कृषि क्षेत्र में बढ़ता मशीनीकरण का प्रभाव

जौनपुर

 03-06-2021 08:30 AM
वास्तुकला 2 कार्यालय व कार्यप्रणाली भूमि प्रकार (खेतिहर व बंजर)

भारत दुनिया के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 2.4 प्रतिशत, और जल संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत उपभोग करता है। लेकिन दुनिया की करीब 17 फीसदी आबादी और 15 फीसदी पशुधन यहां रहते हैं। इस प्रकार, कृषि सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है, जो देश की अर्थव्यवस्था में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 14 प्रतिशत योगदान देती है। देश की लगभग आधी आबादी आज भी कृषि क्षेत्र पर निर्भर है, साथ ही खाद्यान से जुड़े उद्पाद देश के कुल निर्यात में लगभग 11 प्रतिशत की भागीदारी देते हैं। भारत वर्तमान में कृषि औसत चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि (CAGR) के 2.8% की औसत दर से बढ़ रहा है। भारत के कृषि क्षेत्र में मशीनीकरण अभी भी अपने पहले चरण में है, जिसने पिछले दो दशकों के दौरान लगभग 5 प्रतिशत की न्यूनतम विकास दर हासिल की है। मशीनीकरण से तात्पर्य कृषि कार्यों के संचालन के लिए मानव और पशु श्रम से फसल उत्पादन के स्थान पर मशीनों के उपयोग से है। अर्थात मशीनीकरण यांत्रिक ऊर्जा को जैविक स्रोतों में परिवर्तित करने की एक प्रक्रिया है। मशीनीकरण में ट्रैक्टर, थ्रेशर, हार्वेस्टर, पंपसेट जैसी विभिन्न मशीनें शामिल हैं। यहाँ कृषि क्षेत्र मशीनीकरण सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल 14 प्रतिशत योगदान है जिस कारण भारत में कृषि अधिक लाभदायक साबित नहीं हो रही है। यहाँ मशीनीकरण की दर (भारत 55%) है, जो अभी भी कुछ देशों जैसे की संयुक्त राज्य (95%), पश्चिमी यूरोप (95%), रूस (80%),ब्राजील (75%) और चीन (57%) (रेनपू, 2014) से कम है। कृषि भूमि हेतु बिजली की उपलब्धता भी चीन, कोरिया और जापान जैसे देशों से कम है। भारत कृषि में अन्य कृषि क्रियाकलापों के विपरीत कृषि मशीनीकरण की संरचना अत्यंत जटिल है। यह मशीनीकरण से संबंधित विभिन्न चुनौतियों का सामना कर रहा है। जैसे कृषि मशीनरी और उपकरण का अभाव , प्रौद्योगिकी, बाजार, उपकरण संचालन इत्यादि।
देश के विभिन्न हिस्सों में जमीन, फसल, नमी इत्यादि के आधार पर मशीनों (उपकरणों) की आवश्यकता और संख्या बदल जाती है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के पूर्वी मैदानी क्षेत्र- आजमगढ़, मऊ, बलिया, फैजाबाद, गाजीपुर, जौनपुर, संत रविदास नगर और वाराणसी जिले इस उप क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। यहाँ पर वर्षा का स्तर (1,025 मिमी) जो की सामान्य तथा पर्याप्त है। जलवायु शुष्क उप-आर्द्र से नम उप-आर्द्र है। इन क्षेत्रों में 70% से अधिक भूमि पर खेती की जाती है, और 80% से अधिक खेती सिंचाई योग्य है।
उत्तर प्रदेश के अंतर्गत आने वाले भौगोलिक क्षेत्र की मिट्टी आमतौर पर जलोढ़ मृदा होती है। यह मिट्टी दोमट होती है, जिसमें अधिक मात्रा में कार्बनिक पदार्थ की उपस्थिति होती है। यहाँ खरीफ मौसम में चावल, मक्का, अरहर, मूंग की फसलें उगाई जा सकती हैं। और बरसात के बाद (रबी) मौसम में गेहूं, मसूर, चना, मटर, तिल और कुछ स्थानों पर मूंगफली को सिंचाई करके उगाया जा सकता है। क्षेत्र की महत्वपूर्ण नकदी फसलें गन्ना, आलू, तंबाकू, मिर्च, हल्दी और धनिया पूरक सिंचाई के साथ संभव हैं। चावल-गेहूं फसल प्रणाली अधिक प्रसिद्ध है।
कृषि में उपकरणों के संचालन हेतु बिजली की उपलब्धता अनिवार्य है। राज्य में साल 2001 में ई-फार्म बिजली की उपलब्धता 1.75 किलोवाट/हेक्टेयर थी। चूँकि उत्तरप्रदेश अधिक आबादी वाला राज्य है, जहां कुशल सिंचाई तकनीकों के इस्तेमाल के लिए बिजली की अति आवकश्यकता पड़ती है। अतः वर्ष 2020 तक विद्युत क्षमता को 1.75 kW/ha से बढ़ाकर 2 kW/ha करने की आवश्यकता है। माना जा रहा है कि 2020 तक विभिन्न प्रकार की फसलों का 25 से 30 प्रतिशत उत्पादन मशीनों से हो जाएगा। खेती सम्बंधित उपकरणों में ट्रैक्टर सर्वाधिक बिक रहे हैं। साथ ही बड़ी संख्या में भाड़े पर लेजर लैंड लेवलर(लेज़र लैंड लेवलिंग (LLL) एक लेज़र-निर्देशित तकनीक है जिसका उपयोग खेत से मोटी मिट्टी को हटाकर और खेत को समतल करने के लिए किया जाता है। (एलएलएल) फसल स्थापना में सुधार करता है और फसलों को समान रूप से परिपक्व होने में सक्षम बनाता है।) का उपयोग किया जा रहा है।
2020 से शुरू हुई कोरोना महामारी ने अन्य सभी क्षेत्रों की भांति कृषि क्षेत्र के विकास को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। महामारी के कहर से देश के 14 करोड़ कृषि आधारित परिवारों को परेशानी में डाल दिया है। राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही भारतीय वित्त मंत्री ने देश के असहाय वर्ग (किसानों सहित) के लिए 1.7 ट्रिलियन रुपये के पैकेज की घोषणा की। साथ ही पीएम-किसान योजना के तहत आय सहायता के रूप में किसानों के बैंक खातों में 2000 रुपये की अग्रिम राशि भी भेजी गयी। महामारी के दौर में कृषि श्रमिकों की कमी को पूरा करने के लिए सरकारों को राज्य संस्थाओं, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) या कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) के माध्यम से उपयुक्त प्रोत्साहन के साथ आसानी से मशीनरी की उपलब्धता सुनिश्चित करने की जरूरत है।

संदर्भ
https://bit.ly/3wCpcAc
https://bit.ly/3uDY8zu
https://bit.ly/3yM1Wlb
https://bit.ly/3p01Sdn
https://bit.ly/3vxQ0S5

चित्र संदर्भ
1. कृषि मशीन प्रौद्योगिकी का एक चित्रण (wikimedia)
2. सिंचाई हेतु पंप सेट का एक चित्रण(wikimedia)
3. ट्रैक्टर और पावर टिलर का उत्पादन और बिक्री आंकलन का एक चित्रण (economicsdiscussion)


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