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जौनपुर के अप्रकाशित शिलालेख

जौनपुर

 16-03-2022 10:40 AM
ध्वनि 2- भाषायें

जौनपुर में, आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत में, दो अप्रकाशित शिलालेख हैं।जिसमें एक शाहम बेग का है, जो पहले हुमायूँ के एक सामानवाही नौकर थे, और बाद में अली कुली खान जमान (अकबर के शासनकाल के दौरान जौनपुर के राज्यपाल, जो 974 ईस्वी में मारे गए थे, जब उनके महाराज के खिलाफ विद्रोह हुआ था) के काफी पसंदीदा बन गए। दूसरा शिलालेख शाहम बेग के पिता हैदर का है। शाहम बेग और हैदर की कब्रों पर दो शिलालेख को देखा जा सकता है। ये खास हौज (जौनपुर के एक उपनगर में एक बहुत बड़ा तालाब है जो तहसील खौतहान के रास्ते पर है।) के बीच में दो अलग- अलग मिट्टी के स्तूप में स्थित हैं।
शाहम बेग की कब्र एक ईंट के चबूतरे पर खड़ी है, जो उत्तर से दक्षिण तक लगभग 40 फीट लंबी, पूर्व से पश्चिम तक 35 फीट चौड़ी और लगभग 3 फीट ऊंची है।कब्र को ढंकते हुए एक क्षैतिज पत्थर की सिल्ली है जिस पर नीचे दिया गया फारसी शिलालेख है। शिलालेख के मुख्य भाग के बाहर सिल्ली के ढलान वाले किनारे पर, फारसी वर्णों की एक पंक्ति में एक सीमांत अभिलेख है, जो नीचे की ओर फैला हुआ है। शाहम बेग अपनी एक पूर्व मालकिन के सम्मान में सरहरपुर (इस स्थान की पहचान अभी तक नहीं की गई है और ऐसा माना जाता है कि यह जौनपुर से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित है) नामक स्थान पर एक विवाद में मारा गया था। वहीं शिलालेख का अनुवाद इस प्रकार है:
मेरी मृत्यु के दिन मेरी ओर से कोई शोक करने वाला न होगा, सिवाय मेरी अपनी आंसू भरी आंखों के।
# शाहम, उत्कृष्टता के बगीचे का फूल, इस दुनिया से अपने लग्न सौभाग्य की मदद से स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर गया है।
# वह मनोहर मेरी दुनिया देखने वाली आंख थी। हाय! वह मेरी दृष्टि से ओझल हो गया है।
# देखिए इस युवक पर क्या अत्याचार किया गया, जैसा कि यज़ीद के लोगों द्वारा संत हुसैन पर किया गया था।
# राजा, जिसने भाषण के खिलाफ अपने होठों को बंद कर दिया, वह उस बुलबुल के समान है जिसने गुलाब के अभाव में गीत गाना छोड़ दिया हो।
# जब जन्नत से उसकी मौत की तारीख पूछी गई तो अपने उदासीन चहरे से वह बोला, शाहम शहीद हो गया।
हालांकि शाहम बेग की मृत्यु की तारीख एक अंदाजा है, वास्तव में उनकी मृत्यु की तारीख स्पष्ट नहीं है। वहीं शाहम बेग के मकबरे के चबूतरे के दक्षिण-पश्चिम कोने से कुछ फीट की दूरी पर एक और ईंट का चबूतरा है, जो दूसरे के आकार का लगभग एक-तिहाई है, जिसमें एक कब्र है और सिर से लेकर पांव तक बीच में एक टीला है। ऐसा लगता है कि किसी सिल्ली ने इसे कभी आवृत नहीं किया। यह स्थान स्थानीय रूप से अली कुलीखान की कब्रगाह मानी जाती है।खास हौज के पश्चिमी तट पर, उत्तर-पश्चिम कोने के दक्षिण में तालाब की लंबाई के लगभग एक तिहाई हिस्से में, एक मकबरा मौजूद है। मकबरे पर फारसी में एक शब्द हैदर उत्कीर्ण है, इनकी मृत्यु का वर्ष आंकड़ों में (हालांकि इनकी मृत्यु का सटीक वर्ष याद नहीं है, लेकिन यह अकबर के शासनकाल से जुड़ा हुआ है) लिखा गया है। वहीं अटाला मस्जिद में संरक्षित एक शिथिल पत्थर पर एक शिलालेख है, जिसे शर्की वास्तुकला में नंबर x के रूप में प्रकाशित किया गया है।जिसका अनुवाद कुछ इस प्रकार है :
# ईश्वर की विशेष स्तुति करो कि फिरोज शाह के शासनकाल में,
# एक राजा जो दया से विश्वासियों का केंद्र बन जाता है,
# सात सौ पैंसठ वर्ष में,
# शव्वाल के प्रथम रविवार के शुभ मुहूर्त में,
# भरपूर ख्वाजा कामिल, खान जहान,
# यथेष्ट ख्वाजा कामिल खान जहान,
# आनंद के लिए इस मस्जिद की स्थापना की गई।
मस्जिद के निर्माण की शुरुआत फिरोज शाह तुगलक के शासनकाल के तहत हुई थी। जौनपुर शहर की स्थापना की गई थी जब वे या तो बंगाल से जा रहे थे या वापस लौट रहे थे। संभवतःअटाला मस्जिद के निर्माण की शुरुआत शहर की इमारत से पर्याप्त कामगारों को मुक्त करने के तुरंत बाद कर दी गई थी।

संदर्भ :-
https://bit.ly/3we2OAx

चित्र सन्दर्भ
1. जौनपुर किले को दर्शाता चित्रण (prarang)
2. नाई का मकबरा (नई का गुंबद) को दर्शाता चित्रण (wikimedia)
3. अटाला मस्जिद को दर्शाता चित्रण (wikimedia)



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