Writer:
Stephen Markel, Tushara Bindu Gude, Muzaffar Alam, Los Angeles County Museum of ArtPublisher:
Los Angeles County Museum of ArtTags:Art Objects - Art/Beauty
2.
WAILING BEAUTY : The Perishing Art of Nawabi Lucknow
Writer:
Sir William Henry Sleeman, Peter Denis REEVESPublisher:
Saiyed Anwer AbbasTags:Art Objects - Art/Beauty
वैश्विक माइक्रोचिप संकट और भारत: सेमीकंडक्टर निर्माण केंद्र बनने की चुनौतियाँ व संभावनाएँ
अर्धचालक चिप्स (Semiconductor chips), जिसे माइक्रोचिप्स (Microchips) या एकीकृत सर्किट (Circuit) के रूप में भी जाना जाता है, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स (Consumer Electronics) से लेकर स्वास्थ्य सेवा तक लगभग हर उद्योग में एक महत्वपूर्ण घटक हैं। हालाँकि, इनकी सीमित आपूर्ति के कारण, दुनिया वर्तमान में चिप की कमी का सामना कर रही है।इस कमी को देखते हुए भारतीय सरकार ने दिसंबर 2021 में, देश को वैश्विक चिप निर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय अर्धचालक और डिस्प्ले (Display) निर्माताओं को आकर्षित करने के लिए 76,000 करोड़ रुपये (लगभग 10 बिलियन डॉलर) की प्रोत्साहन योजना को शुरू करने का प्रयास किया।लेकिन चीन और वियतनाम (Vietnam) जैसे अधिक प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में कमजोर पारिस्थितिकी तंत्र और संसाधनों की कमी के कारण भारत सेमीकंडक्टर वेलखनऊफर फैब्रिकेशन इकाइयों (Semiconductor wafer fabrication) की स्थापना में पिछड़ गया है।फैब निर्माण इकाइयां स्थापित करने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक यह तथ्य है कि इसके लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होती है।अरबों डॉलर में चलने वाली भारी लागत के अलावा, एक चिप के निर्माण में भी सैकड़ों गैलन शुद्ध पानी की आवश्यकता होती है, जो भारत में आवश्यक मात्रा में मिलना भी मुश्किल हो सकता है।निर्बाध बिजली आपूर्ति एक और बड़ी बाधा है। इस मुद्दे की जड़ यह है कि भारत अभी भी चिप निर्माण क्षेत्र में प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे के बराबर नहीं है।दरसल अर्धचालक चिप एक विद्युत परिपथ है जिसमें कई घटक जैसे ट्रांजिस्टर (Transistors) और अर्धचालक वेफर (Semiconductor wafer) पर तारों का निर्माण होता है। वे अधिकांश आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए छोटे दिमाग के रूप में कार्य करते हैं।इन चिप्स को बनाने के लिए, रेत से सिलिकॉन (Silicon) निकाला जाता है और ठोस सिलेंडर (Cylinder) में पिघलाया जाता है जिसे सिल्लियां कहा जाता है। इन सिल्लियों को फिर बहुत पतले वेफर्स में काट दिया जाता है और पॉलिश (Polish) की जाती है, जिसके बाद उन पर जटिल परिपथ मुद्रित होते हैं।अंत में, वेफर्स को अलग- अलग अर्धचालकों में काट दिया जाता है और तैयार चिप्स में पैक किया जाता है, जिसे बाद में एक परिपथ पट्ट पर रखा जा सकता है। इन चिप्स का निर्माण करना एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें तीन महीने से अधिक समय लगता है। लेकिन महामारी के चलते विश्व भर में चिप की कमी आ गई है। कोविड -19 ने आबादी के एक महत्वपूर्ण हिस्से को घर के अंदर रहने को मजबूर कर दिया है, जिससे उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे लैपटॉप (Laptop), फोन (Phones) और गेमिंग कंसोल (Gaming consoles) की मांग में अचानक वृद्धि हुई है।साथ ही क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrencies) की अचानक लोकप्रियता ने दुनिया भर में और अधिक खनन कार्यों को बढ़ा दिया है, जिसके लिए अधिक प्रसंस्करण इकाइयों की आवश्यकता होती है।हालांकि मांग बढ़ी है, आपूर्ति गिर गई है। दूसरी ओर,कार निर्माता ने महामारी की शुरुआत में अपने चिप के ऑर्डर (Order) को कम कर दिया, यह मानते हुए कि उपभोक्ताओं को नए वाहन खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं होगी,जिस वजह से आपूर्ति में गलत अनुमान लगाया गया और कम चिप का उत्पादन किया गया।संयुक्त राज्य अमेरिका (United States) और चीन (China) के बीच तनावपूर्ण संबंधों ने खराब आपूर्ति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, क्योंकि चीन चिप्स के सबसे बड़े निर्माताओं में से एक है। कई कंपनियां जिन्हें सेमीकंडक्टर्स की आवश्यकता होती है, उन्होंने पहले से ही अपनी दीर्घकालिक खरीद रणनीतियों पर पुनर्विचार करना प्रारंभ कर दिया है।कुछ उदाहरण के लिए उसी समय ऑर्डर करने वाली प्रणाली, जो वस्तुसूची की लागत को कम करने में मदद करता है, से हटकर अर्धचालक को पहले से ऑर्डर करने पर विचार कर रहे हैं।कई अर्धचालक कंपनियां (Company) मजबूत बने रहने के लिए अपनी दीर्घकालिक रणनीतियों को समायोजित कर रही हैं।अर्धचालक कंपनियां जो भी निर्णय लेती हैं, वह उनके उद्योग और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए व्यापक आर्थिक महत्व हो सकता है।2000 के दशक की शुरुआत में, अर्धचालक कंपनियों में लाभ मार्जिन (Profit Margin) कम था, जिसमें पूंजी की लागत से कम प्रतिफल उत्पन्न होता था। पिछले दशक के दौरान लाभप्रदता में सुधार हुआ, जो हालांकि, अधिकांश उद्योगों में माइक्रोचिप्स की बढ़ती मांग, प्रौद्योगिकी क्षेत्र की तीव्रवृद्धि, और क्लाउड के उपयोग में वृद्धि के साथ-साथ कई उप-खंडों में चल रहे समेकन से प्रेरित था। एक परिणाम यह है कि अर्धचालक उद्योग की लाभप्रदता अन्य उद्योगों की तुलना में काफी बेहतर हुई है, और यह प्रवृत्ति जारी रहने की उम्मीद है।जैसा कि किसी भी उद्योग में होता है, मूल्य सृजन उत्पाद श्रेणी के अनुसार भिन्न होता है, इसलिए कुछ खंडों में परिवर्तन दूसरों की तुलना में अधिक प्रभाव डाल सकते हैं। उदाहरण के लिए, मेमोरी (Memory) सबसे अधिक लाभदायक खंड रहा है, इसके बाद फैबलेस (Fabless) कंपनियां हैं जो अपने स्वयं के चिप्स डिजाइन करती हैं लेकिन अपने निर्माण को बाहरी स्रोत को देती हैं।कुछ क्षेत्रीय भिन्नताएँ भी स्पष्ट हैं। उत्तरी अमेरिका, कुछ सबसे बड़े फैबलेस खिलाड़ियों का घर, के पास 2015-19 की अवधि के दौरान वैश्विक अर्धचालक मूल्य पूल का लगभग 60% हिस्सा था। वहीं एशिया, जो अभी भी अनुबंध चिप निर्माण का केंद्र है, शेष 36% के लिए जिम्मेदार है। इस भौगोलिक प्रसार के साथ, अर्धचालक उद्योग के भीतर मूल्य निर्माण दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकता है।उत्पादन क्षमता बढ़ाने के अलावा, अर्धचालक कंपनियां अपने विकास को जारी रखने और ग्राहकों की मांग को पूरा करने के लिए कई कदमों पर विचार कर सकती हैं। वे लाभदायक क्षेत्रों में बढ़त हासिल करने और अपने ग्राहक आधार का विस्तार करने के लिए अधिक एम एंड ए (M&A) सौदे और साझेदारी कर सकते हैं।सेमीकंडक्टर कंपनियां नवीन तकनीकों में भी निवेश बढ़ा सकती हैं जो उन्हें स्वायत्त कारों, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (Internet of things), कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य क्षेत्रों में तेजी से विकास के लिए अग्रणी-बढ़त चिप्स विकसित करने में मदद करेगी। इन सबसे ऊपर, इन अनिश्चित समय के दौरान अधिक चुस्त रणनीतियां महत्वपूर्ण हो सकती हैं।संदर्भ :-https://bit.ly/3NnZSGw https://bit.ly/3NpAqAA
विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
शिवरात्रि के इस पावन पर्व पर करें 'शिवोऽहम्' के भाव को आत्मसात
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ!महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आंतरिक जागरण का विशेष अवसर है। यह वह दिन माना जाता है जब शिव तत्व का प्रभाव पृथ्वी पर सबसे अधिक अनुभूत होता है, यानी भौतिक जीवन और आध्यात्मिक चेतना का सहज मिलन होता है। इसी कारण इस दिन किया गया ध्यान और साधना मन और चेतना पर गहरा प्रभाव छोड़ती है।महाशिवरात्रि हमें यह याद दिलाती है कि शिव कोई बाहरी सत्ता नहीं हैं, बल्कि वही शाश्वत चेतना हमारे भीतर भी विद्यमान है। “शिवोऽहम्” का भाव इसी अनुभूति की ओर संकेत करता है - कि सत्य, शांति और अनंतता हमारे अपने स्वरूप का हिस्सा हैं। जब मन द्वैत से ऊपर उठकर एकत्व को अनुभव करता है, तब जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलने लगता है।रात्रि का भाव शांति, विश्राम और मौन से जुड़ा है। इस दिन मन, बुद्धि और अहंकार को शांत कर ध्यान में स्थिर होना वास्तविक विश्राम माना जाता है। महाशिवरात्रि आत्मसमर्पण का भी संदेश देती है - जब व्यक्ति स्वयं को उस व्यापक चेतना के भरोसे छोड़ देता है, तब भय, चिंता और बेचैनी स्वतः कम होने लगती हैं। यही इस पर्व का वास्तविक अर्थ और सौंदर्य है।संदर्भ:https://tinyurl.com/52e6277c https://tinyurl.com/mr2rcz2b
अवधारणा I - मापन उपकरण (कागज़/घड़ी)
शाही गज़ से आधुनिक मेट्रिक प्रणाली तक: मापन इकाइयों के विकास की रोचक कहानी
मेट्रिक प्रणाली लंबाई, आयतन, दूरी, तापमान और वज़न जैसे मापों के लिए उपयोग की जाने वाली एक मानकीकृत प्रणाली है। यह तीन बुनियादी इकाइयों पर आधारित होती है:⦁ ➲ मीटर (m): लंबाई मापने के लिए।⦁ ➲ किलोग्राम (kg): द्रव्यमान मापने के लिए।⦁ ➲ सेकेंड (s): समय मापने के लिए।इस लेख में हम मेट्रिक प्रणाली के विकास, सामान्य मेट्रिक रूपांतरण इकाइयों तथा मुग़ल काल में भारत में प्रचलित मापन पद्धतियों के बारे में विस्तार से जानेंगे।मेट्रिक प्रणाली मापने का एक सुव्यवस्थित और विश्वसनीय तरीका है, जिसका उपयोग आज विश्वभर में वैज्ञानिक शोध, शिक्षा, व्यापार और दैनिक जीवन में किया जाता है। यह सरल मापों से लेकर जटिल गणनाओं तक के लिए उपयुक्त मानी जाती है।इसके कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं:⦁ ➲ मीटर (m): दूरी और लंबाई मापने की मानक इकाई। जैसे—घर से स्कूल की दूरी या किसी कपड़े की लंबाई।⦁ ➲ ग्राम (g): वज़न की इकाई, जिसे हम खाद्य पदार्थों के पैकेट पर अक्सर देखते हैं, जैसे “250 ग्राम चिप्स।”⦁ ➲ मिलीलीटर (ml): आयतन की इकाई, जिसका उपयोग पेय पदार्थों या तरल पदार्थों की मात्रा मापने में किया जाता है।मेट्रिक प्रणाली में लंबाई, द्रव्यमान (वज़न) और क्षमता (आयतन) के लिए अलग-अलग इकाइयाँ निर्धारित की गई हैं। उदाहरण के लिए:⦁ ➲ लंबाई: मिलीमीटर (mm), सेंटीमीटर (cm), डेसीमीटर (dm), मीटर (m) और किलोमीटर (km)। इनका उपयोग डेबिट कार्ड (Debit Card) की मोटाई से लेकर दो शहरों के बीच की दूरी तक मापने में होता है।⦁ ➲ वज़न: ग्राम (g) और किलोग्राम (kg), जिनसे फलों या शरीर का वज़न मापा जाता है।⦁ ➲ क्षमता: मिलीलीटर (ml) और लीटर (L), जिनका उपयोग जूस कैन या पानी की टंकी की मात्रा मापने में किया जाता है।1789 की फ़्रांसीसी क्रांति के बाद नागरिकों ने पूरे देश में एक समान वज़न और माप प्रणाली की आवश्यकता महसूस की। इस उद्देश्य से नेशनल असेंबली (National Assembly) और बाद की सरकारों ने पेरिस एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (Paris Academy of Sciences) तथा उसके उत्तराधिकारी इंस्टीट्यूट ऑफ फ़्रांस (Institute of France) को नई इकाइयाँ विकसित करने का कार्य सौंपा। इन इकाइयों को दूरी, आयतन, वज़न, कोण और समय मापने के लिए तैयार किया गया, और इन्हें इस तरह बनाया गया कि सभी एक-दूसरे से तार्किक रूप से जुड़े रहें।उदाहरण के तौर पर, लंबाई की इकाइयाँ दस की घात के आधार पर बढ़ती हैं - मिलीमीटर से सेंटीमीटर, फिर मीटर तक। एक लीटर को ऐसे घन के आयतन के रूप में परिभाषित किया गया जिसकी प्रत्येक भुजा 10 सेंटीमीटर हो। मानक तापमान पर एक लीटर पानी का वज़न लगभग एक किलोग्राम होता है। इससे पहले इंच, फ़ीट, गज़ और मील जैसी इकाइयों के बीच कोई स्पष्ट संबंध नहीं था। फ़्रांसीसियों ने न केवल राष्ट्रीय मानकों की स्थापना की, बल्कि एक ऐसी प्रणाली विकसित की जो आज मेट्रिक प्रणाली के रूप में वैश्विक स्तर पर अपनाई जा चुकी है।मेट्रिक प्रणाली के इतिहास की प्रमुख समयरेखा:⦁ ➲ 1668: जॉन विल्किंस (John Wilkins) ने एक संशोधित मापन प्रणाली का प्रस्ताव रखा।⦁ ➲ 1670: गेब्रियल मूटन (Gabriel Mouton) ने पृथ्वी की परिधि के अंश पर आधारित दशमलव प्रणाली सुझाई।⦁ ➲ 1671: जीन पिकार्ड (Jean Picard) ने झूलते पेंडुलम (Pendulum) को लंबाई मापने का आधार बनाने का विचार दिया।⦁ ➲ 1790: फ़्रांस की नेशनल असेंबली ने फ़्रेंच एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (French Academy of Sciences) से मानक प्रणाली विकसित करने का अनुरोध किया।⦁ ➲ 1795: फ़्रांस ने आधिकारिक रूप से मेट्रिक प्रणाली अपनाई।⦁ ➲ 1840: फ़्रांसीसी सरकार ने नागरिकों के लिए इसका उपयोग अनिवार्य किया।⦁ ➲ 1866: संयुक्त राज्य अमेरिका (United States) में मेट्रिक प्रणाली का उपयोग वैध घोषित हुआ, हालांकि अनिवार्य नहीं था।⦁ ➲ 1875: मीटर की संधि पर हस्ताक्षर किए गए और अंतर्राष्ट्रीय वज़न एवं माप ब्यूरो सम्मेलन (International Bureau of Weights and Measures Conference) आयोजित हुआ।⦁ ➲ 1957: अमेरिकी सेना (United States Army) और मरीन कॉर्प्स (Marine Corps) ने इसे अपने उपकरणों के मानक के रूप में अपनाया।⦁ ➲ 1965: ग्रेट ब्रिटेन (Great Britain) ने मेट्रिक प्रणाली अपनाने की प्रक्रिया शुरू की।⦁ ➲ 1988: ओम्निबस ट्रेड एंड कॉम्पिटिटिवनेस एक्ट (Omnibus Trade and Competitiveness Act) के तहत संघीय एजेंसियों को व्यापार में मेट्रिक प्रणाली उपयोग करने का निर्देश दिया गया।गणितीय रूप से, मेट्रिक रूपांतरण किलोग्राम, मीटर और सेकेंड पर आधारित होते हैं। क्षेत्रफल को वर्ग मीटर (m²) में और आयतन को घन मीटर (m³) में मापा जाता है। एक घन मीटर = 1,000 लीटर होता है, अर्थात 1 लीटर = 1/1,000 m³। समय की गणना में 1 घंटा = 60 मिनट, 1 मिनट = 60 सेकेंड और इस प्रकार 1 घंटा = 3,600 सेकेंड होता है। वहीं, 1 दिन = 24 घंटे = 86,400 सेकेंड के बराबर होता है।लेकिन आधुनिक मापन प्रणालियों के विकसित होने से पहले माप कैसे किए जाते थे? इसे समझने के लिए मुग़ल काल की व्यवस्था पर नज़र डालना उपयोगी होगा।मुग़ल काल में भारत में कई प्रकार की मापन इकाइयाँ प्रचलित थीं। कपड़ों को मापने के लिए अकबर का शाही गज़ (Akbar’s Royal Yard) उपयोग किया जाता था, जिसकी लंबाई लगभग 46 अंगुल होती थी। कृषि भूमि और इमारतों के लिए इस्कंधरी गज़ का प्रयोग होता था। विभिन्न गज़ों के कारण उत्पन्न समस्याओं को दूर करने के लिए इलाही गज़ (Ilahigaz) नामक एक मानक इकाई शुरू की गई, जिसकी लंबाई लगभग 33 से 34 इंच थी और जिसे आम जनता ने भी अपनाया।भूमि मापने के लिए बीघा (Bigha) का उपयोग किया जाता था, जिसकी लंबाई और चौड़ाई सामान्यतः 60 गज़ मानी जाती थी। गज़ और बीघा मुग़ल मापन प्रणाली की प्रमुख इकाइयाँ थीं।इन मापों के बीच संबंध इस प्रकार थे:⦁ ➲ 1 हाथ = 8 गिरह⦁ ➲ 1 गज़ = 2 हाथ⦁ ➲ 1 काठी = 5 और 5/6 हाथ⦁ ➲ 1 पंड = 20 काठी⦁ ➲ 1 बीघा = 20 पंड⦁ ➲ 1 बीघा = 20 विश्वा⦁ ➲ 1 विश्वा = 20 विश्वांसभारत में 1956 तक, जब मेट्रिक प्रणाली आधिकारिक रूप से लागू नहीं हुई थी, तब तक गज़ जैसी पारंपरिक इकाइयों का व्यापक उपयोग होता रहा।स्पष्ट है कि मापन इकाइयों की यह यात्रा—शाही गज़ से लेकर आधुनिक मेट्रिक प्रणाली तक—मानव सभ्यता की वैज्ञानिक प्रगति और मानकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रही है, जिसने आज हमारे जीवन को अधिक सटीक, सरल और व्यवस्थित बना दिया है।संदर्भhttps://tinyurl.com/2ddozczz https://tinyurl.com/2cwhuvag https://tinyurl.com/22ez3rmu https://tinyurl.com/y2dnkd9o
नदियाँ और नहरें
लखनऊ शहर में जल निकायों की भूमिका और वर्तमान स्थिति
उत्तर प्रदेश की राजधानी होने के नाते हमारा शहर लखनऊ अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं के लिए पूरे देश में विशेष पहचान रखता है। यही वजह है कि लखनऊ का समग्र और तेज़ विकास सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। लेकिन इस तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के बीच हमें यह भी गंभीरता से सोचना होगा कि कहीं आधुनिक सुविधाओं और शहरी विस्तार की चाह हमारी प्राकृतिक धरोहरों को नुकसान तो नहीं पहुँचा रही है। विकास की इस दौड़ में यदि जल निकायों और नदियों की अनदेखी होती रही, तो इसके दुष्परिणाम पूरे शहर को भविष्य में भुगतने पड़ सकते हैं।तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के चलते लखनऊ अपने जल निकायों का लगभग 46 प्रतिशत हिस्सा पहले ही खो चुका है। जो जल निकाय बचे भी हैं, उनमें से अधिकांश आज अपशिष्ट और सीवेज से बुरी तरह प्रदूषित हो चुके हैं। लखनऊ नगर निगम के एक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 1952 में शहर में 964 तालाब मौजूद थे, लेकिन 2006 तक इनकी संख्या घटकर केवल 494 रह गई। नगर निगम के भूमि रिकॉर्ड यह भी बताते हैं कि शहर में दर्ज कई टैंक और तालाब अब सुधार और अतिक्रमण के कारण पहचान से बाहर हो चुके हैं।तालाब और जलाशय प्राकृतिक रूप से स्पंज तथा थर्मो-रेगुलेटर (damper and thermo-regulator) की तरह काम करते हैं। ये वर्षा जल के संचय में मदद करते हैं और भूजल स्तर को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन लखनऊ के मुख्य शहरी क्षेत्रों में जल निकायों के लगभग समाप्त हो जाने से शहर भविष्य में गंभीर बाढ़ के खतरे की ओर बढ़ रहा है। पिछले एक दशक में लखनऊ चार बड़ी बाढ़ की घटनाओं का सामना कर चुका है, जो इस खतरे की स्पष्ट चेतावनी हैं।शहर की गोमती नदी की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। गोमती एक भूजल-आधारित नदी है, जो अपनी सहायक नदियों से पुनः भरती रहती है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Uttar Pradesh Pollution Control Board – UPPCB) के आँकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में गोमती का प्रवाह 35 से 40 प्रतिशत तक कम हो चुका है। कई स्थानों पर नदी में पानी इतना कम रह गया है कि उसे पैदल पार किया जा सकता है। लखनऊ में लगभग 13 किलोमीटर तक बहने वाला गोमती का यह हिस्सा आज अपनी सबसे खराब स्थिति में है और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board – CPCB) द्वारा इसे देश के सबसे प्रदूषित नदी खंडों में शामिल किया गया है।विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ता जैविक दबाव, पारिस्थितिक प्रवाह में कमी, सहायक नदियों की दुर्दशा, नदी के जलग्रहण क्षेत्र में गाद भराव और अतिक्रमण—इन सभी कारणों ने मिलकर गोमती को सीवेज और कीचड़ से भर दिया है। जानकारों का यह भी कहना है कि लखनऊ के आसपास लगभग 300 जलाशयों के निर्माण की योजनाओं और अवैध अतिक्रमण के चलते स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। पूरे उत्तर प्रदेश में अतिक्रमण के कारण एक लाख से अधिक जलाशय—जिनमें टैंक, तालाब, झीलें और कुएँ शामिल हैं—नष्ट हो चुके हैं।गोमती नदी में प्रदूषण को नियंत्रित करने का पहला संगठित प्रयास वर्ष 1993 में केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा शुरू की गई गोमती कार्य योजना के तहत किया गया था। इस योजना का उद्देश्य नालों को टैप करना और सीवेज को उपचार संयंत्रों तक पहुँचाना था। इसके बावजूद, आज भी बड़ी मात्रा में अनुपचारित सीवेज सीधे नदी में बह रहा है। इसके बाद अप्रैल 2015 में राज्य सरकार ने गोमती पुनरुद्धार परियोजना शुरू की, जिसके तहत नदी की सफाई, तटों को मज़बूत करने और सौंदर्यीकरण की योजना बनाई गई। गोमती बैराज तक नदी के पुनरुद्धार की अनुमानित लागत लगभग 600 करोड़ रुपये तय की गई थी। हालांकि, अतिक्रमण और शहरी दबाव के कारण इन प्रयासों के अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ सके।जल निकायों पर बढ़ते अतिक्रमण को रोकने के लिए सरकार और सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर हस्तक्षेप किए हैं। वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि प्राकृतिक झीलों और तालाबों की सुरक्षा जीवन के अधिकार का हिस्सा है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मूल अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसके बावजूद, लखनऊ के आधिकारिक रिकॉर्ड एक अलग और चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।वर्ष 2014 में पर्यावरण कार्यकर्ता अशोक शंकरम द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर एक याचिका में शहर के 37 जल निकायों पर हुए अतिक्रमण का मुद्दा उठाया गया था। इसके जवाब में अदालत ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (Lucknow Development Authority – LDA) और लखनऊ नगर निगम से स्पष्टीकरण माँगा। लेकिन 2015 में दिए गए जवाब में अतिक्रमण के खिलाफ उठाए गए ठोस कदमों की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि झीलों और तालाबों को अतिक्रमण मुक्त कराना एलडीए और नगर निगम का वैधानिक कर्तव्य है।जल निकायों से अतिक्रमण हटाने की मांग करने वाले अधिवक्ता मोतीलाल यादव का कहना है कि लखनऊ के आसपास सैकड़ों जलाशयों पर निर्माण की योजनाओं ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। हालांकि हाल के वर्षों में लखनऊ जिला प्रशासन ने जल निकायों और सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए अभियान शुरू किए हैं। जिला मजिस्ट्रेट के अनुसार, इन अभियानों का उद्देश्य न केवल तालाबों और जल निकायों का पुनरुद्धार करना है, बल्कि सरकारी भूमि को भी अतिक्रमण से मुक्त कराना है। इसी क्रम में सरोजनीनगर तहसील से शुरू किए गए अभियान के तहत राजस्व विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों की टीम ने लगभग 12 बीघा भूमि से अतिक्रमण हटाया, जिसकी बाज़ार कीमत करीब 7 करोड़ 84 लाख रुपये आँकी गई है।संदर्भhttps://bit.ly/3sPYxQY https://bit.ly/3yQ0HE3 https://bit.ly/3wFhvwi https://tinyurl.com/ytxu4mx5
प्रारंभिक मध्यकाल : 1000 ई. से 1450 ई.
