायी रूप से बना रहता है। इसी विश्वास के चलते कई परिवार इस दिन बच्चों की पढ़ाई की शुरुआत करते हैं, जिससे यह पर्व शिक्षा और संस्कारों से गहरे रूप में जुड़ जाता है।बसंत पंचमी से जुड़े पौराणिक संदर्भ और ऐतिहासिक कथाएँहिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती का जन्म हुआ था, इसलिए इस दिन ज्ञान और कला की देवी की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। कुछ कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी, जिससे यह तिथि और भी पवित्र मानी जाती है।इसके अलावा, बसंत ऋतु को प्रेम और उल्लास की ऋतु कहा जाता है, इसलिए इस दिन कामदेव और उनकी पत्नी रति की पूजा का भी वर्णन मिलता है। इन पौराणिक कथाओं ने बसंत पंचमी को केवल धार्मिक पर्व तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे भावनात्मक, सांस्कृतिक और मानवीय संवेदनाओं से भी जोड़ दिया है।भारत और पड़ोसी देशों में बसंत पंचमी के विविध रूपभारत के विभिन्न राज्यों में बसंत पंचमी अलग-अलग रूपों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है। कहीं यह पतंगों के त्योहार के रूप में प्रसिद्ध है, तो कहीं इसे संगीत, नृत्य और फूलों के माध्यम से मनाया जाता है। लखनऊ सहित उत्तर भारत में सरस्वती पूजा और पीले वस्त्र धारण करने की परंपरा विशेष रूप से देखने को मिलती है।भारत के बाहर भी इस पर्व का प्रभाव दिखाई देता है। नेपाल और बांग्लादेश में इसे श्रद्धा और धार्मिक आस्था के साथ मनाया जाता है, जबकि इंडोनेशिया के बाली द्वीप में इसे सरस्वती के महान दिन के रूप में जाना जाता है। यह विविधताएँ दर्शाती हैं कि बसंत पंचमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव का वैश्विक प्रतीक भी है।बसंत पंचमी में पीले रंग का प्रतीकात्मक और सांस्कृतिक महत्वबसंत पंचमी पर पीले रंग का विशेष महत्व होता है, क्योंकि यह रंग सरसों के फूलों, सूर्य के प्रकाश और नई ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी सरस्वती का प्रिय रंग भी पीला है, इसलिए इस दिन लोग पीले वस्त्र धारण करते हैं और अपने आसपास पीले रंग की सजावट करते हैं।लखनऊ में भी बसंत पंचमी के अवसर पर पीले परिधानों, सजावट और व्यंजनों का विशेष महत्व देखने को मिलता है। सांस्कृतिक रूप से पीला रंग शांति, समृद्धि, आशा और सकारात्मक सोच का प्रतीक है, जो बसंत पंचमी की भावना के साथ पूरी तरह सामंजस्य रखता है।बसंत पंचमी के पारंपरिक व्यंजन और क्षेत्रीय खानपानबसंत पंचमी पर बनने वाले पारंपरिक व्यंजन इस पर्व की पहचान को और भी गहरा बना देते हैं। पीले चावल, खिचड़ी, बूंदी, खीर और मालपुआ जैसे व्यंजन इस दिन विशेष रूप से तैयार किए जाते हैं। कई घरों में केसरिया शीरा भी बनाया जाता है, जिसे देवी सरस्वती को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है।लखनऊ जैसे शहर में, जहाँ खानपान की समृद्ध परंपरा रही है, बसंत पंचमी के अवसर पर पारंपरिक मिठाइयों और व्यंजनों का स्वाद इस पर्व को और भी विशेष बना देता है। यह भोजन केवल स्वाद तक सीमित नहीं, बल्कि परंपरा और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा होता है।अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के पास दरबार लगाते हुए महाराजा रणजीत सिंह, सभी लोग बसंत (पीले) वस्त्र पहने हुए।बसंत पंचमी से जुड़ी सामाजिक परंपराएँ और शुभ कार्यबसंत पंचमी को अत्यंत शुभ दिन माना जाता है और इस दिन कई सामाजिक व धार्मिक परंपराओं का पालन किया जाता है। पवित्र नदियों में स्नान, मेलों का आयोजन और धार्मिक कार्यक्रम इस दिन की विशेष पहचान हैं। लखनऊ में भी विभिन्न स्थानों पर सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियाँ देखने को मिलती हैं।यह दिन नए कार्य की शुरुआत, विवाह, गृह प्रवेश और बच्चों की शिक्षा आरंभ करने के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। कई परिवार इस दिन बच्चों को उनके पहले अक्षर लिखवाते हैं या संगीत शिक्षा की शुरुआत करते हैं। इस प्रकार बसंत पंचमी समाज को आस्था, परंपरा और नए आरंभ का संदेश देने वाला पर्व बन जाती है।संदर्भ:https://tinyurl.com/4ukfkmzf https://bit.ly/3rWL07r https://bit.ly/2LWryIK https://bit.ly/3anD9d8https://tinyurl.com/57sk6xjp
फल और सब्जियाँ
लखनऊ में ड्रैगन फ्रूट की बढ़ती लोकप्रियता: सेहत, खेती और भविष्य की नई उम्मीद
लखनऊवासियों, हाल के वर्षों में आपने बाज़ारों, फ़लों की दुकानों और सुपरमार्केट में एक नए, गुलाबी-लाल रंग के फल की बढ़ती मौजूदगी ज़रूर महसूस की होगी। यह फल है ड्रैगन फ्रूट (dragon fruit), जो अब सिर्फ़ महानगरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लखनऊ जैसे शहरों में भी लोगों की पसंद बनता जा रहा है। बेहतर सेहत की चाह, नए स्वाद के प्रति बढ़ती रुचि और किसानों के लिए इसके लाभकारी होने ने इस फल को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। यही कारण है कि आज ड्रैगन फ्रूट केवल एक विदेशी फल नहीं, बल्कि भारत की उभरती बागवानी फ़सलों में गिना जाने लगा है।आज इस लेख में हम समझेंगे कि भारत में ड्रैगन फ्रूट की लोकप्रियता क्यों बढ़ रही है और इसमें सरकार की क्या भूमिका है। इसके बाद, हम इसके पोषण और स्वास्थ्य लाभों पर नज़र डालेंगे। आगे, ड्रैगन फ्रूट की खेती की विशेषताओं, उत्पादन और किस्मों की जानकारी लेंगे। अंत में, आयात-निर्यात, वैश्विक बाज़ार में भारत की स्थिति और किसानों की आय में इसकी भूमिका पर विस्तार से चर्चा करेंगे।भारत में ड्रैगन फ्रूट की बढ़ती लोकप्रियता और सरकारी समर्थनभारत में ड्रैगन फ्रूट की बढ़ती मांग को देखते हुए केंद्र और कई राज्य सरकारों ने इसकी खेती को बढ़ावा देने के लिए अहम कदम उठाए हैं। गुजरात और हरियाणा जैसे राज्यों की पहल के बाद केंद्र सरकार ने भी इस फल की खेती के विस्तार का निर्णय लिया। सरकार का मानना है कि इसकी लागत प्रभावशीलता, पोषण मूल्य और वैश्विक मांग को देखते हुए भारत में इसकी खेती का बड़ा भविष्य है।केंद्र सरकार राज्यों को अच्छी गुणवत्ता वाली रोपण सामग्री उपलब्ध कराने में सहयोग कर रही है और बागवानी क्षेत्र से जुड़ी योजनाओं के तहत किसानों को सहायता देने पर ज़ोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही, खेती के क्षेत्र को आने वाले वर्षों में हज़ारों हेक्टेयर तक बढ़ाने की योजना पर भी काम किया जा रहा है।ड्रैगन फ्रूट को “सुपर फ्रूट” बनाने वाले पोषण और स्वास्थ्य लाभड्रैगन फ्रूट को “सुपर फ्रूट” (super fruit) कहा जाना यूँ ही नहीं है। यह फल कैलोरी (calorie) में कम होता है और आयरन (iron), कैल्शियम (calcium), पोटेशियम (potassium) और जिंक (zinc) जैसे ज़रूरी पोषक तत्वों से भरपूर होता है। मधुमेह से पीड़ित लोगों के लिए भी इसे लाभकारी माना जाता है, क्योंकि इसमें शर्करा की मात्रा संतुलित होती है। लखनऊ जैसे शहरों में, जहाँ लोग अब सेहत को लेकर पहले से अधिक जागरूक हो रहे हैं, ड्रैगन फ्रूट एक बेहतर विकल्प के रूप में उभर रहा है। इसके पोषण मूल्यों के कारण न सिर्फ़ घरेलू, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में भी इसकी मांग लगातार बनी हुई है।ड्रैगन फ्रूट की खेती की खासियतें और भारतीय परिस्थितियों में अनुकूलताड्रैगन फ्रूट की खेती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके पौधे को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती। इसे बंजर और वर्षा आधारित भूमि दोनों में उगाया जा सकता है, जिससे यह उन क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी बन जाता है जहाँ पारंपरिक खेती कठिन होती है। यह पौधा कैक्टस (cactus) परिवार से संबंधित है और सूखी तथा अर्ध-शुष्क जलवायु में भी अच्छी तरह बढ़ सकता है। एक बार रोपण के बाद, यह पौधा 20 वर्षों से अधिक समय तक फल देता है, जिससे किसानों को लंबे समय तक लाभ मिलता है।उत्पादन, किस्में और उपज: खेती से बाज़ार तक का सफ़रभारत में किसान मुख्य रूप से ड्रैगन फ्रूट की तीन किस्मों की खेती करते हैं - गुलाबी त्वचा वाला सफेद गूदे का फल, गुलाबी त्वचा वाला लाल गूदे का फल और पीली त्वचा वाला सफेद गूदे का फल। अच्छी तरह से प्रबंधित बाग़ानों में पौधे पहले वर्ष से ही फल देना शुरू कर सकते हैं, जबकि तीसरे वर्ष से अच्छी पैदावार मिलने लगती है। फलन सामान्यतः जून से नवंबर के बीच होता है और एक फल का वज़न 200 से 700 ग्राम तक हो सकता है। बाज़ार में इसके दाम फल के आकार और गूदे के रंग के अनुसार बदलते रहते हैं, जिससे किसानों को अच्छे भाव मिलने की संभावना रहती है।आयात, निर्यात और वैश्विक बाज़ार में भारत की स्थितिवर्तमान में भारत में ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन सीमित है, जिसके कारण देश को इसकी एक बड़ी मात्रा आयात करनी पड़ती है। वहीं, वियतनाम और चीन जैसे देशों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है। बावजूद इसके, भारत में भी इतनी क्षमता मौजूद है कि आने वाले समय में आयात पर निर्भरता कम की जा सके। भारत से इस फल का निर्यात फ़ारस की खाड़ी के देशों, यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे बाज़ारों में किया जा सकता है। हाल के वर्षों में निर्यात की शुरुआती पहल भी हो चुकी है, जो इसके उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करती है।किसानों की आय और आत्मनिर्भर भारत में ड्रैगन फ्रूट की भूमिकाड्रैगन फ्रूट की खेती किसानों के लिए कम जोखिम और अधिक लाभ वाली मानी जाती है। इस पर कीटों और बीमारियों का प्रभाव कम होता है, जिससे रखरखाव का ख़र्च भी घटता है। इसके साथ ही, नर्सरी व्यवसाय के रूप में भी यह किसानों के लिए अतिरिक्त आय का साधन बन रहा है। खेती और उत्पादन के क्षेत्र में इसके विस्तार से न केवल किसानों की आय बढ़ सकती है, बल्कि आयात में कमी लाकर भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी यह फल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इन्हीं सभी कारणों से ड्रैगन फ्रूट की लोकप्रियता भारत में लगातार बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में इसके और विस्तार की उम्मीद की जा रही है।संदर्भ–https://bit.ly/3vFzbqk https://bit.ly/3Crumo9https://tinyurl.com/tz2rxfpj
पक्षी
लखनऊ की प्रकृति में रचा-बसा मोर: सौंदर्य, नृत्य और सांस्कृतिक पहचान