कैसे ममलूक वंश ने भारत में सल्तनती सत्ता और नई वास्तुकला की शुरुआत की?
लखनऊवासियों, आज हम एक ऐसे ऐतिहासिक विषय पर बात करने जा रहे हैं जो भले ही सीधे हमारे शहर से जुड़ा न हो, लेकिन भारत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य इतिहास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है - दिल्ली सल्तनत और उसके प्रथम राजवंश, ममलूक वंश का उदय। जिस तरह लखनऊ अपनी तहज़ीब, नक़्क़ाशीदार इमारतों और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए प्रसिद्ध है, उसी तरह सल्तनत काल की इमारतों और स्थापत्य शैलियों ने भी भारत की वास्तुकला की दिशा निर्धारित की। यही कारण है कि इस विषय को समझना हमें यह जानने में मदद करता है कि सदियों पहले भारत में किस तरह की सत्ता, किस तरह की इमारतें और किस तरह की तकनीकें विकसित हुईं - और वे आगे चलकर हमारी आधुनिक कलात्मक विरासत का आधार कैसे बनीं।आज के इस लेख में हम क्रमबद्ध रूप से पाँच महत्वपूर्ण पहलुओं को सरल भाषा में समझेंगे। सबसे पहले, हम जानेंगे कि दिल्ली सल्तनत कैसे स्थापित हुई और ममलूक वंश की शुरुआत में मुहम्मद घोरी, कुतुब-उद-दीन ऐबक और इल्तुतमिश की भूमिका क्या रही। इसके बाद, हम ममलूक शासकों की प्रशासनिक चुनौतियों और उनकी नीतियों पर नज़र डालेंगे, जिनसे सल्तनत मजबूत हुई। फिर हम समझेंगे कि सल्तनत काल की वास्तुकला कैसे भारतीय, इस्लामी और मध्य-एशियाई शैलियों का सुंदर मिश्रण बनी। इसके बाद हम उन प्रमुख इमारतों के बारे में जानेंगे - जैसे कुतुब मीनार, अलाई दरवाज़ा और तुगलकाबाद - जिन्होंने इस युग की पहचान बनाई। अंत में, हम देखेंगे कि चूना-गारा, आर्कुएट (Arcuate - धनुषाकार) तकनीक और गुम्बद-निर्माण जैसी नई तकनीकों ने भारतीय वास्तुकला में कैसे बड़ा परिवर्तन लाया।दिल्ली सल्तनत का उदय और ममलूक (गुलाम) वंश की स्थापनादिल्ली सल्तनत का इतिहास वास्तव में 12वीं सदी के उत्तरार्ध में घुरिद साम्राज्य के विस्तार से शुरू होता है। घुर के शासक मुहम्मद घोरी ने जब 1192 में तराइन की दूसरी लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को हराया और फिर 1194 में चंदावर की लड़ाई में जयचंद पर विजय प्राप्त की, तब उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा उनके नियंत्रण में आ गया। वे स्वयं भारत में अधिक समय नहीं रुके, इसलिए प्रशासन संचालन का दायित्व उन्होंने अपने सबसे विश्वस्त सैन्य अधिकारी कुतुब-उद-दीन ऐबक को सौंपा, जो उनका दास होने के बावजूद एक कुशल योद्धा, रणनीतिकार और संगठक था।1206 में मुहम्मद घोरी की मृत्यु के बाद ऐबक ने दिल्ली में स्वतंत्र सत्ता स्थापित की और इसी क्षण से दिल्ली सल्तनत के प्रथम राजवंश - ममलूक वंश - का जन्म हुआ। “ममलूक” शब्द अरबी से आया है, जिसका अर्थ है “स्वामी-निर्मित दास” या प्रशिक्षित सैनिक। ये साधारण दास नहीं थे, बल्कि अत्यंत सक्षम, निष्ठावान और युद्धकला में दक्ष योद्धा होते थे।ऐबक के बाद उसके दामाद और उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने सल्तनत को एक सुसंगठित, शक्तिशाली और स्थिर राज्य का स्वरूप दिया। कूटनीति, सैन्य-व्यवस्था और प्रशासनिक सुधारों के कारण इल्तुतमिश को वास्तव में दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।ममलूक शासकों का शासन, चुनौतियाँ और प्रशासनिक मजबूतीजब 1211 में इल्तुतमिश ने सत्ता संभाली, तब सल्तनत अभी भी नवजात अवस्था में थी और उसे कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। पहली चुनौती पश्चिमी सीमा पर मंगोलों का लगातार दबाव था, जिन्होंने मध्य एशिया में उथल-पुथल मचा रखी थी और भारत की दिशा में भी नजरें टिकाई थीं। दूसरी चुनौती तुर्की अमीरों की शक्ति थी, जो दरबार में अपने प्रभाव को बढ़ाकर सुल्तान की शक्ति को कमजोर करना चाहते थे। तीसरी चुनौती भारतीय हिंदू सरदारों की स्वतंत्रता-प्रियता थी, जिन्हें सल्तनत की अधीनता कबूल करवाना आवश्यक था। इल्तुतमिश ने शक्तिशाली सेना, संगठित प्रशासन और समझदारीपूर्ण गठबंधन-नीति के माध्यम से इन तीनों क्षेत्रों में सफलता पाई। उसके शासन के बाद उसकी योग्य पुत्री रज़िया सुल्तान ने सत्ता संभाली - जो भारतीय इतिहास की पहली मुस्लिम महिला शासक थीं। लेकिन तुर्क अमीर एक महिला को सत्ता में देखकर असंतुष्ट हुए और अंततः रज़िया को अपदस्थ कर दिया।राजनीतिक अस्थिरता के बाद सत्ता गियास-उद-दीन बलबन के हाथों में पहुँची, जिसने शाही मर्यादा, अनुशासन और राजसत्ता की “दैवीय छवि” को अत्यधिक सुदृढ़ किया। बलबन ने मंगोलों के विरुद्ध व्यापक सुरक्षा-तंत्र तैयार किया और दरबार में कठोर “ज़ाब्ते” लागू किए। उसके शासन में सल्तनत पुनः एक मजबूत और स्थिर साम्राज्य बन गई।सल्तनत काल की वास्तुकला: उद्भव, विशेषताएँ और सांस्कृतिक संगमसल्तनत काल वास्तुकला के इतिहास में एक क्रांतिकारी चरण था। इस अवधि में जन्म लेने वाली इमारतें केवल धार्मिक या राजनीतिक प्रतीक नहीं थीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी, मध्य एशियाई और भारतीय कला का अनोखा संगम थीं। यह वह दौर था जब भारत में पहली बार स्पष्ट रूप से विकसित इंडो-इस्लामिक (Indo-Islamic) वास्तुकला दिखाई देती है - एक ऐसा कला-रूप जिसमें हिंदू-जैन मंदिरों की परंपरागत मूर्तिकारी और भारतीय पत्थर-शिल्प, इस्लामी जगत की मेहराबों, गुम्बदों, ज्यामितीय डिजाइन और ईंट-निर्माण तकनीकों के साथ मिश्रित होते हैं। सल्तनत काल की वास्तुकला तीन प्रमुख रूपों में विकसित हुई - दिल्ली की शाही शैली, जो मुख्यतः सुल्तानों द्वारा संरक्षित थी; प्रांतीय सल्तनती शैली, जो बंगाल, गुजरात और दक्कन में विकसित हुई; तथा हिंदू शासकों के अधीन विकसित शैली, जिसमें राजस्थानी और दक्षिण भारतीय तत्वों का प्रभाव था। यह विविधता आगे चलकर उस विशाल वास्तु-परंपरा का आधार बनी जिसने मुगल काल में अपनी चरम सुंदरता प्राप्त की।प्रमुख इमारतें और सुल्तानों का स्थापत्य योगदानसल्तनत काल में निर्मित इमारतों की श्रृंखला अत्यंत विस्तृत है और इनमें से कई भारत की ऐतिहासिक पहचान बन चुकी हैं। सबसे पहले कुतुब-उल-इस्लाम मस्जिद और अढ़ाई दिन का झोंपड़ा का उल्लेख किया जाता है, जिनमें हिंदू-जैन स्थापत्य की मूर्तिकारी और इस्लामी विन्यास का अद्वितीय सम्मिश्रण देखा जाता है। इसके बाद आती है कुतुब मीनार, जो ईंट-निर्मित मीनारों में विश्व के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक है। ऐबक ने इसकी नींव रखी, इल्तुतमिश ने तीन मंज़िलें बनवाईं और बाद में फ़िरोज़ तुगलक ने इसे और ऊँचा तथा भव्य बनाया।अन्य उल्लेखनीय स्थापत्य योगदानों में शामिल हैं—सुल्तान-ए-गारी का मकबरा, भारत का पहला मकबराहौज़-ए-शम्सी, जो जल-विनियोजन की अद्भुत समझ दर्शाता हैअलाई दरवाज़ा, जो शुद्ध इस्लामी वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना हैतुगलकाबाद, जहाँपनाह, और फ़िरोज़ाबाद - तीन बड़े शाही शहरलोदी और सैय्यद शासकों द्वारा बनवाए गए गुम्बद-दार मकबरे, जिनमें भारत में “बाग़-वाले मकबरों” की परंपरा की शुरुआत हुईये सभी इमारतें न केवल सुल्तानों की शक्ति, बल्कि उस समय की अभियांत्रिकी, कला और सौंदर्य-बोध को भी उजागर करती हैं।सल्तनत काल में निर्माण तकनीकें: आर्कुएट शैली और नई सामग्रियाँसल्तनत काल में भारत की निर्माण-तकनीक में एक मूलभूत परिवर्तन आया। इस काल में पहली बार चूना-गारा (Lime mortar), जिप्सम (Gypsum), सुरखी, और पकी ईंटों का बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ। इन नई सामग्रियों ने निर्माण को तेज, सस्ता और टिकाऊ बना दिया। सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन था आर्कुएट तकनीक का विकास - यानी मेहराबों और गुम्बदों की मदद से विशाल, बिना स्तंभों वाले आंतरिक स्थानों का निर्माण। मेहराबों में प्रयुक्त वौसोइर (पच्चर-आकार के पत्थर) और केंद्र-पत्थर (keystone) ने इमारतों को पहले से कहीं अधिक स्थिर और ऊँचा बनाने की क्षमता प्रदान की। कम लागत और बेहतर स्थायित्व के कारण मस्जिदों, मकबरों, महलों, सरायों, बारादरियों और बाजारों के निर्माण में तेजी आई। यह तकनीकी परिवर्तन आगे मुगल काल की उच्च स्तरीय वास्तुकला की नींव बना।भारतीय–इस्लामी प्रभावों का मिलन और उसका ऐतिहासिक महत्वसल्तनत काल का स्थापत्य भारत की सांस्कृतिक विविधता और सह-अस्तित्व का उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रारंभिक मस्जिदें और भवन कई बार परित्यक्त हिंदू-जैन मंदिरों, संस्कृत महाविद्यालयों और अन्य संरचनाओं पर निर्मित किए गए, जिसके परिणामस्वरूप इन इमारतों में भारतीय शिल्प - जैसे आलंकरण, फूल-पत्ती के डिज़ाइन, कमल आकृति, और अलंकारिक स्तंभ - स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इससे एक नया मिश्रणात्मक स्थापत्य-रूप उभरा, जिसने न केवल सल्तनत काल बल्कि आगे के सैय्यद, लोदी और मुगल काल को भी प्रभावित किया। यही प्रभाव भारत में इस्लामी स्थापत्य को स्थानीय विशेषताओं के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सफल बना, जिसके कारण इस युग की इमारतें आज भी भारत की कला-परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं।संदर्भ - https://tinyurl.com/29uxyr9x https://tinyurl.com/bdz6cbr8 https://tinyurl.com/2u3m8p29 https://tinyurl.com/38axrksh
विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
महात्मा गांधी की शहादत: एक राष्ट्र, एक विचारधारा और अमर नैतिक विरासत
लखनऊवासियो, भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि त्याग, नैतिकता और आत्मबल की एक गहरी यात्रा था और इस यात्रा के केंद्र में महात्मा गांधी का नाम सबसे उज्ज्वल रूप में उभरता है। 30 जनवरी का दिन हमें उस क्षण की याद दिलाता है, जब देश ने अपने नैतिक मार्गदर्शक को खो दिया, लेकिन उनके विचार और मूल्य हमेशा के लिए अमर हो गए। यही कारण है कि हर वर्ष 30 जनवरी को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि महात्मा गांधी के विचारों, उनके बलिदान और उनके द्वारा दिए गए संदेश को याद किया जा सके। शहीद दिवस हमें गांधी जी के बलिदान, अहिंसा और सत्य के संदेश को फिर से आत्मसात करने का अवसर देता है।आज के इस लेख में हम सबसे पहले महात्मा गांधी के व्यक्तित्व और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका को समझेंगे। इसके बाद 30 जनवरी 1948 की उस घटना पर चर्चा करेंगे, जिसने पूरे देश को शोक में डुबो दिया। फिर हम गांधी जी के विचारों और सिद्धांतों को जानेंगे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को नैतिक दिशा दी। आगे उनके प्रमुख आंदोलनों और योगदान पर नज़र डालेंगे। अंत में, हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि उनकी शहादत आज के भारत में क्यों और कैसे प्रासंगिक बनी हुई है।महात्मा गांधी का परिचय और स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिकामहात्मा गांधी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली और केंद्रीय व्यक्तित्व थे। उन्होंने न केवल अंग्रेज़ी शासन के ख़िलाफ़ जनआंदोलनों का नेतृत्व किया, बल्कि आम जनता को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने का कार्य भी किया। उनके नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन एक जनआंदोलन बना, जिसमें हर वर्ग और हर आयु के लोग शामिल हुए। गांधी जी का व्यक्तित्व सादगी, अनुशासन और नैतिकता का प्रतीक था, जिसने उन्हें “राष्ट्रपिता” के रूप में स्थापित किया। उन्होंने संघर्ष के दौरान यह सिद्ध किया कि नैतिक शक्ति और जनसमर्थन किसी भी साम्राज्यवादी ताक़त से अधिक प्रभावशाली हो सकते हैं।30 जनवरी 1948: महात्मा गांधी की हत्या और शहीद दिवस30 जनवरी 1948 का दिन भारतीय इतिहास के सबसे पीड़ादायक और अविस्मरणीय क्षणों में से एक माना जाता है। इसी दिन महात्मा गांधी की उनकी नियमित प्रार्थना सभा के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ ही महीनों बाद हुई, जब देश अभी नवस्वतंत्र भारत की दिशा और भविष्य को आकार दे रहा था। गांधी जी की हत्या की खबर ने पूरे देश को गहरे शोक और स्तब्धता में डुबो दिया। लाखों लोगों के लिए यह केवल एक नेता की मृत्यु नहीं थी, बल्कि नैतिक नेतृत्व और मानवीय मूल्यों की क्षति थी। उनकी शहादत उस विचारधारा पर प्रहार थी, जो अहिंसा, सह-अस्तित्व, धार्मिक सौहार्द और सामाजिक समरसता पर आधारित थी। यही कारण है कि 30 जनवरी को हर वर्ष शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि महात्मा गांधी के बलिदान, उनके संघर्ष और उनके जीवन मूल्यों को स्मरण किया जा सके और आने वाली पीढ़ियों को उनके आदर्शों से प्रेरणा मिल सके।महात्मा गांधी के विचार और सिद्धांतमहात्मा गांधी के विचार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा और दिशा तय करने वाले सिद्धांत थे। सत्याग्रह और अहिंसा उनके सबसे प्रमुख और प्रभावशाली विचार माने जाते हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने अन्याय, शोषण और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष किया। गांधी जी का विश्वास था कि किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनाए गए साधन उतने ही पवित्र और नैतिक होने चाहिए जितना स्वयं लक्ष्य। उनके अनुसार हिंसा से प्राप्त किया गया परिणाम स्थायी नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत नैतिकता और सामाजिक नैतिकता में कोई अंतर नहीं होना चाहिए, क्योंकि समाज की नैतिकता व्यक्तियों के आचरण से ही बनती है। उनके विचारों ने न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में संघर्ष और विरोध के तरीकों को एक नई दिशा दी। आज भी उनके विचार शांति, सहिष्णुता और संवाद के महत्व को रेखांकित करते हैं और आधुनिक समाज के लिए उतने ही प्रासंगिक बने हुए हैं।स्वतंत्रता संग्राम में गांधी के प्रमुख आंदोलन और योगदानमहात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिनका उद्देश्य आम जनता को जागरूक करना और ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ संगठित करना था। असहयोग आंदोलन के माध्यम से उन्होंने विदेशी शासन की वैधता को चुनौती दी, जबकि दांडी मार्च ने औपनिवेशिक कानूनों के अन्यायपूर्ण स्वरूप को दुनिया के सामने उजागर किया। इन आंदोलनों ने जनता में आत्मसम्मान और एकजुटता की भावना को मज़बूत किया। गांधी जी का योगदान केवल आंदोलनों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय एकता पर भी लगातार बल दिया।महात्मा गांधी की शहादत का महत्व और आज के भारत में प्रासंगिकतामहात्मा गांधी की शहादत आज भी भारत के लिए गहरा संदेश रखती है। उनके जीवन और बलिदान से यह सीख मिलती है कि हिंसा के बिना भी बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन संभव हैं। आज के समय में, जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, गांधी जी के विचार—सहिष्णुता, संवाद और शांति—और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। शहीद दिवस केवल अतीत को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन का अवसर भी है कि हम गांधी जी के मूल्यों को अपने जीवन और समाज में कितना आत्मसात कर पा रहे हैं।संदर्भ-https://tinyurl.com/ykv9knxm https://tinyurl.com/5ec5yjz9
घर - आंतरिक सज्जा/कुर्सियाँ/कालीन
कैसे पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर, लखनऊ के घरों को संस्कृति, सौंदर्य और पहचान देता है
लखनऊवासियों के लिए घर केवल चार दीवारों का ढाँचा नहीं, बल्कि तहज़ीब, सलीक़े और सांस्कृतिक विरासत का विस्तार होता है। यहाँ की जीवनशैली में कला, नफ़ासत और संतुलन की झलक हर चीज़ में दिखाई देती है - चाहे वह पहनावा हो, खानपान या फिर घर की सजावट। ऐसे में फ़र्नीचर केवल उपयोग की वस्तु नहीं रहता, बल्कि वह घर के व्यक्तित्व और सोच को भी दर्शाता है। आज लखनऊ के बाज़ारों में पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर और आधुनिक डिज़ाइनों का ऐसा सुंदर संगम देखने को मिलता है, जो अतीत की कारीगरी और वर्तमान की ज़रूरतों - दोनों को साथ लेकर चलता है। भारतीय फ़र्नीचर की यह यात्रा सदियों पुराने सामाजिक बदलावों, विदेशी प्रभावों और स्थानीय शिल्प परंपराओं से होकर आज के स्वरूप तक पहुँची है।आज इस लेख में हम भारतीय फ़र्नीचर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके विकास को समझेंगे। इसके बाद मध्यकालीन भारत में शाही संरक्षण और फ़र्नीचर निर्माण की भूमिका पर चर्चा करेंगे। फिर मुगल काल और यूरोपीय प्रभावों से बनी विविध फ़र्नीचर शैलियों को जानेंगे। आगे भारतीय फ़र्नीचर में प्रयुक्त नक्काशी, जड़ाई और सामग्रियों के महत्व पर बात करेंगे। अंत में, उन पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर वस्तुओं को समझेंगे, जो आज लखनऊ सहित देशभर में फिर से लोकप्रिय हो रही हैं।भारतीय फ़र्नीचर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विकास यात्राप्राचीन भारत में फ़र्नीचर आज की तरह रोज़मर्रा के जीवन का अनिवार्य हिस्सा नहीं था। लोग अधिकतर फ़र्श पर बैठकर जीवन व्यतीत करते थे और साधारण जीवनशैली को महत्व दिया जाता था। फिर भी, वेदिक ग्रंथों और प्राचीन साहित्य में पीढ़ा, खाटा, मुंडा और चौकी जैसी कुछ फ़र्नीचर वस्तुओं का उल्लेख मिलता है। ये वस्तुएँ विशेष अवसरों, धार्मिक कार्यों या विशिष्ट वर्ग तक ही सीमित थीं। धीरे-धीरे समाज की संरचना बदली, निजी स्थानों की अवधारणा विकसित हुई और आराम व सुविधा को अधिक महत्व मिलने लगा। इसी क्रम में फ़र्नीचर की उपयोगिता बढ़ी और वह धीरे-धीरे भारतीय घरों का हिस्सा बनने लगा। यह विकास एकदम अचानक नहीं हुआ, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव और ज़रूरतों के साथ आकार लेता गया।मध्यकालीन भारत में फ़र्नीचर निर्माण और शाही संरक्षणमध्यकालीन भारत में फ़र्नीचर निर्माण को विशेष रूप से शाही संरक्षण प्राप्त हुआ। दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य के दौरान यह कला अपने चरम पर पहुँची। इस समय लकड़ी के कारीगरों को राजपरिवार का संरक्षण और सम्मान प्राप्त था, जिससे उनकी कला में निखार आया। उस दौर का फ़र्नीचर मुख्यतः राजसी उपयोग के लिए बनाया जाता था - जैसे सिंहासन, दरबारी आसन, महलों के दरवाज़े, खंभे और सजावटी संरचनाएँ। इन वस्तुओं में भव्यता, मजबूती और बारीक कारीगरी का अनोखा मेल दिखाई देता है। आम लोगों के घरों में फ़र्नीचर का प्रचलन अभी भी सीमित था, लेकिन यह काल भारतीय फ़र्नीचर कला की तकनीकी और सौंदर्यात्मक नींव को मज़बूत करने वाला साबित हुआ।