लखनऊवासियों, आपने कभी सुबह या मानसून के दिनों में अपने आसपास खेतों, बाग़ों या खुले इलाक़ों के पास मोर को टहलते या नाचते हुए देखा है? लखनऊ का प्राकृतिक परिवेश और आसपास का हरित क्षेत्र मोरों के लिए अनुकूल माना जाता है, इसलिए यहाँ इनका दिखना कोई असामान्य बात नहीं है। नीले रंग के चमकदार पंखों वाला यह पक्षी जब बारिश की पहली फुहारों के साथ अपने पंख फैलाकर नृत्य करता है, तो ऐसा लगता है मानो प्रकृति स्वयं उल्लास मना रही हो। मोर केवल देखने में सुंदर ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और लोकजीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ पक्षी है।आज इस लेख में सबसे पहले, हम मोर की प्रजाति, उसके स्वभाव और प्राकृतिक आवास के बारे में जानेंगे। इसके बाद, मानसून के मौसम में होने वाले मोर नृत्य और उसके पीछे छिपे प्रणय निवेदन के कारणों पर चर्चा करेंगे। आगे, हम यह समझेंगे कि मोर को भारत का राष्ट्रीय पक्षी क्यों घोषित किया गया। फिर, मोर की शारीरिक बनावट और उसके रंग-बिरंगे पंखों के महत्व पर बात करेंगे। अंत में, भारत और एशिया में प्रचलित मोर नृत्य की परंपराओं और लोकसंस्कृति में इसकी भूमिका को विस्तार से जानेंगे।मोर का परिचय: प्रजाति, स्वभाव और प्राकृतिक आवासमोर, जिसे मयूर भी कहा जाता है, पक्षियों के पैवोनिनाए उपकुल के अंतर्गत आता है। नर को मोर और मादा को मोरनी कहा जाता है। स्वभाव से मोर एक शर्मीला पक्षी होता है, जो अधिकतर खुले वनों और शांत इलाक़ों में रहना पसंद करता है। यह प्रायः एकांत में ही विचरण करता है और ज़्यादा शोर-शराबे से दूर रहता है। भौगोलिक दृष्टि से मोर भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से पाया जाता है। भारत के कई हिस्सों के साथ-साथ यह श्रीलंका में भी मिलता है। अलग-अलग क्षेत्रों में मोर की कुछ प्रजातियाँ देखी जाती हैं, जैसे नीला मोर और हरा मोर। प्राकृतिक वातावरण में रहकर यह पक्षी जंगलों और खेतों के संतुलन को बनाए रखने में भी अपनी भूमिका निभाता है।मानसून और मोर नृत्य: प्रणय निवेदन का सुंदर माध्यममानसून का मौसम आते ही मोर का नृत्य देखने को मिलता है। जैसे ही बादल घिरते हैं और बारिश शुरू होती है, मोर अपने लंबे, रंग-बिरंगे पंख फैलाकर नाचने लगता है। यह नृत्य केवल आनंद या उत्सव का प्रतीक नहीं, बल्कि मोरनी को आकर्षित करने का एक प्राकृतिक तरीका है। प्रणय निवेदन के दौरान मोर अपनी पूँछ के पंखों को पूरी तरह फैलाकर गोल आकार में खड़ा होता है और लयबद्ध ढंग से घूमता है। मोरनी सामान्यतः उसी नर की ओर आकर्षित होती है, जिसके पंख अधिक बड़े, चमकीले और आकर्षक होते हैं। यही कारण है कि मानसून का मौसम मोरों के जीवन में विशेष महत्व रखता है।मोर को भारत का राष्ट्रीय पक्षी घोषित किए जाने के कारणभारत में मोर को वर्ष 1963 में राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया था। इसके पीछे कई ठोस कारण थे। मोर भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से पाया जाता है और आम लोगों द्वारा आसानी से पहचाना जा सकता है। यह पक्षी भारतीय धार्मिक, सांस्कृतिक और पौराणिक कथाओं में भी विशेष स्थान रखता है। इसके अलावा, मोर की पहचान इतनी विशिष्ट है कि इसे किसी अन्य देश के पक्षी के साथ भ्रमित नहीं किया जा सकता। भारतीय वन्यजीव संरक्षण क़ानून के तहत इसे पूरी तरह संरक्षित पक्षी का दर्जा भी प्राप्त है, जिससे इसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।मोर की शारीरिक बनावट और पंखों का महत्वमोर की सबसे बड़ी पहचान उसकी सुंदर पूँछ और सिर पर सजी ताज जैसी कलंगी है। नर मोर के पास लगभग 200 पंखों की एक विस्तृत श्रृंखला होती है, जो उसके शरीर का बड़ा हिस्सा बनाती है। यही पंख उसके सौंदर्य और आकर्षण का मुख्य कारण हैं। हर वर्ष वर्षा ऋतु के बाद, विशेषकर अगस्त के महीने में, मोर के पंख झड़ जाते हैं और गर्मियों से पहले फिर से उग आते हैं। रंगों की बात करें, तो मोर मुख्य रूप से नीले रंग का होता है, लेकिन सफेद, हरे और जामुनी रंग के मोर भी पाए जाते हैं। मादा मोरनी के रंग नर की तुलना में कम चमकीले होते हैं और उसके पास सजावटी पंख नहीं होते।भारत और एशिया में मोर नृत्य की परंपराएँमोर के नृत्य से प्रेरित होकर भारत और एशिया के कई देशों में विशेष नृत्य शैलियाँ विकसित हुई हैं। भारत में मोर नृत्य को अलग-अलग रूपों में देखा जाता है, जैसे दक्षिण भारत में थाई पोंगल जैसे उत्सवों के दौरान होने वाला मयिलाट्टम। एशिया के अन्य देशों - जैसे चीन, म्यांमार और इंडोनेशिय - में भी मोर नृत्य लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन नृत्यों में मोर की चाल, उसके पंख फैलाने की मुद्रा और उसकी कोमल गतियों का सुंदर प्रदर्शन किया जाता है।मोर नृत्य और लोकसंस्कृति: उत्सवों और परंपराओं में भूमिकामोर नृत्य केवल कला का रूप नहीं, बल्कि आनंद, उल्लास और स्वागत का प्रतीक भी है। कई क्षेत्रों में यह नृत्य त्योहारों, मेलों और विशेष आयोजनों के अवसर पर किया जाता है। कहीं यह वर्षा और समृद्धि का संकेत माना जाता है, तो कहीं अतिथियों के स्वागत का माध्यम बनता है। लोकसंस्कृति में मोर नृत्य ने लोगों को प्रकृति के और क़रीब लाने का काम किया है। यही वजह है कि आज भी मोर और उसका नृत्य केवल जंगलों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बना हुआ है।संदर्भ:https://bit.ly/3kHbRmi https://bit.ly/3kD2jZt https://tinyurl.com/mr3tmzbz
भूमि और मिट्टी के प्रकार : कृषि योग्य, बंजर, मैदान
भारत की मिट्टियाँ और खेती का रिश्ता: जानिए कौन-सी मृदा किस फ़सल के लिए है सबसे उपयुक्त
भारत एक ऐसा देश है जहाँ की भौगोलिक बनावट और जलवायु में अत्यधिक विविधता देखने को मिलती है। पहाड़ों से लेकर मैदानों, पठारों और तटीय क्षेत्रों तक फैला यह देश मिट्टियों की अनेक किस्मों का घर है। यही विविधता भारतीय कृषि को मज़बूत आधार प्रदान करती है, क्योंकि अलग-अलग मिट्टियाँ अलग-अलग फ़सलों के लिए उपयुक्त होती हैं। खेती की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि किस क्षेत्र में किस प्रकार की मृदा पाई जाती है और उसमें कौन-सी फ़सल उगाई जाए।आज इस लेख में हम भारत में पाई जाने वाली प्रमुख मिट्टियों की विविधता को समझेंगे। साथ ही, यह जानेंगे कि जलोढ़, लाल, काली, रेगिस्तानी और लैटराइट (laterite) जैसी मिट्टियाँ कृषि को कैसे प्रभावित करती हैं। इसके अलावा, खरीफ़ और रबी फ़सलों की बुवाई के समय, उनके लिए उपयुक्त मिट्टी और आदर्श परिस्थितियों पर भी विस्तार से चर्चा करेंगे।भारत में मृदा की विविधता और आईसीएआर (ICAR) द्वारा किया गया वर्गीकरणभारत की जलवायु और भौगोलिक संरचना में अत्यधिक विविधता पाई जाती है, जिसके कारण देश के अलग-अलग हिस्सों में भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टियाँ विकसित हुई हैं। कहीं अधिक वर्षा होती है, तो कहीं शुष्क परिस्थितियाँ पाई जाती हैं, और कहीं नदियों द्वारा लाई गई उपजाऊ मिट्टी मिलती है। इन्हीं भौगोलिक व जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने भारत की मिट्टियों को आठ प्रमुख वर्गों में विभाजित किया है। इस वर्गीकरण में जलोढ़, काली, लाल, रेगिस्तानी, लैटराइट, वन एवं पर्वतीय, क्षारीय-लवणीय तथा पीट अथवा दलदली मृदा शामिल हैं। यह वैज्ञानिक वर्गीकरण केवल मिट्टी के प्रकार बताने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों और कृषि विशेषज्ञों को यह समझने में भी मदद करता है कि किसी विशेष मिट्टी में कौन-सी फ़सल बेहतर उपज दे सकती है और मिट्टी के पोषण स्तर को कैसे संतुलित रखा जा सकता है।जलोढ़ मृदा: उत्तर भारत की कृषि की रीढ़जलोढ़ मृदा का निर्माण नदियों द्वारा लाई गई सिल्ट, गाद और महीन कणों से होता है, जो समय के साथ मैदानों में जमा होकर उपजाऊ भूमि का रूप ले लेते हैं। यह मिट्टी मुख्य रूप से सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली के मैदानी क्षेत्रों और कई डेल्टा (delta) क्षेत्रों में पाई जाती है। अपनी बनावट के कारण यह नमी को संतुलित रूप से बनाए रखती है और पौधों की जड़ों को पोषक तत्व आसानी से उपलब्ध कराती है। रासायनिक दृष्टि से जलोढ़ मिट्टी में पोटाश (potash) और फ़ॉस्फ़ोरिक एसिड (phosphoric acid) पर्याप्त मात्रा में होते हैं, हालाँकि इसमें नाइट्रोजन (nitrogen) की कमी देखी जाती है। इसके बावजूद, इसकी प्राकृतिक उर्वरता इसे कृषि के लिए अत्यंत उपयोगी बनाती है। इसी मिट्टी में धान, गेहूँ, गन्ना, मक्का, जूट, तिलहन, सब्ज़ियाँ और विभिन्न प्रकार के फल बड़े पैमाने पर उगाए जाते हैं, जिससे देश की बड़ी आबादी का जीवनयापन संभव हो पाता है।लाल और काली मृदा: रासायनिक संरचना और फ़सल उपयुक्ततालाल मृदा का निर्माण प्राचीन ग्रेनाइट (granite) चट्टानों के अपक्षय से होता है और इसका लाल रंग इसमें मौजूद आयरन ऑक्साइड (iron oxide) की वजह से दिखाई देता है। यह मिट्टी आयरन और पोटाश से भरपूर होती है, लेकिन नाइट्रोजन, चूना और ह्यूमस (humus) की मात्रा इसमें अपेक्षाकृत कम होती है। यही कारण है कि प्राकृतिक रूप से यह मिट्टी कम उपजाऊ मानी जाती है, लेकिन उचित सिंचाई, खाद और उर्वरकों के प्रयोग से इसमें अच्छी पैदावार ली जा सकती है। इस मिट्टी में धान, बाजरा, दालें, कपास और गन्ना जैसी फ़सलें सफलतापूर्वक उगाई जाती हैं। दूसरी ओर, काली मृदा अपनी चिकनी बनावट और नमी को लंबे समय तक बनाए रखने की क्षमता के लिए जानी जाती है। यह मिट्टी गीली अवस्था में फैलती है और सूखने पर दरारें बनाती है, जिससे मिट्टी में वायु का संचार बना रहता है। इसमें लौह और चूना प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जबकि नाइट्रोजन और फ़ॉस्फ़ोरस की कमी रहती है। कपास की खेती के लिए यह मिट्टी सबसे अधिक उपयुक्त मानी जाती है, इसी कारण इसे “ब्लैक कॉटन सॉयल” (black cotton soil) भी कहा जाता है। इसके अलावा गेहूँ, ज्वार, बाजरा और तिलहन की खेती भी इसमें अच्छे परिणाम देती है।रेगिस्तानी और लैटराइट मृदा: सीमाएँ, चुनौतियाँ और कृषि संभावनाएँरेगिस्तानी मृदा शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है, जहाँ वर्षा बहुत कम होती है। इस मिट्टी में रेत और बजरी की मात्रा अधिक होती है, जिसके कारण इसमें नमी और जैविक पदार्थों की भारी कमी रहती है। पानी को रोकने की क्षमता कम होने के कारण यह मिट्टी स्वाभाविक रूप से कृषि के लिए अनुकूल नहीं मानी जाती। हालाँकि, सिंचाई सुविधाओं के विकास के बाद इन क्षेत्रों में भी खेती संभव हुई है और यहाँ बाजरा, दालें, ग्वार और चारा फ़सलें उगाई जाने लगी हैं। लैटराइट मृदा मुख्य रूप से मानसूनी वर्षा वाले क्षेत्रों की विशेषता है। अधिक वर्षा के कारण इसमें से चूना और सिलिका (silica) बह जाते हैं, जिससे मिट्टी में लौह और ऐल्यूमीनियम (aluminium) की मात्रा बढ़ जाती है। यह मिट्टी नाइट्रोजन और पोटाश की कमी से ग्रस्त होती है, फिर भी उचित कृषि प्रबंधन अपनाकर इसमें धान, रागी, गन्ना और काजू जैसी फ़सलें उगाई जाती हैं। कुछ क्षेत्रों में इसका उपयोग निर्माण सामग्री के रूप में भी किया जाता है।खरीफ़ और रबी फ़सलें: बुवाई का समय और मिट्टी की भूमिकाखरीफ़ फ़सलें मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर होती हैं और इनकी बुवाई सामान्यतः जुलाई से अक्टूबर के बीच की जाती है। इन फ़सलों को बढ़ने के लिए पर्याप्त वर्षा और गर्म तापमान की आवश्यकता होती है। धान, मक्का, बाजरा, रागी, सोयाबीन और मूँगफली खरीफ़ फ़सलों के प्रमुख उदाहरण हैं। इनके लिए उर्वर, अच्छी जल निकासी वाली जलोढ़ या दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि ऐसी मिट्टी पानी और पोषक तत्वों को संतुलित रूप से बनाए रखती है। इसके विपरीत, रबी फ़सलें मानसून समाप्त होने के बाद सर्दियों में बोई जाती हैं और गर्मियों की शुरुआत में काटी जाती हैं। गेहूँ, जौ, सरसों, चना और अलसी रबी फ़सलों में शामिल हैं। इन फ़सलों के लिए अपेक्षाकृत ठंडा और शुष्क मौसम अनुकूल होता है, और चिकनी दोमट से लेकर मंझली काली मिट्टी इनमें अच्छी पैदावार देने में सहायक होती है।खरीफ़ और रबी फ़सलों के लिए आदर्श मिट्टी की आवश्यकताएँरबी फ़सलों के लिए ऐसी मिट्टी आवश्यक होती है जिसमें अच्छी जल निकासी हो, मध्यम उर्वरता बनी रहे और नमी संतुलित रूप से उपलब्ध हो। भारी और जलभराव वाली मिट्टियाँ रबी फ़सलों के लिए अनुकूल नहीं मानी जातीं, क्योंकि इससे फ़सल की जड़ें प्रभावित हो सकती हैं। दूसरी ओर, खरीफ़ फ़सलों के लिए ऐसी मिट्टी उपयुक्त होती है जिसमें कार्बनिक पदार्थ पर्याप्त मात्रा में मौजूद हो, पानी को रोकने की क्षमता अच्छी हो और मिट्टी का पीएच (pH) स्तर संतुलित बना रहे। यदि किसान मिट्टी के प्रकार को सही ढंग से पहचानकर उसी के अनुसार फ़सल का चयन करें, तो न केवल फ़सल उत्पादन में वृद्धि होती है, बल्कि भूमि की दीर्घकालिक उर्वरता भी बनी रहती है, जिससे भविष्य की खेती भी सुरक्षित रहती है।संदर्भhttps://tinyurl.com/5e6kw4js https://tinyurl.com/57vpdh2a https://tinyurl.com/7hpre3v5https://tinyurl.com/5ctjztdn
स्पर्श - बनावट/वस्त्र
चिकनकारी और ज़रदोज़ी: कैसे लखनऊ की कढ़ाई ने शहर को “पूरब का स्वर्ण” बनाया?
लखनऊवासियों, आपके शहर की पहचान सिर्फ नवाबी तहज़ीब, अदब और संगीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ की चिकनकारी और ज़रदोज़ी कढ़ाई ने लखनऊ को दुनिया भर में एक अलग मुकाम दिलाया है। चौक की गलियों से लेकर अमीनाबाद के बाज़ारों तक, सुई और धागे से गढ़ी गई यह कला न केवल रोज़गार का साधन है, बल्कि शहर की सांस्कृतिक आत्मा भी है। लखनऊ की कढ़ाई सदियों से शाही पहनावे, आम लोगों की ज़िंदगी और आधुनिक फैशन - तीनों का हिस्सा रही है। इस लेख में हम इसी समृद्ध परंपरा को समझने की कोशिश करेंगे, जहाँ इतिहास, कला और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं।आज के इस लेख में हम क्रमबद्ध रूप से जानेंगे कि भारत का प्राचीन वस्त्र उद्योग कैसे सभ्यता से संस्कृति तक की यात्रा तय करता आया है। इसके बाद हम समझेंगे कि औपनिवेशिक दौर (colonial era) ने इस उद्योग को कैसे प्रभावित किया और स्वतंत्रता के बाद इसका पुनरुत्थान कैसे हुआ। फिर हम लखनऊ की विशेष भूमिका पर नज़र डालेंगे, जिसने चिकनकारी और ज़रदोज़ी कढ़ाई के ज़रिए शहर को “पूरब का स्वर्ण” की पहचान दिलाई। आगे हम चिकनकारी की मुगलकालीन उत्पत्ति से लेकर आधुनिक फैशन तक की यात्रा को समझेंगे और ज़रदोज़ी कढ़ाई के शाही इतिहास को जानेंगे। अंत में, हम यह भी देखेंगे कि आज के वैश्विक फैशन उद्योग में लखनऊ की कढ़ाई आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से कितनी महत्वपूर्ण बन चुकी है।भारत का प्राचीन वस्त्र उद्योग: सभ्यता से संस्कृति तकभारत का वस्त्र उद्योग केवल व्यापार या आजीविका का साधन नहीं रहा है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता और संस्कृति की आत्मा का हिस्सा रहा है। इसके प्रमाण हमें सिंधु घाटी सभ्यता से ही मिलने लगते हैं। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों - जैसे स्पिंडल व्होरल (spindle whorl), कपास के बीज और बुने हुए वस्त्रों के चिन्ह - यह स्पष्ट करते हैं कि लगभग 4000-2500 ईसा पूर्व भारत में सूत कातने और कपड़ा बुनने की उन्नत तकनीकें मौजूद थीं। उस समय कपास की खेती, धागा निर्माण और हथकरघा उद्योग ग्रामीण जीवन का अभिन्न अंग थे। प्राचीन भारत के वस्त्रों की गुणवत्ता और सौंदर्य का प्रभाव इतना गहरा था कि ग्रीस और बेबीलोन जैसी सभ्यताओं में “भारत” शब्द को ही कपास का पर्याय माना जाने लगा। भारतीय सूती और रेशमी कपड़े न केवल एशिया, बल्कि मध्य एशिया, अरब और यूरोप तक निर्यात किए जाते थे। भारतीय वस्त्रों की कोमलता, टिकाऊपन और रंगों की चमक ने उन्हें वैश्विक पहचान दिलाई। यही कारण था कि भारत को लंबे समय तक विश्व का सबसे बड़ा वस्त्र उत्पादक और निर्यातक माना जाता रहा। वस्त्र केवल शरीर ढकने का साधन नहीं थे, बल्कि सामाजिक स्थिति, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान को भी दर्शाते थे। अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित वस्त्र शैलियाँ - जैसे बनारसी रेशम, दक्षिण भारत का सूती वस्त्र, और उत्तर भारत की कढ़ाई परंपराएँ - भारतीय विविधता को एक सूत्र में पिरोती हैं।औपनिवेशिक प्रभाव और स्वतंत्रता के बाद वस्त्र उद्योग का पुनरुत्थानयूरोपियों के आगमन से पहले तक भारत का वस्त्र उद्योग पूरी तरह आत्मनिर्भर और समृद्ध था। 15वीं शताब्दी में वास्को डि गामा (Vasco da Gama) द्वारा समुद्री मार्ग की खोज के बाद भारतीय वस्त्रों तक यूरोप की सीधी पहुँच बनी। इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन ने व्यापार को संगठित रूप दिया। प्रारंभ में यह व्यापार भारतीय कारीगरों के लिए लाभकारी रहा, लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद परिस्थितियाँ बदल गईं। इंग्लैंड में मशीनों से बने सस्ते कपड़े भारतीय बाजारों में भर गए। ब्रिटिश शासन ने भारत में अपने वस्त्रों पर आयात शुल्क हटाए, जबकि भारतीय वस्त्रों पर ब्रिटेन में भारी कर लगाए गए। इस असमान नीति ने भारतीय हथकरघा और कारीगरों को गहरी चोट पहुँचाई। कई पारंपरिक बुनकर और कारीगर बेरोज़गार हो गए, और सदियों पुरानी शिल्प परंपराएँ संकट में पड़ गईं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने खादी और स्वदेशी वस्त्रों को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनाया। ब्रिटिश वस्त्रों के बहिष्कार ने भारतीय वस्त्र उद्योग में नई चेतना भरी। 1947 के बाद सरकार ने अखिल भारतीय हथकरघा बोर्ड और राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान जैसे संस्थानों के माध्यम से पारंपरिक कारीगरों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। आज भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा वस्त्र उत्पादक है, और यह उद्योग लाखों लोगों को रोज़गार प्रदान करता है।लखनऊ: हस्तशिल्प और कढ़ाई के कारण “पूरब का स्वर्ण”लखनऊ केवल नवाबी तहज़ीब, अदब और संगीत के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यह शहर सदियों से भारतीय हस्तशिल्प और कढ़ाई कला का प्रमुख केंद्र रहा है। इसी समृद्ध विरासत के कारण लखनऊ को “पूरब का स्वर्ण” कहा जाता है। यहाँ की गलियों, चौकों और मोहल्लों में आज भी सुई-धागे से रची जा रही कला जीवित है। लखनऊ की सांस्कृतिक पहचान यहाँ के कारीगरों से जुड़ी हुई है। ये कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी अपने हुनर को सँजोते आए हैं। नवाबों के संरक्षण में यहाँ की कढ़ाई कला ने शाही वैभव और सौंदर्य का रूप लिया। लखनऊ का वस्त्र-शिल्प न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त करता है, बल्कि शहर को वैश्विक मंच पर पहचान भी दिलाता है। आज भी लखनऊ की चिकनकारी और ज़रदोज़ी देश-विदेश के फैशन बाज़ारों में प्रतिष्ठित मानी जाती हैं। यह कला यहाँ के लोगों के लिए सिर्फ रोज़गार नहीं, बल्कि गौरव और पहचान का स्रोत है।चिकनकारी कढ़ाई: मुगलकाल से आधुनिक फैशन तकचिकनकारी लखनऊ की सबसे प्रसिद्ध और विशिष्ट कढ़ाई शैली है। इसकी उत्पत्ति को लेकर एक लोकप्रिय मान्यता है कि मुगल सम्राट जहाँगीर की पत्नी नूरजहाँ इस कला को फारस से भारत लाई थीं। नवाबों के संरक्षण में यह कला अवध में फली-फूली और समय के साथ लखनऊ की पहचान बन गई। चिकनकारी की खासियत इसके नाज़ुक और बारीक टाँकों में है। टेपची, बखिया, जाली, फंदा, मुरी जैसे लगभग 36 पारंपरिक टाँके चिकनकारी को अद्वितीय बनाते हैं। ये टाँके शिफॉन, मलमल, रेशम और ऑर्गेंज़ा जैसे हल्के कपड़ों पर किए जाते हैं, जिससे वस्त्र बेहद सुरुचिपूर्ण और आरामदायक बनते हैं। आज चिकनकारी केवल पारंपरिक परिधानों तक सीमित नहीं है। फैशन डिज़ाइनरों ने इसे आधुनिक कट्स, कुर्तियों, साड़ियों, ड्रेसेज़ और यहाँ तक कि वेस्टर्न आउटफिट्स में भी शामिल किया है। वैश्विक फैशन मंच पर लखनऊ की चिकनकारी ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है।ज़रदोज़ी कढ़ाई: शाही वैभव और ऐतिहासिक परंपराज़रदोज़ी कढ़ाई शाही ठाठ और वैभव की प्रतीक मानी जाती है। इसका मूल फारस में माना जाता है, जहाँ ‘ज़र’ का अर्थ सोना और ‘दोज़ी’ का अर्थ कढ़ाई है। हालांकि सोने और चाँदी के धागों से कढ़ाई की परंपरा प्राचीन भारत में भी मौजूद थी, जिसे ‘हिरण्य’ वस्त्रों के रूप में जाना जाता था। मुगल काल में ज़रदोज़ी कढ़ाई अपने चरम पर पहुँची। शाही पोशाकें, दरबारी परिधान और राजसी सजावट इसी कढ़ाई से सुसज्जित होती थीं। लखनऊ में नवाबों के संरक्षण ने ज़रदोज़ी को विशेष पहचान दी। मखमल, साटन और रेशम जैसे भारी कपड़ों पर की गई यह कढ़ाई आज भी शादियों और भव्य आयोजनों की शान है। आज ज़रदोज़ी आधुनिक फैशन में भी उतनी ही प्रासंगिक है। डिज़ाइनर परिधान, दुल्हन के जोड़े और इंटीरियर डेकोर (interior decor) में इसका व्यापक उपयोग होता है।आधुनिक फैशन उद्योग में लखनऊ की कढ़ाई का आर्थिक महत्वआज के वैश्विक फैशन उद्योग में लखनऊ की कढ़ाई केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति भी है। हज़ारों कारीगर इस उद्योग से जुड़े हैं, जिनकी आजीविका चिकनकारी और ज़रदोज़ी पर निर्भर करती है। लखनऊ के कढ़ाई उत्पाद देश ही नहीं, बल्कि अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व तक निर्यात किए जाते हैं। डिज़ाइनर ब्रांड्स (designer brands) और फैशन हाउसेज़ (fashion houses) लखनऊ की कढ़ाई को अपने कलेक्शन में शामिल कर रहे हैं। इससे न केवल स्थानीय रोज़गार को बढ़ावा मिला है, बल्कि भारत की हस्तशिल्प पहचान भी मज़बूत हुई है। हालाँकि मशीनों और तेज़ फैशन के दौर में कारीगरों के सामने चुनौतियाँ भी हैं, लेकिन यदि इस कला को उचित समर्थन और बाज़ार मिले, तो यह आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकती है। लखनऊ की कढ़ाई आज भी यह साबित करती है कि सुई और धागे से गढ़ी गई कला समय, सीमाओं और फैशन के बदलते रुझानों से कहीं ऊपर होती है - और यही इसे सच मायनों में “पूरब का स्वर्ण” बनाती है।संदर्भ https://tinyurl.com/ye2atkj3 https://tinyurl.com/sxyjeawdhttps://tinyurl.com/bdd37ews
आवास के अनुसार वर्गीकरण
दशहरी आम: मलिहाबाद की ऐतिहासिक पहचान, बेमिसाल खुशबू और स्वाद का प्रतीक
दशहरी आम भारत की सबसे लोकप्रिय और सुगंधित आम किस्मों में से एक है, जिसकी उत्पत्ति उत्तर प्रदेश के लखनऊ जिले के निकट मलिहाबाद क्षेत्र में मानी जाती है। इसका इतिहास 18वीं शताब्दी से जुड़ा है और आज भी यह आम अपनी मिठास, रसीले स्वाद और खास खुशबू के लिए पहचाना जाता है। दशहरी आम मुख्य रूप से उत्तर भारत में उगाया जाता है, जबकि आंध्र प्रदेश, नेपाल और पाकिस्तान में भी इसकी खेती होती है। मलिहाबाद को दशहरी आम का सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्र माना जाता है।पोषण की दृष्टि से दशहरी आम अत्यंत लाभकारी है। इसमें फाइबर (fiber) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो पाचन को बेहतर बनाता है, जबकि विटामिन सी (Vitamin C) रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है। इसके अलावा इसमें आयरन (iron), कैल्शियम (calcium), जिंक (zinc), विटामिन ए (A), ई (F) और फोलेट (Folate) जैसे आवश्यक पोषक तत्व होते हैं, जो शरीर के समुचित विकास और अंगों के सही कार्य में सहायक हैं। इसके छिलके में मौजूद फाइटोकेमिकल्स एंटीऑक्सीडेंट (Phytochemicals Antioxidants) गुणों से भरपूर माने जाते हैं।दशहरी आम की ऐतिहासिक पहचान भी खास है। दशहरी गांव में स्थित “मदर दशहरी ट्री” लगभग 185 वर्ष पुराना है और आज भी फल देता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मलिहाबाद के अब्दुल हमीद खान, जिन्हें “बाबा-ए-अंबा” कहा जाता है, ने इस आम को पहचान दिलाने और ग्राफ्टिंग (grafting) तकनीक के जरिए विकसित करने में अहम भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से दशहरी आम ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त की। आज यह आम सिंगापुर, यूएई (UAE), सऊदी अरब और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में निर्यात किया जाता है। अपनी अनोखी सुगंध और स्वाद के कारण दशहरी आम आज भी लोगों को सहज ही आकर्षित करता है।संदर्भ - https://tinyurl.com/5n75ecw4 https://tinyurl.com/2w2vcdbvhttps://tinyurl.com/ybkr38cy https://tinyurl.com/3nctfh5u
घर - आंतरिक सज्जा/कुर्सियाँ/कालीन
29-01-2026 09:20 AM • Lucknow-Hindi
कैसे पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर, लखनऊ के घरों को संस्कृति, सौंदर्य और पहचान देता है
लखनऊवासियों के लिए घर केवल चार दीवारों का ढाँचा नहीं, बल्कि तहज़ीब, सलीक़े और सांस्कृतिक विरासत का विस्तार होता है। यहाँ की जीवनशैली में कला, नफ़ासत और संतुलन की झलक हर चीज़ में दिखाई देती है - चाहे वह पहनावा हो, खानपान या फिर घर की सजावट। ऐसे में फ़र्नीचर केवल उपयोग की वस्तु नहीं रहता, बल्कि वह घर के व्यक्तित्व और सोच को भी दर्शाता है। आज लखनऊ के बाज़ारों में पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर और आधुनिक डिज़ाइनों का ऐसा सुंदर संगम देखने को मिलता है, जो अतीत की कारीगरी और वर्तमान की ज़रूरतों - दोनों को साथ लेकर चलता है। भारतीय फ़र्नीचर की यह यात्रा सदियों पुराने सामाजिक बदलावों, विदेशी प्रभावों और स्थानीय शिल्प परंपराओं से होकर आज के स्वरूप तक पहुँची है। आज इस लेख में हम भारतीय फ़र्नीचर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके विकास को समझेंगे। इसके बाद मध्यकालीन भारत में शाही संरक्षण और फ़र्नीचर निर्माण की भूमिका पर चर्चा करेंगे। फिर मुगल काल और यूरोपीय प्रभावों से बनी विविध फ़र्नीचर शैलियों को जानेंगे। आगे भारतीय फ़र्नीचर में प्रयुक्त नक्काशी, जड़ाई और सामग्रियों के महत्व पर बात करेंगे। अंत में, उन पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर वस्तुओं को समझेंगे, जो आज लखनऊ सहित देशभर में फिर से लोकप्रिय हो रही हैं।
भारतीय फ़र्नीचर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विकास यात्रा प्राचीन भारत में फ़र्नीचर आज की तरह रोज़मर्रा के जीवन का अनिवार्य हिस्सा नहीं था। लोग अधिकतर फ़र्श पर बैठकर जीवन व्यतीत करते थे और साधारण जीवनशैली को महत्व दिया जाता था। फिर भी, वेदिक ग्रंथों और प्राचीन साहित्य में पीढ़ा, खाटा, मुंडा और चौकी जैसी कुछ फ़र्नीचर वस्तुओं का उल्लेख मिलता है। ये वस्तुएँ विशेष अवसरों, धार्मिक कार्यों या विशिष्ट वर्ग तक ही सीमित थीं। धीरे-धीरे समाज की संरचना बदली, निजी स्थानों की अवधारणा विकसित हुई और आराम व सुविधा को अधिक महत्व मिलने लगा। इसी क्रम में फ़र्नीचर की उपयोगिता बढ़ी और वह धीरे-धीरे भारतीय घरों का हिस्सा बनने लगा। यह विकास एकदम अचानक नहीं हुआ, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव और ज़रूरतों के साथ आकार लेता गया। मध्यकालीन भारत में फ़र्नीचर निर्माण और शाही संरक्षण मध्यकालीन भारत में फ़र्नीचर निर्माण को विशेष रूप से शाही संरक्षण प्राप्त हुआ। दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य के दौरान यह कला अपने चरम पर पहुँची। इस समय लकड़ी के कारीगरों को राजपरिवार का संरक्षण और सम्मान प्राप्त था, जिससे उनकी कला में निखार आया। उस दौर का फ़र्नीचर मुख्यतः राजसी उपयोग के लिए बनाया जाता था - जैसे सिंहासन, दरबारी आसन, महलों के दरवाज़े, खंभे और सजावटी संरचनाएँ। इन वस्तुओं में भव्यता, मजबूती और बारीक कारीगरी का अनोखा मेल दिखाई देता है। आम लोगों के घरों में फ़र्नीचर का प्रचलन अभी भी सीमित था, लेकिन यह काल भारतीय फ़र्नीचर कला की तकनीकी और सौंदर्यात्मक नींव को मज़बूत करने वाला साबित हुआ।
मुगल काल में भारतीय फ़र्नीचर पर कलात्मक प्रभाव 16वीं शताब्दी में मुगलों के आगमन के साथ उत्तर भारत में फ़र्नीचर की शैली में एक नया अध्याय शुरू हुआ। मुगल स्थापत्य और कला की तरह ही फ़र्नीचर में भी भव्यता, संतुलन और अलंकरण पर विशेष ध्यान दिया गया। गहरे रंग की दृढ़ लकड़ियाँ, हड्डी और हाथी दाँत की जड़ाई, शीशों का प्रयोग और जटिल नक्काशी इस दौर की प्रमुख विशेषताएँ रहीं। लेखन मेज़, टेबल, दीवान और आरामदायक आसनों का प्रचलन बढ़ा। लखनऊ जैसे शहर, जहाँ मुगल और बाद में नवाबी संस्कृति का गहरा प्रभाव रहा, वहाँ यह शैली फ़र्नीचर के डिज़ाइनों में आज भी दिखाई देती है। यही कारण है कि लखनऊ के पारंपरिक फ़र्नीचर में शाही ठाठ और नज़ाकत का अहसास बना रहता है। यूरोपीय प्रभाव और इंडो-यूरोपीय फ़र्नीचर शैलियों का विकास 1500 के बाद भारत में पुर्तगाली, डच, फ़्रांसीसी और अंततः अंग्रेज़ों का आगमन हुआ। जब ये यूरोपीय समुदाय भारत में बसे, तो उन्हें अपने रहन-सहन के अनुसार फ़र्नीचर की आवश्यकता पड़ी। उन्होंने भारतीय कारीगरों से वही डिज़ाइन तैयार करने को कहा, जिनका उपयोग वे यूरोप में करते थे, लेकिन स्थानीय लकड़ी और कारीगरी के साथ। इससे भारतीय और यूरोपीय शैलियों का अद्भुत संगम देखने को मिला। गोवानीज़ (Goanese), इंडो-डच (Indo-Dutch) और एंग्लो-इंडियन (Anglo-Indian) जैसी फ़र्नीचर शैलियाँ इसी प्रक्रिया से विकसित हुईं। इन शैलियों में यूरोपीय ढाँचा, लेकिन भारतीय नक्काशी और सजावटी तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। यह दौर भारतीय फ़र्नीचर को वैश्विक प्रभावों से जोड़ने वाला साबित हुआ।
भारतीय फ़र्नीचर में नक्काशी, जड़ाई और सामग्री का महत्व भारतीय फ़र्नीचर की सबसे बड़ी पहचान उसकी उत्कृष्ट नक्काशी और जड़ाई है। सागौन और आबनूस जैसी मज़बूत लकड़ियों का उपयोग इसे टिकाऊ बनाता है, जबकि हाथी दाँत, हड्डी और धातु की जड़ाई इसे विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करती है। पुष्प आकृतियाँ, ज्यामितीय पैटर्न और धार्मिक प्रतीक फ़र्नीचर को केवल उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि कला का रूप देते हैं। लखनऊ के कई पुराने घरों और हवेलियों में आज भी ऐसी कारीगरी के उदाहरण मिलते हैं, जो बीते समय की शिल्प परंपरा की गवाही देते हैं। यही कारीगरी भारतीय फ़र्नीचर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाती है। पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर जो आज फिर से लोकप्रिय हो रहे हैं आधुनिक जीवनशैली के बावजूद, पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर आज फिर से लोगों की पसंद बन रहा है। बाजोट पूजा और सजावट दोनों के लिए उपयोगी है और छोटे घरों में बहुउद्देशीय फ़र्नीचर की तरह काम करता है। प्राचीन सागौन की अलमारियाँ अब केवल भंडारण नहीं, बल्कि घर की शोभा बढ़ाने वाला तत्व बन गई हैं। रंग-बिरंगे कपड़ों से सजे भारतीय ओटोमन छोटे कमरों में अतिरिक्त बैठने की जगह प्रदान करते हैं। दीवान आज भी भारतीय घरों में आराम, संवाद और परंपरा का प्रतीक बना हुआ है, जबकि लकड़ी की जालियाँ आधुनिक घरों में भी निजता और सौंदर्य का संतुलन बनाए रखती हैं। इस प्रकार, पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर लखनऊ के घरों में न केवल अतीत की यादें संजोता है, बल्कि आधुनिक जीवन को सांस्कृतिक गहराई और विशिष्ट पहचान भी प्रदान करता है।
क्यों लखनऊ के किले, इमामबाड़ा और सिकंदर बाग आज भी हमारे इतिहास की धड़कन हैं?