मुगल काल में भारतीय फ़र्नीचर पर कलात्मक प्रभाव16वीं शताब्दी में मुगलों के आगमन के साथ उत्तर भारत में फ़र्नीचर की शैली में एक नया अध्याय शुरू हुआ। मुगल स्थापत्य और कला की तरह ही फ़र्नीचर में भी भव्यता, संतुलन और अलंकरण पर विशेष ध्यान दिया गया। गहरे रंग की दृढ़ लकड़ियाँ, हड्डी और हाथी दाँत की जड़ाई, शीशों का प्रयोग और जटिल नक्काशी इस दौर की प्रमुख विशेषताएँ रहीं। लेखन मेज़, टेबल, दीवान और आरामदायक आसनों का प्रचलन बढ़ा। लखनऊ जैसे शहर, जहाँ मुगल और बाद में नवाबी संस्कृति का गहरा प्रभाव रहा, वहाँ यह शैली फ़र्नीचर के डिज़ाइनों में आज भी दिखाई देती है। यही कारण है कि लखनऊ के पारंपरिक फ़र्नीचर में शाही ठाठ और नज़ाकत का अहसास बना रहता है।यूरोपीय प्रभाव और इंडो-यूरोपीय फ़र्नीचर शैलियों का विकास1500 के बाद भारत में पुर्तगाली, डच, फ़्रांसीसी और अंततः अंग्रेज़ों का आगमन हुआ। जब ये यूरोपीय समुदाय भारत में बसे, तो उन्हें अपने रहन-सहन के अनुसार फ़र्नीचर की आवश्यकता पड़ी। उन्होंने भारतीय कारीगरों से वही डिज़ाइन तैयार करने को कहा, जिनका उपयोग वे यूरोप में करते थे, लेकिन स्थानीय लकड़ी और कारीगरी के साथ। इससे भारतीय और यूरोपीय शैलियों का अद्भुत संगम देखने को मिला। गोवानीज़ (Goanese), इंडो-डच (Indo-Dutch) और एंग्लो-इंडियन (Anglo-Indian) जैसी फ़र्नीचर शैलियाँ इसी प्रक्रिया से विकसित हुईं। इन शैलियों में यूरोपीय ढाँचा, लेकिन भारतीय नक्काशी और सजावटी तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। यह दौर भारतीय फ़र्नीचर को वैश्विक प्रभावों से जोड़ने वाला साबित हुआ।भारतीय फ़र्नीचर में नक्काशी, जड़ाई और सामग्री का महत्वभारतीय फ़र्नीचर की सबसे बड़ी पहचान उसकी उत्कृष्ट नक्काशी और जड़ाई है। सागौन और आबनूस जैसी मज़बूत लकड़ियों का उपयोग इसे टिकाऊ बनाता है, जबकि हाथी दाँत, हड्डी और धातु की जड़ाई इसे विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करती है। पुष्प आकृतियाँ, ज्यामितीय पैटर्न और धार्मिक प्रतीक फ़र्नीचर को केवल उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि कला का रूप देते हैं। लखनऊ के कई पुराने घरों और हवेलियों में आज भी ऐसी कारीगरी के उदाहरण मिलते हैं, जो बीते समय की शिल्प परंपरा की गवाही देते हैं। यही कारीगरी भारतीय फ़र्नीचर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाती है।पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर जो आज फिर से लोकप्रिय हो रहे हैंआधुनिक जीवनशैली के बावजूद, पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर आज फिर से लोगों की पसंद बन रहा है। बाजोट पूजा और सजावट दोनों के लिए उपयोगी है और छोटे घरों में बहुउद्देशीय फ़र्नीचर की तरह काम करता है। प्राचीन सागौन की अलमारियाँ अब केवल भंडारण नहीं, बल्कि घर की शोभा बढ़ाने वाला तत्व बन गई हैं। रंग-बिरंगे कपड़ों से सजे भारतीय ओटोमन छोटे कमरों में अतिरिक्त बैठने की जगह प्रदान करते हैं। दीवान आज भी भारतीय घरों में आराम, संवाद और परंपरा का प्रतीक बना हुआ है, जबकि लकड़ी की जालियाँ आधुनिक घरों में भी निजता और सौंदर्य का संतुलन बनाए रखती हैं। इस प्रकार, पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर लखनऊ के घरों में न केवल अतीत की यादें संजोता है, बल्कि आधुनिक जीवन को सांस्कृतिक गहराई और विशिष्ट पहचान भी प्रदान करता है।संदर्भ https://tinyurl.com/5xbrztaf https://tinyurl.com/yhyj6bykhttps://tinyurl.com/5cvy7pxu
वास्तुकला I - बाहरी इमारतें
क्यों लखनऊ के किले, इमामबाड़ा और सिकंदर बाग आज भी हमारे इतिहास की धड़कन हैं?
लखनऊवासियों, आपका शहर अपनी नज़ाकत भरी तहज़ीब, शायरी और स्वाद के साथ-साथ अपने भव्य किलों और ऐतिहासिक इमारतों के लिए भी जाना जाता है। नवाबी दौर की यह धरती आज भी उन दीवारों, बुर्जों और गलियारों के ज़रिये अपने अतीत की कहानियाँ सुनाती है, जहाँ कभी सत्ता के फैसले लिए गए, युद्ध लड़े गए और कला व संस्कृति ने नया रूप पाया। लखनऊ की स्थापत्य विरासत केवल देखने की चीज़ नहीं है, बल्कि यह शहर की पहचान, आत्मसम्मान और ऐतिहासिक चेतना का हिस्सा है। इन्हीं इमारतों के माध्यम से हम समझ पाते हैं कि लखनऊ कैसे एक साधारण शहर से इतिहास, वीरता और शिल्पकला का जीवंत प्रतीक बना।आज के इस लेख में हम लखनऊ के इतिहास के पाँच दिलचस्प पहलुओं को छोटी-सी, आसान भाषा में समझेंगे। पहले जानेंगे कि लखनऊ के किले क्यों इतने ख़ास हैं और नवाबी-मुगल दौर में उनकी क्या भूमिका थी। फिर देखेंगे कि एक किले की दीवारें, गढ़, बुर्ज और खाइयाँ कैसे उसकी रक्षा की रीढ़ बनती थीं। इसके बाद बड़ा इमामबाड़ा की अनोखी बिना-सहारे वाली वास्तुकला और उसकी रहस्यमयी भूलभुलैया की कहानी पर नज़र डालेंगे। फिर सिकंदर बाग की उस वीरता भरी दास्तान को महसूस करेंगे, जहाँ 1857 के नायकों ने लड़कर इतिहास लिखा। और अंत में समझेंगे कि ये ऐतिहासिक इमारतें आज भी लखनऊ की पहचान, संस्कृति और गर्व को कैसे संभाले हुए हैं।लखनऊ के किलों और ऐतिहासिक स्थापत्य की महत्तालखनऊ के किले और ऐतिहासिक इमारतें सिर्फ ईंट-पत्थरों के ढांचे नहीं हैं - ये शहर की धड़कन, पहचान और स्मृतियाँ हैं। इन किलों में वह अतीत बसता है जिसने लखनऊ की तहज़ीब, राजनीति और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को आकार दिया। नवाबी और मुगल शासनकाल के दौरान इन स्थापनाओं का निर्माण सिर्फ सुरक्षा के उद्देश्य से नहीं हुआ था, बल्कि वे शक्ति, समृद्धि, कलात्मक रुचि और शासन की प्रतिष्ठा के प्रतीक भी थे। बड़ा इमामबाड़ा, सिकंदर बाग, रेज़िडेंसी (residency) और कई अन्य इमारतें आज भी उस दौर की वास्तुकला की कुशलता और सौंदर्यबोध का प्रमाण हैं। हर दीवार, हर मेहराब, हर गलियारा उस समय के युद्धों, सियासी फैसलों, सांस्कृतिक आयोजनों और शिल्पकारों की अद्भुत कला का दर्पण है। इन्हें देखकर आज भी लखनऊवासी अपने इतिहास से गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं।किले की संरचना: रक्षा, रणनीति और वास्तुकला की मूल विशेषताएँमध्यकालीन किले एक गहरी रणनीतिक सूझबूझ और सटीक इंजीनियरिंग के साथ बनाए जाते थे। इनकी ऊँची और मजबूत दीवारें दुश्मनों का सबसे पहला अवरोध होती थीं, जबकि प्राचीर सैनिकों को सुरक्षित चलते हुए युद्ध संचालन करने का रास्ता प्रदान करती थीं। इसी के साथ गढ़, यानी दीवार के बाहर निकला हुआ सुदृढ़ ढांचा, सैनिकों को विभिन्न दिशाओं से हमला करने की शक्ति देता था। किलों के चारों ओर बनी खाइयाँ अक्सर गहरी और चौड़ी होती थीं, ताकि आक्रांताओं के लिए किले की दीवार तक पहुँचना लगभग असंभव हो जाए - कुछ जगहों पर इन्हें और भी भयावह बनाने के लिए मगरमच्छ या अन्य खतरनाक जीव भी छोड़े जाते थे। किलों के भव्य गेट सिर्फ प्रवेश-द्वार नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का माध्यम भी थे। इनके ऊपर अक्सर नक्काशी, धातु की कारीगरी और मज़बूत लकड़ी - लोहा लगा होता था। ऊँचेवॉच टावर दूर तक निगरानी रखने के लिए बनाए जाते थे, जबकि प्राचीर के किनारे बनी पैरापेट (Parapets), मेरलॉन (merlons) और क्रेनेल (crenels) सैनिकों को सुरक्षित खड़े होकर हमला करने की सुविधा देती थीं। बुर्ज किले की दीवारों से बाहर निकले ऊँचे टॉवर थे, जहाँ से तोप और बंदूकें चलाई जाती थीं। इन सभी संरचनाओं का संयोजन एक किले को अभेद्य, शक्तिशाली और कलात्मक बनाता था - और यही विशेषताएँ लखनऊ के ऐतिहासिक स्थलों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।बड़ा इमामबाड़ा: वास्तुकला का चमत्कार और लखनऊ का गौरवबड़ा इमामबाड़ा, जिसे असफ़ी इमामबाड़ा भी कहा जाता है, लखनऊ की ऐतिहासिक और वास्तु विरासत का सबसे शानदार प्रमाण है। 18वीं शताब्दी में नवाब आसफ़-उद-दौला द्वारा बनवाई गई इस इमारत का सबसे अद्भुत पहलू इसका मुख्य हॉल है - जिसमें एक भी पिलर या बीम नहीं है, फिर भी यह दुनिया की सबसे विशाल मेहराबदार संरचनाओं में शुमार है। यह इंजीनियरिंग का ऐसा चमत्कार है जिसकी मिसाल दुनिया में बहुत कम मिलती है। इस इमारत का सबसे रोचक हिस्सा भूलभुलैया है, जिसमें 489 एक जैसे दरवाज़े हैं। तंग गलियारे और मोड़-घुमाव इस तरह बनाए गए हैं कि कोई भी आसानी से दिशा भ्रमित हो सकता है। बताया जाता है कि यह भूलभुलैया सुरक्षा व्यवस्था, प्राकृतिक ठंडक और घुसपैठियों को भ्रमित करने के उद्देश्य से बनाई गई थी। बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण सिर्फ वास्तुकला की दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवता की भावना से भी महान है - 1784 के अकाल के समय इस परियोजना ने हज़ारों लोगों को रोज़गार देकर उनकी आजीविका बचाई थी। इस परिसर का रूमी दरवाज़ा, अपनी तुर्की शैली की नक्काशी और विशाल मेहराब के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध है। धार्मिक दृष्टि से भी यह स्थल अत्यंत महत्व रखता है, जहाँ विशेषकर मुहर्रम के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं। इस प्रकार, बड़ा इमामबाड़ा इतिहास, कला और अध्यात्म का एक अद्वितीय संगम है।सिकंदर बाग: कला, संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीकसिकंदर बाग लखनऊ के इतिहास में एक ऐसी जगह है जहाँ सौंदर्य और बलिदान दोनों एक साथ दर्ज हैं। नवाब वाजिद अली शाह ने इसे अपनी प्रिय पत्नी सिकंदर बेगम के लिए एक सुंदर उद्यान और विश्रामस्थल के रूप में बनवाया था। इसकी वास्तुकला, मस्जिदें और हरियाली उस समय की नवाबी शान को दर्शाती हैं। लेकिन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह शांत उद्यान अचानक एक भीषण युद्धस्थल में बदल गया। ब्रिटिश सेना ने यहाँ हमला किया और लगभग 2,000 भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने अद्भुत साहस दिखाते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया। इस युद्ध में उदा देवी, एक वीर दलित महिला योद्धा, ने अकेले कई अंग्रेज़ सैनिकों को मार गिराया था। उनकी बहादुरी आज भी प्रेरणा देती है। आज का सिकंदर बाग उस संघर्ष, बलिदान और देशभक्ति का जीवंत स्मारक है। इसकी दीवारें सिर्फ ईंटें नहीं, बल्कि उन शहीदों की यादें संभाले हुए हैं जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए।लखनऊ की ऐतिहासिक संरचनाएँ: अतीत की कहानियाँ और सांस्कृतिक पहचानलखनऊ की असंख्य ऐतिहासिक इमारतें - किले, महल, मस्जिदें, उद्यान और तोपखाने - शहर के समृद्ध अतीत की जीवंत गाथाएँ हैं। इनमें युद्धों की रणनीति, नवाबों की जीवनशैली, सांस्कृतिक उत्सवों और शिल्पकला की परंपराएँ छिपी हुई हैं। आज ये इमारतें केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक संरक्षण का माध्यम बन चुकी हैं। वे लखनऊ की पहचान को मजबूत करती हैं और हमें यह याद दिलाती हैं कि यह शहर सिर्फ वर्तमान में नहीं, बल्कि एक ऐसे गौरवशाली इतिहास में भी सांस लेता है जिसे दुनिया सलाम करती है।संदर्भ https://tinyurl.com/25qxtzm8 https://tinyurl.com/2ye6j4dj https://tinyurl.com/57kvwfa4
शहरीकरण - नगर/ऊर्जा
लखनऊ की बदलती ज़िंदगी और बढ़ता ई-वेस्ट:तकनीक की सुविधा और पर्यावरण की चुनौती
लखनऊवासियों, तेज़ी से बदलती तकनीक और बढ़ते डिजिटल उपयोग ने हमारे जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है, लेकिन इसके साथ एक गंभीर समस्या भी सामने आई है - इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट, यानी ई-वेस्ट (e-waste)। पुराने मोबाइल, लैपटॉप, टीवी, बैटरियाँ और घरेलू उपकरण आज हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं और इनके बेकार हो जाने के बाद उनका सही तरीके से निपटान न होना एक बड़ी चिंता बनता जा रहा है। भारत के अन्य शहरों की तरह लखनऊ भी इस बढ़ते ई-वेस्ट संकट से अछूता नहीं है, जिससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम लगातार बढ़ते जा रहे हैं।आज इस लेख में हम भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट की बढ़ती समस्या को समझेंगे। इसके बाद जानेंगे कि ई-वेस्ट के साथ कितनी कीमती धातुएँ नष्ट हो रही हैं। फिर हम उन शहरों पर नज़र डालेंगे जहाँ सबसे ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है। आगे, इसके पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की चर्चा करेंगे। इसके साथ ही, ई-वेस्ट के विभिन्न प्रकारों को समझेंगे और अंत में भारत में इसके पुनर्चक्रण की प्रक्रिया पर विस्तार से बात करेंगे।भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट की बढ़ती समस्याभारत आज दुनिया के सबसे बड़े इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट उत्पादकों में गिना जाने लगा है और हर साल लाखों टन ई-वेस्ट उत्पन्न कर रहा है। बीते कुछ वर्षों में इस कचरे की मात्रा में तेज़ी से वृद्धि दर्ज की गई है, जिसका मुख्य कारण उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का बढ़ता उपयोग और उनके जीवनकाल का लगातार कम होते जाना है। मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप, टीवी और घरेलू उपकरण अब जल्दी पुराने हो जाते हैं, जिससे कचरे की समस्या और गंभीर होती जा रही है। तेज़ी से शहरीकरण कर रहे शहरों में भी यह स्थिति साफ़ दिखाई देती है। यहाँ बढ़ती आबादी, डिजिटल निर्भरता और आधुनिक जीवनशैली के कारण इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खपत लगातार बढ़ रही है, जिससे ई-वेस्ट की मात्रा में भी निरंतर इज़ाफ़ा हो रहा है। अब यह समस्या केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मध्यम आकार के शहरों में भी ई-वेस्ट का प्रभावी प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन चुका है।इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के साथ नष्ट हो रही कीमती धातुएँइलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का सही ढंग से पुनर्चक्रण न होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसके साथ कई बहुमूल्य धातुएँ भी बेकार चली जाती हैं। पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में सोना, चांदी, तांबा, एल्युमिनियम (aluminum) और प्लास्टिक जैसी कीमती सामग्रियाँ मौजूद होती हैं, जिनका दोबारा उपयोग किया जा सकता है। भारत में हर साल ई-वेस्ट के ज़रिये अरबों रुपये मूल्य की ये धातुएँ नष्ट हो जाती हैं, जो सीधे-सीधे आर्थिक क्षति का कारण बनती हैं। इसके अलावा, जब ये धातुएँ पुनः प्राप्त नहीं की जातीं, तो नई धातुओं की आपूर्ति के लिए खनन गतिविधियाँ बढ़ानी पड़ती हैं, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचता है।भारत में सबसे अधिक इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न करने वाले शहरभारत में इलेक्ट्रॉनिक कचरे का सबसे अधिक उत्पादन बड़े शहरी केंद्रों में देखा जाता है। विभिन्न उद्योग संगठनों की रिपोर्टों के अनुसार, मुंबई, दिल्ली और बैंगलोर जैसे शहर ई-वेस्ट उत्पादन में सबसे आगे हैं। इन शहरों में आईटी उद्योग, कॉर्पोरेट कार्यालयों की अधिक संख्या और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स का व्यापक उपयोग इसकी प्रमुख वजह है। हालाँकि, यह समस्या केवल इन महानगरों तक सीमित नहीं रही है। शहरों में भी जैसे-जैसे तकनीक का उपयोग बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ई-वेस्ट की मात्रा भी बढ़ती जा रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि आने वाले समय में छोटे और मध्यम शहरों को भी इस चुनौती के लिए तैयार रहना होगा।इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभावइलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का अनुचित निपटान पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इसमें मौजूद भारी धातुएँ - जैसे सीसा, पारा और कैडमियम (Cadmium) - मिट्टी और जल स्रोतों में मिलकर उन्हें प्रदूषित कर सकती हैं। इससे कृषि भूमि की उर्वरता घटती है और पीने के पानी की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। यदि ई-वेस्ट को जलाया जाए या अनधिकृत तरीकों से नष्ट किया जाए, तो डाइऑक्सिन (Dioxin) और फ्यूरान (Furan) जैसी विषैली गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण को बढ़ाती हैं। इन रसायनों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से तंत्रिका तंत्र, गुर्दे, लीवर और यहाँ तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का ख़तरा भी बढ़ सकता है।इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के विभिन्न प्रकार और उनके स्रोतइलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट केवल मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा कहीं अधिक व्यापक है। इसमें बड़े घरेलू उपकरण - जैसे फ्रिज, वॉशिंग मशीन और ओवन (oven) - के साथ-साथ स्पीकर्स, साउंड सिस्टम (sound system), मेडिकल उपकरण, एलईडी लाइटें (LED lights), बैटरियाँ, वायरिंग, सौर ऊर्जा प्रणालियाँ और यहाँ तक कि बच्चों के इलेक्ट्रॉनिक खिलौने भी शामिल हैं। इन सभी उपकरणों में कई उपयोगी लेकिन खतरनाक सामग्रियाँ मौजूद होती हैं, जिन्हें यदि सामान्य कचरे के साथ फेंक दिया जाए, तो वे पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं। इसलिए इनका अलग से संग्रह और निपटान बेहद आवश्यक है।भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पुनर्चक्रण की प्रक्रियाभारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पुनर्चक्रण की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले, ई-वेस्ट का संग्रह और परिवहन किया जाता है, जिसके तहत इलेक्ट्रॉनिक कचरे को विशेष केंद्रों तक पहुँचाया जाता है। इसके बाद श्रेडिंग (shredding), छंटाई और पृथक्करण की प्रक्रिया से प्लास्टिक, धातु और कांच जैसी सामग्रियों को अलग-अलग किया जाता है। इन सभी चरणों के पूरा होने के बाद प्राप्त कच्चा माल दोबारा उपयोग के लिए तैयार किया जाता है और उसे नई इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं या अन्य उत्पादों के निर्माण में लगाया जा सकता है। इस तरह का संगठित और वैज्ञानिक पुनर्चक्रण न केवल पर्यावरण की रक्षा करता है, बल्कि आर्थिक रूप से भी लाभकारी साबित होता है और संसाधनों के संरक्षण में मदद करता है।संदर्भ https://tinyurl.com/22zk6j4e https://tinyurl.com/2xn3hr8w https://tinyurl.com/3u29w34s https://tinyurl.com/ykkjz2cz
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
आइए याद करें, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का साहसिक नेतृत्व और योगदान