लखनऊवासियों, आपका शहर अपनी नज़ाकत भरी तहज़ीब, शायरी और स्वाद के साथ-साथ अपने भव्य किलों और ऐतिहासिक इमारतों के लिए भी जाना जाता है। नवाबी दौर की यह धरती आज भी उन दीवारों, बुर्जों और गलियारों के ज़रिये अपने अतीत की कहानियाँ सुनाती है, जहाँ कभी सत्ता के फैसले लिए गए, युद्ध लड़े गए और कला व संस्कृति ने नया रूप पाया। लखनऊ की स्थापत्य विरासत केवल देखने की चीज़ नहीं है, बल्कि यह शहर की पहचान, आत्मसम्मान और ऐतिहासिक चेतना का हिस्सा है। इन्हीं इमारतों के माध्यम से हम समझ पाते हैं कि लखनऊ कैसे एक साधारण शहर से इतिहास, वीरता और शिल्पकला का जीवंत प्रतीक बना। आज के इस लेख में हम लखनऊ के इतिहास के पाँच दिलचस्प पहलुओं को छोटी-सी, आसान भाषा में समझेंगे। पहले जानेंगे कि लखनऊ के किले क्यों इतने ख़ास हैं और नवाबी-मुगल दौर में उनकी क्या भूमिका थी। फिर देखेंगे कि एक किले की दीवारें, गढ़, बुर्ज और खाइयाँ कैसे उसकी रक्षा की रीढ़ बनती थीं। इसके बाद बड़ा इमामबाड़ा की अनोखी बिना-सहारे वाली वास्तुकला और उसकी रहस्यमयी भूलभुलैया की कहानी पर नज़र डालेंगे। फिर सिकंदर बाग की उस वीरता भरी दास्तान को महसूस करेंगे, जहाँ 1857 के नायकों ने लड़कर इतिहास लिखा। और अंत में समझेंगे कि ये ऐतिहासिक इमारतें आज भी लखनऊ की पहचान, संस्कृति और गर्व को कैसे संभाले हुए हैं।
लखनऊ के किलों और ऐतिहासिक स्थापत्य की महत्ता लखनऊ के किले और ऐतिहासिक इमारतें सिर्फ ईंट-पत्थरों के ढांचे नहीं हैं - ये शहर की धड़कन, पहचान और स्मृतियाँ हैं। इन किलों में वह अतीत बसता है जिसने लखनऊ की तहज़ीब, राजनीति और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को आकार दिया। नवाबी और मुगल शासनकाल के दौरान इन स्थापनाओं का निर्माण सिर्फ सुरक्षा के उद्देश्य से नहीं हुआ था, बल्कि वे शक्ति, समृद्धि, कलात्मक रुचि और शासन की प्रतिष्ठा के प्रतीक भी थे। बड़ा इमामबाड़ा, सिकंदर बाग, रेज़िडेंसी (residency) और कई अन्य इमारतें आज भी उस दौर की वास्तुकला की कुशलता और सौंदर्यबोध का प्रमाण हैं। हर दीवार, हर मेहराब, हर गलियारा उस समय के युद्धों, सियासी फैसलों, सांस्कृतिक आयोजनों और शिल्पकारों की अद्भुत कला का दर्पण है। इन्हें देखकर आज भी लखनऊवासी अपने इतिहास से गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं।
किले की संरचना: रक्षा, रणनीति और वास्तुकला की मूल विशेषताएँ मध्यकालीन किले एक गहरी रणनीतिक सूझबूझ और सटीक इंजीनियरिंग के साथ बनाए जाते थे। इनकी ऊँची और मजबूत दीवारें दुश्मनों का सबसे पहला अवरोध होती थीं, जबकि प्राचीर सैनिकों को सुरक्षित चलते हुए युद्ध संचालन करने का रास्ता प्रदान करती थीं। इसी के साथ गढ़, यानी दीवार के बाहर निकला हुआ सुदृढ़ ढांचा, सैनिकों को विभिन्न दिशाओं से हमला करने की शक्ति देता था। किलों के चारों ओर बनी खाइयाँ अक्सर गहरी और चौड़ी होती थीं, ताकि आक्रांताओं के लिए किले की दीवार तक पहुँचना लगभग असंभव हो जाए - कुछ जगहों पर इन्हें और भी भयावह बनाने के लिए मगरमच्छ या अन्य खतरनाक जीव भी छोड़े जाते थे। किलों के भव्य गेट सिर्फ प्रवेश-द्वार नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का माध्यम भी थे। इनके ऊपर अक्सर नक्काशी, धातु की कारीगरी और मज़बूत लकड़ी - लोहा लगा होता था। ऊँचेवॉच टावर दूर तक निगरानी रखने के लिए बनाए जाते थे, जबकि प्राचीर के किनारे बनी पैरापेट (Parapets), मेरलॉन (merlons) और क्रेनेल (crenels) सैनिकों को सुरक्षित खड़े होकर हमला करने की सुविधा देती थीं। बुर्ज किले की दीवारों से बाहर निकले ऊँचे टॉवर थे, जहाँ से तोप और बंदूकें चलाई जाती थीं। इन सभी संरचनाओं का संयोजन एक किले को अभेद्य, शक्तिशाली और कलात्मक बनाता था - और यही विशेषताएँ लखनऊ के ऐतिहासिक स्थलों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।
बड़ा इमामबाड़ा: वास्तुकला का चमत्कार और लखनऊ का गौरव बड़ा इमामबाड़ा, जिसे असफ़ी इमामबाड़ा भी कहा जाता है, लखनऊ की ऐतिहासिक और वास्तु विरासत का सबसे शानदार प्रमाण है। 18वीं शताब्दी में नवाब आसफ़-उद-दौला द्वारा बनवाई गई इस इमारत का सबसे अद्भुत पहलू इसका मुख्य हॉल है - जिसमें एक भी पिलर या बीम नहीं है, फिर भी यह दुनिया की सबसे विशाल मेहराबदार संरचनाओं में शुमार है। यह इंजीनियरिंग का ऐसा चमत्कार है जिसकी मिसाल दुनिया में बहुत कम मिलती है। इस इमारत का सबसे रोचक हिस्सा भूलभुलैया है, जिसमें 489 एक जैसे दरवाज़े हैं। तंग गलियारे और मोड़-घुमाव इस तरह बनाए गए हैं कि कोई भी आसानी से दिशा भ्रमित हो सकता है। बताया जाता है कि यह भूलभुलैया सुरक्षा व्यवस्था, प्राकृतिक ठंडक और घुसपैठियों को भ्रमित करने के उद्देश्य से बनाई गई थी। बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण सिर्फ वास्तुकला की दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवता की भावना से भी महान है - 1784 के अकाल के समय इस परियोजना ने हज़ारों लोगों को रोज़गार देकर उनकी आजीविका बचाई थी। इस परिसर का रूमी दरवाज़ा, अपनी तुर्की शैली की नक्काशी और विशाल मेहराब के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध है। धार्मिक दृष्टि से भी यह स्थल अत्यंत महत्व रखता है, जहाँ विशेषकर मुहर्रम के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं। इस प्रकार, बड़ा इमामबाड़ा इतिहास, कला और अध्यात्म का एक अद्वितीय संगम है।
सिकंदर बाग: कला, संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक सिकंदर बाग लखनऊ के इतिहास में एक ऐसी जगह है जहाँ सौंदर्य और बलिदान दोनों एक साथ दर्ज हैं। नवाब वाजिद अली शाह ने इसे अपनी प्रिय पत्नी सिकंदर बेगम के लिए एक सुंदर उद्यान और विश्रामस्थल के रूप में बनवाया था। इसकी वास्तुकला, मस्जिदें और हरियाली उस समय की नवाबी शान को दर्शाती हैं। लेकिन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह शांत उद्यान अचानक एक भीषण युद्धस्थल में बदल गया। ब्रिटिश सेना ने यहाँ हमला किया और लगभग 2,000 भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने अद्भुत साहस दिखाते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया। इस युद्ध में उदा देवी, एक वीर दलित महिला योद्धा, ने अकेले कई अंग्रेज़ सैनिकों को मार गिराया था। उनकी बहादुरी आज भी प्रेरणा देती है। आज का सिकंदर बाग उस संघर्ष, बलिदान और देशभक्ति का जीवंत स्मारक है। इसकी दीवारें सिर्फ ईंटें नहीं, बल्कि उन शहीदों की यादें संभाले हुए हैं जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए।
लखनऊ की ऐतिहासिक संरचनाएँ: अतीत की कहानियाँ और सांस्कृतिक पहचान लखनऊ की असंख्य ऐतिहासिक इमारतें - किले, महल, मस्जिदें, उद्यान और तोपखाने - शहर के समृद्ध अतीत की जीवंत गाथाएँ हैं। इनमें युद्धों की रणनीति, नवाबों की जीवनशैली, सांस्कृतिक उत्सवों और शिल्पकला की परंपराएँ छिपी हुई हैं। आज ये इमारतें केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक संरक्षण का माध्यम बन चुकी हैं। वे लखनऊ की पहचान को मजबूत करती हैं और हमें यह याद दिलाती हैं कि यह शहर सिर्फ वर्तमान में नहीं, बल्कि एक ऐसे गौरवशाली इतिहास में भी सांस लेता है जिसे दुनिया सलाम करती है।
लखनऊ की बदलती ज़िंदगी और बढ़ता ई-वेस्ट:तकनीक की सुविधा और पर्यावरण की चुनौती
लखनऊवासियों, तेज़ी से बदलती तकनीक और बढ़ते डिजिटल उपयोग ने हमारे जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है, लेकिन इसके साथ एक गंभीर समस्या भी सामने आई है - इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट, यानी ई-वेस्ट (e-waste)। पुराने मोबाइल, लैपटॉप, टीवी, बैटरियाँ और घरेलू उपकरण आज हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं और इनके बेकार हो जाने के बाद उनका सही तरीके से निपटान न होना एक बड़ी चिंता बनता जा रहा है। भारत के अन्य शहरों की तरह लखनऊ भी इस बढ़ते ई-वेस्ट संकट से अछूता नहीं है, जिससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम लगातार बढ़ते जा रहे हैं। आज इस लेख में हम भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट की बढ़ती समस्या को समझेंगे। इसके बाद जानेंगे कि ई-वेस्ट के साथ कितनी कीमती धातुएँ नष्ट हो रही हैं। फिर हम उन शहरों पर नज़र डालेंगे जहाँ सबसे ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है। आगे, इसके पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की चर्चा करेंगे। इसके साथ ही, ई-वेस्ट के विभिन्न प्रकारों को समझेंगे और अंत में भारत में इसके पुनर्चक्रण की प्रक्रिया पर विस्तार से बात करेंगे।
भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट की बढ़ती समस्या भारत आज दुनिया के सबसे बड़े इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट उत्पादकों में गिना जाने लगा है और हर साल लाखों टन ई-वेस्ट उत्पन्न कर रहा है। बीते कुछ वर्षों में इस कचरे की मात्रा में तेज़ी से वृद्धि दर्ज की गई है, जिसका मुख्य कारण उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का बढ़ता उपयोग और उनके जीवनकाल का लगातार कम होते जाना है। मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप, टीवी और घरेलू उपकरण अब जल्दी पुराने हो जाते हैं, जिससे कचरे की समस्या और गंभीर होती जा रही है। तेज़ी से शहरीकरण कर रहे शहरों में भी यह स्थिति साफ़ दिखाई देती है। यहाँ बढ़ती आबादी, डिजिटल निर्भरता और आधुनिक जीवनशैली के कारण इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खपत लगातार बढ़ रही है, जिससे ई-वेस्ट की मात्रा में भी निरंतर इज़ाफ़ा हो रहा है। अब यह समस्या केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मध्यम आकार के शहरों में भी ई-वेस्ट का प्रभावी प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन चुका है। इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के साथ नष्ट हो रही कीमती धातुएँ इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का सही ढंग से पुनर्चक्रण न होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसके साथ कई बहुमूल्य धातुएँ भी बेकार चली जाती हैं। पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में सोना, चांदी, तांबा, एल्युमिनियम (aluminum) और प्लास्टिक जैसी कीमती सामग्रियाँ मौजूद होती हैं, जिनका दोबारा उपयोग किया जा सकता है। भारत में हर साल ई-वेस्ट के ज़रिये अरबों रुपये मूल्य की ये धातुएँ नष्ट हो जाती हैं, जो सीधे-सीधे आर्थिक क्षति का कारण बनती हैं। इसके अलावा, जब ये धातुएँ पुनः प्राप्त नहीं की जातीं, तो नई धातुओं की आपूर्ति के लिए खनन गतिविधियाँ बढ़ानी पड़ती हैं, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचता है।
भारत में सबसे अधिक इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न करने वाले शहर भारत में इलेक्ट्रॉनिक कचरे का सबसे अधिक उत्पादन बड़े शहरी केंद्रों में देखा जाता है। विभिन्न उद्योग संगठनों की रिपोर्टों के अनुसार, मुंबई, दिल्ली और बैंगलोर जैसे शहर ई-वेस्ट उत्पादन में सबसे आगे हैं। इन शहरों में आईटी उद्योग, कॉर्पोरेट कार्यालयों की अधिक संख्या और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स का व्यापक उपयोग इसकी प्रमुख वजह है। हालाँकि, यह समस्या केवल इन महानगरों तक सीमित नहीं रही है। शहरों में भी जैसे-जैसे तकनीक का उपयोग बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ई-वेस्ट की मात्रा भी बढ़ती जा रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि आने वाले समय में छोटे और मध्यम शहरों को भी इस चुनौती के लिए तैयार रहना होगा। इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का अनुचित निपटान पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इसमें मौजूद भारी धातुएँ - जैसे सीसा, पारा और कैडमियम (Cadmium) - मिट्टी और जल स्रोतों में मिलकर उन्हें प्रदूषित कर सकती हैं। इससे कृषि भूमि की उर्वरता घटती है और पीने के पानी की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। यदि ई-वेस्ट को जलाया जाए या अनधिकृत तरीकों से नष्ट किया जाए, तो डाइऑक्सिन (Dioxin) और फ्यूरान (Furan) जैसी विषैली गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण को बढ़ाती हैं। इन रसायनों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से तंत्रिका तंत्र, गुर्दे, लीवर और यहाँ तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का ख़तरा भी बढ़ सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के विभिन्न प्रकार और उनके स्रोत इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट केवल मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा कहीं अधिक व्यापक है। इसमें बड़े घरेलू उपकरण - जैसे फ्रिज, वॉशिंग मशीन और ओवन (oven) - के साथ-साथ स्पीकर्स, साउंड सिस्टम (sound system), मेडिकल उपकरण, एलईडी लाइटें (LED lights), बैटरियाँ, वायरिंग, सौर ऊर्जा प्रणालियाँ और यहाँ तक कि बच्चों के इलेक्ट्रॉनिक खिलौने भी शामिल हैं। इन सभी उपकरणों में कई उपयोगी लेकिन खतरनाक सामग्रियाँ मौजूद होती हैं, जिन्हें यदि सामान्य कचरे के साथ फेंक दिया जाए, तो वे पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं। इसलिए इनका अलग से संग्रह और निपटान बेहद आवश्यक है। भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पुनर्चक्रण की प्रक्रिया भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पुनर्चक्रण की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले, ई-वेस्ट का संग्रह और परिवहन किया जाता है, जिसके तहत इलेक्ट्रॉनिक कचरे को विशेष केंद्रों तक पहुँचाया जाता है। इसके बाद श्रेडिंग (shredding), छंटाई और पृथक्करण की प्रक्रिया से प्लास्टिक, धातु और कांच जैसी सामग्रियों को अलग-अलग किया जाता है। इन सभी चरणों के पूरा होने के बाद प्राप्त कच्चा माल दोबारा उपयोग के लिए तैयार किया जाता है और उसे नई इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं या अन्य उत्पादों के निर्माण में लगाया जा सकता है। इस तरह का संगठित और वैज्ञानिक पुनर्चक्रण न केवल पर्यावरण की रक्षा करता है, बल्कि आर्थिक रूप से भी लाभकारी साबित होता है और संसाधनों के संरक्षण में मदद करता है।
आइए याद करें, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का साहसिक नेतृत्व और योगदान
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ!