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ!भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक आंदोलनों और पुरुष नेताओं की गाथा नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य महिलाओं के साहस, त्याग और अदम्य संकल्प की कहानी भी है, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए हर प्रकार के सामाजिक और व्यक्तिगत बंधनों को तोड़ा। ऐसे समय में, जब महिलाओं की भूमिका प्रायः घरेलू दायरे तक सीमित मानी जाती थी, उन्होंने आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर नेतृत्व किया, जेल यात्राएँ कीं, अत्याचार सहे और कई बार अपने प्राणों की आहुति तक दे दी। उनका योगदान स्वतंत्र भारत की नींव का वह मजबूत आधार है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। इस व्यापक संघर्ष में 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ, जिसमें अवध और उसकी राजधानी लखनऊ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में महिला नेतृत्व और जनसहभागिता ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।इस लेख में हम सबसे पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं के समग्र योगदान को समझेंगे और यह जानेंगे कि उन्होंने किन-किन रूपों में आंदोलन को मजबूत किया। इसके बाद, हम 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में लखनऊ और अवध की निर्णायक भूमिका पर चर्चा करेंगे, जहाँ संगठित जनप्रतिरोध ने अंग्रेज़ी सत्ता को हिला दिया। आगे, हम बेगम हज़रत महल के नेतृत्व, उनके सैन्य और प्रशासनिक प्रयासों तथा ब्रिटिश सत्ता को दी गई खुली चुनौती को विस्तार से जानेंगे। अंत में, हम रानी लक्ष्मीबाई, सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी और अन्य प्रमुख महिला स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान के माध्यम से यह समझेंगे कि भारतीय लोकतंत्र और गणतंत्र की नींव महिलाओं के संघर्ष और बलिदान से कैसे मजबूत हुई।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का समग्र योगदानभारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल राजनीतिक आंदोलनों, क्रांतियों और पुरुष नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत महिलाओं की कहानी भी है, जिन्होंने सामाजिक बंधनों, पारिवारिक जिम्मेदारियों और औपनिवेशिक दमन के बीच खड़े होकर आज़ादी की मशाल को जलाए रखा। जब देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब महिलाओं ने केवल समर्थनकर्ता की भूमिका नहीं निभाई, बल्कि वे आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़ी रहीं। उन्होंने जेल यात्राएँ कीं, लाठियाँ खाईं, अपने परिवारों को त्यागा और कई बार अपने प्राणों की आहुति भी दी। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के भारत में, जब महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रखने की सामाजिक प्रवृत्ति प्रबल थी, तब उनका स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल होना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी केंद्रों तक, महिलाओं ने सभाओं, जुलूसों, सत्याग्रहों और सशस्त्र आंदोलनों में भाग लिया। उन्होंने धन संग्रह, गुप्त संदेशों के आदान-प्रदान, शरण देने और घायल क्रांतिकारियों की देखभाल जैसे अनेक कार्यों के माध्यम से आंदोलन को मजबूत आधार प्रदान किया।1857 के विद्रोह में लखनऊ और अवध की निर्णायक भूमिका1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास का वह मोड़ था, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव को हिला दिया। इस विद्रोह में अवध और विशेष रूप से लखनऊ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। अवध न केवल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र था, बल्कि राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से भी अंग्रेजों के लिए अत्यंत आकर्षक था। जब अंग्रेजों ने कूटनीतिक चालों के माध्यम से नवाब वाजिद अली शाह को पदच्युत कर अवध पर कब्ज़ा किया, तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि स्थानीय जनता की अस्मिता और स्वाभिमान पर सीधा आघात था। लखनऊ उस समय प्रतिरोध का प्रमुख केंद्र बन गया। यहां सैनिक, ज़मींदार, धार्मिक नेता और आम नागरिक—सब ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला। छावनियों में विद्रोह भड़का, सरकारी प्रतिष्ठानों पर कब्ज़ा किया गया और अंग्रेजी सत्ता को लगभग समाप्त कर दिया गया। यह विद्रोह केवल सैन्य नहीं था, बल्कि यह एक जनांदोलन का रूप ले चुका था, जिसमें महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही।बेगम हज़रत महलबेगम हज़रत महल: 1857 के संग्राम की अग्रणी महिला नेताबेगम हज़रत महल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उन दुर्लभ महिला नेताओं में से थीं, जिन्होंने न केवल विद्रोह में भाग लिया, बल्कि उसका नेतृत्व भी किया। वाजिद अली शाह के निष्कासन के बाद उन्होंने परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का मार्ग चुना। उन्होंने लखनऊ में विद्रोह को संगठित किया और अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी।बेगम हज़रत महल का नेतृत्व केवल भावनात्मक नहीं था, बल्कि अत्यंत व्यावहारिक और रणनीतिक भी था। उन्होंने सैनिकों को संगठित किया, हथियारों और संसाधनों की व्यवस्था की और जनता में देशभक्ति की भावना को प्रबल किया। उनके नेतृत्व में लखनऊ कुछ समय के लिए पूरी तरह अंग्रेजों के नियंत्रण से मुक्त हो गया। यह एक असाधारण उपलब्धि थी, विशेषकर उस समय की सामाजिक परिस्थितियों में, जब महिला नेतृत्व की कल्पना भी दुर्लभ थी।रानी लक्ष्मीबाईब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध और शासन व्यवस्थाबेगम हज़रत महल ने केवल युद्ध ही नहीं लड़ा, बल्कि एक वैकल्पिक स्वदेशी शासन की भी स्थापना की। बेगम हज़रत महल ने 7 जुलाई, 1857 को अपने पुत्र बिरजिस क़द्र को अवध का नवाब घोषित किया और उनके नाम पर शासन चलाया। एक उच्च स्तरीय प्रशासनिक समिति का गठन किया गया, जिसमें विभिन्न वर्गों और समुदायों के प्रतिनिधि शामिल थे। यह शासन व्यवस्था न्याय, स्थानीय सहभागिता और स्वदेशी मूल्यों पर आधारित थी। उन्होंने अंग्रेजों की नीतियों को वैचारिक स्तर पर भी चुनौती दी। महारानी विक्टोरिया की घोषणाओं को अस्वीकार करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि विदेशी शासन किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। हालांकि अंततः अंग्रेजों की आधुनिक सैन्य शक्ति के सामने उन्हें पीछे हटना पड़ा और नेपाल जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। उनके लिए स्वतंत्रता विलासिता से कहीं अधिक मूल्यवान थी।कस्तूरबा गांधीराष्ट्रीय आंदोलन में अन्य प्रमुख महिला स्वतंत्रता सेनानियाँभारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बेगम हज़रत महल अकेली नहीं थीं। देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक महिलाओं ने अपने-अपने स्तर पर संघर्ष किया। रानी लक्ष्मीबाई ने युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त कर साहस की अमर गाथा लिखी। सरोजिनी नायडू ने महिलाओं को राजनीतिक मंच प्रदान किया और राष्ट्रीय आंदोलनों का नेतृत्व किया। कस्तूरबा गांधी ने सत्याग्रह और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई, जबकि कमला नेहरू ने सविनय अवज्ञा और ‘नो टैक्स’ आंदोलनों को दिशा दी। अरुणा आसफ अली ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय ध्वज फहराकर युवाओं को प्रेरित किया। उषा मेहता ने गुप्त रेडियो के माध्यम से आंदोलन की आवाज़ को जन-जन तक पहुँचाया। सावित्रीबाई फुले और कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने शिक्षा और समाज सुधार के जरिए स्वतंत्रता की चेतना को गहराई दी।सरोजिनी नायडूस्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और महिलाओं का ऐतिहासिक महत्वभारतीय स्वतंत्रता संग्राम की विरासत केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना की भी कहानी है। इस विरासत में महिलाओं का योगदान केंद्रीय स्थान रखता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि साहस, नेतृत्व और बलिदान किसी एक लिंग तक सीमित नहीं होते। आज का भारतीय लोकतंत्र, संविधान और गणतंत्र इन्हीं संघर्षों की देन हैं। जब हम स्वतंत्र भारत में अधिकारों और समानता की बात करते हैं, तो उसके मूल में उन महिलाओं का संघर्ष निहित है, जिन्होंने आज़ादी के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया। वास्तव में, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास महिलाओं के बिना अधूरा है और उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।संदर्भ https://rb.gy/0p3r1rhttps://tinyurl.com/5zpfpda3
तितलियाँ और कीट
कॉमन मॉर्मन तितली: भारतीय बाग़ों में उड़ती सुंदरता और प्रकृति की चतुर कारीगरी
कॉमन मॉर्मन बटरफ्लाई (Common Mormon Butterfly), जिसे वैज्ञानिक रूप से पैपिलियो पॉलीटेस (Papilio polytes) कहा जाता है, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाई जाने वाली एक बड़ी और आकर्षक तितली प्रजाति है। भारत में यह तितली आमतौर पर बगीचों, पार्कों और फूलों से भरे खुले क्षेत्रों में आसानी से देखी जा सकती है। यह लैंटाना (Lantana), इक्सोरा (Ixora) और गुड़हल जैसे विभिन्न फूलों के रस पर निर्भर रहती है, जिससे इसका पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसके काले पंखों पर बने सफेद धब्बे इसे बेहद सुंदर और पहचानने योग्य बनाते हैं।कॉमन मॉर्मन तितली के नर और मादा के स्वरूप में स्पष्ट अंतर देखा जाता है। नर तितली के पंख काले होते हैं जिन पर सफेद धब्बे और लंबी पूंछ जैसी संरचना होती है, जबकि मादा तितली के पंख भी काले और सफेद धब्बों वाले होते हैं, लेकिन उसके पिछले पंखों पर लाल रंग के छोटे-छोटे धब्बे भी पाए जाते हैं। यह तितली एक मजबूत उड़ान भरने वाली प्रजाति है और अक्सर ऊँचाई पर उड़ती हुई दिखाई देती है।इस तितली की एक खास विशेषता इसका अद्भुत बचाव व्यवहार है। इसके कैटरपिलर (caterpillar - कमला) का आकार और रंग पक्षियों की बीट जैसा दिखता है, जिससे शिकारी इसे पहचान नहीं पाते और यह सुरक्षित रहता है। यह प्राकृतिक नकल (मिमिक्री - mimicry) इसे शिकारियों से बचाने में मदद करती है। अपनी सुंदरता, अनोखे व्यवहार और व्यापक उपस्थिति के कारण कॉमन मॉर्मन तितली भारतीय जैव विविधता की एक महत्वपूर्ण और रोचक कड़ी मानी जाती है।संदर्भ -https://tinyurl.com/y3644zzt https://tinyurl.com/mrw8n2ac https://tinyurl.com/4z8e6md3 https://tinyurl.com/3x4pexwr
औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
लखनऊवासियों, पराक्रम दिवस पर आइए नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन को जानें
लखनऊवासियों, हमारा शहर अपनी तहज़ीब, गहरी सोच और ऐतिहासिक चेतना के लिए जाना जाता है। यहाँ जब भी किसी महान व्यक्तित्व को याद किया जाता है, तो वह केवल औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं होती, बल्कि आत्मचिंतन का एक सजीव अवसर बन जाती है। आज का दिन भी ऐसा ही है। आज हम पराक्रम दिवस मना रहे हैं, जो भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत की स्वतंत्रता केवल विचारों और भाषणों से नहीं मिली, बल्कि साहसिक निर्णयों, अनुशासन और असंख्य बलिदानों से संभव हुई। नेताजी का जीवन इसी पराक्रम का प्रतीक है। उनका संघर्ष, उनकी दृष्टि और उनका नेतृत्व आज भी हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हम अपने कर्तव्यों और देश के प्रति ज़िम्मेदारी को कितनी गंभीरता से निभा रहे हैं।आज हम सबसे पहले यह जानेंगे कि पराक्रम दिवस क्यों मनाया जाता है और इसका वास्तविक महत्व क्या है। इसके बाद हम नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रारंभिक जीवन पर नज़र डालेंगे, जहाँ से उनके विचारों और साहस की नींव पड़ी। फिर हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को समझेंगे और यह जानेंगे कि उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व किस प्रकार किया। अंत में, हम उन मूल्यों और सीखों पर चर्चा करेंगे जो नेताजी ने अपने जीवन से हमें दीं और जो आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।पराक्रम दिवस क्यों मनाया जाता हैपराक्रम दिवस केवल एक महान नेता की जयंती मनाने का दिन नहीं है। यह उस निडर सोच और साहसिक दृष्टिकोण का स्मरण है जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। नेताजी का मानना था कि स्वतंत्रता के लिए केवल प्रतीक्षा करना या याचिकाएँ देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए दृढ़ निश्चय, अनुशासन और संगठित प्रयास आवश्यक हैं। पराक्रम दिवस हमें यह याद दिलाता है कि राष्ट्रहित के लिए व्यक्तिगत सुख, पद और प्रतिष्ठा का त्याग करना ही सच्चा साहस है। यह दिन विशेष रूप से युवाओं को प्रेरित करता है कि वे कठिन परिस्थितियों से घबराएँ नहीं, बल्कि उन्हें बदलने का संकल्प लें।नेताजी सुभाष चंद्र बोस का प्रारंभिक जीवनसुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक में हुआ। बचपन से ही उनमें अनुशासन, आत्मसम्मान और देशप्रेम की भावना स्पष्ट दिखाई देती थी। वे पढ़ाई में अत्यंत मेधावी थे और उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की कठिन परीक्षा भी उत्तीर्ण की। उस समय यह सेवा सम्मान, स्थिरता और शक्ति का प्रतीक मानी जाती थी, लेकिन नेताजी के लिए यह सब देश की आज़ादी से बड़ा नहीं था। ब्रिटिश शासन के अधीन कार्य करना उन्हें स्वीकार नहीं था, इसलिए उन्होंने एक सुरक्षित और उज्ज्वल भविष्य को त्यागकर स्वतंत्रता संग्राम का कठिन मार्ग चुना।यह निर्णय दर्शाता है कि नेताजी केवल विचारों के नेता नहीं थे, बल्कि अपने विचारों को जीवन में उतारने का साहस भी रखते थे। प्रारंभिक जीवन में किए गए त्याग और संघर्ष ने आगे चलकर उनके पूरे नेतृत्व को मज़बूत आधार प्रदान किया।स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी का योगदानभारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी का योगदान विशिष्ट और अलग था। वे मानते थे कि केवल सभाओं, प्रस्तावों और आश्वासनों से आज़ादी प्राप्त नहीं की जा सकती। उनके अनुसार संगठित शक्ति और स्पष्ट रणनीति ही स्वतंत्रता का मार्ग खोल सकती है। इसी सोच ने उन्हें पारंपरिक रास्तों से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।नेताजी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आज़ादी का पक्ष मजबूती से रखा और यह स्पष्ट किया कि भारत की लड़ाई केवल एक उपनिवेश की समस्या नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और न्याय का प्रश्न है। उन्होंने भारतीयों के भीतर यह विश्वास जगाया कि वे स्वयं अपने भविष्य के निर्माता हैं। उनका योगदान केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी था, जिसने देशवासियों को निर्भीक और आत्मविश्वासी बनाया।आज़ाद हिंद फ़ौज और नेताजी का नेतृत्वनेताजी का सबसे प्रभावशाली और निर्णायक योगदान आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व रहा। यह सेना केवल सशस्त्र संघर्ष का माध्यम नहीं थी, बल्कि भारतीयों के भीतर स्वाधीनता और आत्मसम्मान की चेतना जगाने का एक सशक्त प्रयास थी। नेताजी ने इस सेना में अनुशासन, समानता और राष्ट्रप्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया।उनका प्रसिद्ध आह्वान — “तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” — उस समय की जनभावनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति था। इस आह्वान ने यह स्पष्ट कर दिया कि स्वतंत्रता के लिए त्याग अनिवार्य है। आज़ाद हिंद फ़ौज ने यह सिद्ध किया कि भारतीय स्वयं संगठित होकर अपने देश के लिए बलिदान देने को तैयार हैं, और यही भावना स्वतंत्रता संग्राम को नई शक्ति प्रदान करती है।नेताजी से मिलने वाली सीखनेताजी सुभाष चंद्र बोस का जीवन आज भी हमें कई महत्वपूर्ण सीख देता है। उनकी पहली सीख साहस की है, यानी कठिन परिस्थितियों में भी सही और दृढ़ निर्णय लेने की क्षमता। दूसरी सीख अनुशासन से जुड़ी है, क्योंकि बिना अनुशासन के कोई भी आंदोलन या उद्देश्य सफल नहीं हो सकता। तीसरी सीख नेतृत्व की है, जहाँ नेताजी ने यह दिखाया कि सच्चा नेतृत्व आदेश देने से नहीं, बल्कि स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करने से बनता है।सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि राष्ट्रहित को हमेशा व्यक्तिगत हित से ऊपर रखा जाना चाहिए। उनका जीवन यह भी सिखाता है कि जब लक्ष्य स्पष्ट हो और संकल्प अडिग हो, तो सबसे कठिन परिस्थितियाँ भी बदली जा सकती हैं।आज के समय में पराक्रम दिवस का महत्वआज के समय में पराक्रम दिवस हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। यह दिन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम अपनी स्वतंत्रता, अपने अधिकारों और अपने कर्तव्यों को कितनी गंभीरता से लेते हैं। नेताजी के विचार आज भी हमें साहस, ज़िम्मेदारी और कर्मठता की प्रेरणा देते हैं। यह दिवस केवल अतीत का स्मरण नहीं करता, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शन प्रदान करता है।संदर्भ -https://tinyurl.com/ytd2xdwdhttps://tinyurl.com/y4sxus2nhttps://tinyurl.com/52uaead3https://tinyurl.com/5e4nudrr
खनिज
18-02-2026 07:04 AM • Lucknow-Hindi
वैश्विक माइक्रोचिप संकट और भारत: सेमीकंडक्टर निर्माण केंद्र बनने की चुनौतियाँ व संभावनाएँ
अर्धचालक चिप्स (Semiconductor chips), जिसे माइक्रोचिप्स (Microchips) या एकीकृत सर्किट (Circuit) के रूप में भी जाना जाता है, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स (Consumer Electronics) से लेकर स्वास्थ्य सेवा तक लगभग हर उद्योग में एक महत्वपूर्ण घटक हैं। हालाँकि, इनकी सीमित आपूर्ति के कारण, दुनिया वर्तमान में चिप की कमी का सामना कर रही है।इस कमी को देखते हुए भारतीय सरकार ने दिसंबर 2021 में, देश को वैश्विक चिप निर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय अर्धचालक और डिस्प्ले (Display) निर्माताओं को आकर्षित करने के लिए 76,000 करोड़ रुपये (लगभग 10 बिलियन डॉलर) की प्रोत्साहन योजना को शुरू करने का प्रयास किया।लेकिन चीन और वियतनाम (Vietnam) जैसे अधिक प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में कमजोर पारिस्थितिकी तंत्र और संसाधनों की कमी के कारण भारत सेमीकंडक्टर वेलखनऊफर फैब्रिकेशन इकाइयों (Semiconductor wafer fabrication) की स्थापना में पिछड़ गया है। फैब निर्माण इकाइयां स्थापित करने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक यह तथ्य है कि इसके लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होती है।अरबों डॉलर में चलने वाली भारी लागत के अलावा, एक चिप के निर्माण में भी सैकड़ों गैलन शुद्ध पानी की आवश्यकता होती है, जो भारत में आवश्यक मात्रा में मिलना भी मुश्किल हो सकता है।निर्बाध बिजली आपूर्ति एक और बड़ी बाधा है। इस मुद्दे की जड़ यह है कि भारत अभी भी चिप निर्माण क्षेत्र में प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे के बराबर नहीं है। दरसल अर्धचालक चिप एक विद्युत परिपथ है जिसमें कई घटक जैसे ट्रांजिस्टर (Transistors) और अर्धचालक वेफर (Semiconductor wafer) पर तारों का निर्माण होता है। वे अधिकांश आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए छोटे दिमाग के रूप में कार्य करते हैं।इन चिप्स को बनाने के लिए, रेत से सिलिकॉन (Silicon) निकाला जाता है और ठोस सिलेंडर (Cylinder) में पिघलाया जाता है जिसे सिल्लियां कहा जाता है। इन सिल्लियों को फिर बहुत पतले वेफर्स में काट दिया जाता है और पॉलिश (Polish) की जाती है, जिसके बाद उन पर जटिल परिपथ मुद्रित होते हैं। अंत में, वेफर्स को अलग- अलग अर्धचालकों में काट दिया जाता है और तैयार चिप्स में पैक किया जाता है, जिसे बाद में एक परिपथ पट्ट पर रखा जा सकता है। इन चिप्स का निर्माण करना एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें तीन महीने से अधिक समय लगता है। लेकिन महामारी के चलते विश्व भर में चिप की कमी आ गई है। कोविड -19 ने आबादी के एक महत्वपूर्ण हिस्से को घर के अंदर रहने को मजबूर कर दिया है, जिससे उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे लैपटॉप (Laptop), फोन (Phones) और गेमिंग कंसोल (Gaming consoles) की मांग में अचानक वृद्धि हुई है।साथ ही क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrencies) की अचानक लोकप्रियता ने दुनिया भर में और अधिक खनन कार्यों को बढ़ा दिया है, जिसके लिए अधिक प्रसंस्करण इकाइयों की आवश्यकता होती है।हालांकि मांग बढ़ी है, आपूर्ति गिर गई है। दूसरी ओर,कार निर्माता ने महामारी की शुरुआत में अपने चिप के ऑर्डर (Order) को कम कर दिया, यह मानते हुए कि उपभोक्ताओं को नए वाहन खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं होगी,जिस वजह से आपूर्ति में गलत अनुमान लगाया गया और कम चिप का उत्पादन किया गया।संयुक्त राज्य अमेरिका (United States) और चीन (China) के बीच तनावपूर्ण संबंधों ने खराब आपूर्ति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, क्योंकि चीन चिप्स के सबसे बड़े निर्माताओं में से एक है।