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक आंदोलनों और पुरुष नेताओं की गाथा नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य महिलाओं के साहस, त्याग और अदम्य संकल्प की कहानी भी है, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए हर प्रकार के सामाजिक और व्यक्तिगत बंधनों को तोड़ा। ऐसे समय में, जब महिलाओं की भूमिका प्रायः घरेलू दायरे तक सीमित मानी जाती थी, उन्होंने आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर नेतृत्व किया, जेल यात्राएँ कीं, अत्याचार सहे और कई बार अपने प्राणों की आहुति तक दे दी। उनका योगदान स्वतंत्र भारत की नींव का वह मजबूत आधार है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। इस व्यापक संघर्ष में 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ, जिसमें अवध और उसकी राजधानी लखनऊ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में महिला नेतृत्व और जनसहभागिता ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। इस लेख में हम सबसे पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं के समग्र योगदान को समझेंगे और यह जानेंगे कि उन्होंने किन-किन रूपों में आंदोलन को मजबूत किया। इसके बाद, हम 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में लखनऊ और अवध की निर्णायक भूमिका पर चर्चा करेंगे, जहाँ संगठित जनप्रतिरोध ने अंग्रेज़ी सत्ता को हिला दिया। आगे, हम बेगम हज़रत महल के नेतृत्व, उनके सैन्य और प्रशासनिक प्रयासों तथा ब्रिटिश सत्ता को दी गई खुली चुनौती को विस्तार से जानेंगे। अंत में, हम रानी लक्ष्मीबाई, सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी और अन्य प्रमुख महिला स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान के माध्यम से यह समझेंगे कि भारतीय लोकतंत्र और गणतंत्र की नींव महिलाओं के संघर्ष और बलिदान से कैसे मजबूत हुई।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का समग्र योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल राजनीतिक आंदोलनों, क्रांतियों और पुरुष नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत महिलाओं की कहानी भी है, जिन्होंने सामाजिक बंधनों, पारिवारिक जिम्मेदारियों और औपनिवेशिक दमन के बीच खड़े होकर आज़ादी की मशाल को जलाए रखा। जब देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब महिलाओं ने केवल समर्थनकर्ता की भूमिका नहीं निभाई, बल्कि वे आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़ी रहीं। उन्होंने जेल यात्राएँ कीं, लाठियाँ खाईं, अपने परिवारों को त्यागा और कई बार अपने प्राणों की आहुति भी दी। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के भारत में, जब महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रखने की सामाजिक प्रवृत्ति प्रबल थी, तब उनका स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल होना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी केंद्रों तक, महिलाओं ने सभाओं, जुलूसों, सत्याग्रहों और सशस्त्र आंदोलनों में भाग लिया। उन्होंने धन संग्रह, गुप्त संदेशों के आदान-प्रदान, शरण देने और घायल क्रांतिकारियों की देखभाल जैसे अनेक कार्यों के माध्यम से आंदोलन को मजबूत आधार प्रदान किया।
1857 के विद्रोह में लखनऊ और अवध की निर्णायक भूमिका 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास का वह मोड़ था, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव को हिला दिया। इस विद्रोह में अवध और विशेष रूप से लखनऊ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। अवध न केवल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र था, बल्कि राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से भी अंग्रेजों के लिए अत्यंत आकर्षक था। जब अंग्रेजों ने कूटनीतिक चालों के माध्यम से नवाब वाजिद अली शाह को पदच्युत कर अवध पर कब्ज़ा किया, तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि स्थानीय जनता की अस्मिता और स्वाभिमान पर सीधा आघात था। लखनऊ उस समय प्रतिरोध का प्रमुख केंद्र बन गया। यहां सैनिक, ज़मींदार, धार्मिक नेता और आम नागरिक—सब ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला। छावनियों में विद्रोह भड़का, सरकारी प्रतिष्ठानों पर कब्ज़ा किया गया और अंग्रेजी सत्ता को लगभग समाप्त कर दिया गया। यह विद्रोह केवल सैन्य नहीं था, बल्कि यह एक जनांदोलन का रूप ले चुका था, जिसमें महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही।
बेगम हज़रत महल
बेगम हज़रत महल: 1857 के संग्राम की अग्रणी महिला नेता बेगम हज़रत महल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उन दुर्लभ महिला नेताओं में से थीं, जिन्होंने न केवल विद्रोह में भाग लिया, बल्कि उसका नेतृत्व भी किया। वाजिद अली शाह के निष्कासन के बाद उन्होंने परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का मार्ग चुना। उन्होंने लखनऊ में विद्रोह को संगठित किया और अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी। बेगम हज़रत महल का नेतृत्व केवल भावनात्मक नहीं था, बल्कि अत्यंत व्यावहारिक और रणनीतिक भी था। उन्होंने सैनिकों को संगठित किया, हथियारों और संसाधनों की व्यवस्था की और जनता में देशभक्ति की भावना को प्रबल किया। उनके नेतृत्व में लखनऊ कुछ समय के लिए पूरी तरह अंग्रेजों के नियंत्रण से मुक्त हो गया। यह एक असाधारण उपलब्धि थी, विशेषकर उस समय की सामाजिक परिस्थितियों में, जब महिला नेतृत्व की कल्पना भी दुर्लभ थी।
रानी लक्ष्मीबाई
ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध और शासन व्यवस्था बेगम हज़रत महल ने केवल युद्ध ही नहीं लड़ा, बल्कि एक वैकल्पिक स्वदेशी शासन की भी स्थापना की। बेगम हज़रत महल ने 7 जुलाई, 1857 को अपने पुत्र बिरजिस क़द्र को अवध का नवाब घोषित किया और उनके नाम पर शासन चलाया। एक उच्च स्तरीय प्रशासनिक समिति का गठन किया गया, जिसमें विभिन्न वर्गों और समुदायों के प्रतिनिधि शामिल थे। यह शासन व्यवस्था न्याय, स्थानीय सहभागिता और स्वदेशी मूल्यों पर आधारित थी। उन्होंने अंग्रेजों की नीतियों को वैचारिक स्तर पर भी चुनौती दी। महारानी विक्टोरिया की घोषणाओं को अस्वीकार करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि विदेशी शासन किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। हालांकि अंततः अंग्रेजों की आधुनिक सैन्य शक्ति के सामने उन्हें पीछे हटना पड़ा और नेपाल जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। उनके लिए स्वतंत्रता विलासिता से कहीं अधिक मूल्यवान थी।
कस्तूरबा गांधी
राष्ट्रीय आंदोलन में अन्य प्रमुख महिला स्वतंत्रता सेनानियाँ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बेगम हज़रत महल अकेली नहीं थीं। देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक महिलाओं ने अपने-अपने स्तर पर संघर्ष किया। रानी लक्ष्मीबाई ने युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त कर साहस की अमर गाथा लिखी। सरोजिनी नायडू ने महिलाओं को राजनीतिक मंच प्रदान किया और राष्ट्रीय आंदोलनों का नेतृत्व किया। कस्तूरबा गांधी ने सत्याग्रह और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई, जबकि कमला नेहरू ने सविनय अवज्ञा और ‘नो टैक्स’ आंदोलनों को दिशा दी। अरुणा आसफ अली ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय ध्वज फहराकर युवाओं को प्रेरित किया। उषा मेहता ने गुप्त रेडियो के माध्यम से आंदोलन की आवाज़ को जन-जन तक पहुँचाया। सावित्रीबाई फुले और कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने शिक्षा और समाज सुधार के जरिए स्वतंत्रता की चेतना को गहराई दी।
सरोजिनी नायडू
स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और महिलाओं का ऐतिहासिक महत्व भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की विरासत केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना की भी कहानी है। इस विरासत में महिलाओं का योगदान केंद्रीय स्थान रखता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि साहस, नेतृत्व और बलिदान किसी एक लिंग तक सीमित नहीं होते। आज का भारतीय लोकतंत्र, संविधान और गणतंत्र इन्हीं संघर्षों की देन हैं। जब हम स्वतंत्र भारत में अधिकारों और समानता की बात करते हैं, तो उसके मूल में उन महिलाओं का संघर्ष निहित है, जिन्होंने आज़ादी के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया। वास्तव में, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास महिलाओं के बिना अधूरा है और उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
कॉमन मॉर्मन तितली: भारतीय बाग़ों में उड़ती सुंदरता और प्रकृति की चतुर कारीगरी
कॉमन मॉर्मन बटरफ्लाई (Common Mormon Butterfly), जिसे वैज्ञानिक रूप से पैपिलियो पॉलीटेस (Papilio polytes) कहा जाता है, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाई जाने वाली एक बड़ी और आकर्षक तितली प्रजाति है। भारत में यह तितली आमतौर पर बगीचों, पार्कों और फूलों से भरे खुले क्षेत्रों में आसानी से देखी जा सकती है। यह लैंटाना (Lantana), इक्सोरा (Ixora) और गुड़हल जैसे विभिन्न फूलों के रस पर निर्भर रहती है, जिससे इसका पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसके काले पंखों पर बने सफेद धब्बे इसे बेहद सुंदर और पहचानने योग्य बनाते हैं।
कॉमन मॉर्मन तितली के नर और मादा के स्वरूप में स्पष्ट अंतर देखा जाता है। नर तितली के पंख काले होते हैं जिन पर सफेद धब्बे और लंबी पूंछ जैसी संरचना होती है, जबकि मादा तितली के पंख भी काले और सफेद धब्बों वाले होते हैं, लेकिन उसके पिछले पंखों पर लाल रंग के छोटे-छोटे धब्बे भी पाए जाते हैं। यह तितली एक मजबूत उड़ान भरने वाली प्रजाति है और अक्सर ऊँचाई पर उड़ती हुई दिखाई देती है।
इस तितली की एक खास विशेषता इसका अद्भुत बचाव व्यवहार है। इसके कैटरपिलर (caterpillar - कमला) का आकार और रंग पक्षियों की बीट जैसा दिखता है, जिससे शिकारी इसे पहचान नहीं पाते और यह सुरक्षित रहता है। यह प्राकृतिक नकल (मिमिक्री - mimicry) इसे शिकारियों से बचाने में मदद करती है। अपनी सुंदरता, अनोखे व्यवहार और व्यापक उपस्थिति के कारण कॉमन मॉर्मन तितली भारतीय जैव विविधता की एक महत्वपूर्ण और रोचक कड़ी मानी जाती है।
लखनऊवासियों, पराक्रम दिवस पर आइए नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन को जानें
लखनऊवासियों, हमारा शहर अपनी तहज़ीब, गहरी सोच और ऐतिहासिक चेतना के लिए जाना जाता है। यहाँ जब भी किसी महान व्यक्तित्व को याद किया जाता है, तो वह केवल औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं होती, बल्कि आत्मचिंतन का एक सजीव अवसर बन जाती है। आज का दिन भी ऐसा ही है। आज हम पराक्रम दिवस मना रहे हैं, जो भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत की स्वतंत्रता केवल विचारों और भाषणों से नहीं मिली, बल्कि साहसिक निर्णयों, अनुशासन और असंख्य बलिदानों से संभव हुई। नेताजी का जीवन इसी पराक्रम का प्रतीक है। उनका संघर्ष, उनकी दृष्टि और उनका नेतृत्व आज भी हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हम अपने कर्तव्यों और देश के प्रति ज़िम्मेदारी को कितनी गंभीरता से निभा रहे हैं। आज हम सबसे पहले यह जानेंगे कि पराक्रम दिवस क्यों मनाया जाता है और इसका वास्तविक महत्व क्या है। इसके बाद हम नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रारंभिक जीवन पर नज़र डालेंगे, जहाँ से उनके विचारों और साहस की नींव पड़ी। फिर हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को समझेंगे और यह जानेंगे कि उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व किस प्रकार किया। अंत में, हम उन मूल्यों और सीखों पर चर्चा करेंगे जो नेताजी ने अपने जीवन से हमें दीं और जो आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।पराक्रम दिवस क्यों मनाया जाता है पराक्रम दिवस केवल एक महान नेता की जयंती मनाने का दिन नहीं है। यह उस निडर सोच और साहसिक दृष्टिकोण का स्मरण है जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। नेताजी का मानना था कि स्वतंत्रता के लिए केवल प्रतीक्षा करना या याचिकाएँ देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए दृढ़ निश्चय, अनुशासन और संगठित प्रयास आवश्यक हैं। पराक्रम दिवस हमें यह याद दिलाता है कि राष्ट्रहित के लिए व्यक्तिगत सुख, पद और प्रतिष्ठा का त्याग करना ही सच्चा साहस है। यह दिन विशेष रूप से युवाओं को प्रेरित करता है कि वे कठिन परिस्थितियों से घबराएँ नहीं, बल्कि उन्हें बदलने का संकल्प लें।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का प्रारंभिक जीवन सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक में हुआ। बचपन से ही उनमें अनुशासन, आत्मसम्मान और देशप्रेम की भावना स्पष्ट दिखाई देती थी। वे पढ़ाई में अत्यंत मेधावी थे और उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की कठिन परीक्षा भी उत्तीर्ण की। उस समय यह सेवा सम्मान, स्थिरता और शक्ति का प्रतीक मानी जाती थी, लेकिन नेताजी के लिए यह सब देश की आज़ादी से बड़ा नहीं था। ब्रिटिश शासन के अधीन कार्य करना उन्हें स्वीकार नहीं था, इसलिए उन्होंने एक सुरक्षित और उज्ज्वल भविष्य को त्यागकर स्वतंत्रता संग्राम का कठिन मार्ग चुना।यह निर्णय दर्शाता है कि नेताजी केवल विचारों के नेता नहीं थे, बल्कि अपने विचारों को जीवन में उतारने का साहस भी रखते थे। प्रारंभिक जीवन में किए गए त्याग और संघर्ष ने आगे चलकर उनके पूरे नेतृत्व को मज़बूत आधार प्रदान किया।स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी का योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी का योगदान विशिष्ट और अलग था। वे मानते थे कि केवल सभाओं, प्रस्तावों और आश्वासनों से आज़ादी प्राप्त नहीं की जा सकती। उनके अनुसार संगठित शक्ति और स्पष्ट रणनीति ही स्वतंत्रता का मार्ग खोल सकती है। इसी सोच ने उन्हें पारंपरिक रास्तों से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।नेताजी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आज़ादी का पक्ष मजबूती से रखा और यह स्पष्ट किया कि भारत की लड़ाई केवल एक उपनिवेश की समस्या नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और न्याय का प्रश्न है। उन्होंने भारतीयों के भीतर यह विश्वास जगाया कि वे स्वयं अपने भविष्य के निर्माता हैं। उनका योगदान केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी था, जिसने देशवासियों को निर्भीक और आत्मविश्वासी बनाया।