कई कंपनियां जिन्हें सेमीकंडक्टर्स की आवश्यकता होती है, उन्होंने पहले से ही अपनी दीर्घकालिक खरीद रणनीतियों पर पुनर्विचार करना प्रारंभ कर दिया है।कुछ उदाहरण के लिए उसी समय ऑर्डर करने वाली प्रणाली, जो वस्तुसूची की लागत को कम करने में मदद करता है, से हटकर अर्धचालक को पहले से ऑर्डर करने पर विचार कर रहे हैं।कई अर्धचालक कंपनियां (Company) मजबूत बने रहने के लिए अपनी दीर्घकालिक रणनीतियों को समायोजित कर रही हैं।अर्धचालक कंपनियां जो भी निर्णय लेती हैं, वह उनके उद्योग और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए व्यापक आर्थिक महत्व हो सकता है। 2000 के दशक की शुरुआत में, अर्धचालक कंपनियों में लाभ मार्जिन (Profit Margin) कम था, जिसमें पूंजी की लागत से कम प्रतिफल उत्पन्न होता था। पिछले दशक के दौरान लाभप्रदता में सुधार हुआ, जो हालांकि, अधिकांश उद्योगों में माइक्रोचिप्स की बढ़ती मांग, प्रौद्योगिकी क्षेत्र की तीव्रवृद्धि, और क्लाउड के उपयोग में वृद्धि के साथ-साथ कई उप-खंडों में चल रहे समेकन से प्रेरित था। एक परिणाम यह है कि अर्धचालक उद्योग की लाभप्रदता अन्य उद्योगों की तुलना में काफी बेहतर हुई है, और यह प्रवृत्ति जारी रहने की उम्मीद है।जैसा कि किसी भी उद्योग में होता है, मूल्य सृजन उत्पाद श्रेणी के अनुसार भिन्न होता है, इसलिए कुछ खंडों में परिवर्तन दूसरों की तुलना में अधिक प्रभाव डाल सकते हैं। उदाहरण के लिए, मेमोरी (Memory) सबसे अधिक लाभदायक खंड रहा है, इसके बाद फैबलेस (Fabless) कंपनियां हैं जो अपने स्वयं के चिप्स डिजाइन करती हैं लेकिन अपने निर्माण को बाहरी स्रोत को देती हैं।कुछ क्षेत्रीय भिन्नताएँ भी स्पष्ट हैं। उत्तरी अमेरिका, कुछ सबसे बड़े फैबलेस खिलाड़ियों का घर, के पास 2015-19 की अवधि के दौरान वैश्विक अर्धचालक मूल्य पूल का लगभग 60% हिस्सा था। वहीं एशिया, जो अभी भी अनुबंध चिप निर्माण का केंद्र है, शेष 36% के लिए जिम्मेदार है। इस भौगोलिक प्रसार के साथ, अर्धचालक उद्योग के भीतर मूल्य निर्माण दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकता है। उत्पादन क्षमता बढ़ाने के अलावा, अर्धचालक कंपनियां अपने विकास को जारी रखने और ग्राहकों की मांग को पूरा करने के लिए कई कदमों पर विचार कर सकती हैं। वे लाभदायक क्षेत्रों में बढ़त हासिल करने और अपने ग्राहक आधार का विस्तार करने के लिए अधिक एम एंड ए (M&A) सौदे और साझेदारी कर सकते हैं।सेमीकंडक्टर कंपनियां नवीन तकनीकों में भी निवेश बढ़ा सकती हैं जो उन्हें स्वायत्त कारों, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (Internet of things), कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य क्षेत्रों में तेजी से विकास के लिए अग्रणी-बढ़त चिप्स विकसित करने में मदद करेगी। इन सबसे ऊपर, इन अनिश्चित समय के दौरान अधिक चुस्त रणनीतियां महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
शिवरात्रि के इस पावन पर्व पर करें 'शिवोऽहम्' के भाव को आत्मसात
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ! महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आंतरिक जागरण का विशेष अवसर है। यह वह दिन माना जाता है जब शिव तत्व का प्रभाव पृथ्वी पर सबसे अधिक अनुभूत होता है, यानी भौतिक जीवन और आध्यात्मिक चेतना का सहज मिलन होता है। इसी कारण इस दिन किया गया ध्यान और साधना मन और चेतना पर गहरा प्रभाव छोड़ती है।
महाशिवरात्रि हमें यह याद दिलाती है कि शिव कोई बाहरी सत्ता नहीं हैं, बल्कि वही शाश्वत चेतना हमारे भीतर भी विद्यमान है। “शिवोऽहम्” का भाव इसी अनुभूति की ओर संकेत करता है - कि सत्य, शांति और अनंतता हमारे अपने स्वरूप का हिस्सा हैं। जब मन द्वैत से ऊपर उठकर एकत्व को अनुभव करता है, तब जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलने लगता है।
रात्रि का भाव शांति, विश्राम और मौन से जुड़ा है। इस दिन मन, बुद्धि और अहंकार को शांत कर ध्यान में स्थिर होना वास्तविक विश्राम माना जाता है। महाशिवरात्रि आत्मसमर्पण का भी संदेश देती है - जब व्यक्ति स्वयं को उस व्यापक चेतना के भरोसे छोड़ देता है, तब भय, चिंता और बेचैनी स्वतः कम होने लगती हैं। यही इस पर्व का वास्तविक अर्थ और सौंदर्य है।
शाही गज़ से आधुनिक मेट्रिक प्रणाली तक: मापन इकाइयों के विकास की रोचक कहानी
मेट्रिक प्रणाली लंबाई, आयतन, दूरी, तापमान और वज़न जैसे मापों के लिए उपयोग की जाने वाली एक मानकीकृत प्रणाली है। यह तीन बुनियादी इकाइयों पर आधारित होती है: ⦁ ➲ मीटर (m): लंबाई मापने के लिए। ⦁ ➲ किलोग्राम (kg): द्रव्यमान मापने के लिए। ⦁ ➲ सेकेंड (s): समय मापने के लिए।
इस लेख में हम मेट्रिक प्रणाली के विकास, सामान्य मेट्रिक रूपांतरण इकाइयों तथा मुग़ल काल में भारत में प्रचलित मापन पद्धतियों के बारे में विस्तार से जानेंगे।
मेट्रिक प्रणाली मापने का एक सुव्यवस्थित और विश्वसनीय तरीका है, जिसका उपयोग आज विश्वभर में वैज्ञानिक शोध, शिक्षा, व्यापार और दैनिक जीवन में किया जाता है। यह सरल मापों से लेकर जटिल गणनाओं तक के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
इसके कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं: ⦁ ➲ मीटर (m): दूरी और लंबाई मापने की मानक इकाई। जैसे—घर से स्कूल की दूरी या किसी कपड़े की लंबाई। ⦁ ➲ ग्राम (g): वज़न की इकाई, जिसे हम खाद्य पदार्थों के पैकेट पर अक्सर देखते हैं, जैसे “250 ग्राम चिप्स।” ⦁ ➲ मिलीलीटर (ml): आयतन की इकाई, जिसका उपयोग पेय पदार्थों या तरल पदार्थों की मात्रा मापने में किया जाता है।
मेट्रिक प्रणाली में लंबाई, द्रव्यमान (वज़न) और क्षमता (आयतन) के लिए अलग-अलग इकाइयाँ निर्धारित की गई हैं। उदाहरण के लिए: ⦁ ➲ लंबाई: मिलीमीटर (mm), सेंटीमीटर (cm), डेसीमीटर (dm), मीटर (m) और किलोमीटर (km)। इनका उपयोग डेबिट कार्ड (Debit Card) की मोटाई से लेकर दो शहरों के बीच की दूरी तक मापने में होता है। ⦁ ➲ वज़न: ग्राम (g) और किलोग्राम (kg), जिनसे फलों या शरीर का वज़न मापा जाता है। ⦁ ➲ क्षमता: मिलीलीटर (ml) और लीटर (L), जिनका उपयोग जूस कैन या पानी की टंकी की मात्रा मापने में किया जाता है।
1789 की फ़्रांसीसी क्रांति के बाद नागरिकों ने पूरे देश में एक समान वज़न और माप प्रणाली की आवश्यकता महसूस की। इस उद्देश्य से नेशनल असेंबली (National Assembly) और बाद की सरकारों ने पेरिस एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (Paris Academy of Sciences) तथा उसके उत्तराधिकारी इंस्टीट्यूट ऑफ फ़्रांस (Institute of France) को नई इकाइयाँ विकसित करने का कार्य सौंपा। इन इकाइयों को दूरी, आयतन, वज़न, कोण और समय मापने के लिए तैयार किया गया, और इन्हें इस तरह बनाया गया कि सभी एक-दूसरे से तार्किक रूप से जुड़े रहें।
उदाहरण के तौर पर, लंबाई की इकाइयाँ दस की घात के आधार पर बढ़ती हैं - मिलीमीटर से सेंटीमीटर, फिर मीटर तक। एक लीटर को ऐसे घन के आयतन के रूप में परिभाषित किया गया जिसकी प्रत्येक भुजा 10 सेंटीमीटर हो। मानक तापमान पर एक लीटर पानी का वज़न लगभग एक किलोग्राम होता है। इससे पहले इंच, फ़ीट, गज़ और मील जैसी इकाइयों के बीच कोई स्पष्ट संबंध नहीं था। फ़्रांसीसियों ने न केवल राष्ट्रीय मानकों की स्थापना की, बल्कि एक ऐसी प्रणाली विकसित की जो आज मेट्रिक प्रणाली के रूप में वैश्विक स्तर पर अपनाई जा चुकी है।
मेट्रिक प्रणाली के इतिहास की प्रमुख समयरेखा: ⦁ ➲ 1668: जॉन विल्किंस (John Wilkins) ने एक संशोधित मापन प्रणाली का प्रस्ताव रखा। ⦁ ➲ 1670: गेब्रियल मूटन (Gabriel Mouton) ने पृथ्वी की परिधि के अंश पर आधारित दशमलव प्रणाली सुझाई। ⦁ ➲ 1671: जीन पिकार्ड (Jean Picard) ने झूलते पेंडुलम (Pendulum) को लंबाई मापने का आधार बनाने का विचार दिया। ⦁ ➲ 1790: फ़्रांस की नेशनल असेंबली ने फ़्रेंच एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (French Academy of Sciences) से मानक प्रणाली विकसित करने का अनुरोध किया। ⦁ ➲ 1795: फ़्रांस ने आधिकारिक रूप से मेट्रिक प्रणाली अपनाई। ⦁ ➲ 1840: फ़्रांसीसी सरकार ने नागरिकों के लिए इसका उपयोग अनिवार्य किया। ⦁ ➲ 1866: संयुक्त राज्य अमेरिका (United States) में मेट्रिक प्रणाली का उपयोग वैध घोषित हुआ, हालांकि अनिवार्य नहीं था। ⦁ ➲ 1875: मीटर की संधि पर हस्ताक्षर किए गए और अंतर्राष्ट्रीय वज़न एवं माप ब्यूरो सम्मेलन (International Bureau of Weights and Measures Conference) आयोजित हुआ। ⦁ ➲ 1957: अमेरिकी सेना (United States Army) और मरीन कॉर्प्स (Marine Corps) ने इसे अपने उपकरणों के मानक के रूप में अपनाया। ⦁ ➲ 1965: ग्रेट ब्रिटेन (Great Britain) ने मेट्रिक प्रणाली अपनाने की प्रक्रिया शुरू की। ⦁ ➲ 1988: ओम्निबस ट्रेड एंड कॉम्पिटिटिवनेस एक्ट (Omnibus Trade and Competitiveness Act) के तहत संघीय एजेंसियों को व्यापार में मेट्रिक प्रणाली उपयोग करने का निर्देश दिया गया।
गणितीय रूप से, मेट्रिक रूपांतरण किलोग्राम, मीटर और सेकेंड पर आधारित होते हैं। क्षेत्रफल को वर्ग मीटर (m²) में और आयतन को घन मीटर (m³) में मापा जाता है। एक घन मीटर = 1,000 लीटर होता है, अर्थात 1 लीटर = 1/1,000 m³। समय की गणना में 1 घंटा = 60 मिनट, 1 मिनट = 60 सेकेंड और इस प्रकार 1 घंटा = 3,600 सेकेंड होता है। वहीं, 1 दिन = 24 घंटे = 86,400 सेकेंड के बराबर होता है।
लेकिन आधुनिक मापन प्रणालियों के विकसित होने से पहले माप कैसे किए जाते थे? इसे समझने के लिए मुग़ल काल की व्यवस्था पर नज़र डालना उपयोगी होगा।
मुग़ल काल में भारत में कई प्रकार की मापन इकाइयाँ प्रचलित थीं। कपड़ों को मापने के लिए अकबर का शाही गज़ (Akbar’s Royal Yard) उपयोग किया जाता था, जिसकी लंबाई लगभग 46 अंगुल होती थी। कृषि भूमि और इमारतों के लिए इस्कंधरी गज़ का प्रयोग होता था। विभिन्न गज़ों के कारण उत्पन्न समस्याओं को दूर करने के लिए इलाही गज़ (Ilahigaz) नामक एक मानक इकाई शुरू की गई, जिसकी लंबाई लगभग 33 से 34 इंच थी और जिसे आम जनता ने भी अपनाया।
भूमि मापने के लिए बीघा (Bigha) का उपयोग किया जाता था, जिसकी लंबाई और चौड़ाई सामान्यतः 60 गज़ मानी जाती थी। गज़ और बीघा मुग़ल मापन प्रणाली की प्रमुख इकाइयाँ थीं।
इन मापों के बीच संबंध इस प्रकार थे: ⦁ ➲ 1 हाथ = 8 गिरह ⦁ ➲ 1 गज़ = 2 हाथ ⦁ ➲ 1 काठी = 5 और 5/6 हाथ ⦁ ➲ 1 पंड = 20 काठी ⦁ ➲ 1 बीघा = 20 पंड ⦁ ➲ 1 बीघा = 20 विश्वा ⦁ ➲ 1 विश्वा = 20 विश्वांस
भारत में 1956 तक, जब मेट्रिक प्रणाली आधिकारिक रूप से लागू नहीं हुई थी, तब तक गज़ जैसी पारंपरिक इकाइयों का व्यापक उपयोग होता रहा।
स्पष्ट है कि मापन इकाइयों की यह यात्रा—शाही गज़ से लेकर आधुनिक मेट्रिक प्रणाली तक—मानव सभ्यता की वैज्ञानिक प्रगति और मानकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रही है, जिसने आज हमारे जीवन को अधिक सटीक, सरल और व्यवस्थित बना दिया है।
लखनऊ शहर में जल निकायों की भूमिका और वर्तमान स्थिति
उत्तर प्रदेश की राजधानी होने के नाते हमारा शहर लखनऊ अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं के लिए पूरे देश में विशेष पहचान रखता है। यही वजह है कि लखनऊ का समग्र और तेज़ विकास सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। लेकिन इस तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के बीच हमें यह भी गंभीरता से सोचना होगा कि कहीं आधुनिक सुविधाओं और शहरी विस्तार की चाह हमारी प्राकृतिक धरोहरों को नुकसान तो नहीं पहुँचा रही है। विकास की इस दौड़ में यदि जल निकायों और नदियों की अनदेखी होती रही, तो इसके दुष्परिणाम पूरे शहर को भविष्य में भुगतने पड़ सकते हैं।
तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के चलते लखनऊ अपने जल निकायों का लगभग 46 प्रतिशत हिस्सा पहले ही खो चुका है। जो जल निकाय बचे भी हैं, उनमें से अधिकांश आज अपशिष्ट और सीवेज से बुरी तरह प्रदूषित हो चुके हैं। लखनऊ नगर निगम के एक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 1952 में शहर में 964 तालाब मौजूद थे, लेकिन 2006 तक इनकी संख्या घटकर केवल 494 रह गई। नगर निगम के भूमि रिकॉर्ड यह भी बताते हैं कि शहर में दर्ज कई टैंक और तालाब अब सुधार और अतिक्रमण के कारण पहचान से बाहर हो चुके हैं।
तालाब और जलाशय प्राकृतिक रूप से स्पंज तथा थर्मो-रेगुलेटर (damper and thermo-regulator) की तरह काम करते हैं। ये वर्षा जल के संचय में मदद करते हैं और भूजल स्तर को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन लखनऊ के मुख्य शहरी क्षेत्रों में जल निकायों के लगभग समाप्त हो जाने से शहर भविष्य में गंभीर बाढ़ के खतरे की ओर बढ़ रहा है। पिछले एक दशक में लखनऊ चार बड़ी बाढ़ की घटनाओं का सामना कर चुका है, जो इस खतरे की स्पष्ट चेतावनी हैं।
शहर की गोमती नदी की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। गोमती एक भूजल-आधारित नदी है, जो अपनी सहायक नदियों से पुनः भरती रहती है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Uttar Pradesh Pollution Control Board – UPPCB) के आँकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में गोमती का प्रवाह 35 से 40 प्रतिशत तक कम हो चुका है। कई स्थानों पर नदी में पानी इतना कम रह गया है कि उसे पैदल पार किया जा सकता है। लखनऊ में लगभग 13 किलोमीटर तक बहने वाला गोमती का यह हिस्सा आज अपनी सबसे खराब स्थिति में है और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board – CPCB) द्वारा इसे देश के सबसे प्रदूषित नदी खंडों में शामिल किया गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ता जैविक दबाव, पारिस्थितिक प्रवाह में कमी, सहायक नदियों की दुर्दशा, नदी के जलग्रहण क्षेत्र में गाद भराव और अतिक्रमण—इन सभी कारणों ने मिलकर गोमती को सीवेज और कीचड़ से भर दिया है। जानकारों का यह भी कहना है कि लखनऊ के आसपास लगभग 300 जलाशयों के निर्माण की योजनाओं और अवैध अतिक्रमण के चलते स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। पूरे उत्तर प्रदेश में अतिक्रमण के कारण एक लाख से अधिक जलाशय—जिनमें टैंक, तालाब, झीलें और कुएँ शामिल हैं—नष्ट हो चुके हैं।
गोमती नदी में प्रदूषण को नियंत्रित करने का पहला संगठित प्रयास वर्ष 1993 में केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा शुरू की गई गोमती कार्य योजना के तहत किया गया था। इस योजना का उद्देश्य नालों को टैप करना और सीवेज को उपचार संयंत्रों तक पहुँचाना था। इसके बावजूद, आज भी बड़ी मात्रा में अनुपचारित सीवेज सीधे नदी में बह रहा है। इसके बाद अप्रैल 2015 में राज्य सरकार ने गोमती पुनरुद्धार परियोजना शुरू की, जिसके तहत नदी की सफाई, तटों को मज़बूत करने और सौंदर्यीकरण की योजना बनाई गई। गोमती बैराज तक नदी के पुनरुद्धार की अनुमानित लागत लगभग 600 करोड़ रुपये तय की गई थी। हालांकि, अतिक्रमण और शहरी दबाव के कारण इन प्रयासों के अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ सके।
जल निकायों पर बढ़ते अतिक्रमण को रोकने के लिए सरकार और सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर हस्तक्षेप किए हैं। वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि प्राकृतिक झीलों और तालाबों की सुरक्षा जीवन के अधिकार का हिस्सा है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मूल अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसके बावजूद, लखनऊ के आधिकारिक रिकॉर्ड एक अलग और चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
वर्ष 2014 में पर्यावरण कार्यकर्ता अशोक शंकरम द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर एक याचिका में शहर के 37 जल निकायों पर हुए अतिक्रमण का मुद्दा उठाया गया था। इसके जवाब में अदालत ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (Lucknow Development Authority – LDA) और लखनऊ नगर निगम से स्पष्टीकरण माँगा। लेकिन 2015 में दिए गए जवाब में अतिक्रमण के खिलाफ उठाए गए ठोस कदमों की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि झीलों और तालाबों को अतिक्रमण मुक्त कराना एलडीए और नगर निगम का वैधानिक कर्तव्य है।
जल निकायों से अतिक्रमण हटाने की मांग करने वाले अधिवक्ता मोतीलाल यादव का कहना है कि लखनऊ के आसपास सैकड़ों जलाशयों पर निर्माण की योजनाओं ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। हालांकि हाल के वर्षों में लखनऊ जिला प्रशासन ने जल निकायों और सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए अभियान शुरू किए हैं। जिला मजिस्ट्रेट के अनुसार, इन अभियानों का उद्देश्य न केवल तालाबों और जल निकायों का पुनरुद्धार करना है, बल्कि सरकारी भूमि को भी अतिक्रमण से मुक्त कराना है। इसी क्रम में सरोजनीनगर तहसील से शुरू किए गए अभियान के तहत राजस्व विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों की टीम ने लगभग 12 बीघा भूमि से अतिक्रमण हटाया, जिसकी बाज़ार कीमत करीब 7 करोड़ 84 लाख रुपये आँकी गई है।
कैसे ममलूक वंश ने भारत में सल्तनती सत्ता और नई वास्तुकला की शुरुआत की?
लखनऊवासियों, आज हम एक ऐसे ऐतिहासिक विषय पर बात करने जा रहे हैं जो भले ही सीधे हमारे शहर से जुड़ा न हो, लेकिन भारत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य इतिहास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है - दिल्ली सल्तनत और उसके प्रथम राजवंश, ममलूक वंश का उदय। जिस तरह लखनऊ अपनी तहज़ीब, नक़्क़ाशीदार इमारतों और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए प्रसिद्ध है, उसी तरह सल्तनत काल की इमारतों और स्थापत्य शैलियों ने भी भारत की वास्तुकला की दिशा निर्धारित की। यही कारण है कि इस विषय को समझना हमें यह जानने में मदद करता है कि सदियों पहले भारत में किस तरह की सत्ता, किस तरह की इमारतें और किस तरह की तकनीकें विकसित हुईं - और वे आगे चलकर हमारी आधुनिक कलात्मक विरासत का आधार कैसे बनीं। आज के इस लेख में हम क्रमबद्ध रूप से पाँच महत्वपूर्ण पहलुओं को सरल भाषा में समझेंगे। सबसे पहले, हम जानेंगे कि दिल्ली सल्तनत कैसे स्थापित हुई और ममलूक वंश की शुरुआत में मुहम्मद घोरी, कुतुब-उद-दीन ऐबक और इल्तुतमिश की भूमिका क्या रही। इसके बाद, हम ममलूक शासकों की प्रशासनिक चुनौतियों और उनकी नीतियों पर नज़र डालेंगे, जिनसे सल्तनत मजबूत हुई। फिर हम समझेंगे कि सल्तनत काल की वास्तुकला कैसे भारतीय, इस्लामी और मध्य-एशियाई शैलियों का सुंदर मिश्रण बनी। इसके बाद हम उन प्रमुख इमारतों के बारे में जानेंगे - जैसे कुतुब मीनार, अलाई दरवाज़ा और तुगलकाबाद - जिन्होंने इस युग की पहचान बनाई। अंत में, हम देखेंगे कि चूना-गारा, आर्कुएट (Arcuate - धनुषाकार) तकनीक और गुम्बद-निर्माण जैसी नई तकनीकों ने भारतीय वास्तुकला में कैसे बड़ा परिवर्तन लाया।
दिल्ली सल्तनत का उदय और ममलूक (गुलाम) वंश की स्थापना दिल्ली सल्तनत का इतिहास वास्तव में 12वीं सदी के उत्तरार्ध में घुरिद साम्राज्य के विस्तार से शुरू होता है। घुर के शासक मुहम्मद घोरी ने जब 1192 में तराइन की दूसरी लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को हराया और फिर 1194 में चंदावर की लड़ाई में जयचंद पर विजय प्राप्त की, तब उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा उनके नियंत्रण में आ गया। वे स्वयं भारत में अधिक समय नहीं रुके, इसलिए प्रशासन संचालन का दायित्व उन्होंने अपने सबसे विश्वस्त सैन्य अधिकारी कुतुब-उद-दीन ऐबक को सौंपा, जो उनका दास होने के बावजूद एक कुशल योद्धा, रणनीतिकार और संगठक था। 1206 में मुहम्मद घोरी की मृत्यु के बाद ऐबक ने दिल्ली में स्वतंत्र सत्ता स्थापित की और इसी क्षण से दिल्ली सल्तनत के प्रथम राजवंश - ममलूक वंश - का जन्म हुआ। “ममलूक” शब्द अरबी से आया है, जिसका अर्थ है “स्वामी-निर्मित दास” या प्रशिक्षित सैनिक। ये साधारण दास नहीं थे, बल्कि अत्यंत सक्षम, निष्ठावान और युद्धकला में दक्ष योद्धा होते थे। ऐबक के बाद उसके दामाद और उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने सल्तनत को एक सुसंगठित, शक्तिशाली और स्थिर राज्य का स्वरूप दिया। कूटनीति, सैन्य-व्यवस्था और प्रशासनिक सुधारों के कारण इल्तुतमिश को वास्तव में दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
ममलूक शासकों का शासन, चुनौतियाँ और प्रशासनिक मजबूती जब 1211 में इल्तुतमिश ने सत्ता संभाली, तब सल्तनत अभी भी नवजात अवस्था में थी और उसे कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। पहली चुनौती पश्चिमी सीमा पर मंगोलों का लगातार दबाव था, जिन्होंने मध्य एशिया में उथल-पुथल मचा रखी थी और भारत की दिशा में भी नजरें टिकाई थीं। दूसरी चुनौती तुर्की अमीरों की शक्ति थी, जो दरबार में अपने प्रभाव को बढ़ाकर सुल्तान की शक्ति को कमजोर करना चाहते थे। तीसरी चुनौती भारतीय हिंदू सरदारों की स्वतंत्रता-प्रियता थी, जिन्हें सल्तनत की अधीनता कबूल करवाना आवश्यक था। इल्तुतमिश ने शक्तिशाली सेना, संगठित प्रशासन और समझदारीपूर्ण गठबंधन-नीति के माध्यम से इन तीनों क्षेत्रों में सफलता पाई। उसके शासन के बाद उसकी योग्य पुत्री रज़िया सुल्तान ने सत्ता संभाली - जो भारतीय इतिहास की पहली मुस्लिम महिला शासक थीं। लेकिन तुर्क अमीर एक महिला को सत्ता में देखकर असंतुष्ट हुए और अंततः रज़िया को अपदस्थ कर दिया। राजनीतिक अस्थिरता के बाद सत्ता गियास-उद-दीन बलबन के हाथों में पहुँची, जिसने शाही मर्यादा, अनुशासन और राजसत्ता की “दैवीय छवि” को अत्यधिक सुदृढ़ किया। बलबन ने मंगोलों के विरुद्ध व्यापक सुरक्षा-तंत्र तैयार किया और दरबार में कठोर “ज़ाब्ते” लागू किए। उसके शासन में सल्तनत पुनः एक मजबूत और स्थिर साम्राज्य बन गई।
सल्तनत काल की वास्तुकला: उद्भव, विशेषताएँ और सांस्कृतिक संगम सल्तनत काल वास्तुकला के इतिहास में एक क्रांतिकारी चरण था। इस अवधि में जन्म लेने वाली इमारतें केवल धार्मिक या राजनीतिक प्रतीक नहीं थीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी, मध्य एशियाई और भारतीय कला का अनोखा संगम थीं। यह वह दौर था जब भारत में पहली बार स्पष्ट रूप से विकसित इंडो-इस्लामिक (Indo-Islamic) वास्तुकला दिखाई देती है - एक ऐसा कला-रूप जिसमें हिंदू-जैन मंदिरों की परंपरागत मूर्तिकारी और भारतीय पत्थर-शिल्प, इस्लामी जगत की मेहराबों, गुम्बदों, ज्यामितीय डिजाइन और ईंट-निर्माण तकनीकों के साथ मिश्रित होते हैं। सल्तनत काल की वास्तुकला तीन प्रमुख रूपों में विकसित हुई - दिल्ली की शाही शैली, जो मुख्यतः सुल्तानों द्वारा संरक्षित थी; प्रांतीय सल्तनती शैली, जो बंगाल, गुजरात और दक्कन में विकसित हुई; तथा हिंदू शासकों के अधीन विकसित शैली, जिसमें राजस्थानी और दक्षिण भारतीय तत्वों का प्रभाव था। यह विविधता आगे चलकर उस विशाल वास्तु-परंपरा का आधार बनी जिसने मुगल काल में अपनी चरम सुंदरता प्राप्त की।
प्रमुख इमारतें और सुल्तानों का स्थापत्य योगदान सल्तनत काल में निर्मित इमारतों की श्रृंखला अत्यंत विस्तृत है और इनमें से कई भारत की ऐतिहासिक पहचान बन चुकी हैं। सबसे पहले कुतुब-उल-इस्लाम मस्जिद और अढ़ाई दिन का झोंपड़ा का उल्लेख किया जाता है, जिनमें हिंदू-जैन स्थापत्य की मूर्तिकारी और इस्लामी विन्यास का अद्वितीय सम्मिश्रण देखा जाता है। इसके बाद आती है कुतुब मीनार, जो ईंट-निर्मित मीनारों में विश्व के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक है। ऐबक ने इसकी नींव रखी, इल्तुतमिश ने तीन मंज़िलें बनवाईं और बाद में फ़िरोज़ तुगलक ने इसे और ऊँचा तथा भव्य बनाया। अन्य उल्लेखनीय स्थापत्य योगदानों में शामिल हैं—
सुल्तान-ए-गारी का मकबरा, भारत का पहला मकबरा
हौज़-ए-शम्सी, जो जल-विनियोजन की अद्भुत समझ दर्शाता है
अलाई दरवाज़ा, जो शुद्ध इस्लामी वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है
तुगलकाबाद, जहाँपनाह, और फ़िरोज़ाबाद - तीन बड़े शाही शहर
लोदी और सैय्यद शासकों द्वारा बनवाए गए गुम्बद-दार मकबरे, जिनमें भारत में “बाग़-वाले मकबरों” की परंपरा की शुरुआत हुई
ये सभी इमारतें न केवल सुल्तानों की शक्ति, बल्कि उस समय की अभियांत्रिकी, कला और सौंदर्य-बोध को भी उजागर करती हैं।
सल्तनत काल में निर्माण तकनीकें: आर्कुएट शैली और नई सामग्रियाँ सल्तनत काल में भारत की निर्माण-तकनीक में एक मूलभूत परिवर्तन आया। इस काल में पहली बार चूना-गारा (Lime mortar), जिप्सम (Gypsum), सुरखी, और पकी ईंटों का बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ। इन नई सामग्रियों ने निर्माण को तेज, सस्ता और टिकाऊ बना दिया। सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन था आर्कुएट तकनीक का विकास - यानी मेहराबों और गुम्बदों की मदद से विशाल, बिना स्तंभों वाले आंतरिक स्थानों का निर्माण। मेहराबों में प्रयुक्त वौसोइर (पच्चर-आकार के पत्थर) और केंद्र-पत्थर (keystone) ने इमारतों को पहले से कहीं अधिक स्थिर और ऊँचा बनाने की क्षमता प्रदान की। कम लागत और बेहतर स्थायित्व के कारण मस्जिदों, मकबरों, महलों, सरायों, बारादरियों और बाजारों के निर्माण में तेजी आई। यह तकनीकी परिवर्तन आगे मुगल काल की उच्च स्तरीय वास्तुकला की नींव बना।
भारतीय–इस्लामी प्रभावों का मिलन और उसका ऐतिहासिक महत्व सल्तनत काल का स्थापत्य भारत की सांस्कृतिक विविधता और सह-अस्तित्व का उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रारंभिक मस्जिदें और भवन कई बार परित्यक्त हिंदू-जैन मंदिरों, संस्कृत महाविद्यालयों और अन्य संरचनाओं पर निर्मित किए गए, जिसके परिणामस्वरूप इन इमारतों में भारतीय शिल्प - जैसे आलंकरण, फूल-पत्ती के डिज़ाइन, कमल आकृति, और अलंकारिक स्तंभ - स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इससे एक नया मिश्रणात्मक स्थापत्य-रूप उभरा, जिसने न केवल सल्तनत काल बल्कि आगे के सैय्यद, लोदी और मुगल काल को भी प्रभावित किया। यही प्रभाव भारत में इस्लामी स्थापत्य को स्थानीय विशेषताओं के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सफल बना, जिसके कारण इस युग की इमारतें आज भी भारत की कला-परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं।
महात्मा गांधी की शहादत: एक राष्ट्र, एक विचारधारा और अमर नैतिक विरासत
लखनऊवासियो, भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि त्याग, नैतिकता और आत्मबल की एक गहरी यात्रा था और इस यात्रा के केंद्र में महात्मा गांधी का नाम सबसे उज्ज्वल रूप में उभरता है। 30 जनवरी का दिन हमें उस क्षण की याद दिलाता है, जब देश ने अपने नैतिक मार्गदर्शक को खो दिया, लेकिन उनके विचार और मूल्य हमेशा के लिए अमर हो गए। यही कारण है कि हर वर्ष 30 जनवरी को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि महात्मा गांधी के विचारों, उनके बलिदान और उनके द्वारा दिए गए संदेश को याद किया जा सके। शहीद दिवस हमें गांधी जी के बलिदान, अहिंसा और सत्य के संदेश को फिर से आत्मसात करने का अवसर देता है। आज के इस लेख में हम सबसे पहले महात्मा गांधी के व्यक्तित्व और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका को समझेंगे। इसके बाद 30 जनवरी 1948 की उस घटना पर चर्चा करेंगे, जिसने पूरे देश को शोक में डुबो दिया। फिर हम गांधी जी के विचारों और सिद्धांतों को जानेंगे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को नैतिक दिशा दी। आगे उनके प्रमुख आंदोलनों और योगदान पर नज़र डालेंगे। अंत में, हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि उनकी शहादत आज के भारत में क्यों और कैसे प्रासंगिक बनी हुई है।
महात्मा गांधी का परिचय और स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका महात्मा गांधी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली और केंद्रीय व्यक्तित्व थे। उन्होंने न केवल अंग्रेज़ी शासन के ख़िलाफ़ जनआंदोलनों का नेतृत्व किया, बल्कि आम जनता को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने का कार्य भी किया। उनके नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन एक जनआंदोलन बना, जिसमें हर वर्ग और हर आयु के लोग शामिल हुए। गांधी जी का व्यक्तित्व सादगी, अनुशासन और नैतिकता का प्रतीक था, जिसने उन्हें “राष्ट्रपिता” के रूप में स्थापित किया। उन्होंने संघर्ष के दौरान यह सिद्ध किया कि नैतिक शक्ति और जनसमर्थन किसी भी साम्राज्यवादी ताक़त से अधिक प्रभावशाली हो सकते हैं।
30 जनवरी 1948: महात्मा गांधी की हत्या और शहीद दिवस 30 जनवरी 1948 का दिन भारतीय इतिहास के सबसे पीड़ादायक और अविस्मरणीय क्षणों में से एक माना जाता है। इसी दिन महात्मा गांधी की उनकी नियमित प्रार्थना सभा के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ ही महीनों बाद हुई, जब देश अभी नवस्वतंत्र भारत की दिशा और भविष्य को आकार दे रहा था। गांधी जी की हत्या की खबर ने पूरे देश को गहरे शोक और स्तब्धता में डुबो दिया। लाखों लोगों के लिए यह केवल एक नेता की मृत्यु नहीं थी, बल्कि नैतिक नेतृत्व और मानवीय मूल्यों की क्षति थी। उनकी शहादत उस विचारधारा पर प्रहार थी, जो अहिंसा, सह-अस्तित्व, धार्मिक सौहार्द और सामाजिक समरसता पर आधारित थी। यही कारण है कि 30 जनवरी को हर वर्ष शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि महात्मा गांधी के बलिदान, उनके संघर्ष और उनके जीवन मूल्यों को स्मरण किया जा सके और आने वाली पीढ़ियों को उनके आदर्शों से प्रेरणा मिल सके।
महात्मा गांधी के विचार और सिद्धांत महात्मा गांधी के विचार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा और दिशा तय करने वाले सिद्धांत थे। सत्याग्रह और अहिंसा उनके सबसे प्रमुख और प्रभावशाली विचार माने जाते हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने अन्याय, शोषण और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष किया। गांधी जी का विश्वास था कि किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनाए गए साधन उतने ही पवित्र और नैतिक होने चाहिए जितना स्वयं लक्ष्य। उनके अनुसार हिंसा से प्राप्त किया गया परिणाम स्थायी नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत नैतिकता और सामाजिक नैतिकता में कोई अंतर नहीं होना चाहिए, क्योंकि समाज की नैतिकता व्यक्तियों के आचरण से ही बनती है। उनके विचारों ने न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में संघर्ष और विरोध के तरीकों को एक नई दिशा दी। आज भी उनके विचार शांति, सहिष्णुता और संवाद के महत्व को रेखांकित करते हैं और आधुनिक समाज के लिए उतने ही प्रासंगिक बने हुए हैं।
स्वतंत्रता संग्राम में गांधी के प्रमुख आंदोलन और योगदान महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिनका उद्देश्य आम जनता को जागरूक करना और ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ संगठित करना था। असहयोग आंदोलन के माध्यम से उन्होंने विदेशी शासन की वैधता को चुनौती दी, जबकि दांडी मार्च ने औपनिवेशिक कानूनों के अन्यायपूर्ण स्वरूप को दुनिया के सामने उजागर किया। इन आंदोलनों ने जनता में आत्मसम्मान और एकजुटता की भावना को मज़बूत किया। गांधी जी का योगदान केवल आंदोलनों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय एकता पर भी लगातार बल दिया।
महात्मा गांधी की शहादत का महत्व और आज के भारत में प्रासंगिकता महात्मा गांधी की शहादत आज भी भारत के लिए गहरा संदेश रखती है। उनके जीवन और बलिदान से यह सीख मिलती है कि हिंसा के बिना भी बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन संभव हैं। आज के समय में, जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, गांधी जी के विचार—सहिष्णुता, संवाद और शांति—और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। शहीद दिवस केवल अतीत को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन का अवसर भी है कि हम गांधी जी के मूल्यों को अपने जीवन और समाज में कितना आत्मसात कर पा रहे हैं।
कैसे पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर, लखनऊ के घरों को संस्कृति, सौंदर्य और पहचान देता है
लखनऊवासियों के लिए घर केवल चार दीवारों का ढाँचा नहीं, बल्कि तहज़ीब, सलीक़े और सांस्कृतिक विरासत का विस्तार होता है। यहाँ की जीवनशैली में कला, नफ़ासत और संतुलन की झलक हर चीज़ में दिखाई देती है - चाहे वह पहनावा हो, खानपान या फिर घर की सजावट। ऐसे में फ़र्नीचर केवल उपयोग की वस्तु नहीं रहता, बल्कि वह घर के व्यक्तित्व और सोच को भी दर्शाता है। आज लखनऊ के बाज़ारों में पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर और आधुनिक डिज़ाइनों का ऐसा सुंदर संगम देखने को मिलता है, जो अतीत की कारीगरी और वर्तमान की ज़रूरतों - दोनों को साथ लेकर चलता है। भारतीय फ़र्नीचर की यह यात्रा सदियों पुराने सामाजिक बदलावों, विदेशी प्रभावों और स्थानीय शिल्प परंपराओं से होकर आज के स्वरूप तक पहुँची है। आज इस लेख में हम भारतीय फ़र्नीचर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके विकास को समझेंगे। इसके बाद मध्यकालीन भारत में शाही संरक्षण और फ़र्नीचर निर्माण की भूमिका पर चर्चा करेंगे। फिर मुगल काल और यूरोपीय प्रभावों से बनी विविध फ़र्नीचर शैलियों को जानेंगे। आगे भारतीय फ़र्नीचर में प्रयुक्त नक्काशी, जड़ाई और सामग्रियों के महत्व पर बात करेंगे। अंत में, उन पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर वस्तुओं को समझेंगे, जो आज लखनऊ सहित देशभर में फिर से लोकप्रिय हो रही हैं।
भारतीय फ़र्नीचर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विकास यात्रा प्राचीन भारत में फ़र्नीचर आज की तरह रोज़मर्रा के जीवन का अनिवार्य हिस्सा नहीं था। लोग अधिकतर फ़र्श पर बैठकर जीवन व्यतीत करते थे और साधारण जीवनशैली को महत्व दिया जाता था। फिर भी, वेदिक ग्रंथों और प्राचीन साहित्य में पीढ़ा, खाटा, मुंडा और चौकी जैसी कुछ फ़र्नीचर वस्तुओं का उल्लेख मिलता है। ये वस्तुएँ विशेष अवसरों, धार्मिक कार्यों या विशिष्ट वर्ग तक ही सीमित थीं। धीरे-धीरे समाज की संरचना बदली, निजी स्थानों की अवधारणा विकसित हुई और आराम व सुविधा को अधिक महत्व मिलने लगा। इसी क्रम में फ़र्नीचर की उपयोगिता बढ़ी और वह धीरे-धीरे भारतीय घरों का हिस्सा बनने लगा। यह विकास एकदम अचानक नहीं हुआ, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव और ज़रूरतों के साथ आकार लेता गया। मध्यकालीन भारत में फ़र्नीचर निर्माण और शाही संरक्षण मध्यकालीन भारत में फ़र्नीचर निर्माण को विशेष रूप से शाही संरक्षण प्राप्त हुआ। दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य के दौरान यह कला अपने चरम पर पहुँची। इस समय लकड़ी के कारीगरों को राजपरिवार का संरक्षण और सम्मान प्राप्त था, जिससे उनकी कला में निखार आया। उस दौर का फ़र्नीचर मुख्यतः राजसी उपयोग के लिए बनाया जाता था - जैसे सिंहासन, दरबारी आसन, महलों के दरवाज़े, खंभे और सजावटी संरचनाएँ। इन वस्तुओं में भव्यता, मजबूती और बारीक कारीगरी का अनोखा मेल दिखाई देता है। आम लोगों के घरों में फ़र्नीचर का प्रचलन अभी भी सीमित था, लेकिन यह काल भारतीय फ़र्नीचर कला की तकनीकी और सौंदर्यात्मक नींव को मज़बूत करने वाला साबित हुआ।