आज़ाद हिंद फ़ौज और नेताजी का नेतृत्व नेताजी का सबसे प्रभावशाली और निर्णायक योगदान आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व रहा। यह सेना केवल सशस्त्र संघर्ष का माध्यम नहीं थी, बल्कि भारतीयों के भीतर स्वाधीनता और आत्मसम्मान की चेतना जगाने का एक सशक्त प्रयास थी। नेताजी ने इस सेना में अनुशासन, समानता और राष्ट्रप्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया।उनका प्रसिद्ध आह्वान — “तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” — उस समय की जनभावनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति था। इस आह्वान ने यह स्पष्ट कर दिया कि स्वतंत्रता के लिए त्याग अनिवार्य है। आज़ाद हिंद फ़ौज ने यह सिद्ध किया कि भारतीय स्वयं संगठित होकर अपने देश के लिए बलिदान देने को तैयार हैं, और यही भावना स्वतंत्रता संग्राम को नई शक्ति प्रदान करती है।
नेताजी से मिलने वाली सीख नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जीवन आज भी हमें कई महत्वपूर्ण सीख देता है। उनकी पहली सीख साहस की है, यानी कठिन परिस्थितियों में भी सही और दृढ़ निर्णय लेने की क्षमता। दूसरी सीख अनुशासन से जुड़ी है, क्योंकि बिना अनुशासन के कोई भी आंदोलन या उद्देश्य सफल नहीं हो सकता। तीसरी सीख नेतृत्व की है, जहाँ नेताजी ने यह दिखाया कि सच्चा नेतृत्व आदेश देने से नहीं, बल्कि स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करने से बनता है।सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि राष्ट्रहित को हमेशा व्यक्तिगत हित से ऊपर रखा जाना चाहिए। उनका जीवन यह भी सिखाता है कि जब लक्ष्य स्पष्ट हो और संकल्प अडिग हो, तो सबसे कठिन परिस्थितियाँ भी बदली जा सकती हैं।
आज के समय में पराक्रम दिवस का महत्व आज के समय में पराक्रम दिवस हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। यह दिन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम अपनी स्वतंत्रता, अपने अधिकारों और अपने कर्तव्यों को कितनी गंभीरता से लेते हैं। नेताजी के विचार आज भी हमें साहस, ज़िम्मेदारी और कर्मठता की प्रेरणा देते हैं। यह दिवस केवल अतीत का स्मरण नहीं करता, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शन प्रदान करता है।
लखनऊ में बसंत पंचमी: ऋतुओं का उत्सव और पीले रंग की सांस्कृतिक कहानी
लखनऊवासियों, जैसे ही माघ माह की पंचमी आती है, शहर की फ़िज़ाओं में एक अलग ही उल्लास घुल जाता है। ठंड की विदाई और हल्की गर्माहट के साथ बसंत पंचमी का आगमन लखनऊ में सिर्फ़ एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और आस्था का सुंदर संगम बन जाता है। इस दिन सरसों के पीले फूल, खिलती फसलें और सुहावना मौसम यह संकेत देते हैं कि बसंत ऋतु ने दस्तक दे दी है। यही वजह है कि लखनऊ में बसंत पंचमी को पूरे श्रद्धा और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया जाता है। आज इस लेख में हम जानेंगे कि बसंत पंचमी का समय और ऋतु परिवर्तन से क्या संबंध है। इसके बाद सरस्वती पूजा के धार्मिक महत्व को समझेंगे। फिर पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं पर चर्चा करेंगे। आगे, भारत और पड़ोसी देशों में मनाए जाने वाले बसंत पंचमी के विविध रूपों को जानेंगे। साथ ही, पीले रंग के महत्व, पारंपरिक व्यंजनों और इस पर्व से जुड़ी सामाजिक परंपराओं को क्रमबद्ध रूप से समझेंगे।
बसंत पंचमी का पर्व: समय, ऋतु परिवर्तन और सांस्कृतिक महत्व बसंत पंचमी हर वर्ष माघ माह की पंचमी तिथि को मनाई जाती है और इसे बसंत ऋतु के औपचारिक आगमन का प्रतीक माना जाता है। इस समय मौसम में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देने लगता है—कड़ाके की ठंड धीरे-धीरे विदा लेने लगती है और वातावरण में हल्की गर्माहट के साथ नई ऊर्जा का संचार होता है। लखनऊ जैसे उत्तर भारतीय शहरों में यह बदलाव प्रकृति के रंगों में साफ़ झलकता है, जहाँ खेतों में फसलें लहलहाने लगती हैं, पेड़-पौधों में नई कोपलें फूटने लगती हैं और चारों ओर जीवन का उत्साह महसूस होता है। सांस्कृतिक दृष्टि से बसंत पंचमी केवल एक ऋतु परिवर्तन का पर्व नहीं है, बल्कि यह जीवन में नई शुरुआत, आशा और सकारात्मकता का प्रतीक भी माना जाता है। यही कारण है कि इस दिन को होली जैसे बड़े पर्व की तैयारियों की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है, जिससे यह त्योहार भारतीय सांस्कृतिक कैलेंडर में विशेष स्थान रखता है।
सरस्वती पूजा और बसंत पंचमी का धार्मिक महत्व बसंत पंचमी को सरस्वती पूजा के रूप में मनाने की परंपरा भारत में व्यापक रूप से प्रचलित है। देवी सरस्वती को ज्ञान, संगीत, कला और बुद्धि की देवी माना जाता है, इसलिए यह दिन विशेष रूप से शिक्षा और रचनात्मकता से जुड़ा हुआ है। लखनऊ में इस अवसर पर विद्यालयों, कॉलेजों, पुस्तकालयों और घरों में सरस्वती पूजा का आयोजन किया जाता है, जहाँ विद्यार्थी और शिक्षक देवी से विद्या, विवेक और सफलता का आशीर्वाद माँगते हैं। यह मान्यता गहराई से जुड़ी हुई है कि बसंत पंचमी के दिन की गई पूजा से ज्ञान का प्रकाश जीवन में स्थायी रूप से बना रहता है। इसी विश्वास के चलते कई परिवार इस दिन बच्चों की पढ़ाई की शुरुआत करते हैं, जिससे यह पर्व शिक्षा और संस्कारों से गहरे रूप में जुड़ जाता है।
बसंत पंचमी से जुड़े पौराणिक संदर्भ और ऐतिहासिक कथाएँ हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती का जन्म हुआ था, इसलिए इस दिन ज्ञान और कला की देवी की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। कुछ कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी, जिससे यह तिथि और भी पवित्र मानी जाती है। इसके अलावा, बसंत ऋतु को प्रेम और उल्लास की ऋतु कहा जाता है, इसलिए इस दिन कामदेव और उनकी पत्नी रति की पूजा का भी वर्णन मिलता है। इन पौराणिक कथाओं ने बसंत पंचमी को केवल धार्मिक पर्व तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे भावनात्मक, सांस्कृतिक और मानवीय संवेदनाओं से भी जोड़ दिया है।
भारत और पड़ोसी देशों में बसंत पंचमी के विविध रूप भारत के विभिन्न राज्यों में बसंत पंचमी अलग-अलग रूपों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है। कहीं यह पतंगों के त्योहार के रूप में प्रसिद्ध है, तो कहीं इसे संगीत, नृत्य और फूलों के माध्यम से मनाया जाता है। लखनऊ सहित उत्तर भारत में सरस्वती पूजा और पीले वस्त्र धारण करने की परंपरा विशेष रूप से देखने को मिलती है। भारत के बाहर भी इस पर्व का प्रभाव दिखाई देता है। नेपाल और बांग्लादेश में इसे श्रद्धा और धार्मिक आस्था के साथ मनाया जाता है, जबकि इंडोनेशिया के बाली द्वीप में इसे सरस्वती के महान दिन के रूप में जाना जाता है। यह विविधताएँ दर्शाती हैं कि बसंत पंचमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव का वैश्विक प्रतीक भी है।
बसंत पंचमी में पीले रंग का प्रतीकात्मक और सांस्कृतिक महत्व बसंत पंचमी पर पीले रंग का विशेष महत्व होता है, क्योंकि यह रंग सरसों के फूलों, सूर्य के प्रकाश और नई ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी सरस्वती का प्रिय रंग भी पीला है, इसलिए इस दिन लोग पीले वस्त्र धारण करते हैं और अपने आसपास पीले रंग की सजावट करते हैं। लखनऊ में भी बसंत पंचमी के अवसर पर पीले परिधानों, सजावट और व्यंजनों का विशेष महत्व देखने को मिलता है। सांस्कृतिक रूप से पीला रंग शांति, समृद्धि, आशा और सकारात्मक सोच का प्रतीक है, जो बसंत पंचमी की भावना के साथ पूरी तरह सामंजस्य रखता है।
बसंत पंचमी के पारंपरिक व्यंजन और क्षेत्रीय खानपान बसंत पंचमी पर बनने वाले पारंपरिक व्यंजन इस पर्व की पहचान को और भी गहरा बना देते हैं। पीले चावल, खिचड़ी, बूंदी, खीर और मालपुआ जैसे व्यंजन इस दिन विशेष रूप से तैयार किए जाते हैं। कई घरों में केसरिया शीरा भी बनाया जाता है, जिसे देवी सरस्वती को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है। लखनऊ जैसे शहर में, जहाँ खानपान की समृद्ध परंपरा रही है, बसंत पंचमी के अवसर पर पारंपरिक मिठाइयों और व्यंजनों का स्वाद इस पर्व को और भी विशेष बना देता है। यह भोजन केवल स्वाद तक सीमित नहीं, बल्कि परंपरा और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा होता है।
अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के पास दरबार लगाते हुए महाराजा रणजीत सिंह, सभी लोग बसंत (पीले) वस्त्र पहने हुए।
बसंत पंचमी से जुड़ी सामाजिक परंपराएँ और शुभ कार्य बसंत पंचमी को अत्यंत शुभ दिन माना जाता है और इस दिन कई सामाजिक व धार्मिक परंपराओं का पालन किया जाता है। पवित्र नदियों में स्नान, मेलों का आयोजन और धार्मिक कार्यक्रम इस दिन की विशेष पहचान हैं। लखनऊ में भी विभिन्न स्थानों पर सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियाँ देखने को मिलती हैं। यह दिन नए कार्य की शुरुआत, विवाह, गृह प्रवेश और बच्चों की शिक्षा आरंभ करने के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। कई परिवार इस दिन बच्चों को उनके पहले अक्षर लिखवाते हैं या संगीत शिक्षा की शुरुआत करते हैं। इस प्रकार बसंत पंचमी समाज को आस्था, परंपरा और नए आरंभ का संदेश देने वाला पर्व बन जाती है।
लखनऊ में ड्रैगन फ्रूट की बढ़ती लोकप्रियता: सेहत, खेती और भविष्य की नई उम्मीद
लखनऊवासियों, हाल के वर्षों में आपने बाज़ारों, फ़लों की दुकानों और सुपरमार्केट में एक नए, गुलाबी-लाल रंग के फल की बढ़ती मौजूदगी ज़रूर महसूस की होगी। यह फल है ड्रैगन फ्रूट (dragon fruit), जो अब सिर्फ़ महानगरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लखनऊ जैसे शहरों में भी लोगों की पसंद बनता जा रहा है। बेहतर सेहत की चाह, नए स्वाद के प्रति बढ़ती रुचि और किसानों के लिए इसके लाभकारी होने ने इस फल को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। यही कारण है कि आज ड्रैगन फ्रूट केवल एक विदेशी फल नहीं, बल्कि भारत की उभरती बागवानी फ़सलों में गिना जाने लगा है। आज इस लेख में हम समझेंगे कि भारत में ड्रैगन फ्रूट की लोकप्रियता क्यों बढ़ रही है और इसमें सरकार की क्या भूमिका है। इसके बाद, हम इसके पोषण और स्वास्थ्य लाभों पर नज़र डालेंगे। आगे, ड्रैगन फ्रूट की खेती की विशेषताओं, उत्पादन और किस्मों की जानकारी लेंगे। अंत में, आयात-निर्यात, वैश्विक बाज़ार में भारत की स्थिति और किसानों की आय में इसकी भूमिका पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
भारत में ड्रैगन फ्रूट की बढ़ती लोकप्रियता और सरकारी समर्थन भारत में ड्रैगन फ्रूट की बढ़ती मांग को देखते हुए केंद्र और कई राज्य सरकारों ने इसकी खेती को बढ़ावा देने के लिए अहम कदम उठाए हैं। गुजरात और हरियाणा जैसे राज्यों की पहल के बाद केंद्र सरकार ने भी इस फल की खेती के विस्तार का निर्णय लिया। सरकार का मानना है कि इसकी लागत प्रभावशीलता, पोषण मूल्य और वैश्विक मांग को देखते हुए भारत में इसकी खेती का बड़ा भविष्य है। केंद्र सरकार राज्यों को अच्छी गुणवत्ता वाली रोपण सामग्री उपलब्ध कराने में सहयोग कर रही है और बागवानी क्षेत्र से जुड़ी योजनाओं के तहत किसानों को सहायता देने पर ज़ोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही, खेती के क्षेत्र को आने वाले वर्षों में हज़ारों हेक्टेयर तक बढ़ाने की योजना पर भी काम किया जा रहा है।
ड्रैगन फ्रूट को “सुपर फ्रूट” बनाने वाले पोषण और स्वास्थ्य लाभ ड्रैगन फ्रूट को “सुपर फ्रूट” (super fruit) कहा जाना यूँ ही नहीं है। यह फल कैलोरी (calorie) में कम होता है और आयरन (iron), कैल्शियम (calcium), पोटेशियम (potassium) और जिंक (zinc) जैसे ज़रूरी पोषक तत्वों से भरपूर होता है। मधुमेह से पीड़ित लोगों के लिए भी इसे लाभकारी माना जाता है, क्योंकि इसमें शर्करा की मात्रा संतुलित होती है। लखनऊ जैसे शहरों में, जहाँ लोग अब सेहत को लेकर पहले से अधिक जागरूक हो रहे हैं, ड्रैगन फ्रूट एक बेहतर विकल्प के रूप में उभर रहा है। इसके पोषण मूल्यों के कारण न सिर्फ़ घरेलू, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में भी इसकी मांग लगातार बनी हुई है।
ड्रैगन फ्रूट की खेती की खासियतें और भारतीय परिस्थितियों में अनुकूलता ड्रैगन फ्रूट की खेती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके पौधे को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती। इसे बंजर और वर्षा आधारित भूमि दोनों में उगाया जा सकता है, जिससे यह उन क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी बन जाता है जहाँ पारंपरिक खेती कठिन होती है। यह पौधा कैक्टस (cactus) परिवार से संबंधित है और सूखी तथा अर्ध-शुष्क जलवायु में भी अच्छी तरह बढ़ सकता है। एक बार रोपण के बाद, यह पौधा 20 वर्षों से अधिक समय तक फल देता है, जिससे किसानों को लंबे समय तक लाभ मिलता है।
उत्पादन, किस्में और उपज: खेती से बाज़ार तक का सफ़र भारत में किसान मुख्य रूप से ड्रैगन फ्रूट की तीन किस्मों की खेती करते हैं - गुलाबी त्वचा वाला सफेद गूदे का फल, गुलाबी त्वचा वाला लाल गूदे का फल और पीली त्वचा वाला सफेद गूदे का फल। अच्छी तरह से प्रबंधित बाग़ानों में पौधे पहले वर्ष से ही फल देना शुरू कर सकते हैं, जबकि तीसरे वर्ष से अच्छी पैदावार मिलने लगती है। फलन सामान्यतः जून से नवंबर के बीच होता है और एक फल का वज़न 200 से 700 ग्राम तक हो सकता है। बाज़ार में इसके दाम फल के आकार और गूदे के रंग के अनुसार बदलते रहते हैं, जिससे किसानों को अच्छे भाव मिलने की संभावना रहती है।