मुगल काल में भारतीय फ़र्नीचर पर कलात्मक प्रभाव 16वीं शताब्दी में मुगलों के आगमन के साथ उत्तर भारत में फ़र्नीचर की शैली में एक नया अध्याय शुरू हुआ। मुगल स्थापत्य और कला की तरह ही फ़र्नीचर में भी भव्यता, संतुलन और अलंकरण पर विशेष ध्यान दिया गया। गहरे रंग की दृढ़ लकड़ियाँ, हड्डी और हाथी दाँत की जड़ाई, शीशों का प्रयोग और जटिल नक्काशी इस दौर की प्रमुख विशेषताएँ रहीं। लेखन मेज़, टेबल, दीवान और आरामदायक आसनों का प्रचलन बढ़ा। लखनऊ जैसे शहर, जहाँ मुगल और बाद में नवाबी संस्कृति का गहरा प्रभाव रहा, वहाँ यह शैली फ़र्नीचर के डिज़ाइनों में आज भी दिखाई देती है। यही कारण है कि लखनऊ के पारंपरिक फ़र्नीचर में शाही ठाठ और नज़ाकत का अहसास बना रहता है। यूरोपीय प्रभाव और इंडो-यूरोपीय फ़र्नीचर शैलियों का विकास 1500 के बाद भारत में पुर्तगाली, डच, फ़्रांसीसी और अंततः अंग्रेज़ों का आगमन हुआ। जब ये यूरोपीय समुदाय भारत में बसे, तो उन्हें अपने रहन-सहन के अनुसार फ़र्नीचर की आवश्यकता पड़ी। उन्होंने भारतीय कारीगरों से वही डिज़ाइन तैयार करने को कहा, जिनका उपयोग वे यूरोप में करते थे, लेकिन स्थानीय लकड़ी और कारीगरी के साथ। इससे भारतीय और यूरोपीय शैलियों का अद्भुत संगम देखने को मिला। गोवानीज़ (Goanese), इंडो-डच (Indo-Dutch) और एंग्लो-इंडियन (Anglo-Indian) जैसी फ़र्नीचर शैलियाँ इसी प्रक्रिया से विकसित हुईं। इन शैलियों में यूरोपीय ढाँचा, लेकिन भारतीय नक्काशी और सजावटी तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। यह दौर भारतीय फ़र्नीचर को वैश्विक प्रभावों से जोड़ने वाला साबित हुआ।
भारतीय फ़र्नीचर में नक्काशी, जड़ाई और सामग्री का महत्व भारतीय फ़र्नीचर की सबसे बड़ी पहचान उसकी उत्कृष्ट नक्काशी और जड़ाई है। सागौन और आबनूस जैसी मज़बूत लकड़ियों का उपयोग इसे टिकाऊ बनाता है, जबकि हाथी दाँत, हड्डी और धातु की जड़ाई इसे विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करती है। पुष्प आकृतियाँ, ज्यामितीय पैटर्न और धार्मिक प्रतीक फ़र्नीचर को केवल उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि कला का रूप देते हैं। लखनऊ के कई पुराने घरों और हवेलियों में आज भी ऐसी कारीगरी के उदाहरण मिलते हैं, जो बीते समय की शिल्प परंपरा की गवाही देते हैं। यही कारीगरी भारतीय फ़र्नीचर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाती है। पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर जो आज फिर से लोकप्रिय हो रहे हैं आधुनिक जीवनशैली के बावजूद, पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर आज फिर से लोगों की पसंद बन रहा है। बाजोट पूजा और सजावट दोनों के लिए उपयोगी है और छोटे घरों में बहुउद्देशीय फ़र्नीचर की तरह काम करता है। प्राचीन सागौन की अलमारियाँ अब केवल भंडारण नहीं, बल्कि घर की शोभा बढ़ाने वाला तत्व बन गई हैं। रंग-बिरंगे कपड़ों से सजे भारतीय ओटोमन छोटे कमरों में अतिरिक्त बैठने की जगह प्रदान करते हैं। दीवान आज भी भारतीय घरों में आराम, संवाद और परंपरा का प्रतीक बना हुआ है, जबकि लकड़ी की जालियाँ आधुनिक घरों में भी निजता और सौंदर्य का संतुलन बनाए रखती हैं। इस प्रकार, पारंपरिक भारतीय फ़र्नीचर लखनऊ के घरों में न केवल अतीत की यादें संजोता है, बल्कि आधुनिक जीवन को सांस्कृतिक गहराई और विशिष्ट पहचान भी प्रदान करता है।
क्यों लखनऊ के किले, इमामबाड़ा और सिकंदर बाग आज भी हमारे इतिहास की धड़कन हैं?
लखनऊवासियों, आपका शहर अपनी नज़ाकत भरी तहज़ीब, शायरी और स्वाद के साथ-साथ अपने भव्य किलों और ऐतिहासिक इमारतों के लिए भी जाना जाता है। नवाबी दौर की यह धरती आज भी उन दीवारों, बुर्जों और गलियारों के ज़रिये अपने अतीत की कहानियाँ सुनाती है, जहाँ कभी सत्ता के फैसले लिए गए, युद्ध लड़े गए और कला व संस्कृति ने नया रूप पाया। लखनऊ की स्थापत्य विरासत केवल देखने की चीज़ नहीं है, बल्कि यह शहर की पहचान, आत्मसम्मान और ऐतिहासिक चेतना का हिस्सा है। इन्हीं इमारतों के माध्यम से हम समझ पाते हैं कि लखनऊ कैसे एक साधारण शहर से इतिहास, वीरता और शिल्पकला का जीवंत प्रतीक बना। आज के इस लेख में हम लखनऊ के इतिहास के पाँच दिलचस्प पहलुओं को छोटी-सी, आसान भाषा में समझेंगे। पहले जानेंगे कि लखनऊ के किले क्यों इतने ख़ास हैं और नवाबी-मुगल दौर में उनकी क्या भूमिका थी। फिर देखेंगे कि एक किले की दीवारें, गढ़, बुर्ज और खाइयाँ कैसे उसकी रक्षा की रीढ़ बनती थीं। इसके बाद बड़ा इमामबाड़ा की अनोखी बिना-सहारे वाली वास्तुकला और उसकी रहस्यमयी भूलभुलैया की कहानी पर नज़र डालेंगे। फिर सिकंदर बाग की उस वीरता भरी दास्तान को महसूस करेंगे, जहाँ 1857 के नायकों ने लड़कर इतिहास लिखा। और अंत में समझेंगे कि ये ऐतिहासिक इमारतें आज भी लखनऊ की पहचान, संस्कृति और गर्व को कैसे संभाले हुए हैं।
लखनऊ के किलों और ऐतिहासिक स्थापत्य की महत्ता लखनऊ के किले और ऐतिहासिक इमारतें सिर्फ ईंट-पत्थरों के ढांचे नहीं हैं - ये शहर की धड़कन, पहचान और स्मृतियाँ हैं। इन किलों में वह अतीत बसता है जिसने लखनऊ की तहज़ीब, राजनीति और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को आकार दिया। नवाबी और मुगल शासनकाल के दौरान इन स्थापनाओं का निर्माण सिर्फ सुरक्षा के उद्देश्य से नहीं हुआ था, बल्कि वे शक्ति, समृद्धि, कलात्मक रुचि और शासन की प्रतिष्ठा के प्रतीक भी थे। बड़ा इमामबाड़ा, सिकंदर बाग, रेज़िडेंसी (residency) और कई अन्य इमारतें आज भी उस दौर की वास्तुकला की कुशलता और सौंदर्यबोध का प्रमाण हैं। हर दीवार, हर मेहराब, हर गलियारा उस समय के युद्धों, सियासी फैसलों, सांस्कृतिक आयोजनों और शिल्पकारों की अद्भुत कला का दर्पण है। इन्हें देखकर आज भी लखनऊवासी अपने इतिहास से गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं।
किले की संरचना: रक्षा, रणनीति और वास्तुकला की मूल विशेषताएँ मध्यकालीन किले एक गहरी रणनीतिक सूझबूझ और सटीक इंजीनियरिंग के साथ बनाए जाते थे। इनकी ऊँची और मजबूत दीवारें दुश्मनों का सबसे पहला अवरोध होती थीं, जबकि प्राचीर सैनिकों को सुरक्षित चलते हुए युद्ध संचालन करने का रास्ता प्रदान करती थीं। इसी के साथ गढ़, यानी दीवार के बाहर निकला हुआ सुदृढ़ ढांचा, सैनिकों को विभिन्न दिशाओं से हमला करने की शक्ति देता था। किलों के चारों ओर बनी खाइयाँ अक्सर गहरी और चौड़ी होती थीं, ताकि आक्रांताओं के लिए किले की दीवार तक पहुँचना लगभग असंभव हो जाए - कुछ जगहों पर इन्हें और भी भयावह बनाने के लिए मगरमच्छ या अन्य खतरनाक जीव भी छोड़े जाते थे। किलों के भव्य गेट सिर्फ प्रवेश-द्वार नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का माध्यम भी थे। इनके ऊपर अक्सर नक्काशी, धातु की कारीगरी और मज़बूत लकड़ी - लोहा लगा होता था। ऊँचेवॉच टावर दूर तक निगरानी रखने के लिए बनाए जाते थे, जबकि प्राचीर के किनारे बनी पैरापेट (Parapets), मेरलॉन (merlons) और क्रेनेल (crenels) सैनिकों को सुरक्षित खड़े होकर हमला करने की सुविधा देती थीं। बुर्ज किले की दीवारों से बाहर निकले ऊँचे टॉवर थे, जहाँ से तोप और बंदूकें चलाई जाती थीं। इन सभी संरचनाओं का संयोजन एक किले को अभेद्य, शक्तिशाली और कलात्मक बनाता था - और यही विशेषताएँ लखनऊ के ऐतिहासिक स्थलों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।
बड़ा इमामबाड़ा: वास्तुकला का चमत्कार और लखनऊ का गौरव बड़ा इमामबाड़ा, जिसे असफ़ी इमामबाड़ा भी कहा जाता है, लखनऊ की ऐतिहासिक और वास्तु विरासत का सबसे शानदार प्रमाण है। 18वीं शताब्दी में नवाब आसफ़-उद-दौला द्वारा बनवाई गई इस इमारत का सबसे अद्भुत पहलू इसका मुख्य हॉल है - जिसमें एक भी पिलर या बीम नहीं है, फिर भी यह दुनिया की सबसे विशाल मेहराबदार संरचनाओं में शुमार है। यह इंजीनियरिंग का ऐसा चमत्कार है जिसकी मिसाल दुनिया में बहुत कम मिलती है। इस इमारत का सबसे रोचक हिस्सा भूलभुलैया है, जिसमें 489 एक जैसे दरवाज़े हैं। तंग गलियारे और मोड़-घुमाव इस तरह बनाए गए हैं कि कोई भी आसानी से दिशा भ्रमित हो सकता है। बताया जाता है कि यह भूलभुलैया सुरक्षा व्यवस्था, प्राकृतिक ठंडक और घुसपैठियों को भ्रमित करने के उद्देश्य से बनाई गई थी। बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण सिर्फ वास्तुकला की दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवता की भावना से भी महान है - 1784 के अकाल के समय इस परियोजना ने हज़ारों लोगों को रोज़गार देकर उनकी आजीविका बचाई थी। इस परिसर का रूमी दरवाज़ा, अपनी तुर्की शैली की नक्काशी और विशाल मेहराब के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध है। धार्मिक दृष्टि से भी यह स्थल अत्यंत महत्व रखता है, जहाँ विशेषकर मुहर्रम के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं। इस प्रकार, बड़ा इमामबाड़ा इतिहास, कला और अध्यात्म का एक अद्वितीय संगम है।
सिकंदर बाग: कला, संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक सिकंदर बाग लखनऊ के इतिहास में एक ऐसी जगह है जहाँ सौंदर्य और बलिदान दोनों एक साथ दर्ज हैं। नवाब वाजिद अली शाह ने इसे अपनी प्रिय पत्नी सिकंदर बेगम के लिए एक सुंदर उद्यान और विश्रामस्थल के रूप में बनवाया था। इसकी वास्तुकला, मस्जिदें और हरियाली उस समय की नवाबी शान को दर्शाती हैं। लेकिन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह शांत उद्यान अचानक एक भीषण युद्धस्थल में बदल गया। ब्रिटिश सेना ने यहाँ हमला किया और लगभग 2,000 भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने अद्भुत साहस दिखाते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया। इस युद्ध में उदा देवी, एक वीर दलित महिला योद्धा, ने अकेले कई अंग्रेज़ सैनिकों को मार गिराया था। उनकी बहादुरी आज भी प्रेरणा देती है। आज का सिकंदर बाग उस संघर्ष, बलिदान और देशभक्ति का जीवंत स्मारक है। इसकी दीवारें सिर्फ ईंटें नहीं, बल्कि उन शहीदों की यादें संभाले हुए हैं जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए।
लखनऊ की ऐतिहासिक संरचनाएँ: अतीत की कहानियाँ और सांस्कृतिक पहचान लखनऊ की असंख्य ऐतिहासिक इमारतें - किले, महल, मस्जिदें, उद्यान और तोपखाने - शहर के समृद्ध अतीत की जीवंत गाथाएँ हैं। इनमें युद्धों की रणनीति, नवाबों की जीवनशैली, सांस्कृतिक उत्सवों और शिल्पकला की परंपराएँ छिपी हुई हैं। आज ये इमारतें केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक संरक्षण का माध्यम बन चुकी हैं। वे लखनऊ की पहचान को मजबूत करती हैं और हमें यह याद दिलाती हैं कि यह शहर सिर्फ वर्तमान में नहीं, बल्कि एक ऐसे गौरवशाली इतिहास में भी सांस लेता है जिसे दुनिया सलाम करती है।
लखनऊ की बदलती ज़िंदगी और बढ़ता ई-वेस्ट:तकनीक की सुविधा और पर्यावरण की चुनौती
लखनऊवासियों, तेज़ी से बदलती तकनीक और बढ़ते डिजिटल उपयोग ने हमारे जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है, लेकिन इसके साथ एक गंभीर समस्या भी सामने आई है - इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट, यानी ई-वेस्ट (e-waste)। पुराने मोबाइल, लैपटॉप, टीवी, बैटरियाँ और घरेलू उपकरण आज हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं और इनके बेकार हो जाने के बाद उनका सही तरीके से निपटान न होना एक बड़ी चिंता बनता जा रहा है। भारत के अन्य शहरों की तरह लखनऊ भी इस बढ़ते ई-वेस्ट संकट से अछूता नहीं है, जिससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम लगातार बढ़ते जा रहे हैं। आज इस लेख में हम भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट की बढ़ती समस्या को समझेंगे। इसके बाद जानेंगे कि ई-वेस्ट के साथ कितनी कीमती धातुएँ नष्ट हो रही हैं। फिर हम उन शहरों पर नज़र डालेंगे जहाँ सबसे ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है। आगे, इसके पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की चर्चा करेंगे। इसके साथ ही, ई-वेस्ट के विभिन्न प्रकारों को समझेंगे और अंत में भारत में इसके पुनर्चक्रण की प्रक्रिया पर विस्तार से बात करेंगे।
भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट की बढ़ती समस्या भारत आज दुनिया के सबसे बड़े इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट उत्पादकों में गिना जाने लगा है और हर साल लाखों टन ई-वेस्ट उत्पन्न कर रहा है। बीते कुछ वर्षों में इस कचरे की मात्रा में तेज़ी से वृद्धि दर्ज की गई है, जिसका मुख्य कारण उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का बढ़ता उपयोग और उनके जीवनकाल का लगातार कम होते जाना है। मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप, टीवी और घरेलू उपकरण अब जल्दी पुराने हो जाते हैं, जिससे कचरे की समस्या और गंभीर होती जा रही है। तेज़ी से शहरीकरण कर रहे शहरों में भी यह स्थिति साफ़ दिखाई देती है। यहाँ बढ़ती आबादी, डिजिटल निर्भरता और आधुनिक जीवनशैली के कारण इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खपत लगातार बढ़ रही है, जिससे ई-वेस्ट की मात्रा में भी निरंतर इज़ाफ़ा हो रहा है। अब यह समस्या केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मध्यम आकार के शहरों में भी ई-वेस्ट का प्रभावी प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन चुका है। इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के साथ नष्ट हो रही कीमती धातुएँ इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का सही ढंग से पुनर्चक्रण न होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसके साथ कई बहुमूल्य धातुएँ भी बेकार चली जाती हैं। पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में सोना, चांदी, तांबा, एल्युमिनियम (aluminum) और प्लास्टिक जैसी कीमती सामग्रियाँ मौजूद होती हैं, जिनका दोबारा उपयोग किया जा सकता है। भारत में हर साल ई-वेस्ट के ज़रिये अरबों रुपये मूल्य की ये धातुएँ नष्ट हो जाती हैं, जो सीधे-सीधे आर्थिक क्षति का कारण बनती हैं। इसके अलावा, जब ये धातुएँ पुनः प्राप्त नहीं की जातीं, तो नई धातुओं की आपूर्ति के लिए खनन गतिविधियाँ बढ़ानी पड़ती हैं, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचता है।
भारत में सबसे अधिक इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न करने वाले शहर भारत में इलेक्ट्रॉनिक कचरे का सबसे अधिक उत्पादन बड़े शहरी केंद्रों में देखा जाता है। विभिन्न उद्योग संगठनों की रिपोर्टों के अनुसार, मुंबई, दिल्ली और बैंगलोर जैसे शहर ई-वेस्ट उत्पादन में सबसे आगे हैं। इन शहरों में आईटी उद्योग, कॉर्पोरेट कार्यालयों की अधिक संख्या और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स का व्यापक उपयोग इसकी प्रमुख वजह है। हालाँकि, यह समस्या केवल इन महानगरों तक सीमित नहीं रही है। शहरों में भी जैसे-जैसे तकनीक का उपयोग बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ई-वेस्ट की मात्रा भी बढ़ती जा रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि आने वाले समय में छोटे और मध्यम शहरों को भी इस चुनौती के लिए तैयार रहना होगा। इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का अनुचित निपटान पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इसमें मौजूद भारी धातुएँ - जैसे सीसा, पारा और कैडमियम (Cadmium) - मिट्टी और जल स्रोतों में मिलकर उन्हें प्रदूषित कर सकती हैं। इससे कृषि भूमि की उर्वरता घटती है और पीने के पानी की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। यदि ई-वेस्ट को जलाया जाए या अनधिकृत तरीकों से नष्ट किया जाए, तो डाइऑक्सिन (Dioxin) और फ्यूरान (Furan) जैसी विषैली गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण को बढ़ाती हैं। इन रसायनों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से तंत्रिका तंत्र, गुर्दे, लीवर और यहाँ तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का ख़तरा भी बढ़ सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के विभिन्न प्रकार और उनके स्रोत इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट केवल मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा कहीं अधिक व्यापक है। इसमें बड़े घरेलू उपकरण - जैसे फ्रिज, वॉशिंग मशीन और ओवन (oven) - के साथ-साथ स्पीकर्स, साउंड सिस्टम (sound system), मेडिकल उपकरण, एलईडी लाइटें (LED lights), बैटरियाँ, वायरिंग, सौर ऊर्जा प्रणालियाँ और यहाँ तक कि बच्चों के इलेक्ट्रॉनिक खिलौने भी शामिल हैं। इन सभी उपकरणों में कई उपयोगी लेकिन खतरनाक सामग्रियाँ मौजूद होती हैं, जिन्हें यदि सामान्य कचरे के साथ फेंक दिया जाए, तो वे पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं। इसलिए इनका अलग से संग्रह और निपटान बेहद आवश्यक है। भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पुनर्चक्रण की प्रक्रिया भारत में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट के पुनर्चक्रण की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले, ई-वेस्ट का संग्रह और परिवहन किया जाता है, जिसके तहत इलेक्ट्रॉनिक कचरे को विशेष केंद्रों तक पहुँचाया जाता है। इसके बाद श्रेडिंग (shredding), छंटाई और पृथक्करण की प्रक्रिया से प्लास्टिक, धातु और कांच जैसी सामग्रियों को अलग-अलग किया जाता है। इन सभी चरणों के पूरा होने के बाद प्राप्त कच्चा माल दोबारा उपयोग के लिए तैयार किया जाता है और उसे नई इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं या अन्य उत्पादों के निर्माण में लगाया जा सकता है। इस तरह का संगठित और वैज्ञानिक पुनर्चक्रण न केवल पर्यावरण की रक्षा करता है, बल्कि आर्थिक रूप से भी लाभकारी साबित होता है और संसाधनों के संरक्षण में मदद करता है।
आइए याद करें, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का साहसिक नेतृत्व और योगदान
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ!