आयात, निर्यात और वैश्विक बाज़ार में भारत की स्थिति वर्तमान में भारत में ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन सीमित है, जिसके कारण देश को इसकी एक बड़ी मात्रा आयात करनी पड़ती है। वहीं, वियतनाम और चीन जैसे देशों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है। बावजूद इसके, भारत में भी इतनी क्षमता मौजूद है कि आने वाले समय में आयात पर निर्भरता कम की जा सके। भारत से इस फल का निर्यात फ़ारस की खाड़ी के देशों, यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे बाज़ारों में किया जा सकता है। हाल के वर्षों में निर्यात की शुरुआती पहल भी हो चुकी है, जो इसके उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करती है।
किसानों की आय और आत्मनिर्भर भारत में ड्रैगन फ्रूट की भूमिका ड्रैगन फ्रूट की खेती किसानों के लिए कम जोखिम और अधिक लाभ वाली मानी जाती है। इस पर कीटों और बीमारियों का प्रभाव कम होता है, जिससे रखरखाव का ख़र्च भी घटता है। इसके साथ ही, नर्सरी व्यवसाय के रूप में भी यह किसानों के लिए अतिरिक्त आय का साधन बन रहा है। खेती और उत्पादन के क्षेत्र में इसके विस्तार से न केवल किसानों की आय बढ़ सकती है, बल्कि आयात में कमी लाकर भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी यह फल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इन्हीं सभी कारणों से ड्रैगन फ्रूट की लोकप्रियता भारत में लगातार बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में इसके और विस्तार की उम्मीद की जा रही है।
लखनऊ की प्रकृति में रचा-बसा मोर: सौंदर्य, नृत्य और सांस्कृतिक पहचान
लखनऊवासियों, आपने कभी सुबह या मानसून के दिनों में अपने आसपास खेतों, बाग़ों या खुले इलाक़ों के पास मोर को टहलते या नाचते हुए देखा है? लखनऊ का प्राकृतिक परिवेश और आसपास का हरित क्षेत्र मोरों के लिए अनुकूल माना जाता है, इसलिए यहाँ इनका दिखना कोई असामान्य बात नहीं है। नीले रंग के चमकदार पंखों वाला यह पक्षी जब बारिश की पहली फुहारों के साथ अपने पंख फैलाकर नृत्य करता है, तो ऐसा लगता है मानो प्रकृति स्वयं उल्लास मना रही हो। मोर केवल देखने में सुंदर ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और लोकजीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ पक्षी है। आज इस लेख में सबसे पहले, हम मोर की प्रजाति, उसके स्वभाव और प्राकृतिक आवास के बारे में जानेंगे। इसके बाद, मानसून के मौसम में होने वाले मोर नृत्य और उसके पीछे छिपे प्रणय निवेदन के कारणों पर चर्चा करेंगे। आगे, हम यह समझेंगे कि मोर को भारत का राष्ट्रीय पक्षी क्यों घोषित किया गया। फिर, मोर की शारीरिक बनावट और उसके रंग-बिरंगे पंखों के महत्व पर बात करेंगे। अंत में, भारत और एशिया में प्रचलित मोर नृत्य की परंपराओं और लोकसंस्कृति में इसकी भूमिका को विस्तार से जानेंगे।
मोर का परिचय: प्रजाति, स्वभाव और प्राकृतिक आवास मोर, जिसे मयूर भी कहा जाता है, पक्षियों के पैवोनिनाए उपकुल के अंतर्गत आता है। नर को मोर और मादा को मोरनी कहा जाता है। स्वभाव से मोर एक शर्मीला पक्षी होता है, जो अधिकतर खुले वनों और शांत इलाक़ों में रहना पसंद करता है। यह प्रायः एकांत में ही विचरण करता है और ज़्यादा शोर-शराबे से दूर रहता है। भौगोलिक दृष्टि से मोर भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से पाया जाता है। भारत के कई हिस्सों के साथ-साथ यह श्रीलंका में भी मिलता है। अलग-अलग क्षेत्रों में मोर की कुछ प्रजातियाँ देखी जाती हैं, जैसे नीला मोर और हरा मोर। प्राकृतिक वातावरण में रहकर यह पक्षी जंगलों और खेतों के संतुलन को बनाए रखने में भी अपनी भूमिका निभाता है।
मानसून और मोर नृत्य: प्रणय निवेदन का सुंदर माध्यम मानसून का मौसम आते ही मोर का नृत्य देखने को मिलता है। जैसे ही बादल घिरते हैं और बारिश शुरू होती है, मोर अपने लंबे, रंग-बिरंगे पंख फैलाकर नाचने लगता है। यह नृत्य केवल आनंद या उत्सव का प्रतीक नहीं, बल्कि मोरनी को आकर्षित करने का एक प्राकृतिक तरीका है। प्रणय निवेदन के दौरान मोर अपनी पूँछ के पंखों को पूरी तरह फैलाकर गोल आकार में खड़ा होता है और लयबद्ध ढंग से घूमता है। मोरनी सामान्यतः उसी नर की ओर आकर्षित होती है, जिसके पंख अधिक बड़े, चमकीले और आकर्षक होते हैं। यही कारण है कि मानसून का मौसम मोरों के जीवन में विशेष महत्व रखता है।
मोर को भारत का राष्ट्रीय पक्षी घोषित किए जाने के कारण भारत में मोर को वर्ष 1963 में राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया था। इसके पीछे कई ठोस कारण थे। मोर भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से पाया जाता है और आम लोगों द्वारा आसानी से पहचाना जा सकता है। यह पक्षी भारतीय धार्मिक, सांस्कृतिक और पौराणिक कथाओं में भी विशेष स्थान रखता है। इसके अलावा, मोर की पहचान इतनी विशिष्ट है कि इसे किसी अन्य देश के पक्षी के साथ भ्रमित नहीं किया जा सकता। भारतीय वन्यजीव संरक्षण क़ानून के तहत इसे पूरी तरह संरक्षित पक्षी का दर्जा भी प्राप्त है, जिससे इसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
मोर की शारीरिक बनावट और पंखों का महत्व मोर की सबसे बड़ी पहचान उसकी सुंदर पूँछ और सिर पर सजी ताज जैसी कलंगी है। नर मोर के पास लगभग 200 पंखों की एक विस्तृत श्रृंखला होती है, जो उसके शरीर का बड़ा हिस्सा बनाती है। यही पंख उसके सौंदर्य और आकर्षण का मुख्य कारण हैं। हर वर्ष वर्षा ऋतु के बाद, विशेषकर अगस्त के महीने में, मोर के पंख झड़ जाते हैं और गर्मियों से पहले फिर से उग आते हैं। रंगों की बात करें, तो मोर मुख्य रूप से नीले रंग का होता है, लेकिन सफेद, हरे और जामुनी रंग के मोर भी पाए जाते हैं। मादा मोरनी के रंग नर की तुलना में कम चमकीले होते हैं और उसके पास सजावटी पंख नहीं होते।
भारत और एशिया में मोर नृत्य की परंपराएँ मोर के नृत्य से प्रेरित होकर भारत और एशिया के कई देशों में विशेष नृत्य शैलियाँ विकसित हुई हैं। भारत में मोर नृत्य को अलग-अलग रूपों में देखा जाता है, जैसे दक्षिण भारत में थाई पोंगल जैसे उत्सवों के दौरान होने वाला मयिलाट्टम। एशिया के अन्य देशों - जैसे चीन, म्यांमार और इंडोनेशिय - में भी मोर नृत्य लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन नृत्यों में मोर की चाल, उसके पंख फैलाने की मुद्रा और उसकी कोमल गतियों का सुंदर प्रदर्शन किया जाता है।
मोर नृत्य और लोकसंस्कृति: उत्सवों और परंपराओं में भूमिका मोर नृत्य केवल कला का रूप नहीं, बल्कि आनंद, उल्लास और स्वागत का प्रतीक भी है। कई क्षेत्रों में यह नृत्य त्योहारों, मेलों और विशेष आयोजनों के अवसर पर किया जाता है। कहीं यह वर्षा और समृद्धि का संकेत माना जाता है, तो कहीं अतिथियों के स्वागत का माध्यम बनता है। लोकसंस्कृति में मोर नृत्य ने लोगों को प्रकृति के और क़रीब लाने का काम किया है। यही वजह है कि आज भी मोर और उसका नृत्य केवल जंगलों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बना हुआ है।
भूमि और मिट्टी के प्रकार : कृषि योग्य, बंजर, मैदान
20-01-2026 09:16 AM • Lucknow-Hindi
भारत की मिट्टियाँ और खेती का रिश्ता: जानिए कौन-सी मृदा किस फ़सल के लिए है सबसे उपयुक्त
भारत एक ऐसा देश है जहाँ की भौगोलिक बनावट और जलवायु में अत्यधिक विविधता देखने को मिलती है। पहाड़ों से लेकर मैदानों, पठारों और तटीय क्षेत्रों तक फैला यह देश मिट्टियों की अनेक किस्मों का घर है। यही विविधता भारतीय कृषि को मज़बूत आधार प्रदान करती है, क्योंकि अलग-अलग मिट्टियाँ अलग-अलग फ़सलों के लिए उपयुक्त होती हैं। खेती की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि किस क्षेत्र में किस प्रकार की मृदा पाई जाती है और उसमें कौन-सी फ़सल उगाई जाए। आज इस लेख में हम भारत में पाई जाने वाली प्रमुख मिट्टियों की विविधता को समझेंगे। साथ ही, यह जानेंगे कि जलोढ़, लाल, काली, रेगिस्तानी और लैटराइट (laterite) जैसी मिट्टियाँ कृषि को कैसे प्रभावित करती हैं। इसके अलावा, खरीफ़ और रबी फ़सलों की बुवाई के समय, उनके लिए उपयुक्त मिट्टी और आदर्श परिस्थितियों पर भी विस्तार से चर्चा करेंगे।
भारत में मृदा की विविधता और आईसीएआर (ICAR) द्वारा किया गया वर्गीकरण भारत की जलवायु और भौगोलिक संरचना में अत्यधिक विविधता पाई जाती है, जिसके कारण देश के अलग-अलग हिस्सों में भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टियाँ विकसित हुई हैं। कहीं अधिक वर्षा होती है, तो कहीं शुष्क परिस्थितियाँ पाई जाती हैं, और कहीं नदियों द्वारा लाई गई उपजाऊ मिट्टी मिलती है। इन्हीं भौगोलिक व जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने भारत की मिट्टियों को आठ प्रमुख वर्गों में विभाजित किया है। इस वर्गीकरण में जलोढ़, काली, लाल, रेगिस्तानी, लैटराइट, वन एवं पर्वतीय, क्षारीय-लवणीय तथा पीट अथवा दलदली मृदा शामिल हैं। यह वैज्ञानिक वर्गीकरण केवल मिट्टी के प्रकार बताने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों और कृषि विशेषज्ञों को यह समझने में भी मदद करता है कि किसी विशेष मिट्टी में कौन-सी फ़सल बेहतर उपज दे सकती है और मिट्टी के पोषण स्तर को कैसे संतुलित रखा जा सकता है।
जलोढ़ मृदा: उत्तर भारत की कृषि की रीढ़ जलोढ़ मृदा का निर्माण नदियों द्वारा लाई गई सिल्ट, गाद और महीन कणों से होता है, जो समय के साथ मैदानों में जमा होकर उपजाऊ भूमि का रूप ले लेते हैं। यह मिट्टी मुख्य रूप से सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली के मैदानी क्षेत्रों और कई डेल्टा (delta) क्षेत्रों में पाई जाती है। अपनी बनावट के कारण यह नमी को संतुलित रूप से बनाए रखती है और पौधों की जड़ों को पोषक तत्व आसानी से उपलब्ध कराती है। रासायनिक दृष्टि से जलोढ़ मिट्टी में पोटाश (potash) और फ़ॉस्फ़ोरिक एसिड (phosphoric acid) पर्याप्त मात्रा में होते हैं, हालाँकि इसमें नाइट्रोजन (nitrogen) की कमी देखी जाती है। इसके बावजूद, इसकी प्राकृतिक उर्वरता इसे कृषि के लिए अत्यंत उपयोगी बनाती है। इसी मिट्टी में धान, गेहूँ, गन्ना, मक्का, जूट, तिलहन, सब्ज़ियाँ और विभिन्न प्रकार के फल बड़े पैमाने पर उगाए जाते हैं, जिससे देश की बड़ी आबादी का जीवनयापन संभव हो पाता है।
लाल और काली मृदा: रासायनिक संरचना और फ़सल उपयुक्तता लाल मृदा का निर्माण प्राचीन ग्रेनाइट (granite) चट्टानों के अपक्षय से होता है और इसका लाल रंग इसमें मौजूद आयरन ऑक्साइड (iron oxide) की वजह से दिखाई देता है। यह मिट्टी आयरन और पोटाश से भरपूर होती है, लेकिन नाइट्रोजन, चूना और ह्यूमस (humus) की मात्रा इसमें अपेक्षाकृत कम होती है। यही कारण है कि प्राकृतिक रूप से यह मिट्टी कम उपजाऊ मानी जाती है, लेकिन उचित सिंचाई, खाद और उर्वरकों के प्रयोग से इसमें अच्छी पैदावार ली जा सकती है। इस मिट्टी में धान, बाजरा, दालें, कपास और गन्ना जैसी फ़सलें सफलतापूर्वक उगाई जाती हैं। दूसरी ओर, काली मृदा अपनी चिकनी बनावट और नमी को लंबे समय तक बनाए रखने की क्षमता के लिए जानी जाती है। यह मिट्टी गीली अवस्था में फैलती है और सूखने पर दरारें बनाती है, जिससे मिट्टी में वायु का संचार बना रहता है। इसमें लौह और चूना प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जबकि नाइट्रोजन और फ़ॉस्फ़ोरस की कमी रहती है। कपास की खेती के लिए यह मिट्टी सबसे अधिक उपयुक्त मानी जाती है, इसी कारण इसे “ब्लैक कॉटन सॉयल” (black cotton soil) भी कहा जाता है। इसके अलावा गेहूँ, ज्वार, बाजरा और तिलहन की खेती भी इसमें अच्छे परिणाम देती है।
रेगिस्तानी और लैटराइट मृदा: सीमाएँ, चुनौतियाँ और कृषि संभावनाएँ रेगिस्तानी मृदा शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है, जहाँ वर्षा बहुत कम होती है। इस मिट्टी में रेत और बजरी की मात्रा अधिक होती है, जिसके कारण इसमें नमी और जैविक पदार्थों की भारी कमी रहती है। पानी को रोकने की क्षमता कम होने के कारण यह मिट्टी स्वाभाविक रूप से कृषि के लिए अनुकूल नहीं मानी जाती। हालाँकि, सिंचाई सुविधाओं के विकास के बाद इन क्षेत्रों में भी खेती संभव हुई है और यहाँ बाजरा, दालें, ग्वार और चारा फ़सलें उगाई जाने लगी हैं। लैटराइट मृदा मुख्य रूप से मानसूनी वर्षा वाले क्षेत्रों की विशेषता है। अधिक वर्षा के कारण इसमें से चूना और सिलिका (silica) बह जाते हैं, जिससे मिट्टी में लौह और ऐल्यूमीनियम (aluminium) की मात्रा बढ़ जाती है। यह मिट्टी नाइट्रोजन और पोटाश की कमी से ग्रस्त होती है, फिर भी उचित कृषि प्रबंधन अपनाकर इसमें धान, रागी, गन्ना और काजू जैसी फ़सलें उगाई जाती हैं। कुछ क्षेत्रों में इसका उपयोग निर्माण सामग्री के रूप में भी किया जाता है।
खरीफ़ और रबी फ़सलें: बुवाई का समय और मिट्टी की भूमिका खरीफ़ फ़सलें मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर होती हैं और इनकी बुवाई सामान्यतः जुलाई से अक्टूबर के बीच की जाती है। इन फ़सलों को बढ़ने के लिए पर्याप्त वर्षा और गर्म तापमान की आवश्यकता होती है। धान, मक्का, बाजरा, रागी, सोयाबीन और मूँगफली खरीफ़ फ़सलों के प्रमुख उदाहरण हैं। इनके लिए उर्वर, अच्छी जल निकासी वाली जलोढ़ या दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि ऐसी मिट्टी पानी और पोषक तत्वों को संतुलित रूप से बनाए रखती है। इसके विपरीत, रबी फ़सलें मानसून समाप्त होने के बाद सर्दियों में बोई जाती हैं और गर्मियों की शुरुआत में काटी जाती हैं। गेहूँ, जौ, सरसों, चना और अलसी रबी फ़सलों में शामिल हैं। इन फ़सलों के लिए अपेक्षाकृत ठंडा और शुष्क मौसम अनुकूल होता है, और चिकनी दोमट से लेकर मंझली काली मिट्टी इनमें अच्छी पैदावार देने में सहायक होती है।
खरीफ़ और रबी फ़सलों के लिए आदर्श मिट्टी की आवश्यकताएँ रबी फ़सलों के लिए ऐसी मिट्टी आवश्यक होती है जिसमें अच्छी जल निकासी हो, मध्यम उर्वरता बनी रहे और नमी संतुलित रूप से उपलब्ध हो। भारी और जलभराव वाली मिट्टियाँ रबी फ़सलों के लिए अनुकूल नहीं मानी जातीं, क्योंकि इससे फ़सल की जड़ें प्रभावित हो सकती हैं। दूसरी ओर, खरीफ़ फ़सलों के लिए ऐसी मिट्टी उपयुक्त होती है जिसमें कार्बनिक पदार्थ पर्याप्त मात्रा में मौजूद हो, पानी को रोकने की क्षमता अच्छी हो और मिट्टी का पीएच (pH) स्तर संतुलित बना रहे। यदि किसान मिट्टी के प्रकार को सही ढंग से पहचानकर उसी के अनुसार फ़सल का चयन करें, तो न केवल फ़सल उत्पादन में वृद्धि होती है, बल्कि भूमि की दीर्घकालिक उर्वरता भी बनी रहती है, जिससे भविष्य की खेती भी सुरक्षित रहती है।
चिकनकारी और ज़रदोज़ी: कैसे लखनऊ की कढ़ाई ने शहर को “पूरब का स्वर्ण” बनाया?