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक आंदोलनों और पुरुष नेताओं की गाथा नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य महिलाओं के साहस, त्याग और अदम्य संकल्प की कहानी भी है, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए हर प्रकार के सामाजिक और व्यक्तिगत बंधनों को तोड़ा। ऐसे समय में, जब महिलाओं की भूमिका प्रायः घरेलू दायरे तक सीमित मानी जाती थी, उन्होंने आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर नेतृत्व किया, जेल यात्राएँ कीं, अत्याचार सहे और कई बार अपने प्राणों की आहुति तक दे दी। उनका योगदान स्वतंत्र भारत की नींव का वह मजबूत आधार है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। इस व्यापक संघर्ष में 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ, जिसमें अवध और उसकी राजधानी लखनऊ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में महिला नेतृत्व और जनसहभागिता ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। इस लेख में हम सबसे पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं के समग्र योगदान को समझेंगे और यह जानेंगे कि उन्होंने किन-किन रूपों में आंदोलन को मजबूत किया। इसके बाद, हम 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में लखनऊ और अवध की निर्णायक भूमिका पर चर्चा करेंगे, जहाँ संगठित जनप्रतिरोध ने अंग्रेज़ी सत्ता को हिला दिया। आगे, हम बेगम हज़रत महल के नेतृत्व, उनके सैन्य और प्रशासनिक प्रयासों तथा ब्रिटिश सत्ता को दी गई खुली चुनौती को विस्तार से जानेंगे। अंत में, हम रानी लक्ष्मीबाई, सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी और अन्य प्रमुख महिला स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान के माध्यम से यह समझेंगे कि भारतीय लोकतंत्र और गणतंत्र की नींव महिलाओं के संघर्ष और बलिदान से कैसे मजबूत हुई।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का समग्र योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल राजनीतिक आंदोलनों, क्रांतियों और पुरुष नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत महिलाओं की कहानी भी है, जिन्होंने सामाजिक बंधनों, पारिवारिक जिम्मेदारियों और औपनिवेशिक दमन के बीच खड़े होकर आज़ादी की मशाल को जलाए रखा। जब देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब महिलाओं ने केवल समर्थनकर्ता की भूमिका नहीं निभाई, बल्कि वे आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़ी रहीं। उन्होंने जेल यात्राएँ कीं, लाठियाँ खाईं, अपने परिवारों को त्यागा और कई बार अपने प्राणों की आहुति भी दी। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के भारत में, जब महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रखने की सामाजिक प्रवृत्ति प्रबल थी, तब उनका स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल होना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी केंद्रों तक, महिलाओं ने सभाओं, जुलूसों, सत्याग्रहों और सशस्त्र आंदोलनों में भाग लिया। उन्होंने धन संग्रह, गुप्त संदेशों के आदान-प्रदान, शरण देने और घायल क्रांतिकारियों की देखभाल जैसे अनेक कार्यों के माध्यम से आंदोलन को मजबूत आधार प्रदान किया।
1857 के विद्रोह में लखनऊ और अवध की निर्णायक भूमिका 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास का वह मोड़ था, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव को हिला दिया। इस विद्रोह में अवध और विशेष रूप से लखनऊ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। अवध न केवल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्र था, बल्कि राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से भी अंग्रेजों के लिए अत्यंत आकर्षक था। जब अंग्रेजों ने कूटनीतिक चालों के माध्यम से नवाब वाजिद अली शाह को पदच्युत कर अवध पर कब्ज़ा किया, तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि स्थानीय जनता की अस्मिता और स्वाभिमान पर सीधा आघात था। लखनऊ उस समय प्रतिरोध का प्रमुख केंद्र बन गया। यहां सैनिक, ज़मींदार, धार्मिक नेता और आम नागरिक—सब ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला। छावनियों में विद्रोह भड़का, सरकारी प्रतिष्ठानों पर कब्ज़ा किया गया और अंग्रेजी सत्ता को लगभग समाप्त कर दिया गया। यह विद्रोह केवल सैन्य नहीं था, बल्कि यह एक जनांदोलन का रूप ले चुका था, जिसमें महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही।
बेगम हज़रत महल
बेगम हज़रत महल: 1857 के संग्राम की अग्रणी महिला नेता बेगम हज़रत महल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उन दुर्लभ महिला नेताओं में से थीं, जिन्होंने न केवल विद्रोह में भाग लिया, बल्कि उसका नेतृत्व भी किया। वाजिद अली शाह के निष्कासन के बाद उन्होंने परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का मार्ग चुना। उन्होंने लखनऊ में विद्रोह को संगठित किया और अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी। बेगम हज़रत महल का नेतृत्व केवल भावनात्मक नहीं था, बल्कि अत्यंत व्यावहारिक और रणनीतिक भी था। उन्होंने सैनिकों को संगठित किया, हथियारों और संसाधनों की व्यवस्था की और जनता में देशभक्ति की भावना को प्रबल किया। उनके नेतृत्व में लखनऊ कुछ समय के लिए पूरी तरह अंग्रेजों के नियंत्रण से मुक्त हो गया। यह एक असाधारण उपलब्धि थी, विशेषकर उस समय की सामाजिक परिस्थितियों में, जब महिला नेतृत्व की कल्पना भी दुर्लभ थी।
रानी लक्ष्मीबाई
ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध और शासन व्यवस्था बेगम हज़रत महल ने केवल युद्ध ही नहीं लड़ा, बल्कि एक वैकल्पिक स्वदेशी शासन की भी स्थापना की। बेगम हज़रत महल ने 7 जुलाई, 1857 को अपने पुत्र बिरजिस क़द्र को अवध का नवाब घोषित किया और उनके नाम पर शासन चलाया। एक उच्च स्तरीय प्रशासनिक समिति का गठन किया गया, जिसमें विभिन्न वर्गों और समुदायों के प्रतिनिधि शामिल थे। यह शासन व्यवस्था न्याय, स्थानीय सहभागिता और स्वदेशी मूल्यों पर आधारित थी। उन्होंने अंग्रेजों की नीतियों को वैचारिक स्तर पर भी चुनौती दी। महारानी विक्टोरिया की घोषणाओं को अस्वीकार करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि विदेशी शासन किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। हालांकि अंततः अंग्रेजों की आधुनिक सैन्य शक्ति के सामने उन्हें पीछे हटना पड़ा और नेपाल जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। उनके लिए स्वतंत्रता विलासिता से कहीं अधिक मूल्यवान थी।
कस्तूरबा गांधी
राष्ट्रीय आंदोलन में अन्य प्रमुख महिला स्वतंत्रता सेनानियाँ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बेगम हज़रत महल अकेली नहीं थीं। देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक महिलाओं ने अपने-अपने स्तर पर संघर्ष किया। रानी लक्ष्मीबाई ने युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त कर साहस की अमर गाथा लिखी। सरोजिनी नायडू ने महिलाओं को राजनीतिक मंच प्रदान किया और राष्ट्रीय आंदोलनों का नेतृत्व किया। कस्तूरबा गांधी ने सत्याग्रह और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई, जबकि कमला नेहरू ने सविनय अवज्ञा और ‘नो टैक्स’ आंदोलनों को दिशा दी। अरुणा आसफ अली ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय ध्वज फहराकर युवाओं को प्रेरित किया। उषा मेहता ने गुप्त रेडियो के माध्यम से आंदोलन की आवाज़ को जन-जन तक पहुँचाया। सावित्रीबाई फुले और कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने शिक्षा और समाज सुधार के जरिए स्वतंत्रता की चेतना को गहराई दी।
सरोजिनी नायडू
स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और महिलाओं का ऐतिहासिक महत्व भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की विरासत केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना की भी कहानी है। इस विरासत में महिलाओं का योगदान केंद्रीय स्थान रखता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि साहस, नेतृत्व और बलिदान किसी एक लिंग तक सीमित नहीं होते। आज का भारतीय लोकतंत्र, संविधान और गणतंत्र इन्हीं संघर्षों की देन हैं। जब हम स्वतंत्र भारत में अधिकारों और समानता की बात करते हैं, तो उसके मूल में उन महिलाओं का संघर्ष निहित है, जिन्होंने आज़ादी के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया। वास्तव में, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास महिलाओं के बिना अधूरा है और उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
कॉमन मॉर्मन तितली: भारतीय बाग़ों में उड़ती सुंदरता और प्रकृति की चतुर कारीगरी
कॉमन मॉर्मन बटरफ्लाई (Common Mormon Butterfly), जिसे वैज्ञानिक रूप से पैपिलियो पॉलीटेस (Papilio polytes) कहा जाता है, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाई जाने वाली एक बड़ी और आकर्षक तितली प्रजाति है। भारत में यह तितली आमतौर पर बगीचों, पार्कों और फूलों से भरे खुले क्षेत्रों में आसानी से देखी जा सकती है। यह लैंटाना (Lantana), इक्सोरा (Ixora) और गुड़हल जैसे विभिन्न फूलों के रस पर निर्भर रहती है, जिससे इसका पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसके काले पंखों पर बने सफेद धब्बे इसे बेहद सुंदर और पहचानने योग्य बनाते हैं।
कॉमन मॉर्मन तितली के नर और मादा के स्वरूप में स्पष्ट अंतर देखा जाता है। नर तितली के पंख काले होते हैं जिन पर सफेद धब्बे और लंबी पूंछ जैसी संरचना होती है, जबकि मादा तितली के पंख भी काले और सफेद धब्बों वाले होते हैं, लेकिन उसके पिछले पंखों पर लाल रंग के छोटे-छोटे धब्बे भी पाए जाते हैं। यह तितली एक मजबूत उड़ान भरने वाली प्रजाति है और अक्सर ऊँचाई पर उड़ती हुई दिखाई देती है।
इस तितली की एक खास विशेषता इसका अद्भुत बचाव व्यवहार है। इसके कैटरपिलर (caterpillar - कमला) का आकार और रंग पक्षियों की बीट जैसा दिखता है, जिससे शिकारी इसे पहचान नहीं पाते और यह सुरक्षित रहता है। यह प्राकृतिक नकल (मिमिक्री - mimicry) इसे शिकारियों से बचाने में मदद करती है। अपनी सुंदरता, अनोखे व्यवहार और व्यापक उपस्थिति के कारण कॉमन मॉर्मन तितली भारतीय जैव विविधता की एक महत्वपूर्ण और रोचक कड़ी मानी जाती है।
लखनऊवासियों, पराक्रम दिवस पर आइए नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन को जानें
लखनऊवासियों, हमारा शहर अपनी तहज़ीब, गहरी सोच और ऐतिहासिक चेतना के लिए जाना जाता है। यहाँ जब भी किसी महान व्यक्तित्व को याद किया जाता है, तो वह केवल औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं होती, बल्कि आत्मचिंतन का एक सजीव अवसर बन जाती है। आज का दिन भी ऐसा ही है। आज हम पराक्रम दिवस मना रहे हैं, जो भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत की स्वतंत्रता केवल विचारों और भाषणों से नहीं मिली, बल्कि साहसिक निर्णयों, अनुशासन और असंख्य बलिदानों से संभव हुई। नेताजी का जीवन इसी पराक्रम का प्रतीक है। उनका संघर्ष, उनकी दृष्टि और उनका नेतृत्व आज भी हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हम अपने कर्तव्यों और देश के प्रति ज़िम्मेदारी को कितनी गंभीरता से निभा रहे हैं। आज हम सबसे पहले यह जानेंगे कि पराक्रम दिवस क्यों मनाया जाता है और इसका वास्तविक महत्व क्या है। इसके बाद हम नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रारंभिक जीवन पर नज़र डालेंगे, जहाँ से उनके विचारों और साहस की नींव पड़ी। फिर हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को समझेंगे और यह जानेंगे कि उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व किस प्रकार किया। अंत में, हम उन मूल्यों और सीखों पर चर्चा करेंगे जो नेताजी ने अपने जीवन से हमें दीं और जो आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।पराक्रम दिवस क्यों मनाया जाता है पराक्रम दिवस केवल एक महान नेता की जयंती मनाने का दिन नहीं है। यह उस निडर सोच और साहसिक दृष्टिकोण का स्मरण है जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। नेताजी का मानना था कि स्वतंत्रता के लिए केवल प्रतीक्षा करना या याचिकाएँ देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए दृढ़ निश्चय, अनुशासन और संगठित प्रयास आवश्यक हैं। पराक्रम दिवस हमें यह याद दिलाता है कि राष्ट्रहित के लिए व्यक्तिगत सुख, पद और प्रतिष्ठा का त्याग करना ही सच्चा साहस है। यह दिन विशेष रूप से युवाओं को प्रेरित करता है कि वे कठिन परिस्थितियों से घबराएँ नहीं, बल्कि उन्हें बदलने का संकल्प लें।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का प्रारंभिक जीवन सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक में हुआ। बचपन से ही उनमें अनुशासन, आत्मसम्मान और देशप्रेम की भावना स्पष्ट दिखाई देती थी। वे पढ़ाई में अत्यंत मेधावी थे और उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की कठिन परीक्षा भी उत्तीर्ण की। उस समय यह सेवा सम्मान, स्थिरता और शक्ति का प्रतीक मानी जाती थी, लेकिन नेताजी के लिए यह सब देश की आज़ादी से बड़ा नहीं था। ब्रिटिश शासन के अधीन कार्य करना उन्हें स्वीकार नहीं था, इसलिए उन्होंने एक सुरक्षित और उज्ज्वल भविष्य को त्यागकर स्वतंत्रता संग्राम का कठिन मार्ग चुना।यह निर्णय दर्शाता है कि नेताजी केवल विचारों के नेता नहीं थे, बल्कि अपने विचारों को जीवन में उतारने का साहस भी रखते थे। प्रारंभिक जीवन में किए गए त्याग और संघर्ष ने आगे चलकर उनके पूरे नेतृत्व को मज़बूत आधार प्रदान किया।स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी का योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी का योगदान विशिष्ट और अलग था। वे मानते थे कि केवल सभाओं, प्रस्तावों और आश्वासनों से आज़ादी प्राप्त नहीं की जा सकती। उनके अनुसार संगठित शक्ति और स्पष्ट रणनीति ही स्वतंत्रता का मार्ग खोल सकती है। इसी सोच ने उन्हें पारंपरिक रास्तों से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।नेताजी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आज़ादी का पक्ष मजबूती से रखा और यह स्पष्ट किया कि भारत की लड़ाई केवल एक उपनिवेश की समस्या नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और न्याय का प्रश्न है। उन्होंने भारतीयों के भीतर यह विश्वास जगाया कि वे स्वयं अपने भविष्य के निर्माता हैं। उनका योगदान केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी था, जिसने देशवासियों को निर्भीक और आत्मविश्वासी बनाया।
आज़ाद हिंद फ़ौज और नेताजी का नेतृत्व नेताजी का सबसे प्रभावशाली और निर्णायक योगदान आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व रहा। यह सेना केवल सशस्त्र संघर्ष का माध्यम नहीं थी, बल्कि भारतीयों के भीतर स्वाधीनता और आत्मसम्मान की चेतना जगाने का एक सशक्त प्रयास थी। नेताजी ने इस सेना में अनुशासन, समानता और राष्ट्रप्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया।उनका प्रसिद्ध आह्वान — “तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” — उस समय की जनभावनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति था। इस आह्वान ने यह स्पष्ट कर दिया कि स्वतंत्रता के लिए त्याग अनिवार्य है। आज़ाद हिंद फ़ौज ने यह सिद्ध किया कि भारतीय स्वयं संगठित होकर अपने देश के लिए बलिदान देने को तैयार हैं, और यही भावना स्वतंत्रता संग्राम को नई शक्ति प्रदान करती है।
नेताजी से मिलने वाली सीख नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जीवन आज भी हमें कई महत्वपूर्ण सीख देता है। उनकी पहली सीख साहस की है, यानी कठिन परिस्थितियों में भी सही और दृढ़ निर्णय लेने की क्षमता। दूसरी सीख अनुशासन से जुड़ी है, क्योंकि बिना अनुशासन के कोई भी आंदोलन या उद्देश्य सफल नहीं हो सकता। तीसरी सीख नेतृत्व की है, जहाँ नेताजी ने यह दिखाया कि सच्चा नेतृत्व आदेश देने से नहीं, बल्कि स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करने से बनता है।सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि राष्ट्रहित को हमेशा व्यक्तिगत हित से ऊपर रखा जाना चाहिए। उनका जीवन यह भी सिखाता है कि जब लक्ष्य स्पष्ट हो और संकल्प अडिग हो, तो सबसे कठिन परिस्थितियाँ भी बदली जा सकती हैं।
आज के समय में पराक्रम दिवस का महत्व आज के समय में पराक्रम दिवस हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। यह दिन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम अपनी स्वतंत्रता, अपने अधिकारों और अपने कर्तव्यों को कितनी गंभीरता से लेते हैं। नेताजी के विचार आज भी हमें साहस, ज़िम्मेदारी और कर्मठता की प्रेरणा देते हैं। यह दिवस केवल अतीत का स्मरण नहीं करता, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शन प्रदान करता है।
जनसंख्या (2025)Source:
Census 2011; population projections based on 2011 city growth rates.
4,025,310
इंटरनेट उपयोगकर्ता
इंटरनेट उपयोगकर्ताSource:
The number of Internet connections was determined by multiplying the number of urban Internet subscribers with the percentage of the District Headquarters (DHQ) population in relation to the total urban population. The value was allocated to DHQs based on population ratio. Urban population is distributed in a 1.5:1 ratio between DHQ and non-DHQ cities. (TRAI September 2025 Report / Number)
4,404,035
फेसबुक उपयोगकर्ता
फेसबुक उपयोगकर्ताSource:
Maximum No. of Facebook Users. (As per Facebook Ad Module, 31 December 2025)
1,550,000
लिंक्डइन उपयोगकर्ता
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The number of unique member accounts that could be potentially reached in the city. (LinkedIn Ad Module, December 2025)
3,700,000
ट्विटर उपयोगकर्ता
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Maximum No. of Twitter Users (X Ad Module,December 2025)
1,250,000
इंस्टाग्राम उपयोगकर्ता
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Maximum No. of Instagram Users (Instagram Ad Module,December 2025)