लखनऊवासियों, आपके शहर की पहचान सिर्फ नवाबी तहज़ीब, अदब और संगीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ की चिकनकारी और ज़रदोज़ी कढ़ाई ने लखनऊ को दुनिया भर में एक अलग मुकाम दिलाया है। चौक की गलियों से लेकर अमीनाबाद के बाज़ारों तक, सुई और धागे से गढ़ी गई यह कला न केवल रोज़गार का साधन है, बल्कि शहर की सांस्कृतिक आत्मा भी है। लखनऊ की कढ़ाई सदियों से शाही पहनावे, आम लोगों की ज़िंदगी और आधुनिक फैशन - तीनों का हिस्सा रही है। इस लेख में हम इसी समृद्ध परंपरा को समझने की कोशिश करेंगे, जहाँ इतिहास, कला और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। आज के इस लेख में हम क्रमबद्ध रूप से जानेंगे कि भारत का प्राचीन वस्त्र उद्योग कैसे सभ्यता से संस्कृति तक की यात्रा तय करता आया है। इसके बाद हम समझेंगे कि औपनिवेशिक दौर (colonial era) ने इस उद्योग को कैसे प्रभावित किया और स्वतंत्रता के बाद इसका पुनरुत्थान कैसे हुआ। फिर हम लखनऊ की विशेष भूमिका पर नज़र डालेंगे, जिसने चिकनकारी और ज़रदोज़ी कढ़ाई के ज़रिए शहर को “पूरब का स्वर्ण” की पहचान दिलाई। आगे हम चिकनकारी की मुगलकालीन उत्पत्ति से लेकर आधुनिक फैशन तक की यात्रा को समझेंगे और ज़रदोज़ी कढ़ाई के शाही इतिहास को जानेंगे। अंत में, हम यह भी देखेंगे कि आज के वैश्विक फैशन उद्योग में लखनऊ की कढ़ाई आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से कितनी महत्वपूर्ण बन चुकी है।
भारत का प्राचीन वस्त्र उद्योग: सभ्यता से संस्कृति तक भारत का वस्त्र उद्योग केवल व्यापार या आजीविका का साधन नहीं रहा है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता और संस्कृति की आत्मा का हिस्सा रहा है। इसके प्रमाण हमें सिंधु घाटी सभ्यता से ही मिलने लगते हैं। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों - जैसे स्पिंडल व्होरल (spindle whorl), कपास के बीज और बुने हुए वस्त्रों के चिन्ह - यह स्पष्ट करते हैं कि लगभग 4000-2500 ईसा पूर्व भारत में सूत कातने और कपड़ा बुनने की उन्नत तकनीकें मौजूद थीं। उस समय कपास की खेती, धागा निर्माण और हथकरघा उद्योग ग्रामीण जीवन का अभिन्न अंग थे। प्राचीन भारत के वस्त्रों की गुणवत्ता और सौंदर्य का प्रभाव इतना गहरा था कि ग्रीस और बेबीलोन जैसी सभ्यताओं में “भारत” शब्द को ही कपास का पर्याय माना जाने लगा। भारतीय सूती और रेशमी कपड़े न केवल एशिया, बल्कि मध्य एशिया, अरब और यूरोप तक निर्यात किए जाते थे। भारतीय वस्त्रों की कोमलता, टिकाऊपन और रंगों की चमक ने उन्हें वैश्विक पहचान दिलाई। यही कारण था कि भारत को लंबे समय तक विश्व का सबसे बड़ा वस्त्र उत्पादक और निर्यातक माना जाता रहा। वस्त्र केवल शरीर ढकने का साधन नहीं थे, बल्कि सामाजिक स्थिति, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान को भी दर्शाते थे। अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित वस्त्र शैलियाँ - जैसे बनारसी रेशम, दक्षिण भारत का सूती वस्त्र, और उत्तर भारत की कढ़ाई परंपराएँ - भारतीय विविधता को एक सूत्र में पिरोती हैं।
औपनिवेशिक प्रभाव और स्वतंत्रता के बाद वस्त्र उद्योग का पुनरुत्थान यूरोपियों के आगमन से पहले तक भारत का वस्त्र उद्योग पूरी तरह आत्मनिर्भर और समृद्ध था। 15वीं शताब्दी में वास्को डि गामा (Vasco da Gama) द्वारा समुद्री मार्ग की खोज के बाद भारतीय वस्त्रों तक यूरोप की सीधी पहुँच बनी। इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन ने व्यापार को संगठित रूप दिया। प्रारंभ में यह व्यापार भारतीय कारीगरों के लिए लाभकारी रहा, लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद परिस्थितियाँ बदल गईं। इंग्लैंड में मशीनों से बने सस्ते कपड़े भारतीय बाजारों में भर गए। ब्रिटिश शासन ने भारत में अपने वस्त्रों पर आयात शुल्क हटाए, जबकि भारतीय वस्त्रों पर ब्रिटेन में भारी कर लगाए गए। इस असमान नीति ने भारतीय हथकरघा और कारीगरों को गहरी चोट पहुँचाई। कई पारंपरिक बुनकर और कारीगर बेरोज़गार हो गए, और सदियों पुरानी शिल्प परंपराएँ संकट में पड़ गईं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने खादी और स्वदेशी वस्त्रों को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनाया। ब्रिटिश वस्त्रों के बहिष्कार ने भारतीय वस्त्र उद्योग में नई चेतना भरी। 1947 के बाद सरकार ने अखिल भारतीय हथकरघा बोर्ड और राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान जैसे संस्थानों के माध्यम से पारंपरिक कारीगरों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। आज भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा वस्त्र उत्पादक है, और यह उद्योग लाखों लोगों को रोज़गार प्रदान करता है।
लखनऊ: हस्तशिल्प और कढ़ाई के कारण “पूरब का स्वर्ण” लखनऊ केवल नवाबी तहज़ीब, अदब और संगीत के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यह शहर सदियों से भारतीय हस्तशिल्प और कढ़ाई कला का प्रमुख केंद्र रहा है। इसी समृद्ध विरासत के कारण लखनऊ को “पूरब का स्वर्ण” कहा जाता है। यहाँ की गलियों, चौकों और मोहल्लों में आज भी सुई-धागे से रची जा रही कला जीवित है। लखनऊ की सांस्कृतिक पहचान यहाँ के कारीगरों से जुड़ी हुई है। ये कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी अपने हुनर को सँजोते आए हैं। नवाबों के संरक्षण में यहाँ की कढ़ाई कला ने शाही वैभव और सौंदर्य का रूप लिया। लखनऊ का वस्त्र-शिल्प न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त करता है, बल्कि शहर को वैश्विक मंच पर पहचान भी दिलाता है। आज भी लखनऊ की चिकनकारी और ज़रदोज़ी देश-विदेश के फैशन बाज़ारों में प्रतिष्ठित मानी जाती हैं। यह कला यहाँ के लोगों के लिए सिर्फ रोज़गार नहीं, बल्कि गौरव और पहचान का स्रोत है।
चिकनकारी कढ़ाई: मुगलकाल से आधुनिक फैशन तक चिकनकारी लखनऊ की सबसे प्रसिद्ध और विशिष्ट कढ़ाई शैली है। इसकी उत्पत्ति को लेकर एक लोकप्रिय मान्यता है कि मुगल सम्राट जहाँगीर की पत्नी नूरजहाँ इस कला को फारस से भारत लाई थीं। नवाबों के संरक्षण में यह कला अवध में फली-फूली और समय के साथ लखनऊ की पहचान बन गई। चिकनकारी की खासियत इसके नाज़ुक और बारीक टाँकों में है। टेपची, बखिया, जाली, फंदा, मुरी जैसे लगभग 36 पारंपरिक टाँके चिकनकारी को अद्वितीय बनाते हैं। ये टाँके शिफॉन, मलमल, रेशम और ऑर्गेंज़ा जैसे हल्के कपड़ों पर किए जाते हैं, जिससे वस्त्र बेहद सुरुचिपूर्ण और आरामदायक बनते हैं। आज चिकनकारी केवल पारंपरिक परिधानों तक सीमित नहीं है। फैशन डिज़ाइनरों ने इसे आधुनिक कट्स, कुर्तियों, साड़ियों, ड्रेसेज़ और यहाँ तक कि वेस्टर्न आउटफिट्स में भी शामिल किया है। वैश्विक फैशन मंच पर लखनऊ की चिकनकारी ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
ज़रदोज़ी कढ़ाई: शाही वैभव और ऐतिहासिक परंपरा ज़रदोज़ी कढ़ाई शाही ठाठ और वैभव की प्रतीक मानी जाती है। इसका मूल फारस में माना जाता है, जहाँ ‘ज़र’ का अर्थ सोना और ‘दोज़ी’ का अर्थ कढ़ाई है। हालांकि सोने और चाँदी के धागों से कढ़ाई की परंपरा प्राचीन भारत में भी मौजूद थी, जिसे ‘हिरण्य’ वस्त्रों के रूप में जाना जाता था। मुगल काल में ज़रदोज़ी कढ़ाई अपने चरम पर पहुँची। शाही पोशाकें, दरबारी परिधान और राजसी सजावट इसी कढ़ाई से सुसज्जित होती थीं। लखनऊ में नवाबों के संरक्षण ने ज़रदोज़ी को विशेष पहचान दी। मखमल, साटन और रेशम जैसे भारी कपड़ों पर की गई यह कढ़ाई आज भी शादियों और भव्य आयोजनों की शान है। आज ज़रदोज़ी आधुनिक फैशन में भी उतनी ही प्रासंगिक है। डिज़ाइनर परिधान, दुल्हन के जोड़े और इंटीरियर डेकोर (interior decor) में इसका व्यापक उपयोग होता है।
आधुनिक फैशन उद्योग में लखनऊ की कढ़ाई का आर्थिक महत्व आज के वैश्विक फैशन उद्योग में लखनऊ की कढ़ाई केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति भी है। हज़ारों कारीगर इस उद्योग से जुड़े हैं, जिनकी आजीविका चिकनकारी और ज़रदोज़ी पर निर्भर करती है। लखनऊ के कढ़ाई उत्पाद देश ही नहीं, बल्कि अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व तक निर्यात किए जाते हैं। डिज़ाइनर ब्रांड्स (designer brands) और फैशन हाउसेज़ (fashion houses) लखनऊ की कढ़ाई को अपने कलेक्शन में शामिल कर रहे हैं। इससे न केवल स्थानीय रोज़गार को बढ़ावा मिला है, बल्कि भारत की हस्तशिल्प पहचान भी मज़बूत हुई है। हालाँकि मशीनों और तेज़ फैशन के दौर में कारीगरों के सामने चुनौतियाँ भी हैं, लेकिन यदि इस कला को उचित समर्थन और बाज़ार मिले, तो यह आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकती है। लखनऊ की कढ़ाई आज भी यह साबित करती है कि सुई और धागे से गढ़ी गई कला समय, सीमाओं और फैशन के बदलते रुझानों से कहीं ऊपर होती है - और यही इसे सच मायनों में “पूरब का स्वर्ण” बनाती है।
दशहरी आम: मलिहाबाद की ऐतिहासिक पहचान, बेमिसाल खुशबू और स्वाद का प्रतीक
दशहरी आम भारत की सबसे लोकप्रिय और सुगंधित आम किस्मों में से एक है, जिसकी उत्पत्ति उत्तर प्रदेश के लखनऊ जिले के निकट मलिहाबाद क्षेत्र में मानी जाती है। इसका इतिहास 18वीं शताब्दी से जुड़ा है और आज भी यह आम अपनी मिठास, रसीले स्वाद और खास खुशबू के लिए पहचाना जाता है। दशहरी आम मुख्य रूप से उत्तर भारत में उगाया जाता है, जबकि आंध्र प्रदेश, नेपाल और पाकिस्तान में भी इसकी खेती होती है। मलिहाबाद को दशहरी आम का सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्र माना जाता है।
पोषण की दृष्टि से दशहरी आम अत्यंत लाभकारी है। इसमें फाइबर (fiber) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो पाचन को बेहतर बनाता है, जबकि विटामिन सी (Vitamin C) रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है। इसके अलावा इसमें आयरन (iron), कैल्शियम (calcium), जिंक (zinc), विटामिन ए (A), ई (F) और फोलेट (Folate) जैसे आवश्यक पोषक तत्व होते हैं, जो शरीर के समुचित विकास और अंगों के सही कार्य में सहायक हैं। इसके छिलके में मौजूद फाइटोकेमिकल्स एंटीऑक्सीडेंट (Phytochemicals Antioxidants) गुणों से भरपूर माने जाते हैं।
दशहरी आम की ऐतिहासिक पहचान भी खास है। दशहरी गांव में स्थित “मदर दशहरी ट्री” लगभग 185 वर्ष पुराना है और आज भी फल देता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मलिहाबाद के अब्दुल हमीद खान, जिन्हें “बाबा-ए-अंबा” कहा जाता है, ने इस आम को पहचान दिलाने और ग्राफ्टिंग (grafting) तकनीक के जरिए विकसित करने में अहम भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से दशहरी आम ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त की। आज यह आम सिंगापुर, यूएई (UAE), सऊदी अरब और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में निर्यात किया जाता है। अपनी अनोखी सुगंध और स्वाद के कारण दशहरी आम आज भी लोगों को सहज ही आकर्षित करता है।
जनसंख्या (2025)Source:
Census 2011; population projections based on 2011 city growth rates.
4,025,310
इंटरनेट उपयोगकर्ता
इंटरनेट उपयोगकर्ताSource:
The number of Internet connections was determined by multiplying the number of urban Internet subscribers with the percentage of the District Headquarters (DHQ) population in relation to the total urban population. The value was allocated to DHQs based on population ratio. Urban population is distributed in a 1.5:1 ratio between DHQ and non-DHQ cities. (TRAI September 2025 Report / Number)
4,404,035
फेसबुक उपयोगकर्ता
फेसबुक उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Facebook Users. (As per Facebook Ad Module, 31 December 2025)
1,550,000
लिंक्डइन उपयोगकर्ता
लिंक्डइन उपयोगकर्ताSource:
The number of unique member accounts that could be potentially reached in the city. (LinkedIn Ad Module, December 2025)
3,700,000
ट्विटर उपयोगकर्ता
ट्विटर उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Twitter Users (X Ad Module,December 2025)
1,250,000
इंस्टाग्राम उपयोगकर्ता
इंस्टाग्राम उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Instagram Users (Instagram Ad Module,December 2025)